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37. परमेश्वर को उठाना और उसे समझना सबसे बड़ी बुद्धि है

लिंगझिन शिजिआझुआंग सिटी, हेबेई प्रदेश

कुछ दिन पहले, मैंने जीवन में प्रवेश पर उपदेश और वार्तालाप IV में “वास्तविकता में प्रवेश करने का तरीका” का एक अवतरण पढ़ा: “उदाहरण के लिए, अब ऐसा कोई व्यक्ति है जिसने गलत मार्ग चुन लिया है। सत्य का संवाद करने के लिए इसका प्रयोग एक वार्तालाप के बिंदु के रूप में करके, तुम यह कैसे करोगे? … सबसे पहले, तुम्हें परमेश्वर के कार्य की गवाही देनी चाहिए, गवाही देनी चाहिए कि कैसे परमेश्वर मानव जाति को बचाता है। फिर, तुम बात कर सकते हो कि वह जिस मार्ग पर है वह परमेश्वर के उद्धार की ओर जाती है या नहीं, वह पवित्र आत्मा का कार्य हासिल कर सकता है या नहीं, और वह परमेश्वर से स्वीकृत मार्ग है या नहीं। तो, सबसे पहले तुम परमेश्वर के मार्ग की गवाही दो, और फिर उस मार्ग की गवाही दो जिस पर परमेश्वर हमें ले जा रहा है, वह है, उद्धार का मार्ग। उसे परमेश्वर का प्रेम और उसका उद्धार दिखाओ, और तब ही वह सही मार्ग पर जा सकता है। इस समस्या को हल करने के लिए, क्या यह सही होगा कि तुम परमेश्वर ही गवाही न दो या उसे न उठाओ? अगर तुम केवल इस बारे में बात करते हो कि कौन सा मार्ग उद्धार की ओर जाता है और कौन सा मार्ग उद्धार की ओर नहीं जाता है, लेकिन तुम परमेश्वर के कार्य की गवाही नहीं देते हो, तो तुम बस सिद्धांतों की बातें कर रहे हो। हालांकि, अगर तुम सबसे पहले परमेश्वर के कार्य की गवाही देते हो, फिर इन दो मार्गों के बारे में बात करते हो, तो फिर तुम सिद्धांतों के बारे में बात नहीं कर रहे हो।” जब मैंने इन वचनों को पढ़ा, तो मैं अंदर से हिल गई। अपने दिल में, मैंने सोचा: दोनों तरीके बताते हैं कि एक व्यक्ति को कैसे सत्य का अभ्यास करना चाहिए। ऐसा क्यों है कि एक व्यक्ति जो परमेश्वर के कार्य का एहसास नहीं कराता है, वह सिद्धांतों की बात कर रहा है, लेकिन वह व्यक्ति जो परमेश्वर के कार्य के बारे में बात करता है और फिर इन चीजों का एहसास कराता है, वह सिद्धांतों के बारे में बात नहीं कर रहा है? जब मैं इस पर चिंतन कर रही थी, मुझे डेविड के फिलिस्तीनी दैत्य गोलियथ को हराने की बाइबल की कहानी का ख्याल आया। उस समय, डेविड ने सबसे यहोवा को उठाया, फिर पत्थर फेंका, और अंतत: गोलियथ को हराया। अगर डेविड ने उस समय यहोवा को न उठाया होता, और बस आगे बढ़ता और सीधे पत्थर फेंकता, तो क्या वह गोलियथ को हरा पाता? बिल्कुल नहीं। ऐसा इसलिए क्योंकि डेविड के गोलियथ को हरा पाने का एक मात्र कारण यह था कि उसने यहोवा पर विश्वास किया था, वह यहोवा पर निर्भर था, और क्योंकि यहोवा ने उसकी मदद की थी। अगर उसने यहोवा को न उठाया होता, तो उसे यहोवा की मदद नहीं मिल पाती। उसके पत्थर फेंकने की बेहतरीन कुशलता के बावजूद, वह गोलियथ को नहीं हरा पाता। जब मैं इस बारे में सोचती हूं, तो यह अचानक ही मेरे दिल में साफ हो जाता है। परमेश्वर का लोगों से उसे उठाने और उससे उम्मीद करने के लिए कहने से तात्पर्य लोगों से नियम या रिवाज मनाने के लिए कहना नहीं है, बल्कि अपने दिलों में परमेश्वर के लिए स्थान रखने, अपने दिल में परमेश्वर को सबसे महान मानने