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वचन देह में प्रकट होता है

भाग तीन

कलीसियाओं में चलने के दौरान मसीह द्वारा बोले गए वचनों

(जून 1992 से अगस्त 2014)

परिचय

कलीसियाओं में चलने के दौरान मसीह द्वारा बोले गए वचनों (I)

(जून 1992 से अक्टूबर 1992)

1मार्ग... (1)
2मार्ग... (2)
3मार्ग... (3)
4मार्ग... (4)
5मार्ग... (5)
6मार्ग... (6)
7मार्ग... (7)
8मार्ग... (8)
9विश्वासियों को क्या दृष्टिकोण रखना चाहिए
10परमेश्वर के कार्य के चरणों के विषय में
11भ्रष्ट मनुष्य परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में अक्षम है
12धार्मिक सेवाओं को अवश्य शुद्ध करना चाहिए
13परमेश्वर में अपने विश्वास में तुम्हें परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करना चाहिए
14परमेश्वर के साथ उचित संबंध स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है
15एक सामान्य आत्मिक जीवन लोगों की सही मार्ग पर अगुवाई करता है
16प्रतिज्ञाएँ उनके लिए जो पूर्ण बनाए जा चुके हैं
17दुष्टों को निश्चित ही दंड दिया जाएगा
18एक उचित अवस्था में प्रवेश कैसे करें
19परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सेवा कैसे करें
20वास्तविकता को कैसे जानें
21एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन के सम्बन्ध में
22कलीसिया जीवन और वास्तविक जीवन पर विचार-विमर्श
23सभी के द्वारा अपना कार्य करने के बारे में
24परमेश्वर द्वारा मनुष्य को इस्तेमाल करने के विषय में
25सत्य को समझ लेने के बाद, तुम्हें उसे अभ्यास में लाना चाहिए
26वह व्यक्ति उद्धार प्राप्त करता है जो सत्य का अभ्यास करने को तैयार है
27एक योग्य चरवाहे को किन साजो-सामान से युक्त होना चाहिए
28अनुभव पर
29नये युग की आज्ञाएँ
30सहस्राब्दि राज्य आ चुका है
31परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध कैसा है?
32वास्तविकता पर अधिक ध्यान केन्द्रित करो
33आज्ञाओं का पालन करना और सत्य का अभ्यास करना
34तुम्हें पता होना चाहिए कि व्यावहारिक परमेश्वर ही स्वयं परमेश्वर है
35मात्र सत्य का अभ्यास करना ही वास्तविकता रखना है
36आज परमेश्वर के कार्य को जानना
37क्या परमेश्वर का कार्य उतना सरल है, जितना मनुष्य कल्पना करता है?
38तुम्हें सत्य के लिए जीना चाहिए क्योंकि तुम्हें परमेश्वर में विश्वास है
39सात गर्जनाएँ—भविष्यवाणी करती हैं कि राज्य के सुसमाचार पूरे ब्रह्माण्ड में फैल जाएंगे
40देहधारी परमेश्वर और परमेश्वर द्वारा उपयोग किए गए लोगों के बीच महत्वपूर्ण अंतर
41अंधकार के प्रभाव से बच निकलो और तुम परमेश्वर द्वारा जीत लिए जाओगे
42विश्वास में, वास्तविकता पर केंद्रित होना चाहिए, धार्मिक रीति-रिवाजों में संलग्न होना विश्वास नहीं है
43जो आज परमेश्वर के कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं
44परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम स्वाभाविक है
45प्रार्थना की क्रिया के विषय में
46परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और उसके चरण-चिन्हों का अनुसरण करो
47जिनके स्वभाव परिवर्तित हो चुके हैं, वे वही लोग हैं जो परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर चुके हैं
48परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत रखने के बारे में
49पूर्णता प्राप्त करने के लिए परमेश्वर की इच्छा के प्रति सचेत रहो
50परमेश्वर उन्हें पूर्ण बनाता है, जो उसके हृदय के अनुसार हैं
51जो सच्चे हृदय से परमेश्वर के आज्ञाकारी हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर के द्वारा ग्रहण किए जाएँगे
52राज्य का युग वचन का युग है
53परमेश्वर के वचन के द्वारा सब कुछ प्राप्त हो जाता है
54जो परमेश्वर से सचमुच प्यार करते हैं, वे वो लोग हैं जो परमेश्वर की व्यावहारिकता के प्रति पूर्णतः समर्पित हो सकते हैं
55जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शुद्धिकरण से अवश्य गुज़रना चाहिए
56केवल पीड़ादायक परीक्षाओं का अनुभव करने के द्वारा ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो
57केवल परमेश्वर को प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है
58"सहस्राब्दि राज्य आ चुका है" के बारे में एक संक्षिप्त वार्ता
59केवल वे लोग ही परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं जो परमेश्वर को जानते हैं
60पतरस ने यीशु को कैसे जाना
61केवल शोधन का अनुभव करने के द्वारा ही मनुष्य सच्चे प्रेम से युक्त हो सकता है
62परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग हमेशा के लिए उसके प्रकाश में रहेंगे
63मात्र उन्हें ही पूर्ण बनाया जा सकता है जो अभ्यास पर ध्यान देते हैं
64पवित्र आत्मा का कार्य और शैतान का कार्य
65जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी
66तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी भक्ति बनाए रखनी चाहिए
67क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो जीवित हो उठा है?
68एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता में होना है
69वे सभी लोग जो परमेश्वर को नहीं जानते हैं वे वो लोग हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं