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78. नकाब को फाड़ डालो, और नए सिरे से जीवन शुरू करो

चेन डान हुनान प्रदेश

पिछले साल के अंत में, क्योंकि मैं अपने क्षेत्र में सुसमाचार के कार्य को फैलाने में असमर्थ थी, इसलिए परमेश्चर के परिवार ने किसी अन्य क्षेत्र से एक भाई को मेरे कार्य का अधिकार सँभालने के लिए स्थानांतरित किया। इससे पूर्व मुझे सूचित नहीं किया गया था, बल्कि मैं जिस बहन के साथ साझेदारी कर रही थी उसके माध्यम से अप्रत्यक्ष तौर पर मुझे यह सुनने को मिला था। मैं बहुत घबरा गई थी। मुझे संदेह था कि प्रभारी व्यक्ति ने मुझे इस डर से सूचित नहीं किया था कि मैं अपना पद त्यागने के लिए तैयार नहीं होऊँगी और झगड़ा करूँगी। परिणामस्वरूप, प्रभारी बहन के लिए मेरे मन में ख़राब राय बन गई थी। बाद में, वह बहन मुझसे मिली और उसने पूछा कि बदले जाने के बारे में मुझे कैसा महसूस हुआ था—शुरू में मैं अपने मन की बात करने वाली थी, किन्तु मुझे चिंता हुई कि उस पर मेरा ग़लत असर पड़ेगा और वह सोचेगी कि मैं पद के लिए षड़यंत्र कर रही हूँ। तो इसके बजाय, यथा संभव तनाव-मुक्त आवाज़ में, मैंने कहा, "यह कोई समस्या नहीं है, मैं रचनात्मक कार्य नहीं कर पा रही थी इसलिए मुझे बदल दिया जाना उचित है। इस मामले पर मेरे मन में कोई खास विचार नहीं है, परमेश्वर का परिवार जो भी कर्तव्य पूरा करने के लिए मुझे देगा, मैं उसका पालन करूँगी।" इस तरह से मैंने उस बहन के समक्ष अपने अवास्तविक रूप को आगे करते हुए अपने असली स्वार्थ को छिपा लिया। इसके बाद, मुझे परमेश्वर के परिवार द्वारा एक सह-कार्यकर्ता बनने के लिए भेज दिया गया। हमारी पहली सह—कार्यकताओं की सभा में, हमारे नवस्थानांतरित अगुआ ने अपनी हालत के संदर्भ में बातें प्रकट की। उसके द्वारा प्रयोग किया गया एक खास वाक्यांश कि "सभी पदवियाँ और प्रसिद्धि खो दी" ने मुझे अचानक और ज़ोरदार तरीके से चोट पहुँचाई: ऐसा लगता था मानो कि वह मेरे बारे में बात कर रही थी। मैं वहाँ सच में घबराई हुई और दुःखी होकर बैठी हुई थी—मैं अपनी आँखों में उमड़ते हुए आँसुओं को महसूस कर सकती थी, किन्तु मैंने इस डर से उन्हें रोक लिया कि दूसरों को पता चल जाएगा। मैं अपने आप को प्रकट करना चाहती थी, किन्तु मैं इस बात से चिंतित भी थी कि मेरे सह—कर्मी मुझे तुच्छ समझेंगे। इज्ज़त बचाने के लिए, मैंने फिर से अपनी असली हालत को छुपा लिया, दूसरों को यह देखने नहीं दिया कि मुझे किस अंश तक पहले ही शुद्ध कर दिया गया है। यह दिखाने के लिए कि मेरी हालत कितनी सामान्य है, मैं यहाँ तक कि ज़बरदस्ती मुस्कराई भी थी। ठीक इसी प्रकार से, मैं अपने साथ कार्य में अपनी नकारात्मकता वापस ले आई, और इस तथ्य के बावजूद कि भले ही मैं कमज़ोर पड़ने का साहस नहीं करती थी और हर रोज उषा-काल से गोधूलि-वेला तक कार्य करती थी, किन्तु ऐसा लगता था कि मैं जितना ज्यादा मेहनत से कार्य करती थी मैं उतनी ही ज्यादा अप्रभावी हो गई थी और हर तरह की समस्याएँ उत्पन्न हो गई थी। सुसमाचार का यह कार्य धीरे-धीरे रुकता जा रहा था और सुसमाचार दल का अगुआ और उसके कुछ सदस्यों को सीसीपी पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया था। इस सब का सामना करते हुए, मुझे लगता था कि मैं टूटने की कगार पर हूँ और केवल अपने आसन्न प्रतिस्थापन के बारे में सोचती थी। तब भी, मैं अपने भाई—बहनों के सामने स्वयं को मजबूत और दृढ़संकल्पी दिखाते हुए, स्वयं को प्रकट करने से मना करती थी।

