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हृदय की मुक्ति

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झेंगशिन, अमेरिका

अक्टूबर 2016 में, जब हम लोग विदेश में थे, तो मेरे पति और मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा उद्धार को स्वीकार किया था। उसके बाद, भाई-बहनों के साथ परमेश्वर के वचनों को पढ़ने, अपने अनुभवों को साझा करने, और परमेश्वर की स्तुति में भजन गाने के लिये, मैं अक्सर सभाओं में शामिल होने लगी। मुझे लगा कि कलीसिया का इस तरह का जीवन आनंद से भरा हुआ है। मुझे वाकई इसमें आनंद आने लगा।

कुछ महीने तो देखते-देखते ही निकल गए। सभी भाई-बहनों का जीवन अलग-अलग स्तर तक विकसित हो गया था। विशेष रूप से बहन वांग का जीवन सबसे तेज़ी से विकसित हुआ, जबकि उसे परमेश्वर में आस्था रखे हुए सबसे कम समय हुआ था। चाहे प्रार्थना की बात हो, या परमेश्वर के वचनों के अनुभव और समझ को साझा करने की बात हो, वह ज़्यादा व्यवहारिक थी, और उसके अंदर प्रकाश भी हम सब से अधिक था। उसकी सहभागिता भी स्पष्ट और विधिवत थी। सभी भाई-बहनों ने कहा कि उसकी कार्यक्षमता अच्छी है, वह तेज़ी से आगे बढ़ रही है। शुरू में तो मैं उसे बहुत पसंद करती थी, मैं अक्सर सभा के बाद भाई-बहनों से कहती थी: "बहन वांग की सहभागिता न केवल स्पष्ट और विधिवत है, बल्कि उसके अंदर समझ भी अच्छी है। अगर उसे कोई समस्या पेश आती है, तो वह आमतौर पर परमेश्वर की इच्छा को खोज पाती है।" लेकिन कुछ दिनों के बाद, मैं चिड़चिड़ाने लगी। मैं सोचती: "सब लोग मेरी प्रशंसा न करके, उसकी प्रशंसा क्यों करते हैं? मैं बिल्कुल भी आगे नहीं पढ़ पाई, क्या यही वजह है? क्या मेरी सहभागिता में कुछ गड़बड़ है?" धीरे-धीरे मेरे अंदर बहन वांग के प्रति एक असंतुष्टि का भाव आने लगा, और मैं मन ही मन में उसकी विरोधी होती चली गई। मैं सोचती: "अगर परमेश्वर के वचनों पर तुम सहभागिता कर सकती हो, तो मैं भी कर सकती हूँ। एक दिन आएगा, जब मैं तुमसे आगे निकल जाऊँगी।" यहाँ तक कि मैं षडयंत्र भी रचने लगी: "मुझे परमेश्वर के वचनों से आमतौर पर जो समझ और रोशनी हासिल होती है, वह मुझे बचाकर रखनी चाहिये और केवल सभा में ही सबके साथ साझा करनी चाहिये। तब सब लोगों को पता चल जाएगा कि मैं भी परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर सकती हूँ, और जिस समझ को मैं साझा कर रही हूँ, वह भी बहुत व्यवहारिक है।" उसके बाद से, मुझे जब भी मौका मिलता, मैं परमेश्वर के वचनों को पढ़ती, और उनसे जो कुछ हासिल होता, जो कुछ मुझे समझ में आता, उसे मैं एक कॉपी में लिख लेती। फिर जब कभी सभा होती, तो मैं उन प्रबोधनों को मन ही मन दोहरा लेती ताकि जब मैं सहभागिता में उन्हें साझा करूँ, तो वे बहन वांग जितने ही स्पष्ट, व्यवस्थित और विधिवत हों। पता नहीं क्यों, मैं भाई-बहनों के सामने दिखावा करने की मेरी इच्छा जितना बढ़ती जाती मैं उतनी ही मूर्ख साबित होती। सहभागिता का समय शुरू होते ही मेरा दिमाग उलझ-सा जाता था। मेरे सारे शब्द गड्डमड्ड हो जाते। मैं जो दृष्टिकोण पेश करना चाहती थी, वह नहीं कर पाती थी। मेरे लिये हर सभा एक शर्मिंदगी बन जाती। उन दिनों मैं दुखी रहती थी, मेरा दिमाग एक भँवर बना रहता था। मैं अपने आपको बहन के उतना करीब महसूस नहीं करती थी, जितना पहले किया करती थी। धीरे-धीरे मुझे महसूस होने लगा कि सभाएँ एक तरह से मेरे लिये तनाव का कारण बनती जा रही हैं। मेरा दिल बंधन-मुक्त नहीं हो पाता था।

