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परमेश्वर का हर वचन उसके स्वभाव की अभिव्यक्ति है

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हु के डेझोउ शहर, शैंडॉन्ग प्रांत

जब भी मैं परमेश्वर द्वारा बोले गए इन वचनों को देखती, तो मुझे उत्कण्ठा महसूस होती थी: "हर एक वाक्य जो मैं ने कहा है वह परमेश्वर के स्वभाव को सिद्ध करता है। आप यदि मेरे वचनों पर सावधानी से मनन करोगे तो अच्छा होगा, और आप निश्चय उनसे बड़ा लाभ उठाएंगे।" मैं उत्कण्ठा महसूस करती थी क्योंकि मनुष्य की परमेश्वर के बारे में समझ और उनके उसे प्रेम और संतुष्ट करने कोशिश करने, दोनों के लिए परमेश्वर के स्वभाव को समझना बहुत महत्वपूर्ण है। लेकिन परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते समय, मैं हमेशा महसूस करती थी कि परमेश्वर का स्वभाव बहुत ज्यादा गूढ़ है, और मैं नहीं जानती थी कि इसे कैसे समझा जाए। बाद में, अपने अगुआ से संगति के माध्यम से, मैं यह जान पाई कि मुझे परमेश्वर के वचनों से यह समझना चाहिए कि वह क्या पसंद करता है और किससे नफ़रत करता है, और इस तरह से मैं परमेश्वर के स्वभाव को जान पाई। इसके बाद, मैंने कुछ समय के लिए इसे अभ्यास में लाना शुरू किया और मैंने कुछ परिणाम देखे। लेकिन मैं अभी भी परमेश्वर के वचनों "हर एक वाक्य जो मैं ने कहा है वह परमेश्वर के स्वभाव को सिद्ध करता है।" के बारे में अनिश्चित महसूस करती थी, और मुझे कोई अनुमान नहीं था कि इसे कैसे समझूँ।

एक दिन, मैंने ऊपर वाले से संगति में ये वचन पढ़े: "परमेश्वर के स्वभाव में कई पहलुओं का समावेश होता है। इसमें परमेश्वर के पास क्या है और वह क्या है, उसके विचारों, उसके सुझावों, उसकी सोच और बुद्धि का समावेश होता है। इसमें सभी तरह के लोगों के प्रति परमेश्वर का बर्ताव समाविष्ट होता है, जैसे कि उसकी दया और परवाह के भाव, और उससे भी ज्यादा मानवजाति के विद्रोह और विरोध के प्रति उसका कोप। क्योंकि परमेश्वर के हर वाक्य में उसकी सोच, उसकी बुद्धि और उसके सुझावों का समावेश होता है, क्योंकि इन सभी में उसके वचनों की पृष्ठभूमि और स्रोत का समावेश होता है, क्योंकि ये सभी स्वभाविक रूप से मानवजाति के प्रति परमेश्वर के बर्ताव को व्यक्त करते हैं, जिसमें एक भी वाक्य ऐसा नहीं होता है जिसकी कोई बुनियाद न हो, इसलिए प्रत्येक वाक्य में परमेश्वर के स्वभाव का समावेश होना बहुत स्वाभाविक बात है।... यदि, परमेश्वर के वचनों को पढ़ते समय, कोई व्यक्ति उन्हें ठीक से समझने की कोशिश नहीं करता है, पर्याप्त प्रयास नहीं करता है या उसे पर्याप्त अनुभव नहीं है, तो फिर परमेश्वर के स्वभाव को समझना आसान नहीं होगा, समझ में तो बिल्कुल भी नहीं आएगा। उस मनुष्य को तब परमेश्वर के सामने खुद को शांत करने और अपने हृदय को पूरी तरह से परमेश्वर के वचनों में लगाने की, और प्रार्थना के दौरान परमेश्वर के वचनों को पढ़ने और उन्हें समझने की कोशिश करने की जरूरत होती है; तब तुम धीरे—धीरे परमेश्वर के वचनों के पीछे की मनोदशा को जान जाओगे" (कलीसिया के अगुआओं और कार्यकर्ताओं के साथ मसीह की बातचीत के अभिलेखों में "सभी कलीसियाओं के प्रश्नों के उत्तर")। जब मैंने इस संगति को पढ़ा, तो यह सब अचानक स्पष्ट हो गया और समझ में आ गया। मेरी समझ में आ गया कि परमेश्वर के स्वभाव में कई चीजें समाविष्ट हैं: इसमें परमेश्‍वर के पास क्‍या है और वह क्‍या है, उसके विचार और उसके सुझाव, उसकी सोच और उसकी बुद्धि और साथ ही सभी प्रकार के लोगों के प्रति उसका बर्ताव, मानवजाति के प्रति उसकी दया और परवाह या भ्रष्ट लोगों के प्रति उसकी घृणा और नफ़रत, आदि का समावेश है। इसके अलावा, परमेश्वर के हर वाक्य में उसके हर वचन की पृष्ठभूमि और स्रोत समाविष्ट है, जिसमें एक भी वाक्य ऐसा नहीं है जो बिना बुनियाद का हो, और हर वह कार्य जो परमेश्वर करता है और वह वाक्य जो वह बोलता है, वह उस सब की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है जो वह जीवन में है। दूसरी तरफ, परमेश्वर के स्वभाव के बारे में मेरी समझ केवल उन बातों तक ही सीमित थी जो परमेश्वर को पसंद है और जिनसे वह नफ़रत करता है। इस प्रकार की समझ बहुत एक-तरफा थी इसलिए यह परमेश्वर के प्रत्येक वाक्य से उसके स्वभाव को समझने में असमर्थ थी। इसके अलावा, मैं यह भी समझ गई थी कि अगर मैं परमेश्वर के प्रत्येक वाक्य से उसके स्वभाव को समझना चाहती हूँ, तो मुझे परमेश्वर के वचनों को समझने का प्रयास करने के लिए परमेश्वर के समक्ष खुद को शांत करने और बहुत अधिक प्रयास करने की आवश्यकता है। इसके अलावा, मुझे परमेश्वर के द्वारा बोले गए वचनों के पीछे की मनोदशा और साथ ही परमेश्वर के कर्मों के पीछे की पृष्ठभूमि और स्रोत को समझने पर ध्यान केन्द्रित करते हुए, परमेश्वर के सम्मुख प्रार्थना करने और मार्गदर्शन खोजने की आवश्यकता थी।

