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"देहधारण का रहस्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से एक संकलन

1. अनुग्रह के युग में, यूहन्ना ने यीशु का मार्ग प्रशस्त किया। वह स्वयं परमेश्वर का कार्य नहीं कर सकता था और उसने मात्र मनुष्य का कर्तव्य पूरा किया था। यद्यपि यूहन्ना प्रभु का अग्रदूत था, फिर भी वह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ था; वह पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किया गया मात्र एक मनुष्य था। यीशु के बपतिस्मा के बाद "पवित्र आत्मा कबूतर के समान उस पर उतरा"। तब यीशु ने अपना काम आरम्भ किया, अर्थात्, उसने मसीह की सेवकाई करना प्रारम्भ किया। इसीलिए उसने परमेश्वर की पहचान को अपनाया, क्योंकि वह परमेश्वर से आया था। इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि इससे पहले उसका विश्वास कैसा था—कदाचित् कभी-कभी यह दुर्बल रहा हो, या कभी-कभी यह मज़बूत—यह सब अपनी सेवकाई को करने से पहले के उसके सामान्य मानव जीवन से संबंधित था। उसका बपतिस्मा (अभिषेक) होने के पश्चात्, उसके पास तुरन्त ही परमेश्वर की सामर्थ्य और महिमा आ गयी थी, और इस प्रकार उसने अपनी सेवकाई आरंभ की। वह चिह्न का प्रदर्शन और अद्भुत काम कर सकता था, चमत्कार कर सकता था, उसके पास सामर्थ्य और अधिकार था, क्योंकि वह सीधे स्वयं परमेश्वर की ओर से काम कर रहा था; उसने पवित्र आत्मा के बदले में उसका काम किया और पवित्रात्मा की आवाज़ को व्यक्त किया; इसलिए वह स्वयं परमेश्वर था। यह निर्विवादित है। पवित्र आत्मा के द्वारा यूहन्ना का उपयोग किया गया था। वह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था, न ही परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करना उसके लिए सम्भव था। यदि उसने ऐसा करने की इच्छा की होती, तो पवित्र आत्मा ने इसकी अनुमति नहीं दी होती, क्योंकि वह उस काम को नहीं कर सकता था जिसे स्वयं परमेश्वर ने सम्पन्न करने का इरादा रखता था। कदाचित् उसमें बहुत कुछ ऐसा था जो मनुष्यों की इच्छा का था, या उसमें कुछ विसामान्य था; वह किसी भी परिस्थिति में प्रत्यक्ष रूप से परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था। उसकी अशुद्धि और ग़लतियाँ केवल उसका ही प्रतिनिधित्व करती थीं, किन्तु उसका काम पवित्र आत्मा का प्रतिनिधि था। फिर भी, तुम नहीं कह सकते हो कि उसका सर्वस्व परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता था। क्या उसकी विसामान्यता और त्रुटियुक्त होना परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता है? मनुष्य का प्रतिनिधित्व करने में त्रुटि होना सामान्य है, परन्तु यदि कोई परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में विसामान्य होता है, तो क्या वह परमेश्वर के प्रति अनादर नहीं होगा? क्या वह पवित्र आत्मा के विरुद्ध ईशनिंदा नहीं होगी? पवित्र आत्मा मनुष्य को आसानी से परमेश्वर के स्थान पर खड़े होने की अनुमति नहीं देता है, भले ही दूसरों के द्वारा उसे बड़ा ठहराया गया हो। यदि वह परमेश्वर नहीं है, तो वह अंत में खड़े रहने में असमर्थ होगा। पवित्र आत्मा मनुष्य को जैसा मनुष्य चाहे वैसे परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने की अनुमति नहीं देता है! उदाहरण के लिए, पवित्र आत्मा ने यूहन्ना की गवाही दी और उसे यीशु के लिए मार्ग प्रशस्त करने वाले व्यक्ति के रूप में भी प्रकट किया, परन्तु पवित्र आत्मा के द्वारा उसमें किए गए कार्य को अच्छी तरह से नपा-तुला था। यूहन्ना से कुल इतना कहा गया था कि वह यीशु के लिए मार्ग तैयार करने वाला बने, उसके लिए मार्ग तैयार करे। कहने का अभिप्राय है, कि पवित्र आत्मा ने केवल मार्ग बनाने में उसके कार्य का समर्थन किया था और केवल इसी प्रकार के कार्य को करने की उसे अनुमति दी, अन्य किसी कार्य के लिए नहीं। यूहन्ना ने एलिय्याह का प्रतिनिधित्व किया था, उस भविष्यद्वक्ता का प्रतिनिधत्व करता था जिसने मार्ग प्रशस्त किया था। पवित्र आत्मा के द्वारा इसमें उसका समर्थन किया गया था; जब तक उसका कार्य मार्ग प्रशस्त करने का था, तब तक पवित्र आत्मा ने उसका समर्थन किया। हालाँकि, यदि उसने दावा किया होता कि वह स्वयं परमेश्वर है और छुटकारे के कार्य को पूरा करने के लिए आया है, तो पवित्र आत्मा को अवश्य उसे अनुशासित करना पड़ता। यूहन्ना का काम चाहे जितना भी बड़ा था, और चाहे पवित्र आत्मा ने उसे समर्थन दिया था, फिर भी उसका काम सीमाओं के अंतर्गत था। यह वास्तव में सत्य है कि पवित्र आत्मा के द्वारा उसके कार्य का समर्थन किया गया था, परन्तु उस समय उसे जो सामर्थ्य दी गई थी वह केवल उसके मार्ग तैयार करने तक ही सीमित थी। वह अन्य कोई काम बिल्कुल नहीं कर सकता था, क्योंकि वह सिर्फ यूहन्ना था जो मार्ग प्रशस्त करता था, वह यीशु नहीं था। इसलिए, पवित्र आत्मा की गवाही मुख्य है, किन्तु वह कार्य जिसको करने के लिए पवित्र आत्मा मनुष्य को अनुमति देता है वह और भी अधिक महत्वपूर्ण है। क्या यूहन्ना के लिए उस समय बड़ी गवाही नहीं दी गई थी? क्या उसका काम भी महान नहीं था? किन्तु जो काम उसने किया वह यीशु के काम से बढ़ कर नहीं हो सका, क्योंकि वह पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति से अधिक नहीं था और वह सीधे परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था, और इस तरह उसने जो काम किया वह सीमित था। उसके मार्ग प्रशस्त करने का काम समाप्त करने के बाद, उसकी गवाही का समर्थन करने वाला कोई नहीं था, कोई भी नया काम फिर उसके पास नहीं आया, और जब परमेश्वर स्वयं का काम शुरू हुआ तो वह चला गया।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "देहधारण का रहस्य (1)" से

2. कुछ ऐसे लोग हैं जो दुष्टात्माओं के द्वारा ग्रसित हैं और लगातार ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाते रहते हैं, "मैं ईश्वर हूँ!" फिर भी अंत में, उन पर से पर्दा हट जाता है, क्योंकि वे गलत चीज़ का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे शैतान का प्रतिनिधित्व करते हैं और पवित्र आत्मा उन पर कोई ध्यान नहीं देता है। तुम अपने आपको कितना भी बड़ा ठहराओ या तुम कितनी भी ताकत से चिल्लाओ, तुम अभी भी एक सृजित प्राणी ही हो और एक ऐसे प्राणी हो जो शैतान से सम्बन्धित है। मैं कभी नहीं चिल्लाता हूँ, "मैं ईश्वर हूँ, मैं परमेश्वर का प्रिय पुत्र हूँ!" परन्तु जो कार्य मैं करता हूँ वह परमेश्वर का कार्य है। क्या मुझे चिल्लाने की आवश्यकता है? ऊँचा उठाये जाने की कोई आवश्यकता नहीं है। परमेश्वर अपना काम स्वयं करता है और उसे मनुष्य से ऐसी कोई अपेक्षा नहीं है कि वह उसे हैसियत या सम्मानसूचक पदवी प्रदान करे: उसकी पहचान और हैसियत को दर्शाने के लिए उसका काम ही पर्याप्त है। अपने बपतिस्मा से पहले, क्या यीशु स्वयं परमेश्वर नहीं था? क्या वह परमेश्वर का देहधारी देह नहीं था? निश्चित रूप से यह नहीं कहा जा सकता है कि केवल उसके लिए गवाही दिए जाने के पश्चात् ही वह परमेश्वर का इकलौता पुत्र बना? क्या उसके द्वारा काम आरम्भ करने से बहुत पहले ही यीशु नाम का कोई व्यक्ति नहीं था? तुम नए मार्ग नहीं ला सकते हो या पवित्रात्मा का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते हो। तुम पवित्र आत्मा के कार्य को या उन वचनों को व्यक्त नहीं कर सकते हो जिन्हें वह कहता है। तुम परमेश्वर स्वयं के या पवित्रात्मा के कार्य को नहीं कर सकते हो। तुम परमेश्वर की बुद्धि, अद्भुतता, और अगाधता को, या उस सम्पूर्ण स्वभाव को व्यक्त नहीं कर सकते हो जिसके द्वारा परमेश्वर मनुष्य को ताड़ना देता है: इन सबको व्यक्त करना तुन्हारी क्षमता के बाहर है। अतः परमेश्वर होने के तुम्हारे दावों से कोई फर्क नहीं पड़ता है; तुम्हारे पास सिर्फ़ नाम होगा और सार में से कुछ भी नहीं होगा। परमेश्वर स्वयं आ गया है, किन्तु कोई भी उसे नहीं पहचाता है, फिर भी वह अपना काम जारी रखता है और पवित्र आत्मा के प्रतिनिधित्व में ऐसा करता है। चाहे तुम उसे मनुष्य कहो या परमेश्वर, प्रभु कहो या मसीह, या उसे बहन कहो, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। परन्तु जिस कार्य को वह करता है वह पवित्रात्मा का है और स्वयं परमेश्वर के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है। वह उस नाम के बारे में परवाह नहीं करता है जिससे मनुष्य उसे पुकारते है। क्या वह नाम उसके काम का निर्धारण कर सकता है? इचाहे तुम उसे कुछ भी कहकर पुकारो, परमेश्वर के दृष्टिकोण से, वह परमेश्वर के आत्मा का देहधारी देह है; वह पवित्रात्मा का प्रतिनिधित्व करता है और उसके द्वारा अनुमोदित है। यदि तुम एक नए युग के लिए मार्ग नहीं बना सकते हो, और तुम पुराने युग का समापन नहीं कर सकते हो और एक नए युग का सूत्रपात या नया कार्य नहीं कर सकते हो तो, तुम्हें परमेश्वर नहीं कहा जा सकता है!

"वचन देह में प्रकट होता है" में "देहधारण का रहस्य (1)" से

3. यहाँ तक कि कोई मनुष्य जिसे पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किया जाता है वह भी परमेश्वर स्वयं का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है। अर्थात न केवल यह व्यक्ति परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है, बल्कि उसका काम भी सीधे तौर पर परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है। दूसरे शब्दों में, मनुष्य के अनुभव को सीधे तौर पर परमेश्वर के प्रबंधन के अंतर्गत नहीं रखा जा सकता है, और यह परमेश्वर के प्रबंधन का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है। वह समस्त कार्य जिसे परमेश्वर स्वयं करता है वह ऐसा कार्य है जिसे वह अपनी स्वयं की प्रबंधन योजना में करने का इरादा करता है और जो बड़े प्रबंधन से संबंधित है। मनुष्य (पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किया गया मनुष्य) के द्वारा किया गया कार्य उसके व्यक्तिगत अनुभव की आपूर्ति करता है। वह अनुभव का एक नया मार्ग खोजता है जिस पर उससे पहले के लोग नहीं चले थे और पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन के अधीन अपने भाईयों और बहनों की अगुवाई करता है। इस तरह के लोग अपना व्यक्तिगत अनुभव या आध्यात्मिक मनुष्यों की आध्यात्मिक रचनाएँ प्रदान करते हैं। यद्यपि पवित्र आत्मा के द्वारा उनका उपयोग किया जाता है, फिर भी ऐसे मनुष्यों का कार्य छ:-हज़ार-वर्षों की योजना के बड़े प्रबंधन कार्य से असम्बद्ध है। वे सिर्फ ऐसे लोग हैं जिन्हें विभिन्न अवधियों में पवित्र आत्मा के द्वारा उभारा गया ताकि वे तब तक पवित्र आत्मा की मुख्यधारा में लोगों की अगुवाई करें जब तक कि वे अपने कार्य को पूरा न कर लें या उनकी ज़िन्दगियों का अंत न हो जाए। जिस कार्य को वे करते हैं वह केवल परमेश्वर स्वयं के लिए एक उचित मार्ग तैयार करने के लिए है या पृथ्वी पर परमेश्वर स्वयं की प्रबंधन योजना में एक अंश को निरन्तर जारी रखने के लिए है। ऐसे मनुष्य उसके प्रबंधन में बड़े-बड़े कार्य करने में असमर्थ होते हैं, और वे नए मार्गों की शुरुआत भी नहीं कर सकते हैं, और वे पूर्व युग के परमेश्वर के सभी कार्यों का समापन तो बिल्कुल भी नहीं कर सकते हैं। इसलिए, जिस कार्य को वे करते हैं वह केवल एक सृजित प्राणी का प्रतिनिधित्व करता है जो अपने कार्यों को क्रियान्वित कर रहा है और स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है जो अपनी सेवकाई को कार्यान्वित कर रहा हो। ऐसा इसलिए है क्योंकि जिस कार्य को वे करते हैं वह परमेश्वर स्वयं के द्वारा किए जाने वाले कार्य के असदृश है। एक नए युग के सूत्रपात का कार्य परमेश्वर के स्थान पर मनुष्य के द्वारा नहीं किया जा सकता है। इसे परमेश्वर स्वयं के अलावा किसी अन्य के द्वारा नहीं किया जा सकता है। मनुष्य के द्वारा किया गया समस्त कार्य सृजित प्राणी के रूप में उसके कर्तव्य का निर्वहन है और तब किया जाता है जब पवित्र आत्मा के द्वारा उसे प्रेरित या प्रबुद्ध किया जाता है। ऐसे मनुष्य द्वारा प्रदान किया जाने वाला समस्त मार्गदर्शन यह होता है कि मनुष्य को दैनिक जीवन में किस प्रकार अभ्यास करना चाहिए और उसको किस प्रकार परमेश्वर की इच्छा के साथ समरसता में कार्य करना चाहिए। मनुष्य का कार्य न तो परमेश्वर की प्रबंधन योजना को सम्मिलित करता है और न ही पवित्रात्मा के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है। एक उदाहरण के रूप में, गवाह ली और वॉचमैन नी का कार्य मार्ग की अगुआई करना था। चाहे मार्ग नया हो या पुराना, कार्य बाइबल के सिद्धांतों के भीतर ही बने रहने के आधार पर किया गया था। चाहे स्थानीय कलीसियाओं को पुनर्स्थापित करना हो अथवा उसे बनाना हो, उनका कार्य कलीसियाओं की स्थापना से संबंधित था। जो कार्य उन्होंने किया उसने उस कार्य को आगे बढ़ाया जिसे यीशु और उसके प्रेरितों ने समाप्त नहीं किया था या अनुग्रह के युग में आगे विकसित नहीं किया था। उन्होंने अपने कार्य में जो कुछ किया, वह उसे बहाल करना था जिसे यीशु ने अपने प्रारम्भिक कार्य में अपने बाद की पीढ़ियों से करने को कहा था, जैसे कि अपने सिरों को ढक कर रखना, बपतिस्मा ग्रहण करना, रोटी साझा करना या दाखरस पीना। यह कहा जा सकता है कि उनका कार्य केवल बाइबल का पालन करना था और केवल बाइबल के भीतर मार्ग तलाशना था। उन्होंने कोई नई प्रगति बिल्कुल नहीं की। इसलिए, कोई उनके कार्य में केवल बाइबल के भीतर ही नए मार्गों की खोज, और साथ ही बेहतर और अधिक यथार्थवादी अभ्यासों को ही देख सकता है। किन्तु कोई उनके कार्य में परमेश्वर की वर्तमान इच्छा को नहीं खोज सकता है, उस कार्य को तो बिल्कुल नहीं खोज सकता है जिसे परमेश्वर अंत के दिनों में करेगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि जिस मार्ग पर वे चलते थे वह पुराना ही था; उसमें कोई प्रगति नहीं थी और कुछ नया नहीं था। उन्होंने, यीशु को सलीब पर चढ़ाए जाने की वास्तविकता को जकड़े रखना, लोगों को पश्चाताप करने और अपने पापों को स्वीकार करने के लिए कहने के अभ्यास का पालन करना, और इस तरह की उक्तियों जैसे कि, जो अन्त तक सहन करता है बचा लिया जाएगा, पुरुष स्त्री का सिर है और स्त्री को अपने पति का आज्ञापालन करना चाहिए का अभ्यास करना जारी रखा। इसके अलावा, उन्होंने इस परंपरागत धारणा को बनाए रखा कि बहनें उपदेश नहीं दे सकती हैं, वे केवल आज्ञापालन कर सकती हैं। यदि इस तरह की अगुआई जारी रही होती, तो पवित्र आत्मा कभी भी नए कार्य को करने, मनुष्यों को सिद्धांत से मुक्त करने, या मनुष्यों को स्वतंत्रता और सुंदरता के क्षेत्र में ले जाने में समर्थ नहीं होता। इसलिए, युगों के परिवर्तन करने वाला कार्य का यह चरण स्वयं परमेश्वर के द्वारा किया और बोला जाना चाहिए, अन्यथा कोई भी व्यक्ति उसके स्थान पर ऐसा नहीं कर सकता है। अभी तक, इस धारा के बाहर पवित्र आत्मा का समस्त कार्य एकदम रुक गया है, और जिन्हें पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया गया था वे दिग्भ्रमित हो गए हैं। इसलिए, चूँकि पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किए गए मनुष्यों का कार्य परमेश्वर स्वयं के द्वारा किए गए कार्य के असदृश है, इसलिए उनकी पहचान और वे जिनकी ओर से कार्य करते हैं वे भी उसी तरह से भिन्न हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि पवित्र आत्मा जिस कार्य को करने का इरादा करता है वह भिन्न है, फलस्वरूप कार्य करने वाले सभी को अलग-अलग पहचानें और हैसियतें प्रदान की जाती है। पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए गए लोग कुछ ऐसे कार्य भी कर सकते हैं जो नये हों और वे पूर्व युग में किये गए कुछ कार्यों को हटा भी सकते हैं, किन्तु उनका कार्य नए युग में परमेश्वर के स्वभाव और इच्छा को व्यक्त नहीं कर सकता है। वे केवल पूर्व युग के कार्य को हटाने के लिए कार्य करते हैं, और सीधे तौर पर परमेश्वर स्वयं के स्वभाव का प्रतिनिधित्व करने के उद्देश्य से कोई नया कार्य करने के लिए नहीं करते हैं। इस प्रकार, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वे पुराने पड़ चुके कितने अभ्यासों का उन्मूलन करते हैं या वे कितने नए अभ्यासों को आरंभ करते हैं, वे तब भी मनुष्य और सृजित प्राणियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। जबकि परमेश्वर स्वयं जब कार्य को करता है, तो वह प्राचीन युग के अभ्यासों के उन्मूलन की खुलकर घोषणा नहीं करता है या सीधे तौर पर नए युग की शुरुआत की घोषणा नहीं करता है। वह अपने कार्य में प्रत्यक्ष और स्पष्ट है। वह उस कार्य को करने में निष्कपट है जिसका उसने इरादा किया है; अर्थात्, वह उस कार्य को सीधे तौर पर व्यक्त करता है जिसे उसने साकारकिया है, वह सीधे तौर पर अपना कार्य करता है जैसा उसने मूलतः इरादा किया था, और अपने अस्तित्व एवं स्वभाव को व्यक्त करता है। जैसा मनुष्य इसे देखता है, उसका स्वभाव और उसी प्रकार उसका कार्य भी बीते युगोंके असदृश है। हालाँकि, परमेश्वर स्वयं के दृष्टिकोण से, यह मात्र उसके कार्य की निरन्तरता और आगे का विकास है। जब परमेश्वर स्वयं कार्य करता है, तो वह अपने वचन को व्यक्त करता है और सीधे तौर पर नया कार्य लाता है। इसके विपरीत, जब मनुष्य काम करता है, तो यह विचार-विमर्श एवं अध्ययन के माध्यम से होता है, या यह दूसरों के कार्य की बुनियाद पर निर्मित ज्ञान का विकास और अभ्यास का व्यवस्थापन है। कहने का अर्थ है, कि मनुष्य के द्वारा किए गए कार्य का सार पहले से स्थापित व्यवस्था को बनाए रखना और "नए जूतों में पुराने मार्ग पर चलना" है। इसका अर्थ है कि पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए गए मनुष्यों द्वारा चला गया मार्ग भी उस पर बना है जिसे स्वयं परमेश्वर के द्वारा खोला गया था। अंततः मनुष्य आख़िरकर मनुष्य है, और परमेश्वर परमेश्वर है।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "देहधारण का रहस्य (1)" से