फिर एक दिन, बातचीत के दौरान, मैंने अपने पति को सारी बातें बता दीं: "मैंने सभाओं में कुछ दिनों से महसूस किया है कि बहन वांग की सहभागिता मेरी सहभागिता से ज़्यादा अच्छी है। मुझे वाकई बहुत बेचैनी महसूस होती है...।" इससे पहले कि मैं अपनी बात ख़त्म करती, मेरे पति की आँखें फैल गई, और वे बड़ी गंभीरता से बोले, "बहन वांग की सहभागिता तो बहुत अच्छी होती है, बड़ी शिक्षाप्रद होती है। हमें इसके लिये परमेश्वर को धन्यवाद देना चाहिये। तुम्हारी बेचैनी क्या महज़ ईर्ष्या नहीं है?" उनके शब्द मुझे तमाचे की तरह लगे। मैंने गर्दन हिलाकर उनकी बात को नकार दिया: "नहीं, बात यह नहीं है। मैं ऐसी नहीं हूँ।" फिर वे बोले: "हमारे भा‌ई—बहनों ने बहन वांग की सहभागिता से काफ़ी-कुछ अर्जित किया है। अगर तुम्हें उसकी सहभागिता सुनकर बेचैनी होती है, तो क्या तुम्हें इस बात की जलन नहीं हो रही कि वह तुमसे ज़्यादा काबिल है?" मेरे पति के शब्द एक बार फिर मेरे दिल में चुभ गए। मैं बहुत उखड़ गई। क्या मैं वाकई इतनी ख़राब हूँ? मुझे लगा मेरे साथ अन्याय हो रहा है, जैसे अभी आँसुओं का सैलाब फूट पड़ेगा। मैं बोली: "बस, अब कुछ और मत कहिए। मुझे थोड़ा चैन लेने दीजिये। मैं ख़ुद इस पर विचार करूँगी!" उसके बाद, आश्चर्यजनक रूप से, मेरे पति ने कलीसिया की अगुवा, बहन ल्यू को, वो सब बता दिया जो मेरे साथ हो रहा था। वे चाहते थे कि बहन ल्यू मेरी मदद करे। मुझसे पूछे बिना ये सब बोलने पर, मैंने उन्हें झाड़ लगाई। मुझे लगा, "अब मैं भा‌ई-बहनों को क्या मुँह दिखाऊँगी? अगर उन्हें पता चल गया कि मैं बहन वांग से जलती हूँ, तो क्या मैं उनकी नज़रों में गिर नहीं जाऊँगी?" मैं इस पर जितना सोचती, उतनी ही परेशान होती जाती। लेकिन सच्चाई से मुँह फेरने से तो कुछ होने वाला नहीं था। मैंने प्रार्थना की: "हे परमेश्वर! अब मैं क्या करूँ?"

अगले दिन, मैंने उन तमाम चीज़ों पर विचार किया जो कुछ मैंने उस समय के दौरान प्रकट किया था। आमतौर भाई-बहन पर परमेश्वर से प्राप्त होने वाली प्रबुद्धता और समझ को किसी भी समय एक-दूसरे के साथ साझा करते थे, लेकिन जो रोशनी मैं हासिल करती थी, सभाओं में उसका दिखावा करने के लिये बचाकर रख लेती थी। मैं उन बातों की चर्चा करना चाहती थी जिन्हें बाकी लोग नहीं जानते थे ताकि भाई-बहनों की नज़रों में मेरा सम्मान बढ़े। जब मैंने देखा कि दूसरे भाई-बहन मुझसे ज़्यादा अच्छी सहभागिता करते हैं, तो मैं बेचैन हो जाती और उन्हें पीछे छोड़ने के लिये लालायित रहती। मुझे लगता था कि मैं सबके साथ बड़ा सहज अच्छा मेल-जोल रखती हूँ, कभी छोटी-छोटी बातों का बतंगड़ नहीं बनाती, मैं दिल से एक अच्छी और सीधी इंसान हूँ। लेकिन मैं ऐसा सोचन भी नहीं चाहती थी कि मैं किसी से ईर्ष्या भी कर सकती हूँ, किसी से स्पर्धा करने के लिये उसके ख़िलाफ़ भी जा सकती हूँ। मैं ऐसी इंसान कैसे हो सकती हूँ? करीब दोपहर को, मैंने एक बहन को फ़ोन करके पूछा कि क्या कभी किसी सभा के दौरान किसी भाई-बहन की सहभागिता सुनकर, उसे इस बात को लेकर ईर्ष्या हुई है कि वह उससे अच्छी सहभागिता करती है? उसने कहा नहीं, उसे कभी ऐसा नहीं लगता। उसने यह भी कहा: "अगर हमारे भाई-बहन अच्छी सहभागिता करते हैं, तो इससे हमें बहुत शिक्षा और लाभ मिलते हैं। मुझे तो बड़ा आनंद आता है, बहुत ख़ुशी होती है!" यह बात सुनकर मैं और भी बेचैन हो गई। तब जाकर मुझे एहसास हुआ कि मेरे अंदर तो भयंकर ईर्ष्या घर कर गई है। मैंने रो-रोकर परमेश्वर से प्रार्थना की: "हे परमेश्वर! मैं ईर्ष्यालु इंसान नहीं बनना चाहती, लेकिन मैं जब भी उस बहन की सहभागिता सुनती हूँ, तो मैं खुद को उससे ईर्ष्या करने से रोक नहीं पाती हूँ। सारा दिन मैं इसी परेशानी से जूझती रहती हूँ, इसी से बंधी रहती हूँ। मुझे समझ में नहीं आ रहा कि मैं क्या करूँ। हे परमेश्वर! आप मेरे दिल को ईर्ष्या के बंधन से छुटकारा दीजिये...।" बाद में, कलीसिया की अगुवा बहन ल्यू मेरे पास आई। उसने मुझे परमेश्वर के वचनों से कुछ अंश पढ़कर सुनाए जो मेरी दशा से संबंधित थे। "क्रूर, निर्दयी मानवजाति! साँठ-गाँठ और साज़िश, आपस में धक्का-मुक्की, सम्मान और संपत्ति के लिए छीना-झपटी, एक-दूसरे का कत्ल करना—आखिर ये सब कब समाप्त होगा? परमेश्वर ने लाखों वचन कहे हैं, तब भी किसी को अभी तक अक़्ल नहीं आई है। ...