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आज्ञाकारिता का पाठ

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यांगमिंगज़ेन, कनाडा

मेरा नाम यांग मिंगज़ेन है। मैं सात साल से सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अनुसरण कर रही हूँ। इन पिछले कुछ सालों में, कलीसिया ने जो भी काम मुझे दिया या काम के दौरान मेरे सामने जो भी मुश्किलें या परेशानियाँ आईं, भले ही मुझे कष्ट उठाने पड़े हों, या मुझे कोई कीमत अदा करनी पड़ी हो, मैंने बिना किसी नकारात्मकता के या बिना पीछे हटे, पूरे उत्साह से सहयोग किया है। मुझे लगता था, चूँकि मैं उन सभी कार्यों को करने में सक्षम थी, इसलिये मेरा जीवन स्वभाव बदल गया है, मेरे अंदर परमेश्वर के प्रति थोड़ी व्यवहारिक आज्ञाकारिता है। लेकिन परमेश्वर मेरी कमियों को और मुझे जीवन में विकास के लिये जो कुछ चाहिये, वह जानता है। इसलिये उसने मेरे अनुभव करने के लिये ध्यान से वास्तविक परिवेशों की व्यवस्था की। परमेश्वर के प्रकटन के कारण ही मैं साफ़ तौर पर अपनी वास्तविक कद-काठी को देख पाई।

मार्च 2016 में, मैं सीसीपी की गिरफ़्तारी और उत्पीड़न से बचने के लिये दूसरे देश चली गई ताकि मैं आज़ादी से परमेश्वर में विश्वास रख सकूँ, उसकी आराधना कर सकूँ। वहाँ पहुँचकर, मैं कुछ युवा बहनों के साथ रहने लगी। वे बहनें रोज़ाना सुसमाचार का प्रचार-प्रसार करने, नए विश्वासियों का सिंचन और समर्थन करने निकलतीं। शाम को आकर, वे प्रसन्नता से एक-दूसरे के साथ अपने अनुभव और अपने काम के दौरान उन्हें क्या प्राप्त हुआ, इन बातों को साझा करतीं। यह सब देखकर मैं वाकई उनकी सराहना करती थी। मैंने सोचा: "अगर मैं भी इनकी तरह बन सकूँ, अगर इनकी तरह नए भाई-बहनों का सिंचन करने का काम और उनका समर्थन कर सकूँ, तो कितना अच्छा होगा!" एक दिन बहन झांग हमारे साथ कलीसिया के काम की चर्चा करने के लिये आई। उसने पूछा: "क्या आप हमारे नए भाई-बहनों की सहायता-समर्थन करना चाहेंगी?" मैंने ख़ुशी-ख़ुशी हाँ कर दी। मैंने सोचा: जब मेरे दोस्तों, रिश्तेदारों, भाई-बहनों को पता चलेगा कि मैं विदेश में रहकर इस तरह का काम कर रही हूँ, तो वे इस बात को सराहेंगे, मेरा आदर करेंगे। ये तो कमाल हो जाएगा! अगले कुछ दिनों में, मुझे नए विश्वासियों के सिंचन-कार्य की शुरुआत करने की बड़ी उत्सुकता थी।

मेरा दिल उम्मीदों से भरा था कि तभी कलीसिया की अगुवा ने आकर मुझसे पूछा कि क्या मैं मेज़बानी कर सकती हूँ। ये सुनते ही मेरे दिल में हलचल मच गयी: "मैंने सोचा कि जब कलीसिया मेरे लिये नए भाई-बहनों के सिंचन और समर्थन की व्यवस्था कर रही थी, तो मुझे अब मेज़बानी करने के लिये क्यों कहा जा रहा है? क्या मैं सारा दिन बर्तन-भांडों में ही नहीं लगी रहूँगी? इसमें मेहनत तो है ही, ऊपर से कोई इज़्ज़त भी नहीं है! जब मैं दुनियादारी में थी, तो एक व्यवसाय में महिला के तौर पर अपनी फ़ैक्टरी चलाती थी। मेरे सारे दोस्तों और संबंधियों ने हमेशा कहा है कि मैं वाकई एक मज़बूत औरत हूँ। मेरे घर पर कपड़े धोने, खाना बनाने और साफ़-सफ़ाई के लिये नौकर-चाकर थे। लेकिन लगता है अब मैं आपके लिये खाना बनाऊँगी। मुझे नहीं करना इस तरह का काम!" मेरे मन में इस तरह के विचार उठ रहे थे, लेकिन अपनी गरिमा बनाए रखने के लिए मैं साफ़ तौर पर मना नहीं करना चाहती थी। मैंने बड़ी चतुराई से बहाना बनाया कि मैं अभी-अभी इस देश में आई हूँ, मैं यहाँ न तो आस-पास की जगहों से परिचित हूँ, न मैं यहाँ की स्थानीय भाषा बोल सकती हूँ। मुझे सब्ज़ी-भाजी ख़रीदना भी नहीं आता, इसलिये मैं मेज़बानी के काम को ठीक से नहीं कर पाऊँगी। बहन झांग बोली कि आप चिंता मत कीजिये, जब भी ज़रूरत होगी, कोई न कोई आपकी मदद को आ जाएगा। इसके बाद, मेरे पास बहाना बनाने को कुछ बचा नहीं, लेकिन मन ही मन मैं इस काम को बिल्कुल नहीं करना चाहती थी। अगर मैंने हाँ कर दी, तो फिर दोबारा मुझे सिंचन का काम नहीं मिलेगा, इस तरह क्या मेरी उम्मीदों पर पानी नहीं फिर जाएगा? लेकिन अगर मैंने मना कर दिया तो क्या बहन यह नहीं कहेगी कि मैं अपनी मर्ज़ी से काम चुनकर नाफ़रमानी कर रही हूँ? बहुत सोचने-समझने के बाद, मैंने मजबूरन उस काम को स्वीकार कर लिया।

हालाँकि अगले कुछ दिनों तक, मैं मेज़बानी के काम में लगी रही, लेकिन मेरे दिल में हलचल होती रही। मेरे मन में शक पैदा हुआ। मैंने सोचा: कहीं ऐसा तो नहीं कि बहन मुझे सिंचन के काम के काबिल ही न समझती हो? वरना वह मुझे मेज़बानी का काम क्यों सौंपती? जो भाई-बहन मुझे जानते हैं, अगर उन्हें पता चल गया, तो क्या वे यह नहीं सोचेंगे कि मेरे अंदर सत्य की वास्तविकता की कमी के कारण मुझे मेज़बानी का काम सौंपा गया है? क्या वे मुझे नीची नज़रों से नहीं देखेंगे? सोच-सोचकर मेरामन और भी ख़राब हो गया। तभी मुझे उस संकल्प का ख़्याल आया जो मैंने परमेश्वर के सामने किया था: मुझे चाहे जैसे हालात का सामना करना पड़े, इससे अगर कलीसिया के काम को फ़ायदा होता है, तो मैं जितना संभव होगा, सहयोग करूँगी। चाहे वह काम मेरी धारणाओं से कितना भी अलग क्यों न हो, मैं आज्ञाकारी बनकर परमेश्वर को संतुष्ट करूँगी। लेकिन जब मुझे मेज़बानी सौंपी गई, तो मेरी आज्ञाकारिता कहाँ चली गई? मैंने मन ही मन परमेश्वर से प्रार्थना की: "हे परमेश्वर! मैं जानती हूँ कि इस काम में आपका ही नियम और व्यवस्था निहित है, लेकिन मेरे दिल में हमेशा एक विद्रोह का भाव बना रहता है, मैं आपके प्रति सच्चे मन से आज्ञाकारी नहीं बन पाती। मैं जानती हूँ कि मेरी स्थिति ठीक नहीं है। आप मुझे प्रबुद्ध कीजिये, मुझे राह दिखाइये ताकि मैं आपकी इच्छा को समझकर, उस व्यवस्था का पालन कर सकूँ जिसका प्रबंध आपने किया है।" प्रार्थना करने के बाद, मुझे इन वचनों का विचार आया: "वे सभी जो अपने विश्वास में परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता की खोज नहीं करते हैं, परमेश्वर का विरोध करते हैं। परमेश्वर कहता है कि लोग सत्य की खोज करें, कि वे परमेश्वर के वचन के लिए प्यासे हों, और परमेश्वर के वचनों को खाएँ एवं पीएँ, और उन्हें अभ्यास में लाएँ, ताकि वे परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता को प्राप्त कर सकें। यदि तुम्हारी प्रेरणाएँ सचमुच में इस प्रकार की हैं, तो परमेश्वर निश्चित रूप से तुम्हें उन्नत करेगा, और वह निश्चित रूप से तुम्हारे प्रति अनुग्रहपूर्ण होगा। कोई भी इस पर सन्देह नहीं कर सकता है, और कोई भी इसे बदल नहीं सकता है। यदि तुम्हारी प्रेरणाएँ परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता के वास्ते नहीं हैं, और तुम्हारे अन्य लक्ष्य हैं, तो जो कुछ भी तुम कहते और करते हो—परमेश्वर के सामने तुम्हारी प्रार्थनाएँ, और यहाँ तक कि तुम्हारे प्रत्येक कार्यकलाप—परमेश्वर के विरोध में होंगे। तुम मृदुभाषी एवं विनम्र-व्यवहार वाले हो सकते हो, तुम्हारा हर कार्यकलाप और अभिव्यक्ति सही दिखायी दे सकती है, तुम एक ऐसा व्यक्ति दिखाई दे सकते हो जो कि आज्ञाकारी है, किन्तु जब परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रेरणाओं एवं परमेश्वर में विश्वास के बारे में तुम्हारे दृष्टिकोण की बात आती है, तो जो कुछ भी तुम करते हो वह परमेश्वर के विरोध में और बुरा होता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर में अपने विश्वास में तुम्हें परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करना चाहिए")।

घर पहुँचकर, मैंने यह सहभागिता पढ़ी: "कुछ लोग अपने कर्तव्य के निर्वाह के दौरान, केवल अपने अभिमान और अपनी इज्ज़त के बारे में ही सोचते हैं। 'मैं कोई भी काम करने को तैयार हूँ जहाँ मैं अपने को दिखा सकूँ। अगर किसी काम में मुझसे यह अपेक्षा की जाती है कि मैं सिर झुकाकर मेहनत करता रहूँ, अगर कोई मेरा काम देखे नहीं और मैं अपने आपको दिखा नहीं पाऊँ, अगर यह काम गुप्त रहे और मैं बस एक बेनाम नायक रह जाऊँ, तो मैं उस काम को नहीं करूँगा। मैं वह काम करूँगा जिसमें मैं लोगों को नज़र आऊँ, वह काम जो मेरे अभिमान को पसंद आए।' ये लोग बस दूसरों के सामने अच्छा दिखना चाहते हैं, और ऐसा होते ही ये लोग रोमाँचित हो जाते हैं। इसके लिये ये लोग कोई भी कष्ट उठाने को, कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। ये लोग अपने अभिमान की संतुष्टि की खोज में ही लगे रहते हैं। ऐसे लोग सत्य को प्रेम नहीं करते। तुम्हें परमेश्वर की इच्छा के प्रति विचारशील होना चाहिये, उसकी व्यवस्थाओं का पालन करना चाहिये। परमेश्वर के घर में व्यवस्थाओं की अनुमति परमेश्वर द्वारा दी जाती है, इसलिये तुम्हें इरादे के साथ आज्ञाकारी होना चाहिये। यदि तुम परमेश्वर के घर में व्यवस्थाओं का पालन कर सकते हो, तो इसका अर्थ है कि तुम परमेश्वर का आज्ञापालन कर सकते हो। यदि नहीं कर सकते, तो परमेश्वर के लिये तुम्हारा आज्ञापालन महज़ खोखले शब्द हैं, क्योंकि परमेश्वर कभी भी तुम्हें सामने आकर कुछ करने के लिये आदेश नहीं देगा। आज, परमेश्वर के घर ने तुम्हारे लिये इस काम की व्यवस्था की है, इस काम की व्यवस्था हमारे वर्तमान कार्य की आवश्यकताओं के आधार पर की गई है। तुम कहते हो: 'मेरे पास विकल्प हैं। मैं वही काम करूँगा जो मुझे पसंद है, अगर मुझे पसंद नहीं है, तो मैं यह काम नहीं करूँगा।' क्या इस तरह से काम करना परमेश्वर का आज्ञापालन है? क्या ऐसा व्यक्ति सत्य को प्रेम करता है? क्या ये लोग परमेश्वर की समझ को हासिल कर सकते हैं? ऐसे लोगों में परमेश्वर के प्रति श्रद्धा नहीं होती। अपने काम को चुनना, नकारात्मक होना और ढीलापन दिखाना—इस प्रकार के लोगों में ज़रा-सी भी सत्य की वास्तविकता नहीं होती। इनमें सच्ची आज्ञाकारिता नहीं होती। बल्कि ऐसे लोग पूरी तरह से अपनी पसंद के हिसाब से काम करते हैं। परमेश्वर ऐसे लोगों को पसंद नहीं करता" (जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति (X) में "परमेश्वर के वचन 'परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है' के बारे में धर्मोपदेश और संगति (I)")।