4. यूहन्ना प्रतिज्ञा द्वारा जन्मा था, बहुत कुछ जैसे अब्राहम के लिए इसहाक पैदा हुआ था। उसने यीशु के लिए मार्ग प्रशस्त किया और बहुत कार्य किया, किन्तु वह परमेश्वर नहीं था। बल्कि, वह भविष्यद्वक्ताओं में से एक है क्योंकि उसने यीशु के लिए केवल मार्ग प्रशस्त किया था। उसका कार्य भी महान था, और केवल उसके मार्ग प्रशस्त करने के बाद ही यीशु ने आधिकारिक रूप से अपना कार्य शुरू किया। सार में, उसने केवल यीशु के लिए श्रम किया, और उसका कार्य यीशु के कार्य की सेवा में था। उसके मार्ग प्रशस्त करने के बाद, यीशु ने अपना कार्य शुरू किया, वह कार्य जो नया, अधिक यथार्थपूर्ण, और अधिक विस्तृत था। यूहन्ना ने केवल शुरुआत का कार्य किया; अधिकतर नया कार्य यीशु के द्वारा किया गया था। यूहन्ना ने भी नया कार्य किया, किन्तु वह वो नहीं था जिसने नए युग का सूत्रपात किया था। यूहन्ना प्रतिज्ञा के द्वारा जन्मा था, और उसका नाम स्वर्गदूत के द्वारा दिया गया था। उस समय, कुछ लोग उसके पिता जकरयाह के नाम पर उसका नाम रखना चाहते थे, परन्तु उसकी माँ ने कहा, "इस बालक को उस नाम से नहीं पुकारा जा सकता है। उसे यूहन्ना के नाम से पुकारा जाना चाहिए।" यह सब पवित्र आत्मा के द्वारा निर्देशित किया गया था। तो यूहन्ना को परमेश्वर क्यों नहीं कहा गया? यीशु का नाम भी पवित्र आत्मा के आदेश से था, और उसका जन्म पवित्र आत्मा से हुआ था, और पवित्र आत्मा द्वारा उसकी प्रतिज्ञा की गयी थी। यीशु परमेश्वर, मसीह, और मनुष्य का पुत्र था। यूहन्ना का कार्य भी महान था, किन्तु उसे परमेश्वर क्यों नहीं कहा गया? यीशु के द्वारा किए गए कार्य और यूहन्ना के द्वारा किए गए कार्य के बीच वास्तव में क्या अंतर था? क्या यही एकमात्र कारण था कि यूहन्ना वह व्यक्ति था जिसने यीशु के लिए मार्ग प्रशस्त किया था? या इसलिए क्योंकि इसे परमेश्वर के द्वारा पहले से ही नियत कर दिया गया था? यद्यपि यूहन्ना ने भी कहा था, "मन फिराओ, क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है," और स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार का भी उपदेश दिया, उसका कार्य को आगे नहीं बढ़ाया गया था और उसने मात्र एक आरम्भ का गठन किया था। इसके विपरीत, यीशु ने एक नए युग का सूत्रपात किया, और पुराने युग का अंत किया, किन्तु उसने पुराने विधान की व्यवस्था को भी पूरा किया। जो कार्य उसने किया था वह यूहन्ना की अपेक्षा अधिक महान था, और वह समस्त मानवजाति को छुटकारा दिलाने के लिए आया—उसने कार्य के इस चरण को पूर्ण किया। जबकि यूहन्ना ने बस मार्ग तैयार किया। यद्यपि उसका कार्य महान था, उसके वचन बहुत थे, और वे चेले जो उसका अनुसरण करते थे वे बहुतेरे थे, फिर भी उसके कार्य ने लोगों तक एक नई शुरुआत को पहुँचाने से बढ़कर और कुछ नहीं किया। न ही कभी लोगों ने उससे जीवन, मार्ग, या गहरे सत्यों को प्राप्त किया, और न ही उन्होंने उसके जरिए परमेश्वर की इच्छा की समझ को प्राप्त किया। यूहन्ना एक बहुत बड़ा भविष्यद्वक्ता (एलिय्याह) था जिसने यीशु के कार्य के लिए नई भूमि को सामने लाया और चुने हुओं को तैयार किया; वह अनुग्रह के युग का अग्रदूत था। ऐसे मुद्दों को साधारण तौर पर उनके सामान्य मानवीय प्रकटन को देखकर नहीं जाना जा सकता है। विशेष रूप से इस कारण कि यूहन्ना ने भी बहुत बड़ा काम किया; इसके अतिरिक्त, वह पवित्र आत्मा की प्रतिज्ञा के द्वारा जन्मा था, और उसके कार्य को पवित्र आत्मा के द्वारा समर्थन दिया गया था। उसी प्रकार, केवल उनके कार्य के माध्यम से उनकी अपनी-अपनी अपनी पहचान के बीच अन्तर किया जा सकता है, क्योंकि किसी मनुष्य का बाहरी प्रकटन उसके सार के बारे में नहीं बताता है, न ही कोई ऐसा तरीका है जिससे मनुष्य पवित्र आत्मा की सच्ची गवाही को सुनिश्चित करने में समर्थ हो। यूहन्ना के द्वारा किया गया कार्य और यीशु के द्वारा किया गया कार्य समान नहीं थे साथ ही अलग-अलग प्रकृतियों के थे। इसी से यह निर्धारित करना चाहिए कि वह परमेश्वर है या नहीं। यीशु का कार्य शुरूआत करना, जारी रखना, समापन करना और सफल बनाना था। इनमें से प्रत्येक चरण यीशु के द्वारा सम्पन्न किया गया था, जबकि यूहन्ना का कार्य शुरुआत से अधिक और कुछ नहीं था। आरम्भ में, यीशु ने सुसमाचार को फैलाया और पश्चाताप के मार्ग का उपदेश दिया, फिर वह मनुष्य को बपतिस्मा देने लगा, बीमारों को चंगा करने लगा, और दुष्टात्माओं को निकालने लगा। अंत में, उसने मानवजाति को पाप से छुटकारा दिलाया और सम्पूर्ण युग के अपने कार्य को पूरा किया। उसने सभी स्थानों में मनुष्य को स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार का उपदेश दिया और उसे फैलाया। इस लिहाज से यीशु और यूहन्ना समान थे, अन्तर यह था कि यीशु ने एक नए युग का सूत्रपात किया और वह मनुष्य के लिए अनुग्रह का युग लाया। उसके मुँह से वह वचन निकला जिसका मनुष्य को अभ्यास करना चाहिए और वह मार्ग निकला जिसका मनुष्य को अनुग्रह के युग में अनुसरण करना चाहिए, और अंत में, उसने छुटकारे के कार्य को पूरा किया। ऐसा कार्य यूहन्ना के द्वारा कभी सम्पन्न नहीं किया जा सकता थ। और इसलिए, यह यीशु ही था जिसने परमेश्वर स्वयं के कार्य को किया, और वही है जो परमेश्वर स्वयं है और जो प्रत्यक्ष रूप से परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है। मनुष्य की धारणाएँ कहती हैं कि वे सभी जो प्रतिज्ञा द्वारा जन्मे थे, पवित्र आत्मा से जन्मे थे, पवित्र आत्मा द्वारा सँभाले गए थे और जिन्होंने नए मार्ग खोले वे परमेश्वर हैं। इस तर्क के अनुसार, यूहन्ना भी परमेश्वर होगा, और मूसा, अब्राहम और दाऊद..., ये भी परमेश्वर होंगे। क्या यह पूरी तरह एक मज़ाक नहीं है?

"वचन देह में प्रकट होता है" में "देहधारण का रहस्य (1)" से

5. लोग विश्वास करते हैं कि परमेश्वर जो देह में आता है निश्चित रूप से मनुष्य की तरह नहीं जीता है; वे मानते हैं कि वह अपने दाँतों को साफ किए बिना या अपने चेहरे को धोए बिना ही स्वच्छ रहता है, क्योंकि वह एक पवित्र व्यक्ति है। क्या ये सब पूर्ण रूप से मनुष्य की धारणाएँ नहीं हैं? बाइबल एक मनुष्य के रूप में यीशु के जीवन को लिखित रूप में दर्ज नहीं करती है, केवल उसके कार्य को दर्ज करती है, किन्तु इससे यह साबित नहीं होता कि उसके पास एक सामान्य मानवता नहीं थी या यह कि उसने 30 वर्ष की आयु से पहले सामान्य मानव जीवन नहीं जीया था। उसने आधिकारिक रूप से 29 वर्ष की आयु में अपने कार्य को आरम्भ किया, किन्तु उस आयु से पहले तुम मनुष्य के रूप में उसके सम्पूर्ण जीवन से इनकार नहीं कर सकते हो। बाइबल ने मात्र उस चरण को अपने लिखित दस्तावेज़ों से हटा दिया; क्योंकि यह एक साधारण मनुष्य के रूप में उसका जीवन था और उसके दिव्य कार्य का समय नहीं था, इसलिए इसको लिखे जाने की कोई आवश्यकता नहीं थी। क्योंकि यीशु के बपतिस्मा से पहले, पवित्र आत्मा ने सीधे अपना कार्य नहीं किया, परन्तु उसने मात्र एक साधारण मनुष्य के रूप में उसके जीवन को उस दिन तक बनाए रखा था जबसे यीशु के लिए अपनी सेवकाई करना निश्चित था। यद्यपि वह देहधारी परमेश्वर था, फिर भी वह परिपक्व होने की प्रक्रिया से वैसे ही गुज़रा था जैसे एक आम मानव गुज़रता है। इस प्रक्रिया को बाइबल से हटा दिया गया था, क्योंकि यह मनुष्य के जीवन की उन्नति में कोई बड़ी सहायता प्रदान नहीं कर सकता था। उसके बपतिस्मा से पहले का समय एक गुप्त समय था जिसमें न ही उसने चिह्न दिखाये न अद्भुत काम किए। केवल अपने बपतिस्मा के बाद ही यीशु ने मानवजाति के छुटकारे के समस्त कार्य को करना आरम्भ किया, ऐसा कार्य जो अनुग्रह, सत्य, और प्रेम, और करुणा की प्रचुर मात्रा से भरपूर था। इस कार्य का आरम्भ अनुग्रह के युग का आरम्भ भी था; इसी कारण से, इसे लिखा गया और वर्तमान तक पहुँचाया गया। यह अनुग्रह के युग के सभी लोगों के वास्ते एक बचाव का मार्ग समाने लाने और समस्त को पूर्ण करने के लिए था ताकि वे अनुग्रह के युग के और सलीब के मार्ग पर चल सकें। यद्यपि इस तरह के अभिलेख, कुछ मामलों में मामूली त्रुटियों के साथ, मनुष्य के द्वारा लिखे गए थे, फिर भी ये सभी तथ्यों के विवरण हैं। इस सब के बावज़ूद, ऐसे मामलों की सत्यता से कोई इनकार नहीं कर सकता है। ये पूरी तरह से तथ्यात्मक हैं, बस लोगों ने लिखते समय कुछ गलतियाँ कर दीं हैं। कुछ लोग कह सकते हैं कि यीशु एक सामान्य और साधारण मनुष्य था, तो ऐसा कैसे हो सकता है कि वह चिन्हों और अद्भुत कामों को करने में सक्षम था? प्रलोभन के वे चालीस दिन जिनसे यीशु गुज़रा एक चमत्कारिक चिह्न है, ऐसा जिसे एक साधारण व्यक्ति प्राप्त करने में अक्षम होगा। चालीस दिनों का उसका प्रलोभन पवित्र आत्मा का कार्य था; तो फिर कोई ऐसा कैसे कह सकता है कि उसके भीतर लेश मात्र भी अलौकिकता नहीं है? उसका चिह्नों और अद्भुत कामों को करना यह नहीं दर्शाता है कि वह कोई साधारण व्यक्ति नहीं बल्कि एक सर्वोत्कृष्ट व्यक्ति था; यह केवल इतना ही दर्शाता है कि पवित्र आत्मा ने उस जैसे एक साधारण व्यक्ति में कार्य किया, और इस प्रकार उसके लिए चमत्कारों को करना और अधिक बड़ा कार्य करना संभव बनाया। यीशु के अपनी सेवकाई करने से पहले, या जैसा कि बाइबल में कहा गया है, उसके ऊपर पवित्र आत्मा के उतरने से पहले, यीशु सिर्फ एक साधारण मनुष्य था और थोड़ी सी भी अलौकिकता धारण नहीं करता था। पवित्र आत्मा के उतरने पर, अर्थात्, जब उसने अपनी सेवकाई को करना आरम्भ किया, तब वह अलौकिकता से व्याप्त हो गया। इस तरह, लोग यह धारणा रखने लगे कि परमेश्वर के देहधारी देह में कोई साधारण मानवता नहीं होती और ग़लत ढंग से यह मानते हैं कि देहधारी परमेश्वर में कोई मानवता नहीं है। निश्चित रूप से, जब परमेश्वर धरती पर आता है, तो उसका कार्य और वह सब कुछ जिन्हें मनुष्य देखता है वह अलौकिक है। जो कुछ तुम अपनी आँखों से देखते हो और जो कुछ तुम अपने कानों से सुनते हो वे सब अलौकिक हैं, क्योंकि उसके कार्य और उसके वचन मनुष्य के लिए अबोधगम्य और अप्राप्य है। यदि स्वर्ग की किसी चीज़ को पृथ्वी पर लाया जाता है, तो वह अलौकिक होने के सिवाए कोई अन्य चीज़ कैसे हो सकती है? जब स्वर्ग के राज्य के रहस्यों को पृथ्वी पर लाया जाता है, ऐसे रहस्य जो मनुष्य के लिए अबोधगम्य और अगाध हैं, जो बहुत चमत्कारिक और बुद्धिमत्तापूर्ण हैं—क्या वे सब अलौकिक नहीं हैं? हालाँकि, तुम्हें यह जानना चाहिए कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वे कितने अलौकिक हैं, उन्हें उसकी सामान्य मानवता में किया जाता है। परमेश्वर के देहधारी देह में मानवता है, अन्यथा, वह परमेश्वर का देहधारी देह नहीं होता।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "देहधारण का रहस्य (1)" से

