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"अच्छा" बने रहने को अलविदा

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लिन फ़ान, स्पेन

मेरा बचपन अपनी सौतेली माँ की चीख़-चिल्लाहट और गालियाँ सुनने में ही बीता है। जब थोड़ी समझदार हुई, तो अपनी माँ और आस-पास के दूसरे लोगों के साथ बेहतर ताल-मेल बनाने के लिये, मैं "ख़ामोश रहना, सुखी रहना, जैसे इन शैतानी सिद्धांत पर चलने लगा: आत्म-रक्षा के लिए चुप रहें और केवल दोष से बचने की कोशिश करें," और "अच्छे मित्रों की गलतियों पर मौन रहने से एक दीर्घकालीन और अच्छी मित्रता बनती है।" इससे मेरी तारीफ़ होने लगी। लोग कहने लगे कि मेरे साथ तालमेल बैठाना आसान है। धीरे-धीरे, मैंने कुछ सबक सीखे: अगर मुझे इस अंधेरे और बुरे समाज में जीना है, तो मुझे अपने आसपास के लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करना पड़ेगा। तभी मैं इनके बीच अच्छे से घुल मिल पाऊँगीगी। कलीसिया में आकर भी, मैं इन्हीं सिद्धांतों पर चली। जब कभी मुझे अपने कर्तव्य को निभाने में कोई परेशानी आती, तो मैं शांत रहती। मुझे इस बात का डर लगा रहता था कि अगर मैंने परेशानी का ज़िक्र किया तो लोग नाराज़ हो जायेंगे और यह मेरे लिये अच्छा नहीं होगा। मेरे सच न बोल पाने से कलीसिया के काम को नुकसान हो रहा था। यह परमेश्वर के सामने अपराध था। परमेश्वर की ताड़ना और न्याय के ज़रिये मेरा "अच्छे" इंसान वाला असली चेहरा उजागर हो गया। इनसे मुझे उन "शालीन" लोगों के सार का कुछ-कुछ ज्ञान मिला। मैंने जाना कि "अच्छा" बने रहने से दूसरों को और मुझे नुकसान हो रहा है। मैंने यह भी जाना कि मैं परमेश्वर का विरोध करने के एक ऐसे मार्ग पर चल पड़ी हूँ जहाँ से वापसी नहीं है। तो मैंने "अच्छा होने" की मानसिकता के बंधन को दरकिनार करने का संकल्प लिया। मैंने संकल्प लिया कि मैं सत्य पर अमल करूँगी और सिद्धांतों का पालन करूँगी, मैं एक ईमानदार इंसान की तरह जीने का प्रयास करूँगी।

2018 में, मुझे एक मध्य-स्तर का अगुवा चुन लिया गया। मैं परमेश्वर की आभारी थी कि उसने मुझे प्रशिक्षण देने का अवसर प्रदान किया। मैंने संकल्प लिया कि मैं सही ढंग से अपना कर्तव्य निभाऊँगी, परमेश्वर को संतुष्ट करूँगी, और उसकी आशाओं के अनुरूप जीवन जिऊँगी। कलीसिया के कई काम ऐसे थे जिनसे मैं वाकिफ़ नहीं थी। मुझे बहन लियु के साथ साथ मिलकर काम करना था। वो पिछले एक साल से काम कर रही थी और कलीसिया के काम के हर पहलू से काफ़ी-कुछ परिचित थी। मुझे जब भी कोई परेशानी आती, तो मैं बहन लियु से पूछ लिया करती थी, और वह अक्सर मेरी मदद किया करती थी। लेकिन धीरे-धीरे मुझे एहसास हुआ कि सभाओं में बहन लियु सिर्फ़ सिद्धांतों और वचनों पर ही बोलती है, उसमें परमेश्वर के वचनों पर अमल करने की वास्तविकता नहीं है। वह बहुत निष्क्रिय भी थी और जब कर्तव्य निभाने की बात आती तो वह असली काम नहीं करती। जब कभी भाई-बहन कोई समस्याएँ लेकर आते, तो वह उन्हें दूर करने की कोशिश नहीं करती; ख़ास तौर से, कलीसिया के जिन झूठे अगुवाओं को तुरंत बदलने की ज़रूरत थी, उनका भी उसने ठीक से निपटारा नहीं किया, बल्कि समस्या को टालती रही। इस दौरान, बहन लियु कई बार ज़िक्र करती कि किस तरह कलीसिया की अगुवा बहन झांग सिर्फ़ औपचारिकता निभाती है, जब काम करने की बात आती है, तो वह असली काम कभी नहीं करती, वह सभाओं में सिर्फ़ सिद्धांतों और शब्दों की बात करती है। इतना ही नहीं, बहन झांग किसी का सुझाव या मदद भी स्वीकार नहीं करती। इतना सब कहने के बावजूद, बहन लियु की ऐसी कोई मंशा नहीं थी कि बहन झांग को हटाया जाये। बाद में, जब मैं बहन झांग से मिली, तो मुझे पता चला कि वह वैसी ही है जैसा बहन लियु ने बताया था। तो मैंने बहन लियु से कहा, "सिद्धांतों के पैमाने पर बहन झांग खरी नहीं उतरती। वह एक झूठी अगुवा है जो न तो सत्य का अनुसरण करती है, न असली काम करती है। उसमें पवित्र आत्मा का कार्य भी नहीं है। उसे तो हटा देना चाहिये।" लेकिन बहन लियु ने बड़े ही हल्के ढंग से जवाब दिया, "बहन झांग भले ही ज़्यादा काबिल न हो, लेकिन फिलहाल वह कुछ तो काम करती ही है न। हमें उसकी मदद करने की कोशिश करनी चाहिये।" मैंने मन में सोचा: "हमारी कार्य-व्यवस्था में ऐसा कहा जाता है कि कलीसिया में जैसे ही किसी झूठे अगुवा का पता चले, उसे समय रहते हटा देना चाहिए। बहन झांग एक झूठी अगुवा के तौर पर पहले ही उजागर हो चुकी है, इसलिये उसे हटा देना चाहिए!" मैं यह बात कहने के लिये अपना मुँह खोलने ही वाली थी कि मैंने सोचा: "बहन लियु इतने समय से एक अगुवा के तौर पर काम कर रही है, उसे तो कार्य-व्यवस्था की आवश्यकताओं का पता ही होगा। अगर मैंने इस बात पर ज़ोर दिया, तो कहीं वह यह तो नहीं सोचेगी कि मैं यह कह रही हूँ कि वो असली काम नहीं कर रही है, कि मैं बात का बतंगड़ बना रही हूँ, या मेरे साथ काम करना मुश्किल है? एक तो मैं यहाँ नई हूँ, दूसरे ऐसी बहुत-सी बातें हैं जिन्हें मैं समझती नहीं हूँ। फिर मुझे इस बहन के साथ काफ़ी लम्बे समय तक काम करना है, अगर इस मामले की वजह से मैंने इससे बिगाड़ ली, तो फिर हम साथ मिलकर काम कैसे कर पाएँगे? भूल जाना ही बेहतर है!" यह सोचकर, मैं चुप हो गयी।

