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38. मेरे हृदय की गहराई में समाया हुआ रहस्य

वुझी लिनयी शहर, शैंडॉन्ग प्रान्त

2006 की बसंत में, मुझसे मेरा अगुआ का पद छीन लिया गया था और मैं जहाँ से आई थी मुझे वापस वहाँ वापिस भेज दिया गया क्योंकि मुझे दूसरों का बहुत ज्यादा "चाटुकार" माना गया था। जब मैं पहली बार वापस गया, तो मैं संताप और वेदना की संकट की घड़ी में पड़ गया। मैंने कभी नहीं सोचा था कि सालों तक की अगुआई के बाद, "चाटुकार" होने के कारण चीज़ें बिगड़ जाएँगी। मेरे लिए यह अंत था, मैं सोचता था, कि मेरे सभी परिचितों को मेरी असफलता के बारे में पता चल जाएगा और मैं कलीसिया में एक बुरा उदाहरण बनकर रह जाऊँगा। इन सबके बाद मैं दूसरों का सामना कैसे कर सकूँगा? इस बारे में मैं जितना ज्यादा सोचता, मैं उतना ही ज्यादा नकारात्मक हो जाता, और अंतत: मैंने सत्य की खोज जारी रखने की निष्ठा खो दी। हालाँकि, जब मैं बीते कुछ वर्षों में किए गए अपने सभी बलिदानों और व्ययों के बारे में सोचता, तो मैं इसे नहीं छोड़ पाता था। अगर मैं खुद को पूरी तरह से नकार दूँगा और असफलता स्वीकार कर लूँगा, तो क्या मेरे सभी प्रयास व्यथ नहीं हो जाएँगे? क्या लोग तब मेरे बारे में और भी नीचा नहीं सोचेंगे? मैं ऐसा नहीं होने दे सकता! मुझे खुद के लिए खड़ा होना है और अन्य लोगों को अपने से बेहतर मान कर उन्हें अपने साथ धृष्ट तरीके से व्यवहार नहीं करने दूँगा। अब, चाहे मुझे कितना भी कठिन प्रयास क्यों न करना पड़े, चाहे मुझे कितने भी ज़ुल्म क्यों न सहने पड़ें, मुझे सकारात्मक रहना है—मैं बीच राह में हिम्मत नहीं हार सकता! अगर मैं असफलता से मिली सीखों को याद रखता हूँ और सत्य की खोज करने पर ध्यान केन्द्रित करता हूँ, तो हो सकता है कि एक दिन मैं फिर से अगुआ बन सकता हूँ। मन में इन विचारों के साथ, समस्त नकारात्मकता और निराशा गायब हो जाती थी और मुझे अपनी खोज में एक नई ऊर्जा महसूस होती थी।

उस पल से, मैं अपने पिछले अपराधों में चिंतन करते और उनसे परिज्ञान प्राप्त करते हुए, खुद को सत्य से सुसज्जित करने के लिए सक्रिय रूप से परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हुए, हर रोज कई घंटे बिताता था। मैंने जीवन के अपने अनुभवों के बारे में विस्तार से बताते हुए अनगिनत निबंध, और साथ ही धर्मोपदेश लिखे। कुछ समय बाद, जब मैंने देखा कि मेरे दो निबंधों को चुन लिया गया है, तो मुझे अपनी खोज में और भी निष्ठा महसूस होने लगी। मैंने खुद से सोचा: बस काम करते रहो और जल्द ही मेरा सपना हक़ीक़त में बन जाएगा। इस तरह, मैं अपनी खोज को जारी रखता था और इस बात पर सांत्वना महसूस करता था कि मेरी स्थिति लगभग 'सामान्य' हो गई थी।

एक दिन आध्यात्मिक उत्कर्ष के दौरान, मैं परमेश्वर के वचन के एक निश्चित अंश की ओर आकर्षित हुआ: "यदि आप खुद को समझना चाहते हैं, तो आपको अपनी वास्तविक स्थिति को समझना चाहिए; अपनी स्थिति को समझने में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आप अपने विचारों और अभिप्रायों को समझें। काल की हर अवधि में, लोगों के विचार एक प्रमुख चीज़ द्वारा नियंत्रित होते रहे हैं; यदि आप अपने विचारों को पकड़ सकते हैं, तो आप उनके पीछे की चीज़ों को भी पकड़ सकते हैं" ("मसीह की बातचीतों के अभिलेख" से "जिन लोगों की परमेश्वर से हमेशा अपेक्षाएँ होती हैं, वे सबसे कम विवेकी होते हैं" से)। परमेश्वर के वचन पर विचार करते हुए, मैंने अचानक ही खुद से सवाल किया: मेरे विचारों पर अब किसका प्रभुत्व है? मेरे सभी विचारों के पीछे क्या निहित है? मैंने अपनी विचार प्रक्रिया पर ध्यानपूर्वक चिंतन करना शुरू किया और, परमेश्वर के मार्गदर्शन से, मैंने जाना कि मुझे हटाए जाने के बाद से ही, मेरे विचार इस इच्छा के प्रभुत्व में रहे हैं कि "मुझे अपनी पूर्व की प्रतिष्ठा और हैसियत वापस प्राप्त करनी चाहिए और खुद के लिए खड़ा होना चाहिए। मैं दूसरों के द्वारा तुच्छ समझे जाना जारी नहीं रख सकता हूँ।" यह विचार एक आध्यात्मिक स्तंभ की भाँति था, जिसने मुझे खुद की निराशा की संकटमय घड़ी में दृढ़ रहने दिया और अपने लक्ष्य को खोजने के लिए मुझे प्रेरित किया। मन में इन विचारों के साथ, मैं "तिरस्कार और अपमान" की अनवरत झड़ी में भी "निष्ठावान और अटल"बना रहा। इस पल, मुझे अहसास हुआ कि मेरी खोज अशुद्ध, इच्छाओं से परिपूर्ण थी और थोड़ा सा भी सकारात्मक नहीं थी।

