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ईसाई जीवन: एक ध्यान रखने वाली माँ बनने और अपने बच्चे को शिक्षित करने का सही तरीका

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लेक्सिन, हांगकांग

प्रस्तावना

"माँ, आप मेरी पढ़ाई को लेकर इतनी सख्त हुआ करती थीं कि मेरे पास खेलने के लिए भी समय नहीं होता था। आप पहले से कितनी बदल गयी हैं, अब आप बहुत प्यार से बोलती हैं। माँ, मैं आपसे बहुत प्यार करती हूँ।" बगल में लेटी, अपनी मासूम और उत्साह से भरी छोटी बच्ची को खुशी से ऐसा कहते हुए सुनकर उस युवा माँ का चेहरा आनंद से दमकने लगा।

इस युवा मां का नाम लेक्सिन है। जब हम उसकी बेटी की सरल अभिव्यक्ति सुनते हैं, तो हम यह समझ सकते हैं कि उनका संबंध पहले इतना सामंजस्यपूर्ण नहीं था, क्योंकि लेक्सिन अपनी बेटी के पर पढ़ाई को लेकर दबाव डालती थी। तो इस माँ-बेटी की कहानी क्या है? और लेक्सिन ने अपनी बेटी को शिक्षित करने के तरीके को कैसे बदला और अपनी बेटी की प्रशंसा कैसे पायी? कृपया अपनी बेटी को शिक्षित करने के लेक्सिन के अनुभवों को पढ़ें।

नवजात बच्ची से बड़ी उम्मीदें

चूँकि मैंने खुद बहुत उच्च स्तर की शिक्षा नहीं पाई थी, इसलिए "ज्ञान आपके भाग्य को बदल सकता है," और "अन्य बातों के अध्ययन का मूल्य छोटा है, पुस्तकों का अध्ययन उन सभी में सबसे उत्कृष्ट है," जैसे विचारों और दृष्टिकोण के प्रभाव में आकर मैंने हमेशा ये आशा की थी मेरा बच्चा बड़ा होकर एक शानदार छात्र बनेगा और उसकी भविष्य की संभावनाएं अच्छी होंगी। मैंने सुना था कि प्रसवपूर्व अभ्यास से बच्चे अधिक बुद्धिमान बनते हैं, इसलिए जब मैं गर्भवती थी, मैंने बच्चों की कविताओं की बहुत सारी किताबें खरीदीं और संगीत के साथ प्रसवपूर्व अभ्यास शुरू किया। मैं कुछ विशेष खाद्य पदार्थ भी लेने लगी जो भ्रूण के मस्तिष्क के विकास को बढ़ावा देते हैं। अपनी बेटी के जन्म के बाद, मैंने उसके कॉलेज जाने की लागतों की तैयारी के लिए कुछ शिक्षा बीमा करा लिए। जब वह 1 वर्ष की थी, मैं आस-पास पूछने लगी कि कौन सा किंडरगार्टन, प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय सबसे अच्छा है ताकि मैं उसके भविष्य की राह तैयार कर सकूँ। और इस तरह, मैं हर वक्त अपनी बेटी के भविष्य के लिए योजनाएं बना रही थी। मुझे इस बात का डर था कि अगर मैंने अभी चीजों को ठीक से व्यवस्थित नहीं किया, तो इससे उसके भविष्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