बाद में, कई बार मैंने बहन झांग से सहभागिता की, लेकिन उसकी दशा में कोई सुधार नहीं आया। फिर कलीसिया के दूसरे भाई-बहनों ने भी शिकायत की कि बहन झांग असली कार्य नहीं कर रही है। तब मुझे लगा कि मामले पर तुरंत ध्यान देने की ज़रूरत है। बिना वक्त गँवाए, मैं बहन लियु के पास गई और मैंने बहन झांग को हटाने की बात की। लेकिन बहन लियु बहाने-बाज़ी करने लगी: "ऊपरी-स्तर के अगुवा आरोपों की जाँच कर रहे हैं। जब वे इस बात की पुष्टि कर लेंगे कि वह झूठी अगुवा है, तभी उसे हटाया जायेगा।" मैंने मन में सोचा, "अगर वह वाकई एक झूठी अगुवा है, तो उसे जितनी जल्दी हो सके, हटा देना चाहिये। अगर हम पुष्टि होने तक का इंतज़ार करेंगे, तो कलीसिया के काम में देरी होगी, जिसकी वजह से भाई-बहनों के जीवन-प्रवेश में भी देरी होगी। यह बात तो परमेश्वर के विरुद्ध है!" मैं बहन लियु से झूठे अगुवाओं को हटाने की अहमियत पर बात करना चाहती थी, लेकिन फिर मैंने सोचा: "अगर मैंने बहन झांग को हटाने की बात की, तो बहन लियु कहीं यह तो नहीं सोचेगी कि मैं कुछ ज़्यादा ही अहंकारी और मगरूर हूँ, मैं यहाँ दिखावा करके नये पद पर अपनी सार्थकता सिद्ध करने की कोशिश कर रही हूँ? इसके अलावा, बहन लियु ने यह तो कहा नहीं है कि बहन झांग के साथ निपटा नहीं जायेगा; उसने तो सिर्फ़ ऊपरी-स्तर के अगुवाओं द्वारा पुष्टि होने तक कुछ भी करने से पहले इंतज़ार करने को कहा है। इसलिये बेहतर होगा कि मैं ख़ामोश रहूँ। कुछ ही दिन की तो बात है।" इस तरह, मैंने अपनी बात अपने तक ही रखी। कुछ दिनों के बाद, ऊपरी-स्तर के अगुवाओं ने कलीसिया में झूठे अगुवा के मामले को तुरंत न संभालने को लेकर हम मध्यम-स्तर के अगुवाओं को कड़ी फटकार लगाई। उन्होंने कहा कि हम परमेश्वर के चुने हुए लोगों की रक्षा नहीं कर रहे, हम भी शैतान के साथी हैं, उसकी ढाल हैं, कि हम दूसरे भाई-बहनों को नुकसान पहुँचा रहे हैं। तब जाकर बहन झांग को फ़ौरन हटाया गया। जब यह सारा मामला सुलझाया जा रहा था, तो मुझे पता चला कि काफ़ी समय से बहन झांग ने कोई असली कार्य नहीं किया है। वह कलीसिया के सुसमाचार कार्य के लिये उत्तरदायी थी, लेकिन उसने कभी भी प्रभावी तरीके से काम नहीं किया। सारे भाई-बहन नकारात्मकता और दुर्बलताओं में जी रहे थे। कुछ तो सभा में जाना भी पसंद नहीं करते थे। किसी झूठे अगुवा से तुरंत न निपटने के क्या भयंकर दुष्परिणाम हो सकते हैं, यह देखकर मैंने मन ही मन ख़ुद को बहुत धिक्कारा। फिर भी, मैंने इस बात पर बहुत सोच-विचार नहीं किया, न ही आत्म-मंथन करने की कोशिश की, मेरे लिये इतना काफी था कि बहन झांग को हटा दिया गया है।

उसके बाद, बहन लियु जिन-जिन कलीसियाओं का काम संभाल रही थी, वहाँ के हर काम में गंभीर समस्याएँ पैदा होने लगीं। जब ऊपरी-स्तर के अगुवाओं ने उसकी काट-छाँट की और उससे निपटे, तो न सिर्फ उसे कोई पछतावा नहीं था, बल्कि वह नकारात्मकता और प्रतिरोध में जी रही थी। उसे अपने काम में कोई दिलचस्पी नहीं रह गयी थी। बहन लियु कि हालत देखकर, मैं उन समस्याओं की ओर उसका ध्यान दिलाना चाहती थी ताकि वह उन पर विचार कर सके, लेकिन मुझे यह फ़िक्र भी थी: "अगर मैंने उसे खुद आर चिंतन करने के लिये कहा, तो वह कहीं यह तो नहीं कहेगी कि मैं उसके प्रति हमदर्दी नहीं दिखा रही, मेरे मन में उसके लिए प्रेम नहीं हैती? अगर हमारे बीच रूखापन आ गया, तो साथ में काम करना मुश्किल हो जाएगा।" थोड़ा सोच-विचार करने के बाद, मैंने घुमा-फिराकर परमेश्वर की इच्छा पर उससे सहभागिता की, और उसे समझाया कि वह नकारात्मक होना छोड़ दे। उसके बाद, वह अक्सर शिकायत करती, सही-गलत पर बहस करती—ज़ाहिर तौर पर उसके अंदर पवित्र आत्मा का कार्य नहीं था। मैंने उन बातों पर विचार किया कि जब से हम लोगों ने मिलकर काम करना शुरू किया है, तब से बहन लियु ने कोई भी असली कार्य नहीं किया, और जब उसकी काट-छाँट की गई, उससे निपटा गया, तो उसने न तो उन चीज़ों को स्वीकार किया था, न ही सत्य की खोज करने का प्रयास किया था। ये सारे लक्षण झूठे अगुवा के थे! ऐसे समय में, ऊपरी-स्तर के अगुवाओं ने मुझे बहन