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एक पथभ्रष्ट मनुष्य का रूपान्तरण

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टोंग ज़िन फ़ुजियान प्रांत

मैं देहात में पैदा हुआ था। मैं सीधे-सादे किसानों के खानदान से था, ऊपर से हमारे परिवार जनों की संख्या कम थी, इसलिए हमें प्रायः डराया-धमकाया जाता था। जब मैं 13 वर्ष का था, तो हमारे गाँव के बाहर के किसी व्यक्ति ने एक बच्चे को पीट दिया था। गाँववालों ने मेरे पिता पर इसे भड़काने का झूठा आरोप लगाया और उन्होंने कहा कि वे हमारे घर की तलाशी लेंगे और हमारी संपत्ति को जब्त कर, हमारे सूअरों को ले जायेंगे, यहाँ तक कि मेरे पिता को भी पीटेंगे। एक बार तो एक गाँववाला हमारा मछली पकड़ने का जाल ले गया और उसे अपना कह कर रख लिया। जब मेरे पिता इसे वापस लेने गए, तो गाँव वाले ने, अपनी ताक़त और प्रभावके दम पर, मेरे पिता को मार। मेरे पिता को अपमान का घूंट पीकर माफ़ी मांगनी पड़ी क्योंकि वे जानते थे कि उनके पास न तो पैसा है और न ही ताक़त। मेरी माँ ने मेरे भाइयों से और मुझ से कहा कि भविष्य में हम स्वयं के लिए अवश्य लड़ें, और कभी भी इस तरह के दमन का जीवन नहीं जीयें। युवा जोश और समाज के अन्याय से घृणा के कारण, मैंने यह निश्चित कर लिया था कि भविष्य में मैं भीड़ से अलग दिखाई दूँगा और उनका सम्मान अर्जित करूँगा, और कभी भी नहीं दबूँगा। इसलिए मैंने बहुत मेहनत से पढ़ाई की, किन्तु मैं दिमाग से उतना तेज़ नहीं था, मुझे किसी भी विश्वविद्यालय में दाखिला नहीं मिला, इसलिए मैंने सेना में कैरियर बनाने की कोशिश की और संपर्कों के माध्यम से आसानी से उसमें शामिल हो गया।

जब मैं पहली बार सेना से जुड़ा, तब मैंने सभी कठिन और मलिनता से भरे कार्यों को सँभालने और अपने अधिनायकों को प्रभावित करने के लिये मैं आगे बढ़कर काम करने में दिलचस्पी दिखाने लगा और भविष्य में तरक्की पाने के लिए संघर्ष करने लगा। लेकिन, मेरे कठोर प्रयासों के बावजूद, मुझे सैन्य-दल के अधिनायक का पद तक नहीं मिल सका। मेरे फटेहाल कपड़ों और मितव्ययता की वजह से मेरे साथी लगातार मेरा मज़ाक उड़ाते थे, मुझेडराते-धमकाते थे, जिसने अलग दिखने की मेरी इच्छा को अधिक तीव्र ही किया। बाद में, गाँव के मेरे साथी की सलाह से मुझे पता चला कि सेना में मूल्यांकन और पदोन्नति कड़ी मेहनत पर निर्भर नहीं करती , बल्कि उपहार देने पर निर्भर करती है। भले ही मुझे लगता था कि इस प्रकार की चीज़ घृणित है, फिर भी मुझे पदोन्नति पाने के एकमात्र मार्ग को तो अपनाना ही था। इसलिए, मैंने अपने अधिनायकों को उपहार देने और संपर्क बनाने के लिए अपनी समस्त बचत लगा देने का फैसला किया; आख़िरकार मैं सैन्य अकादमी में भरती होने में समर्थ हो गया। किन्तु स्नातक होने के बाद, मुझे कैंटीन में खाना बनाने का काम सौंपा गया क्योंकि मेरे पास उपहार देने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं थे, और बाद में मैं एक क्वार्टरमास्टर बन तो गया, लेकिन केवल नाम के लिए। कई वर्षों के सैन्य जीवन के बाद, मैं समझ गया कि नौकरशाह उपहार देने वालों को कभी अनुशासित नहीं करते हैं और आप उनके जूतों को चाटे बिना कुछ भी नहीं कर सकते हैं। यदि आप पैर जमाए रखना चाहते हैं, तो आपको पैसा बनाने और उपहार देने के हर तरीके आज़माने होंगे, अन्यथा आप कुछ भी हासिल नहीं पाएँगे, चाहे आपकी योग्यताएँ कितनी ही बड़ी क्यों न हों। अपनी आकांक्षाओं को प्राप्त करने के लिए, मैंने हर जगह से पैसे बनान और धन जुटाना आरंभ कर दिया: मैं खाने-पीने का सामान ख़रीदते समय जानबूझ कर ज्यादा भाव और मात्रा बढ़ा-चढ़ा कर बताता, और थोड़ा ऊपर का पैसा बना लेता; अन्य क्वार्टरमास्टर्स को चावल बेचता देखकर, मैंने सेना का चावल से भरा एक ट्रक चुपके से बेच दिया और कई हजार युआन कमाए, और इसी तरह के काम करता रहा। मैं बचपन से ही यीशु में विश्वास करता था और स्पष्ट रूप से जानता था कि ये काम जो मैं कर रहा हूँ, वे अपराध हैं, मैं लगातार चिंतित भी रहता था कि किसी दिन मेरे गोरखधंधों के बारे में पता चल जाएगा और मुझे सज़ा हो जाएगी। पदोन्नति पाने की इच्छा मेरी अंतरात्मा के विरुद्ध इन चीजों को करने के लिए मुझे प्रेरित करती थी। एक बार जब मैंने कुछ पैसे बचा लिए, तो मैंने अपने अधिनायकों की चापलूसी करनी शुरू कर दी और उन्हें उनकी पसंद का उपहार देने की पेशकश की। हर बार जब भी कोई अधिनायक मुझसे मिलने आता तो मैं उसके साथ पीने चला जाता और गीत गाने वेश्याओं के संपर्क में रहने में खुद को डुबो देता था...। मैंने उनका अनुग्रह प्राप्त करने के लिए हर संभव काम किया। मैंने प्रत्येक संभव तरीके से उनकी चापलूसी करने की कोशिश की। जब भी अधिनायकों को कुछ सहायता की आवश्यकता होती थी, तो मैं अपनी सेवाएँ पेश करने में तत्पर रहता था। जिस किसी के साथ भी अधिनायकों के साथ अच्छे रिश्ते थे, उसके करीब आकर मैं एक सकारात्मक अनुशंसा प्राप्त करने की