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विवाह को बचाने का रहस्य (भाग 1) - सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने मेरे विवाह को बचाया

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ली क्वान

जब मैं छोटा था, मेरी माँ और मेरे पिताजी के बीच अक्सर बहस होती थी, और मेरी माँ को अक्सर मेरे पिता के हाथों मार और दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा। माँ ने अपने दिल में इतना मालिन्य भर लिया कि वह काफ़ी छोटी ही गुज़र गईं। उसके बाद मैंने खुद से वादा किया: जब मैं बड़ा हो जाऊँगा और एक परिवार को शुरू करूँगा, तो मैं अपनी पत्नी के साथ अच्छा व्यवहार करूँगा और एक प्रसन्न और शांत परिवार का सर्जन करूँगा। मैं अपने माता-पिता के विवाह की असफलताओं को नहीं दोहराऊँगा।

1995 में, मैं एक रेस्तराँ में स्थापना अभियांत्रिकी के लिए विभाग निर्देशक था। शुरुआत में मैं बस इतना ही सोच सकता था कि मुझे एक उद्यमी बनना है, धन कमाना है और एक ऐसी पत्नी को खोजना है जो बुद्धिमान और दयालु हो ताकि हम खुशी से एक साथ रह सकें, और मैं सोचता था कि इतना पर्याप्त होगा। लेकिन कुछ समय बाद, मेरा कार्य ऐसा था कि मैं अक्सर अन्य विभाग के नेताओं के साथ रेस्तराँ, फूट स्पा इन, कराओके पार्लर, होटल और मनोरंजन के अन्य स्थानों में जाया करता था। उस समय वे अक्सर ऐसी बातें करते थे, "जीवन केवल खाने और पहनने के बारे में है," या "एक पत्नी रखो और उप-पत्नियाँ भी", या "प्यार करना और खोना कभी भी प्यार न करने से बेहतर है", या "जीवन छोटा है, तुम अपनी युवावस्था का तब तक आनंद लो जब तक ले सकते हो", या "पुरुष ऐसे ही होते हैं। कौन खाना, पीना और मस्ती करना नहीं चाहता है?" या "हमारा देश तेज आर्थिक विकास को बढ़ावा दे रहा है और सभी प्रकार के मनोरंजन व्यवसायों को प्रेरित कर रहा है, इसलिए हमें उत्साहजनक प्रतिक्रिया करनी चाहिए। चीनी नागरिकों के रूप में, अगर हम नाइटलाइफ़ (रात्रि की मौज-मस्ती) में अपना हिस्सा पूरा नहीं करते, तो हम सरकार को नीचा दिखायेंगे!" उनका प्रभाव मुझ पर पड़ने लगा और समय के साथ, मैंने उनकी नाइटलाइफ़ की गतिविधियों में उनका अनुकरण करना शुरू कर दिया और मैं सोचना लगा कि यह मज़ेदार था।