लियु के बारे में एक मूल्यांकन लिखने के लिये कहा। मैं बड़ी दुविधा में पड़ गई: बहन लियु के बारे में जो कुछ आम तौर पर सामने आया है, क्या उन बातों को ईमानदारी से लिख दूँ? अगर मैं उन बातों को न बताऊँ, तो मैं झूठे अगुवाओं को प्रश्रय दे रही हूँ और परमेश्वर के घर के कार्य को कायम नहीं रख रही हूँ। मगर ज़्यादातर भाई-बहनों को इसकी कोई भनक नहीं थी कि दरअसल क्या चल रहा है। वे लोग इस बात को समझ नहीं पाये, और पूरी तरह से बहन लियु के समर्थन में खड़े थे। अगर मैंने उसकी शिकायत करने का जोखिम उठाया, तो क्या वे लोग मेरे बारे में बुरा सोचेंगे? इसके अलावा, मैं हर दिन बहन लियु के साथ ही रहती थी। मेरी समस्याओं के दौरान उसने मेरी मदद की थी। अगर मैंने उसकी समस्याओं की शिकायत की और उसे हटा दिया गया, तो क्या वह मुझसे नफ़रत करने लगेगी? इस प्रकार, हर तरह से भले-बुरे का विचार करने के बाद, मैंने बहन लियु के बारे में मूल्यांकन लिखते समय, उसके वास्तविक काम की नाकामी और प्रवेश के अभाव को कम करके बताया। जब मैंने मूल्यांकन जमा कर दिया, तो मुझे मन में बड़ी बेचैनी होने लगी। मुझे एहसास हुआ कि मैंने तथ्यों को छुपा कर परमेश्वर को धोखा दिया है। अपनी आत्मा में मुझे बड़े गलतियों का एहसास हुआ। अगले कई दिनों तक, परमेश्वर के वचनों को पढ़ते समय मेरी आँख लग जाती थी, सभाओं और सहभागिताओं में भी मैं प्रबुद्ध या प्रकाशित नहीं हो पाती थी। मैं परमेश्वर के मार्गदर्शन को महसूस नहीं कर पा रही थी, न ही मैं कलीसिया की समस्याओं को पहचान पा रही थी। कई दिन बाद, यह जाँच और पुष्टि करने के पश्चात कि बहन लियु एक झूठी अगुवा है जो असली कार्य नही करती, ऊपरी-स्तर के अगुवाओं ने उसे हटा दिया। हालाँकि बहन लियु को हटा दिया गया था, लेकिन उसके साथ अपने संबंधों को बनाए रखने के लिये, मैंने सत्य को त्याग कर अपराध किया था। यह सब सोच कर, मैं बेहद शर्मसार हुई और अपराध-बोध से ग्रस्त रही। मैंने तुरंत परमेश्वर से प्रार्थना की और आत्म-चिंतन करने लगी।

बाद में, मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े कि "किसी व्यक्ति की मानवता के सबसे बुनियादी और महत्वपूर्ण घटक उसके विवेक और सूझ-बूझ हैं। वह किस तरह का व्यक्ति है जिसमें विवेक नहीं है और सामान्य मानवता की सूझ-बूझ नहीं है। सीधे शब्दों में कहा जाये तो, वह ऐसा व्यक्ति है जिसमें मानवता का अभाव है या वह एक बुरी मानवता वाला व्यक्ति है। ...ऐसे लोग अपने कार्यों में लापरवाह होते हैं, और अपने को उन चीज़ों से अलग रखते हैं जो व्यक्तिगत रूप से उनसे संबंधित नहीं होती हैं। वे परमेश्वर के घर के हितों पर विचार नहीं करते हैं और परमेश्वर की इच्छा का लिहाज नहीं करते हैं। वे परमेश्वर की गवाही देने या अपने कर्तव्य को करने की कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेते हैं और उनमें उत्तरदायित्व की कोई भावना नहीं होती है। ...यहाँ तक कि कुछ अन्य लोग भी हैं जो किसी समस्या को देख कर चुप रहते हैं। वे देखते हैं कि दूसरे बाधा डाल रहे हैं और परेशानी पैदा कर रहे हैं, फिर भी वे इसे रोकने के लिए कुछ नहीं करते हैं। वे परमेश्वर के घर के हितों पर जरा सा भी विचार नहीं करते हैं, और न ही वे अपने कर्तव्य या उत्तरदायित्व का जरा सा भी विचार करते हैं जिसके साथ वे बँधे होते हैं। वे केवल अपने दंभ, चेहरे, पद, हितों और प्रतिष्ठा के लिए ही बोलते हैं, कार्य करते हैं, अलग से दिखाई देते हैं, प्रयास करते हैं और ऊर्जा व्यय करते हैं" ("मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "तू अपने सच्चे हृदय को परमेश्वर की ओर मोड़ने के बाद सच्चाई को प्राप्त कर सकता है")। मैंने एक सहभागिता भी पढ़ी जो इस प्रकार थी, "जो लोग झूठे अगुवाओं और मसीह-विरोधियों के प्रकटन को देखते हैं, जो उन्हें पहचान पाते हैं, लेकिन अपनी ज़िम्मेदारियाँ नहीं निभाते, चुने हुए जनों की रक्षा नहीं करते, न ही परमेश्वर के कार्य को कायम रखते हैं, लोगों को नाराज़ करने से डरते हैं, जो 'अच्छे' बने रहते हैं—ऐसे लोग परमेश्वर से प्रेम नहीं करते, परमेश्वर भी ऐसे लोगों को पूर्ण नहीं करता; परमेश्वर 'शालीन' बने रहने वालों को पूर्ण नहीं करता; ऐसे लोगधूर्त, चालाक और कपटी होते हैं, वो लोग हवा का रुख़ देखकर चलते हैं, ऐसे लोग ज़रा भी भले नहीं होते, ये लोग छँटे हुए बदमाश और शैतान होते हैं" (जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति (IX) में "परमेश्वर के प्रेम के अनुसरण और पूर्ण किये जाने के बीच संबंध")। परमेश्वर के वचनों के पढ़ने और इस सहभागिता ने मुझे बहुत तकलीफ़ दी, मैं शर्मिंदगी के आँसुओं को रोक न सकी। मैंने