परमेश्वर के वचनों और सहभागिता ने मेरे दिल को वेध दिया, मुझे बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई। मुझे यह भी समझ में आ गया कि मैं मेज़बानी के काम में नाफ़रमानी क्यों कर रही थी। मुझे याद आया, जब कलीसिया में एक छोटे समूह का दायित्व मुझ पर था, तो अगुवा कलीसिया के काम को लेकर सबसे पहले मुझसे चर्चा किया करती थी, उसके बाद मैं भाई-बहनों से चर्चा करती थी कि उस काम को कैसे करना है। उस समय मुझे लगता था कि कलीसिया की अगुवा की नज़र में मेरा सम्मान है, भाई-बहन भी मुझे उसी नज़र से देखते हैं। मैं अपने काम में जोश से लबालब रहती थी। काम चाहे कितना भी मुश्किल या थका देने वाला हो, मैं ख़ुशी-ख़ुशी करती थी। अब चूँकि मुझे मेज़बानी करनी है, तो मैं नकारात्मक हो गई हूँ और मेरे अंदर ऊर्जा भी ख़त्म हो गई है। मुझे लगता है कि खाना बनाना छोटा काम है, बस दिन भर बर्तन-भांडों से सिर खपाते रहो। कितनी भी मेहनत करो, किसी को कुछ पता ही नहीं चलेगा। इस तरह का काम बहुत मायूसी भरा होता है, इसलिये मैं इसका विरोध कर रह हूँ, और इस काम को स्वीकारना नहीं चाहती। मेरे अंदर परमेश्वर के प्रति व्यवहारिक आज्ञाकारिता नहीं है। तब मुझे पता चला कि पहले मैंने जो अथक कार्य किया था, वह किसी आज्ञाकारिता की वजह से नहीं किया था, बल्कि दूसरों के सामने दिखावा करने, दूसरों की प्रशंसा और सम्मान पाने के लिये किया था। ऐसा करके मैं परमेश्वर के प्राणी के तौर पर काम नहीं कर रही थी। जब मुझे अपने काम से शोहरत और पद-प्रतिष्ठा पाने की अपनी महत्वाकांक्षा और इच्छा पूरी होती नहीं दिखाई दी, तो मैंने दुनिया भर के बहाने बनाने शुरू कर दिए। मैं न तो इस काम को स्वीकार करने को तैयार थी और न ही मैं आज्ञाकारी थी। साफ़ कहूँ तो, कहने को मैं अपने कर्तव्यों का निर्वाह करने का झंडा बुलंदकर रही थी, लेकिन सच्चाई यह है कि मैं व्यक्तिगत शोहरत और पद-प्रतिष्ठा और अपने मिथ्याभिमान की संतुष्टि के पीछे भाग रही थी। मैं न तो परमेश्वर की इच्छा के प्रति विचारशील थी, न ही कलीसिया के काम को संभाल रही थी। मैं वाकई बेहद स्वार्थी और घृणा-योग्य हूँ! मैंने हमेशा अपनी निजी पसंद-नापसंद के हिसाब से काम किया है, मैं हमेशा सांसारिक सुखों के लिये षडयंत्र रचती रही हूँ। मैं ऐसी इंसान कैसे हो सकती थी जो सत्य का अनुसरण और परमेश्वर का आज्ञापालन करता है? फिर मैंने परमेश्वर के और भी वचन पढ़े: "जो लोग सच्चाई को व्यवहार में लाने में सक्षम हैं वे अपने कार्यों में परमेश्वर की जाँच को स्वीकार कर सकते हैं। जब तू परमेश्वर की जाँच को स्वीकार करता है, तो तेरा हृदय सही है। यदि तू हमेशा दूसरों के दिखाने के लिए ही चीज़ों को करता है और परमेश्वर की जाँच को स्वीकार नहीं करता है, तो क्या तेरे हृदय में परमेश्वर है? इस तरह के लोगों के पास परमेश्वर के भय से रहित हृदय होता है। हमेशा अपने स्वयं के वास्ते कार्यों को मत कर, हमेशा अपने हितों की मत सोच, और अपनी स्वयं की हैसियत, चेहरे या प्रतिष्ठा पर विचार मत कर। तुझे सबसे पहले परमेश्वर के घर के हितों पर विचार अवश्य करना चाहिए और उसे अपनी पहली प्राथमिकता बनाना चाहिए; तुझे परमेश्वर की इच्छा के बारे में मननशील होना चाहिए, इस पर चिंतन करना चाहिए कि तू परमेश्वर के घर के कार्य के बारे में सोच रहा है या नहीं और तूने अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाया है या नहीं। जब तू हमेशा अपने हृदय में परमेश्वर के घर के कार्य पर विचार करता है और अपने भाइयों और बहनों के जीवन प्रवेश के बारे में सोचता है, तो तू अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाने में समर्थ होगा" ("मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "तू अपने सच्चे हृदय को परमेश्वर की ओर मोड़ने के बाद सच्चाई को प्राप्त कर सकता है")। परमेश्वर के वचनों पर विचार करके, मुझे उसकी इच्छा समझ में आ गई कि उसकी संतुष्टि के लिये क्या करना चाहिये। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की और अपना संकल्प तय कर लिया: "हे परमेश्वर! मैं तेरी जांच-पड़ताल को स्वीकारने के लिये तैयार हूँ, अपने मिथ्याभिमान और दिखावे को त्यागने को तैयार हूँ, शोहरत और पद-प्रतिष्ठा का पीछा छोड़ने को तैयार हूँ। मैं आपकी संतुष्टि के लिये आपकी व्यवस्था का आज्ञापालन करने और पूरी श्रद्धा से अपने कर्तव्यों का निर्वाह करने को तैयार हूँ!" प्रार्थना करने के बाद, मेरे दिल को काफ़ी सुकून मिला, और इस कार्य को मैंने दिल से स्वीकार कर लिया।

