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परमेश्वर के मातृवत् ह्रदय को कौन जानता है?

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किंगज़िन झेंगझोउ शहर, हेनान प्रांत

पहले मैं परमेश्वर के मानवजाति को बचाने के कार्य को नहीं समझती थी। मैं सोचती थी कि अगर कोई व्यक्ति अपने कार्य में भ्रष्टता प्रकट करता है या कलीसिया के कार्य को नुकसान पहुँचाने वाला उल्लंघन करता है, तो वह व्यक्ति सजा का सामना करेगा, या अपने कर्तव्य को गँवा देगा या दंड के अधीन किया जाएगा। यह परमेश्वर की धार्मिकता है। इस ग़लत समझ को देखते हुए, साथ ही अपने कार्य में ग़लतियाँ करने से अपना कर्तव्य गँवा देने के डर से, मैंने एक "चतुर" तरीके के बारे में सोचा: जब भी मैं कुछ ग़लत करती, तो मैं अपनी पूरी कोशिश करती कि अगुआओं को इस बारे में पहले पता न चले, और तेजी से खुद ही उसकी क्षतिपूर्ति करने की कोशिश करती और उसे सही करने के लिए अपना पूरा प्रयास करती। क्या फिर इससे मुझे अपना कर्तव्य पूरा करने में मदद नहीं मिलेगी? इसलिए, मैं जब भी अपने कार्य की सूचना देती थी, तो मैं बड़े मुद्दों को छोटा बना दिया करती थी और छोटे मुद्दों को गायब ही कर दिया करती थी। अगर कभी मैं निष्क्रिय रहती थी तो मैं अगुआओं के समक्ष इसे छिपाने की पूरी कोशिश किया करती और बेहद सक्रिय और सकारात्मक होने का दिखावा करती, मुझे डर था कि अगुआओं को मैं अक्षम लगूँगी और वे मेरा उपयोग करना बंद कर देंगे। तो, बस इसी तरह से, मैं जो कुछ भी किया करती थी, उसमें अगुआओं और परमेश्वर के निमित्त काफी ध्यानपूर्वक सतर्क रहा करती थी।

हालाँकि, परमेश्वर लोगों के हृदयों का निरीक्षण करता है, और मेरी "उत्तम चाल" कभी भी परमेश्वर की आँखों से नहीं बच सकी थी। मैंने पाया कि मैं चीज़ों को छिपाने की जितनी भी ज्यादा कोशिश करती थी, परमेश्वर मुझे उतना ही ज्यादा प्रकाश में उजागर कर देता था। उदाहरण के लिए: जब भी मैं अगुआओं के समक्ष अपनी "प्रतिभा" का दिखावा करने की कोशिश करती, तो हमेशा ही तुच्छ बन जाया करती थी और खुद की हँसी उड़वा लिया करती थी; जब कभी भी मैं अपनी निष्क्रिय स्थिति को छिपाने की कोशिश करती, तो अनजाने में ही मेरे चेहरे पर "काले बादल" छा जाया करते थे और भाई और बहनें इसे समझ जाते थे; जब कभी भी मैं अपने कार्य में भूल-चूकों को छिपाने की कोशिश करती थी, तो परिणाम एक आइने की तरह होता था जो सब कुछ प्रकट कर देता था। ... बेईमान होने की वजह से मेरे अंतःकरण की बार—बार की शर्मिंदगी और यातना ने मुझे नीचे गिरा दिया था, फिर भी इससे मुझे इस बात के पीछे के इरादे और प्रयोजन समझ में नहीं आए कि परमेश्वर ने इस तरह से कार्य क्यों करता है, न ही मेरी समझ में यह आया कि परमेश्वर लोगों को कैसे बचाता है। मैं मात्र निष्क्रिय रूप से "परमेश्वर का धार्मिक न्याय" के आने का—कलीसिया द्वारा निपटाए जाने का—इंतजार करती थी।