देखा कि मैं कहने को तो एक "अच्छी" इंसान हूँ, अगर कुछ हो गया तो मैं अपने आपको बचाने के लिये सब-कुछ कर सकती हूँ, लेकिन परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा के लिये कुछ नहीं करती। मेरे अंदर न तो कलीसिया के काम के प्रति किसी ज़िम्मेदारी का बोध है और न ही मुझ में भाई-बहनों के जीवन में प्रवेश के प्रति कोई कर्तव्य-भावना है। मुझे अच्छी तरह पता था कि बहन झांग को झूठी अगुवा के तौर पर उजागर कर दिया गया है। कलीसिया के जिन कामों और जीवन में भाई-बहनों के प्रवेश लिए वो उत्तरदायी थी, वह बाधित हुआ था। मुझे यह भी पता था कि झूठे अगुवाओं को तुरंत न हटाना परमेश्वर के विरुद्ध पाप है और इससे परमेश्वर के स्वभाव का अपमान होता है, फिर भी मैं अपने ज़मीर के विरुद्ध जाकर लोगों को नाराज़ करने के बजाय परमेश्वर को नाराज़ करने को तैयार थी—इसका नतीजा यह हुआ कि झूठी अगुवा दो महीने से भी अधिक समय तक कलीसिया में परमेश्वर के चुने हुए लोगों को नुकसान पहुँचाती रही। इसके बावजूद, मैंने अपने अंदर झाँक कर नहीं देखा। जब ऐसे बहुत से कामों में, जिनके लिये बहन लियु ज़िम्मेदार थी, गंभीर मामले आते थे, तो वह न सिर्फ़ ऊपरी-स्तर के अगुवाओं की काट-छाँट और व्यवहार को नकार देती थी, बल्कि नकारात्मकता के साथ पीछे हट जाती थी। उस समय मुझे तुरंत उसकी मदद करनी चाहिये थी, सुझाव देने चाहिये थे, और इस तरह की अभिव्यक्ति को उजागर करना चाहिये था, उसकी प्रकृति और नतीजों का विश्लेषण करना चाहिये था, ताकि बहन झांग को तुरंत प्रायश्चित का मौका मिलता। लेकिन मैंने अपने हितों की रक्षा की और उसे महज़ सांत्वना के दो शब्द कहे और परामर्श दिया। जब मुझे बहन लियु का मूल्यांकन लिखने के लिये कहा गया, तो मुझे अच्छी तरह पता था कि वह पहले ही पवित्र आत्मा का कार्य गँवा चुकी है, वह कलीसिया की समस्याओं को नहीं सुलझा सकती, वह झूठी अगुवा है—लेकिन मैंने अपने पद की रक्षा के लिये, सच्चाई को छुपाने और बहन लियु को बचाने की कोशिश की। मैंने देखा कि मैंने बार-बार एक झूठे अगुवा को बचाया है। मैंने सच्चाई पर अमल करने और धार्मिकता का पालन करने के बजाय कलीसिया के काम को नुकसान पहुँचने दिया। मैंने सिर्फ़ अपने हितों का ख़्याल रखा, मैंने कलीसिया के काम की ज़रा भी परवाह नहीं की, फिर भले ही भाई-बहन मरें चाहे जियें; अपनी इस हरकत से, मैं एक झूठी अगुवा की ढाल बन गई, मैं शैतान की एक ऐसी साथी बन गई जो परमेश्वर के घर के कार्य में दख़ल देने और परेशानी पैदा करने आता है। मेरी मानवता कहाँ चली गई? मैं एक ऐसी "अच्छी" महिला थी, जो स्वार्थी, अधम, धूर्त और चालाक थी! कलीसिया ने मुझे कितना महत्वपूर्ण काम दिया था। मैं चिल्लाती थी कि मैं परमेश्वर के प्रेम का प्रतिदान देना चाहती हूँ, उसे संतुष्ट करना चाहती हूँ, मगर सच्चाई यह है कि मैंने परमेश्वर को धोखा देने की कोशिश की। लेकिन जब कोई समस्या आई, तो मैं परमेश्वर का विरोध करने के लिये बाहें फैलाकर शैतान के साथ जा खड़ा हुई। मेरी हरकतों ने बहुत पहले ही परमेश्वर के स्वभाव का अपमान कर दिया था। परमेश्वर को मेरी हरकतों से घृणा और नफ़रत हो गई थी। मेरी शर्मिंदगी का कोई अंत न था। मेरे पास परमेश्वर से प्रार्थना करने के अलावा कोई चारा न था: "हे परमेश्वर! मैंने बार-बार तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध काम किया है, अपनी रक्षा की है, मैंने कभी सत्य का अभ्यास नहीं किया, मैंने कलीसिया के काम में बाधा पहुँचाई है, भाई-बहनों के जीवन को नुकसान पहुँचाया है। मैंने तुम्हारे विरुद्ध विद्रोह किया है, तुम्हारा विरोध किया है, अगर मैंने प्रायश्चित नहीं किया, तो मैं तुम्हारी धार्मिकता के दण्ड का भागी बनूँगी। हे परमेश्वर! मैंने गलत काम किये हैं, मैं तुम्हारे आगे प्रायश्चित करना चाहती हूँ, मैं अपने अपराधों की भरपाई के लिए, सत्य पर अमल करना चाहती हूँ।"

बाद में, सभा के दौरान, भाई-बहनों ने बताया कि कैसे भाई ली, जिसके साथ मैंने काम किया था, सही काम नहीं कर रहा। उन्होंने बताया कि वह सभा में हमेशा सिर्फ़ औपचारिकताओं को पूरा किया करता है। जब उन्हें अपने काम में कोई समस्या पेश आती है तो वह तुरंत सहभागिता करके उनका निवारण नहीं करता। बाद में, मैंने भाई ली से कई बार सहभागिता करने की कोशिश की। लेकिन वह हर बार मेरी बात से सरसरी तौर पर सहमति जता देता, बस। कुछ समय के बाद, भाई ली के वास्तविक काम न करने की अभिव्यक्ति के बारे में भाई-बहन फिर शिकायत करने लगे, जिसके कारण बहुत समय से कलीसिया का काम लटका हुआ था और उसमें कोई प्रगति नहीं हो पा रही थी। अगर सैद्धांतिक तौर पर देखा जाये, तो भाई ली भी झूठा