ऐसे कितने हैं जो अपनी हैसियत बनाए रखने के लिए दूसरों का दमन नहीं करते हैं और दूसरों के साथ भेदभाव नहीं करते हैं?" (वचन देह में प्रकट होता है)। "कुछ लोग हमेशा इस बात डरे रहते हैं कि दूसरे लोग उनकी प्रसिद्धि को चुरा लेंगे और उनसे आगे निकल जाएंगे, अपनी पहचान बना लेंगे जबकि उनको अनदेखा कर दिया जाएगा। इसी वजह से वे दूसरों पर हमला करते हैं और उन्हें अलग कर देते हैं। क्या यह अपने से ज़्यादा सक्षम लोगों से ईर्ष्या करने का मामला नहीं है? क्या ऐसा व्यवहार स्वार्थी और घिनौना नहीं है? यह किस तरह का स्वभाव है? यह दुर्भावनापूर्ण है! सिर्फ़ खुद के बारे में सोचना, सिर्फ़ अपनी इच्छाओं को संतुष्ट करना, दूसरों के कर्तव्यों पर कोई ध्यान नहीं देना, और सिर्फ़ अपने हितों के बारे में सोचना और परमेश्वर के घर के हितों के बारे में नहीं सोचना—इस तरह के लोग बुरे स्वभाव वाले होते हैं, और परमेश्वर के पास उनके लिये कोई प्रेम नहीं है" ("मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "तू अपने सच्चे हृदय को परमेश्वर की ओर मोड़ने के बाद सच्चाई को प्राप्त कर सकता है")। उसने जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति से भी एक अंश पढ़कर सुनाया: "तो क्या जितने भी ईर्ष्यालु लोग हैं, वे संकीर्ण मानसिकता वाले होते हैं? ... क्या संकीर्ण मानसिकता रखने और ईर्ष्यालु होने के कोई लाभ हैं? इसका एक भी लाभ नहीं है। ऐसे लोग तुच्छ, संकीर्ण मानसिकता के, और दुष्ट होते हैं। ऐसे लोगों का मज़ाक उड़ाया जाता है। ऐसे लोग जीने लायक नहीं होते। संकीर्ण मानसिकता का होना अच्छी बात नहीं है, यह तय है। कुछ लोग कहते हैं: 'कभी-कभी इस पर हमारा काबू नहीं होता। जैसे ही हमें कोई अपने से बेहतर दिखता है, हमारे अंदर ईर्ष्या और क्रोध पैदा हो जाते हैं। ऐसे व्यक्ति को देखकर, लगने लगता है कि अब जीना बहुत दुश्वार है। अगर ऐसा हो तो मैं क्या करूँ?' क्या तुम परमेश्वर से प्रार्थना नहीं कर सकते, ख़ुद को धिक्कार नहीं सकते? तुम्हें प्रार्थना कैसे करनी चाहिये? तुम कहते हो: 'मैं बर्दाश्त नहीं कर सकती/सकता कि कोई मुझसे बेहतर हो। मैं किस किस्म की/का इंसान हूँ? मेरे जैसे इंसान को जीने का हक नहीं है। अपने से बेहतर इंसान को देखते ही मुझे उससे ईर्ष्या होने लगती है। यह किस तरह का हृदय है? यह कोई सामान्य मानवता नहीं है। काश कि परमेश्वर मुझे अनुशासित करे, मेरी काट-छाँट करे।' उसके बाद, यह प्रार्थना करो: 'हे परमेश्वर, मुझे मेरी संकीर्ण मानसिकता से बचाइये, मेरी आत्मा को उदार बनाइये, मुझे विशाल मन का बनाइये, मुझे ऐसा बनाइये कि मैं इंसानों के समान जी सकूँ ताकि आप मेरे कारण शर्मिंदा न हों।' तुम्हें इस तरह से प्रार्थना करनी चाहिये। कुछ समय तक इस तरह से प्रार्थना करने से, शायद तुम्हें पता चले इससे पहले ही तुम्हारी आत्मा थोड़ी और उदार बन जाएगी। अगली बार जब तुम किसी ऐसे व्यक्ति से मिलोगे जो तुम से ज़्यादा काबिल है, तो तुम्हारे अंदर उतनी ईर्ष्या पैदा नहीं होगी। तुम उस चीज़ को स्वीकार कर लोगे और उस व्यक्ति के साथ सहजता से बातचीत कर पाओगे। वक्त से साथ, सब-कुछ ठीक होता चला जाएगा। जैसे ही तुम्हारी मानवता सामान्य होगी, तुम ख़ुश, उन्मुक्त, और सहजता से रहने लगोगे। एक संकीर्ण मानसिकता वाला व्यक्ति अजीब तरीके से, दुख में और शक्तिहीन होकर जीता है" (जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति)। यह सहभागिता सुनकर तो मैं दंग रह गई। मेरी स्थिति बिल्कुल यही तो थी! बहन वांग की सहभागिता प्रबुद्ध करने वाली थी, लेकिन मुझे इससे अभ्यास का मार्ग नहीं मिला। बल्कि, अपने मिथ्याभिमान की रक्षा की ख़ातिर, मैं बहन वांग के साथ स्पर्धा की अवस्था में ही जीती रही। मैं गुपचुप उसके विरोध में खड़ी हो गई, और दिमाग लड़ाती रही कि उससे बेहतर सहभागिता कैसे साझा करूँ। मैं दिल से इस बात की भी आस लगाए रहती कि कोई उसके बारे में कुछ अच्छा न बोले, या उसकी तारीफ़ न करे। जब मेरी सहभागिता अच्छी नहीं रहती, जब मैं दिखावा नहीं कर पाती और ख़ुद को अपमानित कर बैठती, तो मेरा दिमाग घूम जाता, मैं दुखी और परेशान रहती। मैं दिनभर बेचैन और चिंतित रहती, इस बात से डरी रहती कि दूसरे लोग मुझे नीची नज़रों से देखेंगे। मेरी सोच बहुत ही संकीर्ण हो गई थी। मैं बस एक