बाद के दिनों में, चूँकि दूसरी बहनें जानती थीं कि मैं यहाँ नई थी और आस-पास की जगहों से परिचित नहीं थी, तो मेरे लिये किराने के सामान आदि की ख़रीदारी करना थोड़ा मुश्किल था, इसलिये खाने-पीने और रोज़मर्रा की ज़रुरतों की चीज़ों लाने के लिये वे मेरे साथ आने के लिये समय निकालने लगीं। थोड़ी उम्रदराज़ होने के कारण, मैं कम्प्यूटर वगैरह में इतनी अच्छी नहीं हूँ, इसलिये अन्य बहनें बड़े संयम से मुझे ये सब सिखाने लगीं। जब कभी मुझे कोई मुश्किल पेश आती, मैं नकारात्मक और कमज़ोर दशा में होती, तो वे इससे जुड़े परमेश्वर के वचनों के अंशों को सहभागिता में मेरे साथ साझा करतीं। वे बड़े प्यार से मेरी सहायता करतीं और मेरी व्यवहारिक मुश्किलों को दूर करतीं। हालाँकि सभी बहनें अपने-अपने कामों में व्यस्त रहती थीं, लेकिन जब कभी उन्हें समय मिलता, तो वे घर के कामों में, और साफ़-सफ़ाई वगैरह में मेरी मदद करतीं। कोई भी ऐसी नहीं थी, जो मेरे मेज़बान होने के कारण मुझे नीची नज़रों से देखे या मुझसे खिंची-खिंची रहे। हर कोई अपने काम में जो कुछ कर सकता था कर रहा था। मुझे महसूस हुआ कि भाई-बहनों के बीच किसी तरह का ऊँच-नीच का कोई भेद नहीं था। बल्कि हमारे बीच एक परिवार से भी ज़्यादा घनिष्टता थी। मेरा हर दिन पूर्णता से भरा होता था, मुझे बहुत शांति और सुकून महसूस होता था। मैं वाकई परमेश्वर का धन्यवाद करती हूँ! परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना से गुज़रकर, मुझे महसूस हुआ कि मैंने परमेश्वर के आज्ञापालन के सत्य में थोड़ा-बहुत प्रवेश प्राप्त कर लिया है, और मैं अपने काम में ज़्यादा आज्ञाकारी हो गई हूँ। मगर परमेश्वर अच्छी तरह जानता था कि शोहरत और पद-प्रतिष्ठा के पीछे भागने वाली मेरी शैतानी प्रकृति मेरे अंदर गहरी जड़ें जमाए हुए है, इसलिये उसने मुझे शुद्ध करने और बचाने के लिये एक दूसरे परिवेश का निर्माण किया।

एक दिन, कलीसिया की अगुवा ने मुझे बुलाकर कहा कि फ़्लाँ बहन अपने काम में बहुत ज़्यादा व्यस्त चल रही है, इसलिये शनिवार की दोपहर को उसके बच्चे की देखभाल के लिये कोई नहीं होता, अगर मैं हर हफ़्ते आधा दिन उसकी मदद कर सकूँ तो अच्छा होगा। जब मैंने सुना कि मुझे उसके बच्चे की देखभाल करनी है, तो मुझे थोड़ा बुरा लगा। क्या बच्चे की देखभाल करना भी मेरे काम में शामिल है? और फिर, इतने सालों तक अपने कारोबार में व्यस्त रहने के कारण, मैंने कभी अपने पोते-पोतियों की देखभाल नहीं की। मैंने जो भी काम किया, उससे मेरा सम्मान बढ़ता था, रिश्तेदारों और दोस्तों की नज़र में मैं एक सशक्त महिला थी। एक तो मेज़बानी ही मेरे लिये छोटा काम है, ऊपर से किसी के बच्चे को संभालना, क्या मैं आया बनकर नहीं रह जाऊँगी? बच्चे की देखभाल करने से मुझे कौन-सी शोहरत या पद-प्रतिष्ठा मिल जाएगी, मैं यह काम नहीं करना चाहती थी। इसलिये मैंने बहाना बनाया: अभी तो मुझे बहनों के लिये खाना बनाना पड़ता है, और मुझे घर की भी देखभाल करनी पड़ती है। भाई-बहन यहाँ अक्सर आते रहते हैं, इसलिये मेरा बाहर निकल पाना मुश्किल है। चूँकि मैं बहानेबाज़ी और टालमटोल कर रही थी, इसलिए अगुवा ने मुझे पहले परमेश्वर से प्रार्थना करने और फिर निर्णय लेने के लिये कहा। फ़ोन रखने के बाद, मैं बेचैन हो गई, मैं जितना सोचती, मेरी दशा उतनी ही बिगड़ती जाती। मैंने सोचा: अगुवा किसी और को क्यों नहीं पकड़ लेती? मैं ही क्यों? बच्चे की देखभाल करने से मुझे शोहरत या पद-प्रतिष्ठा नहीं मिलने वाली। मुझे यह सब करते देखकर भाई-बहन क्या सोचेंगे? मैं उन्हें क्या मुँह दिखाऊँगी? लेकिन अगर मैं यह काम न करूँ, तो क्या भाई-बहन यह नहीं सोचेंगे कि मेरे दिल में प्यार नहीं है? मैंने बहुत सोचा और आख़िरकार वहाँ जाकर एक बार कोशिश करने का फ़ैसला किया।