कोशिश करता। उन वर्षों के दौरान, इस प्रकार के सांसारिक फ़लसफों का सहारा लेकर मैं शीघ्र ही बटालियन कमांडर के पद पर पहुँच गया। मैं अंततः भीड़ से ऊपर उठ गया और मैं शान से घर लौट सकता था! उसके बाद, हर बार जब मैं घरजाता, तो गाँव के लोग मेरे चारों ओर जमा हो जाते, चापलूसी करते और मेरा अभिनंदन करते थे, जो मेरे घमंड को बहुत संतुष्ट करता था। तब मेरी महत्वाकांक्षाएँ और मेरी अभिलाषाएँ बढ़ गईं। जैसा कि लोग कहते हैं, "इंसान अच्छे भोजन और कपड़ों के लिये अधिकारी बनता है," "ताक़त उपयोग किए जाने के लिए है इससे पहले यह चली जाए" और "ऐसा कोई अधिकारी नहीं है जो भ्रष्ट न हो।" इसलिए, मैंने एक अधिकारी के विशेषाधिकार का आनंद लेना आरंभ कर दिया। जहाँ भी मैं जाता था, मुझे मुफ्त में चीज़ें मिलती थीं, और यदि कोई मुझसे सहायता माँगता, तो मैं उससे उपहार के लिए कहता और यदि उपहार पूरे नहीं होते थे तो मैं उनकी सहायता नहीं करता था। मैं मँहगे भोजन और कपड़ोंके पीछे भागने लगा, और नकचढ़ों की तरह व्यवहार करना शुरू कर दिया था। इस बात के दम पर कि मैं सेनापति और राजनैतिक कमिसार या विभागाध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण अधिनायकों के साथ से घिरे एक "सबसे पसंदीदा बालक" की तरह हूँ, मैं इतना अहंकारी हो गया कि मैं अपने ताक़तवर संबंधों पर इतराते हुए लोगों को डराता-धमकाता था, इन अधिनायकों के नाम पर अपने अधीनस्थों से उपहारों की मांग करता था। इसी तरह एक साधारण ईसाई देहाती लड़के से एक लालची, धोखेबाज और अहंकारी व्यक्ति के रूप में मेरा पतन हो गया।

भ्रष्ट और पतित हो कर, मैं अपनी भयानक प्रकृति को दूसरों पर भी थोपा करता था। मुझे प्रायः बिना किसी ठोस कारण के संदेह होता था कि मेरी सुंदर पत्नी जो एक विदेशी कंपनी में कार्य करती थी, उसका किसी के साथ प्रेम संबंध है; इससे हमारे बीच झगड़ा और अलगाव बढ़ गया। 2006 में, मेरी पत्नी बहुत दुःखी हो गई और उसने तलाक की पहल कर दी; मेरे लिए ये एक बड़े अपमान की बात थी, इसलिए मैं इससे सहमत नहीं हुआ। देर रात में मैं प्रायः अपने जीवन के बारे में सोचता था। मैंने मन में सोचा: मैं बचपन से ही अलग दिखने के लिए संकल्पित रहा हूँ, मैं और मेरी पत्नी दोनों अपने-अपने कैरियर में सफल रहे हैं। हमारे घर की परिस्थितियाँ हर तरह से अच्छी हैं, अन्य लोग हमसे ईर्ष्या करते हैं, तो मैं ऐसी पीड़ा में क्यों रह रहा हूँ, और यह स्थिति क्यों आ गई है कि मेरी पत्नी मुझे तलाक देना चाहती है? यहाँ तक कि हमारा बेटा भी हमारे साथ भुगत रहा है। क्या मेरा जीवन वैसा है जैसा मैं चाहता हूँ? मैं वास्तव में किसके लिए जी रहा हूँ? जब मैं हारा हुआ और भ्रांत महसूस कर रहा था, तभी मेरी पत्नी ने अंत के दिनों के सर्वशक्तिमान परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार कर लिया। बहनों और भाइयों के साथ लगातार सभाओं और संगति के माध्यम से, वह अधिकाधिक आशावादी हो गई, उसने मेरे साथ बहस करना बंद कर दिया, और फिर कभी तलाक की बात नहीं की। इसके बजाय, वह सुसमाचार का उपदेश देने और अपने कर्तव्य को पूरा करने में व्यस्त हो गई। बाद में, अपनी पत्नी और माँ से प्रेरित हो कर, मैंने भी सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास रखना शुरू कर दिया।

कलीसियाई जीवन के कारण, मैं समझ गया कि परमेश्वर पवित्र और धार्मिक है, वह मनुष्यों की गंदगी और भ्रष्टता से सर्वाधिक घृणा करता है। मैंने उन गंदे तरीकों पर विचार किया जो मैंने सेना में रहते हुए अपना लिये थे, मैंने सोचा यदि मैंने अपने पुराने स्वभाव को नहीं बदला तो मैं परमेश्वर द्वारा संभवत: बचाया नहीं जा सकता हूँ, इसलिए मैंने बेसब्री से परमेश्वर के वचनों को पढ़ना शुरू कर दिया, यह आशा करते हुए कि एक दिन मैं उन में कोई समाधान पा लूँगा। एक दिन, मैंने परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ा: "ऐसी गन्दी जगह में जन्म लेकर, मनुष्य को समाज के द्वारा बुरी तरह हानि पहुँची है, वह सामंती नैतिकता से प्रभावित हो चुका है, और उन्हें 'उच्च शिक्षा के संस्थानों' में सिखाया गया है। पिछड़ी सोच, भ्रष्ट नैतिकता, जीवन पर मतलबी दृष्टिकोण, तिरस्कार-योग्य दर्शन, बिल्कुल बेकार अस्तित्व, भ्रष्ट जीवन शैली और रिवाज—इन सभी चीजों ने मनुष्य के हृदय में गंभीर रूप से घुसपैठ की है, और उसकी अंतरात्मा को बुरी तरह खोखला कर दिया है और उस पर गंभीर प्रहार किया है। फलस्वरूप, मनुष्य परमेश्वर से और अधिक दूर हो गया है, और परमेश्वर का और अधिक विरोधी हो गया है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता में होना है")। परमेश्वर के वचनों ने मेरे हृदय की गहराइयों के रहस्यों को उजागर कर दिया था; इसने मुझे बुरी तरह से झकझोर दिया था। सेना में सेवा करने के उन वर्षों में, मैंने अलग दिखने के लिए दुनिया के "अनकहे नियमों" का पालन किया था। मैंने ऐसे कई काम किए थे जो मेरी अंतरात्मा पर बोझ थे। मैं बेईमानी से प्राप्त कमाई से धनी हो गया था, एक अंधकारमय और भ्रष्ट जीवन जी रहा था—मैं लगातार पाप में लिप्त रहता था किन्तु मुझे कोई शर्म महसूस नहीं होती थी। फिर, परमेश्वर के वचनों से मैं न केवल अच्छे-बुरे में भेद कर पाया, बल्कि अपने पतन और भ्रष्टता के मूल को भी साफ़ तौर पर देख पाया। मुझे पता चला कि ये आफ़तें शैतान से आयी थीं। यह शैतान था जिसने इस देश को बुराई और क्रूरता के दलदल में बदल दिया था जहाँ शक्तिहीन, ईमानदार लोगों का दमन किया जाता था और वे जीवित रहने के लिए संघर्ष करते थे जबकि शक्तिशाली, प्रभावशाली और अत्याचारी समृद्धि पाते थे। इस समाज में निम्न प्रकार के विधर्म और भ्रम भरे थे" हर कोई अपने लिए बाकियों को शैतान ले जाये," "एक अधिकारी उपहार देने वालों के लिए चीज़ों को आसान बना देता है," "उनके तलवे चाटे बिना तुम कुछ हासिल नहीं कर सकते" "कुछ अधिकारी बस सर्वश्रेष्ठ की ताक में रहते हैं, जनता की नहीं," "जब तक है तब तक ताकत का इस्तेमाल कर लो, क्योंकि एक बार ये चली गई तो तुम ऐसा नहीं कर पाओगे" इत्यादि। मैं इन भयानक बातों के झाँसे में आ गया था, और अपने आस-पास के उत्पीड़न के कारण मैंने अपना मार्ग गँवा दिया, मानवीय सिद्धांतों को त्याग दिया, अनैतिकता से उच्च पदों को पाने की कोशिश की, और पाप के दलदल में धँस गया था। मैं अंततः एक दुष्ट इंसान बन गया था जो धन के अलावा और कुछ नहीं चाहता था, निजी लाभ के लिए सामर्थ्य का दुरुपयोग करता था, और सार्वजनिक निधियों का गबन करता था। परमेश्वर के वचनों के न्याय से, मैंने परमेश्वर का प्रचंड क्रोध और उसकी पवित्रता को देखा, और समझ गया कि उसके धार्मिक स्वभाव का अपमान करने की अनुमति नहीं है। मुझेअपने बुराई के कार्यों पर पछतावा हुआ और मेरा हृदय भय से भर गया। मुझे लगा कि यदि समय पर परमेश्वर ने मुझे बचाया और बुराई के दलदल से खींचा नहीं होता, तो जो मैंने किया था उसके लिए परमेश्वर द्वारा मुझे शाप दिया और दंडित किया जाता। पुनः प्रकाश देखने, और मानवीय सिद्धांतों को समझने देने के लिए परमेश्वर का धन्यवाद। तब से, मैंने उन कामों को फिर कभी नहीं किया जो परमेश्वर के नाम को शर्मिंदा करते थे।

जैसे-जैसे मैंने सत्य को अधिकाधिक समझा, मैंने परमेश्वर से अधिक और गहरे उद्धार का अनुभव किया। 2009 में, मैं 20 वर्ष तक सेना में कार्य कर चुका था। राष्ट्रीय नियमों के अनुसार, मुझे बाहर जाने की और अपने दम पर काम ढूँढने की अनुमति दी गई थी। मैंने बुराई से दूर रहने और नेकी करने का दृढ़ संकल्प लिया था, इसलिए मैंने सेना को छोड़ दिया और नागरिक कार्यों में स्थानांतरित होने का फैसला किया, और अपने हृदय और आत्मा को परमेश्वर के कार्य करने में लगा दिया। हालाँकि, मेरे अधिनायक ने मुझे सेना में टिके रहने के लिए समझाने का प्रयास किया और मुझसे इस पर अच्छी तरह से विचार करने के लिए कहा, और एक अन्य उच्च पद वाले अधिनायक ने मुझसे वादा किया कि यदि मैं कड़ी मेहनत करता रहा तो मुझे पदोन्नति देकर डिप्टी रेजिमेंटल कमांडर बना दिया जाएगा। मैं थोड़ा-सा झिझका—यही वह अवसर था जिसके लिए मैं दिन-रात लालायित रहता था! मैं उस पद के विचार को दिमाग से नहीं निकाल पा रहा था, इसलिए मैंने परमेश्वर से सहायता माँगी और प्रार्थना की, "हे परमेश्वर, एक उच्च पद पाने का हमेशा मेरा सपना रहा है। अब मेरे पास यह अवसर है और मैं नहीं जानता कि कैसे चयन करूँ। तू मुझे प्रबुद्ध कर और मेरा मार्गदर्शन कर!" बाद में मैंने परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचा, "यदि तुम उच्च पद वाले, आदरणीय प्रतिष्ठा वाले, प्रचुर ज्ञान से सम्पन्न, विपुल सम्पदा के मालिक हो, और कई लोगों के द्वारा समर्थित हो, फिर भी ये चीज़ें तुम्हें परमेश्वर के आह्वान और परमेश्वर के आदेश को स्वीकार करने, जो कुछ परमेश्वर तुम से कहता है उसे करने के लिए, उसके सम्मुख आने से नहीं रोकती हो, तब तुम जो कुछ भी करोगे वह पृथ्वी पर सर्वाधिक महत्वपूर्ण होगा और मानवजाति में सर्वाधिक धर्मी होगा। यदि तुम परमेश्वर के आह्वान को अपनी हैसियत और लक्ष्यों के वास्ते अस्वीकार करोगे, तो तुम जो कुछ भी करोगे वह श्रापित हो जाएगा और यहाँ तक कि परमेश्वर द्वारा भी तिरस्कृत किया जाएगा" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियन्ता है")। "लोग पृथ्वी पर आते हैं और मेरे सामने आ पाना दुर्लभ है, और सत्य को खोजने और प्राप्त करने का अवसर भी दुर्लभ है। क्यों नहीं तुम लोगों को इस खूबसूरत समय को इस जीवन में अनुसरण करने का सही मार्ग मान कर महत्त्व देना चाहिए?