दबाव बढ़ाते जाने से नतीजे मेरी मंशा के विपरीत हो गये

लेकिन चीजें उतनी आसानी से नहीं चल रही थीं जितनी मैंने कल्पना की थी। किंडरगार्टन में, मेरी बेटी गणित में खराब अंक पा रही थी। प्राथमिक विद्यालय में प्रवेश पर इस बात का असर न पड़े इसलिए मैंने फौरन उसे एक मानसिक गणित की कक्षा में प्रवेश दिला दिया, लेकिन हर बार जब मैं उसे कक्षा में ले जाती, तो वह ज़ोर-ज़ोर से रोने लगती थी और कक्षा में नहीं जाती थी। अपनी पढ़ाई के साथ उसे इस तरह संघर्ष करते देर, मुझे भी बुरा लगा, और मैंने मन में सोचा: "मेरी बेटी अभी बहुत छोटी है। क्या उसे इस तरह से पढ़ने के लिए मजबूर करने की कोशिश करना गलत है?" लेकिन फिर मैंने सोचा, "अगर मेरी बेटी की नींव अच्छी नहीं हुई, तो वह गणित में खराब अंक के कारण अच्छे स्कूल में दाखिला नहीं पायेगी। फिर यह उसके मिडिल स्कूल, उसके बाद कॉलेज में दाखिले पर भी असर डालेगा, फिर भविष्य में उसके लिए क्या संभावनाएँ होंगी? नहीं, मैं उसके गुस्से को रास्ते में नहीं आने दूँगी। मैं उसकी भलाई के लिए ही ये सब कर रही हूँ।" और इसलिए, हर बार जब हम कक्षा में जाते, तो मुझे उसे बहुत मनाना पड़ता और वास्तव में उसे धक्के देकर कक्षा में बिठाना पड़ता था।

कुछ दिनों के बाद, मुझे पता चला कि मेरी बेटी के गणित के अंक बेहतर नहीं हो रहे हैं, और मैं बहुत चिंतित हो गयी। मैंने सोचा कि कड़ी मेहनत किसी भी प्राकृतिक क्षमता की कमी को पूरा कर सकती है, इसलिए मैंने उससे कहा कि वह हर दिन गणित के फॉर्मूले याद करे और जब मैं उसे उसके होमवर्क में गलतियाँ करते देखती, तो मैं उन्हें तुरंत ठीक कर देती थी। कभी-कभी, वह कुछ समय के लिए खेलना चाहती थी, लेकिन मैं उसके बजाय उसे सिखाती रहती थी। उसने जो सवाल गलत किए होते थे, उन्हें पूरी तरह से मिटाकर उन्हें तब तक फिर से करने को कहती थी जब तक वो उन्हें सही से नहीं कर लेती थी। जब मैं अन्य अभिभावकों को अपने बच्चों को प्रसिद्ध स्कूलों में दाखिला दिलाने के लिए अनेक प्रकार की कक्षाओं में डालते देखती थी, तो मुझे डर लगता था कि मेरी बेटी पिछड़ रही है, और इसलिए मैंने उसके लिए एक सख्त अध्ययन कार्यक्रम तैयार किया: उसके शिक्षकों के दिए पाठों को पूरा करने के बाद, हर दिन उससे कई अतिरिक्त अध्ययन अभ्यास करने को कहा और उसके लेखन के बहुत साफ़-सुथरे होने पर भी बहुत ज़ोर दिया। इसलिए मेरी बेटी अक्सर गुस्सा करती और कहती "मम्मी मैं लिख-लिख कर थक गयी हूँ। क्या मैं थोड़ी देर खेलने के बाद पढ़ सकती हूँ?" ये सुनकर मैं अपना धीरज खो देती और कहती, "नहीं! अभी भी तुम्हें बहुत से पाठ पढ़ने हैं। देखो तुम्हारी फलां-फलां सहपाठिनी के तौर-तरीके कितने अच्छे हैं। वह पढ़ाई में रूचि लेती है और हर दिन अपने सारे सबक पूरे करती है। तुम्हारी तरह नहीं, जिसे हर वक्त खेलने की पड़ी रहती है!" मेरे कड़े रुख को देखकर, मेरी बेटी को लगता था मैं उसके साथ गलत कर रही हूँ और वो रोने लगती थी। उसे इस हाल में देखकर, मैं अपने स्वर को नरम करके उसे बहलाने की कोशिश करते हुए कहती, "मैं तुम्हारे भले के लिए ऐसा कर रही हूँ। क्या तुम भी बड़े होकर पर मेरे समान अनपढ़ रहना चाहती हो, जिससे तुम केवल एक ऐसी नौकरी पा सको, जो थका देने वाली और कठिन हो?" मेरी बेटी इस पर कोई जवाब नहीं देती थी, बस अपनी आँखें पोंछती और अपने पाठों को पढना जारी रखती थी। जब मैंने सोचा कि वह हाल ही में अपनी पढ़ाई के कारण कितनी दबाव में है और वह अक्सर परेशान होकर और अपना आपा खो देती है, तो मुझे बहुत बुरा लगा। लेकिन तब मैंने यह सोचकर खुद को तसल्ली दी: "समाज में इतनी अधिक होड़ लगी है। एक अच्छे कॉलेज से डिप्लोमा किये बिना, लोगों को एक अच्छी नौकरी नहीं मिल सकती है अगर आज मैं अपनी बेटी के साथ थोड़ी कड़ाई बरतती हूँ तो, भविष्य में उसकी अच्छी संभावनाएं होंगी। जब वह बड़ी हो जाएगी, तो वह मेरे सभी श्रमसाध्य प्रयासों को समझ जाएगी!"

लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, मैंने पाया कि मेरी बेटी जो हमेशा से खुशमिजाज रही थी, बिल्कुल चुप होती जा रही थी। उसे अब पड़ोसियों का अभिवादन करना पसंद नहीं था, और हम एक-दूसरे से दूर होते जा रहे थे। जब मैं घर आती, तो ऐसा लगता जैसे उसने मुझे देखा ही न हो, और वह मुझे पूरी तरह से अनदेखा कर देती थी, जबकि इससे पहले वह दौड़ कर मुझे गले लगाती थी और मुझे उस दिन स्कूल में क्या क्या हुआ, सब बताती थी। उसमें आ रहे इन बदलावों को देखकर मुझे बहुत दुःख हुआ।

एक बार एक पैरेंट टीचर मीटिंग में, उसकी अध्यापिका ने मुझसे पूछा, "क्या आपने ध्यान दिया है कि हाल में आपकी बेटी अब ज्यादा बातें नहीं करती और वह अपनी पढ़ाई में पिछड़ रही है? शायद आप उस पर बहुत अधिक दबाव डाल रही हैं। आपको पता होना चाहिए कि जब बच्चे खुश होते हैं तो वे तेजी से सीखते हैं, इसलिए अभी से उस पर इतना दबाव न डालें और चीजों को अपने ढंग से होने दें!" अध्यापिका की इन बातों को सुनकर, मैं परेशान और थोड़ी निराश हो गयी। मैंने सोचा: "यकीनन उसकी पढ़ाई को लेकर मेरा कड़ा व्यवहार ही मेरी बेटी के गुमसुम हो जाने का कारण है, लेकिन मैंने ऐसा इसलिए किया कि उसके बेहतर अंक आ सकें। मैंने कभी नहीं सोचा था... अब मैं क्या करूँ?" जब मुझे इस बात का ध्यान आया कि मेरी बेटी जल्द ही प्राथमिक विद्यालय में जाने के लिए परीक्षा देने वाली है, तो मैं चिंतित महसूस करने लगी, कि वह एक अच्छे स्कूल में दाखिला नहीं पा सकेगी। लेकिन मैं उस पर और अधिक दबाव डालना नहीं चाहती थी, कि कहीं मैं उसके लिए जो चाहती थी, परिणाम उसके विपरीत न हो जाये। कुछ समय के लिए, मुझे विरोधाभास महसूस हुआ और मुझे नहीं समझ आ रहा था कि अच्छे नतीजों के लिए मुझे क्या करना है ...