लेकिन हकीकत ने वैसी प्रगति नहीं की थी जैसी मैंने कल्पना की थी: मेरे कार्य में, भले ही उचित रूप से अपना कर्तव्य पूरा न करने के लिए मेरी काट-छाँट की जाता थी और मुझसे निपटा जाता था, लेकिन मैं भाइयों और बहनों का समर्पित मार्गदर्शन प्राप्त करने में समर्थ थी, जो मुझे बताते थे कि क्या लापरवाही है और वफ़ादारी से मेरा कर्तव्य पूरा करना क्या है। मैं समझती थी कि केवल परमेश्वर की अपेक्षा के अनुसार कार्य करके ही कोई व्यक्ति अपने कर्तव्य को उचित रूप से पूरा कर सकता है। जीवन में प्रवेश करने के संदर्भ में, मैं कई बार ऐसे बुरे विचारों में फँसी थी, जिनसे मैं छुटकारा नहीं पा सकती थी, जिससे मेरा हृदय वेदना में रह जाता था। मैं अपना हृदय खोलना और संवाद की कोशिश करना चाहती थी, लेकिन मुझे बोलने में बहुत ज्यादा शर्मिंदगी लगती थी। अंत में, मैं अंधकार में गिर गई और मैंने पवित्र आत्मा के कार्य को गँवा दिया। लेकिन मेरे सब कुछ छोड़ने और बोलने के बाद, मैंने देखा कि इसकी वजह से भाई और बहनें मुझ पर न केवल हँसते नहीं थे या मुझे तुच्छ नहीं समझते थे, इसके बजाय वे मेरी मदद और मुझे प्रोत्साहित करते थे, जिसने मुझे प्रकाश में जीने में सक्षम बनाया और मुझे अभ्यास करने का मार्ग दिया और पाप को हराने की ताकत दी। बाद में, मैं देखती थी कि जब मेरे आसपास के भाई और बहन कुछ गलत करते थे या भ्रष्टता प्रकट करते थे, तो कलीसिया उन्हें इस वजह से घर नहीं भेजता था। बल्कि, उन्हें बार-बार मौका देकर कलीसिया उनसे संवाद करने और उन्हें सहारा देने का पूरा प्रयास करता था। भले ही, किसी कुछ लोगों को अंत में घर भेजा जाता था, इसकी एकमात्र वजह यह होती थी, कि उनमें अच्छी मानवता की कमी थी; वे बाधा उत्पन्न करने वाले और कलीसिया के कार्य में हस्तक्षेप करने वाले लोग थे, जो एक सकारात्मक भूमिका निभाने में असफल थे। वे हमेशा अपने कर्तव्य को लापरवाही से निभाते थे, वे कोई व्यवहारिक परिणाम पाने में असमर्थ थे और कई बार काट-छाँट करने, निपटाने, और संवाद करने के बाद भी उन्होंने पछतावा करने से इनकार किया था। लेकिन ऐसे लोगों के लिए भी, कलीसिया अभी भी उनके पछतावा करने और जागने का इंतजार कर रहा है। अगर वे वाकई आत्म-चिंतन करते हैं और एक समयावधि के बाद बदल जाते हैं, तो कलीसिया फिर से उन्हें अभ्यास करने और अच्छे कर्म तैयार करने का मौका देगा। इन तथ्यों ने मुझे दिखाया कि जिस तरह से माता-पिता अनुपम प्रेम और अनुराग के साथ अपने अपने खर्चीले बेटे की वापसी पर बर्ताव करते हैं, वैसा ही भाव परमेश्वर का भी है। केवल तभी मुझे ये एहसास हुआ कि चाहे परमेश्वर लोगों के साथ दया और प्रेम से पेश आये या उनके संग धार्मिकता, प्रताप और कोप के साथ व्यवहार करे, यह सब अधिकतम संभव अंश तक मानवजाति को बचाने के लिए है। इन सबके भीतर मानवजाति के लिए परमेश्वर का असीम प्रेम और उद्धार है और यह सब उसके सार द्वारा निर्धारित होता है। परमेश्वर की इच्छा पर विचार करते हुए, मैंने उन लोगों के बारे में सोचा जिन्हें उजागर या प्रतिस्थापित किया गया था या जिन्हें घर भेजा गया था; केवल इस तरह के उजागर किये जाने और हटाए जाने के परिवेश में ही उन्होंने अपने ऊपर मनन करना, शैतान द्वारा उनकी भ्रष्टता की सच्चाई को देखना और परमेश्वर के सामने दंडवत कर दिल से पश्चाताप करना शुरू किया। उस तरह की असफलता के बिना, शायद वे आंखें बंद किये मार्ग में भटकते ही रहते। यह स्पष्ट है कि परमेश्वर जो कार्य करता है वो वाकी मानवजाति को बचाने का है और इसमें इंसान के लिए उसका प्रेम और दयालु इरादे हैं। पहले मैं वास्तव में परमेश्वर के उद्धार-कार्य को नहीं समझती थी; परमेश्वर की मेरी समझ बहुत एक-पक्षीय थी।