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "युवा और वृद्ध लोगों के प्रति वचन")। परमेश्वर के हर वचन ने मेरी अंतरात्मा पर प्रहार किया, और मैं अपनी झिझक से जाग गया था। मेरे पास देहधारी परमेश्वर के धरती पर कार्य को देखने का सौभाग्य और सत्य की तलाश और परमेश्वर के लिए कार्य करने का अनमोल अवसर था। परमेश्वर की ओर से कितना बड़ा उत्कर्ष और अनुग्रह है यह! सृष्टा के लिए कार्य करने की अपेक्षा दुनिया में कौन-सी जीवन-वृत्ति अधिक अर्थपूर्ण हो सकती थी? यहाँ तक कि यदि आप उच्चतम पद पर भी होते और सर्वोच्च अधिकारी होते, किन्तु यदि आप परमेश्वर को नहीं जानते और आपने अपने स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं किया होता, तो आपको अंततः परमेश्वर द्वारा दंडित किया जाता। इसलिए प्रतिष्ठित पदों में बहुत से लोग महाविपदा में पड़ गए थे और उनकी असामयिक मृत्यु हो गई थी, कितने ही उच्च-पदस्थ अधिकारियों का बदनामी में डूबकर भयानक अंत हो गया था। जहाँ तक मेरी बात है, मैंने एक अधिकारी के रूप में अलग से दिखने के लिए भरपूर संघर्ष और प्रयास किया, जिसके परिणामस्वरूप मैंने स्वयं को इस हद तक बर्बाद कर लिया कि मैं बदनाम और गंदा हो गया था, और एक ऐसे व्यक्ति का जीवन बिताता था जो नाममात्र के लिए ही मनुष्य था। फिर परमेश्वर मुझे ग़लत मार्ग से वापस ले आया और मुझे एक मानवीय जीवन का मार्ग स्पष्टता से दिखाया। मैं अभी भी उन जोखिमों को उठाना और अपने पुराने तरीकों पर वापस लौटना कैसे चुन सकता था? मेरी ज़िंदगी का पूर्वार्द्ध शैतान की यंत्रणा और चालबाजी के अधीन था और मेरे लिए बहुत पीड़ा लाया था। जीवन के उत्तरार्द्ध में शैतान के लिये मुझे दास बनाना, मेरा शोषण करना और मुझे भ्रष्ट करना संभव नहीं था। मुझे जीवन जीने के अपने तरीके को बदलना, स्थिरतापूर्वक परमेश्वर का अनुसरण करना, सत्य को खोजने के मार्ग पर चलना, और एक सार्थक जीवन जीना था। इसलिए मैंने अपने दम पर एक नौकरी ढूँढने और सेना को पूरी तरह से छोड़ने का दृढ़ संकल्प लिया। लेकिन, शैतान की ओर से मेरी भ्रष्टता बहुत गहरी थी, इसलिए अलग से दिखने और एक महत्वपूर्ण व्यक्ति होने का उसका ज़हरीला विचार गहराई से मेरे हृदय में जड़ जमाए हुए था और प्रायः मुझे सही मार्ग पर चलने से रोकता था। मुझे जीवन में सही मार्ग पर ले जाने के लिए परमेश्वर ने मेरा न्याय करने और मुझे शुद्ध करने के कार्य को और भी अधिक किया, और मुझे परमेश्वर से और भी अधिक उद्धार प्राप्त हुआ।

कुछ समय तक कलीसिया में अपना कर्तव्य पूरा करने के बाद, मैंने देखा कि कलीसिया के कुछ अगुआ काफी युवा थे और उनमें से एक मेरा दोस्त रहा था, जिससे मुझे असहज महसूस हुआ। मैंने सोचा: लौकिक दुनिया में तुम लोगों में से कोई भी मेरे जितने ऊँचे पद पर नहीं था, किन्तु कलीसिया में तुम सबकी वर्तमान स्थिति मुझ से ऊँची है। यदि तुम लोग अगुआ बनने में सक्षम हो, तो मैं और भी अधिक सक्षम हूँ! इसलिए मैंने इस खोज में कड़ी मेहनत की; मैं परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के लिए हर सुबह पाँच बजे उठ जाता था, और मैंने अपने लिए लक्ष्य निर्धारित किए—हर दिन कम-से-कम दो घंटों तक प्रवचन और जीवन में प्रवेश करने की संगति को सुनना, हर सप्ताह तीन गीत सीखना और परमेश्वर के वचन के सभी गीतों को सीखने की योजना बनाना। मैंने कलीसिया में अपने कर्तव्य को करने के लिए और भी कड़ी मेहनत की। अगर कलीसिया में कोई काम ऐसा होता था जिसे मैं निपटाने में सक्षम था, मैं इस बात की परवाह नहीं करता था कि यह कितना कठिन या थकाने वाला है, मैं इसे करने के लिए दौड़ पड़ता था। इस बीच, मैं बहनों और भाइयों के सामने सेना में अपने अनुभव और कौशल की शेखी बघारता, कलीसिया के अगुआओं के संवाद पर नाक-भौंह सिकोड़ता था या जिस तरह से वे मुद्दों को सुलझाते या समस्याओं को निपटाते थे उसे बड़ी सफ़ाई छोटा करके बताता था। इस तरह, प्रसिद्ध होने के लिए संघर्ष करते हुए, जितनी जल्दी हो सके कलीसिया में एक आधिकारिक पद प्राप्त करने की आशा से, मैं सीधे आगे बढ़ता गया। 2011 में, मुझे अंततः कलीसिया में एक अगुआ के लिए चुन लिया गया जैसा कि मैंने अपेक्षा की थी। मैं बहुत उत्साहित था और मैं दूसरों को प्रभावित करने के लिए बहुत-सी चीजों को करने और अपने आप को अलग दिखाने के लिए तैयार था। हालाँकि, मेरी पत्नी ने मुझे कई बार याद दिलाया था कि मैं दूसरों की अगुआई करने के लिए उपयुक्त नहीं हूँ और सुझाव दिया कि मैं त्यागपत्र दे दूँ। मेरे पास त्यागपत्र देने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। मैंने एक बहन को अगुआ के रूप में अनुशंसित किया। हालाँकि, मैंने अपने हृदय में इसे स्वीकार नहीं किया। कुछ समय बाद, मुझे पता चला कि अगुआ जिस तरह से समस्याओं के साथ निपट रही थी उसमें कुछ कमियाँ थी, और मेरी महत्वाकांक्षा ने एक बार फिर अपना सिर उठा लिया। मैंने परोक्ष रूप से उसे सुझाव दिया कि वह दोष स्वीकार कर ले और त्यागपत्र दे दे, जो मुझे अगले चुनाव में चुने जाने का अवसर देता। हालाँकि, जिन बहनों और भाइयों ने इसे सुना उन्होंने यह कहते हुए मेरा विश्लेषण किया, कि मैं बहुत चालाक और महत्वाकांक्षी हूँ, औ मैं हमेशा कलीसिया का नियंत्रण लेना चाहता था, इसलिए उन्होंने समूह के अगुआ के मेरे पद से मुझे