अगुवा साबित हुआ जो वास्तविक काम नहीं करता था। मुझे उसके बारे में तुरंत ऊपरी-स्तर के अगुवाओं को ख़बर करके उसे हटवा देना चाहिये। लेकिन उसके बारे में शिकायत करने की बात सोचते ही चिंता और घबराहट ने मेरे मन को फिर से आ घेरा: "भाई ली यहाँ पर हम सबमें, सबसे ज़्यादा समय से काम कर रहा है। उसे 'एल्डर' समझा जाता है। मैं भी उससे अक्सर कलीसिया के मामलों में सलाह ले लिया करती हूँ, वो हमेशा मेरी मदद भी करता है। अगर उसे पता चल गया कि मेरी शिकायत पर उसे हटाया गया है, तो वह मेरे बारे में क्या सोचेगा? क्या वह मुझे कृतघ्न कहेगा? उसके बाद उससे मिलना कितना शर्मनाक होगा। दूसरे सह-कर्मी भी तो हैं जिन्होंने उसकी शिकायत नहीं की; अच्छा होगा, मैं इस मामले में अपनी टाँग न फँसाऊँ। मुझे इस बात को लेकर शोर-शराबा नहीं करना चाहिये। जब तक ऊपरी-स्तर के अगुवाओं को पता न चल जाये, तब तक इस मामले को ठण्डे बस्ते में ही डाल देना बेहतर है। लेकिन अगर मैंने इस स्थिति की शिकायत करके भाई ली को न हटवाया, तो मेरे कारण भाई-बहनों के जीवन-प्रवेश में देरी हो जाएगी, कलीसिया के काम में दख़लंदाज़ी होगी और बाधा पहुँचेगी।" उस समय, मन में संघर्ष चल रहा था, समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूँ। मैंने बिना वक्त गँवाये, परमेश्वर से प्रार्थना की और उसकी इच्छा जाननी चाही। मैंने परमेश्वर के इन वचनों पर विचार किया: "आपके अंदर मेरे वचन सदैव कार्यरत रहें, चाहे आपके सामने कोई भी हो; आपको मेरे लिए अपनी गवाही में दृढ़ और मेरे भार के प्रति विचारशील रहना होगा। आपको भ्रमित नहीं होना है, बिना अपनी सोच-बूझ के लोगों के साथ अंधाधुंध सहमत होते हुए, बल्कि इसके बजाय आपमें खड़े होकर उन बातों का विरोध करने का साहस होना चाहिए जो मेरी ओर से नहीं आतीं। यदि आप स्पष्ट रूप से जानते हैं कि कुछ गलत है, फिर भी चुप रहते हैं, तो आप वो नहीं जो सच्चाई का अभ्यास करता है। यदि आप जानते हैं कि कुछ गलत है और आप विषय को घुमा देते हैं, लेकिन शैतान आपका रास्ता रोकता है—आप किसी भी प्रभाव के बिना बोलते हैं और अंत तक टिके रहने में असमर्थ हो जाते हैं—तो आपके दिल में अभी भी डर बैठा हुआ है, और क्या आपका दिल अब भी शैतान से आते विचारों से भरा हुआ नहीं है?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 12")। "सभी ने कहा है कि वे परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील रहेंगे और कलीसिया की गवाही की रक्षा करेंगे। वास्तव में परमेश्वर के बोझ के प्रति कौन विचारशील रहा है? अपने आप से पूछो: क्या तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील रहा है? क्या तुम परमेश्वर के लिए धार्मिकता का अभ्यास कर सकते हो? क्या तुम मेरे लिए खड़े होकर बोल सकते हो? क्या तुम दृढ़ता से सत्य का अभ्यास कर सकते हो? क्या तुम शैतान के सभी कर्मों के विरूद्ध लड़ने के लिए पर्याप्त साहस जुटा सकते हो? क्या तुम अपनी भावनाओं को किनारे रखकर मेरे सत्य के खातिर शैतान का पर्दाफ़ाश कर सकोगे? क्या तुम मेरी इच्छा को स्वयं में पूरा होने दोगे? महत्वपूर्ण समय आने पर क्या तुमने अपने दिल को समर्पित किया है? क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो मेरी इच्छा पूरी करता है? स्वयं से पूछो और अक्सर इसके बारे में सोचो" ("वचन देह में प्रकट होता है" में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 13")। परमेश्वर के उलाहना भरे हर प्रश्न में मुझसे अपेक्षाएँ थीं। जब भी कलीसिया में ऐसा कुछ होता था, जिससे सत्य के सिद्धांतों का उल्लंघन होता था, तो परमेश्वर को मुझसे अपेक्षा होती थी कि मैं परमेश्वर के पक्ष में खड़ी रहूँ, मेरे अंदर शैतान को बेपर्दा करने का, कलीसिया का काम कायम रखने का साहस हो, और धार्मिकता का भाव हो। लेकिन मैंने जो कुछ भी अभिव्यक्त और उजागर किया था, उसे देखकर कहीं से भी ऐसा नहीं लग रहा था कि मुझे परमेश्वर की इच्छा की चिंता है या मैं सत्य पर अमल कर रही हूँ: जब मुझे पता चला कि भाई ली एक झूठा अगुवा है, और उसे हटाने की ज़रूरत है, तो मैं अपने हितों की रक्षा के लिये और उसके दिल में अपनी छवि बनाए रखने के लिये, समस्याओं का पता लग जाने के बावजूद, मैं शिकायत करने को तैयार नहीं थी। मैं मामले को ऊपरी-स्तर के अगुवाओं के मत्थे मढ़ देना चाहती थी। मुझे परमेश्वर के घर के हितों की ज़रा भी चिंता नहीं थी। मैंने जाना कि मैं कितनी स्वार्थी और चालाक प्रकृति की हूँ! जब निर्णायक घड़ी आई, तो मैं क्यों हमेशा "अच्छा" बने रहने की कोशिश करती थीही? मैंने कलीसिया के काम की रक्षा के लिये खड़े रहने का साहस क्यों नहीं दिखाया?