6. देह में परमेश्वर के आत्मा का कार्य भी अपने स्वयं के सिद्धान्त द्वारा नियमित होता है। वह परमपिता के कार्य और उत्तरदायित्व को तभी अपने ऊपर ले सकता है जब वह सामान्य मानवता को धारण कर ले। केवल तभी वह अपना काम प्रारम्भ कर सकता है। अपने बचपन में, जो कुछ प्राचीन समयों में घटित हुआ था यीशु उन्हें बहुत ज़्यादा नहीं समझ पाता था, और केवल रब्बियों से पूछने के माध्यम से ही वह समझ पाया था। यदि पहली बार बोलना सीखते ही उसने अपने कार्य को आरम्भ किया होता, तो कोई ग़लती न करना कैसे सम्भव होता? परमेश्वर कैसे ग़लतियाँ कर सकता है? इसलिए, यह केवल समर्थ होने के पश्चात् ही उसने अपना काम आरम्भ किया; उसने तब तक किसी भी कार्य को नहीं किया जब तक वह ऐसे कार्य को आरम्भ करने में पूरी तरह से सक्षम नहीं हो गया। 29 वर्ष की आयु में, यीशु पहले से ही काफी परिपक्व हो चुका था और उसकी मानवता जो कार्य उसे करना था उसको आरम्भ करने के लिए पर्याप्त रूप से समर्थ थी। केवल तभी जो तीस वर्षों से छिपे पवित्र आत्मा ने स्वयं को प्रकट करना आरम्भ किया, और परमेश्वर का आत्मा आधिकारिक रूप से उसमें कार्य करने लगा। उस समय, यूहन्ना ने उसके लिए मार्ग खोलने के लिए सात वर्षों तक तैयारी की थी, और अपने कार्य का समापन पर, उसे बंदीगृह में डाल दिया गया था। तब पूरा बोझ यीशु पर आ गया। यदि उसने इस कार्य को 21 या 22 वर्ष की आयु में प्रारम्भ किया होता, जब उसमें मानवता का अभी भी अभाव था और उसने बस अभी-अभी युवा वयस्कता में प्रवेश किया था, और उसमें बहुत सी चीज़ों की समझ का अभाव था, तो वह नियन्त्रण अपने हाथों मेंले पाने में असमर्थ होता। उस समय, यीशु के कार्य आरम्भ करने के पूर्व ही यूहन्ना ने पहले ही अपने कार्य को सम्पन्न कर लिया था, इस समय तक यीशु मध्य आयु में प्रवेश कर चुका था। उस आयु में, उसकी सामान्य मानवता उस कार्य को आरम्भ करने के लिए पर्याप्त थी जो उसे करना चाहिए था।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "देहधारण का रहस्य (1)" से

7. जब देहधारी परमेश्वर, देह में कार्य करता है, तो बहुत से सिद्धान्त हैं, और मामले होते हैं जिन्हें मनुष्य साधारणतः नहीं समझता है; मनुष्य उसे मापने के लिए या परमेश्वर से बहुत अधिक माँग करने के लिए लगातार अपनी स्वयं की अवधारणाओं का उपयोग करता है। फिर भी आज के दिन भी बहुत से ऐसे लोग हैं जिन्हें बिलकुल भी पता नहीं है कि उनके ज्ञान में उनकी स्वयं की अवधारणाओं से अधिक और कुछ भी नहीं है। वह युग या स्थान जो भी हो जिसमें परमेश्वर ने देहधारण किया है, देह में उसके कार्य के सिद्धान्त अपरिवर्तनीय बने रहते हैं। वह देह बन कर अपने कार्य में देह की सीमाओं से परे नहीं जा सकता है; इसके अतिरिक्त, देह बनने पर भी देह की साधारण मानवता के भीतर काम नहीं करना तो और भी असम्भव है। अन्यथा, परमेश्वर के देहधारण का महत्व घुलकर शून्य हो जाएगा, और वचन का देह बनना पूरी तरह से निरर्थक हो जाएगा। इसके अतिरिक्त, केवल स्वर्ग में परमपिता (पवित्रात्मा) ही परमेश्वर के देहधारण के बारे में जानता है, और दूसरा कोई नहीं, यहाँ तक कि स्वयं देह या स्वर्ग के दूत भी नहीं जानते हैं। देह में परमेश्वर का कार्य और भी अधिक सामान्य है और बेहतर ढंग से यह प्रदर्शित करने में समर्थ है कि वास्तव में वचन देह बन गया है; देह का अर्थ एक सामान्य और साधारण मनुष्य है।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "देहधारण का रहस्य (1)" से

8. कुछ लोग आश्चर्य कर सकते हैं, युग का सूत्रपात स्वयं परमेश्वर के द्वारा क्यों किया जाना चाहिए? क्या उसके स्थान पर कोई सृजित प्राणी नहीं खड़ा हो सकता है? तुम लोग अच्छी तरह से अवगत हो कि एक नए युग का सूत्रपात करने के खास उद्देश्य से परमेश्वर देह बनता है, और, वास्तव में, जब वह नए युग का सूत्रपात करेगा, तो वह उसके साथ-साथ ही पूर्व युग का समापन भी करेगा। परमेश्वर आदि और अंत है; वह स्वयं ही है जो अपने कार्य को चलाता है और इसलिए वह स्वयं ही वो होना चाहिए जो पहले के युग का समापन करता है। यही प्रमाण है कि वह शैतान को पराजित करता है और संसार को जीत लेता है। प्रत्येक बार जब वह स्वयं मनुष्य के बीच कार्य करता है, तो यह एक नए युद्ध की शुरुआत होती है। नए कार्य की शुरुआत के बिना, स्वाभाविक रूप से पुराने का कोई समापन नहीं होगा। और पुराने का समापन न होना इस बात का प्रमाण है कि शैतान के साथ युद्ध अभी तक समाप्त नहीं हुआ है। यदि स्वयं परमेश्वर मनुष्यों के बीच में आता है और एक नया कार्य करता है, केवल तभी मनुष्य शैतान के अधिकार क्षेत्र को तोड़कर पूरी तरह से स्वतन्त्र हो सकता है और एक नया जीवन एवं नई शुरुआत प्राप्त कर सकता है। अन्यथा, मनुष्य सदैव ही पुराने युग में जीएगा और हमेशा शैतान के पुराने प्रभाव के अधीन रहेगा। परमेश्वर के द्वारा अगुवाई किए गए प्रत्येक युग के साथ, मनुष्य के एक भाग को स्वतन्त्र किया जाता है, और इस प्रकार परमेश्वर के कार्य के साथ-साथ मनुष्य एक नए युग की ओर आगे बढ़ता है। परमेश्वर की विजय उन सबकी विजय है जो उसका अनुसरण करते हैं। यदि सृजित मानवजाति को युग के समापन का कार्यभार दिया जाता, तब चाहे यह मनुष्य के दृष्टिकोण से हो या शैतान के, यह एक ऐसे कार्य से बढ़कर नहीं होता जो परमेश्वर का विरोध या परमेश्वर के साथ विश्वासघात करता है, न कि परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता का एक कार्य होता, और इस प्रकार मनुष्य का कार्य शैतान का साधन बन जाता। केवल जब मनुष्य परमेश्वर के द्वारा सूत्रपात किए गए एक युग में परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन और अनुसरण करता है, तभी शैतान पूरी तरह से आश्वस्त होगा, क्योंकि यह सृजित प्राणी का कर्तव्य है। और इसलिए मैं कहता हूँ कि तुम लोगों को केवल अनुसरण और आज्ञापालन कंरने की आवश्यकता है, और इससे अधिक तुम लोगों से किसी बात की अपेक्षा नहीं की जाती है। प्रत्येक व्यक्ति के द्वारा अपने कर्तव्य का पालन करने और अपने कार्य को क्रियान्वित करने का अर्थ यही है। परमेश्वर स्वयं अपना काम करता है और उसे कोई आवश्यकता नहीं है कि मनुष्य उसके स्थान पर काम करे, और न ही वह सृजित प्राणियों के काम में भाग लेता है। मनुष्य अपना स्वयं का कर्तव्य करता है और परमेश्वर के कार्य में हस्तक्षेप नहीं करता है। केवल यही सच्ची आज्ञाकारिता है और शैतान की पराजय का सबूत है। जब परमेश्वर स्वयं ने नए युग का आरम्भ कर दिया उसके पश्चात्, वह मानवों के बीच अब और कार्य करने नहीं आएगा। तभी एक सृजित प्राणी के रूप में मनुष्य अपने कर्तव्य को करने और अपने ध्येय को सम्पन्न करने के लिए आधिकारिक रूप से नए युग में कदम रखेगा। कार्य करने के सिद्धान्त ऐसे ही हैं जिनका उल्लंघन किसी के द्वारा नहीं किया जा सकता है। केवल इस तरह से कार्य करना ही विवेकपूर्ण और तर्कसंगत है। परमेश्वर का कार्य परमेश्वर स्वयं के द्वारा किया जाना है। वही अपने कार्य को चलाता है, और साथ ही उसका समापन करता है। वही है जो कार्य की योजना बनाता है, और साथ ही उसका प्रबंधन करता है, और उससे भी बढ़कर, वही उस कार्य को सफल बनाता है। जैसा बाइबल में कहा गया है, "मैं ही आदि और अंत हूँ; मैं ही बोनेवाला और काटनेवाला हूँ।" वो सब कुछ जो उसके प्रबंधन के कार्य से संबंधित है स्वयं परमेश्वर के द्वारा किया जाता है। वह छ:-हज़ार-वर्षों की प्रबंधन योजना का शासक है; कोई भी उसके स्थान पर उसका काम नहीं कर सकता है या उसके कार्य का समापन नहीं कर सकता है, क्योंकि यह वही है जो सबको अपने हाथों में रखता है। चूँकि उसने संसार का सृजन किया है, वह संपूर्ण संसार की अगुवाई करेगा ताकि सब उसके प्रकाश में जीवन जीएँ, और संपूर्ण युग का समापन करने के परिणामस्वरूप अपनी सम्पूर्ण योजना को सफल करेगा!

"वचन देह में प्रकट होता है" में "देहधारण का रहस्य (1)" से

9. उस समय जब यीशु ने यहूदिया में कार्य किया था, तब उसने खुलकर ऐसा किया, परन्तु अब, मैं तुम लोगों के बीच गुप्त रूप से काम करता और बोलता हूँ। अविश्वासी लोग इस बात से पूरी तरह से अनजान हैं। तुम लोगों के बीच मेरा कार्य उन लोगों के लिए बंद है जो बाहर हैं। इन वचनों, इन ताड़नाओं और न्यायों को केवल तुम लोग ही जानते हो और कोई नहीं। यह समस्त कार्य तुम लोगों बीच में कार्यान्वित किया जाता है और केवल तुम लोगों के लिए प्रकट किया जाता है; अविश्वासियों में से कोई भी इसे नहीं जानता है, क्योंकि समय अभी तक नहीं आया है। यहाँ ये लोग ताड़नाओं को सहने के बाद पूर्ण बनाए जाने के समीप हैं, परन्तु जो लोग बाहर हैं वे इस बारे में कुछ नहीं जानते हैं। यह कार्य बहुत अधिक छिपा हुआ है! उनके लिए, परमेश्वर का देह बन जाना गोपनीय बात है, परन्तु जो इस धारा में हैं उनके लिए, कोई कह सकता है कि वह स्पष्ट है। यद्यपि परमेश्वर में सब कुछ स्पष्ट है, सब कुछ प्रकट है, और सब कुछ मुक्त है, फिर भी यह केवल उनके लिए सही है जो उसमें विश्वास करते हैं; और जहाँ तक शेष, अविश्वासियों का संबंध है, कुछ भी ज्ञात नहीं करवाया जाता है। अब यहाँ कार्यान्वित किए जा रहे कार्य को उन्हें ज्ञात होने से सुरक्षित रखने के लिए कड़ाई से बंद किया जाता है। यदि वे इस कार्य से अवगत हो जाते हैं, तो वे जो कुछ भी करेंगे वह इसकी निंदा होगी और वे इसे उत्पीड़न के अधीन करेंगे। वे इसमें विश्वास नहीं करेंगे। बड़े लाल अजगर के देश, इस सबसे अधिक पिछड़े हुए इलाके, में कार्य करना कोई आसान काम नहीं है। यदि इस कार्य को खुले में रखा गया होता, तब इसे जारी रखना असम्भव होता। कार्य का यह चरण बस इस स्थान में कार्यान्वित नहीं किया जा सकता है। यदि इस कार्य को खुले तौर पर किया जाता, तो वे इसे कैसे आगे जाने दे सकते थे? क्या यह कार्य को और अधिक जोखिम में नहीं डाल देता? यदि इस कार्य को छिपा कर नहीं रखा जाता, बल्कि इसके बजाए यीशु के समय के समान ही कार्यान्वित किया जाता, जब उसने असाधारण ढंग से बीमारों को चंगा किया और दुष्टात्माओं को निकाला था, तो क्या इसे बहुत पहले ही दुष्टात्माओं के द्वारा "बंदी बना" नहीं लिया गया होता? क्या वे परमेश्वर के अस्तित्व को बर्दाश्त करने में समर्थ होते? यदि मुझे मनुष्य को उपदेश और व्याख्यान देने के लिए अब बड़े कक्षों में प्रवेश करना होता, तो क्या मुझे बहुत पहले ही टुकड़े-टुकड़े नहीं कर दिया गया होता? और यदि ऐसा होता, तो मेरा कार्य किया जाना कैसे जारी रखा जा सकता था? चिह्नों और अद्भुत कामों को खुले तौर पर अभिव्यक्त नहीं किया जाता है इसका कारण प्रच्छन्नता के वास्ते है। इसलिए, मेरा कार्य अविश्वासियों के द्वारा देखा, जाना या खोजा नहीं जा सकता है। यदि कार्य के इस चरण को उसी तरीके के समान किया जाना होता जैसा कि अनुग्रह के युग में यीशु का था, तो यह इतना सुस्थिर नहीं हो सकता था जितना यह अब है। इसलिए, इस तरह से गुप्त रूप से कार्य करना तुम लोगों के और समस्त कार्य के लाभ के लिए है। जब पृथ्वी पर परमेश्वर का कार्य समाप्त होता है, अर्थात्, जब इस गुप्त कार्य का समापन हो जाता है, तब कार्य का यह चरण झटके से प्रकट हो जाएगा। सब जान जाएँगे कि चीन में विजेताओं का एक समूह है; सब जान जाएँगे कि परमेश्वर ने चीन में देहधारण किया है और यह कि उसका कार्य समाप्ति पर आ गया है। केवल तभी मनुष्य पर प्रकटन होगा: ऐसा क्यों है कि चीन ने अभी तक ह्रास या पतन का प्रदर्शन नहीं किया है? इससे पता चलता है कि परमेश्वर चीन में व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य कर रहा है और उसने लोगों के एक समूह को विजाताओं के रूप में सिद्ध बना दिया है।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "देहधारण का रहस्य (2)" से