बर्खास्त कर दिया। मैं इसे स्वीकार नहीं सका। मैं इतना सक्षम व्यक्ति था; ऐसा कैसे हो सकता है कि मैं एक समूह के अगुआ बनने के लिए भी उपयुक्त नहीं हूँ! महीनों तक, मैं अपने हृदय में बहुत असंतुष्ट रहा, मैं अपने बहनों और भाइयों से खुश नहीं था, इसलिए मैं सभाओं में बहुत नहीं बोलता था। मेरी आत्मा अंधकार से भरी थी और मैं परमेश्वर को खोज नहीं पा रहा था। इस पीड़ा के बीच में, मुझे अंधकार से बाहर निकालने के लिए मैंने परमेश्वर से विनती की। और एक दिन, मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े, "आज, मनुष्य के अनुभव में, परमेश्वर के कार्य का हर एक कदम उसकी धारणाओं पर जवाबी हमला करता है, और सभी मनुष्य की बुद्धि से परे और उसकी अपेक्षाओं से बाहर रहते हैं। परमेश्वर वह सब कुछ प्रदान करता है जिसकी मनुष्य को आवश्यकता होती है, और हर दृष्टि से यह उसकी धारणाओं से असंगत है। ...तुम्हारी धारणाओं पर जवाबी हमला करके, वह तुमसे परमेश्वर के व्यवहार को स्वीकार करवाता है; केवल इस तरह से ही तुम अपने आप को अपनी भ्रष्टता से मुक्त कर सकते हो" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "केवल वे लोग ही परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं जो परमेश्वर को जानते हैं")। "यदि तू अब आज्ञापालन नहीं करती है, तो अंत में तुझे शाप दिया जाएगा—क्या तब तू खुश होगी? तू जीवन के तरीके पर ध्यान नहीं देती है बल्कि केवल अपनी हैसियत और उपाधि पर ध्यान केंद्रित करती है; तेरा जीवन किस प्रकार का है? ...तू व्यक्तिगत रूपान्तरण का अनुकरण करने और प्रवेश करने पर ध्यान केन्द्रित नहीं करती है; तू हमेशा उन अनावश्यक अभिलाषाओं और उन चीजों पर ध्यान केंद्रित करती है जो परमेश्वर के लिए तुम्हारे प्रेम को बाधित करती हैं और तुझे उसके करीब आने से रोकती हैं। क्या वे चीजें तुझे रूपान्तरित कर सकती हैं? क्या वे तुझे राज्य में ला सकती हैं?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "तुम लोग एक विषमता होने के इच्छुक क्यों नहीं हो?")। परमेश्वर के न्याय के कठोर वचनों ने मेरे दिल को वेध दिया, मुझ विद्रोही को शर्मिंदा और लज्जित कर दिया। तब तक मुझे नहीं पता था कि हाल ही में मेरे साथ जो कुछ भी हुआ था, वह भले ही वैसा नहीं था जैसा मैं चाहता था, लेकिन उसका अर्थ यह नहीं था कि लोग सिर्फ मुझे तंग कर रहे थे। बल्कि, वे परमेश्वर की ओर से सिर्फ मेरा उचित न्याय थे, और उसके द्वारा मेरा समय पर उद्धार थे। उस समय परमेश्वर का कार्य लोगों के पुराने विचारों और दृष्टिकोणों को बदलने के, उन्हें शैतान के प्रभाव से बचाने के प्रयोजन से, और इस प्रयोजन से था कि एक उज्ज्वल जीवन जीने के लिए वे परमेश्वर से सत्य और जीवन प्राप्त करें। मैंने सही मार्ग नहीं लिया और सत्य को अपने जीवन के रूप में प्राप्त करने की कोशिश नहीं की, किन्तु हैसियत और प्रसिद्धि का पीछा किया, और यहाँ तक कि मैंने चालें भी चलीं और षड़यंत्र रचे, जो कि एक अधिकारी और एक महत्वपूर्ण व्यक्ति बनने की कोशिश से कोई भिन्न नहीं थे। क्या यह परमेश्वर के कार्य और मानवजाति को बचाने की उसकी इच्छा के विरुद्ध नहीं था? यदि मैं इनका पीछा करता रहता हूँ तो मैं सत्य को कैसे प्राप्त कर सकता हूँ और एक सार्थक जीवन कैसे जी सकता हूँ? यदि मैं वापस नहीं लौटा होता, तो क्या इसने मुझे बर्बाद नहीं कर दिया होता और परमेश्वर के अपना कार्य पूरा कर लेने पर मुझे उसके द्वारा सज़ा का भागी नहीं बना दिया होता? मुझे ग़लत मार्ग पर जाने से रोकने के लिए, अनुसरणों के मेरे दोषपूर्ण विचारों को ठीक करने के लिए और मुझे वापस लौटाने के लिए, मेरे चारों ओर जो लोग थे उनके माध्यम से, परमेश्वर ने मेरे पहलुओं में काँट-छाँट की और मेरे साथ "कठोरतापूर्वक" निपटा, मेरी हैसियत मुझसे ले ली, और मेरी महत्वाकांक्षाओं और अभिलाषाओं के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। तब परमेश्वर का धार्मिक और पवित्र स्वभाव मेरी समझ में आया, और यह समझ में आया कि मेरे इरादे, प्रेरणाएँ, और यहाँ तक कि हर एक विचार और क्रिया भी उसकी निगरानी के अधीन है। परमेश्वर ने मेरा सबसे वास्तविक उद्धार उसी समय में किया था जब उसने अपने प्रताप का प्रदर्शन किया था। परमेश्वर द्वारा उद्धार के अनुग्रह को पहचानने के बाद, मैंने स्वयं को किसी पद की हानि में उलझने नहीं दिया, और मुझमें सत्य की खोज करने की इच्छा थी। परमेश्वर मुझे इतना प्यार करता था कि उसने मुझे बचाने का प्रयास किया, इसलिए मैं उसे निराश नहीं कर सकता था। मुझे परमेश्वर की व्यवस्थाओं का पालन करना था, और इस बात की परवाह किए बिना कि मैं कोई अगुआ हूँ या कोई साधारण व्यक्ति, मुझे सत्य की खोज करनी चाहिए और अपने कर्तव्य को यथा संभव अच्छी तरह से करना चाहिए।

