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एक उड़ाऊपुत्र की वापसी

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वांग सिन हार्बिन शहर

1999 में, मैं कलीसिया के कार्य की आवश्यकताओं के कारण एक अग्रणी बन गया। हालांकि शुरुआत में मुझे गहराई से महसूस हुआ कि मैं कार्य के योग्य नहीं था, कुछ समय बाद मेरे अभिमान और आत्म तुष्ट स्वभाव के कारण, मेरी प्रारंभिक सावधानी धीरे-धीरे स्वयं को उत्कर्षित करने और अपने बारे में गवाही देने में बदल गयी। मैं भोजन, कपड़े और मौज-मस्ती में लगा रहता था, और लालची बनकर अपनी हैसियत के मज़े ले रहा था। मैं परमेश्वर के साथ एक समान स्तर पर भी होना चाहता था। अंततः मुझे निकाल दिया और घर भेजा दिया गया। उसके बाद ही मैं जागरूक हुआ और मुझे एहसास हुआ कि "प्रतिष्ठा" ने मुझसे परमेश्वर और सच्चाई दोनों को छुड़वा दिया था; "प्रतिष्ठा" ने मुझसे अपना व्यक्तिगत राज्य स्थापित करवा दिया था; "प्रतिष्ठा" ने मुझे एक ईसा विरोधी में बदल दिया था; "प्रतिष्ठा" ने मुझे मृत्यु के मार्ग की ओर भेज दिया था। तब मुझे पता चला कि मैं सही मार्ग से बहुत दूर भटक गया था और बहुत गहरा गिर चुका था।

पीछे मुडकर देखता हूँ, मेरा पतन तब शुरू हुआ जब मेरे सुसमाचार कार्य के कुछ परिणाम दिखने शुरू हुए। उस समय, मुझे सचमुच लगा कि मैं कुछ हूं और बड़ी बातें करने लगा और स्वयं से प्रसन्न होना शुरू कर दिया, और मैं अकसर अपने कार्य के दायरे के भीतर ही एक खास स्वर में लोगों से बात करता था। बाद में, मेरे साथ कार्य करने वाली एक बहन ने मेरी कमियों को मुझे दिखाया, और कहा कि मेरे बात करने का तरीका बहुत ही अभिमानी स्वभाव वाला है। मैंने इसे सिर्फ ऊपरी स्तर पर ही स्वीकार किया, लेकिन अपने हृदय में नहीं। अंत में, मैंने उन उठाई गई कमियों का अप्रत्यक्ष रूप से खंडन करने के सभी तरह के तरीकों के बारे में सोचा। और इसके बाद, मैंने अपनी प्रतिष्ठा के लिए बात करना शुरू कर दिया, और इस बात को लेकर कभी परेशान नहीं हुआ कि मैं परमेश्वर को संतुष्ट करने में नाकाम हो रहा हूँ। बल्कि मैं अक्सर निराश होता था क्योंकि अन्य लोग मुझ पर विश्वास नहीं करते