2000 के उत्तरार्ध में मैंने विवाह कर लिया। बहुत शुरुआत में मेरी पत्नी और मेरे बीच एक गहरा भावनात्मक संबंध नहीं था, लेकिन हम एक साथ मिलकर रहने लगे और एक दूसरे को समझने लगे। बहरहाल, मेरे काम के सामाजिक कार्यक्रमों और उन जटिल व्यक्तिगत रिश्तों के कारण जो मुझे बनाए रखने पड़े, मैंने अभी भी पार्टियों में जाना पहले की तरह जारी रखा था। मैं एक सुखवादी जीवन जीता था और हर रात देर से नशे में बहकते हुए घर लौटता था। बाद में, मेरी पत्नी ने आखिरकार यह पता लगा ही लिया कि मेरा घर देर से आना इसलिए नहीं था कि मैं कड़ी मेहनत से काम कर रहा था, बल्कि यह इसलिए था कि मैं शराब पीकर मस्ती किया करता था; बस तब से वह मेरे साथ रूखी हो गई। हम दोनों अपना-अपना काम करते थे, एक दूसरे से कभी बात नहीं करते थे और कभी एक दूसरे के प्रति संवेदना या विचार नहीं दिखाते थे। हम एक दूसरे के प्रति अजनबी बन गए। जब मैंने देखा कि हमारा रिश्ता कितना ख़राब हो गया था, तो मुझे चिंता हुई कि मेरा विवाह टूट चुका था। मैं मुश्किल से सोता था। इस अवरोध से गुज़र जाने की उम्मीद में, मैंने अपनी पत्नी के साथ दिल से दिल की बात करने की कोशिश की। लेकिन इससे पहले कि मैं दो शब्द भी बोल पाता, वह पुरानी बातों का हिसाब लेकर उल्टे मुझ पर ही पड़ जाती, मुझे यह बताते हुए कि मैंने शराब पीकर मस्ती करने के अलावा और कुछ भी नहीं किया था, कभी पैसे घर नहीं लाया, वगैरह, और हम बहस शुरू कर देते और अंत में बुरी तरह दूर हो जाते थे। हर बहस के बाद दर्द और उदासी मुझे व्याकुल कर देती। अगर पति-पत्नी एक आम भाषा साझा नहीं करते हैं, तो परिवार में साथ रहना एक दुश्मन के साथ रहने जैसा होता है। तुम कुछ कहने का प्रयास करते हो लेकिन यह सिर्फ एक बहस को छेड़ देता है! उन दिनों से गुज़रना पीड़ाजनक था। इस तरह से इसे जारी रखने और पीड़ा को लम्बा करने की अपेक्षा तलाक लेना लगभग एक बेहतर विकल्प लग रहा था। फिर भी, मैं सभी के सामने हमारी बदनामी नहीं चाहता था, इसलिए मेरे अपने आत्म-सम्मान और मेरे बच्चों की खातिर—लेकिन अधिकतर एक ऐसे खुशहाल परिवार के सपने की खोज में जो मैं हमेशा चाहता था—मैं अपने बिगड़े विवाह में बना रहा। इसके अलावा, पहले तो मैं ही गलत था, इसलिए मुझे ही इसे ठीक करना होगा, है ना?

कुछ समय बाद, मैंने एक स्थापना कंपनी शुरू की और इस काम को सीखने के लिए मेरे साले को ले आया। मैंने सोचा: मैं एक अच्छे दर्जे और अच्छी आय का व्यक्ति हूँ। यह मेरी पत्नी के अभिमान को पूरा करने के लिए पर्याप्त होना चाहिए, साथ ही मैं उसके छोटे भाई को देख रहा हूँ; इससे हमारा सम्बन्ध ठीक हो जाना चाहिए। बहरहाल, हम अब भी अक्सर लड़ते थे, जिसकी मुझे उम्मीद नहीं थी। मेरी पत्नी ने मेरे कर्मचारियों के सामने भी मेरी कमियों का ज़िक्र किया और कहा कि मैंने अपने परिवार की अच्छी देखभाल नहीं की है...। मैं अब इस बहस को सहन नहीं कर सका, इसलिए मैं कुछ धन छोड़कर और एक और निर्माण स्थल के लिए बाहर जाने लगा था। जब मैंने अपनी पत्नी से मेरे छोड़कर जाने के बारे में बात की, तो उसने कोई अभिरुचि नहीं दिखाई, जिससे मुझे बहुत ख़राब महसूस हुआ। मैं इसे बिलकुल समझ नहीं सका। लोग हमेशा कहते हैं कि एक पति और पत्नी को बीती परेशानियों के बारे में खीजना नहीं चाहिए, लेकिन हमारे बीच इतनी भयानक शत्रुता क्यों थी? हर बार जब हम एक-दूसरे से मिलते थे तो हम एक दूसरे से रूखे क्यों होते थे या बहस क्यों करते थे? हमने एक-दूसरे के लिए चीज़ों को इतना दर्दनाक कैसे बना लिया था और हमारे घर को इस तरह की अव्यवस्था में कैसे डाल दिया? हम चार या पांच साल के लिए इसी तरह से रहे; क्या वास्तव में ऐसा कुछ भी नहीं था जो हम अपने रिश्ते को ठीक करने के लिए कर सकते थे? चूँकि पति-पत्नी के रूप में हमारे रिश्ते दिन-ब-दिन खराब होते गए और काम का दबाव भी बढ़ता गया, न मैं ठीक से खा सकता था न ही सो सकता था। मैं थक गया था और बर्बाद हो रहा था। नई झुर्रियों ने मेरे माथे पर गहरी रेखाएँ खींच दी थीं। कभी-कभी यह इतना बुरा हो जाता था कि मुझे लगता था कि जीवन में अब कोई उम्मीद नहीं बची थी और मैं मर कर इस दर्दनाक जीवन से भाग जाना चाहता था। लेकिन फिर मैं अपने दो प्यारे बच्चों के बारे में सोचने लगता, और मैं उनको नकार नहीं सका। और इस प्रकार, मैं एक ऐसी पीड़ा में रहता था जो अंतहीन लगती थी।

जब लोग अपनी हर कोशिश कर चुके होते हैं, तब परमेश्वर अपना कार्य शुरू करता है! मार्च 2008 में, मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंतिम दिनों के उद्धार का सानिध्य प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया में आने के बाद, मैं अक्सर परमेश्वर के वचन को पढ़ता था और मैंने कलीसिया के जीवन में सक्रिय होना शुरू कर दिया। मैंने भाइयों और बहनों को सच्चाई और उनके अनुभवों के बारे में सहभागिता करते सुना और इस प्रकार अनायास मैंने परिवार और विवाह के बारे में कुछ सच्चाइयों को समझा, और मानव जाति की नियति के बारे में एक नई समझ हासिल की। मेरे दिमाग पर चिंता और तनाव का भार बहुत कम हो गया था। मैंने एक ऐसी खुशी का अनुभव करना शुरू किया जिसे मैंने पहले कभी महसूस नहीं किया था और मेरा पूरा शरीर अधिक आराम और सहजता महसूस करने लगा था। एक समागम के दौरान मैंने खुलकर पिछले कुछ सालों के दर्द और भ्रम के बारे में सहभागिता की, और भाइयों और बहनों ने मुझे परमेश्वर के वचन के निम्नलिखित दो अंश पढ़ कर सुनाये: "एक ऐसी गन्दी जगह में जन्म लेकर, मनुष्य समाज के द्वारा गंभीर रूप से अभिशप्त किया जा चुका है, वह सामंती नैतिकता के द्वारा प्रभावित किया जा चुका है, और "उच्च शिक्षा के संस्थानों" पर सिखाया गया है। पिछड़ी सोच, भ्रष्ट नैतिकता, जीवन पर मतलबी दृष्टिकोण, तिरस्कार-योग्य दर्शनशास्त्र, पूर्ण रूप से बेकार अस्तित्व, और भ्रष्ट जीवन शैली और रिवाज—इन सभी चीजों ने मनुष्य के हृदय पर गंभीर रूप से घुसपैठ की है, और उसके सद्विवेक पर हमला किया और उसे गंभीर रूप से कम आंका है। फलस्वरूप, मनुष्य परमेश्वर से और अधिक दूर है, और परमेश्वर के और अधिक विरोध में रहा है। दिन प्रतिदिन मनुष्य का स्वभाव और अधिक शातिर बन रहा है, और कोई एक भी व्यक्ति नहीं है जो स्वेछा से परमेश्वर के लिए कुछ भी त्याग देगा, एक भी व्यक्ति नहीं जो स्वेछा से परमेश्वर की आज्ञा का पालन करेगा, न ही, इसके अलावा, एक भी व्यक्ति स्वेछा से परमेश्वर के रूप को खोजेगा। इसके बजाये, शैतान की प्रभुता के आधीन, मनुष्य कुछ नहीं करता परन्तु आनंद का पीछा करता है, कीचड़ की जगह में अपने आप को देह के भ्रष्टाचार के लिए दे देता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता होना है")।

"एक के बाद एक, ये सभी प्रवृत्तियाँ एक दुष्ट प्रभाव को लेकर चलती हैं जो निरन्तर मनुष्य को पतित करती रहती हैं, जो उनकी नैतिकता एवं उनके चरित्र की गुणवत्ता को और भी अधिक नीचे ले जाती हैं, उस हद तक कि हम यहाँ तक कह सकते हैं कि अब अधिकांश लोगों के पास कोई ईमानदारी नहीं है, कोई मानवता नहीं है, न ही उनके पास कोई विवेक है, और कोई तर्क तो बिलकुल भी नहीं है। ...क्योंकि मनुष्य जो एक स्वस्थ्य शरीर एवं मन का नहीं है, जो कभी नहीं जानता है कि सत्य क्या है, जो सकारात्मक एवं नकारात्मक चीज़ों के बीच अन्तर नहीं बता सकता है, इन किस्मों की प्रवृत्तियाँ एक के बाद एक उन सभों को स्वेच्छा से इन प्रवृत्तियों, जीवन के दृष्टिकोण, जीवन के दर्शन ज्ञान एवं मूल्यों को स्वीकार करने के लिए प्रेरित करती हैं जो शैतान से आती हैं। जो कुछ शैतान उनसे कहता है वे उसे स्वीकार करते हैं कि किस प्रकार जीवन तक पहुँचना है और जीवन जीने के उस तरीके को स्वीकार करते हैं जो शैतान उन्हें "प्रदान" करता है। उनके सभी वह सामर्थ्य नहीं है, न ही उनके पास वह योग्यता है, प्रतिरोध करने की जागरूकता तो बिलकुल भी नहीं है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "स्वयं परमेश्वर, अद्वितीय VI")।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर का वचन मानवजाति की भ्रष्टता और दुराचार के स्रोत को उजागर करता है, और मुझे यह पता चला कि शैतान की भ्रष्टता ही मेरी सारी पीड़ा का स्रोत थी। मैं शैतान के अधिकार क्षेत्र के अधीन था और मैं बुरी सामाजिक प्रवृत्तियों से प्रभावित था। मैं दुष्ट शैतानी सोच के तहत जी रहा था जैसे कि: "जीवन छोटा है। इसका आनंद लो", "अपने दिन को आनंद के लिए ज़ब्त कर लो, क्योंकि जीवन छोटा है", और "एक पत्नी रखो और उप-पत्नियाँ भी"। मैं लम्पटता के जीवन में लिप्त हुआ था और उत्तरोत्तर अधिक बुरा और दुराचारी होता गया, उस सीमा तक जहाँ मैं अब एक वास्तविक इंसान भी नहीं लगता था। यह जीवनशैली मेरी पत्नी और मेरे बीच एक अंतहीन संघर्ष ले आई जिससे कि हम एक-दूसरे से अलग होते गए। अंत में, मेरा पारिवारिक जीवन टूट कर बिखर जाने के कगार पर था और मैं शारीरिक और मानसिक रूप से थक चुका था। मैं वर्णनातीत पीड़ा में रहा था और मेरे विचार भी आत्महत्या की ओर बहक गए थे। लेकिन अब, मैं स्पष्ट रूप से देख रहा हूँ। शैतान इन तरीकों का उपयोग सिर्फ मुझे फँसाने और भ्रष्ट करने, मेरे विवाह और परिवार को नष्ट करने, और मुझे बुराई और दुख का जीवन जीने की ओर धकेलने के लिए कर रहा था। शैतान का दुष्ट लक्ष्य मुझे निगल जाना था; शैतान वास्तव में विश्वासघात और दुर्भावना से भरा हुआ है!

एक बार जब मैंने शैतान की चालों को परख लिया, तो मैंने उन दुष्ट और शैतानी विचारों को पूरी तरह त्यागने और परमेश्वर के वचन से खुद को संचालित करने का संकल्प किया। मैं जितनी जल्दी हो सके सुसमाचार को अपनी पत्नी तक भी लाना चाहता था ताकि वह भी परमेश्वर के उद्धार को प्राप्त कर सके।

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