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परमेश्‍वर के विशेष प्रेम का अनुभव करना

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जिआयी फुयांग शहर, अन्‍हुई प्रांत

मैं स्वभाव से विशेष रूप से अहंकारी हूँ; चाहे मैं कुछ भी कर रही हूँ, मैं हमेशा अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए सरलता और मौलिकता का उपयोग करती हूँ और इस प्रकार चीज़ों को अपने तरीके से करने के लिए मैं अक्सर कार्य-व्यवस्था का उल्लंघन करती हूँ। मैं किसी पद के लिए लोगों को चुनते समय विशेष रूप से अहंकारी हो जाती हूँ। मेरा मानना है कि मेरे पास अद्वितीय प्रतिभा और परिज्ञान है जिससे मुझे हमेशा सही व्यक्ति का चयन करने में मदद मिलती है। इस वजह से, जब मैं किसी व्‍यक्ति का चयन करती थी तो उस व्यक्ति की सभी परिस्थितियों को समझने के लिए मैं ईमानदारी से जाँच नहीं करती थी जिसे में चुनना चाहती थी। मैं जिन लोगों को चुनना चाहती हूँ, उन्हें संबंधित सिद्धांतों के अनुसार नहीं मापती हूँ। इसका परिणाम यह हुआ कि मैंने अंत में कुछ ऐसे धूर्त और चालाक लोगों को चुन लिया, जो कलीसिया की महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारियों को हथियाने के लिए मात्र पत्रों और सिद्धांतों की बात करते थे। इसने काम में और साथ ही मेरे भाई-बहनों के जीवन में बहुत बड़ा नुकसान पहुँचाया। अंततः, परमेश्‍वर की सेवा में मेरे सारभूत कार्य के अभाव के कारण मुझे परमेश्‍वर द्वारा अस्वीकार कर दिया गया था। मैंने पवित्र आत्मा का कार्य गँवा दिया और मुझे सेवा से हटा दिया गया।

जब मुझे यह कहा गया कि मेरी जगह किसी और को रखा जाना है, तो मैं स्तब्ध रह गयी थी। यह कल्पना करना मुश्किल था कि मेरे साथ ऐसा कुछ हो सकता है। इसके बाद, मैंने परमेश्वर को ग़लत समझना और उससे सवाल करना शुरू कर दिया: चर्च ने मुझे बदल दिया और कोई कर्तव्य नहीं दिया। ऐसा लगता था जैसे कि मेरी समस्या काफी गंभीर है। इस बात की संभावना थी कि मुझे निष्कासित कर दिया जाएगा। पहले कुछ लोगों को इसलिए निकाल दिया गया था क्योंकि उन्होंने लापरवाही से कार्य किया था और परमेश्‍वर को धोखा दिया था और कलीसिया के कार्य में बहुत हस्तक्षेप किया था और उसे बाधित किया था। और कुछ अन्य लोग मसीह विरोधी हो गए थे क्योंकि उसने खुद का उत्कर्ष किया था और खुद की ही गवाही दी थी, और परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए परमेश्‍वर से प्रतिस्पर्धा की थी। क्‍या मैं भी आज निष्कासित नहीं कर दी जाऊँगी क्योंकि मैंने लापरवाही से कार्य किया था, परमेश्‍वर को धोखा दिया था, खुद को उठाया था, अपनी ही गवाही दी थी, और कलीसिया के कार्य में बहुत हस्तक्षेप किया था और उसे बाधित किया था? मेरे द्वारा निर्मित इस आपदा को देख कर, मैं डर से काँपने लगी। मेरा दिल लगातार कह रहा था: मैं समाप्त हो गई हूँ। इस बार मैं पूरी तरह से समाप्त हो गयी हूँ। मैंने परमेश्‍वर का कई बार विरोध करके उसे अपमानित किया था। परमेश्‍वर निश्चित रूप से मुझे नहीं बचाएगा। यद्यपि परमेश्‍वर ने कहा था कि मानवजाति को बचाने के लिए वह जो कुछ भी कर सकता