बाद में, मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े: "मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव शैतान के द्वारा उसे जहर देने और रौंदे जाने के कारण उपजा है, उस प्रबल नुकसान से जिसे शैतान ने उसकी सोच, नैतिकता, अंतर्दृष्टि, और समझ को पहुँचाया है। ऐसा इसलिये है क्योंकि मनुष्य की मौलिक चीजें शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दी गईं हैं, और पूरी तरह से उसके विपरीत हैं जैसा परमेश्वर ने मूल रूप से इंसान को बनाया था, कि मनुष्य परमेश्वर का विरोध करता है और सत्य को नहीं समझता" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता में होना है")। "परमेश्वर में एक बार विश्वास करने के बाद, जब तुम परमेश्वर के सामने आते हो लेकिन तुम अभी-भी उसी पुराने तरीके से जीते हो, तो क्या परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास सार्थक और मूल्यवान है? तुम्हारे जीवन के लक्ष्य और सिद्धांत और जीवन जीने के तरीके नहीं बदले हैं, और एकमात्र चीज़ जो तुम्हें अविश्वासियों के ऊपर करती है वो है परमेश्वर की तुम्हारी अभिस्वीकृति। बाहर से तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हुए प्रतीत होते हो, लेकिन तुम्हारे जीवन स्वभाव में ज़रा सा भी बदलाव नहीं हुआ है। अंत में, तुम्हें बचाया नहीं जाएगा। इस तरह, क्या यह एक खोखला विश्वास, और खोखला आनंद नहीं है?" ("मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "केवल सत्य को अभ्यास में ला कर ही तू भ्रष्ट स्वभाव के बंधनों को त्याग सकता है")। फिर मैंने एक सहभगिता में ये वचन पढ़े: "कलीसिया के लोग, जो शैतान के फ़लसफ़े के सहारे जीते हैं और प्रयास करते हैं कि किसी को नाराज़ न करें, क्या ऐसे लोग परमेश्वर द्वारा सराहे जा सकते हैं? परमेश्वर ऐसे लोगों को बिल्कुल नहीं सराह सकता। ऐसे लोग जो प्रयास करते हैं कि दूसरे नाराज़ न हों, कभी कोई गवाही नहीं दे सकते। ऐसे लोग परमेश्वर के पक्ष में खड़े नहीं होते, ऐसे लोग विशेष रूप से परमेश्वर की आज्ञा का पालन करने वाले नहीं होते। जो लोग प्रयास करते हैं कि दूसरों को नाराज़ न करें, उनमें कभी सत्य नहीं होता, इसलिये उन्हें बचाया नहीं जा सकता! जो लोग प्रयास करते हैं कि वे दूसरों को नाराज़ न करें, वे शैतान के हाथों बुरी तरह से भ्रष्ट हो चुके होते हैं और वे शैतान के फ़लसफ़े के सहारे जीते हैं। दूसरे लोग भले ही उन्हें अच्छा इंसान समझते हों, लेकिन परमेश्वर उन्हें ऐसे इंसान के तौर पर देखता है जिनमें सत्य के सिद्धांत नहीं होते, जो शैतान के पक्ष में खड़े होते हैं और शैतान की आज्ञा का ही पालन करते हैं। क्या बात ऐसी ही नहीं है? आजकल कलीसिया में ऐसे लोग बहुतायत में हैं। अगर ऐसे लोगों के विचार नहीं बदले, तो देर-सवेर, उनका पतन निश्चित है। अगर आप परमेश्वर के पक्ष में नहीं खड़े हैं, तो आप काम तमाम हो जाएगा" (जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति, खंड 151)। इन वचनों को पढ़कर मेरा मन प्रबुद्ध हुआ। तब मैं समझा कि मैं जो हमेशा अपने ही हितों की सोचती हूँ और जब कोई समस्या होती है तो "अच्छा" बनने की कोशिश करती हूँ, इसकी वजह शैतान के जीने के ये नियम हैं—"ख़ामोश रहना, सुखी रहना, वाले शैतानी सिद्धांत पर चलने लगा; आत्म-रक्षा के लिए चुप रहें और केवल दोष से बचने की कोशिश करें," और "अच्छे मित्रों की गलतियों पर मौन रहने से एक दीर्घकालीन और अच्छी मित्रता बनती है"—जो बहुत पहले ही मेरा जीवन बन चुके थे। ये नियम इस हद तक मेरा जीवन बन गये कि जब मैं छोटी थी, तो मैं अपने परिवार जनों से, पास-पड़ोसियों से, और मित्रों से व्यवहार करते समय सावधान रहती थी और विचार किया करती था। मैं सोचती कि इस दुनिया में मेरी जगह तभी बनेगी जब मैं सबके साथ अच्छे संबंध रखूँगी, किसी को नाराज़ नहीं करूँगी। अगर मैं किसी को कुछ गलत काम करते हुए देखती भी थी, तो मैं बोलने की हिम्मत नहीं करती थी; मैं केवल अपने ही हितों को देखती थी और बिना किसी आत्म-सम्मान के जीती थी। जब मैंने परमेश्वर में आस्था रखना और काम करना शुरू किया, तो मैंने जीने के शैतानी नियमों के अनुसार ही काम करना जारी रखा। जब मैंने एक झूठे अगुवा को कलीसिया में नुकसान पहुँचाते देखा, तो सबसे पहले मैंने अपने हितों के बारे में