उस पल, मैंने परमेश्वर के वचनों के एक अंश के बारे में सोचा: "मसीह का सार क्या है? मनुष्यों के लिए, मसीह का सार प्रेम है; जो लोग उसका अनुसरण करते हैं, उनके लिए यह असीम प्रेम है। अगर उसमें कोई प्यार न होता या दया नहीं होती, तो लोग अभी भी उसका अनुसरण नहीं कर रहे होते। कुछ लोग कहते हैं: 'तो क्या परमेश्वर अभी भी धर्मी नहीं है?' यह सही है कि वह अभी भी धर्मी है, लेकिन उसके स्वभाव के दृष्टिकोण से, उसकी धार्मिकता मानव जाति की भ्रष्टता और दुष्टता के प्रति घृणा है। क्या होता यदि उसके पास बिना प्रेम के केवल धार्मिकता ही होती? क्या होता अगर प्रेम धार्मिकता पर हावी न हो पाता? तब तो हम यह कह सकते थे कि मानव जाति के दिन पूरे हो चुके हैं। इसलिए, मैं तुम्हारे साथ साफ़-साफ़ बात कर रहा हूँ: परमेश्वर देहधारण के दरम्यान मानवजाति के लिए जो काम करता है, उसमें उसका सबसे स्पष्ट और प्रमुख सार प्रेम है; यह असीम सहिष्णुता है। तुम कल्पना करो, 'यदि परमेश्वर किसी को मार गिराना चाहता है, तो वह ऐसा करेगा, और यदि वह किसी से घृणा करता है, तो वह उस व्यक्ति को दंड देगा, शाप देगा, उसका न्याय करेगा और उसे ताड़ना देगा; वह इतना सख्त है! यदि वह लोगों पर क्रोधित होता है, तो लोग डर से कांप जाएँगे और उसके सामने टिक नहीं पाएँगे।' बहरहाल, वह बात सच नहीं है; यह केवल एक तरीक़ा है जिससे परमेश्वर का स्वभाव व्यक्त किया जाता है। अंततः, अभी भी उसका लक्ष्य उद्धार करना है। उसका प्यार उसके स्वभाव के सभी प्रकटनों में बना रहता है। इस पर चिंतन करो, देह में काम करते समय, परमेश्वर लोगों के सामने जो सबसे अधिक प्रकट करता है, वह प्रेम है। धैर्य क्या है? भीतर प्रेम होने के कारण दया का होना धैर्य है, और तब भी इसका उद्देश्य लोगों को बचाना है। परमेश्वर लोगों पर दया करने में सक्षम है क्योंकि उसके पास प्रेम है। ठीक उसी तरह जैसे अगर पति-पत्नी के बीच सच्चा प्यार हो, तो वे एक-दूसरे की कमियों और दोषों को नहीं देखते हैं। अगर उन्हें क्रोध के लिए उकसाया जाए, तो भी वे धीरज धर सकेंगे। सब कुछ प्रेम की नींव पर ही स्थापित होता है। यदि वे घृणासे भरे होते, तो उनका रवैया वैसा नहीं होता जैसा कि अभी है, उनकी अभिव्यक्ति वैसी न होती जैसी कि अभी है। यदि परमेश्वर में केवल नफ़रत होती और रोष होता, और वह बिना किसी प्रेम के केवल न्याय करता और ताड़ना ही देता, तो स्थिति वह नहीं होती जो तुम अभी देखते हो और विपत्ति तुम लोगों पर आ पड़ती। क्या वह तुम्हें सच्चाई प्रदान करता?" ("मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "मनुष्‍यता के लिए परमेश्‍वर का सच्‍चा प्रेम")। अतीत में जब मैंने इस अंश को पढ़ा था, तो भले ही मैं कहा करती थी कि मैंने इसे पसंद करती हूँ, लेकिन मैंने कभी इसे समझा नहीं था और तब भी परमेश्वर के लिए काफी संदेह और सतर्कता से भरी हुई थी। केवल अब, मुझे इन वचनों की थोड़ी सी समझ आई है और यह महसूस कर सकती हूँ कि इनमें बहुत सार है। इन पंक्तियों के बीच के अंतराल मानवजाति के लिए परमेश्वर के गहन अनुराग से और उसकी सदाशयी आपूर्ति, सहारे और उनके लिए शिक्षा से भरे हैं।

इस बिन्दु पर, मैं अपने हृदय में परमेश्वर के प्रति अपराध-बोध की गहरी भावना विकसित होने से नहीं रोक सकी थी: हे परमेश्वर! जितने भी समय तक मैंने तेरा अनुसरण किया है, भले ही मैं तुझ पर विश्वास करती थी, लेकिन मैं तुझे नहीं जानती थी। मैंने बिना देखे और झूठे ढंग से न केवल तेरे दयालु ह्रदय को ग़लत समझा, बल्कि मैंने तुझे काफी पीड़ा भी पहुँचाई। मैं वाकई तेरे समक्ष आने के अयोग्य हूँ, और तुझसे उद्धार पाने के तो और भी अधिक अयोग्य हूँ। मैं केवल तेरे शाप के योग्य हूँ! फिर तू जिस ढंग से मुझसे बर्ताव करता है, वह मेरी अवज्ञा पर आधारित नहीं है। बल्कि, तू मज़बूती से मेरा उत्कर्ष करता है, मुझ पर दया दिखाता है और मुझे सहता है, मुझे तेरे समस्त प्रेम और अनुग्रह का आनंद लेने दे रहा है, मुझे अपनी सुंदरता और दयालुता देखने दे रहा है, और तेरे वचन की व्यावहारिकता का अनुभव करने दे रहा है—परमेश्वर धार्मिक है और इन सबसे बढ़कर प्रेम है! अब से, मैं तेरे वचनों और वास्तविक जिंदगी के माध्यम से तेरी पूजनीयता के बारे में और अधिक जानना चाहती हूँ, और ऐसा व्यक्ति बनने का प्रयत्न करना चाहती हूँ जो ईमानदार हो, जो तुझे प्रेम करती हो, और मैं तेरे महान प्रेम को चुकाने के लिए पूरी ईमानदारी से अपने कर्तव्य को पूरा करना चाहती हूँ!

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