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56. शैतानी फ़लसफ़ा फँसाने वाला और हानिकारक है

वू यू, हेची शहर, गुआंग्ज़ी प्रांत

कुछ समय पहले, कलीसिया ने कार्य सम्बन्धी कारणों से मेरे रहने का प्रबंध एक मेज़बान परिवार के साथ करवा दिया। जब पहली बार मैंने मेज़बान परिवार के भाई-बहनों के साथ संगति की तो उन्होंने कहा, "हमें संगति में प्रार्थना करने में सबसे अधिक डर लगता है। जब हम अपने दम पर प्रार्थना करते हैं हमें पता होता है कि हमें क्या बोलना है, परन्तु जब संगति में प्रार्थना करने की बात आती है, तो हमें बिल्‍कुल पता नहीं होता है कि हम क्‍या कहें।" जब मैंने यह सुना तो मैंने अपने आप में सोचा, "यदि हम संगति के दौरान प्रार्थना नहीं करते हैं तो हम पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त नहीं कर पाएँगे, और संवाद प्रभावी नहीं होगा। हमें प्रार्थना करनी ही होगी!" पर तब मैंने फिर से विचार किया, यह सोचते हुए कि यदि वे सही में प्रार्थना करने से डरते हैं और यदि मैं जोर डालती हूँ कि वे प्रार्थना करें तो क्या वे मेरे प्रति एक धारणा नहीं बना लेंगे? लेखों को संशोधित करने के अपने कर्तव्यों को पूरा करने के लिए, मुझे मेज़बान परिवार के साथ लम्बे समय तक रहने की आवश्यकता पड़ेगी। यदि उन्होने मेरे प्रति एक धारणा बना ली और मेरी मेज़बानी करनी नहीं चाही क्योंकि मैं उनकी इच्छाओं के साथ नहीं चली थी, तो क्‍या होगा। मैंने अनुमान लगाया कि मुझे उनकी इच्छाओं के अनुसार चलना चाहिए। इसलिए, अगले महीने तक, हमने संगति के दौरान कभी भी प्रार्थना नहीं की। इसने परमेश्वर के वचनों के बारे में संवाद को कुंठित और नीरस और पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता से सर्वथा रहित बना दिया। हम प्रायः विषय से हट भी जाते थे। धीरे-धीरे, भाई-बहनों की स्थिति कम सामान्य हो गई, और वे संगति के लिए उतने इच्‍छुक नहीं रहे। यहाँ तक कि जब भी हम संगति करते, तो वे हमेशा ऊँघते रहते थे और अपने दैनिक जीवन में वे परमेश्वर के वचन को खाने और पीने को महत्त्व देने में असफल रहते थे। जब भी उनके पास समय होता वे टीवी देखते, और मेरे प्रति वे उतने सौहार्द्रपूर्ण नहीं थे, यहाँ तक कि मुझसे बात करने में भी अनिच्छुक हो रहे थे। इस परिस्थिति का सामना करते हुए, मैं काफी पीड़ित और व्याकुल महसूस कर रही थी: मैं हर बात में उनकी इच्छाओं का पालन करती थी, और उन्हें अपमानित नहीं करती थी। वे ऐसे क्यों थे?