है वह सब कर रहा है, किन्तु यह उन लोगों पर लागू होता है जो थोड़े से भ्रष्ट थे और जिन्होंने छोटे-छोटे अपराध किए थे। मेरे जैसे एक अहंकारी और दंभी व्यक्ति, जिसने परमेश्वर के प्रति अंधी होकर सभी प्रकार के अपराध किये, वह निश्चित रूप से परमेश्‍वर की सजा भुगतेगी। यहाँ तक कि यदि मैंने एक नई शुरुआत करने का प्रयास भी किया तब भी परमेश्‍वर मुझे माफ़ नहीं करेगा, क्योंकि मेरे कार्यकलापों से परमेश्‍वर ने मुझमें उम्मीद खो दी थी और उन्होंने परमात्मा को बहुत ज्यादा दुःखी किया था। ...अनजाने में, मैं दर्द और निराशा में डूब गयी।

अत्यधिक पीड़ा में, मैं यह भी चाहती थी कि कलीसिया मुझे किसी कर्तव्य को पूरा करने का एक और मौका दे। परन्तु हर बार जब यह विचार मेरे मन में आता था, तो "गहरा पाप" शब्द उसे नकार कर उम्मीद की किसी भी किरण को दबा देते थे। दर्द, आत्म-दोष, संघर्ष और मेरी इच्छाएँ मुझे इतना सताती, मुझे इतना दर्द देती थी कि मैं जीना नहीं चाहती थी। मैं अपनी निराशा में लगभग टूट गयी थी। ठीक इसी समय, मैंने परमेश्‍वर के इन वचनों को पढ़ा जो कह रहे थे, "परमेश्वर कायरों को पसंद नहीं करता है; वह दृढ़ संकल्प वाले लोगों को पसंद करता है। भले ही तुमने बहुत भ्रष्टता प्रकट की हो, भले ही तुम कई घुमावदार सड़कों पर चले हो, या भले ही तुम मार्ग में कई अतिक्रमण किए हों या परमेश्वर का विरोध किया हो—या ऐसे कुछ लोग हों अपने हृदयों में परमेश्वर के विरुद्ध ईशनिन्दा करते हों या उसे दोष देते हों, उसके साथ मतभिन्नता रखते हों—परमेश्वर इस पर ध्यान नहीं देता है। परमेश्वर केवल इस बात पर ध्यान देता है कि कोई व्यक्ति किसी दिन बदलने में समर्थ हो सकता है या नहीं। ...ऐसा है कि मानवजाति को बचाने के लिए परमेश्वर की इच्छा ईमानदार है। वह लोगों को पश्चाताप करने के अवसर और बदलने के अवसर देता है, और इस प्रक्रिया के दौरान, वह लोगों को समझता है और उसके पास उनकी कमजोरियों और उनकी भ्रष्टाचार की हदों का गहरा ज्ञान है। वह जानता है कि वे लड़खड़ाएँगे। ...वह हर व्यक्ति की कठिनाइयों, कमजोरियों, और साथ ही उनकी आवश्यकताओं को समझता है। इससे भी अधिक, वह समझता है कि स्वभाव में परिवर्तन आरंभ करने की प्रक्रिया में प्रत्येक व्यक्ति किन कठिनाइयों का सामना करेगा, और किस प्रकार की कमजोरियाँ और विफलताएँ घटित होंगी। यह कुछ ऐसा है जो परमेश्वर सबसे अधिक समझता है। यही कारण है कि यह कहा जाता है कि परमेश्वर लोगों के हृदय की गहराई में देखता है। इस बात की परवाह किए बिना कि तुम कितने कमज़ोर हो, जब तक तुम परमेश्वर के नाम को त्यागते नहीं हो, जब तक तुम परमेश्वर को या इस मार्ग को छोड़ते नहीं हो, तो तुम्हारे पास स्वभाव में परिवर्तन प्राप्त करने का हमेशा एक अवसर होगा। और यदि हमारे पास स्वभाव में परिवर्तन प्राप्त करने का अवसर है तो हमें हमारे जीवित बचे रहने की आशा है। यदि हमें जीवित बचे रहने की आशा है, तो हमें परमेश्वर के द्वारा बचाए जाने की आशा है" ("मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "स्‍वभाव में परिवर्तन क्‍या है और स्‍वभाव में परिवर्तन का मार्ग")। मैंने एक उपदेश