परमेश्वर मेरी बेटी की नियति के ऊपर संप्रभुता रखता है

अगस्त 2017 में, मैं सौभाग्यशाली थी कि मैंने अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य को स्वीकार किया। एक सभा में, मैंने अपनी बहन से खुलकर बात की और उनसे इस बारे में संगति की कि मुझे अपनी बेटी को कैसे शिक्षित करना चाहिए। यह एक ऐसा मामला था जो मेरे लिए हमेशा से सिरदर्द रहा था। उस बहन ने मेरे साथ परमेश्वर के वचन का एक अंश साझा किया, "लोग जानते हैं कि वे इस जीवन में निर्बल और आशाहीन हैं, कि उनके पास औरों से विशिष्ट होने का अन्य अवसर, और अन्य आशा नहीं होगी, और यह कि उनके पास अपने भाग्य को स्वीकार करने के सिवाए और कोई विकल्प नहीं है। और इसलिए वे अगली पीढ़ी पर अपनी समस्त आशाओं, अपनी अतृप्त इच्छाओं, और आदर्शों को डाल देते हैं, यह आशा करते हुए कि उनकी संतान उनके सपनों को हासिल करने में और उनकी इच्छाओं को साकार करने में उनकी सहायता कर सकती हैं; यह कि उनकी बेटियाँ और बेटे परिवार के नाम को गौरवान्वित करेंगे, और महत्वपूर्ण, समृद्ध, या प्रसिद्ध हो जाएँगे; संक्षेप में, वे अपने बच्चों के सौभाग्य को बहुत ऊँचा देखना चाहते हैं। लोगों की योजनाएँ और कल्पनाएँ उत्तम होती हैं; क्या वे नहीं जानते हैं कि उनके बच्चों की संख्या, उनके बच्चों का रंग-रूप, योग्यताएँ, इत्यादि, यह तय करना उनके हाथ में नहीं है, यह कि उनके बच्चों के भाग्य उनकी हथेलियों में नहीं है? मनुष्य अपने स्वयं के भाग्य के स्वामी नहीं हैं, फिर भी वे युवा पीढ़ी के भाग्य को बदलने की आशा करते हैं; वे अपने स्वयं के भाग्य से बच निकलने में निर्बल हैं, फिर भी वे अपने बेटे और बेटियों के भाग्य को नियन्त्रित करने की कोशिश करते हैं। क्या वे अपने आप को बहुत अधिक मूल्यांकित नहीं कर रहे हैं? क्या यह मनुष्य की मूर्खता और अज्ञानता नहीं है?" ("स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III")।

परमेश्वर के वचन बहुत वास्तविक हैं—यह बिल्कुल वैसा ही था जैसा मैं सोच रही थी। मैंने हमेशा यही सोचा था कि, चूँकि मेरे पास कॉलेज की कोई डिग्री नहीं थी, इसलिए मेरे पास जीवन में आगे निकलने का कोई अवसर नहीं था, और इसलिए मैंने अपनी सारी उम्मीदें अपनी बेटी पर लगा दीं। मैं अपनी बेटी को अच्छी तरह से प्रशिक्षित करने के लिए अपने स्वयं के प्रयासों पर निर्भर रहना चाहती थी, उसके बचपन में ही उसके लिए अच्छी नींव रखना चाहती थी, ताकि भविष्य में वह एक अच्छे कॉलेज में प्रवेश पा सके और उसके भविष्य की संभावनाएं अच्छी हों। इसलिए, अपनी बेटी के जन्म से पहले ही, मैंने प्रसवपूर्व अभ्यास किये। और उसके स्कूल जाना शुरू करने के बाद, मैंने हर छोटी से छोटी बात का ध्यान रखा, उस पर दबाव डाला, उसे उस अध्ययन कार्यक्रम के अनुसार पढ़ाई करने पर मजबूर किया, जो मैंने उसके लिए तैयार किया था। अंत में मैंने उस पर बहुत अधिक दबाव डाल दिया, जिससे न केवल उसके अंकों में सुधार नहीं हुआ, बल्कि उसका व्यक्तित्व भी अधिकाधिक एकाकी और असामाजिक हो गया, उसने वो ख़ुशी खो दी जो एक मासूम, भोली बच्ची के पास होनी चाहिए, और वह लगातार मुझसे दूर होती जा रही थी। यह सब मेरे परमेश्वर की संप्रभुता को न समझने और उसके बजाय अपनी बच्ची के अंकों में सुधार करने के लिए अपनी क्षमताओं पर भरोसा करने के कारण हुआ था। अब मुझे समझ में आया कि लोगों की नियति बहुत पहले परमेश्वर द्वारा शासित और पूर्वनियत की गयी है, और भविष्य में मेरी बच्ची की संभावनाएँ अच्छी होंगी या नहीं, यह मेरे ऊपर नहीं है—यह सब परमेश्वर के हाथों में है। मेरा अपने भाग्य पर कोई नियंत्रण नहीं है, फिर भी मैं अपने प्रयासों से अपनी बेटी की नियति को बदलना चाहती थी। मैं वास्तव में बहुत अभिमानी, अज्ञानी और मूर्ख थी!