छ्ह महीने बाद, कलीसिया के एक अगुआ ने मेरे कलीसिया जीवन को जारी रखने के लिए एक अन्य कलीसिया में व्यवस्था कर दी। इस समय उस कलीसिया के अगुआओं का चयन किया जा रहा था। जब मुझे पता चला कि मैंने सभी बहनों और भाईयों की अपेक्षा अधिक समय तक परमेश्वर में विश्वास किया है, तो मुझे बहुत खुशी हुई और मैंने सोचा: अब मेरा अवसर आया है। मैं अंततः एक अगुआ के रूप में अपनी योग्यताओं को दिखा सकता हूँ। आख़िरकार, मेरे पास ज़िंदगी का अनुभव अधिक है और मैं उनसे पहले से परमेश्वर पर विश्वास कर रहा हूँ। पद के लिए मैं सबसे अच्छा व्यक्ति हूँ। जब मैं स्वयं को उनके सामने अच्छी तरह से प्रस्तुत करने की तैयारी कर रहा था, तभी पिछली कलीसिया की एक बहन को चुनाव में शामिल होने के लिए स्थानांतरित कर दिया गया। मुझे डर था कि वह पद के लिए मेरी मुठभेड़ के घोटाले की स्थिति को प्रकट कर देगी, जो मेरे लिए एक शर्मिंदगी होगी, इसलिए मुझे अपनी प्रारंभिक योजना को छोड़ना पड़ा। मैंने एक समूह के अगुआ के रूप में चुने जाने का प्रयास करने और उसके बाद कदम दर कदम अपना मार्ग तैयार करने का निर्णय लिया। मैंने यह कल्पना नहीं की थी कि मुझे एक समूह के अगुआ के रूप में नहीं चुना जाएगा, बल्कि इसके बजाय मुझे कुछ मामूली कार्य करने के लिए चुना जाएगा जिसमें बहनों और भाईयों को परमेश्वर के वचनों की किताबें बाँटनी थी। मैं, एक प्रतिष्ठित बटालियन कमांडर, छोटे-छोटे कार्यों को करते हुए इधर-उधर दौड़ रहा था। मुझे यह स्वीकार करना मुश्किल लग रहा था। हालाँकि, परमेश्वर के न्याय और ताड़ना से गुज़रने के बाद, मैं समझ गया था कि यह परमेश्वर के नियम और उसकी व्यवस्थाओं में से था। परमेश्वर हैसियत का पीछा करने की मेरी अभिलाषा से निपट रहा था, इसलिए मैंने स्वयं को त्याग दिया और आज्ञापालन किया। हालाँकि, शीघ्र ही वह स्थान जहाँ मैं बैठकों में भाग लेता था पुलिस द्वारा पहचान लिया गया, इसलिए कलीसिया ने मेरे लिए दो अन्य बहनों के साथ कहीं अन्यत्र मिलकर सभा करने की व्यवस्था की। जहाँ तक कलीसिया के अगुआ की बात है, वह हमारे लिए सिंचाई के अपने कर्तव्य को करने के लिए बहुत बार नहीं आ सकती थी क्योंकि वह चीन की कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा सताई जा रही थी। उस समय, मैं इसे अब और सहन नहीं कर सकता था: छोटे-मोटे कार्य करने के अलावा, मुझे कमज़ोर क्षमता वाले उन बुजुर्गों के साथ मिलना पड़ता था। मैं इस जगह पर कैसे आया? जितना अधिक मैं इसके बारे में सोचता था, मुझे उतना ही अधिक बुरा लगता था। यहाँ तक कि मुझे यह भी महसूस होता था कि जीवन जीने योग्य नहीं है। पीड़ा में, मैंने परमेश्वर से दिल से प्रार्थना की और उससे उसकी प्रबुद्धता मांगी। एक दिन, मैंने परमेश्वर के वचनो को पढ़ा जिसमें कहा गया था कि, "आज के पथ पर खोज के लिए सबसे उपयुक्त तरीका क्या है? अपनी खोज में तुम्हें किस व्यक्ति के रूप में स्वयं को देखना चाहिए? तुम्हें पता होना चाहिए कि जो कुछ अभी तुम्हारे साथ घटित हो रहा है उसे कैसे सँभाला जाए, चाहे वे परीक्षाएँ हों या पीड़ा, बेरहम ताड़ना हो या अभिशाप, इन सब के प्रति तुम्हें सतर्क ध्यान देना चाहिए" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "वे जो कुछ भी सीखते और जानते नहीं: क्या वे पशु नहीं हैं?")। परमेश्वर के वचनों से, मैं समझ गया कि मैं अपनी अहंकारी शैतानी प्रकृति से प्रेरित था, परमेश्वर की इच्छा से भटक गया था, और प्रसिद्धि और पदों का पीछा करने के ग़लत मार्ग पर चला गया था। परिणामस्वरूप, मैंने केवल उन "आधिकारिक खिताबों" वाले कर्तव्यों को ही महत्वपूर्ण माना और अन्य कर्तव्यों को तुच्छ समझा, और यहाँ तक कम योग्यता वाले उन बहनों और भाईयों से भी इसलिए घृणा की क्योंकि मुझे लगता था कि उनके साथ होने से मेरी हैसियत कम हो गई है। हैसियत, प्रसिद्धि और सम्पत्ति ने मुझे अहंकारी बना दिया था। हालाँकि, मुझे नहीं पता था कि परमेश्वर के घर में, सभी कर्तव्य बराबर थे, और मेरी बहनें और भाई और साथ ही मैं सभी समान हैसियत वाले प्राणी थे। सांसारिक दुनिया में मेरी ऊँची हैसियत कभी भी उस तथ्य को नहीं बदल सकती थी। इस बारे में सोचकर, मुझे बहुत राहत मिली। हालाँकि, मुझे पता था कि प्रसिद्धि और हैसियत मेरी घातक कमजोरियाँ थीं, इसलिए मैं इस मुद्दे को हल करने हेतु अधिक सत्य की तलाश करने के लिए परमेश्वर से प्रार्थना करता था। बाद में, जीवन में प्रवेश करने के बारे में संगति देने वाले कुछ उपदेश को सुना, जिसमें कहा गयाथा: "तुम्हारी राय में, क्या लोगों के लिए पदों को धारण करना और उन्हें प्यार करना महत्वपूर्ण है? तुम्हें हैसियत और प्रसिद्धि को स्पष्ट रूप से देखना चाहिए और उनके प्रति उदासीन होना चाहिए। वे खोखली और व्यर्थ हैं। एक उच्च पद आशीष की गारंटी नहीं देता है। यदि तुम्हारा स्वभाव अच्छा नहीं है, तो एक उच्च पद तुम्हारे लिए दुर्भाग्य ला सकता है। यदि तुम सत्य का अनुसरण नहीं करते हो, तो वह पद तुम्हारे लिए महान बुराई का स्रोत हो जाएगा। सत्य के बिना, तुम चीजों को स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते हो, और पदों द्वारा आसानी से बर्बाद हो सकते हो। ...सत्य का अनुसरण किए बिना तुम एक अगुआ नहीं हो सकते हैं; यह केवल तुम्हें बर्बाद कर सकता है। यदि तुम सत्य का अनुसरण करते हो, तो अगुआई तुम्हें सिद्ध बना सकती है" (जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति)। "लोग अच्छे प्रतीत होते हैं जब उनके पास सामर्थ्य नहीं होती है, किन्तु जैसे ही उनके पास यह होगी, तो वे अपने असली रंग दिखाएँगे। सामर्थ्य लोगों को कैसे उजागर कर सकती है? जब कोई साधारण व्यक्ति होता है, तो वह शिष्ट प्रतीत होता है और सम्मानित और ईमानदार प्रतीत होता है। एक बार जब वह कुछ सामर्थ्य को धारण कर लेता है, तो वह विकृत हो जाता है। यह किस प्रकार की समस्या है? शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए सभी लोगों की प्रकृति एक समान है" (जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति)। इन वचनों ने अचानक मेरी आँखें खोल दीं और मैंने हैसियत का पीछा करने के खोखलेपन और अर्थहीनता को देखा। हैसियत को मान देना और सत्य का अनुसरण करने में असफल होना लोगों को केवल विनाश की ओर ले जा सकता है। उदाहरण के रूप में सेना में मेरे अनुभव को लें—जब मैं एक सैनिक था तो उन भ्रष्ट अधिकारियों से मैं घृणा करता था। लेकिन, जैसे-जैसे मेरी हैसियत बढ़ी, अंत में मैं वास्तव में भ्रष्ट अधिकारी बन गया। जो उच्च पदों पर थे, वे तब अच्छे और ईमानदार प्रतीत होते थे जब उनके पास उच्च हैसियत नहीं थी। हालाँकि, जैसे ही उनके पास सामर्थ्य आई, उन्होंने अत्याचारी की तरह व्यवहार करना आरंभ कर दिया था और अनगिनत अपराध करने लगे। ये तथ्य इस बात को समझाने के लिए पर्याप्त थे कि शैतान द्वारा लोगों को भ्रष्ट कर दिए जाने के बाद, वे बिना किसी अपवाद के शैतान द्वारा कष्ट और चालबाजी के अधीन कर दिए जाएँगे; यदि उन्होंने सत्य का अनुसरण नहीं किया और उनके स्वभाव में बदलाव नहीं आया, तो चाहे यह लौकिक दुनिया में हो या परमेश्वर के घर में हो, एक बार सामर्थ्य और हैसियत धारण कर लेने पर, वे केवल विकृत बन सकते थे और बुरे काम कर सकते थे, जिसका अंतिम परिणाम परमेश्वर द्वारा न्यायपूर्ण तरीके से दंडित किया जाना होगा। इसके बारे में सोच, मुझे डर और कृतज्ञता दोनों महसूस हुआ। यह पता चला कि मेरी बार-बार की हताशा, मेरे प्यार के कारण किया गया मेरा उद्धार था! क्योंकि मैंने कई वर्षों तक नौकरशाही की दुनिया में चढ़ने के लिए संघर्ष किया था, इसलिए मैं शैतान के ज़हर से दूषित हो गया था। ऐसा कहा जा सकता है कि मैं अहंकार, धूर्तता, स्वार्थ और लालच का एक संयोजन था। परमेश्वर पर विश्वास करने के बाद, मैं हैसियत को बहुत अधिक महत्व देता था और वास्तव में सत्य का अनुसरण नहीं करता था। परिणामस्वरूप, तब तक भी मुझे सत्य के बारे में थोड़ी सी ही प्राप्ति हुई थी, और मुझमें परमेश्वर का थोड़ा सा ही भय था। यदि मैं वास्तव में एक उच्च पद पर होता, तो मैं केवल महत्वाकांक्षी बनता और अत्याचारी रूप से व्यवहार करता जैसा कि मैंने सेना में किया था, और अंत में मुझे परमेश्वर के स्वभाव का अपमान करने के लिए दंडित किया जाता। परमेश्वर द्वारा प्रबुद्धता के कारण, मैं प्रसिद्धि और हैसियत का पीछा करने के सार और परिणाम को स्पष्ट रूप से देख सकता था, और उससे भी ज्यादा, मैं सत्य का अनुसरण करने के महत्व को देख सकता था।

इसके बाद मैंने परमेश्वर के वचनों पर अपने प्रयासों को एकाग्र करना शुरू कर दिया। मैं परमेश्वर के वचनों को अपने जीवन में लाने के लिए गहराई से लालायित था और "आधिकारिक खिताब" वाले कर्तव्यों पर ध्यान नहीं देता था, और अन्य कर्तव्यों का कभी महत्वहीन नहीं समझता था। मुझे लगता था कि हर कर्तव्य का अपना अर्थ था, कि सब कुछ परमेश्वर द्वारा शासित और पूर्वनियत है और मेरा कर्तव्य वह ज़िम्मेदारी है जिसे मुझे वहन करना है। जब मैं अपने संपूर्ण हृदय से परमेश्वर के वचनों की लालसा करता था और अपने कर्तव्यों को पूरा करने का प्रयास करता था, तो मुझे न केवल कई सच्चाइयाँ समझ में आती थी जिन्हें मैं पहले नहीं समझता था, बल्कि प्रायः परमेश्वर की उपस्थिति का भी आनन्द लेता था। मुझे पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और अगुआई प्राप्त हुई, जिसने मुझे स्थिर और अकथनीय रूप से आनन्दित महसूस करवाया। एक समयावधि के बाद, दूसरों के साथ बातचीत करते समय मैंने पाया कि मैं अपनी चर्चा कम करता हूँ, और अब मैं सेना में अपने पुराने पदों के बारे में और शेखी नहीं बघारता था या दिखावा करने के लिए उनका उपयोग नहीं करता था। चाहे कोई भी मेरी कमियों की ओर इंगित करे, मैं सबसे पहले आज्ञापालन करता और बाद में अपने ऊपर चिंतन करता था। मैं कलीसिया में कम शिक्षा और कम क्षमता वाली बहनों और भाईयों के साथ समान रूप से व्यवहार कर सकता था, मैं अब और स्वयं को उनसे श्रेष्ठ नहीं मानता था। अनजाने में ही खोज पर मेरी राय बहुत बदल गई थी, और मैं हैसियत