10. देहधारी बना परमेश्वर स्वयं को केवल कुछ लोगों पर ही अभिव्यक्त करता है जो इस अवधि के दौरान उसका अनुसरण करते हैं जब वह व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य करता है, और सभी प्राणियों पर प्रकट नहीं करता है। वह अपने कार्य के केवल एक चरण को पूरा करने के लिए देह बना, मनुष्य को अपनी छवि दिखाने के वास्ते नहीं। हालाँकि, उसके कार्य को स्वयं उसके द्वारा ही किया जाना चाहिए, इसलिए देह में ऐसा करना उसके लिए आवश्यक है। जब यह कार्य पूरा हो जाएगा, तो वह मानवीय दुनिया से चला जाएगा; वह इस बात के भय से लम्बी अवधि तक मनुष्यजाति के बीच बना नहीं रह सकता है कि कहीं आने वाले कार्य के मार्ग में खड़ा न हो जाए। जो कुछ वह भीड़ पर प्रकट करता है वह केवल उसका धार्मिक स्वभाव और उसके समस्त कर्म हैं, और उसकी देह की छवि नहीं है जब वह दूसरी बार देहधारण करता है, क्योंकि परमेश्वर की छवि को केवल उसके स्वभाव के माध्यम से ही प्रदर्शित किया जा सकता है, और उसे उसके देहधारी देह की छवि के द्वारा बदला नहीं जा सकता है। उसके देह की छवि केवल लोगों की एक सीमित संख्या को, केवल उन्हें ही दिखाई जाती है जो उसका अनुसरण करते हैं जब वह देह में कार्य करता है। इसीलिए जो कार्य अब किया जा रहा है उसे इस तरह गुप्त रूप में किया जाता है। उसी तरह से, यीशु ने जब अपना कार्य किया तो उसने स्वयं को केवल यहूदियों को ही दिखाया, और अपने आप को कभी भी दूसरी जातियों को सार्वजनिक रूप से नहीं दिखाया। इस प्रकार, जब एक बार उसने काम समाप्त कर लिया, तो वह तुरन्त ही मनुष्यों के बीच से चला गया और रुका नहीं; उसके बाद यह वह, मनुष्य की यह छवि, नहीं था, जिसने स्वयं को मनुष्य को दर्शाया था, बल्कि पवित्र आत्मा था जिसने सीधे तौर पर कार्य को कार्यान्वित किया। एक बार जब परमेश्वर के देह बनने का कार्य पूरी तरह से समाप्त हो जाता है, तो वह नश्वर संसार से चला जाता है, और फिर कभी भी उसके समान कार्य नहीं करता है जो उसने उस समय किया था जब वह देह में था। इसके बाद का समस्त कार्य पवित्र आत्मा के द्वारा सीधे तौर पर किया जाता है। इस अवधि के दौरान, मनुष्य मुश्किल से ही उसके हाड़-माँस के शरीर की छवि को देखने में समर्थ होता है; वह स्वयं को मनुष्य पर बिल्कुल भी प्रकट नहीं करता है, बल्कि हमेशा छिपा रहता है। देहधारी बने परमेश्वर के कार्य के लिए समय सीमित है। इसे एक विशेष युग, अवधि, देश और विशेष लोगों के बीच किया जाता है। यह कार्य केवल परमेश्वर के देहधारण की अवधि के दौरान के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है, और यह उस युग के लिए विशेष है; एक विशेष युग में परमेश्वर के आत्मा के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है, और उसके कार्य की सम्पूर्णता का नहीं। इसलिए, परमेश्वर के देह बनने की छवि सभी लोगों को नहीं दिखाई जाएगी। जो कुछ जनसमूह को दिखाया जाता है वह परमेश्वर की धार्मिकता और उसकी सम्पूर्णता में उसका स्वभाव है, बजाए उसके स्वरूप के जब वह दूसरी बार देह बना। यह न तो इकलौती छवि है जो मनुष्य को दिखायी जाती है, और न ही दो संयुक्त छवियाँ हैं। इसलिए, यह अति महत्वपूर्ण है कि परमेश्वर का देहधारी देह उस कार्य की समाप्ति पर पृथ्वी से चला जाए जिसे उसे करने की आवश्यकता है, क्योंकि वह केवल उस कार्य को करने आता है जो उसे करना चाहिए, लोगों को अपनी छवि दिखाने नहीं आता है। यद्यपि देहधारण के महत्व को परमेश्वर के द्वारा पहले ही दो बार देहधारण करके पूरा किया जा चुका है, फिर भी वह किसी ऐसे देश पर अपने आपको खुलकर प्रकट नहीं करेगा जिसने उसे पहले कभी नहीं देखा है।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "देहधारण का रहस्य (2)" से

11. एक बार जब परमेश्वर के दो देहधारणों का कार्य समाप्त हो जाएगा, तो वह, जनसमूह को अपना स्वरूप देखने देते हुए, अन्यजाति देशों भर में अपना धार्मिक स्वभाव दिखाना शुरू करेगा। वह अपने स्वभाव को अभिव्यक्त करेगा, और इसके माध्यम से भिन्न-भिन्न श्रेणियों के मनुष्यों के अंत को स्पष्ट करेगा, फलस्वरूप पुराने युग को पूरी तरह से समाप्त कर देगा। देह में उसका कार्य बड़ी सीमा तक विस्तारित नहीं होता है (ठीक वैसे ही जैसे यीशु ने केवल यहूदिया में काम किया था, और आज मैं केवल तुम लोगों बीच कार्य करता हूँ) उसका कारण है क्योंकि देह में उसके कार्य की हदें और सीमाएँ हैं। वह केवल एक साधारण और सामान्य देह में एक अल्प समयावधि का कार्य कर रहा है; वह शाश्वतता का कार्य करने या अन्यजाति देशों के लोगों को दिखाई देने के कार्य को करने के लिए इस देहधारी देह का उपयोग नहीं कर रहा है। देह में कार्य को केवल दायरे में सीमित किया जा सकता है (जैसे कि सिर्फ यहूदिया में या सिर्फ तुम लोगों बीच में कार्य करना), और तब इन सीमाओं के भीतर किए गए कार्य के माध्यम से, इसके दायरे को तब विस्तारित किया जा सकता है। वास्तव में, विस्तार का कार्य सीधे तौर पर पवित्र आत्मा के द्वारा किया जाना है और तब उसके देहधारी देह का कार्य अब और नहीं होगा। क्योंकि देह में कार्य की सीमाएँ हैं और यह विश्व के सभी कोनों तक नहीं फैलता है—इसलिए इसे, यह पूरा नहीं कर सकता है। देह में कार्य के माध्यम से, उसका आत्मा उस कार्य को करता है जो उसके बाद आता है। इसलिए, देह में किया गया कार्य उद्घाटन की प्रकृति का है जिसे कुछ निश्चित सीमाओं के भीतर किया जाता है; इसके बाद, यह उसका आत्मा है जो इस कार्य को आगे बढ़ाता है, और इसके अलावा ऐसा एक बढ़े हुए दायरे में करता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "देहधारण का रहस्य (2)" से

12. परमेश्वर इस पृथ्वी पर जिस कार्य को करने के लिए आता है वह केवल युग की अगुवाई करना, नए युग को आरम्भ करना और पुराने युग को समाप्त करना है। वह इस पृथ्वी पर मनुष्य के जीवन के मार्ग को जीने, एक मनुष्य के रूप में स्वयं जीवन के सुखों और दुःखों का अनुभव करने, या अपने हाथ से किसी निश्चित व्यक्ति को सिद्ध बनाने या जब कोई आगे बढ़ता है तो उसकी व्यक्तिगत रूप से निगरानी करने के लिए नहीं आया है। यह उसका कार्य नहीं है; उसका कार्य केवल एक नए युग का मार्ग प्रशस्त करना और पुराने युग को समाप्त करना है। अर्थात्, वह व्यक्तिगत रूप से एक युग का मार्ग प्रशस्त करेगा, व्यक्तिगत रूप से अन्य युग का अंत करेगा, और व्यक्तिगत रूप से कार्य करके शैतान को पराजित करेगा। हर बार जब वह व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य करता है, तो यह ऐसा है मानो कि वह युद्ध के मैदान में कदम रख रहा हो। सबसे पहले, वह संसार को पराजित करता है और देह में शैतान को जीतता है; वह सारी महिमा का मालिक हो जाता है और दो हज़ार वर्षों के कार्य की समग्रता पर से पर्दा उठता है, और इसे ऐसा बना देता है कि पृथ्वी के सभी मनुष्यों के पास चलने के लिए एक सही मार्ग और रहने के लिए एक शांति और आनन्द का जीवन हो। हालाँकि, परमेश्वर लम्बे समय तक पृथ्वी पर मनुष्य के साथ नहीं रह सकता है, क्योंकि परमेश्वर तो परमेश्वर है, और अंततः मनुष्य के असदृश है। वह एक सामान्य मनुष्य का जीवनकाल नहीं जी सकता है, अर्थात्, वह पृथ्वी पर एक ऐसे मनुष्य के रूप में नहीं रह सकता है जो साधारण के अलावा कुछ नहीं है, क्योंकि उसके पास अपने जीवन को बनाए रखने के लिए एक साधारण मनुष्य की सामान्य मानवता का केवल एक अल्पतम अंश ही है। दूसरे शब्दों में, कैसे परमेश्वर एक परिवार शुरू कर सकता है, उसकी एक आजीविका हो सकती है, और वह पृथ्वी पर बच्चे पैदा कर सकता है? क्या यह उसके लिए एक अपमान नहीं होगा? उसे सिर्फ सामान्य तरीके से कार्य करने के उद्देश्य से, न कि जैसा कि एक साधारण मनुष्य करता है, उसे अपना परिवार और आजीविका रखने में समर्थ होने के लिए, सामान्य मानवता प्रदान की जाती है। उसकी सामान्य समझ, सामान्य मन, और सामान्य भोजन और उसके देह के वस्त्र यह प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त हैं कि उसमें एक सामान्य मानवता है; इस बात को साबित करने के लिए कि वह सामान्य मानवता से सुसज्जित है उसे एक परिवार या एक आजीविका रखने की कोई आवश्यकता नहीं है। यह पूरी तरह से अनावश्यक होगा! परमेश्वर का पृथ्वी पर आना वचन का देह बनना है; वह मनुष्य को मात्र अपने वचन को समझने और अपने वचन को देखने दे रहा है, अर्थात्, देह द्वारा किए गए कार्य को मनुष्य को देखने दे रहा है। उसका अभिप्राय यह नहीं है कि लोग उसके देह के साथ एक विशेष तरीके से व्यवहार करें, बल्कि मनुष्य केवल अंत तक आज्ञाकारी बने रहें, अर्थात्, उन सभी वचनों का पालन करें जो उसके मुँह से निकलते हैं, और उस समस्त कार्य के प्रति समर्पित हो जाएँ जिसे वह करता है। वह मात्र देह में कार्य कर रहा है; जानबूझ कर मनुष्य से यह नहीं कह रहा है कि वे उसकी देह की महानता या पवित्रता की सराहना करें, बल्कि वह मनुष्यों को अपने कार्य की बुद्धि और वह समस्त अधिकार दिखा रहा है जिसका वह प्रयोग करता है। इसलिए, भले ही उसके पास उत्कृष्ट मानवता है, फिर भी वह कोई घोषणा नहीं करता है, और केवल उस कार्य पर ध्यान केन्द्रित करता है जो उसे करना चाहिए। तुम लोगों को जानना चाहिए कि ऐसा क्यों है कि परमेश्वर देह बना और फिर भी वह सामने प्रकट नहीं होता है या अपनी सामान्य मानवता की गवाही नहीं देता है, बल्कि इसके बजाय केवल उस कार्य को कार्यान्वित करता है जिसे करने की उसकी इच्छा है। इसलिए, जो कुछ तुम लोग देहधारी परमेश्वर से देख सकते हो यही वह है जो वह दिव्यता में है, ऐसा इसलिए है क्योंकि वह मनुष्य के लिए स्पर्धा करने हेतु कभी भी इस बात की घोषणा नहीं करता है कि मानवीय रूप से वह क्या है। जब मनुष्य मनुष्यों की अगुवाई करता है केवल तभी, उनकी प्रशंसा और उनके द्वारा अधीनता को बेहतर ढंग से प्राप्त करने और फलस्वरूप दूसरों की अगुआई प्राप्त करने के लिए, वह बात करता है कि वह मानवीय रूप में क्या है। इसके विपरीत, परमेश्वर केवल अपने कार्य के माध्यम से ही मनुष्य पर विजय पाता है (अर्थात्, मनुष्य के लिए अप्राप्य कार्य)। मनुष्य के द्वारा उसकी प्रशंसा किए जाने, या मनुष्य से उसकी आराधना करवाने की कोई संभावना ही नहीं है। जो कुछ भी वह करता है वह उसके प्रति मनुष्य में आदर की भावना या उसकी अगाधता का एक भाव भरना है। मनुष्य को प्रभावित करने की परमेश्वर को कोई आवश्यकता नहीं है। वह तुम लोगों से बस इतना ही चाहता है कि जब एक बार तुम लोगों ने उसके स्वभाव को देख लिया है तो उसका आदर करो। परमेश्वर जो कार्य करता है वह उसका स्वयं का है; इसे उसके स्थान पर मनुष्य के द्वारा नहीं किया जा सकता है, न ही इसे मनुष्य के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। केवल स्वयं परमेश्वर ही अपना स्वयं का कार्य कर सकता है और मनुष्य की नए जीवन में अगुआई करने के लिए नए युग का सूत्रपात कर सकता है। जो कार्य वह करता है वह मनुष्य को एक नये जीवन को धारण करने और नए युग में प्रवेश करने में सक्षम बनाने के लिए है। शेष कार्य उन मनुष्यों को सौंप दिया जाता है जो सामान्य मानवता वाले हैं और जिनकी दूसरों के द्वारा प्रशंसा की जाती है। इसलिए, अनुग्रह के युग में, उसने दो हज़ार वर्षों के कार्य को, देह में अपने तैंतीस वर्षों में से मात्र साढ़े तीन वर्षों में पूरा कर दिया। जब परमेश्वर अपना कार्य करने के लिए पृथ्वी पर आता है, तो वह हमेशा दो हजार वर्षों के या एक समस्त युग के कार्य को कुछ ही वर्षों के लघुतम समय के भीतर पूरा कर देता है। वह कोई समय बर्बाद नहीं करता है, और वह विलंब नहीं करता है; वह केवल कई वर्षों के काम को घनीभूत कर देता है ताकि यह मात्र कुछ थोड़े से वर्षों में ही पूरा हो जाए। ऐसा इसलिए है क्योंकि जिस कार्य को वह व्यक्तिगत रूप से करता है वह पूरी तरह से एक नया मार्ग प्रशस्त करने और नए युग का सूत्रपात करने के वास्ते होता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "देहधारण का रहस्य (2)" से