परमेश्वर के वचन मुझे सभी पीड़ाओं के स्त्रोत के बारे में बताते हैं

बाद में, मैंने परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ा, "जहाँ तक बच्चों की बात है, सभी माँ-बाप आशा करते हैं कि उनके बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त करेंगे और वे किसी दिन आगे निकलेंगे, समाज में उनकी एक जगह होगी और उनके पास एक स्थिर आय और प्रभाव दोनों होंगे—इस तरह वे अपने परिवार का नाम रोशन करेंगे। हर किसी का यही दृष्टिकोण होता है। क्या "बेटा योद्धा बने और बेटी परी बने" यह दृष्टिकोण रखना सही है? हर कोई चाहता है कि उनके बच्चे एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में जाएं, उच्च शिक्षा पाएं। वे सोचते हैं कि डिग्री प्राप्त करने के बाद वे भीड़ से अलग हो जायेंगे। ऐसा इसलिए है क्योंकि अपने दिल में, हर कोई ज्ञान को पूजता है, यह विश्वास करता है कि "अन्य बातों के अध्ययन का मूल्य छोटा है, किताबों का अध्ययन उन सभी में सबसे उत्कृष्ट है।" उस पर, आधुनिक समाज में प्रतिस्पर्धा विशेष रूप से भयंकर है, और एक डिग्री के बिना, तुम्हें एक वक्त का खाना नसीब होगा, इस बात की भी गारंटी नहीं है। इस बारे में हर कोई ऐसे ही सोचता है। अर्थात, तुम जो सीखते हो और जिस तरह की शैक्षिक पृष्ठभूमि हासिल करते हो, वह तुम्हारी आजीविका, तुम्हारे भविष्य का निर्धारण करेगा। दूसरे शब्दों में, लोग जीवन भर जीने के लिए इस चीज़ के भरोसे रहना चाहते हैं, और वे इसे विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानते हैं। यही कारण है कि सभी लोग अपने बच्चों के लिए, शीर्ष के विश्वविद्यालय में प्रवेश और उच्च शिक्षा पाने को सर्वोच्च प्राथमिकता वाली सबसे महत्वपूर्ण बात समझते हैं" ("पथ से भटके अपने विचारों को जानकर ही तुम अपने बारे में जान सकते हो")।