सोचा; लोगों को नाराज़ करने के बजाय, मैं परमेश्वर को नाराज़ कर देती थी। मेरी हिम्मत सत्य के सिद्धांत पर चलने या परमेश्वर के पक्ष में खड़े होने की नहीं हुई। मैं बार-बार कलीसिया के काम के प्रति लापरवाह बनी रही। मैं शैतान की गुलाम थी, और परमेश्वर द्वारा तिरस्कृत थी। इस बार, जब मुझे पता चला कि भाई ली एक झूठा अगुवा है, तब भी मैंने शैतान के आपसी संबंधों वाले फ़लसफ़े के सहारे जीने का प्रयास किया, उसके मन में अपनी छवि बनाए रखने की कोशिश की। मैं केवल अपने हितों की ही सोच रही थी। मैंने जाना कि "अच्छा" बने रहने वाले नज़रिये के सहारे जी कर, मैं और भी ज़्यादा स्वार्थी, नीच, धूर्त और चालाक बन गई हूँ। मेरे अंदर इंसानियत की कोई झलक नहीं थी। उसी समय, मुझे पता चला कि "अच्छे" लोग झूठे और चापलूस भी होते हैं। ऐसे लोग हर मामले में परमेश्वर के घर के काम में बाधा पहुँचाने और परेशान करने के अलावा कुछ नहीं करते। ये लोग शैतान के प्यादे होते हैं जो दूसरों को नुकसान पहुँचाने और तबाही लाने में माहिर होते हैं। ये लोग भागते-दौड़ते कुत्ते, परमेश्वर के शत्रु हैं। परमेश्वर ऐसे "अच्छे" लोगों का तिरस्कार और उपेक्षा करता है, उन्हें न तो बचाता है, न ही उन्हें पूर्ण करता है। अगर मैंने प्रायश्चित नहीं किया, और "अच्छा" बने रहने की राह पर ही चलती रही, तो मैं अंतत: परमेश्वर द्वारा हटा दिया जाऊँगी और दण्डित की जाँऊगी! इस बात को जानने के बाद, मुझे एहसास हो गया कि मेरी स्थिति बहुत ही ख़तरनाक है, मैं ऐसा करना जारी नहीं रख सकती; मुझे परमेश्वर के आगे सच्चा प्रायश्चित करना चाहिये, सत्य पर अमल करना चाहिये, और धार्मिकता की समझ रखने वाला इंसान बनना चाहिये।

बाद में, मैंने ऊपरी-स्तर के अगुवाओं को भाई ली की स्थिति के बारे में बता दी। जाँच-पड़ताल और सत्यापन के बाद, उन्होंने तय किया कि भाई ली एक झूठा अगुवा है। उन्होंने मुझे उसे हटा देने के लिये कहा। भाई ली को हटाने—वास्तविक कार्य न करने की वजह से उसे उजागर करने और उसका विश्लेषण करने—के ख़्याल से ही, मेरे दिल में घबराहट होने लगी; मैं उसका सामना नहीं करना चाहती थी, उसे आहत करने से मुझे डर लग रहा था। उस समय, मैंने परमेश्वर के वचनों पर विचार किया: "अगर तुम्हारे पास एक 'नेक व्यक्ति' होने की प्रेरणाएं और दृष्टिकोण हैं, तो तुम हमेशा इन मामलों में पिछड़ जाओगे और विफल हो जाओगे। तो फिर ऐसी परिस्थितियों में तुम्हें क्या करना चाहिये? इस तरह की चीज़ों से सामना होने पर, तुम्हें परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिये। परमेश्वर से तुम्हें मांगना चाहिए कि वो तुम्हें शक्ति दे, वह तुम्हें सिद्धांत का पालन करने दे, तुम्हें वो करने दे जो तुम्हें करना चाहिये, चीज़ों को सिद्धांत के अनुसार नियंत्रित करने दे, अपनी बात पर मजबूती से खड़ा रहने दे, और परमेश्वर के घर के कार्य को नुकसान न पहुंचने दे। अगर तुम अपने खुद के हितों को, अपनी पहचान और एक 'नेक व्यक्ति' होने के दृष्टिकोण को छोड़ने में सक्षम हो, अगर तुम एक ईमानदार, संपूर्ण हृदय के साथ वह करते हो जो तुम्हें करना चाहिये, तो तुमने शैतान को हरा दिया है, और तुमने सत्य के इस पहलू को हासिल कर लिया है" ("मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "आप सत्‍य की खोज तभी कर सकते हैं जब आप स्‍वयं को जानें")। सहभागिता में ऐसा कहा गया है कि "परमेश्वर के कुछ चुने हुए जनों में धार्मिकता की समझ होती है; चुने हुए जनों की रक्षा करने और परमेश्वर के घर के कार्य के लिये, उनमें झूठे अगुवाओं और मसीह-विरोधियों को उजागर करने का साहस होता है। ऐसे लोग ईमानदार और स्पष्टवादी होते हैं, ये लोग परमेश्वर को प्रिय होते हैं, और ऐसे ही लोग सचमुच सत्य को प्रेम करते हैं। जो लोग सत्य को प्रेम करते हैं और जिनमें वास्तविक अभिव्यक्तियाँ होती हैं, मात्र वही लोग सच्चा प्रायश्चित करते हैं, और उन्हीं लोगों को बचाया जायेगा" (जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति (XII) में "परमेश्वर के वचन 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II' के बारे में धर्मोपदेश और संगति (XX)")। परमेश्वर के वचनों और इस सहभागिता से, यह जाना जा सकता है कि परमेश्वर उन्हीं लोगों को प्यार करता है जो ईमानदार होते हैं और जिनमें धार्मिकता की