के लिए कहना है। अगर एक व्यक्ति सच्चे मायने में परमेश्वर को उठाता है और उससे उम्मीद करता है, तो यह दर्शाता है कि उसके दिल में परमेश्वर के लिए स्थान है और वह अपने दिल में परमेश्वर का सम्मान सबसे महान के रूप में कर सकता है। इस प्रकार से, जब लोग परमेश्वर के चेहरे के समक्ष जाते हैं, तो वे उसका आनंद और आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं, और पवित्र आत्मा उन लोगों के अंदर कार्य करेगी। वे लोग जो भी कार्य करेंगे, वह उनके खुद के कर्म पर निर्भर नहीं होगा, बल्कि उनके कार्य के परमेश्वर के मार्गदर्शन पर निर्भर होगा। और इसका प्रभाव स्वाभाविक रूप से अच्छा होगा। अगर एक व्यक्ति परमेश्वर को नहीं उठाता है और उससे उम्मीद नहीं करता है, तो यह दर्शाता है कि उसके दिल में परमेश्वर के लिए कोई स्थान नहीं है और वे जो कुछ भी करते हैं, वह उनके खुद के कार्य के आधार पर है। ऐसा व्यक्ति परमेश्वर की घृणा के योग्य है और निश्चित रूप से उसे उसका आशीर्वाद प्राप्त नहीं होगा या पवित्र आत्मा से कार्य हासिल नहीं होगा। इसलिए, उसका कार्य प्रभावी नहीं होगा। इस समय, मैं अचंभित होने से खुद को नहीं रोक सकी: क्या सत्य के मेरे खुद के अभ्यास का लगातार अप्रभावी होना इस तथ्य से संबंधित है कि मैं जो कुछ भी करती हूं, उसमें परमेश्वर नहीं उठाती हूं या उससे उम्मीद नहीं करती हूं? इतने बीते सालों को याद करके, मैं देखती हूं कि परमेश्वर के समक्ष मेरी प्रार्थनाएं और सत्य का अभ्यास करने का मेरा खुद का मार्ग, दोनों पूरी तरह से अव्यवस्थित थे। सत्य का अभ्यास करने में, मैं कदाचित ही परमेश्वर पर निर्भर रहती थी या उससे उम्मीद करती थी। सत्य का अभ्यास करने के लिए अपनी खुद की ताकत पर भरोसा करके, मैं पवित्र आत्मा से मदद नहीं पा सकी थी। इसी वजह से, मुझे हालात खास तौर पर कठिन, कठोर महसूस होते थे और मैं नियत परिणाम देख पाने में असक्षम थी।

जब से, मैंने असल जीवन के हर मामले में परमेश्वर को उठाने और उससे उम्मीद करने का अभ्यास करना शुरू कर दिया है। हर सुबह जब मैं प्रार्थना करती हूं, मैं खुद को पूरी तरह से परमेश्वर के हाथों में सौंप देती हूं, परमेश्वर को उस दिन मेरी जिंदगी को पूरी तरह से नियंत्रित करने देती हूं। मेरे खुद के उद्धार के महत्वपूर्ण मामलों के संबंध में, मैं परमेश्वर की प्रार्थन करने और उससे उम्मीद करने के लिए पूरी तरह से समर्पित रहूंगी। मैं नहीं जानती हूं कि मुझमें क्या कमी है या मुझे किस चीज की जरूरत है। हालांकि, परमेश्वर को सब चीजें स्पष्ट हैं। वह मुझे सबसे अच्छी तरह समझता है। परमेश्वर सबसे अच्छी तरह से जानता है कि उद्धार के मेरे अनुसरण के लिए मुझे कैसे वातावरण की जरूरत है, मुझे क्या अनुभव करने की जरूरत है, मुझे प्रवेश करने के लिए किस चीज की जरूरत है। तो, मैं खुद को पूरी तरह से परमेश्वर के हाथों में सौंप देती हूं, परमेश्वर को मुझे “गढ़ने” और नियंत्रित करने देती हूं। मैं केवल वह व्यक्ति बनना चाहती हूं जो परमेश्वर की आज्ञाकारी है, और उद्धार के मार्ग पर परमेश्वर के मार्गदर्शन का पालन करती है। इसके अलावा, असल जिंदगी के सभी मामलों में, मैं पहले परमेश्वर की प्रशंसा करूंगी, परमेश्वर को मेरा मार्गदर्शन करने के लिए आगे