मैं परमेश्वर की प्रबुद्धता और रोशनी तो धन्यवाद देती हूँ जिसने मुझे इन बातों को समझने दिया, और फिर इसके बाद मैंने इस पहलु का अभ्यास करने और इसमें प्रवेश करने पर ध्यान केन्द्रित करना शुरू कर दिया। एक दिन, मैंने परमेश्वर के वचनों के एक अंश को पढ़ा: "ऐसा कार्य महत्वपूर्ण है या नहीं यह मानवजाति की आवश्यकताओं, एवं मानवजाति की कलुषता की वास्तविकता, और शैतान की अनाज्ञाकारिता और कार्य के विषय में उसकी गड़बड़ी पर आधारित है। सही व्यक्ति जो कार्य करने में समर्थ है वह अपने कार्य के स्वभाव, और कार्य के महत्व पर आधारित होता है। जब इस कार्य के महत्व की बात आती है, इस सम्बन्ध में कि कार्य के कौन से तरीके को अपनाया जाए - आत्मा के द्वारा सीधे तौर पर किया गया कार्य, या देहधारी परमेश्वर के द्वारा किया गया कार्य, या मनुष्य के माध्यम से किया गया कार्य– जिसे पहले निष्काषित किया जाना है वह मनुष्य के माध्यम से किया गया कार्य है, और, उस कार्य के स्वभाव, और देह के कार्य के विपरीत आत्मा के कार्य के स्वभाव पर आधारित है, अंततः यह निर्णय लिया गया है कि देह के द्वारा किया गया कार्य आत्मा के द्वारा सीधे तौर पर किए गए कार्य की अपेक्षा मनुष्य के लिए अत्यधिक लाभदायक है, और अत्यधिक लाभ प्रदान करता है। यह उस समय परमेश्वर का विचार है कि वह निर्णय ले कि कार्य आत्मा के द्वारा किया गया था या देह के द्वारा" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है" से)। जब मैंने ध्यानपूर्वक इस अंश को समझने की कोशिश की, तो मुझे लगा कि मैंने एक बड़े इनाम का अनावरण कर लिया है। परमेश्वर के वचन परमेश्वर की उस समय की सोच के विकास को, अंत के दिनों में कार्य के लिए किस विधि का उपयोग किया जाए इस बात की सोच को दर्शाते हैं। अपनी सोच की इस अवधि के दौरान, परमेश्वर जिस पहली बात विचार करता था वह थी कि ऐसी कौन सी विधि का उपयोग किया जाए जिससे इस कार्य में मनुष्य को सबसे ज्यादा फायदा पहुँचे, मनुष्य के उद्धार के परिणाम को किस प्रकार सर्वोत्तम ढंग से प्राप्त किया जाए और शैतान को हार स्वीकार कराने के लिए क्या किया जाए, जिससे शैतान को परास्त कर दिया जाए उन लोगों को पूर्ण उद्धार में लाया जाए जिन्हें बहुत गहराई तक नुकसान पहुँचाया गया है। विचार की इस पूरी प्रक्रिया के दौरान, परमेश्वर ने लगातार मनुष्य के बारे में विचार किया और कभी भी अपने खुद के हित या सुरक्षा के बारे में विचार नहीं किया। परमेश्वर स्पष्ट रूप से जानता था कि उसका देहधारण बहुत कठिनाई का सामना करेगा, लेकिन जब मानव जाति को बचाने