समझ होती है। ऐसे ही लोगों को बचाया जाएगा और पूर्ण किया जाएगा। आज, एक झूठा अगुवा कलीसिया में आया था। परमेश्वर देख रहा था कि मैं इस मामले को कैसे सुलझाती हूँ, मैं अपने हितों की रक्षा करती हूँ या कलीसिया के हितों पर विचार करती हूँ, क्या मैं सत्य पर अमल कर पाती हूँ, कहीं मैं शैतान को छूट तो नहीं देती। पहले, मैं परमेश्वर की इच्छा की परवाह नहीं करती थी, मैंने उन उम्मीदों के साथ छल किया था जो परमेश्वर को मुझसे थीं। इस बार, भाई ली को हटाने के मामले में, मैं परमेश्वर की जाँच को स्वीकार करूँगी, और भाई ली मेरे बारे में चाहे जो भी सोचेया मेरे साथ जैसे भी पेश आये, मैं अपने हितों की रक्षा नहीं करूँगी। झूठे अगुवाओं को उजागर करना और उन्हें हटाना मेरा अनिवार्य कर्तव्य और ज़िम्मेदारी है; मुझे कलीसिया के कार्य को कायम रखना है, भाई-बहनों के जीवन-प्रवेश पर विचार करना है, परमेश्वर के पक्ष में खड़ा होना है, भाई ली को हटाकर उसके कृत्यों को उजागर करना है। अगर भाई ली सत्य का पालन करने वाला इंसान है, तो इस निष्कासन से उसे आत्म-मंथन में मदद मिलेगी, जिससे जीवन-प्रवेश में उसे लाभ होगा, और वह परमेश्वर के सामने और अपराध नहीं करेगा। इसलिये मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की: हे परमेश्वर, मुझे राह दिखाओ, और मुझे भाई ली के साथ सहभागिता करने का साहस दो। जब मैंने भाई ली के वास्तविक कार्य को करने में नाकाम रहने की प्रत्येक अभिव्यक्ति को पूरी तरह उजागर कर दिया और उसका विश्लेषण किया, तो उसने मुझसे नफ़रत नहीं की, बल्कि उसने प्रायश्चित किया और कहा, "आज मेरा हटाया जाना परमेश्वर की धार्मिकता है। यह मेरे लिये परमेश्वर का प्यार और सुरक्षा है। अगर तुमने मुझे यह न बताया होता, तो मुझे कभी पता न चलता कि मैं कलीसिया को कितना नुकसान पहुँचा रहा था। परमेश्वर का धन्यवाद! मैं इस पर मनन करूँगा। बताओ, मेरे अंदर और कौन-सी भ्रष्टता है; इससे मुझे सही ढंग से आत्म-मंथन करने में मदद मिलेगी...।" भाई ली की ये बातें मेरे दिल को छू गईं; मुझे तो लगा था कि उसके कृत्यों को उजागर करने से वह आहत होगा, लेकिन ऐसा सोचना सिर्फ़ मेरी कल्पना थी। अगर मैंने उसे उजागर न किया होता, तो मैंने वाकई उसका नुकसान किया होता। उस पल, मैंने अपने आपको दृढ़ महसूस किया, मुझे सुकून का एहसास हुआ और मैंने ख़ास कर ख़ुद को परमेश्वर के करीब महसूस किया। इस तरह, मैं समझ पायी कि सिर्फ़ सत्य का अभ्यास करके और धार्मिकता के पक्ष में खड़े रहकर ही, मैं भाई-बहनों की मदद कर सकती हूँ। बाद में, जब कभी मैंने भाई-बहनों को सत्य के किसी सिद्धांत का उल्लंघन करते देखती थी तो मेरा "अच्छा" चेहरा और दूसरों को नाराज़ करने का भय अब भी उभरकर आत था, लेकिन उस वक्त मैं तुरंत परमेश्वर के सामने जाकर प्रार्थना करती, स्वयं का त्याग करके, सत्य के सिद्धांतों के अनुसार आचरण करती थी। परमेश्वर का धन्यवाद। मेरा इस तरह से थोड़ा-बहुत अभ्यास कर पाना और प्रवेश परमेश्वर के वचनों का ही प्रभाव है!

परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना का अनुभव करने और तथ्यों के प्रकट होने के बाद, मैंने जाना कि जो लोग "अच्छे" होते हैं, वे चालाक, काले-दिल के होते हैं, उनमें अंतरात्मा या मानवता नहीं होती। ऐसे लोगों के पास परमेश्वर द्वारा बचाये जाने का कोई अवसर नहीं होता। मैं परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन और अगुवाई की भी आभारी थी; उनके कारण मुझे "अच्छा" होने की मानसिकता के बंधन से भी छुटकारा मिल गया था, और मैं थोड़ा-थोड़ा एक ईमानदार इंसान की तरह जीने लगी थी। अनुभव करने के दौरान, मैंने इस बात को समझा कि परमेश्वर के घर में सत्य और धार्मिकता कितना सामर्थ्य रखते हैं। परमेश्वर के घर में, केवल वही लोग टिक सकते हैं और परमेश्वर द्वारा स्वीकार किये जा सकते हैं, जो सत्य पर अमल करते हैं, सत्य के सिद्धांतों के अनुसार आचरण करते हैं, और धार्मिकता के बोध से युक्त ईमानदार व्यक्ति होते हैं। भविष्य में, मैं सत्य का अनुसरण करने, धार्मिकता के बोध युक्त ईमानदार व्यक्ति बनने, सही ढंग से अपना कर्तव्य निभाने, परमेश्वर को संतुष्ट करने और उसके दिल को सुख पहुँचाने के लिये जो कर सकती हूँ वो सब-कुछ करूँगी!

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