करूंगी, और फिर उसका पालन करूंगी, अपनी सभी बातों और कर्मों में परमेश्वर की इच्छा का पालन करूंगी। कुछ समय के बाद, मैंने पाया कि अब मैं पहले जैसे भ्रमित रहती थी, अब मैं अपने हर दिन को वैसा अनुभव नहीं करती थी। अब जब मैं किसी चीज का सामना करती हूं, तो मैं जानती हूं कि सत्य के किस पहलू का अभ्यास मुझे करना चाहिए, वास्तविकता के किस पहलू में मुझे प्रवेश करना चाहिए, और परमेश्वर की इच्छा क्या है। ये सभी पहले से ज्यादा स्पष्ट हैं। यह जाने बिना, मैं आसानी से कुछ सत्यों का अभ्यास कर सकती हूं। उदाहरण के लिए, परमेश्वर के समक्ष अपने दिल को स्थिर करने के पहलू में, भले ही मैं पहले जब परमेश्वर के समक्ष जाती थी तो स्थिर रहना चाहती थी, लेकिन मैं हमेशा महसूस करती थी कि मेरा दिल मेरे नियंत्रण में नहीं है, और अनजाने में मैं निरर्थक बातों में फंस जाया करती थी। कई बार जब मैं लेखों का संशोधन भी किया करती थी, तो मेरा मन भटकने लगता था, और मैं उसे नियंत्रित नहीं कर पाती थी। आज, मैं खुद को नियंत्रित करने के लिए बहुत ज्यादा कोशिश नहीं करनी पड़ती। इसे जाने बिना ही, बाहरी चीजों में मेरा दिल लगने के मामलों में कमी आ गई है। भले ही मेरा मन तब भी कभी-कभार भटकने लगे, लेकिन मैं तुरंत ही इसका अनुभव कर सकती हूं, और अपने दिमाग को वापस स्थिर करना मेरे लिए आसान हो गया है। खुद को जानने के पहलू में, इससे पहले भी, मैं खुद को थोड़ा और जानते हुए, हर दिन कुछ प्रगति करना चाहती थी। हालांकि, मैं हमेशा ही अपने अंदरूनी विचारों को थामने में असफल हुई थी। खुद को जानने के क्रम में, मैं हमेशा ही उन्हें थामना भूल जाती थी। कई बार रात के समय, मैं सोचा करती, “कैसे आज फिर से मैं खुद को जान नहीं पाई?” मैं लगातार अपना हर दिन इसी तरह से व्यर्थ में गुजारा करती थी। अब, जब भी कुछ निश्चित विचार मेरे मन में आते हैं, तो मेरे लिए उन्हें थाम लेना आसान हो जाता है। मेरे इन विचारों का अनुभव करने के बाद, मैं खुद को बेहतर जानने के लिए परमेश्वर से प्रार्थना करूंगी, और अपने दिल में मैं खास तौर पर खुद से घृणित हूं, और मुझमें मेरे शरीर को नकारने की ताकत है। जब मैं कुछ निश्चित माहौलों का सामना करती हूं, तो मैं यह भी जानती हूं कि परमेश्वर उस पहलू को उजागर करने के लिए इस वातावरण का प्रयोग करता है जिसमें मैं भ्रष्ट हूं या कमी दिखा रही हूं। फिर, मैं इस पहलू में सत्य से खुद को सज्जित करूंगी। बस खानापूर्ति करने के स्थान पर व्यक्ति का कर्तव्य पूरा करने के इस पहलू के संदर्भ में, अतीत में जब मैंने बच निकलने लायक काम करने की ओर अपनी प्रवृत्ति को अनजाने में उजागर किया था, तो कई बार मैं इससे अनजान थी। कुछ कई मैं अनजान थी, लेकिन इसे हल करने पर ध्यान बिल्कुल भी केन्द्रित नहीं करती थी। अब, जबकि मेरे दिल में यह प्रवृत्ति है, तो मेरे दिल में जागरुकता भी है। फिर, प्रार्थना के माध्यम से, मैं अपने अंदर ही इस स्थिति का खंडन करने में सक्षम हूं। मैं नितांत रूप से यह जानती हूं कि यह सब परिणाम परमेश्वर का मेरा मार्गदर्शन करने और मुझे आगे बढ़ाने की वजह से मिला है। यह सब पवित्र आत्मा के मुझे ताकत देने की वजह से ही हुआ है कि मैंने इसे हासिल किया। इसका सारा श्रेय परमेश्वर को जाता है!