से इन वचनों को सुना, "परमेश्‍वर मानवजाति को बचाने के लिए जो कुछ कर सकता है वह सब कर रहा है। विशेष रूप से अपराधियों के लिए, लोगों को लगता है कि वे बचाए जाने से बाहर हैं, परन्तु परमेश्‍वर उन्हें छोड़ने के लिए तैयार नहीं है और अब भी उन्हें बचाना चाहता है। कुछ लोगों ने गंभीर अपराध किए हैं। परमेश्‍वर ने उनसे कहा, 'तुम्‍हें पहले जैसे समर्पण के मार्ग पर वापस लौटने और सत्य का अनुसरन करने की आवश्यकता है। मैं अभी भी तुम्हें बचाना चाहता हूँ।' तुमने जो कुछ भी अपराध किए हैं उनकी परवाह किए बिना, अगर तुम्हारे पास परमेश्‍वर को कभी नहीं छोड़ने और उद्धार की तलाश करने की इच्छा है, तो परमेश्‍वर तुम्हें नहीं त्यागेगा" (जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति (II) में "कैसे जानें कि मसीह ही सत्‍य, मार्ग और जीवन है")। ये वचन मुझे मीठी ओस के समान प्रतीत हुए जिन्होंने मेरे हृदय की चिरकालीन शुष्‍कता को नम कर दिया। मेरे आँसू बह निकले और मैं सुबकने लगी। मुझे यह एहसास नहीं होता था कि कितनी बार "असंभव" अप्रत्याशित रूप से अच्छे में बदल गया था। परमेश्वर ने कहा कि अगर मैं अपनी तलाश को नहीं छोड़ती हूँ, पश्चाताप करने की कोशिश करती हूँ, और चाहे मेरी स्थिति जो भी हो मैं परमेश्वर को नहीं छोड़ती हूँ, तो वह अभी भी मुझे बचाना चाहता है। मैं परमेश्‍वर के समक्ष दण्डवत गिरने के अलावा और कुछ नहीं कर सकी: "हे परमेश्‍वर! मैं तुझ पर विश्वास करती हूँ और तेरा अनुसरण करती हूँ और फिर भी मैं तेरे विरुद्ध बगावत करती हूँ और हर मोड़ पर तेरी अवहेलना करती हूँ। जब मैं अपने कर्तव्य को करती हूँ तो मैं अपनी इच्छा से चलती हूँ और कलीसिया के कार्य में हस्तक्षेप और उसे बाधित करती हूँ; लेकिन तूने मेरे प्रति धैर्य रखा है और मुझे क्षमा किया है। तूने मुझे पश्चाताप करने और बचाए जाने का दूसरा मौका दिया है। हे परमेश्‍वर! तेरे प्रेम ने तेरे बारे में मेरी ग़लतफ़हमियों और सवालों को निकाल दिया है। इसने मेरे मृतप्राय दिल को ठीक कर दिया है और अति नकारात्मकता, पीड़ा और निराशा से ऊपर उठा दिया है। इसने जीवन के लिए मेरी इच्छा—उद्धार की तलाश—को एक बार पुनः प्रज्वलित कर दिया है। हे परमेश्‍वर! मेरे लिए तेरा प्रेम इतना गहरा, इतना ज्यादा है! जब मैं तेरे प्रेम का सामना करती हूँ तो मैं अवाक् रह जाती हूँ, मैं शर्मिंदा हूँ और अपना चेहरा दिखाने में असमर्थ हूँ। मैं गहराई से महसूस करती हूँ कि मैं तेरी उपस्थिति में रहने पर शर्मिंदा हो जाऊँगी। इस पल, मैं केवल तुझे अपने दिल की गहराई से अपने गहनतम धन्यवाद दे सकती हूँ और तेरी स्तुति कर सकती हूँ। मैं केवल अपने दिल का गीत तुझे अर्पित कर सकती हूँ: 'तेरे प्रेम ने मुझे कुछ और चुनने में असमर्थ कर दिया है, मेरे कारण मुझे फिर कभी तुझे चिंता में नहीं डालना चाहिए। अत्यधिक भ्रष्ट मैं, तेरे प्रेम का बहुत अधिक आनंद लेती हूँ। मेरे दिल में तू ही एकमात्र प्रेम-योग्य है, एकमात्र तू ही है जिसके लिए भावपूर्ण हुआ जा सकता है, जिसका आदर किया जा सकता है, और जिस पर भरोसा किया जा सकता है। तेरा प्रेम खो दूँ तो, मेरे पास होगी केवल पीड़ा और जी नहीं सकूंगी मैं। तुझे जानने से, मेरी सारी जिंदगी कितनी आनंदमय और खुशहाल है। चाहे जो हो जाये, मैं सदा तेरे पदचिह्नों का अनुसरण करूँगी और तुझे आराम देने के लिए तेरे साथ रहूँगी। चरम पीड़ा में भी मैं तेरी गवाही दूँगी और तुझे संतुष्ट करूंगी। कष्ट और शुद्धिकरण मेरे दिल को तेरे और करीब पहुँचाते हैं। तुझे दिल में बसा कर मैं हमेशा के लिए खुश हूँ।'"