बीते बातों पर विचार करते हुए, मैंने देखा कि परमेश्वर ने मुझे खुद पर चिंतन करने और मेरी खुद की शैतानी प्रकृति को समझने की अनुमति देने के लिए मुझे उजागर किया था ताकि मैं सत्य की अपनी खोज में स्थिर और निष्कपट हो सकूँ, बुराई और पाप को दूर कर सकूँ और परमेश्वर का उद्धार प्राप्त कर सकूँ। हालाँकि, मैंने निस्संदेह परमेश्वर को उसके उद्धार के उपहार के लिए धन्यवाद नहीं दिया था, न ही मैंने अपनी की हुई बुराइयों के लिए खुद से नफ़रत की थी। इससे भी ज्यादा, मैंने परमेश्वर की उम्मीदों के अनुसार जीने में असफल होने के लिए खुद की निंदा नहीं की थी या कोई पश्चाताप महसूस नहीं किया था। इसके बजाय, "मुझे किसी भी मूल्य पर जीतना चाहिए" की अहंकारी प्रकृति से प्रोत्साहित होकर, मैंने केवल अपने फिर से उन्नति करने, अगुआ के रूप में फिर से अभिषिक्त होने, अपनी पूरी तरह से खत्म की गई प्रतिष्ठा को फिर से पाने वाले दिन के ही बारे में सोचते हुए, इस साज़िश की योजना बनाने में खुद को डुबा दिया था। प्रभावी रूप से, मैं दूसरों द्वारा मेरी खुद की प्रशंसा और आराधना करवाने की अपनी शैतानी छवि का निर्माण करने की आशा कर रहा था। साफ तौर पर, मेरी आकांक्षाएँ बहुत बड़ी थी—इतनी बड़ी कि मैं अंत तक परमेश्वर से लड़ता रहना चाहता था। मैं हद से ज्यादा अहंकारी था और मेरे दिल में परमेश्वर के लिए जरा सा भी आदर या डर नहीं था। अपनी पूर्व की अवस्था पर वापिस चिंतन करते हुए, मैं बहुत डरा हुआ महसूस करता था। मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि मेरे विचारों के पीछे ऐसी क्रूर आकांक्षा होगी। कोई आश्चर्य नहीं कि परमेश्वर ने कहा था, "यदि आप अपने विचारों को पकड़ सकते हैं, तो आप उनके पीछे की चीज़ों को भी पकड़ सकते हैं।" निस्संदेह। अतीत में, मैं अपने विचारों को अस्थिर अवधारणाओं के रूप में देखता था और कभी उनका विश्लेषण करने और उन्हें समझने के लिए समय नहीं निकालता था। केवल अब जा कर मेरी समझ में आया कि किसी के विचारों को समझना और किसी के हृदय की गहराई में समायी हुई चीज़ों का सक्रिय रूप से विश्लेषण करना उस व्यक्ति की अंदरूनी प्रकृति को समझने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है!

इस प्रबुद्धता के लिए प्रभु का धन्यवाद, जिसने मुझे अज्ञानता से बाहर निकाला है। अगर ऐसा नहीं होता, तो मैं अब भी अपने खुद के झूठ से अपनी आँखों में धूल झोंक रहा होता—अपनी खुद की आसन्न मृत्यु की ओर अंधी आकांक्षा से डगमगा रहा होता। यह अविश्वसनीय रूप से कितना डरावना है! इस प्रक्रिया में, मैंने यह भी जाना कि मुझे बदलकर, परमेश्वर मेरी रक्षा कर रहा था और मुझे उद्धार प्रदान कर रहा था। ऐसे अहंकार और विक्षिप्त आकांक्षा वाले व्यक्ति के लिए, अगर मैंने परमेश्वर की ताड़ना और न्याय की यंत्रणा देने वाली संकट की घड़ी को नहीं सहा होता, तो मैं निरपवाद रूप से मसीह विरोधी बन जाता और अपनी खुद की मृत्यु को आमंत्रित करता। प्रिय परमेश्वर, मैं सभी झूठी खोजों को त्यागने, अपने अहंकार और आकांक्षा से लौटने और तेरी सभी आज्ञाओं का पालन करने की शपथ लेता हूँ। मैं तेरे दिल को सांत्वना देने के लिए ईमानदारी से सत्य की खोज करूँगा, अपने हर कर्तव्य को पूरा करूँगा और एक वास्तविक और सच्चे व्यक्ति के रूप में जीऊँगा।

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