ही बात सोचती रहती कि मैं दूसरों से अलग दिखाई दूँ, लेकिन मैं यह बर्दाश्त नहीं कर पाती थी कि कोई मुझसे बेहतर हो। क्या यह उन लोगों के प्रति ईर्ष्या और जलन नहीं है जो अच्छा कर रहे हैं? इसमें कहीं भी सामान्य मानवता नहीं है! मैं यह सोचती हूँ, कि परमेश्वर में आस्था रखने से पहले, मैं भी ऐसी ही थी। दोस्तों, संबंधियों, पड़ोसियों, और सहकर्मियों से बातचीत करते वक्त यही सोचती रहती थी कि वे लोग मेरे बारे में अच्छा बोलें। अगर कभी कोई सहकर्मी, मेरे सामने किसी और की प्रशंसा करता, तो मैं बेचैन हो जाती, मैं अपने काम को अच्छे ढंग से करने के लिये जी-जान लगा देती, फिर चाहे वह काम कितना ही मुश्किल या थका देने वाला क्यों न हो। अब जाकर मुझे एहसास हुआ कि उस तरह की हरकतें शैतानी भ्रष्ट स्वभाव का प्रदर्शन थीं। एक बार जब मुझे इस बात का एहसास हो गया, तो बहन ल्यू ने फिर से इसे सहभागिता के अंश से जोड़ दिया और मुझे अभ्यास के लिये एक मार्ग बताया। वह था परमेश्वर के सामने आकर प्रार्थना करना, अपनी परेशानियाँ और स्वयं द्वारा प्रकट की गयी भ्रष्टता परमेश्वर को बताना, ताकि वह एक ऐसा इंसान बनने में मेरी मदद कर सके जिसकी आत्मा उदार हो। उसके बाद, मैं अक्सर परमेश्वर के सामने जाती, और अपनी परेशानियों के लिये प्रार्थना करती। मैं जागरुक होकर परमेश्वर के वचनों को पढ़ने लगी, जिनमें परमेश्वर ने इंसान के भ्रष्ट स्वभाव का न्याय करने और उजागर करने की बात कही है। परमेश्वर के वचनों से प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त होने के बाद, मैं उसे किसी भी समय भाई-बहनों से साझा करती। जो कुछ उन लोगों ने हासिल किया और समझा होता, वे भी उस बारे में बात करते। मैं कभी सोच भी नहीं सकती थी, मगर इस तरह के अभ्यास से मुझे उससे भी ज़्यादा की प्राप्ति हुई जो मैं अपने स्तर पर परमेश्वर के वचनों को पढ़कर हासिल कर पाती। सभाओं में, मुझे जितना समझ आया था, उन के आधार पर मैं सहभागिता साझा करती। मैं अपने हृदय को शांत करने और दूसरों की सहभागिता को सुनने पर ध्यान देती। इसी तरह के अभ्यास से, जब भाई-बहन अपने अनुभवों और परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने वाली गवाहियों की बातें करते, मुझे भी बहुत शिक्षा मिलती। कुछ समय तक इस तरह के अभ्यास से, मेरी ईर्ष्या पहले से थोड़ी कम हो गई, लेकिन जब भी मैं किसी सभा में भाई-बहनों को बहन वांग की सहभागिता की तारीफ़ करते देखती, तो मेरे अंदर फिर से थोड़ी-बहुत ईर्ष्या सिर उठाने लगती। मैं हमेशा अपने और उसके बीच एक दूरी महसूस करती, और मैं उसके साथ सामान्य तरीके से बातचीत नहीं कर पाती थी। उस दशा मे रहते हुए, मैं भाई-बहनों के साथ खुलकर बातचीत करने की हिम्मत नहीं कर पाती थी। मुझे डर लगा रहता कि अगर मैंने ऐसा किया, तो मुझे नीची नज़रों से देखेंगे। इसलिये, बहुत सारी सभाओं के दौरान, मैं अपने दिल में हल्कापन महसूस नहीं कर पाई। मैं अपनी परेशानियों को लेकर परमेश्वर से सिर्फ़ प्रार्थना ही कर सकती थी: "हे परमेश्वर! आज मैं फिर से बुरी स्थिति में हूँ। मेरा मार्गदर्शन कीजिये...।"

एक शाम, बहन ल्यू ने मुझे फ़ोन किया। उसने चिंतित होकर मुझसे पूछा कि क्या हाल के दिनों में मैं किसी परेशानी का सामना कर रही हूँ। मैंने अस्पष्ट-सा उत्तर दिया: "मेरे अंदर भयंकर भ्रष्टता है। कहीं ऐसा तो नहीं कि परमेश्वर मेरे जैसे लोगों को नहीं बचाता?" मुझे लगा कि मैं उसकी नज़र में गिर जाऊँगी, इसलिए मैंने आगे कुछ नहीं कहा। बहन ल्यू ने मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़कर सुनाया: "कुछ लोग कहते हैं: 'ईमानदार होना कठिन है। क्या मुझे अपने हृदय की हर बात दूसरों को बतानी होगी? क्या सकारात्मक चीज़ों की संगति करना पर्याप्त नहीं है? मुझे अपने अंधकारमय या भ्रष्ट पक्ष के बारे में दूसरों को बताने की ज़रूरत नहीं है, है ना?' यदि तू इन चीज़ों को नहीं बोलता है, और अपना विश्लेषण नहीं करता है, तो तू स्वयं को कभी नहीं जान पाएगा, कभी नहीं जान पाएगा कि तू किस