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VI. अनुग्रह के युग में बचाए जाने और राज्य के युग में उद्धार पाने के बीच रहे अंतर की सच्चाई के पहलू पर हर किसी को अवश्य स्पष्ट रूप से सहभागिता करनी चाहिए

2. बचाए जाने और उद्धार के बीच सारभूत अंतर क्या है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

"जो मुझ से, 'हे प्रभु! हे प्रभु!' कहता है, उनमें से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है" (मत्ती 7:21)।

"इसलिये तुम पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ" (लैयव्यवस्था 11:45)।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

यद्यपि यीशु ने मनुष्यों के बीच अधिक कार्य किया है, उसने केवल समस्त मानवजाति के छुटकारे के कार्य को पूरा किया और वह मनुष्य की पाप-बलि बना, मनुष्य को उसके भ्रष्ट स्वभाव से छुटकारा नहीं दिलाया। शैतान के प्रभाव से मनुष्य को पूरी तरह बचाने के लिये यीशु को न केवल पाप-बलि के रूप में मनुष्यों के पापों को लेना आवश्यक था, बल्कि मनुष्य को उसके भ्रष्ट स्वभाव से पूरी तरह मुक्त करने के लिए परमेश्वर को और भी बड़े कार्य करने की आवश्यकता थी जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया था। और इसलिए, मनुष्य को उसके पापों के लिए क्षमा कर दिए जाने के बाद, एक नये युग में मनुष्य की अगुवाई करने के लिए परमेश्वर वापस देह में लौटा, और उसने ताड़ना एवं न्याय के कार्य को आरंभ किया, और इस कार्य ने मनुष्य को एक उच्चतर क्षेत्र में पहुँचा दिया। वे सब जो परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन समर्पण करेंगे उच्चतर सत्य का आनंद लेंगे और अधिक बड़ी आशीषें प्राप्त करेंगे। वे वास्तव में ज्योति में निवास करेंगे, और सत्य, मार्ग और जीवन को प्राप्त करेंगे।

"वचन देह में प्रकट होता है" से

प्रथम देहधारण यीशु की देह के माध्यम से मनुष्य को पाप से छुटकारा देने के लिए था, अर्थात्, उसने मनुष्य को सलीब से बचाया, परन्तु भ्रष्ट शैतानी स्वभाव तब भी मनुष्य के भीतर रह गया था। दूसरा देहधारण अब और पापबलि के रूप में कार्य करने के लिए नहीं है परन्तु उन्हें पूरी तरह से बचाने के लिए है जिन्हें पाप से छुटकारा दिया गया था। इसे इसलिए किया जाता है ताकि जिन्हें क्षमा किया गया उन्हें उनके पापों से छुटकारा दिया जा सके और पूरी तरह से शुद्ध किया जा सके, और वे स्वभाव में परिवर्तन प्राप्त कर सकें, उसके परिणामस्वरूप वे शैतान के अंधकार के प्रभाव को तोड़कर आज़ाद हो जाएँ और परमेश्वर के सिंहासन के सामने लौट आएँ। केवल इसी तरीके से ही मनुष्य को पूरी तरह से पवित्र किया जा सकता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "देहधारण का रहस्य (4)" से