इन अनुभूतियों के बाद, मैं समझ गई कि अतीत में सत्य का अभ्यास करने में मुझे कठिनाई महसूस करने का कारण यह था, क्योंकि मैं सत्य का अभ्यास करने के लिए पूरी तरह से खुद पर आश्रित थी, उद्धार के मार्ग पर चलने के लिए खुद पर आश्रित थी। मेरे दिल में परमेश्वर के लिए कोई स्थान नहीं था, मेरे अनुभवों में, मैं परमेश्वर के वचन का अभ्यास नहीं करती थी, और मुझे पवित्र आत्मा का कार्य नहीं मिलता था। जैसा कि परमेश्वर ने कहा है: “ऐसा हुआ करता था कि कोई भी पवित्र आत्मा को नहीं जानता था, और विशेष रूप से उन्हें नहीं पता होता था कि पवित्र आत्मा का मार्ग क्या है। यही कारण है कि लोग हमेशा परमेश्वर के सामने स्वयं मूर्ख बन जाते थे। यह कहा जा सकता है कि लगभग सभी लोग जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, पवित्रात्मा को नहीं जानते हैं, बल्कि केवल एक भ्रमित प्रकार का विश्वास करते हैं। इससे यह स्पष्ट है कि लोग परमेश्वर को नहीं समझते हैं, और भले ही वे कहते हों कि वे उस पर विश्वास करते हो, इसके सार के संदर्भ में, अपनी क्रियाओं के आधार पर वे स्वयं पर विश्वास करते हैं, परमेश्वर पर नहीं।” (“वचन देह में प्रकट होता है” से “मार्ग… (5)” से) परमेश्वर के वचनों को आगे बढ़ने से मुझे यह समझ आया कि उद्धार का अनुसरण करने वाले विश्वास पवित्र आत्मा के कार्य पर निर्भर रहते हैं, ये सभी ऐसे लोग हैं जिनका मार्ग पवित्र आत्मा करती है। वे लोग जो खुद पर निर्भर रहते हैं, उन्हें यह प्राप्त नहीं होगा। अतीत में, मैं आसानी से परमेश्वर पर निर्भर नहीं रहती थी, उससे उम्मीद नहीं करती थी, न ही परमेश्वर के मार्गदर्शन की खोज करती थी। मैं परमेश्वर को दरकिनार कर दिया था, किसी भी परिणाम के बिना अपनी खुद की ताकत में, जो भी करना चाहती थी, वह बिना देखे करती थी। मैंने यह भी शिकायत की थी कि परमेश्वर में विश्वास करना और सत्य का अभ्यास करना बहुत कठिन था। अब, मैं जानती हूं कि यह परमेश्वर में मेरे 'विश्वास' न करने की वजह से था। परमेश्वर का वचन कहता है: “मनुष्य क्या करने में सक्षम है? उसके बजाए क्या यह वह नहीं है जिसे मैं स्वयं करता हूँ? मैं ऐसा क्यों कहता हूँ कि मैं व्यक्तिगत रूप से उस स्थान पर नीचे उतरा हूँ जहाँ लोग युद्ध में शामिल हो गए हैं। जो मैं चाहता हूँ वह तुम लोगों का विश्वास है, न कि तेरे कार्य।” (“वचन देह में प्रकट होता है” से “दसवाँ कथन” से) “जब तक तू अपना हृदय परमेश्वर को अर्पित करके, उसकी आज्ञा मानता रहेगा, सब कुछ सफल होगा। तुझे ऐसा क्यों लगता है कि यह बहुत कठिन है?” (“वचन देह में प्रकट होता है” से “जिनके स्वभाव परिवर्तित हो चुके हैं, वो वे लोग हैं जो परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर चुके हैं” से) मिस्र छोड़ने वाले इजरायलियों को याद करते हुए, क्या वह परमेश्वर नहीं था जो व्यक्तिगत तौर पर उनका