तरह की चीज़ है, और दूसरों के पास तुझ पर भरोसा करने का कोई अवसर नहीं होगा। यह तथ्य है। यदि आप चाहते हैं कि दूसरे आप पर विश्वास करें, तो पहले आपको ईमानदार बनना होगा। ईमानदार होने के लिए ज़रूरी है कि आप अपना दिल खोलकर रख दें, ताकि हर कोई उसे देख सके, आपके विचारों को समझ सके, और आपका असली चेहरा देख सके; आप बहाने बनाने या खुद को छिपाने का प्रयास न करें। लोग तभी आप पर विश्वास करेंगे और आपको ईमानदार मानेंगे। यह ईमानदार होने का सबसे मूल अभ्यास और ईमानदार होने की शर्त है" ("मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "एक ईमानदार व्यक्ति होने का सबसे बुनियादी अभ्यास")। परमेश्वर के उन वचनों को पढ़कर, उसने सहभागिता की: "खुलकर अपनी बात कहना और सहभागिता साझा करना अपने दिल को मुक्त करने का एक तरीका है। अगर हम परेशानियों को अपने दिल में ही छिपाए रहेंगे, तो बड़ी आसानी से शैतान के हाथों का खिलौना बन जाएँगे, और हमें जीवन में हानि उठानी पड़ेगी। खुलना और बात को रोशनी में लाना सत्य का अभ्यास करना है, एक ईमानदार इंसान बनना है। तब हम अपने भाई-बहनों से भी मदद हासिल कर सकते हैं। इससे हमारी मुश्किलें ज़्यादा तेज़ी से सुलझती हैं। हमारे जीवन में विकास होगा और हम दिल में हल्कापन महसूस करेंगे। क्या यह अच्छी बात नहीं है?" बहन ल्यू की सहभागिता सुनकर, मैंने साहस बटोरा और उससे अपना सारा दर्द कह दिया। मैं सोच भी नहीं सकती थी कि वह मेरी बात सुनकर, बजाय इसके कि वह मुझे छोटेपन का एहसास कराए, या मुझे नीची नज़रों से देखे, उसने तसल्ली से मुझे अपना अनुभव बताया। उसने बताया कि कैसे वह बहुत ही ईर्ष्यालु इंसान हुआ करती थी, और कैसे वह उससे बाहर निकली। मुझे उसकी सहभागिता सुनकर बहुत आश्चर्य हुआ। मैंने सोचा: "अच्छा, तो आपको भी इस तरह की भ्रष्टता का सामना करना पड़ा!" बहन ल्यू ने मेरी दशा से संबंधित परमेश्वर के वचनों का एक और अंश पढ़कर सुनाया: "परमेश्वर जिन लोगों को बचाता है वे वही लोग हैं जिनके स्वभाव शैतान की भ्रष्टता के कारण भ्रष्ट हो गये हैं; वे निष्कलंक, पूर्ण लोग नहीं हैं, वे ऐसे लोग भी नहीं हैं जो रिक्तता में जीवन जीते हैं। कुछ लोग, अपनी भ्रष्टता के प्रकट होते ही सोचते हैं, 'एक बार फिर, मैंने परमेश्वर का विरोध किया है; मैंने कई सालों से उस पर विश्वास किया है, लेकिन मैं अब भी नहीं बदला हूँ। परमेश्वर निश्चित रूप से अब मुझे पसंद नहीं करता है!' यह रवैया कैसा है? उन लोगों ने खुद से उम्मीद छोड़ दी है, और वे सोचते हैं कि अब परमेश्वर उन्हें नहीं चाहता है। क्या यह परमेश्वर को गलत समझने वाली बात नहीं है? इतना नकारात्मक होने से शैतान के लिये तुम्हें नुकसान पहुंचाना बहुत आसान हो जाता है, और एक बार वह कामयाब हो गया, तो परिणामों की कल्पना नहीं की जा सकती। इसलिए, चाहे तुम कितनी ही बड़ी मुश्किल में क्यों न हो या चाहे तुम कितना भी निराश क्यों न महसूस करते हो, तुम्हें कभी हिम्मत नहीं हारनी चाहिये! जीवन में प्रगति की प्रक्रिया में और बचाये जाते समय, लोग कभी-कभी गलत मार्ग चुन लेते हैं या पथभ्रष्ट हो जाते हैं। वे कुछ समय के लिए अपने जीवन में कुछ अपरिपक्वता दिखाते हैं, या कभी-कभी कमज़ोर या नकारात्मक हो जाते हैं, गलत बातें कहते हैं, फिसल जाते हैं और गिरते हैं, या असफलता का सामना करते हैं। परमेश्वर के दृष्टिकोण से, ऐसी बातें सामान्य हैं, और वह इन बातों का बतंगड़ नहीं बनाएगा" ("मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "परमेश्‍वर में विश्‍वास के लिए जीवन में प्रवेश सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण है")। फिर, उसने सहभागिता साझा की: "हम सभी लोग शैतान के हाथों बुरी तरह से भ्रष्ट हो चुके हैं। अहंकार, कपट, स्वार्थ, और दूसरों से ईर्ष्या रखना—ये सारे भ्रष्ट स्वभाव इंसान में गहराई तक समाये हुए हैं। मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है। परमेश्वर न्याय और ताड़ना का कार्य करने के लिये आया है ताकि वह हमें रूपांतरित और