जो अंधकार के प्रभाव में रहते हैं, ये वे हैं, जो मृत्यु के मध्य रहते हैं, ये वे हैं जो शैतान द्वारा ग्रसित हैं। बिना परमेश्वर द्वारा बचाए जाने और बिना उसके द्वारा न्याय व ताड़ना पाने के, लोग मृत्यु के प्रभाव से बच नहीं पा रहे हैं, वे जीवित नहीं बन सकते हैं। ये मृतक परमेश्वर के लिए गवाही नहीं दे सकते, ना ही वे परमेश्वर के द्वारा इस्तेमाल किए जा सकते हैं, परमेश्वर के राज्य में तो प्रवेश कर ही नहीं सकते। परमेश्वर को जीवितों की गवाही चाहिए, मृतकों की नहीं, और वो चाहता है कि उसके लिए जीवित कार्य करें, न कि मृतक। "मृतक" वे हैं जो परमेश्वर का विरोध और उससे बगावत करते हैं, ये वे हैं जो आत्मा में सुन्न होकर परमेश्वर के वचन नहीं समझते, ये वे हैं जो सत्य को अपने व्यवहार में नहीं लाते और परमेश्वर के प्रति जरा भी निष्ठा नहीं रखते, ये वे हैं जो शैतान के वश में हैं और शैतान द्वारा शोषित है। मृतक सत्य के विरुद्ध खडे होकर, परमेश्वर का विरोध कर, नीचता कर, घिनौना, दुर्भावनापूर्ण, पाशविक, धोखेबाजी और कपट का व्यवहार कर स्वयं को प्रदर्शित करते हैं। हालांकि ऐसे लोग परमेश्वर का वचन खाते और पीते हैं, परंतु वे परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवन नहीं व्यतीत करते हैं। वे जीवित तो हैं, परंतु वे चलती फिरती लाशें हैं, वे सांस लेने वाली लाशें है। मृतक पूर्णतः परमेश्वर को संतुष्ट करने में असमर्थ हैं, वे उसकी आज्ञा तो बिल्कुल मान ही नहीं सकते। वे केवल उसे धोखा दे सकते हैं, उसकी निंदा कर सकते हैं, और उससे कपट कर सकते हैं, और जैसा वे जीवन जीते हैं शैतान को प्रगट करते हैं। अगर लोग जीवित प्राणी बनना चाहते हैं, और परमेश्वर के गवाह बनना चाहते हैं, और परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त करना चाहते हैं, तो उन्हें परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करना होगा, उन्हें आनंदपूर्वक उसके न्याय व ताड़ना के प्रति समर्पित होना होगा, और आनंदपूर्वक परमेश्वर की काट-छांट और बर्ताव को स्वीकार करना होगा। केवल तब ही परमेश्वर द्वारा जरूरी तमाम सत्य को अपने आचरण में ला सकेंगे, और तब ही परमेश्वर के उद्धार को पा सकेंगे, और सचमुच जीवित प्राणी बन सकेंगे। जीवित परमेश्वर द्वारा बचाए जाते हैं, वे परमेश्वर द्वारा न्याय व ताड़ना का सामना कर चुके हैं, वे स्वयं को समर्पित करने और आनंदपूर्वक अपने प्राणों को परमेश्वर को देने के लिए तत्पर हैं और वे प्रसन्नता से अपना सम्पूर्ण जीवन परमेश्वर को अर्पण करने में भी तत्पर हैं। जब जीवित जन परमेश्वर की गवाही देता है, तब ही शैतान शर्मिन्दा होता है, केवल जीवित ही परमेश्वर के सुसमाचार का प्रचार कर सकते हैं, केवल जीवित ही परमेश्वर के हृदय का अनुसरण करते हैं और केवल जीवित ही वास्तविक जन हैं। पहले परमेश्वर द्वारा बनाया गया मनुष्य जीवित था, परंतु शैतान की भ्रष्टता के कारण मनुष्य मृत्यु के मध्य रहता है, और शैतान के प्रभाव में रहता है, और इसलिए जो मनुष्य बिना आत्मा के हैं, वे मृत हो चुके हैं, वे परमेश्वर के शत्रु बन गए हैं जो उसका विरोध करते हैं, वे शैतान के हथियार बन गए हैं, और वे शैतान के कैदी बन गए हैं, और इसलिए परमेश्वर ने अपनी गवाही खो दी है। और परमेश्वर ने मनुष्यों को खो दिया है, जिसे उसने सृजा था और जो एकमात्र सृजन थे, जिनमें उसकी सांसे थी। अगर परमेश्वर को अपनी गवाही और उन्हें जिसे उसने अपने हाथों से बनाया, जो अब शैतान द्वारा कैद कर लिए गए हैं, वापस लेना है, तो उसे उन्हें वापस नया जन्म देकर जीवित प्राणी बनाना पड़ेगा और उन्हें वापस लाना होगा कि वे उसकी ज्योति में जीवित रहें। मृतक वे हैं जिनमें आत्मा नहीं होती, जो चरमसीमा तक सुन्न और परमेश्वर विरोधी होते हैं। साथ ही, ये वे लोग होते हैं जो परमेश्वर को नहीं जानते। इन लोगों में परमेश्वर की आज्ञा मानने की थोड़ी सी भी इच्छा नहीं होती, वे केवल उससे विद्रोह कर उसका सामना करते हैं और इन में थोड़ी भी निष्ठा नहीं होती है। जीवित वे हैं जिनकी आत्मा ने नया जन्म पाया है, जो परमेश्वर कि आज्ञा मानना जानते हैं, और जो परमेश्वर के प्रति निष्ठावान हैं। ये लोग सत्य और गवाही धारण करते हैं और केवल यही हैं जो परमेश्वर के घर में उसे अच्छे लगते हैं।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "क्या आप जाग उठे हैं?" से