और प्रसिद्धि के प्रति उदासीन हो गया था और इनसे बहुत विवश और नियंत्रित नहीं होता था। जब मैं उन बहनों और भाईयों को कलीसिया के अगुआओं के रूप में चुने जाते देखता था जिन्होंने मेरी अपेक्षा कम समय तक परमेश्वर में विश्वास किया था, तो मुझे थोड़ी ईर्ष्या महसूस होती थी। लेकिन, प्रार्थना के माध्यम से मैं इसे दिल से निकाल देने में समर्थ था। मैं इस बारे में विचार करके शर्मिंदा महसूस करता था कि मैं प्रसिद्धि और लाभ के लिए संघर्ष करता था; मुझे महसूस होता था कि यह कुरूप और अमानवीय है। अब, मेरी पत्नी और मैं घर पर अपने कर्तव्यों को मिलजुल कर पूरा करते हैं। यद्यपि वे महत्वपूर्ण नहीं हैं, किन्तु मैं तुष्ट महसूस करता हूँ और मैं आनंद का अनुभव करता हूँ। मेरा बेटा भी अब सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करता है, जिससे हमारा परिवार एक सच्चा ईसाई परिवार बन गया है जहाँ परमेश्वर के वचन शासन करते हैं। चाहे कोई भी व्यक्ति सत्य के अनुरूप बोले, हम उस व्यक्ति की बात सुनेंगे। भले ही भ्रष्ट स्वभाव का प्रकाशन हो, हम एक-दूसरे को समझ सकते हैं, सहन कर सकते हैं और क्षमा कर सकते हैं, और परमेश्वर के वचनों के अनुसार स्वयं की जाँच कर सकते हैं, जिसने हमारे परिवार को ज़्यादा से ज़्यादा खुशहाल बना दिया है। मैं दृढ़ता से महसूस करता हूँ कि यह सर्वशक्तिमान परमेश्वर है जिसने मुझे और मेरी पत्नी को बदल दिया है, जिसने मेरे विवाह और परिवार को बचाया है, और साथ ही साथ, मुझे चरम भ्रष्टता से बचाया है और मुझे एक अहंकारी, दुष्ट और गंदे जिज्ञासु से ऐसे व्यक्ति में बदल दिया है जो प्रकाश और न्याय की खोज करता है, जिसके पास वास्तविक जीवन का लक्ष्य है। जब मैंने परमेश्वर के वचनोंको पढ़ता हूँ, तो मुझमें सभी तरह की भावनाएँ उमड़ पड़ती हैं: "संसार की सृष्टि से अब तक, परमेश्वर ने जो कुछ अपने कार्य में किया है, वह प्रेम ही है, जिसमें मनुष्य के लिए घृणा नहीं है। यहाँ तक कि ताड़ना और न्याय, जो तुम देख चुके हो, वे भी प्रेम ही हैं, अधिक सच्चा और अधिक वास्तविक प्रेम; यह प्रेम लोगों का मानवजीवन के सही मार्ग पर सन्दर्शन करता है। ...जो समस्त कार्य वह कर चुका है, उसका उद्देश्य मानवीय जीवन के सही मार्ग पर लोगों का सन्दर्शन करना है, ताकि वे मनुष्यजाति का सामान्य जीवन प्राप्त कर सकें, क्योंकि मनुष्य नहीं जानता कि एक जीवन का सन्दर्शन कैसे करना है। ऐसे सन्दर्शन के बिना तुम एक रिक्त जीवन जीने के योग्य ही होगे, मात्र एक मूल्यहीन और निरर्थक जीवन जीने के योग्य होगे और यह जानोगे ही नहीं कि एक सामान्य व्यक्ति कैसे बनना है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "विजयी कार्यों का आंतरिक सत्य (4)")। हाँ, परमेश्वर द्वारा उद्धार के बिना, मैंने जीवन में सही मार्ग नहीं पाया होता; मैं केवल अधिकाधिक पतित हो गया होता, और गंदी मैल बन गया होता, जिसे अंत में परमेश्वर द्वारा शाप दिया जाता। यह परमेश्वर का निष्पक्ष न्याय है जिसने मुझे बचाया है, और कठोरशुद्धिकरण है जिसने मुझे बदल दिया है। इससे मैं यह समझता हूँ कि कुरूप क्या है और पवित्र क्या है और साथ ही परमेश्वर की महानता, सुन्दरता और अच्छाई, और शैतान की नीचता और दुर्जनता को समझता हूँ। मैं फिर कभी भी शैतान का अनुसरण नहीं करूँगा, और पूरे हृदय से केवल सत्य का अनुसरण करूँगा, शैतान की भ्रष्टता से छुटकारा पाऊँगा, और वास्तविक मानवीय जीवन जीऊँगा। यद्यपि मैंने कई ताड़नाओं और शुद्धिकरणों की पीड़ा को झेला है, किन्तु मैंने जीवन का सबसे अनमोल मार्ग अर्जित किया है, जिसने मुझे आध्यात्मिक रूप से पुनर्जीवित होने और जीवन में एक सच्चे मार्ग में प्रवेश करने दिया है।

इस वर्ष, मैं कुछ प्रक्रिया संबंधी कार्यों को संभालने के लिए अपनी पूर्व कार्य इकाई में वापस गया। मैंने देखा कि मेरे पिछले सहयोगियों और मेरे पिछले सभी अगुआओं को पदोन्नत किया जा चुका था। जब मेरे पिछले सहकर्मियों ने मुझे देखा, तो उन्होंने कहा, "यदि आपने सेना नहीं छोड़ी होती, तो अब तक आपकी पदोन्नति हो चुकी होती।" मैं अप्रभावित रहा और मैंने सोचा: उच्च पद किस काम का है? यदि आप एक व्यक्ति के रूप में बिना किसी लक्ष्य, दिशा या अर्थ के जीवित रहते हैं, केवल बुराई के उस दलदल में मथे जाते हैं, तो क्या यह सबसे अपमानजनक प्रकार का जीवन नहीं है? क्या आप सिर्फ शैतान के दास, उसके खिलौने नहीं हैं? आप अंत में परमेश्वर का दंड और प्रतिफल भुगतेंगे! यद्यपि मेरे पास एक उच्च पद नहीं है, किन्तु मुझे अपने चयन पर कभी भी पछतावा नहीं होता है, क्योंकि मैंने अपने हृदय में वास्तव में शांति और आराम महसूस किया है, जो कि सच्ची खुशी है। जो आपको होना चाहिए, वो प्राणी बनना , परमेश्वर का आज्ञापालन और उसकी आराधना करना ही एक सच्चा मानव जीवन है, और केवल इसके माध्यम से ही आप एक उज्ज्वल भविष्य को पा सकते हैं!

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