शुद्ध कर सके। हमें अपने साथ सही ढंग से पेश आना चाहिये। हमें किसी तरह की नकारात्मकता और गलतफहमियों में नहीं जीना चाहिये। अगर हम अच्छे इरादों के साथ सत्य का अनुसरण करें, परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना के कार्य को स्वीकार करें, परमेश्वर के वचनों के अनुसार अपने भ्रष्ट सार पर आत्म-मंथन करें और उसे समझें, देह से मुँह मोड़कर सत्य पर अमल करें, तो एक दिन ऐसा आएगा जब हमारा जीवन स्वभाव रूपांतरित हो जाएगा, और हम एक सच्चे इंसान की तरह जीवन जी पाएँगे।" बहन ल्यू की सहभागिता सुनकर मेरा दिल एकदम हल्का हो गया, और मुझे परमेश्वर की इच्छा भी समझ में आ गई। मुझे न केवल सही ढंग से अपनी भ्रष्टता का सामना करना चाहिये, अपने आपको जानने और अपने भ्रष्ट स्वभाव को सुधारने के लिये सत्य को खोजने पर ध्यान देना चाहिये, बल्कि ईमानदार इंसान की तरह व्यवहार भी करना चाहिये, और इतनी समयावधि में मेरी जो भ्रष्टता उजागर हुई है, उसके बारे में भाई-बहनों से खुलकर बातचीत करनी चाहिये। ऐसा करने से शैतान को अपना दुष्कार्य करने का कोई अवसर नहीं मिल पाएगा, बल्कि सत्य पर अमल करने से, शैतान को शर्मिंदगी उठानी पड़ेगी। अगले दिन, बहन ल्यू फिर मेरे घर आई। हमने परमेश्वर के वचनों के अंश को मिलकर पढ़ा: "... जैसे ही पद, प्रतिष्ठा या रुतबे की बात आती है, हर किसी का दिल प्रत्याशा में उछलने लगता है, तुममें से हर कोई हमेशा दूसरों से अलग दिखना, मशहूर होना, और अपनी पहचान बनाना चाहता है। हर कोई झुकने को अनिच्छुक रहता है, इसके बजाय हमेशा विरोध करना चाहता है—इसके बावजूद कि विरोध करना शर्मनाक है और परमेश्वर के घर में इसकी अनुमति नहीं है। हालांकि, वाद-विवाद के बिना, तुम अब भी संतुष्ट नहीं होते हो। जब तुम किसी को दूसरों से विशिष्ट देखते हो, तो तुम्हें ईर्ष्या और नफ़रत महसूस होती है, तुम्हें लगता है कि यह अनुचित है। 'मैं दूसरों से विशिष्ट क्यों नहीं हो सकता? हमेशा वही व्यक्ति दूसरों से अलग क्यों दिखता है, और मेरी बारी कभी क्यों नहीं आती है?' फिर तुम्हें कुछ नाराज़गी महसूस होती है। तुम इसे दबाने की कोशिश करते हो, लेकिन तुम ऐसा नहीं कर पाते, इसलिये तुम प्रार्थना करते हो। अपनी प्रार्थना पूरी करने के बाद, तुम कुछ समय के लिए बेहतर महसूस करते हो, लेकिन बाद में, जब एक बार फिर तुम्हारा सामना इसी मामले से होता है, तो तुम इससे जीत नहीं पाते हो। क्या यह एक अपरिपक्व कद का मामला नहीं है? क्या किसी व्यक्ति का इस तरह की स्थिति में गिर जाना एक फंदा नहीं है? ये शैतान की भ्रष्ट प्रकृति के बंधन हैं जो इंसानों को बाँध देते हैं। ...तुम्हें इन चीज़ों को छोड़ देने और अलग कर देने का तरीका सीखना चाहिये। तुम्हें झुकना, दूसरों की अनुशंसा करना, और उन्हें दूसरों से विशिष्ट बनने देना सीखना चाहिए। क्रोधावेश में संघर्ष मत करो या जैसे ही दूसरों से अलग बनने या कीर्ति हासिल करने का अवसर मिले, तुम ज़ल्दबाजी में उसका फ़ायदा उठाने के लिये मत दौड़ पड़ो। तुम्हें पीछे रहने का कौशल सीखना चाहिये, लेकिन तुम्हें अपने कर्तव्य के निर्वहन में देरी नहीं करनी चाहिए। ऐसा व्यक्ति बनो जो शांत गुमनामी में काम करता है, और जो अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए दूसरों के सामने दिखावा नहीं करता है। तुम जितना अधिक चीज़ों को छोड़ते और अलग रखते हो, तुम उतने ही शांतचित्त बनोगे, तुम्हारे हृदय में उतनी ही ज़्यादा जगह खुलेगी और तुम्हारी अवस्था में उतना ही अधिक सुधार होगा। तुम जितना अधिक संघर्ष और प्रतिस्पर्धा करोगे, तुम्हारी अवस्था उतनी ही अंधेरी होती जाएगी। अगर तुम्हें इस बात पर विश्वास नहीं है, तो इसे आज़माकर देखो! अगर तुम इस तरह की स्थिति को बदलना चाहते हो, और इन चीज़ों से नियंत्रित नहीं होना चाहते हो, तो तुम्हें पहले इन चीज़ों को अलग करना होगा और इन्हें छोड़ना होगा। अन्यथा, तुम जितना अधिक संघर्ष करोगे, उतना ही अंधेरा तुम्हारे आस-पास छा जाएगा, तुम उतनी ही अधिक ईर्ष्या और नफ़रत महसूस करोगे, और