हर एक कार्य जो परमेश्वर करता है वह आवश्यक है, और वह असाधारण महत्व रखता है, क्योंकि वह सब कुछ जो परमेश्वर मनुष्य में करता है वह उसके प्रबंधन एवं मानवजाति के उद्धार से सम्बन्धित होता है। ... दूसरे शब्दों में, इसके बावजूद कि जो कुछ परमेश्वर करता है या वे माध्यम जिनके द्वारा वह इसे करता है, उस कीमत, या उसके उद्देश्य के बावजूद, उसके कार्यों का उद्देश्य बदलता नहीं है। उसका उद्देश्य है कि वह मनुष्य के भीतर परमेश्वर के वचनों, परमेश्वर की अपेक्षाओं, और मनुष्य के लिए परमेश्वर की इच्छा का काम करे; दूसरे शब्दों में, उसका उद्देश्य है कि मनुष्य के भीतर वह सब कुछ किया जाए जिसके विषय में परमेश्वर विश्वास करता है कि ये उसके चरणों के अनुसार रचनात्मक हैं, उसका उद्देश्य है कि मनुष्य को सक्षम बनाया जाए ताकि वह परमेश्वर के हृदय को समझे और परमेश्वर की हस्ती को बूझे, और उसे अनुमति दिया जाए ताकि वह परमेश्वर की संप्रभुता एवं इंतज़ामों को माने, और इस प्रकार मनुष्य को अनुमति दिया जाए कि वह परमेश्वर के भय और बुराई के परित्याग को हासिल करे-जो भी वह करता है उसमें यह सब परमेश्वर के उद्देश्य का एक पहलु है। दूसरा पहलु यह है कि, क्योंकि शैतान एक महीन परत है और परमेश्वर के कार्य में एक मोहरा है, इसलिए मनुष्य को अकसर शैतान को दे दिया जाता है; यह वह साधन है जिसे परमेश्वर उपयोग करता है ताकि शैतान की परीक्षाओं एवं हमलों के बीच लोगों को शैतान की दुष्टता, कुरूपता एवं घिनौनेपन को देखने की अनुमति दे, इस प्रकार लोग शैतान से घृणा करने लग जाते हैं और उसे पहचान जाते हैं जो नकारात्मकता है। यह प्रक्रिया उन्हें अनुमति देती है कि वे धीरे धीरे स्वयं को शैतान के नियन्त्रण से, और शैतान के आरोपों, हस्तक्षेप एवं आक्रमणों से स्वतन्त्र करें-जब तक, परमेश्वर के वचन के कारण, परमेश्वर के विषय में उनके ज्ञान एवं आज्ञाकारिता के कारण, और परमेश्वर में उनके विश्वास एवं भय के कारण, वे शैतान के हमलों के ऊपर विजय न पा लें, और शैतान के आरोपों के ऊपर विजय न पा लें; केवल तभी उन्हें पूरी तरह से शैतान के प्रभुत्व से छुड़ा लिया जाएगा। लोगों के छुटकारे का अर्थ है कि शैतान को हरा दिया गया है; इसका अर्थ है कि वे आगे से शैतान के मुंह का भोजन नहीं हैं-उन्हें निगलने के बजाय, शैतान ने उन्हें छोड़ दिया है। यह इसलिए है क्योंकि ऐसे लोग सच्चे हैं, क्योंकि उनके पास विश्वास, आज्ञाकारिता एवं