मार्गदर्शन कर रहा था? इजरा​यलियों ने कुछ नहीं किया था; उन्हें बस बादल और अग्नि के स्तंभ का अनुसरण करना था। मार्ग में, उन्होंने जितनी भी कठिनाइयों का सामना किया था, वे सभी खुद यहोवा परमेश्वर द्वारा खुद दूर की गई थी। क्या आज का उद्धार का मार्ग इजरायलियों के मिस्र से भागने के समान ही नहीं है? परमेश्वर हमसे बस चाहता है कि हम उस पर निष्ठा रखें, परमेश्वर को देखें, परमेश्वर को अपना दिल दें और परमेश्वर के नेतृत्व का पालन करें। इस तरह से, लोग पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त कर सकते हैं। एक बार जब पवित्र आत्मा किसी के अंदर कार्य करना आरंभ कर दे, तो सत्य किसी भी पहलू का अभ्यास करना उनके लिए आसान हो जाता है। चूंकि यह खुद परमेश्वर है जो शैतान से जंग लड़ेगा, यह परमेश्वर के वचन हैं जो हमारे अंदरूनी शैतानी स्वभाव को बदलता है। यह हमारे कार्य के माध्यम से पूरा नहीं किया जा सकता। इन्हें समझने के बाद, परमेश्वर में मेरा आत्मविश्वास कई गुना बढ़ गया। भले ही, मुझे अभी सत्य के विभिन्न पहलुओं में काफी बाहरी प्रवेश ही मिला है, लेकिन मैं मानती हूं कि जब मैं परमेश्वर को उठाना और उस पर निर्भर रहना जारी रखूंगी, तो परमेश्वर संपूर्ण सत्य में मेरा मार्गदर्शन करना जारी रखेगी और अंतत: मैं उद्धार हासिल कर लूंगी!

मुझे आगे बढ़ाने और परमेश्वर के मार्गदर्शन के लिए उसका धन्यवाद, जिससे मैं यह समझ पाई कि अपने हर अनुभव में परमेश्वर को उठाना और उससे उम्मीद करना ही सबसे बड़ी बुद्धिमत्ता है। केवल परमेश्वर को उठाकर और उससे उम्मीद करके ही मनुष्य पवित्र आत्मा के कार्य का अनुभव कर सकता है। मनुष्य पवित्र आत्मा के कार्य के साथ ही आसानी से सत्य का अभ्यास कर सकता है और उद्धार का अनुसरण कर सकता है। इसी के साथ ही, परमेश्वर ने मुझे उसमें विश्वास करने के मेरे मार्ग पर मेरे हानिकारक भटकाव को पहचानने में मेरी मदद भी की - अपने मुख से परमेश्वर में अपने विश्वास को स्वीकारना, लेकिन अपने अनुभव में परमेश्वर की कमी होना। अतीत में, मैं उद्धार के मार्ग पर चलने के लिए खुद पर आश्रित रहती थी, मैं जो भी हासिल करना चाहती थी उसके लिए खुद पर ही आश्रित रहती थी। प्रयोगों के दस सालों ने यह साबित किया कि मैं असफलता के मार्ग पर थी। अब से, मैं परमेश्वर में विश्वास करने और परमेश्वर का अनुभव करने के अपने पिछले तरीके को त्यागने की इच्छुक हैं। मैं परमेश्वर का अनुभव करने के इस नए तरीके के अनुसार सत्य का अभ्यास करूंगी, परमेश्वर के मार्गदर्शन के माध्यम से बाकी के मार्ग पर चलूंगी। मैं परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करने, सत्य को समझने के लिए उस पर आश्रित रहूंगी और यह विश्वास करूंगी कि परमेश्वर निश्चित रूप से सत्य की वास्तविकता में मेरा मार्गदर्शन करेगा।

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