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इंसान जो परमेश्वर के अधिकार के अधीन रहता है

I

इंसान सभी चीज़ों के बीच रहता है,

उसे शैतान ने दूषित किया, धोखा दिया है।

मगर फिर भी इंसान, हवा को छोड़ नहीं सकता है।

मगर फिर भी इंसान, पानी को छोड़ नहीं सकता है।

और तमाम चीज़ों को जिसे परमेश्वर ने बनाया है।

इंसान, परमेश्वर की बनाई इस जगह पर ही, रहता है, बढ़ता है, रहता है।

II

इंसान का सहज-ज्ञान बदला नहीं है।

अब भी इंसान देखने-सुनने के लिये, आंख-कान पर ही भरोसा करता है,

दिमाग़ से सोचता है, दिल से समझता है,

पैरों से चलता है, हाथों से काम लेता है।

परमेश्वर ने जो दिया इंसान को सहज-ज्ञान,

ताकि पा सके वो उसका प्रावधान, वो बदला नहीं।

इंसान का हुनर, जिससे वो परमेश्वर को,

सहयोग करता है, इंसानी फ़र्ज़ निभाता है, वो बदला नहीं है।

III

उसकी आत्मिक ज़रूरतें बदली नहीं हैं।

अपने मूल को तलाशने की चाहत बदली नहीं है।

इंसान की ये लालसा, कि परमेश्वर उसे बचाए,

बदली नहीं है। बदली नहीं है।

परमेश्वर के अधिकार के अधीन जो रहता है,

शैतान के हाथों, ख़ूनी तबाही जिसने झेली है, ये हालत है उस इंसान की।

इंसान सभी चीज़ों के बीच रहता है, उसे शैतान ने दूषित किया।

"वचन देह में प्रकट होता है" से

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प्रश्न 24: तुम यह प्रमाण देते हो कि प्रभु यीशु पहले से ही सर्वशक्तिमान परमेश्वर के रूप में वापस आ चुका है, कि वह पूरी सच्चाई को अभिव्यक्त करता है जिससे कि लोग शुद्धिकरण प्राप्त कर सकें और बचाए जा सकें, और वर्तमान में वह परमेश्वर के घर से शुरू होने वाले न्याय के कार्य को कर रहा है, लेकिन हम इसे स्वीकार करने की हिम्मत नहीं करते। यह इसलिए है क्योंकि धार्मिक पादरियों और प्राचीन लोगों का हमें बहुधा यह निर्देश है कि परमेश्वर के सभी वचन और कार्य बाइबल में अभिलेखित हैं और बाइबल के बाहर परमेश्वर का कोई और वचन या कार्य नहीं हो सकता है, और यह कि बाइबल के विरुद्ध या उससे परे जाने वाली हर बात विधर्म है। हम इस समस्या को समझ नहीं सकते हैं, तो तुम कृपया इसे हमें समझा दो। परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियन्ता है केवल परमेश्वर के प्रबंधन के मध्य ही मनुष्य बचाया जा सकता है बुलाए हुए बहुत हैं, परन्तु चुने हुए कुछ ही हैं