परमेश्वर के प्रति भय है, और क्योंकि उन्होंने शैतान के साथ पूरी तरह से नाता तोड़ लिया है। वे शैतान को लज्जित करते हैं, वे शैतान को डरपोक बना देते हैं, और वे पूरी तरह से शैतान को हरा देते हैं। परमेश्वर का अनुसरण करने में उनकी आस्था ने, और परमेश्वर के भय एवं आज्ञाकारिता ने शैतान को हरा दिया है, और शैतान को पूरी तरह से उन्हें छोड़ देने के लिए मजबूर किया है। केवल ऐसे ही लोगों को सचमुच में परमेश्वर के द्वारा हासिल किया गया है, और मनुष्य को बचाने के लिए यही परमेश्वर का चरम उद्देश्य है। यदि वे उद्धार पाने की इच्छा करते हैं, और यह कामना करते हैं कि उन्हें पूरी तरह से परमेश्वर के द्वारा हासिल किया जाए, तो वे सभी जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं उन्हें शैतान की परीक्षाओं और बड़े एवं छोड़े हमलों का सामना करना होगा। ऐसे लोग जो इन परीक्षाओं एवं आक्रमणों से उभरकर निकलेंगे और जो शैतान को पूरी तरह से हराने में समर्थ हैं वे ही ऐसे लोग हैं जिन्हें परमेश्वर के द्वारा बचाया गया है। कहने का तात्पर्य है, वे लोग जिन्हें परमेश्वर के लिए बचाया गया है वे ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर की परीक्षाओं से होकर गुज़रे हैं, शैतान के द्वारा अनगिनित बार जिनकी परीक्षा ली गई और जिन पर आक्रमण किया गया है। ऐसे लोग जिन्हें परमेश्वर के लिए परमेश्वर की समझ के लिए और परमेश्वर की इच्छा के लिए और अपेक्षाओं के लिए बचाया गया है, जो चुपचाप परमेश्वर की संप्रभुता एवं इंतज़ामों को स्वीकार करते हैं, और वे शैतान के प्रलोभनों के बीच परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग को नहीं छोड़ते हैं। ऐसे लोग जिन्हें परमेश्वर के लिए बचाया गया है वे ईमानदारी को धारण करते हैं, वे दयालु हैं, वे प्रेम एवं घृणा के बीच अन्तर करते हैं, उनके पास न्याय का एहसास है और वे न्यायसंगत हैं, और वे परमेश्वर की परवाह करने और वह सब संजोकर रखने के योग्य हैं जो परमेश्वर की और से है। ऐसे लोगों को शैतान के द्वारा बांधा नहीं गया है, उनकी जासूसी नहीं की गई है, उन पर दोष नहीं लगाया गया है, या उनका शोषण नहीं किया गया है, वे पूरी तरह से स्वतन्त्र हैं, उन्हें पूरी तरह से छुड़ाया एवं मुक्त किया गया है। अय्यूब स्वतन्त्रता का मात्र ऐसा ही एक मनुष्य था, और परमेश्वर ने किस लिए उसे शैतान को सौंप दिया था यह निश्चित रूप से उसका महत्व है।

"वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी" से "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" से

आखिरकार तुम्हें क्या गवाही देने को कहा जाएगा? तुम एक अपवित्र भूमि पर रहते हुए भी पवित्र बनने में समर्थ हो, और आगे फिर अपवित्र और अशुद्ध नहीं होगे, तुम शैतान के अधिकार क्षेत्र में रहकर भी अपने आपको उसके प्रभाव से छुड़ा लेते हो, और शैतान द्वारा ग्रसित और सताए नहीं जाते, और तुम सर्वशक्तिमान के हाथों में रहते हो। यही गवाही है, और शैतान से युद्ध में विजय का साक्ष्य है। तुम शैतान को त्यागने में सक्षम हो, जो जीवन तुम जीते हो उसमें शैतान प्रकाशित नहीं होता, परंतु क्या यह वही है जो परमेश्वर ने मनुष्य के सृजन के समय चाहा था कि मनुष्य इन्हें प्राप्त करे: सामान्य मानवता, सामान्य युक्तता, सामान्य अंतर्दृष्टि, परमेश्वर के प्रेम हेतु सामान्य संकल्पशीलता, और परमेश्वर के प्रति निष्ठा। यह परमेश्वर के प्राणी मात्र की गवाही है। तुम कहते हो कि "हम अपवित्र भूमि पर रहते हैं, परंतु परमेश्वर की सुरक्षा के कारण, उसकी अगुवाई के कारण क्योंकि उसने हम पर विजय प्राप्त की है, हमने शैतान के प्रभाव से मुक्ति पाई है। कि हम आज आज्ञा मान पाते हैं यह भी इस बात का प्रभाव है कि परमेश्वर ने हम पर विजय पाई है, और यह इसलिये नहीं कि हम अच्छे हैं, या हम सहज भाव से परमेश्वर से प्रेम करते हैं। यह इसलिये है कि परमेश्वर ने हमें चुना, और हमें पूर्वनिर्धारित किया, इसलिए हम पर आज विजय पाई गई है, हम उसकी गवाही देने में समर्थ हुए हैं, और उसकी सेवा कर सकते हैं, ऐसा इसलिये भी कि उसने हमें चुना, और हमारी रक्षा की, इस कारण हमें शैतान के अधिकार से बचाया और छुड़ाया गया और हम गंदगी को पीछे छोड़ लाल अजगर के देश में शुद्ध हो सक हैं।"

"वचन देह में प्रकट होता है" में "विजयी कार्यों का आंतरिक सत्य (2)" से

अंत के दिनों में जन्म लेने वाले लोग किस प्रकार के थे? ये वो लोग हैं जो हजारों सालों से शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए थे, वे इतनी गहराई तक भ्रष्ट किए गए थे कि वे कहीं से भी मानव नहीं लगते थे, जिन्होंने अंततः न्याय, ताड़न और परमेश्वर के वचन के प्रकटीकरण को देखा है, जिन्हें जीत लिया गया है और तब जिन्होंने परमेश्वर के वचनों में से सत्य को प्राप्त कर लिया है; ये वो लोग हैं जो परमेश्वर द्वारा ईमानदारी से भरोसा दिलाए गए हैं, जिन्हें परमेश्वर की समझ आ गई है, जो परमेश्वर की आज्ञा का पालन पूरी तरह से कर सकते हैं और उनकी इच्छा को संतुष्ट कर सकते हैं। परमेश्वर की प्रबंधन योजना की समाप्ति इस तरह के लोगों के समूह को प्राप्त करना है। … मनावजाति के वे लोग जो संपूर्ण प्रबंधन योजना के द्वारा प्राप्त किए जाएँगे, वे ऐसा समूह हैं जो परमेश्वर की इच्छा को समझ सकते हैं, जो परमेश्वर से सत्य प्राप्त करते हैं, जो जीवन और मानवीय समरूपता से युक्त होते हैं जिसकी परमेश्वर अपेक्षा करते हैं। … परंतु उनके भीतर मानवीय स्वरूपता नहीं थी जिसकी परमेश्वर को अपेक्षा थी या आशा थी कि वे लोग प्राप्त कर पाएँगे। लोगों का समूह जिन्हें अंततः यह प्राप्त होगा, वे लोग होंगे जो अंत में रहेंगे, और वह समूह भी वे होंगे जिसकी परमेश्वर को आवश्यकता है, जिसे परमेश्वर प्रेम करते हैं और जिससे परमेश्वर प्रसन्न रहते हैं।

"मसीह की बातचीतों के अभिलेख" से "केवल परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता के बारे में जान कर ही आप सच्चा विश्वास रख सकते हैं" से

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