मैं शनिवार दोपहर को बहन झू के घर गई। मैंने देखा कि बच्ची बहुत ही चँचल, मासूम और प्यारी है, लेकिन इससे मुझे कोई ख़ुशी नहीं हुई। मेरा दिल बेचैन था। मैंने किसी तरह शाम 5.00 बजे तक का समय काटा, लेकिन तभी बच्ची अपनी माँ के लिये रोने लगी। मैंने हर कोशिश कर के देख ली, लेकिन बच्ची चुप होने का नाम ही नहीं ले रही थी। बहन झू के घर लौटने का समय हो रहा था, और बच्ची थी कि रोए जा रही थी। मैं परेशान हो गई। मैंने सोचा: अगर उसने आकर अपनी बच्ची को रोते देखा, तो वह मेरे बारे क्या सोचेगी? क्या वह यह नहीं सोचेगी कि इस उम्र में मैं एक छोटी बच्ची को भी नहीं संभाल सकती? मैंने घबराकर, बच्ची को खाने-पीने की चीज़ों से बहलाने की कोशिश की, उसे कहानी सुनाई, कार्टून दिखाए। धीरे-धीरे उसने रोना बंद कर दिया। तभी बहन झू काम से वापस आ गई। किसी तरह मैंने वह दोपहर काटी। घर लौटते समय मैं सोचने लगी: बच्चों की देखभाल करना कोई मामूली काम नहीं है। इंसान थक तो जाता ही है, एक फ़िक्र भी बनी रहती है, वह अलग। अगर कुछ हो गया, तो मैं संभाल नहीं पाऊँगी। और फिर, कलीसिया में इतने लोग हैं, बच्चे की देखभाल के काम के लिये मैं ही क्यों? मैं जितना इस पर सोचती, उतनी ही मायूस होती जाती। उस रात, मुझे नींद नहीं आई, मैं रात भर करवटें बदलती रही। मुझे परमेश्वर के सामने आकर प्रार्थना करनी पड़ी: "हे परमेश्वर! मेरा मन बहुत ही ख़राब हो रहा है। मैं जानती हूँ कि उस बहन की बच्ची की देखभाल में मदद इसलिये ज़रूरी है ताकि उसकी घरेलु समस्या उसके काम के आड़े न आए, और इस काम को मुझे अपने कर्तव्य की तरह स्वीकार लेना चाहिये। लेकिन मुझे हमेशा लगता है मेरे साथ गलत होता है, मैं इस काम को स्वीकार नहीं कर पा रही हूँ। हे परमेश्वर! मुझे प्रबुद्ध कर, राह दिखा ताकि मैं तेरी इच्छा को समझ सकूँ, और इस गलत दशा से बाहर आ सकूँ।" प्रार्थना करने के बाद मेरा मन थोड़ा ठीक हुआ। मैंने परमेश्वर के वचनों की एक पुस्तक खोली जिसमें लिखा था: "एक सच्चा समर्पण क्या है? जब कभी भी चीज़ें तुम्हारे अनुरूप होती हैं और तुम्हें दूसरों से अलग दिखने, चमकने, और कुछ सम्मान पाने देती हैं, तो तुम्हें ऐसा महसूस होता है कि सब कुछ संतोषजनक और उचित है। तुम परमेश्वर को धन्यवाद देते हो और उसके आयोजनों एवं व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित हो पाते हो। हालांकि, जब कभी भी तुम्हें किनारे कर दिया जाता है, तुम दूसरों से अलग दिखने में अक्षम होते हो, और दूसरे लोग निरंतर तुम्हारी उपेक्षा करते हैं, तो तुम खुश नहीं रहते। ...जब परिस्थितियां अनुकूल हों, तब समर्पण करना आम तौर पर आसान होता है। अगर तुम प्रतिकूल परिस्थितियों में भी समर्पण दिखा सकते हो—उन मामलों में जहां चीज़ें तुम्हारे अनुकूल नहीं हो रही हैं और जब तुम्हारी भावनाओं को ठेस पहुँचती है, जो तुम्हें कमजोर करते हैं, जो तुम्हें शारीरिक रूप से तकलीफ़ देते हैं और तुम्हारी प्रतिष्ठा को आघात पहुंचाते हैं, जो तुम्हारे मिथ्याभिमान और गौरव को संतुष्ट नहीं कर पाते है, और जो तुम्हें मानसिक रूप से कष्ट पहुंचाते हैं—तब तुम सही मायनों में परिपक्व हो गये हो। क्या यह वही लक्ष्य नहीं है जिसका तुम्हें अनुसरण करना चाहिये? अगर तुम्हारे पास ऐसा संकल्प, ऐसा लक्ष्य है, तो उम्मीद बाकी है" (परमेश्‍वर की संगति)।

"मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव उसके हर कार्य के पीछे के इरादों के भीतर, उसके हर सोच-विचार के भीतर छुपा होता है; यह उस हर राय, समझ, दृष्टिकोण और इच्छा के भीतर छिपा होता है जो वह परमेश्वर के हर कार्य के प्रति रखता है। और परमेश्वर मनुष्य की इन बातों से कैसे निपटता है? वह तुम्हें उजागर करने के लिए परिवेशों की व्यवस्था करता है। वह न केवल तुम्हें उजागर करेगा, बल्कि तुम्हारा न्याय भी करेगा। जब तुम अपने भ्रष्ट स्वभाव को प्रकट करते हो, जब तुम्हारे मन में ऐसे विचार और ख़्याल आते हैं जो परमेश्वर की अवहेलना करते हैं, जब तुम्हारी स्थितियां और दृष्टिकोण ऐसे होते हैं जो परमेश्वर से वाद-विवाद करते हैं, जब तुम्हारी ऐसी स्थिति होती है जहां तुम परमेश्वर को गलत समझते हो, या प्रतिरोध और विरोध करते हो, तब परमेश्वर तुम्हें फटकारेगा, तुम्हारा न्याय करेगा और तुम्हें ताड़ना देगा, और वह कभी-कभी तुम्हें दंडित और अनुशासित भी करेगा। ...परमेश्वर चाहता है कि तुम अपने भ्रष्ट स्वभावों और शैतानी सार को पहचानो, तुम उन परिवेशों के प्रति आज्ञाकारी होने में सक्षम बनो जिनकी परमेश्वर तुम्हारे लिए व्यवस्था करता है और अंततः, तुम उसका अभ्यास करने में सक्षम बनो जिसकी वह अपनी इच्छा के अनुरूप तुमसे अपेक्षा करता है, और उसके इरादे को पूरा करने में सक्षम बनो" ("मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "केवल वास्तव में आज्ञाकारी होना ही एक यथार्थ विश्वास है")।