क्या परमेश्वर के वचनों उन्हीं विचारों को उजागर नहीं करते जो मैंने रखे थे? "ज्ञान आपके भाग्य को बदल सकता है" और "अन्य बातों के अध्ययन का मूल्य छोटा है, किताबों का अध्ययन उन सभी में सबसे उत्कृष्ट है," इन विचारों के प्रभाव के तहत, मेरा मानना था कि, अगर कोई अच्छा भविष्य बनाना चाहता है, तो उसके लिए उच्च स्तर की शिक्षा प्राप्त करना और अच्छे कॉलेज में प्रवेश पाना ज़रुरी था। इसीलिए, मैंने अपनी बेटी से सख्ती की और उस पर पढ़ाई के लिए दबाव डाला, कक्षा में उसमें जिस भी चीज़ की कमी थी मैं उससे उसे पूरा करवाती थी, और मुझे उसकी पसंद, नापसंद की परवाह नहीं थी। जब वह मेरे निर्धारित लक्ष्यों को पूरा नहीं कर पाती थी, तो मैं उसे सभी तरह के अध्ययन अभ्यास करने के लिए मजबूर कर देती थी, उसे खेलने का कोई समय नहीं देती थी। और उसके शिकायत करने पर, उससे बहुत प्यार करने के बावजूद, उस सोच से प्रेरित होने के कारण मैं उसकी भावनाओं पर कोई ध्यान नहीं देती थी। मैं यह विश्वास करती थी कि मैं जो कुछ भी कर रही हूँ वह उसके अच्छे के लिए है, और मैं उसे पढ़ाई के लिए मजबूर करती रही। अंत में, मैंने उसे बस दर्द दिया, अंतत: वह अधिकाधिक अंतर्मुखी और एकाकी बन गयी। मैंने सोचा कि मेरे जैसे कितने माँ-बाप थे जो नहीं चाहते थे कि उनके बच्चे शुरूआत होने से पहले ही असफल हो जाएं, और इसलिए उन्होंने बहुत ही कम उम्र में अपने बच्चों का दाखिला हर प्रकार के अध्ययन और रूचि कक्षाओं में करा दिया था और अनजाने में उन पर हद से अधिक दबाव डाल दिया था। इसका नतीजा यह होता है कि बच्चे इतना बोझ उठाने में नाकाम रहते हैं। कुछ निराशा में डूब जाते हैं और कुछ इमारतों से कूद कर आत्महत्या करके अपना जीवन समाप्त कर लेते हैं। क्या इस दुखद घटना का कारण लोगों का इन गलत विचारों और धारणाओं के अनुसार जीना नहीं है? क्या यह शैतान द्वारा लोगों को नुकसान पहुँचाने और भक्षण करने का परिणाम नहीं है? जब मैं यह सब सोच रही थी, तभी मैंने अचानक प्रकाश देखा। वास्तव में इन गलत विचारों के कारण, जिनकी शैतान हमें शिक्षा देता है, हम आँख बंद करके अपने बच्चों पर अध्ययन करने के लिए दबाव बनाते हैं, और वे हमारे सारे दर्द का स्रोत हैं, और मुख्य अपराधी हैं जो हमारे बच्चों को आपदा के कगार पर धकेल देते हैं। एक बार जब मैंने इन बातों को समझ लिया, तो मैंने अपने पुराने गलत विचारों को त्याग देने और अब अपनी बेटी को पढ़ाई के लिए मजबूर न करने का फैसला किया। मैं केवल अपनी बेटी के भविष्य को परमेश्वर को सौंपना चाहती थी, परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं का पालन करना और एक देखभाल करने वाली माँ बनना चाहती थी।