13. देहधारी परमेश्वर का कार्य उन व्यक्तियों के समान नहीं है जिन्हें पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किया गया था। जब परमेश्वर पृथ्वी पर अपना काम करने आता है, तब वह केवल अपनी सेवकाई को पूरा करने की परवाह करता है। जहाँ तक अन्य मुद्दों की बात है जो उसकी सेवकाई से सम्बन्धित नहीं हैं, तो वह उसमें कोई भाग नहीं लेता, यहाँ तक कि वह उसे अनदेखा कर देता है। वह मात्र उस कार्य को करता है जो उसे करना चाहिए, और वह उस कार्य के विषय में तो बिलकुल परवाह नहीं करता जो मनुष्य को करना चाहिए। जिस कार्य को वह करता है वह केवल उस युग से सम्बन्धित है जिसमें वह है और उस सेवकाई से सम्बन्धित है जिसे उसे पूरा करना चाहिए, मानो कि अन्य सभी मुद्दे उसके दायरे से बाहर हैं। वह एक मनुष्य के रूप में जीवन जीने के बारे में अधिक मूलभूत ज्ञान अर्जित नहीं करता, न तो वह और अधिक सामाजिक कौशल और न ही अन्य कोई बात सीखता है जिसे मनुष्य समझता है। वह उन तमाम बातों की ज़रा भी परवाह नहीं करता है जो इंसान में होनी चाहिये और वह मात्र उस कार्य को करता है जो उसका कर्तव्य है। और इस प्रकार, जैसा कि मनुष्य इसे देखता है, देहधारी परमेश्वर में इतनी बातों का अभाव है कि जो बातें इंसान में होनी चाहिये, उन्हें वह अनदेखा कर देता है, और उसे ऐसी बातों की समझ नहीं है। जीवन का सामान्य ज्ञान, और साथ ही व्यवहार के सिद्धान्त और दूसरों के साथ सम्बद्ध होने जैसे मामले मानो उससे कोई संबंध नहीं रखते है। इसके बावजूद, तुम्हें देहधारी परमेश्वर का व्यवहार जरा-सा भी असामान्य नहीं लगेगा। कहने का अभिप्राय है कि उसकी मानवता बस उसके जीवन को एक साधारण इंसान का जीवन और उसके मस्तिष्क के सामान्य विवेक को बनाकर रखती है ताकि वह सही और गलत का फैसला कर सके। लेकिन उसके अंदर उन बातों में से कोई भी बात नहीं है जो सिर्फ़ इंसानों (सृजित प्राणियों) में होनी चाहिये। परमेश्वर केवल अपनी सेवकाई को पूरा करने के लिए देहधारी बनता है। उसका कार्य पूरे युग के लिये है न कि किसी विशेष व्यक्ति या स्थान के लिये, समूचे विश्व के लिये है। यही उसके कार्य की दिशा और वह सिद्धान्त है जिसके द्वारा वह कार्य करता है। इसे किसी के द्वारा बदला नहीं जा सकता, और इंसान की इसमें कोई भूमिका नहीं है। जब भी परमेश्वर देह बनता है, तो वह अपने साथ उस युग के कार्य को लेकर आता है, और बीस, तीस, चालीस या यहाँ तक कि सत्तर, अस्सी वर्षों तक मनुष्य के साथ रहने के इरादे से नहीं आता जिससे कि इंसान उसे बेहतर ढंग से समझ सके और उसमें अंतर्दृष्टि प्राप्त कर सके। इसकी कोई आवश्यकता नहीं है! ऐसा करना उस ज्ञान को बिल्कुल भी गहरा नहीं करेगा जो परमेश्वर के अंतर्निहित स्वभाव के बारे में मनुष्य को है; इसके बजाए, यह केवल उसकी अवधारणाओं में वृद्धि करेगा और उसकी अवधारणाओं और विचारों को प्राचीन बना देगा। इसलिए तुम सभी को समझ लेना चाहिए कि वास्तव में देहधारी परमेश्वर का कार्य क्या है। यकीनन तुम लोग मेरे कहे वचनों: "मैं एक साधारण मनुष्य के जीवन का अनुभव करने के लिए नहीं आया हूँ", को समझ गये होगे? क्या तुम लोग इन वचनों: "परमेश्वर पृथ्वी पर एक साधारण मनुष्य का जीवन जीने के लिए नहीं आता है" को भूल गए हो? तुम लोग परमेश्वर के देह बनने के उद्देश्य को नहीं समझते, और न ही तुम लोग इसका अर्थ जानते हो कि "परमेश्वर एक रचे गए प्राणी के जीवन का अनुभव करने के इरादे से पृथ्वी पर कैसे आ सकता है"? परमेश्वर पृथ्वी पर केवल अपना काम पूरा करने आता है, और इसलिए पृथ्वी पर उसका कार्य थोड़े समय का होता है। वह पृथ्वी पर इस अभिप्राय के साथ नहीं आता है कि परमेश्वर का आत्मा उसके देह को कलीसिया के एक श्रेष्ठ अगुवे के रूप में विकसित करे। जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, तो यह वचन का देह बनना है; हालाँकि, मनुष्य उसके कार्य को नहीं जानता और ज़बरदस्ती चीज़ों को उस पर थोपता है। किन्तु तुम सब लोगों को यह एहसास करना चाहिए कि परमेश्वर "देह बना वचन" है, न कि अस्थायी रूप से परमेश्वर की भूमिका निभाने के लिए पवित्र आत्मा के द्वारा विकसित किया गया एक देह है। परमेश्वर स्वयं, विकसित नहीं किया गया है, बल्कि "देह बना वचन", है और आज वह तुम सब लोगों के बीच अपने कार्य को आधिकारिक रूप से कर रहा है।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "देहधारण का रहस्य (3)" से

14. केवल युग की अगुवाई करने और एक नए कार्य को गतिमान करने के लिए परमेश्वर देह बनता है। तुम लोगों को इस बिन्दु को समझना होगा। यह मनुष्य के काम से बहुत अलग है, और दोनों एक साँस में उल्लेख किये जाने योग्य नहीं हैं। इससे पहले कि कार्य करने के लिए मनुष्य का उपयोग किया जाए, मनुष्य को विकसित होने एवं पूर्ण किये जाने की एक लम्बी समयावधि की आवश्यकता होती है और एक विशेष रूप से उच्च-स्तर की मानवता की आवश्यकता है। मनुष्य को न केवल अपनी सामान्य मानवीय समझ को बनाए रखना चाहिए, बल्कि उसे दूसरों के सामने व्यवहार के अनेक सिद्धान्तों और नियमों को भी अधिक समझना चाहिए, और इसके अतिरिक्त उसे मनुष्य की बुद्धि और नैतिकता को और अधिक सीखना चाहिए। इंसान के अंदर ये तमाम बातें होनी चाहिये। लेकिन, देहधारी परमेश्वर के लिए ऐसा नहीं है, क्योंकि उसका कार्य न तो मनुष्य का प्रतिनिधित्व करता है और न ही मनुष्यों का है; बल्कि, यह उसके अस्तित्व की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है और उस कार्य का प्रत्यक्ष कार्यान्वयन है जो उसे करना चाहिए। (स्वभाविक है कि उसका कार्य उपयुक्त समय पर किया जाता है, न कि यूँ ही बेतरतीब तरीके से किया जाता है। और उसका कार्य तब शुरू होता है जब उसकी सेवकाई को पूरा करने का समय होता है।) वह मनुष्य के जीवन में या मनुष्य के कार्य में भाग नहीं लेता है, अर्थात्, उसकी मानवता में इनमें से कुछ भी नहीं होता (हालाँकि इससे उसका कार्य प्रभावित नहीं होता है)। वह अपनी सेवकाई को केवल तब पूरा करता है जब उसके लिए ऐसा करने का समय होता है; उसकी हैसियत कुछ भी हो, वह बस उस कार्य को करने के लिए आगे बढ़ता है जो उसे करना चाहिए। मनुष्य उसके बारे में जो कुछ भी जानता है या उसके बारे में उसकी जो भी राय रखता है इससे उसके कार्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। मिसाल के तौर पर, जब यीशु ने अपना काम किया था; तब कोई नहीं जानता था कि वह कौन है, परन्तु वह अपने काम में आगे बढ़ता गया। इसमें से किसी ने भी उसे जो कार्य करना था, उसमें बाधा नहीं डाली। इसलिए, उसने पहले अपनी पहचान को स्वीकार या घोषित नहीं किया, और उसने लोगों को अपना अनुसरण करने दिया। स्वाभाविक है कि यह केवल परमेश्वर की विनम्रता नहीं थी; यह वह तरीका भी था जिससे परमेश्वर ने देह में काम किया था। वह केवल इसी तरीके से काम कर सकता था, क्योंकि मनुष्य उसे खुली आँखों से नहीं पहचान सकता था। यदि मनुष्य पहचान भी लेता, तब भी वह उसके काम में सहायता नहीं कर पाता। इसके अतिरिक्त, वह इसलिए देहधारी नहीं हुआ कि मनुष्य उसकी देह को जान जाए; यह कार्य को करने और अपनी सेवकाई को पूरा करने के लिए था। इसी कारण से, उसने अपनी पहचान ज्ञात करवाने को कोई महत्व नहीं दिया। जब उसने सारा कार्य पूरा कर लिया जो उसे करना चाहिए था, तब उसकी पूरी पहचान और हैसियत स्वभाविक रूप से मनुष्य की समझ में आ गई। देहधारी परमेश्वर मौन रहता है और कभी कोई घोषणाएँ नहीं करता। वह न तो मनुष्य पर, न ही इस बात पर कोई ध्यान नहीं देता है कि इंसान उसका अनुसरण किस तरह कर रहा है, बस अपनी सेवकाई पूरी करने और उस कार्य को करने के लिये आगे बढ़ता जाता है जो उसे करना चाहिए। कोई भी उसके कार्य के मार्ग में बाधा नहीं बन सकता है। जब उसके कार्य के समापन का समय आता है, तब इसे निश्चित रूप से पूरा किया जाएगा। कोई भी अन्यथा आदेश नहीं दे सकता है। अपने कार्य की समाप्ति के बाद जब वह मनुष्य से विदा होकर चला जाएगा, तभी मनुष्य उसके द्वारा किए गए कार्य को समझेगा, यद्यपि अभी भी पूरी तरह से स्पष्ट नहीं समझेगा। और जिस इरादे से पहली बार उसने अपना कार्य किया, उसे समझने में इंसान को बहुत समय लग जाएगा। दूसरे शब्दों में, देहधारी परमेश्वर के युग के कार्य को दो भागों में विभाजित किया जाता है। एक भाग वह है जिसे स्वयं देहधारी परमेश्वर करता है और दूसरा वे वचन हैं जिन्हें स्वयं देहधारी परमेश्वर बोलता है। एक बार जब उसके देह की सेवकाई पूरी तरह से सम्पन्न हो जाती है, तो कार्य का दूसरा भाग पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किए जाने वाले लोगों के द्वारा किया जाना शेष रह जाता है। इस समय इंसान को अपना काम पूरा करना चाहिये, क्योंकि परमेश्वर ने पहले ही मार्ग प्रशस्त कर दिया है, और अब उस पर मनुष्य को स्वयं चलना चाहिए। कहने का अभिप्राय है कि कार्य के एक भाग को देहधारी परमेश्वर करता है, और इसके बाद पवित्र आत्मा और पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किए गये लोग इस काम में सफल होंगे। अतः मनुष्य को पता होना चाहिये कि इस चरण में देहधारी परमेश्वर को सबसे पहले कौन-सा कार्य करना है। उसे समझना चाहिये कि परमेश्वर देहधारी होने के सही मायने क्या हैं और उसे कौन-सा कार्य करना चाहिये। बजाय इसके कि वह परमेश्वर से भी वैसी ही अपेक्षा करे जैसी इंसानों से की जाती है। इसी में इंसान की गलती, अवधारणा और अवज्ञा छिपी है।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "देहधारण का रहस्य (3)" से

15. परमेश्वर इसलिये देह धारण नहीं करता कि इंसान उसे जाने, या देहधारी परमेश्वर की देह और मनुष्य की देह में भेद करने की अनुमति देने के लिए नहीं है; न ही मनुष्य के विवेक की योग्यता को प्रशिक्षित करने के लिए परमेश्वर देह बनता है, इस अभिप्राय से तो परमेश्वर ऐसा बिलकुल नहीं करता कि मनुष्य परमेश्वर के देहधारी देह या शरीर की आराधना करे, जिससे उसे बड़ी महिमा मिले। इसमें से कुछ भी परमेश्वर के देह बनने के पीछे की मूल इच्छा नहीं है। न ही परमेश्वर मनुष्य की निन्दा करने के लिए, जानबूझकर मनुष्य को प्रकट करने के लिए, या चीज़ों को मनुष्य के लिए कठिन बनाने के लिए देहधारण करता है। इनमें से कोई भी परमेश्वर की मूल इच्छा नहीं है। हर बार जब परमेश्वर देह बनता है, तो कार्य का वह स्वरूप है जो अपरिहार्य होता है। वह अपने और भी महान कार्य और प्रबंधन के कारण ऐसे कार्य करता है न कि उन कारणों से जो इंसान सोचता है। परमेश्वर पृथ्वी पर केवल तभी आता है जब उसके कार्य के द्वारा अपेक्षित होता है, और जब आवश्यकता होती है। वह पृथ्वी पर घूमने-फिरने के इरादे से नहीं आता है, बल्कि उस कार्य को करने लिए आता है जो उसे करना चाहिए। अन्यथा वह इतने भारी उत्तरदायित्व को क्यों ग्रहण करेगा और इस कार्य को करने के लिए इतना बड़ा जोखिम क्यों लेगा? केवल तभी परमेश्वर देह बनता है जब उसे ऐसा करना है, और वह हमेशा एक अद्वितीय महत्व के साथ देह बनता है। यदि यह सिर्फ मनुष्य को उसे नज़र भर देखने और उनके ज्ञान के दायरे को बढ़ाने के लिये होता, तो वह यों ही लोगों के बीच कभी नहीं आता। वह पृथ्वी पर अपने प्रबंधन, महान कार्य के लिए आता है, और इसलिये आता है ताकि बहुत से लोगों को प्राप्त कर सके। वह युग का प्रतिनिधित्व करने के लिए और शैतान को पराजित करने के लिए आता है, और वह शैतान को पराजित करने के लिए देह धारण करता है। इसके अतिरिक्त, समस्त मानवजाति को अपनी ज़िन्दगी किस प्रकार जीनी है, इसमें उनका मार्गदर्शन करने के लिए आता है। इन सबका संबंध उसके प्रबंधन और पूरे विश्व के कार्य से है। यदि परमेश्वर मनुष्य को मात्र अपनी देह को जानने देने और मनुष्य की आँखें खोलने के लिए देह बना होता, तो वह हर देश की यात्रा क्यों नहीं करता? क्या उसके लिये ऐसा करना अत्यधिक आसान नहीं होता? परन्तु उसने ऐसा नहीं किया, इसके बजाए वह बसने और उस कार्य को आरंभ करने के लिए जो उसे करना चाहिए, एक उपयुक्त स्थान को चुनता है। केवल यह अकेला देह ही अत्यधिक महत्व का है। वह संपूर्ण युग का प्रतिनिधित्व करता है, और संपूर्ण युग के कार्य को भी करता है; वह पुराने युग का समापन और नए युग का सूत्रपात करता है। ये तमाम बातें, एक महत्वपूर्ण मामला हैं जो परमेश्वर के प्रबंधन से संबंधित हैं, और यह कार्य के उस एक चरण के मायने हैं जिसे सम्पन्न करने परमेश्वर पृथ्वी पर आता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "देहधारण का रहस्य (3)" से

16. परमेश्वर के सम्पूर्ण स्वभाव को छ: हज़ार वर्षों की प्रबंधन योजना के दौरान प्रकट किया गया है। इसे सिर्फ अनुग्रह के युग में, सिर्फ व्यवस्था के युग में प्रकट नहीं किया जाता है, ऐसा तो बिल्कुल नहीं है की इसे सिर्फ अंत के दिनों की इस समयावधि में प्रकट किया जाता है। अंत के दिनों में किया गया कार्य न्याय, कोप और ताड़ना का प्रतिनिधित्व करता है। अंत के दिनों में किया गया कार्य व्यवस्था के युग या अनुग्रह के युग के कार्य का स्थान नहीं ले सकता है। हालाँकि, तीनों चरण आपस में एक दूसरे से जुड़कर एक सत्त्व बन जाते हैं और सभी एक ही परमेश्वर के द्वारा किये गए कार्य हैं। स्वाभाविक रूप में, इस कार्य का क्रियान्वयन तीन अलग-अलग युगों में विभाजित है। अंत के दिनों में किया गया कार्य हर चीज़ को समाप्ति की ओर ले जाता है; जो कुछ व्यवस्था के युग में किया गया वह आरम्भ का कार्य है; और जो अनुग्रह के युग में किया गया वह छुटकारे का कार्य है। जहाँ तक इस सम्पूर्ण छ: हज़ार वर्षों की प्रबंधन योजना में कार्य के दर्शनों की बात है, तो किसी को भी अंर्तदृष्टि या समझ प्राप्त करने में समर्थ नहीं है। ऐसे दर्शन हमेशा से ही रहस्य रहे हैं। अंत के दिनों में, राज्य के युग का सूत्रपात करने के लिए केवल वचन का कार्य किया जाता है, परन्तु यह सभी युगों का प्रतिनिधि नहीं है। अंत के दिन अंत के दिनों से बढ़कर नहीं हैं और राज्य के युग से बढ़कर नहीं हैं, जो अनुग्रह के युग या व्यवस्था के युग का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं। अंत के दिन मात्र वह समय है जिसमें छ: हज़ार वर्षों की प्रबंधन योजना के समस्त कार्य को तुम लोगों पर प्रकट किया जाता है। यह रहस्य से पर्दा उठाना है। ऐसे रहस्य को किसी भी मनुष्य के द्वारा अनावृत नहीं किया जा सकता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मनुष्य के पास बाइबल की कितनी अधिक समझ है, यह वचनों से बढ़कर और कुछ नहीं है, क्योंकि मनुष्य बाइबल के सार को नहीं समझता है। जब मनुष्य बाइबल को पढ़ता है, तो वह कुछ सत्यों को प्राप्त कर सकता है, कुछ वचनों की व्याख्या कर सकता है या कुछ प्रसिद्ध अंशों या उद्धरणों का तुच्छ परीक्षण कर सकता है, परन्तु वह उन वचनों के भीतर निहित अर्थ को निकालने में कभी भी समर्थ नहीं होगा, क्योंकि मनुष्य जो कुछ देखता है वे मृत वचन हैं, यहोवा और यीशु के कार्य के दृश्य नहीं हैं, और मनुष्य ऐसे कार्य के रहस्य को सुलझाने में असमर्थ है। इसलिए, छ: हज़ार वर्षों की प्रबंधन योजना का रहस्य सबसे बड़ा रहस्य है, एक ऐसा रहस्य जो मनुष्य से बिलकुल छिपा हुआ और उसके लिए सर्वथा अबूझ है। कोई भी सीधे तौर पर परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझ सकता है, जब तक कि वह मनुष्य को स्वयं न समझाए और खुल कर न कहे, अन्यथा, वे सर्वदा मनुष्य के लिए पहेली बने रहेंगे और सर्वदा मुहरबंद रहस्य बने रहेंगे। जो धार्मिक जगत में हैं उनकी तो बात ही छोड़ो; यदि तुम लोगों को भी आज नहीं बताया जाता, तो तुम लोग भी समझने में समर्थ होते।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "देहधारण का रहस्य (4)" से

