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सृष्टिकर्ता के अधिकार का असली मूर्त रूप

दुनिया और इंसान की नियति,

रचयिता के प्रभुत्व से जुड़ी है गहराई से,

अलग हो नहीं सकती रचयिता के आयोजन से,

अटूट बंधन है इसका रचयिता के अधिकार से।

तमाम चीज़ों के कानूनों से समझता है इंसा,

रचयिता के आयोजन और सत्ता को;

जीवित रहने के नियमों से महसूस करता है इंसा,

परमेश्वर के शासन को;

चीज़ों की नियति से वो नतीजे निकालता है,

रचयिता जिस तरह अपनी सत्ता का उपयोग करता है,

उन्हें काबू में रखता है;

इंसानों और चीज़ों की ज़िंदगी के चक्र में,

चीज़ों और जीवों के लिये इंसा,

रचयिता के आयोजन और प्रबंधन की अनुभूति करता है,

और गवाही देता है, किस तरह वो आयोजन,

और प्रबंधन, ऊँचे उठ जाते हैं दुनियावी कानूनों से,

नियमों, व्यवस्थाओं से, और ताकतों और शक्तियों से।

इंसा इसकी रोशनी में, मानने को विवश है,

कोई सृजित प्राणी, परमेश्वर की सत्ता को भंग नहीं कर सकता,

कोई ताकत दख़ल दे नहीं सकती, न बदल सकती, किसी घटना,

किसी भी चीज़ को, जो कर दिया निश्चित रचयिता ने।

इन्हीं दिव्य नियमों और कानूनों के तहत,

पीढ़ी-दर-पीढ़ी, इंसान और हर चीज़ रहती है और बढ़ती है।

क्या ये सृष्टिकर्ता के अधिकार का, असली मूर्त रूप नहीं है?

"वचन देह में प्रकट होता है" से

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