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8. कष्ट और परीक्षण—कृपा पाने की आशीषें

वांगगांग शैंडॉन्गप्रदेश

मैं एक किसान हूं और चूंकि मेरा परिवार गरीब है, इसलिए मुझे धन कमाने हेतु अस्थायी नौकरियां खोजने के लिए जगह-जगह की यात्राएँ करनी पड़ती थी; मैं सोचता था कि अपनी शारीरिक मेहनत से मैं अपनी जिंदगी को बेहतर बना सकता हूं। हालांकि, असलियत में, मैंने देखा कि मेरे जैसे प्रवासी श्रमिकों के लिए कानूनी अधिकारों की कोई गारंटी नहीं थी; मेरे वेतन को किसी कारण के बिना ही अक्सर रोक लिया जाता था। बार-बार मेरे साथ धोखा किया जाता था और दूसरे मेरा फायदा उठाते थे। एक साल की कड़ी मेहनत के बाद भी, मुझे वह नहीं मिला जो मुझे मिलने की उम्मीद थी। मुझे महसूस हुआ कि यह दुनिया वाकई बुरी है! इंसान एक-दूसरे के साथ पशुओं जैसा बर्ताव करते हैं, जहां ताकतवर कमजोर का शिकार करता है; वे एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते हैं, परस्पर लड़ाई करते हैं, और मैं इस तरह की जिंदगी नहीं जी पा रहा था। मेरी आत्मा में बहुत दर्द और अवसाद था, और जब मैंने जिंदगी में विश्वास खो दिया था, तभी मेरे एक दोस्त ने मुझे सर्व शक्तिमान परमेश्वर के उद्धारक चरित्र को मुझसे साझा किया। तब से, मैं नियमित तौर पर भाइयों व बहनों के साथ एकत्रित होता, प्रार्थना करता और भजन गाता था; हम सत्य का संवाद और आदान-प्रदान करते थे, और एक—दूसरे की कमजोरियों को दूर करने के लिए अपनी क्षमता का उपयोग करते थे। मैं बहुत खुश व स्वतंत्र महसूस करता था। सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया में, मैंने देखा कि भाई व बहनें एक—दूसरे को नीचा दिखाने या सामाजिक भेदभाव करने की कोशिश नहीं करते थे; वे सभी शुद्ध रूप से मुक्त व निष्कपट थे और एक—दूसरे के मित्र थे। वहां पर हर कोई अपने भ्रष्ट आचारों को बाहर निकालने, और इंसानों जैसा जीवन जीने व उद्धार पाने हेतु पूरी मेहनत से सत्य पाने के लिए प्रयत्न कर रहा था। इससे मैंने जिंदगी में खुशियों का अनुभव करना और जिंदगी के महत्व व आदर्श को समझना सीखा। इसलिए, मैंने निर्णय लिया कि मुझे सुसमाचार का प्रसार करना चाहिए और अंधकार में जी रहे लोगों को उद्धार दिलाने और फिर से प्रकाश देखने के लिए परमेश्वर के पास लाने में उनकी मदद करनी चाहिए। परिणामस्वरूप, मैं सुसमाचार का प्रचार करने व परमेश्वर का प्रमाण प्रस्तुत करने वाले रैंक में शामिल हो गया। लेकिन अप्रत्याशित रूप से, सुसमाचार का प्रसार करने के लिए सीसीपी सरकार ने मुझे गिरफ्तार कर लिया और मुझे बेहद निर्दयी उत्पीड़न, क्रूर बर्ताव और जेल की पीड़ा सहनी पड़ी।

यह 2008 की सर्दियों की एक दोपहर की बात है, जब दो बहनें व मैं सुसमाचार के एक लक्ष्य-समूह में, अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य का प्रचार कर रहे थे, तभी अधर्मी लोगों ने हमारी शिकायत कर दी। छ: पुलिस कर्मचारियों ने सुसमाचार लक्ष्य-समूह के घर में घुसने के लिए हमारे आवासीय परमिट को जांचने की जरूरत का बहाना बनाया। जैसे ही वे दरवाजे पर आएं, वे चिल्लाने लगे: "हिलना मत!" उन दुष्ट पुलिसवालों में से दो मुझ पर इस तरह झपटे जैसे वे पूरी तरह से अपना आपा खो चुके हों; उनमें से एक ने मेरी छाती के कपड़े को धर दबोचा और दूसरे ने मेरे हाथों को पकड़ लिया और उन्हें मेरे पीछे कसने के लिए अपनी पूरी ताकत का इस्तेमाल किया, फिर उसने उग्रतापूर्वक पूछा: "तुम क्या कर रहे हो? तुम कहा से हो? तुम्हारा नाम क्या है।" जवाब में मैंने पूछा: "तुम लोग क्या कर रहे हें? तुम लोग मुझे क्यों गिरफ्तार कर रहे हैं?" जब उन्होंने मुझे ऐसा कहते हुए सुना, तो वे बहुत गुस्सा हो गए और आवेशपूर्ण रूप से कहा: "कोई फर्क नहीं पड़ता कि कारण क्या है, हम तुम्हें ही ढूंढ रहे थे और अब तुम हमारे साथ चलोगे।" इसके बाद, उन दुष्ट पुलिस वालों ने मुझे व दो बहनों को पुलिस वाहन में ढकेला और स्थानीय पुलिस स्टेशन ले गए।

हमारे पुलिस स्टेशन पहुँचने के बाद, उन दुष्ट पुलिस वालों ने हमें ले जाकर एक छोटे कमरे में मुझे बंद कर दिया; उन्होंने मुझे जमीन पर अपनी नाक रगड़ने का आदेश दिया और हम पर निगरानी के लिए 4 लोग लगा दिए। चूंकि मैं काफी देर से उकड़ूँ बैठा हुआ था, इसलिए मैं इतना थक गया था कि मैं वह नहीं कर पाया। जब भी मैं खड़े होने की कोशिश करता था, तो वे दुष्ट पुलिस वाले मुझे घेर लेते थे और मेरे सिर को दबाकर मुझे खड़े होने से रोक दिया करते थे। रात तक ऐसा ही चलता रहा, जब वे मेरी तलाशी लेने आए तब उन्होने मुझे खड़े होने की अनुमति दी; जब उन्हें तलाशी में कुछ नहीं मिला तो वे सभी चले गए। कुछ ही समय बाद, मैंने बाजू के कमरे से आ रहीं यातना की चीखें सुनी जो खून को जमा देने वाली थी और उस पल, मैं बहुत डर गया था: मैं नहीं जानता था कि इसके बाद वे मुझ पर किस प्रकार के उत्पीड़न और क्रूर बर्ताव का प्रयोग करेंगे! मैंने तुरंत ही अपने दिल से परमेश्वर की प्रार्थना करनी शुरू कर दी: "हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, मैं अभी बहुत डरा हुआ हूं, मैं आपसे श्रद्धा व विश्वास तथा शक्ति की याचना कर रहा हूं, मुझे स्थिर व साहसी बनाइए ताकि मैं आपके लिए प्रमाण प्रस्तुत करने हेतु खड़ा हो सकूं। भले ही मैं उनका उत्पीड़न व क्रूर बर्ताव नहीं सह सकूँ, भले ही मुझे अपनी जीभ को काटकर आत्महत्या करनी पड़े, लेकिन मैं जुडास की तरह आपको कभी धोखा नहीं दूंगा!" प्रार्थना करने के बाद, मैंने परमेश्वर के वचनों को सोचा, "डरो नहीं, सेनाओं का सर्वशक्तिमान परमेश्वर निश्चित रूप से तुम्हारे साथ होगा; वह तुम लोगों के पीछे है और तुम्हारा रक्षक है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 26")। हां, सर्वशक्तिमान परमेश्वर मेरा सहारा हैं और वह मेरे साथ है; तो फिर किस बात का डर? मुझे शैतान से लड़ने के लिए परमेश्वर पर भरोसा करना है। परमेश्वर के वचनों ने मेरे दिल से घबराहट निकाल दी, और मेरा दिल निश्चिन्त हो गया।

