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वचन देह में प्रकट होता है

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कलीसियाओं में चलते हुए देहधारी मानव के पुत्र के वचन (Ⅲ)

1जब परमेश्वर की बात आती है, तो तुम्हारी समझ क्या होती है
2एक वास्तविक मनुष्य होने का क्या अर्थ है
3देहधारियों में से कोई भी कोप के दिन से नहीं बच सकता है
4तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई
5पद नामों एवं पहचान के सम्बन्ध में
6जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर को सन्तुष्ट कर सकते हैं
7परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है
8स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता ही मसीह का वास्तविक सार है
9तुझे अपने भविष्य मिशन से कैसे निपटना चाहिए
10मानव जाति के प्रबंधन का उद्देश्य
11मनुष्य का सार और उसकी पहचान
12मनुष्य की निहित पहचान और उसका मूल्य क्या है
13क्या वे जो सीखते और जानते नहीं, पशु मात्र नहीं हैं?
14चीन के चुने हुए लोग इस्राएल के किसी गोत्र का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते
15आशीषों से तुम लोग क्या समझते हो?
16तुम विश्वास के विषय में क्या जानते हो?
17जब झड़ती हुई पत्तियाँ अपनी जड़ों की ओर लौटेंगी तो तुम्हें उन सभी बुराइयों पर पछतावा होगा जो तुमने की हैं
18उद्धारकर्त्ता पहले से ही एक "सफेद बादल" पर सवार होकर वापस आ चुका है
19सुसमाचार को फैलाने का कार्य मनुष्यों को बचाने का कार्य भी है
20कितना नीच है तुम्हारा चरित्र !
21व्यवस्था के युग में कार्य
22छुटकारे के युग में कार्य के पीछे की सच्ची कहानी
23युवा और वृद्ध लोगों के प्रति वचन
24केवल पूर्ण बनाया गया ही एक सार्थक जीवन जी सकता है
25तुम लोगों को हैसियत के आशीषों को अलग रखना चाहिए और मनुष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिए
26वह मनुष्य किस प्रकार परमेश्वर के प्रकटनों को प्राप्त कर सकता है जिसने उसे अपनी ही धारणाओं में परिभाषित किया है?
27देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर
28परमेश्वर सम्पूर्ण सृष्टि का प्रभु है
29तेरह धर्मपत्रों के प्रति तुम क्या मनोभाव रखते हो
30सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है
31परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का काम
32भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है
33परमेश्वर द्वारा आवासित देह का सार
34मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना
35परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे
36परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार
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