परमेश्वर के प्रकट करने वाले न्याय के वचनों को पढ़कर, मुझे लगा मैं कहाँ मुँह छुपाऊँ। परमेश्वर के इन वचनों को पढ़कर "मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव उसके हर कार्य के पीछे के इरादों के भीतर, उसके हर सोच-विचार के भीतर छुपा होता है; यह उस हर राय, समझ, दृष्टिकोण और इच्छा के भीतर छिपा होता है जो वह परमेश्वर के हर कार्य के प्रति रखता है," मैं अपने अंदर झाँकने को विवश हो गई: परमेश्वर ने मेरे लिए जिस परिवेश की रचना की है, मैं उसका पालन क्यों नहीं कर पाई? मैं बच्ची की देखभाल करके, उस बहन की मदद करने की अनिच्छुक क्यों थी? मुझे लगा कि बच्चों की देखभाल करना छोटी हैसियत के लोगों का काम है, यह काम करने से मेरी इज्ज़त घटती है, लोग मुझे नीची नज़रों से देखेंगे। मुझे लगता था कि वही काम महत्वपूर्ण है जहाँ मैं लोगों की नज़रों में आ सकूँ, कुछ बड़ा कर सकूँ, लोग मुझे सराहें, मेरी इज़्ज़त करें और परमेश्वर मेरी प्रशंसा करे। अगर मेरा काम छोटा होगा, जो लोगों की नज़र में न आए, तो वह काम बेकार है। मेरे अंदर इस तरह के जो विचार चल रहे थे, उन पर मैंने आत्म-मंथन किया, तो मुझे एहसास हुआ कि मैं अभी भी शोहरत और पद-प्रतिष्ठा के वशीभूत होकर ही ऐसा सोचती हूँ। मेरे लक्ष्य, जीवन के प्रति मेरा नज़रिया, परमेश्वर में अपनी आस्था को लेकर मैं जिन मूल्यों पर चल रही हूँ, वे सब संसारी लोगों के समान ही हैं, जैसे "जैसे एक पेड़ अपनी छाल के लिए जीता है, उसी तरह एक मनुष्य अपने चेहरे के लिए जीता है," "पुरुषों को हमेशा अपने समकालीनों से बेहतर होने का प्रयत्न करना चाहिए," "एक व्यक्‍ति जहां वह रहता है अपना नाम छोड़ता है, जैसे कि एक हंस जहां कहीं उड़ता है आवाज़ करता जाता है," "आदमी ऊपर की ओर के लिए संघर्ष करता है; पानी नीचे की ओर बहता है," आदि। ये सारे शैतानी विष और तार्किक नियम मेरे मन में गहराई से जड़ें जमाए हुए थे, और मेरा जीवन बन चुके थे। इनके कारण मैं बेहद अहंकारी बनकर शोहरत और पद-प्रतिष्ठा के पीछे भाग रही थी। इन्हीं के कारण मैं अपने काम में शोहरत और पद-प्रतिष्ठा के लाभ-हानि का हिसाब-किताब करती रहती थी और परमेश्वर का सच्चा आज्ञापालन नहीं कर पा रही थी।

मैंने परमेश्वर के वचनों पर फिर से विचार किया और मुझे यह बात समझ में आई कि हालाँकि परमेश्वर ने मेरे लिये जिस परिवेश की रचना है, वह मेरी धारणाओं के अनुरूप नहीं है, लेकिन इसमें परमेश्वर के इरादे निहित हैं। परमेश्वर मुझे उस परिवेश के ज़रिये उजागर करना चाहता है ताकि मुझे अपने भ्रष्ट स्वभाव की गहरी समझ प्राप्त हो और मैं साफ़ तौर पर देख सकूँ कि मैं गलत रास्ते पर चल रही हूँ, ताकि मैं समय पर प्रायश्चित करके मुड़कर सत्य का अनुसरण करने के सही मार्ग पर कदम रख दूँ। अब, मेरे काम को कोई छोटा समझे या बड़ा, यह सब परमेश्वर के नियम और व्यवस्था के अनुसार है और मुझे इस दायित्व और कर्तव्य से पीछे नहीं हटना चाहिये। मुझे बिना किसी अटकलबाज़ी या तर्क-वितर्क के इसका पालन करना चाहिये; मैं न तो इस पर बहस कर सकती हूँ, न इसका विरोध कर सकती हूँ। इसमें मुझे पसंद-नापसंद नहीं दिखानी है—यही सच्चा आज्ञापालन है!

अगले दिन, अपनी आध्यात्मिक भक्ति करते समय, मैंने परमेश्वर के और भी वचन पढ़े: "अगर तुम अपना कर्तव्य अच्छे से नहीं निभाते हो, लेकिन हमेशा सम्मान चाहते हो और पद, पहचान, प्रतिष्ठा, और अपने खुद के हितों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हो, तो ऐसी स्थिति में रहते हुए, क्या तुम सेवा करना चाहते हो? अगर तुम चाहो तो तुम सेवा कर सकते हो, लेकिन यह संभव है कि तुम्हारी सेवा पूरी होने से पहले तुम्हें उजागर कर दिया जायेगा। तुम्हें उजागर करने का काम तत्काल होता है। जैसे ही तुम्हें उजागर किया जाता है, सवाल यह नहीं रह जाता कि क्या तुम्हारी स्थिति में सुधार किया जा सकता है; इसके बजाय, यह संभव है कि तुम्हारा परिणाम पहले ही निर्धारित कर लिया गया हो—और यह तुम्हारे लिये एक समस्या बन जाएगी" ("मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "तू अपने सच्चे हृदय को परमेश्वर की ओर मोड़ने के बाद सच्चाई को प्राप्त कर सकता है")।

