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मानवता को बचाने के लिए देह में परमेश्वर करता है खामोशी से काम

I

परमेश्वर देहधारी होकर मनुष्यों में छुपकर रहता है

नए काम करने को, हमें गुनाह से बचाने को।

वो नहीं बताता हमें कि वो क्या सोचता है।

अपनी बनाई योजना अनुसार अपने काम कदम बा कदम करता है।

उसके वचन हैं दिन ब दिन बढ़ रहे,

दिलासा देते, याद दिलाते, निंदा और चेतावनी के साथ।

कोमल और दयालु से आक्रामक और प्रतापी हो जाते हैं वचन,

मन में बिठाते हैं करुणा और भय भी उसके वचन।

वो जो भी कहता है खोले गहरे राज़ हमारे।

उसके वचन चुभते हैं हृदय के भीतर और शर्मसार होते हैं हम।

उसके जीवित जल के भंडार हैं असीमित।

और उसके कारण ही हम रहते परमेश्वर के रूबरू।

परमेश्वर देहधारी होकर मनुष्यों में छुपकर रहता है

नए काम करने को, हमें गुनाह से बचाने को।

वो नहीं बताता हमें कि वो क्या सोचता है।

अपनी बनाई योजना अनुसार अपने काम कदम बा कदम करता है।

II

वचन में उसके जीवन की ताक़त है,

और राह दिखाये हमें चलने के लिए और सच क्या है ये भी बताए।

उसके वचन से आकर्षित ध्यान लगायें उसके स्वर पे,

और इस साधारण इंसान के दिल की आवाज़ पे।

हर कोशिश वो करता उसके हृदय से लहू है झरता।

हमारे लिए ही वो करहाता और विलाप करता,

दुख और शर्म सहता हमारी मंज़िल और उद्धार के लिए।

लहूलुहान हृदय उसका रोता हमारे विद्रोही होने से।

कोई नहीं पा सकता है परमेश्वर का ऐसा स्वरूप।

कोई नहीं है जो हो उसकी तरह इतना सहनशील।

किसी सृजन में इतना प्रेम और सहनशीलता नहीं हो सकती कभी।

"वचन देह में प्रकट होता है" से

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