उस रात, चार दुष्ट पुलिस वाले आए और उनमें से एक ने मेरी ओर इशारा किया और चिल्लाया: "हमने निश्चित तौर पर एक बड़ी मछली पकड़ी है! सर्वशक्तिमान परमेश्वर पर विश्वास रखने वाले तुम लोग समाज की व्यवस्था को बाधित कर रहे हो, और देश के कानून को नष्ट कर रहे हो...।" वह मुझे, चिल्लाते हुए दूसरे तल के यातना कक्ष में धकेलते हुए ले गया, और झुकने का आदेश दिया। उस यातना कक्ष में यातनाएं देने के लिए हर प्रकार का सामान मौजूद था, जैसे कि रस्सियां, लकड़ी के डंडे, छड़ी, चाबुक बन्दूक आदि। वे बेतरतीब तरीके से बिखरे हुए थे। टेढ़ी भौंहों व धधकती आंखों के साथ, एक दुष्ट पुलिसवाले ने एक हाथ से मेरे बाल पकड़े, और दूसरे हाथ में तेज "प्रहार करने व थपड़ी" की आवाज करने वाली इलेक्ट्रॉनिक छड़ी ले ली, और मुझे डराते हुए जानकारी मांगने लगा: "तुम लोग कलीसिया में कुल कितने लोग हो? तुम लोगों के मिलने का स्थान कहा है? प्रभारी कौन है? इस क्षेत्र में कितने लोग सुसमाचार का प्रचार कर रहे हैं? बोलो! वर्ना, जो होगा वह तुम्हें भुगतना होगा!" मैंने इलेक्ट्रॉनिक छड़ी के आने वाले खतरे की ओर देखा और फिर यातना के उपकरणों से भरे हुए उस कमरे को देखा; मैं घबराने व डरने के अलावा और कुछ नहीं कर सकता था। मैं नहीं जानता था कि मैं इस यातना को सह पाउंगा भी या नहीं। इस क्रूर व कठिन पल में, मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को याद किया: "तुझे भी उस कड़वे प्याले से अवश्य पीना चाहिए जिससे मैंने पीया है (उसने पुनरुत्थान के बाद यही कहा था), तुझे भी उस मार्ग पर चलना होगा जिस पर मैं चला हूँ" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "पतरस ने यीशु को कैसे जाना")। मैं समझ गया कि यह ऐसा कुछ था जो परमेश्वर ने हमारे सुपुर्द किया था और यह जिंदगी का वह तरीका था जिसे खुद परमेश्वर ने हमारे लिए निर्धारित किया था। परमेश्वर में विश्वास करने और सत्य की खोज करने के मार्ग पर चलने में, व्यक्ति को निश्चित तौर पर दुख व निराशा से गुजरना होता है। यह अपरिहार्य है, और अंत में, ये तकलीफ़ें परमेश्वर का आशीर्वाद लेकर आती हैं। केवल दुख के मार्ग से होकर ही, व्यक्ति परमेश्वर द्वारा स्वीकृत सत्य के मार्ग को पा सकता है, और यह सत्य ही अनंत जीवन है, जो परमेश्वर द्वारा हमें अनुमत किया गया है। मुझे परमेश्वर के कदमों पर चलना चाहिए और पूरे साहस से इसका सामना करना चाहिए; मुझे घबराना या डरना नहीं चाहिए। ऐसा सोचते हुए, मेरे दिल में तुरंत ही एक प्रकार की ऊर्जा का संचार हुआ और मैंने तेज आवाज में कहा: "मैं केवल सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करता हूं, मुझे और कुछ भी नहीं पता!" जब उस दुष्ट पुलिस वाले ने यह सुना, तो वह घबरा गया और क्रूरतापूर्वक उसने इलेक्ट्रॉनिक डंडे से मेरी छाती के बांई ओर से