आध्यात्मिक उत्कर्ष के दौरान एक दिन मैंने मसीह की संगति से निम्नलिखित अंश को सुना, "अपने भाइयों और बहनों से बातचीत करते समय, कुछ लोग डरते हैं कि कहीं वे अपने हृदय में छिपी कठिनाइयों का पता न लगा लें, और यह कि उनके भाईयों और बहनों के पास उनके बारे में कहने या उनका तिरस्कार करने के लिए कुछ होगा। जब वे बालते हैं, तो हमेशा ऐसी छाप छोड़ने का प्रयास करते है कि वे वास्तव में उत्साही है, वे वाकई परमेश्वर को चाहते हैं, और सत्य को अभ्यास में लाने के लिए वाकई इच्छुक हैं लेकिन असलियत में, अपने हृदय में वे अत्यधिक कमज़ोर और निष्क्रिय होते हैं। वे मज़बूत होने का ढोंग करते हैं, ताकि कोई उनकी असली प्रकृति को न जान नहीं सके। यह भी कपट है। कुल मिलाकर, इस पर ध्यान दिए बगैर कि तुम क्या करते हो—चाहे यह जीवन में हो, परमेश्वर की सेवा करना हो, या अपने कर्तव्यों का निर्वाह करना हो—अगर तुम लोगों को अपना नक़ली चेहरा दिखाते हो और उसका उपयोग लोगों को गुमराह करने के लिए करते हो, ताकि वे तुम्हारे बारे में सम्मान से सोचें या तुम्हें नीची नजर से न देखें, तब तुम बेईमान हो रहे हो!" ("मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "एक ईमानदार व्यक्ति होने का सबसे बुनियादी अभ्यास")। इस अंश को पढ़ने के बाद, मैं बिल्कुल भौचक्की रह गई। मसीह के न्याय ने मुझे मेरे अस्तित्व के मूल तक झकझोर दिया था। जब मैंने इन वचनों से अपने स्वयं के कार्यों को मापा, तो ऐसा लगा कि मैं परमेश्वर द्वारा बताई गई एक अधर्मी, एक असली पाखंडी व्यक्ति हूँ। उस अगुआ और अपने सह-कर्मियों को यह दर्शाने के लिए कि मैं ऐसी व्यक्ति हूँ जो हैसियत को जाने देने और परमेश्वर के परिवार द्वारा मेरे लिए की गई व्यवस्थाओं का पालन करने के लिए तैयार हूँ, मैंने दोबारा सोचे बिना परमेश्वर के परिवार के कार्य और अपने भाई-बहनों के जीवन को बलिदान करते हुए, परिश्रम से स्वयं को छुपा लिया और सत्य को ढक लिया। मैं बस उन्हें यह प्रकट करने के लिए तैयार नहीं थी कि बदले जाने के बाद मेरी हालत और व्यवहार कितने नकारात्मक हो गए थे, इसलिए जब से मुझे मेरे अगुआ के पद से हटाया गया था और एक कार्यकर्ता के रूप में नियत किया गया था, तब से मैं दृढ़ और संकल्पी दिखने का ढोंग करती थी भले ही मैं अंदर से नकारात्मक और कमज़ोर महसूस करती थी। मैं शैतान के धोखे में जी रही थी। मैं परमेश्वर के बारे में ग़लतफ़हमी और उसके साथ विश्वासघात में जी रही थी। फिर भी, मैं अपने भ्रष्ट स्वभाव का समाधान करने के लिए स्वयं को प्रकट करने और सत्य की खोज करने के लिए अनिच्छुक थी। मैं कितनी कपटी थी! फिर भी, मैंने चाहे कितना ही रूप बदला हो और अपनी असली भावनाओं को छुपाया हो, मैं परमेश्वर की परीक्षा से बच कर नहीं भाग सकती थी। पवित्र आत्मा ने सबकुछ प्रकट करने के लिए कार्य में मेरी प्रभावहीनता का उपयोग किया था। मैं किसी भी तरह से अपनी हैसियत को नहीं जाने देना चाहती थी, बल्कि अपने भाई-बहनों को मूर्ख बनाने और भ्रमित करने के लिए अपनी स्वयं की झूठी छवि को आगे बढ़ा कर मैं अपनी इज़्जत बचाने और अपनी पदवी को संरक्षित करने के लिए बड़ी हद तक जाती थी। मैं यह कैसे नहीं जान सकी थी कि, ऐसा कार्य करके, मैं न केवल स्वयं को फँसा लूँगी, बल्कि परमेश्वर के परिवार के कार्य को भी बहुत ज्यादा नुकसान पहुँचाऊँगी? परमेश्वर के परिवार के कार्य और अपने स्वयं के जीवन ऊपरी तौर से दिलचस्पी लेना करना कितना ख़तरनाक था!