जब मैं इस परिस्थिति से बहुत उलझन में थी तभी परमेश्वर के वचनों ने मुझे प्रबुद्ध किया: "यदि परमेश्वर के साथ तुम्हारा उचित संबंध नहीं है, तो चाहे तुम दूसरों के साथ संबंध बनाए रखने की जितनी भी कोशिश कर लो, चाहे तुम जितनी भी मेहनत कर लो या जितनी भी ताक़त लगा दो, वह तब भी जीवन के मानवीय दर्शनशास्त्र का हिस्सा रहेगा। वह तुम लोगों के बीच एक मानवीय दृष्टिकोण और मानवीय दर्शनशास्त्र के माध्यम से अपनी स्थिति बनाकर रख रहा है ताकि वे तुम्हारी प्रशंसा करे। तुम परमेश्वर के वचनों के अनुसार लोगों के साथ उचित संबंध स्थापित नहीं करते हैं। यदि तुम लोगों के साथ अपने संबंधों पर ध्यान केंद्रित नहीं करते हो लेकिन परमेश्वर के साथ एक उचित संबंध बनाए रखते हो, अगर तुम अपने दिल को परमेश्वर को देने के लिए और उसकी आज्ञा का पालने करने के लिए तैयार हो, तो बहुत स्वाभाविक है कि सभी लोगों के साथ तुम्हारे संबंध सही हो जाएंगे। … लोगों के बीच एक उचित संबंध परमेश्वर को अपना दिल सौंपने की नींव पर स्थापित होता है; यह मानवीय प्रयासों के माध्यम से प्राप्त नहीं किया जाता" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर के साथ एक उचित संबंध स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है" से)। परमेश्वर के वचनों के माध्यम से मैंने अचानक रोशनी देखी। जैसा कि पता चला कि यह स्थिति इसलिए उत्पन्न हुई थी क्योंकि मेरा ध्यान अंधों की तरह लोगों के बीच देह के रिश्ते बनाए रखने पर केन्द्रित था, और परमेश्वर के साथ सामान्य रिश्ता बनाने पर केन्द्रित नहीं था। इस बारे में पुनर्विचार करने पर कि, मैंने अपने लिए एक अनुकूल धारणा बनवाने और मेरी मेजबानी करने के लिए तैयार करवाने के लिए कैसे अपने मेज़बान परिवार के साथ मेलजोल किया था, सत्य के सिद्धांतों पर या इस बात पर कोई विचार किए बिना कि क्या मेरे कृत्य उनके लिए लाभप्रद होंगे मैंने उनकी हर बात का पालन किया था और उन्हें समायोजित करने के लिए सब कुछ किया था। जब मैंने संगति के दौरान प्रार्थना करने के उनके भय को जाना, तो मैंने प्रार्थना के अर्थ और महत्व के बारे में समझने में उनकी सहायता करने के लिए प्रासंगिक सत्य के संबंध में उनसे कोई संवाद नहीं किया; इसके बजाय, अपने स्वार्थ को बचाने के लिए, मैंने उनकी बात मानी और संगति के दौरान प्रार्थना न करने की उनकी इच्छा के प्रति विचारशील थी, जिसने हमारी बातचीत को एक पूरी तरह से दैहिक मानवीय सम्बन्ध बना दिया था। यह देखते हुए कि वहाँ कोई प्रार्थना नहीं थी, कोई खोज नहीं थी, या कुछ सौंपने को नहीं था, संगति के दौरान पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और उसके मार्गदर्शन तक पहुँचने का, या परमेश्वर के वचन को खाने और पीने के माध्यम से भरण-पोषण प्राप्त करने का कोई तरीका नहीं था। परिणामस्वरूप, हम्रारी स्थितियाँ कम सामान्य हो गयी थीं, और हम एक सामान्य संबंध बनाए रखने में असफल थे। मैं प्रार्थना के महत्व को अच्छी तरह जानती थी। प्रार्थना लोगों को पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित करने में सहायता करती है, और व‍ह पवित्र आत्मा के कार्य करने का एक तरीका है। प्रार्थना सत्य को बेहतर ढंग से समझने के लिए पवित्र आत्मा से हमें अधिक प्रबुद्धता प्राप्त करने में सहायता कर सकती है। इसके अतिरिक्त, संगति से पहले प्रार्थना करना मनुष्य के हृदय में परमेश्वर का स्थान दिखाने का हमेशा एक मार्ग है, प्रार्थना करना दर्शाता है कि मनुष्य परमेश्वर को अन्य सबसे अधिक आदर देता है। परन्तु मैं अब भी अपने सम्बन्धों को बनाए रखने के लिए प्रार्थना रद्द करते हुए, शैतान के फ़लसफ़े—"स्वयं के जीवित बचे रहने के लिए दुनियादार बनो"—के अनुसार चल रही थी। इसने दर्शाया कि मेरे हृदय में परमेश्वर के लिए बिल्कुल भी कोई स्थान नहीं है, और मैं भीतर से पूर्ण रूप से शैतानी फ़लसफ़े के प्रभुत्व में थी। मैंने लोगों के साथ दैहिक सम्बन्ध बनाए रखने का हमेशा प्रयास किया—इस व्यवहार का श्रेय मेरे द्वारा पूरी तरह से शैतानी फ़लसफ़े "स्वयं के जीवित बचे रहने के लिए दुनियादार बनो" को अपनाने को देने योग्य