मुझे जकड़ लिया। उसने लगभग एक मिनट तक मुझे बिजली का झटका दिया। मुझे तुरंत ही लगने लगा था कि मेरे शरीर में खून उबल रहा है; सिर से पैर तक मुझे असहनीय दर्द हो रहा था और मैं लगातार चिल्लाते हुए जमीन पर गिर कर तड़प रहा था। उसने फिर भी मुझे नहीं बख्शा और अचानक ही मुझे घसीटने लगा और ठुड्डी के बल मुझे उठाने के लिए डंडे का प्रयोग किया, और चिल्लाया: "बोलो! तुम कुछ भी स्वीकार नहीं करोगे?" और इलेक्ट्रॉनिक डंडे से मेरी छाती के दांए हिस्से को कोंचने लगा, मुझे इतनी बुरी तरह से झटके लग रहे थे कि मैं सिर से पैर तक थरथरा रहा था। बाद में उससे इतना दर्द हुआ कि मैं जमीन पर गिरकर बेसुध सा पड़ा रहा। मुझे पता भी नहीं चला कि कितना समय बीत गया था, लेकिन एक दुष्ट पुलिस वाले ने मुझे यह कहते हुए जगाया: "क्या तुम मरने का नाटक कर रहे हो? तुम नाटक कर रहे हो! चलो ठीक है और नाटक करो!" उन लोगों ने मेरे चेहरे को फिर डंडे से कोंच दिया और जांघों पर मारा। इसके बाद, उन्होंने मुझे पकड़कर ऊपर उठाया और गुस्से से पूछा: "क्या तुम मुझे बताओगे या नहीं?" मैंने फिर भी उत्तर नहीं दिया। उस दुष्ट पुलिस वाले ने पूरी क्रूरता के साथ मेरे चेहर पर मुक्के मार मार कर मेरी पिटाई की और मेरा एक दांत टूटकर बाहर गिर गया, दूसरा दांत हिलने लगा। मेरे होंठ से तुरंत ही खून आने लगा था। इन दानवों की उन्मादी यातनाओं का सामना करते हुए, मुझे केवल इस बात का डर था कि इनकी यातनाओं को न सह पाने के कारण कहीं मैं परमेश्वर को धोखा न दे दूं। उस समय, मैंने फिर से परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचा, "सत्ता में रहने वाले लोग बाहर से दुष्ट लग सकते हैं, लेकिन डरो मत, क्योंकि ऐसा इसलिए है तुम सब का विश्वास बहुत कम है। जब तक तुम सभी का विश्वास बढ़ता है, तब तक कुछ भी मुश्किल नहीं होगा" ("वचन देह में प्रकट होता है" में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 75")।

परमेश्वर के वचनों ने मुझे फिर से श्रद्धा व शक्ति दी, और मैं जान गया कि भले ही मेरे सामने मौजूद दुष्ट पुलिस वाले पागल व भ्रष्ट हो, लेकिन उन्हें परमेश्वर के हाथों ही तैयार किया गया था। उस पल, परमेश्वर उनका प्रयोग मेरी श्रद्धा की परीक्षा लेने के लिए कर रहा था। जब तक मैं परमेश्वर पर श्रद्धा दिखाउंगा व उस पर आश्रित रहूंगा और उन दुष्टों से हार नहीं मानूंगा, तब तक वे निश्चित रूप से मुझे अपमानित करने में असफल हो जाएंगे। ऐसा सोचकर, मैंने अपने शरीर की पूरी शक्ति को इकट्ठा किया और तेज आवाज में उत्तर दिया: "तुम लोग मुझे यहां क्यों लाए हो? तुम लोग इलेक्ट्रिक डंडे से क्यों मुझे बिजली के झटके दे रहे हो? मैंने कौन सा जुर्म किया है?" दुष्ट पुलिस वाला अचानक ही हेडलाइट के सामने आने वाले हिरण की तरह हो गया और अपराधबोध के साथ उसका सर झुक गया। वह हकलाने लगा: मैं "... मैं ... मुझे तुम्हें यहां नहीं लाना चाहिए था?" फिर वह दुम