इस समय, मैंरे पास स्वयं से पूछने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था कि: क्यों मैं हमेशा ही दूसरों के समक्ष अपनी झूठी छवि दिखाती हूँ? क्या यह इसलिए नहीं है क्योंकि मेरी अधर्मी प्रकृति हमेशा इज़्जत बचाने और अपने पद की रक्षा करने के लिए मुझे आज्ञा देती है? पवित्र आत्मा की इस प्रबुद्धता के माध्यम से, मैंने यह जाना कि शैतान का जहर मेरे अंदर कितना सड़ गया था। "एक पेड़ जैसे अपनी छाल के लिए जीता है, मनुष्य अपनी इज़्जत के लिए जीता है" और "मनुष्य जहाँ भी रहता वहाँ अपना नाम पीछे छोड़ जाता है, ठीक वैसे ही जैसे एक जंगली हंस जहाँ उड़ता है वहाँ आवाज़ करता है" जैसे वाक्यांश मेरी आत्मा में स्वयं पहले से ही इतनी गहराई तक जड़ जमा चुके थे कि मेरे सभी कार्यकलाप उनके द्वारा गहराई से प्रभावित और आयोजित हो गए थे। मैं पीछे विचार करती थी कि यह पूर्व में कैसे व्यक्त हुआ था: कितनी बार इज़्जत बचाने के लिए और इस डर से कि यदि मैंने दूसरों को बता दिया, तो वे मेरी आलोचना करेंगे, मैंने परिस्थिति की वास्तविकता को छुपाते हुए, अपने कर्तव्यों को पूरा करने में सत्य के सिद्धांतों के प्रतिकूल कार्य किया था? कितनी ही बार मैंने अपने जीवन को गंभीर रूप से नुकसान पहुँचाया था क्योंकि, दर्दनाक रूप से यह जानने कि मेरी हालत बहुत बुरी अवस्था में थी और यह जाने के बावज़ूद कि मुझे दूसरों के साथ संगति में स्वयं को प्रकट करना चाहिए, मैंने इस डर से खुलकर बोलने और रोशनी का मार्ग खोजने की जगह मौन में पीड़ित होने का चुनाव किया कि मुझे तुच्छ समझा जाएगा? सार रूप से, जब भी मेरी इज़्जत और प्रतिष्ठा ख़तरे में होती, तो मैं धोखेबाजी से स्वयं को छुपा लेती और परमेश्वर को मूर्ख बनाने और दूसरों को भ्रमित करने के लिए स्वयं की एक झूठी छवि आगे कर देती। जैसे ही परमेश्वर अनगिनत प्रकाशनों के माध्यम से मुझे बचाने की कोशिश करता था, तब भी मेरी धोखेबाज प्रकृति मुझे एक झूठी छवि का निर्माण करने, परमेश्वर को धोखा देने और दूसरों को भ्रमित करने के लिए आज्ञा देती थी। इस तरह से, परमेश्वर मेरे माध्यम से कैसे कार्य कर सकता था? यदि मैं लगातार इस मार्ग पर बनी रहती, तो मैं कैसे उद्धार प्राप्त कर पाती? यह सब परमेश्वर के कोप को सक्रिय कैसे नहीं करता? डर से बँधे हुए, मैंने परमेश्वर के समक्ष स्वयं को दंडवत कर दिया: सर्वशक्तिमान परमेश्वर, मैं तेरे सामने खड़े होने के लायक नहीं हूँ! मेरी अधर्मी प्रकृति ने परमेश्वर के परिवार के कार्य को भारी नुकसान पहुँचाया है, किन्तु तूने मुझे सुधरने का एक अवसर भी दिया है। अब, मैं नहीं कहती हूँ कि तू मुझे सहन कर या कि अन्य लोग मेरे बारे में ऊँचा समझें, मैं बस इतनी ही प्रार्थना करती हूँ कि तेरी ताड़ना और न्याय हमेशा मेरे साथ रहें। तेरी ताड़ना और न्याय के माध्यम से मुझे तेरे धार्मिक स्वभाव को देखने और अपनी अधर्मी प्रकृति को पूरी तरह से समझने की अनुमति दे, ताकि मैं अपने छद्मवेश को फेंक दूँ और ईमानदारी से जीऊँ।

बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों के निम्नलिखित अंश को पढ़ा: "ईमानदारी का अर्थ है अपना हृदय परमेश्वर को अर्पित करना; किसी भी चीज़ में उससे ढकोसला नहीं करना; सभी चीजों में उसके प्रति निष्कपट होना, सत्य को कभी भी नहीं छुपाना; कभी भी ऐसा कार्य नहीं करना जो उन लोगों को धोखा देता हो जो ऊँचे हैं और उन लोगों को भ्रम में डालता हो जो नीचे हैं; और कभी भी ऐसा काम नहीं करना जो केवल परमेश्वर की चापलूसी करने के लिए किया जाता है। संक्षेप में, ईमानदार होने का अर्थ है अपने कार्यों और वचनों में अशुद्धता से परहेज करना, और न तो परमेश्वर को और न ही मनुष्य को धोखा देना। ...यदि तुममें ऐसे बहुत से आत्मविश्वास हैं जिन्हें साझा करने के लिए तुम अनिच्छुक हो, और यदि तुम अपने रहस्यों को—कहने का अर्थ है, अपनी कठिनाइयों को—दूसरों के सामने प्रकट करने के अत्यधिक अनिच्छुक हो ताकि प्रकाश का मार्ग खोजा जा सके, तो मैं कहता हूँ कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जिसे आसानी से उद्धार प्राप्त नहीं होगा और जो आसानी से अंधकार से नहीं निकलेगा। यदि सत्य का मार्ग खोजने से तुम लोगों को प्रसन्नता मिलती है, तो तुम उसके समान हो जो सदैव प्रकाश में जीवन व्यतीत करता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "तीन चेतावनियाँ")। परमेश्वर के वचनों से, मैंने देखा कि वे लोग जो सत्य की खोज करने के लिए अपने आत्मविश्वास को साझा करने और अपनी कठिनाइयों को प्रकट करने के लिए तैयार नहीं हैं, वे अधर्मी हैं। क्योंकि परमेश्वर अधर्मियों से नफ़रत और घृणा करता है, इसलिए अधर्मी लोगों के अंदर पवित्र आत्मा का कार्य नहीं होता है और वे चाहे कितने ही साल तक परमेश्वर में निष्ठा रखने का अभ्यास करें, उन्हें कभी भी उसका उद्धार प्राप्त नहीं होगा और अंतत: उन्हें हटा दिया जाएगा। परमेश्वर के वचनों की प्रबुद्धता के कारण, कि मैं यह जान पाई कि परमेश्वर की सेवा करने में मेरे असफल होने का कारण मेरी स्वयं की अधर्मी प्रकृति थी। मैं कभी भी परमेश्वर के प्रति अपना हृदय समर्पित करने, परमेश्वर या अपने भाई-बहनों के समक्ष स्वयं को प्रकट करने और अपना स्वयं का शुद्धिकरण करने के लिए परमेश्वर की ताड़नाओं और न्याय को प्राप्त करने की अनिच्छुक थी। परिणामस्वरूप, मैं अनुचित हालत में जी रही थी, मैंने पवित्र आत्मा के कार्य को खो दिया था और अंधकार में गिर गई थी। यदि मैंने प्रभारी बहन के साथ संगति के दौरान अपनी वास्तवित स्थिति के संदर्भ में संवाद किया होता, तो