परमेश्‍वर के बारे में अपनी गलत अवधारणाओं के हटाने के बाद, मैंने शांत होना और अपने पिछले व्यवहार का परीक्षण करना शुरू कर दिया: अपने काम में, मैं कभी भी परमेश्‍वर पर भरोसा नहीं करती थी और न ही उसकी ओर झाँकती थी। मैं परमेश्‍वर की इच्छा की तलाश नहीं करती थी और कार्य व्यवस्था या चर्च की अपेक्षाओं के आधार पर कार्य निष्पादित नहीं करती थी। मैं अपने हिसाब से काम करने के लिए पूरी तरह से अपने खुद के मन, आंतरिक गुणों और अनुभव पर भरोसा करती थी। मैं मामलों को कभी भी परमेश्वर के वचन के अनुसार नहीं देखती या सँभालती थी, और अपने काम के सिद्धांतों की खोज नहीं करती थी। मैं निष्कर्ष निकालने और आँकलन करने के लिये अपनी खुद की भावनाओं और विचारों पर भरोसा करती थी। मैं कभी भी दूसरों से सलाह नहीं लेती थी और मैं चीज़ों को अक्सर अपने हिसाब से करती थी। यहाँ तक कि यदि मैं दूसरों से सलाह भी लेती थी तो यह केवल इसलिए होता था कि मैं विनम्र दिखाई दूँ। वास्तविकता में, मेरे मन में पहले से ही एक योजना होती थी और इस वजह से, मैंने शायद ही कभी दूसरे लोगों के विचारों को शामिल करती थी। ऊपर वाले की कार्य-व्‍यवस्‍थाओं को अच्छी तरह से नहीं करती थी अगर वे मेरी अवधारणाओं के अनुरूप नहीं होती थी और यदि कोई मुझसे निपटने या मेरी काट-छाँट करने की कोशिश करता था, तो मैं इसे स्वीकार करने के लिए और भी अधिक अनिच्छुक हो जाती थी। मैं विशेष रूप से उत्कृष्ट होना चाहती थी; मैं चाहे कुछ भी क्यों न करती मैं दूसरों से आगे निकलना चाहती थी। मैं मानती थी कि मैं हर किसी से बेहतर हूँ और कलीसिया में ऐसा कोई भी काम नहीं है जिसे मैं नहीं कर सकती हूँ और मैं जो कुछ भी करती थी वह अच्छा होता था। ...अपनी अहंकारी प्रकृति से नियंत्रित होने के कारण, मैं शैतान की प्रकृति पर भरोसा करती थी जो मेरे काम को अनियंत्रित करने के लिए कई वर्षों से मुझमें थी। मैं मूल रूप से सत्य की तलाश नहीं करती थी और मैं अपने आप को जानने पर जोर नहीं देती थी। मैं पूरी दिल से उच्च पदों की इच्छा रखती थी, और एक बड़ा अगुआ बनना चाहती थी। परिणामस्वरूप, मैं परमेश्वर के स्वभाव और परमेश्वर के सार को पूरी तरह से नहीं समझी थी। मुझमें परमेश्वर के प्रति थोड़ी सी भी मात्रा में श्रद्धा या भय नहीं था। मैं परमेश्‍वर के सामने लापरवाही से कार्य करती थी और किसी भी बात पर नहीं रूकती थी। मैं कुछ भी कहने और करने की हिम्मत रखती थी। मैं अहसास नहीं करती थी कि मैं एक झूठे चरवाहे की भूमिका निभा रही हूँ; मैं परमेश्‍वर का विरोध करते हुए उसकी सेवा करने का मार्ग ले रही थी। यद्यपि भाई-बहन मुझे बहुत बार याद दिलाते थे, लेकिन मैं उनकी नेकनीयती से की गर्इ मदद को स्वीकार नहीं करती थी। मैं बहुत अहंकारी थी और मैं अपने रास्ते पर चलती रहती थी। मेरे कई बार परमेश्‍वर का विरोध करने और उसके प्रतिकूल जाने के कारण, मैंने परमेश्‍वर के क्रोध को उकसा दिया था और मुझे अंततः सेवा से हटा दिया गया, जो मुझे आत्‍म–चिंतन में ले आया।