17. अंत के दिनों का कार्य तीनों चरणों में से अंतिम चरण है। यह एक अन्य नए युग का कार्य है और संपूर्ण प्रबंधन कार्य का प्रतिनिधित्व नहीं करता है। छ: हज़ार वर्षों की प्रबंधन योजना कार्य के तीन चरणों में विभाजित है। कोई भी अकेला चरण तीनों युगों के कार्य का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है बल्कि सम्पूर्ण के केवल एक भाग का ही प्रतिनिधित्व कर सकता है। यहोवा नाम परमेश्वर के सम्पूर्ण स्वभाव का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है। उसने व्यवस्था के युग में कार्य किया है, इस तथ्य से यह साबित नहीं होता है कि परमेश्वर केवल व्यवस्था के अधीन ही परमेश्वर हो सकता है। यहोवा ने, मनुष्य से मंदिर और वेदियाँ बनाने के लिए कहा, मनुष्य के लिए व्यवस्थाएँ निर्धारित की और आज्ञाओं की घोषणा की; उसने जो कार्य किया उसने केवल व्यवस्था के युग का प्रतिनिधित्व किया। उसने जो कार्य किये वह यह साबित नहीं करता है कि परमेश्वर वही परमेश्वर है जो मनुष्य से व्यवस्था बनाए रखने के लिए कहता है, या वो बस मंदिर में परमेश्वर है, या बस वेदी के सामने का परमेश्वर है। ऐसा कहना गलत है। व्यवस्था के अधीन कार्य केवल एक युग का ही प्रतिनिधित्व कर सकता है। इसलिए, यदि परमेश्वर ने केवल व्यवस्था के युग में ही काम किया होता, तो मनुष्य ने परमेश्वर को एक परिभाषा में यह कहते हुए बंद कर दिया होता, "परमेश्वर मंदिर का परमेश्वर है। परमेश्वर की सेवा करने के लिए, हमें याजकीय वस्त्र पहनने ही चाहिए और मंदिर में प्रवेश करना चाहिए।" यदि अनुग्रह के युग में उस कार्य को कभी नहीं किया जाता और व्यवस्था का युग वर्तमान तक जारी रहता, तो मनुष्य यह नहीं जान पाता कि परमेश्वर दयावान और प्रेममय भी है। यदि व्यवस्था के युग में कोई कार्य नहीं किया जाता, और केवल अनुग्रह के युग में ही कार्य किया जाता, तो मनुष्य बस इतना ही जान पाता कि परमेश्वर मनुष्य को छुटकारा दे सकता है और मनुष्य के पापों को क्षमा कर सकता है। वे केवल इतना ही जान पाते कि वह पवित्र और निर्दोष है, कि वह मनुष्य के लिए स्वयं का बलिदान कर सकता है और सलीब पर चढ़ाया जा सकता है। मनुष्य केवल इतना ही जान पाता और अन्य सभी बातों के बारे में उसके पास कोई समझ नहीं होती। अतः, प्रत्येक युग परमेश्वर के स्वभाव के एक भाग का प्रतिनिधित्व करता है। व्यवस्था का युग कुछ पहलुओं का प्रतिनिधित्व करता है, अनुग्रह का युग कुछ पहलुओं का प्रतिनिधित्व करता है, और फिर यह युग कुछ पहलुओं का प्रतिनिधित्व करता है। परमेश्वर के स्वभाव को सिर्फ तीनों युगों को मिलाने के माध्यम से ही पूरी तरह से प्रकट किया जा सकता है। जब मनुष्य इन तीनों चरणों को जान जाता है केवल तभी मनुष्य इसे पूरी तरह से समझ सकता है। तीनों में से एक भी चरण को छोड़ा नहीं जा सकता है। जब एक बार तुम कार्य के इन तीनों चरणों को जान लेते हो, केवल तभी तुम परमेश्वर के स्वभाव को उसकी सम्पूर्णता में देखोगे। व्यवस्था के युग में परमेश्वर द्वारा अपने कार्य की पूर्णता यह साबित नहीं करती है कि वह व्यवस्था के अधीन परमेश्वर है, और छुटकारे के उसके कार्य की पूर्णता यह नहीं दर्शाती है कि परमेश्वर सदैव मानवजाति को छुटकारा देगा। ये सभी मनुष्य के द्वारा निकाले गए निष्कर्ष हैं। अब जबकि अनुग्रह का युग समाप्ति पर आ गया है, तो तुम यह नहीं कह सकते हो कि परमेश्वर केवल सलीब से ही सम्बन्धित है, कि केवल सलीब परमेश्वर द्वारा उद्धार का प्रतिनिधित्व करता है। यदि तुम ऐसा करते हो, तो तुम परमेश्वर को परिभाषित कर रहे हो। इस चरण में, परमेश्वर मुख्य रूप से वचन का कार्य कर रहा है, परन्तु तुम यह नहीं कह सकते हो कि परमेश्वर मनुष्य के प्रति कभी दयालु नहीं रहा है और वह जो कुछ लेकर आया है वह बस ताड़ना और न्याय है। अंत के दिनों का कार्य यहोवा और यीशु के कार्य को और उन सभी रहस्यों को प्रकट कर देता है जिन्हें मनुष्य के द्वारा समझा नहीं गया था। इसे मानवजाति की मंज़िल और अंत को प्रकट करने के लिए और मानवजाति के बीच उद्धार के सब कार्य का समापन करने के लिए किया जाता है। अंत के दिनों में कार्य का यह चरण सभी चीज़ों को समाप्ति की ओर ले आता है। मनुष्य के द्वारा समझे नहीं गए सभी रहस्यों को, मनुष्य को ऐसे रहस्यों में अंर्तदृष्टि पाने की अनुमति देने और उनके हृदयों में एक स्पष्ट समझ पाने के लिए, अवश्य उजागर किया जाना चाहिए। केवल तभी मनुष्य को उनके प्रकारों के अनुसार विभाजित किया जा सकता है। जब छ: हज़ार वर्षों की प्रबंधन योजना पूर्ण हो जाती है केवल उसके पश्चात् ही परमेश्वर का स्वभाव अपनी सम्पूर्णता में मनुष्य की समझ में आएगा, क्योंकि तब उसकी प्रबंधन योजना समाप्त होगी।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "देहधारण का रहस्य (4)" से

18. आज मनुष्य से जो माँग की जाती है वह अतीत की माँग के असदृश है और व्यवस्था के युग में मनुष्य से की गई माँग के तो और भी अधिक असदृश है। जब इस्राएल में कार्य किया गया था तब व्यवस्था के अंतर्गत मनुष्य से क्या माँग की गई थी? उससे सब्त और यहोवा की व्यवस्थाओं का पालन करने से बढ़कर और कुछ की माँग नहीं की गई थी। किसी को भी सब्त के दिन काम नहीं करना था या यहोवा की व्यवस्था का उल्लंघन नहीं करना था। परन्तु अब ऐसा नहीं है। सब्त पर, मनुष्य काम करते हैं, हमेशा की तरह इकट्ठे होते हैं और प्रार्थना करते हैं, और उन पर कोई प्रतिबन्ध नहीं लगाए जाते हैं। वे जो अनुग्रह के युग में थे उन्हें बपतिस्मा लेना पड़ता था; सिर्फ इतना ही नहीं, उन्हें उपवास करने, रोटी तोड़ने, दाखमधु पीने, अपने सिरों को ढकने और दूसरों के पाँव धोने के लिए कहा जाता था। अब, इन नियमों का उन्मूलन कर दिया गया है और मनुष्यों से और भी बड़ी माँगें की जाती हैं, क्योंकि परमेश्वर का कार्य लगातार अधिक गहरा होता जाता है और मनुष्य का प्रवेश पहले से कहीं अधिक ऊँचा हो गया है। अतीत में, यीशु मनुष्य पर हाथ रखता था और प्रार्थना करता था, परन्तु अब जबकि सब कुछ कहा जा चुका है, तो हाथ रखने का क्या उपयोग है? वचन अकेले ही परिणामों को प्राप्त कर सकते हैं। जब अतीत में वह अपना हाथ मनुष्य के ऊपर रखता था, तो यह मनुष्य को आशीष देने और चंगा करने के लिए था। उस समय पवित्र आत्मा इसी प्रकार से काम करता था, परन्तु अब ऐसा नहीं है। अब, पवित्र आत्मा कार्य करने और परिणामों को हासिल करने के लिए वचनों का उपयोग करता है। उसने अपने वचनों को तुम लोगों के लिए स्पष्ट कर दिया है, और तुम लोगों को बस उन्हें वैसे ही अभ्यास में लाना चाहिए, जैसे तुम्हें बताया गया है। उसके वचन उसकी इच्छा हैं और उस कार्य को दर्शाते हैं जिसे वह करन चाहता है। उसके वचनों के माध्यम से, तुम उसकी इच्छा को और उस चीज को समझ सकते हो जिसे प्राप्त करने के लिए वह तुम्हें कहता है। तुम हाथ रखने की आवश्यकता नहीं है बस सीधे तौर पर उसके वचनों को अभ्यास में लाओ। कुछ लोग कह सकते हैं, "मुझ पर अपना हाथ रख! मुझ पर अपना हाथ रख ताकि मैं तेरे आशीष प्राप्त कर सकूँ और तेरा भागी बन सकूँ।" ये सभी पहले के अप्रचलित अभ्यास हैं जो अब निषिद्ध हैं, क्योंकि युग बदल चुका है। पवित्र आत्मा युग के अनुरूप कार्य करता है, न कि इच्छानुसार या तय नियमों के अनुसार। युग बदल चुका है, और एक नया युग को अपने साथ नया काम अवश्य लेकर आता है। यह कार्य के प्रत्येक चरण के बारे में सच है, और इसलिए उसका कार्य कभी दोहराया नहीं जाता है। अनुग्रह के युग में, यीशु ने इस तरह का बहुत सा कार्य किया, जैसे कि बीमारियों को चंगा करना, दुष्टात्माओं को निकालना, मनुष्य के लिए प्रार्थना करने के लिए मनुष्य पर हाथ रखना, और मनुष्य को आशीष देना। हालाँकि, ऐसा करते रहने से वर्तमान में कोई उद्देश्य पूरा नहीं होगा। उस समय पवित्र आत्मा उस तरह से काम करता था, क्योंकि वह अनुग्रह का युग था, और आनन्द के लिए मनुष्य पर बहुत अनुग्रह बरसाया गया था। मनुष्य को कोई कीमत चुकानी नहीं पड़ती थी और जब तक उसके पास विश्वास था वह अनुग्रह प्राप्त कर सकता था। सब के साथ अत्यधिक अनुग्रह के साथ व्यवहार किया जाता था। अब, युग बदल चुका है, और परमेश्वर का काम और आगे प्रगति कर चुका है, उसकी ताड़ना और न्याय के माध्यम से, मनुष्य की विद्रोहशीलता को और मनुष्य के भीतर की अशुद्धता को दूर किया जाएगा। चूँकि वह छुटकारे का चरण था, इसलिए, मनुष्य के आनन्द के लिए मनुष्य पर पर्याप्त अनुग्रह प्रदर्शित करते हुए, परमेश्वर को ऐसा काम करना पड़ा, ताकि मनुष्य को पापों से छुटकारा दिया जा सके, और अनुग्रह के माध्यम से उसके पापों को क्षमा किया जा सके। वर्तमान चरण ताड़ना, न्याय, वचनों के प्रहार, और साथ ही अनुशासन तथा वचनों के प्रकाशन के माध्यम से मनुष्य के भीतर के अधर्मों को प्रकट करने के लिए है, ताकि बाद में मानवजाति को बचाया जा सके। यह कार्य छुटकारे के कार्य से कहीं अधिक गहरा है। अनुग्रह के युग में, मनुष्य ने पर्याप्त अनुग्रह का आनन्द उठाया और चूँकि उसने पहले से इस अनुग्रह का अनुभव कर लिया है, और इस लिए मनुष्य के द्वारा इसका अब और आनन्द नहीं उठाया जाना है। ऐसे कार्य का समय अब चला गया है तथा अब और नहीं किया जाना है। अब, मनुष्य को वचन के न्याय के माध्यम से बचाया जाता है। मनुष्य का न्याय, उसकी ताड़ना और उसे परिष्कृत होने के पश्चात्, इन सबके परिणामस्वरूप उसका स्वभाव बदल जाता है। क्या यह उन वचनों की वजह से नहीं है जिन्हें मैंने कहा है? कार्य के प्रत्येक चरण को समूची मानवजाति की प्रगति और उस युग के अनुसार किया जाता है। समस्त कार्य का अपना महत्व है; इसे अंतिम उद्धार के लिए, मानवजाति की भविष्य में एक अच्छी मंज़िल के लिए है, और इसलिए है कि अंत में मनुष्य को उसके प्रकार के अनुसार विभाजित किया जा सके।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "देहधारण का रहस्य (4)" से