थे। धीरे-धीरे, मेरा हृदय सुन्न और भावना से रहित हो गया। जब मैं अभी भी पूरी तरह से अनजान था कि मैं गलत मार्ग पर चल रहा था, एक अग्रणी ने मुझे एक पत्री दी। उसमें लिखा था: "फ्लां-फ्लां, अब जब तुम एक बड़े आदमी बन गए हो, तुम्हारी आवाज का स्वर तक बदल गया है। तुम काफी कुछ दुनिया के सरकारी अधिकारियों की तरह बन गए हो। तुम्हें जल्दी ही हटा दिया जाएगा।" क्या? क्या इसका अर्थ यह नहीं है कि मैं अपना भविष्य और भाग्य खोने वाला हूं? इन वचनों को पढ़ने के बाद मैं दर्दनाक पीड़ा में पड़ गया, लेकिन मैंने अपने स्वभाव की जांच नहीं की या इसे परमेश्वर की ओर से चिंता और विचार के रूप में समझ पाया, और इसके अलावा इस तरह से जारी रखने के परिणामों को मैंने नहीं समझा। फिर, मुझे अचानक एक बड़ी बीमारी हो गई। इस दशा और परिस्थिति में, मुझे लगा कि मैं पूरी तरह से निराशा में घिर गया था। मेरा मन एक उलझन में था और मुझे अपना कर्तव्य खोने का डर था। मुझे हटा दिए जाने और कोई भविष्य ना होने का भी डर था, साथ-साथ निकालकर घर भेज दिए जाने का डर भी था। मैं आहत मन से परमेश्वर से प्रार्थना कर रहा था। हालांकि मुझे एहसास हुआ कि मुझे प्रतिष्ठा के बारे में बहुत अधिक परवाह है, मैं पूरी तरह से शैतान के नियंत्रण में था और स्वयं को मुक्त नहीं कर सकता था। मैंने वास्तव में अग्रणी के पद का उपयोग भाइयों और बहनों को नियंत्रित करके अपने लिए निजी चीज़ें करवाने के लिए किया, मैंने उनसे एक चिकित्सक ढूंढने के लिये कहा ताकि मैं बीमारी से जल्दी से जल्दी छुटकारा पा सकूं मेरे हृदय में एक विचार सबसे आगे था: मुझे किसी भी सूरत में न अपनी प्रतिष्ठा नहीं खोनी है और न अपना कर्तव्य नहीं खोना है। मैंने विशेष व्यवहार का आनंद लेना शुरू कर दिया, अच्छा पौष्टिक आहार लेने लगा, और बिना किसी प्रश्न के भाइयों और बहनों से अच्छा खाना भी स्वीकार करने लगा। फिर भी, मैंने मूर्खता से सोचा कि: मैं इसे आनंद के लिए नहीं कर रहा हूं; मैं यह अपनी बीमारी को ठीक करने के लिए कर रहा हूं, ताकि मेरा कार्य विलंबित न हो, और इसलिए यह यह ऐसी कोई ज़्यादती नहीं है। आखिरकार, मेरी तबियत ठीक होने की बजाय, और बिगड़ती गई।