दबाकर भाग गया। शैतान की दुविधा की इस अपमानजनक परस्थिति को देखकर, मेरी आंखों से आंसू निकल आएं। इस अवस्था में, मैं वाकई सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों की शक्ति व प्रभुत्व को अनुभव किया। जब तक परमेश्वर के वचन को अभ्यास में लिया जाएगा और उनका पालन किया जाएगा, तब तक परमेश्वर आपका ध्यान रखेंगे और आपकी रक्षा करेंगे और परमेश्वर की ताकत आपके साथ रहेगी। इसी समय, मुझमें जो थोड़ी बहुत श्रद्धा थी उसकी वजह से मैंने परमेश्वर की ओर कृतज्ञ महसूस किया। कुछ समय के बाद, एक लंबा पुलिस अधिकारी अंदर आया और मेरे पास आकर कहने लगा: "तुम्हें हमें बस इतना बताना है कि तुम्हारा परिवार कहां रहता है और तुम्हारे परिवार में कितने लोग हैं, और हम तुम्हें तुरंत छोड़ देंगे।" जब उसने देखा कि मैं कुछ नहीं कहूंगा, तो वह बुरी तरह चिढ़ गया और जबरदस्ती मेरे हाथ पकड़ लिए और उन्होंने जो मौखिक स्वीकारोक्ति लिखी थी उस पर जबरदस्ती मेरे अंगूठे के निशान लगवाने लगे। मैंने देखा कि वह मौखिक स्वीकारोक्ति वह नहीं थी जो मैंने उनसे कही थी, यह साफ तौर पर नकली और जाली साक्ष्य थे। मैं अधिकारपूर्ण क्रोध से भर गया और मैंने उसे झपट लिया व उसके टुकड़े—टुकड़े कर दिए। वह दुष्ट पुलिस वाला तुरंत ही गुस्से से आगबबूला हो गया और उसने मेरे चेहरे की बांई ओर एक मुक्का जड़ दिया। फिर उसने मेरे चेहरे पर दो बार थप्पड़ मारा, वह भी इतनी जोर से कि मुझे चक्कर आने लगा। इसके बाद, वे मुझे वापस उस छोटे कमरे में ले गए जहां मैं पहले था।

उस छोटे कमरे में वापस आने के बाद, मुझे चोट पहुंचाई गई व मारा गया, वह दर्द असहनीय था। मेरा दिल दुख व कमजोरी की भावना पैदा करने के अलावा कुछ नहीं कर सकता था: आस्तिकों को इस प्रकार का कष्ट क्यों सहना पड़ता है? मैंने लोगों को सत्य दिखाने व उन्हे बचाने के अच्छे प्रयोजन के साथ सुसमाचार का प्रचार किया था, और मुझे अप्रत्याशित रूप से इस उत्पीड़न को सहना पड़ा है। इस बारे में सोचते हुए, मैं ज्यादा यह सोचने लगा कि मेरे साथ गलत किया गया है। अपने दर्द में, मैंने परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचा: "एक मनुष्य के रूप में, तुम्हें परमेश्वर में बढ़ना और समस्त दुखों को सहना चाहिए। तुम्हें थोड़ा दुःख, जो तुम्हें प्राप्त होना ही है, प्रसन्नतापूर्वक और निश्चित ही स्वीकार करना चाहिए और अय्यूब और पतरस के समान एक अर्थपूर्ण जीवन जीना चाहिए। ...तुम सब वे लोग हो, जो सही मार्ग पर चलते हो, वे लोग जो उन्नति को खोजते हो। तुम सब वे लोग हो, जो बड़े लाल अजगर के देश में ऊपर उठते हो, वे लोग जिन्हें परमेश्वर धर्मी बुलाता है। क्या यही सब से अर्थपूर्ण जीवन नहीं है?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "अभ्यास (2)")। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों ने मेरे दिल के तारों को अचानक झंकृत कर दिया। हां, परमेश्वर ने जिंदगी के अपने उदार वचनों से सींचा है और इन्हें मुझ तक पहुंचाया है, उन्होंने मुफ्त में अपने प्रचुर अनुग्रह का आनंद लेने की अनुमति मुझे दी है और उन्होंने मुझे उन रहस्यों व सत्य को जानने की अनुमति दी है जिन्हें कई पीढ़ियों से कोई भी नहीं समझ पाया है। यह मुझे दिया गया परमेश्वर का खास आशीर्वाद है। मुझे परमेश्वर की गवाही देनी चाहिए और परमेश्वर के लिए सभी पीड़ाओं को सहना चाहिए। इसके लिए कितना भी दर्द सहा जा सकता है, क्योंकि यह सबसे अनमोल व अर्थपूर्ण चीज है! आज, सुसमाचार का प्रचार करने के लिए मुझे प्रताड़ित किया गया है और मैं इसके लिए यदि कोई भी शारीरिक दर्द सहने के लिए प्रस्तुत नहीं होता हूं; तो मैं गलत व कमजोर महसूस करूंगा। क्या मैंने ऐसा करने में परमेश्वर को पीड़ा नहीं दी है? क्या मैं विवेक नहीं खो रहा हूं? कैसे मैं परमेश्वर के दयालु आशीर्वाद व जिंदगी के नियम के योग्य हो सकता हूं? संतों ने पीढ़ी दर पीढ़ी परमेश्वर के लिए सशक्त और प्रतिध्वनित होने वाली गवाही प्रस्तुत किया क्योंकि उन्होने परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण किया; उन्होने सार्थक जीवन व्यतीत किया आज मेरे पास परमेश्वर के ये सभी वचन हैं, तो क्या मुझे परमेश्वर के लिए और भी सुंदर गवाही को प्रस्तुत नहीं करना चाहिए? इन विचारों में मग्न रहते हुए, मेरे शरीर ने अधिक दर्द महसूस नहीं किया, मैं अपनी अंतरात्मा से यह जान गया था कि यह सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन ही थे, जिन्होंने मुझे जिंदगी की शक्ति दी, मुझे देह की कमजोरियों से बाहर आने की अनुमति दी।

अगले दिन, उन दुष्ट पुलिस वालों के पास आजमाने के लिए कोई भी अन्य रणनीति नहीं रह गई थी। तो फिर उन्होंने मुझे यह कहते हुए धमकाया: "क्या तुम कुछ भी नहीं बताओगे? फिर हम तुम्हें जेल में बंद कर देंगे!" इसके बाद उन्होंने मुझे जेल भेज दिया। जेल में, वे बुरे पुलिस वाले मुझे यातना देने के लिए हर प्रकार की युक्तियों को लगातार आजमा रहे थे और अक्सर कैदियों को भी मुझे मारने के लिए उकसाया करते थे। सर्दी की जमा देने वाली ठंड में, वे कैदियों से बाल्टी से मुझ पर ठंडा पानी डालने के लिए कहते और जबरदस्ती मुझे ठंडे पानी से नहाने के लिए विवश करते थे। मैं सिर से पाँव तक ठंड से कांप जाता था। यहां कैदी, सरकार के लिए धन बनाने वाली मशीन थे और उनके पास कोई भी वैधानिक अधिकार नहीं था। उनके पास इस दमन को सहने और गुलाम बने रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। जेल में मुझे मृतकों के साथ रखी जाने वाली और राख़ अवशेष स्वरूप प्रयोग किए जाने वाले कागज का धन मुद्रित करने के लिए विवश किया गया और रात में मुझसे ओवरटाइम काम भी करवाया गया। अगर मैं आराम करने के लिए रुक जाता था, तो कोई न कोई आकर मुझे पीटने लगता था। आरंभ में, उन्होंने यह नियम बनाया कि मुझे हर रोज 2,000 कागज के टुकड़ों को मुद्रित करना होगा, जिसे