19. अंत के दिनों का कार्य वचनों को बोलना है। वचनों के माध्यम से मनुष्य में बड़े परिवर्तन किए जा सकते हैं। इन वचनों को स्वीकार करने पर इन लोगों में हुए परिवर्तन उन परिवर्तनों की अपेक्षा बहुत अधिक बड़े हैं जो चिन्हों और अद्भुत कामों को स्वीकार करने पर अनुग्रह के युग में लोगों पर हुए थे। क्योंकि, अनुग्रह के युग में, हाथ रखने और प्रार्थना से दुष्टात्माओं को मनुष्य से निकाला जाता था, परन्तु मनुष्य के भीतर का भ्रष्ट स्वभाव तब भी बना रहता था। मनुष्य को उसकी बीमारी से चंगा कर दिया जाता था और उसके पापों को क्षमा किया जाता था, परन्तु वह कार्य, कि आखिर किस प्रकार मनुष्य के भीतर से उन शैतानी स्वभावों को निकाला जाना है, अभी भी बाकी था। मनुष्य को केवल उसके विश्वास के कारण ही बचाया गया था और उसके पापों को क्षमा किया गया था, परन्तु उसका पापी स्वभाव उसमें से निकाला नहीं गया था और वह तब भी उसके अंदर बना हुआ था। मनुष्य के पापों को देहधारी परमेश्वर के द्वारा क्षमा किया गया था, परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य के भीतर कोई पाप नहीं रह गया है। पाप बलि के माध्यम से मनुष्य के पापों को क्षमा किया जा सकता है, परन्तु मनुष्य इस मसले को हल करने में पूरी तरह असमर्थ रहा है कि वह कैसे आगे और पाप नहीं कर सकता है और कैसे उसके पापी स्वभाव को पूरी तरह से दूर किया जा सकता है और उसे रूपान्तरित किया जा सकता है। परमेश्वर के सलीब पर चढ़ने के कार्य की वजह से मनुष्य के पापों को क्षमा किया गया था, परन्तु मनुष्य पुराने, भ्रष्ट शैतानी स्वभाव में जीवन बिताता रहा। ऐसा होने के कारण, मनुष्य को भ्रष्ट शैतानी स्वभाव से पूरी तरह से बचाया जाना चाहिए ताकि मनुष्य का पापी स्वभाव पूरी तरह से दूर किया जाए और वो फिर कभी विकसित न हो, जो मनुष्य के स्वभाव को बदलने में सक्षम बनाये। इसके लिए मनुष्य के लिए आवश्यक है कि वह जीवन में उन्नति के पथ को, जीवन के मार्ग को, और अपने स्वभाव को परिवर्तित करने के मार्ग को समझे। साथ ही इसके लिए मनुष्य को इस मार्ग के अनुरूप कार्य करने की आवश्यकता है ताकि मनुष्य के स्वभाव को धीरे-धीरे बदला जा सके और वह प्रकाश की चमक में जीवन जी सके, और वो जो कुछ भी करे वह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार हो, ताकि वो अपने भ्रष्ट शैतानी स्वभाव को दूर कर सके, और शैतान के अंधकार के प्रभाव को तोड़कर आज़ाद हो सके, और उसके परिणामस्वरूप पाप से पूरी तरह से ऊपर उठ सके। केवल तभी मनुष्य पूर्ण उद्धार प्राप्त करेगा। जब यीशु अपना काम कर रहा था, तो उसके बारे में मनुष्य का ज्ञान तब भी अज्ञात और अस्पष्ट था। मनुष्य ने हमेशा यह विश्वास किया कि वह दाऊद का पुत्र है और उसके एक महान भविष्यद्वक्ता और उदार प्रभु होने की घोषणा की जो मनुष्य को पापों से छुटकारा देता था। विश्वास के आधार पर मात्र उसके वस्त्र के छोर को छू कर ही कुछ लोग चंगे हो गए थे; अंधे देख सकते थे और यहाँ तक कि मृतक को जिलाया भी जा सकता था। हालाँकि, मनुष्य अपने भीतर गहराई से जड़ जमाए हुए शैतानी भ्रष्ट स्वभाव को नहीं समझ सका और न ही मनुष्य यह जानता था कि उसे कैसे दूर किया जाए। मनुष्य ने बहुतायत से अनुग्रह प्राप्त किया, जैसे देह की शांति और खुशी, एक व्यक्ति के विश्वास करने पर पूरे परिवार की आशीष, और बीमारियों से चंगाई, इत्यादि। शेष मनुष्य के भले कर्म और उसका ईश्वर के अनुरूप प्रकटन था; यदि मनुष्य इस तरह के आधार पर जीवन जी सकता था, तो उसे एक उपयुक्त विश्वासी माना जाता था। केवल ऐसे विश्वासी ही मृत्यु के बाद स्वर्ग में प्रवेश कर सकते थे, जिसका अर्थ है कि उन्हें बचा लिया गया था। परन्तु, अपने जीवन काल में, उन्होंने जीवन के मार्ग को बिलकुल भी नहीं समझा था। वे बस एक निरंतर चक्र में पाप करते थे, फिर पाप-स्वीकारोक्ति करते थे और अपना स्वभाव बदलने के पथ पर कोई प्रगति नहीं करते थे: अनुग्रह के युग में मनुष्य की दशा ऐसी ही थी। क्या मनुष्य ने पूर्ण उद्धार पा लिया है? नहीं! इसलिए, उस चरण के कार्य के पूरा हो जाने के पश्चात्, अभी भी न्याय और ताड़ना का काम बाकी है। यह चरण वचन के माध्यम से मनुष्य को शुद्ध बनाने के लिए है ताकि मनुष्य को अनुसरण करने का एक मार्ग प्रदान किया जाए। यह चरण फलप्रद या अर्थपूर्ण नहीं होगा यदि यह दुष्टात्माओं को निकालना जारी रखता है, क्योंकि यह मनुष्य के पापी स्वभाव को दूर करने में असफल हो जाएगा और मनुष्य केवल पापों की क्षमा पर आकर रुक जाएगा। पापबलि के माध्यम से, मनुष्य के पापों को क्षमा किया गया है, क्योंकि सलीब पर चढ़ने का कार्य पहले से ही पूरा हो चुका है और परमेश्वर ने शैतान को जीत लिया है। परन्तु मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव अभी भी उसके भीतर बना हुआ है और मनुष्य अभी भी पाप कर सकता है और परमेश्वर का प्रतिरोध कर सकता है; परमेश्वर ने मानवजाति को प्राप्त नहीं किया है। इसीलिए कार्य के इस चरण में परमेश्वर मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव को प्रकट करने के लिए वचन का उपयोग करता है और मनुष्य से सही मार्ग के अनुसार अभ्यास करवाता है। यह चरण पिछले चरण की अपेक्षा अधिक अर्थपूर्ण और साथ ही अधिक लाभदायक भी है, क्योंकि अब वचन ही है जो सीधे तौर पर मनुष्य के जीवन की आपूर्ति करता है और मनुष्य के स्वभाव को पूरी तरह से नया बनाए जाने में सक्षम बनाता है; यह कार्य का ऐसा चरण है जो अधिक विस्तृत है। इसलिए, अंत के दिनों में देहधारण ने परमेश्वर के देहधारण के महत्व को पूरा किया है और मनुष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर की प्रबंधन योजना का पूर्णतः समापन किया है।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "देहधारण का रहस्य (4)" से

20. परमेश्वर के द्वारा मनुष्य को, सीधे तौर पर पवित्रात्मा के साधनों के माध्यम से और आत्मा की पहचान से बचाया नहीं जाता है, क्योंकि उसके आत्मा को मनुष्य के द्वारा न तो देखा जा सकता है और न ही स्पर्श किया जा सकता है, और मनुष्य के द्वारा उस तक पहुँचा नहीं जा सकता है। यदि उसने आत्मा के तरीके से सीधे तौर पर मनुष्य को बचाने का प्रयास किया होता, तो मनुष्य उसके उद्धार को प्राप्त करने में पूरी तरह असमर्थ होता। यदि परमेश्वर सृजित मनुष्य का बाहरी रूप धारण नहीं करता, तो वे इस उद्धार को पाने में असमर्थ होते। क्योंकि मनुष्य किसी भी तरीके से उस तक नहीं पहुँच सकता है, उसी प्रकार जैसे कोई भी मनुष्य यहोवा के बादल के पास नहीं जा सकता था। केवल सृष्टि का एक मनुष्य बनने के द्वारा ही, अर्थात्, अपने वचन को उस देह में, जो वो धारण करने वाला है, रखकर ही, वह व्यक्तिगत रूप से वचन को उन सभी मनुष्यों में पहुँचा सकता है जो उसका अनुसरण करते हैं। केवल तभी मनुष्य स्वयं उसके वचन को सुन सकता है, उसके वचन को देख सकता है, उसके वचन को ग्रहण कर सकता है, और इसके माध्यम से पूरी तरह से बचाया जा सकता है। यदि परमेश्वर देह नहीं बना होता, तो कोई भी शरीर युक्त मनुष्य ऐसे बड़े उद्धार को प्राप्त नहीं कर पाता, और न ही एक भी मनुष्य बचाया गया होता। यदि परमेश्वर का आत्मा सीधे तौर पर मनुष्य के बीच काम करता, तो पूरी मानवजाति खत्म हो जाती या शैतान के द्वारा पूरी तरह से बंदी बनाकर ले जाया गयी होती क्योंकि मनुष्य परमेश्वर के साथ सम्बद्ध होने में पूरी तरह असमर्थ रहता।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "देहधारण का रहस्य (4)" से

21. प्रथम देहधारण यीशु की देह के माध्यम से मनुष्य को पाप से छुटकारा देने के लिए था, अर्थात्, उसने मनुष्य को सलीब से बचाया, परन्तु भ्रष्ट शैतानी स्वभाव तब भी मनुष्य के भीतर रह गया था। दूसरा देहधारण अब और पापबलि के रूप में कार्य करने के लिए नहीं है परन्तु उन्हें पूरी तरह से बचाने के लिए है जिन्हें पाप से छुटकारा दिया गया था। इसे इसलिए किया जाता है ताकि जिन्हें क्षमा किया गया उन्हें उनके पापों से दूर किया जा सके और पूरी तरह से शुद्ध किया जा सके, और वे स्वभाव में परिवर्तन प्राप्त कर शैतान के अंधकार के प्रभाव को तोड़कर आज़ाद हो जाएँ और परमेश्वर के सिंहासन के सामने लौट आएँ। केवल इसी तरीके से ही मनुष्य को पूरी तरह से पवित्र किया जा सकता है। व्यवस्था के युग का अंत के बाद और अनुग्रह के युग के आरम्भ से, परमेश्वर ने उद्धार के अपने कार्य को शुरू किया, जो अंत के दिनों तक चलता है, जब वह विद्रोहशीलता के लिए मनुष्य के न्याय और ताड़ना का कार्य करते हुए मानवजाति को पूरी तरह से शुद्ध कर देगा। केवल तभी वो अपने उद्धार कार्य का समापन करेगा और विश्राम में प्रवेश करेगा। इसलिए, कार्य के तीन चरणों में, परमेश्वर स्वयं मनुष्य के बीच अपने कार्य को करने के लिए मात्र दो बार देह बना। ऐसा इसलिए है क्योंकि कार्य के तीन चरणों में से केवल एक चरण ही मनुष्यों की उनकी ज़िन्दगियों में अगुवाई करने के लिए है, जबकि अन्य दो चरण उद्धार के कार्य हैं। केवल परमेश्वर के देह बनने से ही वह मनुष्य के साथ-साथ रह सकता है, संसार के दुःख का अनुभव कर सकता है, और एक सामान्य देह में रह सकता है। केवल इसी तरह से वह उस व्यावहारिक वचन से मनुष्यों को आपूर्ति कर सकता है जिसकी उन्हें एक सृजन होने के नाते आवश्यकता है। देहधारी परमेश्वर की वजह से मनुष्य परमेश्वर से पूर्ण उद्धार प्राप्त करता है, न कि सीधे तौर पर स्वर्ग से की गई अपनी प्रार्थनाओं से। क्योंकि मनुष्य शरीरी है; मनुष्य परमेश्वर के आत्मा को देखने में असमर्थ है और उस तक पहुँचने में तो बिलकुल भी समर्थ नहीं है। मनुष्य केवल परमेश्वर के देहधारी देह के साथ ही सम्बद्ध हो सकता है; केवल उसके माध्यम से ही मनुष्य सारे वचनों और सारे सत्यों को समझ सकता है, और पूर्ण उद्धार प्राप्त कर सकता है। दूसरा देहधारण मनुष्य को पापों से पीछा छुड़ाने और मनुष्य को पूरी तरह से पवित्र करने के लिए पर्याप्त है। इसलिए, दूसरे देहधारण देह के साथ परमेश्वर के सभी कार्य समाप्त होंगे और परमेश्वर के देहधारण के अर्थ को पूर्ण किया जायेगा। उसके बाद, देह में परमेश्वर का काम पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। दूसरे देहधारण के बाद, वह अपने कार्य के लिए पुन: देह नहीं बनेगा। क्योंकि उसका सम्पूर्ण प्रबंधन समाप्त हो जाएगा। अंत के दिनों का, उसका देहधारण अपने चुने हुए लोगों को पूरी तरह से प्राप्त कर लेगा, और अंत के दिनों में मनुष्यको उनके प्रकार के अनुसार विभाजित कर दिया जाएगा। वह उद्धार का कार्य अब और नहीं करेगा, और न ही वह किसी कार्य को करने के लिए देह में लौटेगा।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "देहधारण का रहस्य (4)" से