निश्चित तौर पर उसने मुझसे सत्य की संगति की होती और मेरी स्थिति तुरंत बेहतर हो गई होती। यदि मैंने हमेशा ही आसानी से स्वयं को प्रकट किया होता, तो परमेश्वर के साथ मेरा संबंध सामान्य होता और मैंने उसके विरुद्ध पूर्वाग्रहों को आश्रय नहीं दिया होता और मैं परमेश्वर के परिवार के कार्य को इतना अधिक नुकसान पहुँचाने का कारण नहीं बनती। मुझ पर अपना धार्मिक स्वभाव प्रकट करने के लिए मैं परमेश्वर का धन्यवाद करती हूँ। परमेश्वर के वचन के माध्यम से मुझे प्रकट किया गया और मेरा न्याय किया गया था और इसलिए मुझे अपनी अधर्मी प्रकृति और अपनी असफलताओं के मूल कारण का पता चला था। परमेश्वर के प्रकाशन और न्याय ने अभ्यास करने के लिए मुझे एक मार्ग दिखाया था: मुझे चाहे कितनी ही कठिनाइयाँ क्यों न मिली हों, या मेरी स्थिति चाहे कितनी ही खराब क्यों न हो, केवल स्वयं को प्रकट करके और समाधान तक पहुँचने के लिए सत्य का प्रयोग करके और परमेश्वर के वचनों के अनुसार चल कर ही मुझे पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त होगा। अपने छद्मवेश को फेंक कर और ईमानदारी से व्यवहार करके ही मैं परमेश्वर का उद्धार प्राप्त करूँगी।

परमेश्वर के वचनों में, मुझे आशा मिली और मेरा दिल गहराई से प्रेरित हुआ। भले ही मेरे कार्यकलाप परमेश्वर के लिए काफी ठेस पहुँचाने वाले रहे हैं, किन्तु उसने मुझे कभी नहीं छोड़ा, बल्कि वह हमेशा ही चुपचाप अपना उद्धार का कार्य करता रहा। इस कठोर प्रतीत होने वाली ताड़ना और न्याय के पीछे, परमेश्वर की ईमानदार चिंता पूरी तरह से स्पष्ट है। मैं सच में यह अनुभव करती थी कि, "इतना गंभीर प्रेम जितना कि पिता के अपने बेटे के मार्गदर्शन में व्यक्त होता है" से क्या तात्पर्य है। परमेश्वर का सार केवल निष्ठा में ही नहीं है, बल्कि सुंदरता और भलाई में भी है। वह जो कुछ भी घोषित करता है वह सत्य है और सभी मनुष्यों को उसे सँजोना चाहिए, क्योंकि भ्रष्ट मानवजाति का कोई भी सदस्य इस परमेश्वर-के-सार को आत्मसात नहीं करता है। यद्यपि मेरी सच्ची प्रकृति अधर्मी और घिनौनी है और मैंने जो कुछ भी किया है वह सत्य के प्रतिकूल है, फिर भी मैं परमेश्वर की ओर लौटने और सत्य की खोज करने के लिए अपना पूरा प्रयास करने, अपने स्वभाव में परिवर्तन लाने की कोशिश करने और अपनी बेकार की हैसियत और इज़्जत की रक्षा करने के नाम पर कभी भी पुनः स्वयं का छद्मवेश धारण नहीं करने की शपथ लेती हूँ। भविष्य में, चाहे मैं किसी भी प्रकार की कठिनाइयों या खराब स्थितियों का सामना क्यों न करूँ, मैं सत्य की खोज करने में दूसरों साथ स्वयं को प्रकट करने और परमेश्वर के हृदय को सांत्वना देने के लिए ईमानदारी से जीने की शपथ लेती हूँ।

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