बाद में उन्होंने 2,800 टुकड़े प्रति दिन कर दिया, और अंत में इसे बढ़ा कर 3,000 टुकड़े कर दिया गया। इतनी मात्रा को पूरा करना एक अनुभवी व्यक्ति के लिए भी असंभव था, तो मेरे जैसे गैर अनुभवी व्यक्ति की तो बात ही छोड़ दीजिए। असल में, उन्होंने जानबूझकर मुझे इतना काम दिया था, ताकि मैं इसे किसी भी तरह पूरा न कर पाउं और उन्हें मुझे प्रताड़ित करने व पीटने के लिए एक बहाना मिल जाए। जब भी मैं इस कोटे को पूरा नहीं कर पाता था, तो दुष्ट पुलिस वाले मेरे पैरों में 5 किलोग्राम से ज्यादा वजनी बेड़ियां बांध देते, और वे हथकड़ियों से मेरे हाथ व पैर एक साथ बांध देते थे। मैं बस वहां बैठा रह सकता था, अपना सिर झुकाए और अपनी कमर मोड़े बिना मैं हिलने में भी सक्षम नहीं था। इसके अलावा, इन अमानवीय व निर्दयी पुलिस वालों ने मेरी मूलभूत जरूरतों के लिए भी मुझसे कभी नहीं पूछा और न ही उन्हें इसकी परवाह थी। हालांकि जेल की सेल में ही शौचालय था, लेकिन मैं वहां तक जाने और उसका प्रयोग करने में पूरी तरह से असक्षम था; मैं बस अपने सेल के साथियों से निवेदन कर सकता था कि वे मुझे उठाकर शौचालय तक ले जाएं। अगर वे कुछ बेहतर कैदी होते, तो वे मुझे उठाकर ले जाते; अगर कोई मेरी मदद नहीं करता था, तो फिर अपने पैंट में मलत्याग करने के अलावा मेरे पास कोई विकल्प नहीं होता था। सबसे ज्यादा दर्दनाक समय भोजन करने का समय होता था क्योंकि मेरे हाथ व पैर दोनों एक—साथ बंधे होते थे। मैं बस अपनी पूरी ताकत से अपना सिर बस नीचे कर पाता था और अपने हाथ व पैर उठा पाता था। केवल ऐसा करके ही मैं एक रोल अपने मुंह में डाल पाता था। मुझे हर कौर पर बहुत ऊर्जा खर्च करनी पड़ती थी। वे हथकड़ियां मेरे हाथों व पैरों में रगड़ खाती थीं, जिसकी वजह से काफी दर्द होता था। काफी समय के बाद, मेरी कलाईयों व टखनों में काले व चमकदार कड़े घट्टे पड़ गए थे। अक्सर ही जब मुझे बंद रखा जाता था तो मैं खा नहीं पाता था, और कभी कभार ही, कैदी मुझे दो छोटे रोल्स दे दिया करते थे। ज्यादातर वे मेरा हिस्सा भी खा जाया करते थे और मैं खाली पेट ही रह जाया करता था। मुझे पीने के लिए इससे भी कम मिलता था; असल में, हर किसी को प्रति दिन केवल दो बाउल पानी दिया जाता था, लेकिन मैं बंद था और हिल भी नहीं सकता था, इसलिए मैं कभी-कभार ही पानी पी पाता था। इस अमानवीय यातना को शब्दों मेँ नहीं व्यक्त किया जा सकता है। कुल मिलाकर, मैंने इसे चार बार झेला और हर बार मुझे कम से कम तीन दिन और अधिकतम आठ दिनों के लिए जेल में बंद किया गया था। हर बार भूख को सहना बहुत मुश्किल होता था, लेकिन मैं परमेश्वर के पहले कहे गए वचनों को याद किया करता था: "मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है, जीवित रहेगा" (मत्ती 4:4) धीरे-धीरे मुझे यह आभास होना शुरू हो गया कि परमेश्वर शैतान के दुखों के माध्यम से मुझ पर इस तथ्य को कार्यान्वित करना चाहते हैं कि "उसका वचन मनुष्य