"जो लोग जीवन का अनुकरण नहीं करते हैं वे रूपान्तरित नहीं हो सकते हैं; जिन्हें सच्चाई की प्यास नहीं है वे सच्चाई को प्राप्त नहीं कर सकते हैं। तू व्यक्तिगत रूपान्तरण का अनुकरण करने और प्रवेश करने पर ध्यान केन्द्रित नहीं करती है; तू हमेशा उन अनावश्यक अभिलाषाओं और उन चीजों पर ध्यान केंद्रित करती है जो परमेश्वर के लिए तुम्हारे प्रेम को बाधित करती हैं और तुझे उसके करीब आने से रोकती हैं। क्या वे चीजें तुझे रूपान्तरित कर सकती हैं? क्या वे तुझे राज्य में ला सकती हैं?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "तुम लोग एक विषमता होने के इच्छुक क्यों नहीं हो?")।

इसके एक-एक वचन ने मेरे दिल को वेध दिया। मैंने परमेश्वर की धार्मिकता देखी, पवित्र स्वभाव देखा जो इंसान के अपराधों को क्षमा नहीं करता। जिस रास्ते पर मैं चल रहा थी, उसे लेकर मैं डर गयी। मुझे एहसास हुआ कि मैंने परमेश्वर में बरसों आस्था रखी थी, लेकिन सत्य का अनुसरण कभी नहीं किया—मैं हमेशा शोहरत और पद-प्रतिष्ठा के पीछे भागती रही। मैंने हमेशा वही काम करने चाहे जिनसे मैं लोगों की नज़र में आ सकूँ, उनका सम्मान और समर्थन अर्जित कर सकूँ। मैंअनावश्यक इच्छाओं के दायरे में बंधी थी, जिनकी वजह से मैं परमेश्वर की व्यवस्थाओं का पालन नहीं कर पा रही थी। मैं ख़ास तौर से परमेश्वर का आज्ञापालन या उसे प्रेम नहीं कर पा रही थी। अगर मैं अंत तक इसी तरह से परमेश्वर का अनुसरण करती रही, तो मेरा जीवन स्वभाव कभी नहीं बदलेगा। मैं इस शैतानी प्रकृति के कब्ज़े में रहकर, यूँ ही दुखी होती रहूँगी, परमेश्वर के ख़िलाफ़ विद्रोह और उसका विरोध करती रहूँगी। ऐसी स्थिति में, परमेश्वर द्वारा मुझे बचाए जाने की संभावना कहाँ बचती है? हालाँकि अपने काम के समायोजन में मैंने काफी भ्रष्टता दिखाई, लेकिन उससे मुझे एक बात समझ में आ गई कि परमेश्वर में अपनी आस्था में, सत्य का अनुसरण करके, न्याय, ताड़ना और काट-छाँट को स्वीकार करके, और परमेश्वर के वचनों के व्यवहार से ही मैं अपनी शैतानी प्रकृति को समझ सकती हूँ, और परमेश्वर के ख़िलाफ़ विद्रोह और विरोध की भ्रष्टता की सच्चाई को साफ़ तौर पर देख सकती हूँ। इससे मैं स्वयं से घृणा कर पाऊँगी, देह की ओर से विमुख हो पाऊँगी, और अपने जीवन स्वभाव में रूपांतरण हासिल कर पाऊँगी। इस तरह मैं परमेश्वर के प्रति सचमुच आज्ञाकारी बनकर उसकी प्रशंसा प्राप्त कर पाऊँगी। इस बात को समझकर, मुझे महसूस हुआ कि परमेश्वर के प्रति आस्था में समर्पित होना सीखना सचमुच आवश्यक है। मैंने उसी समय संकल्प लिया: कलीसिया मुझे जो चाहे काम दे, मैं पूरी तरह से परमेश्वर की व्यवस्था का पालन करने को तैयार हूँ। उसमें मैं अपनी तर्क नहीं लगाऊँगी, न ही मैं अपने हानि-लाभ का विचार करूँगी। मैं केवल परमेश्वर के प्राणी के तौर पर, पूरी दृढ़ता से अपने कर्तव्य का निर्वाह करूँगी और परमेश्वर को संतुष्ट करूँगी!