इसे जाँचने पर, मैं धीरे-धीरे अपनी जड़ता से जागना शुरू हुई। शुरू से ही, मुझे बचाए रखने के इरादे से परमेश्‍वर ने मुझ पर पड़ने वाली सभी चीज़ों को बहुत विचार कर बनाया था। मैं खुद को फिर से परमेश्‍वर के समक्ष दण्डवत होकर गिरने के अलावा और कुछ नहीं कर सकी "हे सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर! मैं तेरा धन्यवाद करती हूँ! भले ही इस बार बदले जाना मरने जैसा महसूस हुआ था और मेरा दर्द अतुलनीय था, फिर भी इसने मुझे मेरे लिए तेरे महान प्रेम और उद्धार को अनुभव करने के एक बहाने के रूप में सहायता दी। यदि मुझे इस समय नहीं हटाया गया होता, तो मैं अभी भी अपनी खुद की धारणाओं और कल्पनाओं में ही रह रही होती, और चीज़ों को ग़लत तरीके से करती रहती। मैं अब भी विश्वास करती कि कलीसिया में कार्य करने के लिए अपने परिवार और नौकरी को छोड़ना तेरी निष्‍ठापूर्वक सेवा करना है। मैंने अपने आचरण पर चिंतन नहीं किया होता और मैं नहीं जान पाती कि मेरी सेवा तेरा विरोध कर रही है। यदि चीजें इसी तरह होती रहती, तो मैं और भी अधिक अहंकारी और दंभी बन जाती। अंततः मैं एक मसीह-विरोधी के रूप में तेरा विरोध करती; और तेरे दंड का सामना करती। हे परमेश्‍वर, मेरे लिए तेरा प्रेम कितना महान और कितना वास्‍तविक है! आज का बदलाव है कि वाकई में कैसे तू बचा रहा है। तेरे ताड़ना देने वाले प्रेम ने मेरा दिल जीत लिया है। मुझे बचाने और मेरी रक्षा करने के लिए मैं अपने दिल से तेरा धन्यवाद करती हूँ। तेरे प्रकाशन के माध्यम से सही मायनों में यह अनुभव करने के लिए तेरा और भी धन्यवाद करती हूँ कि तेरा धार्मिक स्‍वभाव अपमान सहन नहीं कर सकता है; मैं तुझे धन्यवाद देती हूँ कि मनुष्य के निष्ठुर दंड और पीड़ादायक परीक्षणों में तूने अपने पितृवत् गहन प्रेम को देखने दिया। साथ ही, तूने मुझे मेरे भ्रष्ट स्वभाव की पहचान करने दी और यह देखने दिया कि मैं शैतान द्वारा बहुत गहराई तक भ्रष्‍ट कर दी गई हूँ। अहंकारी प्रकृति मेरे भीतर गहरे तक जड़ जमाए हुए है और मुझे बचाने के लिए मुझे तेरी ताड़ना, न्याय, परीक्षाओं, शुद्धिकरण और यहाँ तक कि तेरे दंड और श्राप की भी आवश्‍यकता है। यह केवल इसी कार्य के माध्यम से है कि मैं तेरे प्रति श्रद्धा रख कर उभरने और बचाए और शुद्ध किए जाने में समर्थ हूँ। हे परमेश्‍वर, आज के दिन से, मैं परिश्रम से सत्‍य की तलाश करने और तेरे कार्य के प्रति सच में समर्पण करने के लिए तैयार हूँ। मैं तेरे न्‍याय और ताड़ना को स्वीकार करूँगी। चाहे तू मेरे साथ कैसा भी व्यवहार करे, मैं पूरी तरह से तेरे प्रति समर्पण करूँगी और तेरी व्यवस्थाओं के आगे झुक जाऊँगी। मैं न तो ग़लतफ़हमी रखूँगी और न ही शिकायत करूँगी। मैं एक खरा इंसान बनूँगी तथा मूल्य व उद्देश्य के साथ जीवन जीऊँगी।"

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