की बात आई तो यह विचार का विषय नहीं था। इसके बजाय, उसने फिर भी, मानवजाति की जरूरतों और मानवजाति की चरित्रहीनता की वास्तविकता के आधार पर, अंत के दिनों का कार्य करने के लिए परमेश्वर के देहधारी बनने की विधि को चुना। वह शेर की माँद में अंदर गहराई तक जाने का बड़ा जोखिम उठाता है, वह बड़े लाल अजगर के क्रूर उत्पीड़न और पीछे पड़ने को भुगतता है, विभिन्न पंथों और संप्रदायों के दुर्व्यवहार और उनकी ईशनिंदा को झेलता है, और हम में से अनुसरण करने वालों के प्रतिरोध, विद्रोह और गलतफ़हमी को भी झेलता है। परमेश्वर के हृदय पर किए गए घाव और हमले और वह अपमान जो परमेश्वर सहता है, वास्तव में ऐसी बातें हैं जिन्हें कोई नहीं समझ सकता है। परमेश्वर जो कुछ भी व्यक्त और प्रकट करता है, वही सब है जो वह जीवन में है: मानवजाति के प्रति उसका निःस्वार्थ समर्पण और उनके लिए उसका मूल्य चुकाना। परमेश्वर की महानता और निःस्वार्थता उसके कार्य और उसके हर वाक्य में स्वाभाविक रूप से प्रकट होती है, और ये परमेश्वर की महान दया और निःस्वार्थ प्रेम को भी साकार करती हैं। मानवजाति के लिए परमेश्वर का प्यार सिर्फ खोखले वचन नहीं है, बल्कि एक व्यावहारिक मूल्य है जो वह चुकाता है। उस समय, मुझे एक जीवंत समझ आयी कि परमेश्वर वास्तव में बहुत महान और बहुत प्यारा है! इसलिए, यद्यपि मैंने परमेश्वर के इन वचनों को पहले पढ़ा था, लेकिन मैं कभी भी मसीह के द्वारा बोले गए वचनों या उनसे जो कुछ भी प्रकट होता था, उसके पीछे की पृष्ठभूमि को नहीं समझी थी, न ही मैं मानवजाति के लिए मसीह के प्रेम को समझी थी। मैं केवल अब जा कर परमेश्वर के इन वचनों के बारे में कुछ सही समझी था: "हर एक वाक्य जो मैं ने कहा है वह परमेश्वर के स्वभाव को सिद्ध करता है।"

इससे पहले, क्योंकि मैंने अपने दिल को कभी भी शांत नहीं किया था या परमेश्वर के वचनों को ईमानदारी से समझने की कोशिश नहीं की थी, इसलिए मैंने परमेश्वर को समझने के बहुत से अच्छे अवसरों को खो दिया था, इतना ज्यादा कि आज भी परमेश्वर के प्रति मेरी कई धारणाएँ और ग़लतफ़हमियाँ हैं, और मैं अभी भी उससे विमुख हूँ। केवल अब मैं समझती हूँ कि यदि मैं परमेश्वर के स्वभाव को समझना चाहती हूँ, तो मुझे अवश्य परमेश्वर के हर वाक्य के अंदर, सत्य को ईमानदारी से समझना और उसकी खोज करनी चाहिए। इस तरह से, मुझे निश्चित रूप से बहुत लाभ होगा। आज से, मैं परमेश्वर के वचनों में और अधिक प्रयास लगाने पर ध्यान केंद्रित करना, और शीघ्र ही ऐसा व्यक्ति बनने की कोशिश करना चाहती हूँ जिसे परमेश्वर की कुछ समझ हो।