था। इसने मेरे हृदय और आत्मा को भ्रष्ट कर दिया था, मुझे कायर, स्वार्थी और नीच बना दिया था, यह मेरे अन्यायपूर्ण होने और सत्य को अभ्यास में न ला पाने का कारण बना था। मुझे अतीत के कई क्षण याद आए जब मैं आत्म-संरक्षण से प्रेरित हो कर परमेश्वर के विरोध में खड़ी हुई थी: जब मैं कलीसिया की अगुवाई कर रही थी, मैं लोगों को कुछ अवधारणाएँ और नकारात्मकता फैलाते हुए, कलीसिया के जीवन में अशांति फैलाते हुए देखती थी, पर मैं कभी भी उन्हें रोकने का साहस नहीं करती थी, डरती थी कि यदि मैंने कुछ कहा तो यह मेरे स्वार्थों को खतरे में डाल देगा। सुसमाचार के कार्य का प्रबंधन करने में, जैसे ही भाई-बहन शिकायत करते थे कि चीज़ें काफी कठिन हैं तो मैं पीछे हट जाती थी, और इस भय से कि मैं उनका अपमान कर दूँगी और उनके हृदयों में अपना स्थान खो दूँगी, मैं उनसे और कुछ कहने का साहस नहीं कर पाती थी। ऐसा करने में, मैं हमारे सुसमाचार के कार्य को अप्रभावी बनाने का कारण बन गई। लेखों का संशोधन करने वाले समूह के साथ कार्य करते हुए, मैंने गौर किया कि जिस बहन के साथ मैं साझेदारी में थी वह अपने कार्य को लेकर गंभीर नहीं है परन्तु मैं इस बात पर उसका ध्यान दिलाने से डरती थी, इस भय से कि वह अप्रसन्न हो जाएगी और मेरे विरुद्ध पूर्वाग्रह पनप जाएँगे जो कि हमारे तालमेल को प्रभावित करेगा।… इस बिंदु पर, मैंने स्पष्ट रूप से देखा कि मैं जो कुछ भी कर रही थी, मेरा ध्‍यान हमेशा अपने प्रति दूसरों के मनोभावों और मूल्यांकन पर केन्द्रित था। मैं हमेशा लोगों के हृदयों में अपने स्थान और छवि को बचाए रखती थी, और अपने लाभ और हानि के बारे में सोचती थी। यह कहा जा सकता था कि मैं शैतान के फ़लसफ़े के अनुसार ही जी रही थी कि "स्वयं के जीवित बचे रहने के लिए दुनियादार बनो"। यह मेरे कृत्यों का सिद्धांत, और इस बात का आधार बन गया था कि एक मनुष्य के रूप में मैं कैसे कार्य करती थी। परमेश्वर लोगों से कहता हैं कि वे स्वयं को न्याय और सत्य के लिए लड़ने के प्रति समर्पित कर दें, अन्धकार की शक्तियों के उत्पीड़न के सम्मुख न झुकने का साहस रखें, अपने आधार पर अडिग रहें, भीड़ का अनुसरण न करें, और अन्यायों को आश्रय न दें। तब भी, यह शैतानी फ़लसफ़ा कि "स्वयं के जीवित बचे रहने के लिए दुनियादार बनो" स्वार्थी बनने और अन्धकार की शक्तियों के वशीभूत करने के लिए लोगों का गलत मार्गदर्शन कर रहा है। वे अपने किसी भी कार्य में सिद्धांत या परिस्थिति पर विचार नहीं करते हैं, पर केवल यह विचार करते हैं कि क्या यह उनके लिए व्यक्तिगत रूप से लाभप्रद होगा। यह शैतानी फ़लसफ़ा कि "स्वयं के जीवित बचे रहने के लिए दुनियादार बनो" सत्य के पूरी तरह से विरोध में एक नकारात्मक सिद्धांत है—लोगों को भ्रष्ट करने के लिए शैतान द्वारा प्रयोग किया जाने वाला एक साधन है। इस सिद्धांत के अनुसार जीते हुए, लोग केवल अधिक धोखेबाज़, धूर्त, स्वार्थी और नीच बनते हैं। वे धीरे-धीरे उन सब गुणों को खो देते हैं जो एक सच्चा मनुष्य बनाते हैं। शैतानी फ़लसफ़ा फँसाने वाला और हानिकारक है। मैं इस फ़ससफ़े के अनुसार फिर कभी भी नहीं जीना चाहती! एक बार जब मैंने इस सबको पहचान लिया, तो मैं प्रार्थना के विषय में सत्य के बारे में अपने मेज़बान परिवार के भाईयों और बहनों के साथ संवाद करती थी। एक बार जब उन्हें प्रार्थना का अर्थ और महत्व समझ में आ गया, तो वे संगति में प्रार्थना करने का अभ्यास करने के लिए तैयार हो गए, और इसके साथ ही, उनकी परिस्थितियाँ बदल गयीं।

परिस्थिति की वास्तविकता का सामना करके, मैंने जाना कि शैतानी फ़लसफ़े के अनुसार जीना हर तरह से बेहद हानिकारक है। अब से, मैं पूरे हृदय से सत्य का पालन करने, उन सभी शैतानी फ़लसफ़ों की असलियत का पता लगाने की जिन्हें मैंने अपना लिया है, और इस तरह के फ़लसफ़ों के अनुसार जीना बंद करने की शपथ लेती हूँ। मैं चाहती हूँ कि परमेश्वर, और परमेश्वर का वचन मेरे हृदय पर शासन करे और उसे नियंत्रित करे। सत्य मेरे हृदय का स्वामी बने ताकि मैं हर चीज़ में परमेश्वर के वचन के अनुसार जीवन बिता सकूँ।

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