बाद में, मेरी परिस्थिति के आधार पर, अग्रणियों ने मुझे आत्म-चिंतन करने के लिए घर जाने दिया, ये कह कर कि मेरी बीमारी एक मानसिक समस्या है।

जब मैंने यह समाचार सुना कि वे मुझे आत्म-चिंतन करने के लिए घर जाने को कह रहे हैं, तो मुझे ऐसा महसूस हुआ कि जैसे मुझ पर बिजली गिर पड़ी हो। मेरे पैर इतने कमजोर हो चुके थे कि मैं खड़ा नहीं हो पा रहा था, और मेरे अंदर सांस लेने की ताकत भी नहीं बची नहीं थी। मैंने सोचा: सब समाप्त हो गया है। क्या इतने वर्षों का कार्य व्यर्थ में नहीं चला गया? अब मेरे पास क्या संभावनाएं बची हैं? मैं भविष्य में कैसे क्या करूगा?

घर लौटने के बाद, मैं पूरे दिन अपने आपे से बाहर था। मेरी पूर्व महत्वाकांक्षायें और प्रतिज्ञाएं सभी खत्म हो चुकी थीं। मैंने अपनी उम्र देखी और फिर देखा कि इतने वर्षों में मेरा परिवार कैसे बदल गया था: मेरे सभी भाइयों और बहनों का विवाह हो गया था, जबकि मैं एक अनावश्यक अजीब-सा आदमी बन गया जिसे लोग समझ नहीं सकते थे। उस क्षण में, मुझे लगा कि मैं एक स्तर तक अकेला और असहाय बन गया था, और इस तरह मैं हर बेचैन, शिकायती, निराश और दोषारोपण करने वाला बना रहने लगा। यद्यपि मैं कभी-कभी पवित्र आत्मा के कार्य की मिठास और परमेश्वर के कार्य के अनुभव के आनंदपूर्ण क्षणों के बारे में सोचता था, मैंने इसके बारे में जितना अधिक सोचता, उतना ही अधिक मैंने दुखी होने लगा और पछताने लगा। तब मैं रोता था, अपने आप से पूछता था: क्या परमेश्वर में विश्वास करने का मेरा मार्ग बस इस तरह समाप्त हो जाएगा? क्या मैं सिर्फ इस तरह से पीड़ित हो कर मर जाऊंगा? नहीं, ऐसा नहीं हो सकता! मैं इतना दुखी हो चुका था कि लगा इस ज़िंदगी से तो मौत अच्छी। मैं इतने दर्द में था कि वास्तव में जीवित रहने के बजाय मृत्यु चुनता मैंने घुटने टेक दिए और रोने लगा, जोर से परमेश्वर को आवाज़ दे कर और प्रार्थना करके: "हे परमेश्वर! तुम्हें छोड़ने के बाद हर पल इतना असहनीय रहा है। अब मैं गहराई से समझता हूं कि मुझे जो चाहिए, वह तुम हो, न कि देह के लिए भोजन, कपड़े, प्रतिष्ठा और आनंद जैसी चीज़ें.... ये चीज़ें केवल मुझे पीड़ा, ताड़ना और मानसिक यातना देंगी, मेरी अंतरात्मा पर अभियोग लगाएंगी, निंदा और चिंता ले कर आएँगी। हे परमेश्वर! मैं तुम्हारे द्वारा पूर्ण किए जाने के अवसर को न संजो पाने के लिए स्वयं से नफरत और घृणा करता हूं। मैं वास्तव में तुम्हें छोड़ना नहीं चाहता हूं! हे परमेश्वर! मैं अपने भविष्य के मार्ग पर कैसे चलूंगा? अब मैं क्या करूँ? कृपया मुझे सही मार्ग दिखाओ। इन परिस्थितियों में मैं तुम्हारे प्रयोजनों को कैसे संतुष्ट कर सकता हूं?" मेरा हृदय रो रहा था, और मेरा पूरा शरीर काँप रहा था। अफसोस, आभार और पश्चाताप के आँसू, सभी एक साथ मिल गए थे। उस क्षण में, मुझे समझ आया कि परमेश्वर द्वारा जीते हुए किसी व्यक्ति का उसके स्वभाव का अपमान करने पर परमेश्वर द्वारा त्याग दिए जाने के बाद कैसा महसूस होता है! मेरे निरंतर रोने और अफसोस के बीच, मुझे परमेश्वर धीरे से अपनी तरफ मुड़ते महसूस हुए। परमेश्वर ने फिर मुझे प्रबुद्ध किया: "तुम क्या करोगे अगर तुम्हें फिर से सेवा करने वालों के समान परीक्षा भोगनी पड़े तो? चाहे कभी भी हो, तुम्हें एक हृदय और दिमाग के साथ अनुसरण करना होगा ... स्वभाव परिवर्तन खोजना होगा जब तक कि पूरे ब्रह्मांड का कार्य पूरा नहीं हो जाता।" मुझे तब ये भी याद आया कि परमेश्वर ने एक बार कहा था: "इससे कोई अंतर नहीं पडता कि आज्ञा का उल्लंघन