22. अंत के दिनों के कार्य में, वचन चिन्हों एवं अद्भुत कामों के प्रकटीकरण की अपेक्षा कहीं अधिक शक्तिमान है, और वचन का अधिकार चिन्हों एवं अद्भुत कामों से कहीं बढ़कर है। वचन मनुष्य के हृदय में गहराई से दबे सभी भ्रष्ट स्वभावों को प्रकट करता है। तुम अपने बल पर इन्हें पहचानने में असमर्थ हो। जब उन्हें वचन के माध्यम से तुम पर प्रकट किया जाता है, तब तुम्हें स्वाभाविक रुप से ही एहसास हो जाएगा; तुम उन्हें इनकार करने में समर्थ नहीं होगे, और तुम्हें पूरी तरह से यक़ीन हो जाएगा। क्या यह वचन का अधिकार नहीं है? यह वह परिणाम है जिसे वचन के वर्तमान कार्य के द्वारा प्राप्त किया गया है। इसलिए, बीमारियों की चंगाई और दुष्टात्माओं को निकालने के द्वारा मनुष्य को उसके पापों से पूरी तरह से बचाया नहीं जा सकता है और चिन्हों और अद्भुत कामों के प्रदर्शन के द्वारा उसे पूरी तरह से पूर्ण नहीं किया जा सकता है। चंगाई करने और दुष्टात्माओं को निकालने का अधिकार मनुष्य को केवल अनुग्रह प्रदान करता है, परन्तु मनुष्य का देह तब भी शैतान से सम्बन्धित होता है और भ्रष्ट शैतानी स्वभाव तब भी मनुष्य के भीतर बना रहता है। दूसरे शब्दों में, वह जिसे शुद्ध नहीं किया गया है अभी भी पाप और गन्दगी से सम्बन्धित है। जब वचनों के माध्यम से मनुष्य को स्वच्छ कर दिया जाता है केवल उसके पश्चात् ही उसे परमेश्वर के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है और वह पवित्र बन सकता है। जब मनुष्य के भीतर से दुष्टात्माओं को निकाला गया और उसे छुटकारा दिलाया गया, तो इसका अर्थ केवल इतना था कि, मनुष्य को शैतान के हाथ से छीन कर परमेश्वर को लौटा दिया गया है। हालाँकि, उसे परमेश्वर के द्वारा स्वच्छ या परिवर्तित नहीं किया गया है, इसलिए वह भ्रष्ट बना रहता है। मनुष्य के भीतर अब भी गन्दगी, विरोध, और विद्रोशीलता बनी हुई है; मनुष्य केवल छुटकारे के माध्यम से ही परमेश्वर के पास लौटा है, परन्तु मनुष्य को उसका कोई ज्ञान नहीं है और अभी भी परमेश्वर का विरोध करता और उसके प्रति प्रतिरोध दिखाता है। मनुष्य को छुटकारा दिये जाने से पहले, शैतान के बहुत से ज़हर उसमें पहले से ही गाड़ दिए गए थे। हज़ारों वर्षों तक शैतान द्वारा भ्रष्ट किये जाने के बाद, मनुष्य के भीतर पहले ही ऐसा स्वभाव है जो परमेश्वर का विरोध करता है। इसलिए, जब मनुष्य को छुटकारा दिया गया है, तो यह छुटकारे से बढ़कर और कुछ नहीं है, जहाँ मनुष्य को एक ऊँची कीमत पर खरीदा गया है, परन्तु भीतर का विषैला स्वभाव नहीं हटाया गया है। मनुष्य जो इतना अशुद्ध है उसे परमेश्वर की सेवा करने के योग्य होने से पहले एक परिवर्तन से होकर अवश्य गुज़रना चाहिए। न्याय और ताड़ना के इस कार्य के माध्यम से, मनुष्य अपने भीतर के गन्दे और भ्रष्ट सार को पूरी तरह से जान जाएगा, और वह पूरी तरह से बदलने और स्वच्छ होने में समर्थ हो जाएगा। केवल इसी तरीके से मनुष्य परमेश्वर के सिंहासन के सामने वापस लौटने के योग्य हो सकता है। वह सब कार्य जिसे आज किया गया है वह इसलिए है ताकि मनुष्य को स्वच्छ और परिवर्तित किया जा सके; न्याय और ताड़ना के वचन के द्वारा और साथ ही शुद्धिकरण के माध्यम से, मनुष्य अपनी भ्रष्टता को दूर फेंक सकता है और उसे शुद्ध किया जा सकता है। इस चरण के कार्य को उद्धार का कार्य मानने के बजाए, यह कहना कहीं अधिक उचित होगा कि यह शुद्ध करने का कार्य है। सच में, यह चरण विजय का और साथ ही उद्धार के कार्य का दूसरा चरण है। मनुष्य को वचनन्याय और ताड़ना के माध्यम से परमेश्वर के द्वारा प्राप्त किया जाता है; शुद्ध करने, न्याय करने और खुलासा करने के लिए वचन के उपयोग के माध्यम से मनुष्य के हृदय के भीतर की सभी अशुद्धताओं, अवधारणाओं, प्रयोजनों, और व्यक्तिगत आशाओं को पूरी तरह से प्रकट किया जाता है। यद्यपि मनुष्य को छुटकारा दिया गया है और उसके पापों को क्षमा किया गया है, फिर भी इसे केवल इतना ही माना जा सकता है कि परमेश्वर मनुष्य के अपराधों का स्मरण नहीं करता है और मनुष्य के अपराधों के अनुसार मनुष्य से व्यवहार नहीं करता है। हालाँकि, जब मनुष्य जो देह में रहता है, जिसे पाप से मुक्त नहीं किया गया है, वह भ्रष्ट शैतानी स्वभाव को अंतहीन रूप से प्रकट करते हुए, केवल पाप करता रह सकता है। यही वह जीवन है जो मनुष्य जीता है, पाप और क्षमा का एक अंतहीन चक्र। अधिकांश मनुष्य दिन में सिर्फ इसलिए पाप करते हैं ताकि शाम को स्वीकार कर सकें। इस प्रकार, भले ही पापबलि मनुष्य के लिए सदैव प्रभावी है, फिर भी यह मनुष्य को पाप से बचाने में समर्थ नहीं होगी। उद्धार का केवल आधा कार्य ही पूरा किया गया है, क्योंकि मनुष्य में अभी भी भ्रष्ट स्वभाव है। उदाहरण के लिए, जब लोग जान गए कि वे मोआब के वंशज हैं, तो उन्होंने शिकायत के वचन जारी किए, जीवन की तलाश छोड़ दी, और पूरी तरह निष्क्रिय हो गए। क्या यह इस बात को नहीं दर्शाता है कि मानवजाति अभी भी परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन पूरी तरह से समर्पित होने में असमर्थ हैं? क्या यह निश्चित रूप से उनका भ्रष्ट शैतानी स्वभाव नहीं है? जब तुम्हें ताड़ना के अधीन नहीं किया गया था, तो अन्य सभी की तुलना में तुम्हारे हाथ अधिक ऊँचे उठे हुए थे, यहाँ तक कि यीशु के हाथों से भी ऊँचे। और तुम ऊँची आवाज़ में चीख़ रहे थे: "परमेश्वर का प्रिय पुत्र बनो! परमेश्वर का अंतरंग बनो! हम शैतान को समर्पण करने के बजाय मरना चाहेंगे! पुराने शैतान के विरुद्ध विद्रोह करो! बड़े लाल अजगर के विरुद्ध विद्रोह करो! बड़ा लाल अजगर पूरी तरह से सत्ता से गिर जाये! परमेश्वर हमें पूरा करें!" अन्य सभी की तुलना में तुम्हारी चीख़े अधिक ऊँची थीं। किन्तु फिर ताड़ना का समय आया और, एक बार फिर, मनुष्यों का भ्रष्ट स्वभाव प्रकट हुआ। फिर, उनकी चीख़ें बंद हो गईं, और उनका संकल्प टूट गया। यही मनुष्य की भ्रष्टता है; यह पाप की अपेक्षा अधिक गहराई तक फैला है, इसे शैतान के द्वारा गाड़ा गया है और यह मनुष्य के भीतर गहराई से जड़ पकड़े हुए है। मनुष्य के लिए अपने पापों के प्रति अवगत होना आसान नहीं है; मनुष्य अपनी स्वयं की गहराई से जमी हुई प्रकृति को पहचानने में असमर्थ है। केवल वचन के न्याय के माध्यम से ही इन प्रभावों को प्राप्त किया जा सकता है। केवल इस प्रकार से ही मनुष्य को उस स्थिति से आगे धीरे-धीरे बदला जा सकता है। मनुष्य अतीत में इस प्रकार चिल्लाता था क्योंकि मनुष्य को अपने मूल भ्रष्ट स्वभाव की कोई समझ नहीं थी। मनुष्य के भीतर इस तरह की अशुद्धियाँ हैं। न्याय और ताड़ना की इतनी लंबी अवधि के दौरान, मनुष्य तनाव के माहौल में रहता था। क्या यह सब वचन के माध्यम से प्राप्त नहीं किया गया था? क्या सेवा करने वालों की परीक्षा[क] से पहले तुम भी बहुत ऊँची आवाज़ में नहीं चीख़े थे? "राज्य में प्रवेश करो! वे सभी जो इस नाम को स्वीकार करते हैं राज्य में प्रवेश करेंगे! सभी परमेश्वर का हिस्सा बनेंगे!" जब सेवा करने वालों की परीक्षा आयी, तो तुम ने चिल्लाना बंद कर दिया। सबसे पहले, सभी चीख़े थे, "हे परमेश्वर! तुम मुझे जहाँ कहीँ भी रखो, मैं तुम्हारे द्वारा मार्गदर्शन किए जाने के लिए समर्पित होऊँगा।" फिर उसने इन वचनों, "मेरा पौलुस कौन बनेगा?" को देखा और कहा, "मैं तैयार हूँ!" तब उसने इन वचनों, "और अय्यूब की आस्था का क्या?" को देखा। तो उसने कहा, "मैं अय्यूब की आस्था स्वयं पर लेने के लिए तैयार हूँ। परमेश्वर, कृपया मेरी परीक्षा लो!" जब सेवा करने वालों की परीक्षा आयी, तो वह तुरंत ढह गया और फिर न उठ सका। उसके बाद, मनुष्य के हृदय में अशुद्धियाँ धीरे-धीरे घट गईं। क्या यह वचन के माध्यम से प्राप्त नहीं किया गया था? इसलिए, वर्तमान में जो अनुभव तुम लोगों ने किए हैं, वे वचन के माध्यम से प्राप्त किए गए परिणाम हैं, जो यीशु के चिह्न दिखाने और अद्भुत काम करने के माध्यम से प्राप्त किए गए अनुभवों से भी बड़े हैं। परमेश्वर की महिमा और परमेश्वर स्वयं का अधिकार जिसे तुम देखते हो वे मात्र सलीब पर चढ़ने, बीमारी को चंगा करने और दुष्टात्माओं को बाहर निकालने के माध्यम से नहीं देखे जाते हैं, बल्कि वचन के द्वारा उसके न्याय के माध्यम से और अधिक देखे जाते हैं। यह तुम्हें दर्शाता है कि न केवल चिह्न दिखाना, बीमारियों को चंगा करना और दुष्टात्माओं को बाहर निकालना परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्य है, बल्कि वचन द्वारा न्याय परमेश्वर के अधिकार का प्रतिनिधित्व करने और उसकी सर्वशक्तिमत्ता को प्रकट करने में बेहतर समर्थ है।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "देहधारण का रहस्य (4)" से

23. जो कुछ मनुष्यों ने अब प्राप्त किया है—आज की अपनी कद-काठी, ज्ञान, प्रेम, वफादारी, आज्ञाकारिता, और अंतर्दृष्टि—वे ऐसे परिणाम हैं जिन्हें वचन के न्याय के माध्यम से प्राप्त किया गया है। यह कि तुम वफादारी रखने में और आज के दिन तक खड़े रहने में समर्थ हो यह वचन के माध्यम से प्राप्त किया जाता है। अब मनुष्य देखता है कि देहधारी परमेश्वर का कार्य वास्तव में असाधारण है। बहुत कुछ ऐसा है जिसे मनुष्य के द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता है; वे रहस्य हैं और अद्भुत बातें हैं। इसलिए, बहुतों ने समर्पण कर दिया है। कुछ लोगों ने अपने जन्म के समय से ही किसी भी मनुष्य के प्रति समर्पण नहीं किया है, फिर भी जब वे आज के दिन परमेश्वर के वचनों को देखते हैं, तो वे पूरी तरह से समर्पण कर देते हैं इस बात पर ध्यान दिए बिना कि उन्होंने ऐसा किया है और वे सूक्ष्म परिक्षण करने या कुछ और कहने का जोखिम नहीं उठाते हैं; मनुष्य वचन के अधीन गिर गया है और वचन के द्वारा न्याय के अधीन औंधे मुँह पड़ा है। यदि परमेश्वर का आत्मा मनुष्यों से सीधे तौर पर बात करता, तो वे सब उस वाणी के प्रति समर्पित हो जाते, प्रकाशन के वचनों के बिना नीचे गिर जाते, बिलकुल वैसे ही जैसे पौलुस दमिश्क की राह पर ज्योति के मध्य भूमि पर गिर गया था। यदि परमेश्वर लगातार इसी तरीके से काम करता रहा, तो मनुष्य वचन के द्वारा न्याय के माध्यम से अपने स्वयं के भ्रष्ट स्वभाव को जानने और इसके परिणामस्वरूप उद्धार प्राप्त करने में कभी समर्थ नहीं होता। केवल देह बनने के माध्यम से ही वह व्यक्तिगत रूप से अपने वचनों को सभी के कानों तक पहुँचा सकता है ताकि वे सभी जिनके पास कान हैं उसके वचनों को सुन सकें और वचन के द्वारा उसके न्याय के कार्य को प्राप्त कर सकें। उसके वचन के द्वारा प्राप्त किया गया परिणाम सिर्फ यही है, पवित्रात्मा का प्रकटन नहीं जो मनुष्य को भयभीत करके समर्पण करवाता है। केवल ऐसे ही व्यावहारिक और असाधारण कार्य के माध्यम से ही मनुष्य के पुराने स्वभाव को, जो अनेक वर्षों से भीतर गहराई में छिपा हुआ है, पूरी तरह से प्रकट किया जा सकता है ताकि मनुष्य उसे पहचाने सके और उसे बदलवा सके। यह देहधारी परमेश्वर का व्यावहारिक कार्य है; वह वचन के द्वारा मनुष्य पर न्याय के परिणामों को प्राप्त करने के लिए व्यावहारिक तरीके से बोलता है और न्याय को निष्पादित करता है। यह देहधारी परमेश्वर का अधिकार है और परमेश्वर के देहधारण का महत्व है। इसे देहधारी परमेश्वर के अधिकार को, वचन के कार्य के द्वारा प्राप्त किए गए परिणामों को, और इस बात को प्रकट करने के लिए किया जाता है कि आत्मा देह में आ चुका है; वह वचन के द्वारा मनुष्य का न्याय करने के माध्यम से अपने अधिकार को प्रदर्शित करता है। यद्यपि उसका देह एक साधारण और सामान्य मानवता का बाहरी रूप है, फिर भी ये उसके वचन से प्राप्त हुए परिणाम हैं जो मनुष्य को दिखाते हैं कि परमेश्वर अधिकार से परिपूर्ण है, कि वह परमेश्वर स्वयं है और उसके वचन स्वयं परमेश्वर की अभिव्यक्ति हैं। इसके माध्यम से सभी मनुष्यों को दिखाया जाता है कि वह परमेश्वर स्वयं है, परमेश्वर स्वयं जो देह बन गया है, और किसी के भी द्वारा उसका अपमान नहीं किया जा सकता है। कोई भी उसके वचन के द्वारा किए गए न्याय से बढ़कर नहीं हो सकता है, और अंधकार की कोई भी शक्ति उसके अधिकार पर प्रबल नहीं हो सकती। मनुष्य उसके प्रति पूर्णतः समर्पण करता है क्योंकि वही देह बना वचन है, और उसके अधिकार, और वचन द्वारा उसके न्याय के कारण समर्पण करता है। उसके देहधारी देह द्वारा लाया गया कार्य ही वह अधिकार है जिसे वह धारण करता है। वह देहधारी हो गया क्योंकि देह भी अधिकार धारण कर सकता है, और वह एक व्यावहारिक तरीके से मनुष्यों के बीच इस प्रकार का कार्य करने में सक्षम है जो मनुष्यों के लिए दृष्टिगोचर और मूर्त है। ऐसा कार्य परमेश्वर के आत्मा के द्वारा सीधे तौर पर किए गए किसी भी कार्य की अपेक्षा कहीं अधिक वास्तविक है जो सारे अधिकार को धारण करता है, और इसके परिणाम भी स्पष्ट हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि उसका देहधारी देह व्यावहारिक तरीके से बोल और कार्य कर सकता है; उसकी देह का बाहरी रूप कोई अधिकार धारण नहीं करता है और मनुष्य के द्वारा उस तक पहुँचा जा सकता है। जबकि उसका सार अधिकार को वहन करता है, किन्तु उसका अधिकार किसी के लिए भी दृष्टिगोचर नहीं है। जब वह बोलता और कार्य करता है, तो मनुष्य उसके अधिकार के अस्तित्व का पता लगाने में असमर्थ होता है; यह उसके वास्तविक प्रकृति के कार्य के लिए और भी अधिक अनुकूल है। और इस प्रकार के सभी कार्य परिणामों को प्राप्त कर सकते हैं। भले ही कोई मनुष्य यह एहसास नहीं करता है कि परमेश्वर अधिकार रखता या यह नहीं देखता है कि परमेश्वर का अपमान नहीं किया जाना चाहिए या परमेश्वर के कोप को नहीं देखता है, फिर भी वो अपने छिपे हुए अधिकार और कोप और सार्वजनिक भाषण के माध्यम से, अपने वचनों के अभीष्ट परिणामों को प्राप्त कर लेता है। दूसरे शब्दों में, उसकी आवाज़ के लहजे, भाषण की कठोरता, और उसके वचनों की समस्त बुद्धि के माध्यम से, मनुष्य सर्वथा आश्वस्त हो जाता है। इस तरह से, मनुष्य उस देहधारी परमेश्वर के वचन के प्रति समर्पण करता है, जिसके पास प्रतीत होता है कि कोई अधिकार नहीं है, और इससे मनुष्य के लिए परमेश्वर के उद्धार का लक्ष्य पूरा होता है। यह उसके देहधारण का एक और महत्व है: अधिक वास्तविक रूप से बोलना और अपने वचनों को मनुष्य पर प्रभाव डालने देना ताकि वे परमेश्वर के वचन की सामर्थ्य के गवाह बनें। अतः यह कार्य, यदि देहधारण के माध्यम से नहीं किया जाए, तो थोड़े से भी परिणामों को प्राप्त नहीं करेगा और पापियों का पूरी तरह से उद्धार करने में समर्थ नहीं होगा। यदि परमेश्वर देह नहीं बना होता, तो वह पवित्रात्मा बना रहता जो मनुष्यों के लिए अदृश्य और अमूर्त है। चूँकि मनुष्य देह वाला प्राणी है, इसलिए मनुष्य और परमेश्वर दो अलग-अलग संसारों से सम्बन्धित हैं, और स्वभाव में भिन्न हैं। परमेश्वर का आत्मा देह वाले मनुष्य से बेमेल है, और उनके बीच कोई सम्बन्ध स्थापित नहीं किया जा सकता है; इसके अतिरिक्त, मनुष्य आत्मा नहीं बन सकता है। ऐसा होने के कारण, परमेश्वर के आत्मा को सृजित प्राणियों में से एक बनना ही चाहिए और अपना मूल काम करना चाहिए। परमेश्वर सबसे ऊँचे स्थान पर चढ़ सकता है और सृष्टि का एक मनुष्य बनकर, कार्य करने और मनुष्य के बीच रहने के लिए अपने आपको विनम्र भी कर सकता है, परन्तु मनुष्य सबसे ऊँचे स्थान पर नहीं चढ़ सकता है और पवित्रात्मा नहीं बन सकता है और वह निम्नतम स्थान में तो बिलकुल भी नहीं उतर सकता है। इसलिए, अपने कार्य को करने के लिए परमेश्वर को देह अवश्य बनना चाहिए। उसी प्रकार, प्रथम देहधारण के दौरान, केवल देहधारी परमेश्वर का देह ही सलीब पर चढ़ने के माध्यम से मनुष्य को छुटकारा दे सकता था, जबकि परमेश्वर के आत्मा को मनुष्य के लिए पापबलि के रूप में सलीब पर चढ़ाया जाना सम्भव नहीं था। परमेश्वर मनुष्य के लिए एक पापबलि के रूप में कार्य करने के लिए प्रत्यक्ष रूप से देह बन सकता था, परन्तु मनुष्य परमेश्वर द्वारा तैयार की गयी पापबलि को लेने के लिए प्रत्यक्ष रूप से स्वर्ग में चढ़ नहीं सकता था। ऐसा होने के कारण, मनुष्य को इस उद्धार को लेने के लिए स्वर्ग में चढ़ने देने की बजाए, यही सम्भव था कि परमेश्वर से स्वर्ग और पृथ्वी के बीच इधर-उधर आने-जाने का आग्रह किया जाये, क्योंकि मनुष्य पतित हो चुका था और स्वर्ग पर चढ़ नहीं सकता था, और पापबलि को तो बिलकुल भी प्राप्त नहीं कर सकता था। इसलिए, यीशु के लिए मनुष्यों के बीच आना और व्यक्तिगत रूप से उस कार्य को करना आवश्यक था जिसे मनुष्य के द्वारा पूरा किया ही नहीं जा सकता था। हर बार जब परमेश्वर देह बनता है, तब ऐसा करना नितान्त आवश्यक होता है। यदि किसी भी चरण को परमेश्वर के आत्मा के द्वारा सीधे तौर पर सम्पन्न किया जा सकता, तो वो देहधारी होने के अनादर को सहन नहीं करता।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "देहधारण का रहस्य (4)" से

फुटनोट:

क. मूल पाठ में "की परीक्षा" यह वाक्यांश नहीं है।

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