परमेश्वर की संप्रभुता क्र पालन करते हुए, मैं सहज और मुक्त महसूस करती हूँ

इसके तुरंत बाद, मेरी बेटी को प्राथमिक विद्यालय की प्रवेश परीक्षा देनी थी। जब मैंने अन्य माता-पिताओं को अपने बच्चों को एक अच्छे स्कूल में प्रवेश पाने हेतु पहली कक्षा में प्रवेश के प्रशिक्षण के लिए साक्षात्कार कक्षाओं में दाखिला दिलाते हुए देखा, तो मैंने सोचा कि शायद मुझे भी अपनी बेटी को इन कक्षाओं में भेजना चाहिए। इस तरह, मेरी बेटी, अपने साक्षात्कार के समय एक अच्छी छाप छोड़ पायेगी, उसकी प्रतिभा अन्य सभी छात्रों से अलग दिखेगी, और एक अच्छे स्कूल में दाखिला पाने की उसकी उम्मीद बढ़ेगी। जब मैं और मेरे पति इस मामले पर चर्चा कर रहे थे और इसकी तैयारी कर रहे थे, तब मुझे एहसास हुआ कि मैं एक बार फिर से अपनी बेटी की नियति को बदलने के लिए ज्ञान का उपयोग करने की कोशिश कर रही थी। मैंने परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचा, "योग्यता, बौद्धिक स्तर, और संकल्प-शक्ति में भिन्नताओं की परवाह किए बिना, भाग्य के सामने सभी लोग एक समान हैं, जो महान और तुच्छ, ऊँचे और नीचे, तथा उत्कृष्ट और निकृष्ट के बीच कोई भेद नहीं करता है। कोई किस व्यवसाय की खोज करता है, कोई आजीविका के लिए क्या करता है, और कोई जीवन में कितनी धन-सम्पत्ति संचित करता है, ये उसके माता-पिता, उसकी प्रतिभाओं, उसके प्रयासों या उसकी महत्वाकांक्षाओं के द्वारा तय नहीं किए जाते हैं, बल्कि सृजनकर्ता के द्वारा पूर्वनिर्धारित किए जाते हैं" ("स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III")।

परमेश्वर के वचनों ने मुझे फिर से याद दिलाया कि कोई व्यक्ति अपने जीवन में क्या करेगा और उसके पास एक अच्छा भविष्य होगा या नहीं, इसका इस बात से कोई लेना-देना नहीं है कि उनके पास कितना ज्ञान है या वे कितने सक्षम हैं, इसके बजाय सब कुछ सृष्टिकर्ता द्वारा व्यवस्थित और आयोजित है। मैंने अपने भाई के सहपाठी के बारे में सोचा जो कॉलेज खत्म कर लेने के बाद भी नौकरी नहीं पा सका था, इसलिए केवल अपने गृह नगर में एक छोटे से स्टाल पर चीजें बेच रहा था। मेरी एक सहकर्मी ने कॉलेज से मीडिया की पढ़ाई पूरी की थी लेकिन अंतत: एक रेस्तरां में वेट्रेस का काम कर रही थी। जबकि मेरे पिताजी के सहपाठियों में से एक ने मिडिल स्कूल भी पूरा नहीं किया था और फिर भी संपत्ति बाजार में एक बड़ा नाम बन गया था। ये सभी तथ्य दर्शाते हैं कि हर किसी की नियति परमेश्वर के हाथों में है, और ज्ञान रखने से किसी की भविष्य की संभावनाओं पर कोई असर नहीं पड़ता है। एक बार जब मैंने परमेश्वर की इच्छा को समझ लिया, तो मैं जल्दी से परमेश्वर के सामने आयी और प्रार्थना की, "हे परमेश्वर! मेरी बेटी प्राथमिक स्कूल की प्रवेश परीक्षा देने वाली है और मैं अभी भी "ज्ञान आपके भाग्य को बदल सकता है," और "अन्य बातों के अध्ययन का मूल्य छोटा है, किताबों का अध्ययन उन सभी में सबसे उत्कृष्ट है", जैसे शैतानी विचारों और धारणाओं में जी रही हूँ और ज्ञान का उपयोग कर उसकी नियति बदलना चाहती हूँ। हे परमेश्वर! मैं ऐसा करते रहना नहीं चाहती, इसके बजाय मैं अपनी बेटी के भविष्य को आपके हाथों में रखना चाहती हूँ। चाहे मेरी बेटी जिस भी स्कूल में प्रवेश पाये, सब बातों के पीछे आपकी भली इच्छा होती है, मैं आपके आयोजन और व्यवस्थाओं को समर्पित होना चाहती हूँ।" प्रार्थना करने के बाद, मैंने बहुत अधिक आराम महसूस किया, और मैंने अपनी बेटी को साक्षात्कार प्रशिक्षण कक्षाओं में दाखिल नहीं कराया।