अनजाने में हुआ है कि विद्रोही स्वभाव के कारण, केवल इतना याद रखें: शीघ्रता करें और वास्तविकता को पहचानें! आगे बढने का प्रयास करें; हालात कुछ भी हों, आप आगे बढने का प्रयास करें। …" ("परमेश्वर की इच्छा है कि यथासंभव लोगों की रक्षा की जाये" मसीह की बातचीतों के अभिलेख में ). परमेश्वर के अथक वचन के सामने, मेरा हृदय धीरे-धीरे ठीक हुआ। मुझे आशा की किरण नज़र आई, मैंने परमेश्वर के प्रयोजनों को समझा, और अब मुझे कोई उलझन नहीं थी कि मुझे अपने सामने कौन सा मार्ग लेना था। अभी, परमेश्वर चाहता है मैं एक वफादार अनुयायी रहूं, दृढ़तापूर्वक स्वभाव के बदलाव की खोज कर सकूं, और इसी क्षण से मैं उस मार्ग पर चलूँ जिसे एक सृजित प्राणी के रूप में मैं समाप्त नहीं कर पाया था, अब परमेश्वर से आगे कुछ नहीं मांगना। इस बिंदु पर, मैंने परमेश्वर द्वारा कहे गए सेवा करने वालों की परीक्षा के बारे में सोचा, जिसका अर्थ है: अगर मनुष्य वास्तव में एक सृजित प्राणी बनने के लिए तैयार हो तो वह बहुत ज्यादा कष्ट नहीं झेलता है ... हां, मेरी पीड़ा का स्रोत मेरी भ्रष्टता है। परमेश्वर का मूल प्रयोजन मनुष्य को इतनी पीड़ा देना नहीं था। बात सिर्फ इतनी-सी है कि मैं एक सृजित प्राणी नहीं बनना चाहता था। मैं हमेशा अपने ही मार्ग पर चलने के लिए सच्चाई से बचने की कोशिश करता था, हमेशा परमेश्वर बनना चाहता था, और चाहता था कि लोग मुझसे परमेश्वर की तरह व्यवहार करें। फिर मैं कैसे बहुत पीड़ा नहीं झेलता? इस पल में, मैंने व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर के वचन की शक्ति का अनुभव किया-यह मुझे मृत्यु से वापस ला सकती है, मुझे मृत्यु की सभी शक्तियों के पार ले जा सकती है। अब मेरे हृदय में परमेश्वर के वचन से सभी कठिनाइयां हल हो गयी थीं। एक लंबे सूखे के बाद अच्छी बारिश की तरह, सब कुछ इतना ताजा हो गया था, इतना मुक्त, इतना निराला। हाँ! परमेश्वर, मैं मूल रूप से तुम्हारे द्वारा बनाया गया प्राणी था। चूंकि मैं तुम्हारे द्वारा बनाया गया था, मैं तुम्हारा हूं और तुम्हारी ही आराधना करूंगा। यह मेरा कर्तव्य और जिम्मेदारी है। मुझे तुमसे और ज्यादा कुछ नहीं माँगना चाहिए और बस तुम्हारे धर्मी स्वभाव के आगे आज्ञाकारी होना चाहिए। मुझे आत्म-चिंतन करने के लिए घर जाने देना मेरे लिए तुम्हारा प्यार और सुरक्षा का सबसे बड़ा उपहार है। मैं अपनी अवज्ञा के कारण बीमारी से परेशान था और क्योंकि मैंने तुम्हारे स्वभाव का अपमान किया था। मेरे कार्यों के आधार पर मुझे तुम्हारे द्वारा बहुत पहले शाप दे दिया जाना चाहिए था, लेकिन तुम्हारे अनुग्रह के कारण तुमने मुझे आज जीवित रहने की अनुमति दी है।

इस अनुभव ने मेरी आत्मा की गहराई में गहरी छाप छोड़ दी है, जिससे मैं जीवनभर नहीं भूल पाऊंगा। हर बार मैं जब भी खुद को मार दिए जाने के एक के बाद एक दृश्य याद करूँगा, तो मैं बहुत सतर्क और प्रेरित हो जाऊँगा। मैं फिर कभी परमेश्वर का अपमान नहीं करूंगा और परमेश्वर को दुखी नहीं करूंगा। परमेश्वर की सहिष्णुता और धैर्य के बिना, मैं आज साँस नहीं ले रहा होता! हे परमेश्वर! धन्यवाद! तुम्हारे कार्य में मैंने पहले उसकी मिठास और खुशी का आनंद लिया है, लेकिन मैंने तुम्हारे उल्लंघन ना किये जा सकने वाले स्वभाव को भी चख लिया है। इसके अलावा, मैंने उड़ाऊपुत्र होने का और फिर तुम्हारे आलिंगन में वापस आने की गर्मी का अनुभव किया है। ऐसा कैसे हो सकता है कि तुम्हारे कार्य मुझे हार्दिक यशोगान करने को बाध्य ना करें?