कुछ पाने की तुम्हारी इच्छा अधिक मजबूत ही होगी। कुछ पाने की तुम्हारी इच्छा जितनी अधिक मजबूत होगी, तुम ऐसा कर पाने में उतने ही कम सक्षम होगे, जैसे-जैसे तुम कम चीज़ें प्राप्त करोगे, तुम्हारी नफ़रत बढ़ती जाएगी। जैसे-जैसे तुम्हारी नफ़रत बढ़ती है, तुम्हारे अंदर उतना ही अंधेरा छाने लगता है। तुम्हारे अंदर जितना अधिक अंधेरा छाता है, तुम अपने कर्तव्य का निर्वहन उतने ही बुरे ढंग से करोगे; तुम अपने कर्तव्य का निर्वहन जितने बुरे ढंग से करोगे, तुम उतने ही कम उपयोगी होगे। यह एक आपस में जुड़ा हुआ, कभी न ख़त्म होने वाला दुष्चक्र है। ऐसी अवस्था में तुम अपने कर्तव्य का निर्वहन अच्छी तरह से नहीं कर सकते, इसलिए, धीरे-धीरे तुम्हें हटा दिया जाएगा" ("मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "तू अपने सच्चे हृदय को परमेश्वर की ओर मोड़ने के बाद सच्चाई को प्राप्त कर सकता है")। परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के बाद, उसने इसे अपने अनुभव से जोड़ा और लोगों की ईर्ष्या के मूल पर सहभागिता की। तभी मुझे एहसास हुआ कि इस सबकी वजह मेरे अंदर नाम और पद-प्रतिष्ठा की ज़बर्दस्त ख़्वाहिश और मेरे स्वभाव का भयंकर रूप से अहंकारी होना है। इन भ्रष्ट स्वभावों के प्रभुत्व में, मेरी महत्वाकांक्षा और आक्रामकता बहुत अधिक प्रबल थीं, मुझे अपने हर कार्य में दूसरों से बेहतर होना था। चाहे समाज हो या कलीसिया, मैं हर जगह ऐसी ही थी। सभाओं, सहभागिता और प्रार्थना के दौरान भी, मैं दूसरों से बेहतर होने की ही सोचती रहती थी। मुझे तभी ख़ुशी मिलती थी जब लोग मेरी तारीफ़ करते थे। अगर कोई मुझसे बेहतर होता, तो मैं बर्दाश्त नहीं कर पाती थी और मेरे अंदर ईर्ष्या पैदा हो जाती थी। मेरे अंदर एक प्रतिरोध की भावना भर जाती थी और मैं उसके विरुद्ध काम करने लगती थी। जब मैं इस भावना पर काबू नहीं कर पाती थी, तो एक नकारात्मकता में जीते हुए, मैं अपने आपसे ठीक से नज़रें नहीं मिला पाती थी। मैं परमेश्वर को भी गलत समझने लगी थी और मानने लगी थी कि मैं परमेश्वर द्वारा उद्धार का लक्ष्य नहीं हो सकती। मैंने देखा कि शैतान की भ्रष्टता ने मुझे अहंकारी, कमज़ोर, स्वार्थी और घृणा के योग्य बना दिया है। मेरा जीवन इतना नारकीय बना दिया कि बयाँ नहीं किया जा सकता। मुझे परमेश्वर के वचनों में अभ्यास का मार्ग मिला। मुझे त्याग करना, चीज़ों को दरकिनार करना, परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुरूप अपनी देह से मुँह मोड़ लेना सीखना चाहिये, बहन की अच्छी बातों से सीखना चाहिये, और अपनी दुर्बलताओं को दूर करना चाहिये। यही परमेश्वर की इच्छा है। सत्य को ज़्यादा बेहतर समझने और हासिल करने का यही तरीका है। इसके बाद, बहन ल्यू ने परमेश्वर के वचनों का एक और अंश पढ़ा: "कार्य समान नहीं हैं। एक शरीर है। प्रत्येक अपना कर्तव्य करता है, प्रत्येक अपनी जगह पर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करता है—प्रत्येक चिंगारी के लिए प्रकाश की एक चमक है—और जीवन में परिपक्वता की तलाश करता है। इस प्रकार मैं संतुष्ट रहूंगा" ("वचन देह में प्रकट होता है" में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 21")। परमेश्वर के इन वचनों को पढ़कर, मैं समझ गई कि परमेश्वर हर इंसान को अलग-अलग कार्यक्षमता और प्रतिभा प्रदान करता है। किसी में इसकी मात्रा कितनी भी हो, उसे तो बस परमेश्वर के प्राणी के तौर पर कर्तव्य का निर्वाह करना चाहिये, परमेश्वर की गवाही देनी चाहिये और उसकी महिमा का गान करना चाहिये। बहन वांग की अच्छी कार्यक्षमता को और उसके द्वारा सत्य को तुरंत ग्रहण करने की प्रतिभा को परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत किया गया है। मुझे उस चीज़ को सकारात्मक रूप से लेना चाहिये, मुझे अपनी ताकत और कमियों को भी सकारात्मक रूप से लेना चाहिये, क्योंकि परमेश्वर ने हम में से हर एक को जो कुछ दिया है वह सर्वोत्कृष्ट है। उसने मेरे लिये जो भी कार्यक्षमता पूर्वनियत की है, मुझे उसके नियम और व्यवस्था को मानना चाहिये, मुझे अपनी अभिप्रेरणाओं में सुधार लाना चाहिये, और सत्य का अनुसरण पूरे दिल से करना चाहिये। मैं जिस पर स्पष्ट हूँ उस पर सहभागिता करूँगी—न कम, न ज़्यादा। मैं जो समझती हूँ उसका अभ्यास करूँगी—न कम, न ज़्यादा। मैं परमेश्वर के समक्ष पूरी शक्ति से कार्य करूँगी ताकि उसे सुख-संतुष्टि मिले—केवल यही सार्थक हो सकता है। इसी का मुझे सर्वाधिक अनुसरण भी करना चाहिये। इस लक्ष्य के लिये, मैंने परमेश्वर के सामने यह संकल्प किया: अब से, मैं सत्य की खोज के लिये प्रयास करूँगी, अहंकार और स्वार्थ के अपने शैतानी स्वभाव का तेज़ी से त्याग कर दूँगी, और परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिये एक सच्चे इंसान की तरह जिऊँगी।

अगली कलीसिया सभा का आयोजन बहुत जल्दी हुआ। मैं बहन वांग से मिलकर उसे बताना चाहती थी कि मैंने इतने दिनों तक उसके प्रति ईर्ष्या से संबंधित किस तरह की भ्रष्टता पाल रखी थी। लेकिन जैसे ही मैंने यह सोचा कि जब उसे मेरी इतनी सारी भ्रष्टता के बारे में पता चलेगा, तो वह मुझे जिस नज़र से देखेगी, उसका सामना करने की मेरी हिम्मत नहीं हुई। मैंने मन ही मन, परमेश्वर से प्रार्थना की: "हे परमेश्वर! मुझे विश्वास और साहस दीजिये। मैं अपने मिथ्याभिमान का त्याग करके बहन के साथ खुलकर सहभागिता करने को तैयार हूँ, हमारे बीच आए अवरोध को समाप्त करने को तैयार हूँ।" प्रार्थना करने के बाद, मुझे दिल में एक सुकून की अनुभूति हुई, और फिर मैंने उस सारी अवधि की अपनी स्थिति और अनुभवों के बारे में उसे सब-कुछ बता दिया। फलस्वरूप, यह सुनकर किसी भी भाई-बहन ने मुझे गिरी हुई नज़रों से नहीं देखा, बल्कि मेरे साहस की, मेरे एक ईमानदार इंसान बनने के प्रयास की सराहना की। उन्होंने यह भी कहा कि मेरे अनुभव से उन्हें इस बात का एहसास हुआ कि परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करके ही हम अपने शैतानी भ्रष्ट स्वभावों को दूर कर सकते हैं, मुक्ति और आज़ादी पा सकते हैं, वे यह भी जान गए कि अगर कभी इस तरह की स्थिति आई तो उसका अनुभव उन्हें कैसे लेना है। आगामी सभाओं में, मैंने बहन की सहभागिता को बहुत ही गंभीरता से सुना, उससे मुझे उसके बहुत-से गुणों का पता चला। मैंने जाना कि जब उसके सामने कोई समस्या आती थी, तो वह परमेश्वर के सामने जाकर, सत्य की खोज करती थी, और परमेश्वर के वचनों से अभ्यास का मार्ग ढूँढ़ लेती थी। मुझे उन सारे पहलुओं से सीखने की ज़रूरत थी। सचमुच तभी मुझे यह बात समझ में आई कि सभाओं में भाई-बहन जो अपने अनुभव और परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने की गवाहियाँ साझा करते हैं, वह जीवन में विकास का एक बेहतरीन अवसर है। इस बहन का मेरे निकट होना परमेश्वर की एक व्यवस्था थी। यह बहन उन बातों पर सहभागिता करती थी जिन पर मैं स्पष्ट नहीं थी। मेरे अंदर जिन चीज़ों की कमी थी, यह बहन उन चीज़ों की पूर्ति पूरी तरह से कर देती थी। यह परमेश्वर का आशीष ही तो है! जब मैंने इन बातों पर इस तरह से विचार किया, तो मुझे अपने दिल में सुकून की अनुभूति हुई। तथ्यों और परमेश्वर के वचनों के न्याय वताड़ना द्वारा उजागर होकर, लोगों के प्रति मेरी ईर्ष्या के भ्रष्ट स्वभाव में थोड़ा-बहुत बदलाव आया, और मुझे परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव के बारे में थोड़ा-थोड़ासतही ज्ञान होने लगा। परमेश्वर के न्याय और ताड़ना में उनके प्रकटन को देखकर, मैंने भी निजी तौर पर अनुभव किया कि परमेश्वर के वचन सचमुच इंसान का शुद्धिकरण और रूपांतरण कर सकते हैं, उसे बचा सकते हैं। परमेश्वर के वचन इंसान का जीवन हो सकते हैं, वे हमारी मुश्किलों और दुख-दर्द को दूर कर सकते हैं। मैं परमेश्वर के वचनों पर और अधिक अमल करने, उनके न्याय और ताड़ना का आज्ञापालन करने को तैयार हूँ। परमेश्वर मुझे शीघ्र शुद्ध करें, ताकि मैं एक सच्चे इंसान की तरह जी सकूँ और उनकी प्रशंसा की पात्र बन सकूँ।

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