फिर कुछ ऐसा हुआ जो सभी अपेक्षाओं से परे था। जब स्कूलों ने सभी सफल उम्मीदवारों की अपनी सूची प्रकाशित की, तो मुझे अचानक उस स्कूल से कॉल आया, जो मेरी पहली पसंद था, और प्रधानाध्यापक ने कहा कि वह मेरी बेटी से मिलना चाहते हैं। मुझे लगा कि यह बहुत अजीब बात थी क्योंकि मेरी बेटी ने स्पष्ट रूप से कहा था कि उसने अपनी परीक्षा में बहुत अच्छा नहीं किया है और उसने बहुत सारे सवालों के जवाब नहीं दिए हैं। और मेरी बेटी की साथ पढ़ने वाली सबसे साथी को इस स्कूल ने नहीं लिया था, तो प्रधानाध्यापक हमें क्यों तलाश रहे थे? जब हम स्कूल पहुंचे, तो प्रधानाध्यापक ने हमें बताया कि मेरी बेटी की परीक्षा के अंक काफी औसत थे, और वे उसे परीक्षा देने का एक और मौका देना चाहते हैं। मुझे यह सुनकर बहुत आश्चर्य हुआ—यह प्रधानाध्यापक, जो हमेशा से उच्च अंकों की मांग करते रहे हैं, अप्रत्याशित रूप से मेरी बेटी को परीक्षा देने का एक और मौका देने के लिए तैयार हो गया था! बाद में, मेरी बेटी ने फिर से परीक्षा दी और वास्तव में उस स्कूल में उसका चयन हो गया। इस अनुभव के बाद, मैं और भी निश्चित हो गयी कि मेरी बेटी की किस्मत परमेश्वर के हाथों में है, और वो कुछ ऐसा नहीं है जो मैं उसके लिए नियत कर सकती थी।

परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करते हुए मैं और मेरी बेटी करीब आ गये

परमेश्वर की अद्भुत व्यवस्थाओं का अनुभव करने के बाद, मैं अब अपनी बेटी की नियति को ज्ञान के माध्यम से बदलना नहीं चाहती हूँ, बल्कि केवल उसे परमेश्वर के हाथों में रखने की कामना करती हूँ, प्रकृति को अपने ढंग से काम करने देते हुए अपनी बेटी को खुशी से बढ़ने देना चाहती हूँ। बाद में, मैंने अपनी बेटी को शिक्षित करने के तरीके को बदल दिया और अब में ज़बरदस्ती यह मांग नहीं करती हूँ कि वह अध्ययन कक्षाओं में भाग ले या पढ़ाई के अलावा अन्य अभ्यासों में भाग ले। कभी-कभी मेरी बेटी अपना होमवर्क पूरा करने से पहले बाहर जाकर खेलना चाहती थी, तो मैं उसके साथ बात करती और कहती, "जाओ आधे घंटे के लिए खेलो और फिर अपना होमवर्क पूरा कर लो, ठीक है?" यह सुनकर मेरी बेटी खुशी से सिर हिला देती थी। यकीनन कुछ देर के बाद, मेरी बेटी अपने मन से वापस आकर अपना होमवर्क करने लगती थी, और उसका रवैया पहले की तुलना में कहीं अधिक ईमानदार था। कुछ समय के बाद, मेरी बेटी के गणित के अंकों में सुधार हुआ, और वह पहले की तरह ही खुश और जीवंत हो गई थी।

अब मेरी बेटी परमेश्वर में मेरा विश्वास साझा करती है, और हर दिन, दिल शांति और आनंद भरकर हम एक साथ भजन गाते हैं और परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हैं। जैसे-जैसे समय बीत रहा है उसके साथ मेरा संबंध अधिक से अधिक सामंजस्यपूर्ण होता जा रहा है। मैं जानती हूँ कि ये सब परमेश्वर के कर्म हैं, और ये परमेश्वर के ही वचन हैं जो मुझे अपनी बच्ची को शिक्षित करने के सही रास्ते पर ले आये हैं। परमेश्वर का धन्यवाद!

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