आने वाले दिनों में, यूँ हुआ कि जब कभी भाई-बहन अपने-अपने कामों में व्यस्त होते, और उन्हें अपने बच्चों की देखभाल के लिये मेरी ज़रूरत पड़ती, तो मैं परमेश्वर द्वारा रची गई व्यवस्था को पूरे दिल से स्वीकार करती और उसका पालन करती। मैं पूरी निष्ठा से उस काम को करती। इस तरह मुझे सुकून और मन की शांति मिलती। मुझे उसमें पूरी तरह से परमेश्वर का मार्गदर्शन और आशीष भी नज़र आता। कभी-कभी ऐसा भी होता कि अगर कोई बच्चा मेरी बात नहीं मानता या नखरे दिखाता, तो मुझे गुस्सा आने लगता। लेकिन मैं तुरंत समझ जाती कि मेरी भ्रष्टता फिर से उजागर होने को है, तो मैं फ़ौरन परमेश्वर की शरण में जाकर आत्म-मंथन करती, मैं देखती कि परमेश्वर के आगे मैं एक ऐसे नादान बच्चे की तरह हूँ जो अक्सर परमेश्वर के ख़िलाफ़ विद्रोह करता है, उसका विरोध करता है, और उसकी बात नहीं मानता। तब मेरी नाराज़गी चली जाती, मैं बच्चे को अच्छे से समझ जाती और उसे माफ़ कर देती। कभी-कभी उन बच्चों से मेरी राय मेल नहीं खाती, तो मैं बच्ची बनकर उनकी बात सुनती, और उनकी जो बात सही होती, उसे मान लेती। मैंने बच्चों से मन की बात करना और उनकी भावनाओं को समझना भी सीख लिया। अगर उनके मन में कोई बात होती, तो मुझसे कह देते। इस तरह, हमारे बीच अब कोई दूरी नहीं रह गई थी। हम अक्सर परमेश्वर के वचनों को भी साथ-साथ पढ़ते थे, भक्ति-गीतों को साथ-साथ सुनते थे। मैं बच्चों से परमेश्वर के तीन चरणों के कार्य पर, परमेश्वर से कैसे प्रार्थना करनी है और मुश्किलें आने पर उस पर कैसे भरोसा करना है, इन तमाम बातों पर सहभागिता करती। बच्चे भी मुझे अंग्रेज़ी सिखाते। इस तरह, हम एक-दूसरे की मदद करते। जब मैंने देखा कि बच्चे काफ़ी आज्ञाकारी हो गए हैं, वे परमेश्वर से प्रार्थना करना सीख गए हैं, उस पर भरोसा करना सीख गए हैं, तो मुझे बेहद ख़ुशी हूई! मैंने दिल से परमेश्वर को धन्यवाद दिया और उसकी स्तुति की! परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना के अनुभव के ज़रिये, मैंने धीरे-धीरे शोहरत और पद-प्रतिष्ठा के लिये अपनी ख़्वाहिशों के पीछे भागना छोड़ दिया। मैं अब ऐसा कोई काम नहीं करना चाहती थी जिसमें मुझे अहमियत मिले न ही मुझे इसकी परवाह थी कि लोग मेरे बारे में क्या सोचते हैं। बल्कि, मैं परमेश्वर की व्यवस्थाओं का पालन करने वाली, दृढ़ता से परमेश्वर के समक्ष आने वाली और अपने कर्तव्यों का निर्वाह करने वाली इंसान बन गई। मुझे लगता है इस तरह से जीने में सुकून, स्वतंत्रता, और एक उन्मुक्ति है। मैंने इस बात का भी अनुभव किया कि परमेश्वर के घर में कोई काम छोटा-बड़ा नहीं है, न ही कुछ ऊँच-नीच का भेद है। मैं जो भी काम करती हूँ, उसमें मेरे लिये कोई न कोई सबक होता है, सत्य होता है, जिस पर मुझे अमल करना चाहिये, जिसमें मुझे प्रवेश करना चाहिये। अगर मैं परमेश्वर के वचनों पर अमल करूँ और उसका आज्ञापालन करूँ, तो पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त कर सकती हूँ, सत्य को समझ सकती हूँ और अपने कर्तव्यों के निर्वाह में उसके आशीषों को प्राप्त कर सकती हूँ। इससे मैं जान सकती हूँ कि वह कितना धार्मिक है, वह किसी के साथ अन्याय नहीं करता!

परमेश्वर कहता है: "परमेश्वर हर इंसान के लिये बहुत श्रमसाध्य कीमत चुकाता है। वह सभी के लिए अपेक्षाओं और उम्मीद के साथ, हर व्यक्ति को अपनी इच्छा का दायित्व सौंपता है। वह उन लोगों के लिए बेझिझक बड़ी कीमत चुकाता है जो उसकी इच्छा के अनुरूप हैं, और वह खुशी से हर व्यक्ति को अपना जीवन और सत्य देता है। अगर कोई इंसान उसके इस लक्ष्य को समझने में सक्षम होता है तो परमेश्वर संतुष्ट होता है। परमेश्वर जो चीज़ें करता है, अगर तुम उसे स्वीकार करने और उसके अनुसार चलने में सक्षम हो, और अगर तुम सब कुछ परमेश्वर से प्राप्त करने में सक्षम हो, तब उसे यह महसूस होता है कि वह बड़ी कीमत व्यर्थ में नहीं चुकाई गई है। इसका मतलब है कि अगर तुम परमेश्वर द्वारा की गई देखभाल और विचार के अनुसार जीवन जीने में सफल रहे हो, तो तुमने हर परिवेश मेंअच्छे नतीजे पा लिए हैं, और तुमसे रही परमेश्वर की उम्मीदों को तुमने निराश नहीं किया है, साथ ही, अगर तुम पर परमेश्वर ने जो काम किया है उसका अपेक्षित असर पड़ा है और यह अपेक्षित उद्देश्य तक पहुंचा है, तो परमेश्वर का हृदय संतुष्ट है" ("मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "सत्य को प्राप्त करने के लिए, तुझे लोगों, मामलों और अपने आसपास की चीज़ों से अवश्य सीखना चाहिए")। मैंने परमेश्वर के वचनों से समझ लिया है कि दिन भर में मेरा जितने भी लोगों से, घटनाओं से, चीज़ों से, और परिस्थितियों से सामना होता है, उसमें परमेश्वर की इच्छा और उसके प्रयास निहित होते हैं। परमेश्वर ने मुझे एक आदेश दिया है और विशेष रूप से मुझसे उम्मीद बाँधी है। उसने इस विशाल भव-सागर से मुझे बचाया है। परमेश्वर की इच्छा है कि उसकी प्रबंधन योजना में मैं अपनी भूमिका अदा करूँ। परमेश्वर की रचना होने के नाते, यह मेरा कर्तव्य है कि मैं परमेश्वर की बात सुनूँ, उसके प्रबंधन का पालन करूँ, उसने जो कुछ मुझे सौंपा है, मैं उन दायित्वों को व्यवस्थित ढंग से निभाऊँ। यह मेरा कर्तव्य और लक्ष्य है जिससे मैं जी नहीं चुरा सकती। मैं यहाँ परमेश्वर से आने वाली हर चीज़ को स्वीकार करने, उसका पालन करने का संकल्प लेती हूँ। मैं उन तमाम लोगों, घटनाओं, चीज़ों और परिस्थितियों में सत्य खोजने, परमेश्वर की इच्छा को ग्रहण करने, और परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार अमल करने का संकल्प लेती हूँ। भविष्य में, मेरे कर्तव्य के निर्वाह में, चाहे कैसे भी दायित्व मिलें या कोई भी परिस्थिति आए, चाहे मेरी धारणाओं से वे कितने भी अलग हों, मैं उन्हें स्वीकार करने और उनका पालन करने के लिये तैयार रहूँगी। मैं मन-आत्मा और बुद्धि से अपने कर्तव्य का निर्वाह करूँगी। मैं सच्चे मन से परमेश्वर का आज्ञापालन करने उसकी प्रशंसा प्राप्त करने की कोशिश करूँगी।

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