का जीवन बन जाता है" परमेश्वर की इच्छा को समझकर, मेरा दिल स्वतंत्र हो गया था और मैंने शांतिपूर्वक परमेश्वर से प्रार्थना की और परमेश्वर के वचनों को समझने की कोशिश की। अनजाने में, मुझे दर्द या भूख का आभास नहीं हो रहा था। इससे सच में मुझे यह महसूस हुआ कि परमेश्वर के वचन सत्य, मार्ग, और जिंदगी हैं एवं निश्चित रूप से यही वह आधार है जिस पर मुझे जीवित रहने के लिए भरोसा करना चाहिए। इसलिए, परमेश्वर में मेरी श्रद्धा अनायास रूप से बढ़ गई थी। मुझे याद है कि एक बार जेल की पुलिस ने जान-बूझकर मुझे प्रताड़ित किया और हथकड़ियों से मुझे बांध दिया था। तीन दिनों व तीन रातों तक, मैंने एक बूंद पानी भी नहीं पिया था। मेरे बाजू मेँ पड़े हथकड़ियों से जकड़े कैदी ने मुझसे कहा: "पहले भी एक युवा आदमी था जिसे इसी प्रकार से हथकड़ी लगाई गई थी और उसे तब तक भूखा रखा गया था जब तक वह मर नहीं गया। मैंने देखा है कि तुमने कई दिनों से कुछ भी नहीं खाया है और फिर भी तुम्हारा मनोबल बहुत उच्च है।" उसकी बातें सुनकर, मैंने सोचा कि भले ही मैंने तीन दिनों व तीन रातों से कुछ भी खाया या पिया न हो, लेकिन मुझे भूख-प्यास की पीड़ा महसूस नहीं हुई थी। मैंने गहराई से यह महसूस किया कि यह परमेश्वर के वचनों में जिंदगी की ताकत थी जो मेरा समर्थन कर रही थी और इसी वजह से मैं उसके वचनों में प्रकट होते परमेश्वर को देख पा रहा था। मेरा दिल लगातार उत्साहित हो रहा था; कष्टों के इस वातावरण में, मैं इस सत्य की वास्तविकता को सच में अनुभव करने में सक्षम था कि "मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है, जीवित रहेगा।" यह सच में जिंदगी की सबसे बहुमूल्य संपत्ति थी जो परमेश्वर ने मुझे दी है, और यह मेरा अनोखा उपहार भी है। इसके अलावा, एक ऐसे वातावरण में मैं कभी यह नहीं पा सकता था जहां मुझे खाने या कपड़े की चिंता करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। अब, मेरे कष्टों का काफी अर्थ व मूल्य था! इस समय मैं परमेश्वर के वचनों को सोचने के अलावा और कुछ नहीं कर सकता था: "तुमने आज के दिन जो विरासत पाई है वह पूर्वकाल के सभी प्रेरितों और नबियों से, यहाँ तक कि मूसा और पतरस से भी बढ़कर है। आशीष एक या दो दिन में नहीं मिलती; बहुत कुछ त्याग कर उसे अर्जित करना पड़ता है। अर्थात्, तुम सबों के पास परिष्कृत प्रेम होना चाहिये, बड़ा विश्वास, और वे बहुतेरे सत्य जो परमेश्वर चाहता है कि तुम लोगों के पास हों; इसके साथ-साथ, तुम सभी न्याय की ओर अपना ध्यान केंद्रित करने में सक्षम होना चाहिए और कभी भी नहीं डरना चाहिए या हार नहीं माननी चाहिए, और परमेश्वर के प्रति तुम लोगों का प्रेम निरंतर और कभी न समाप्त होने वाला होना चाहिए। तुम लोगों से संकल्प की अपेक्षा की जाती है, और साथ ही तुम सबों के जीवन स्वभाव में बदलाव की भी; तुम्हारे भ्रष्टाचार का निवारण होना चाहिए, और तुम लोगों को परमेश्वर के अधिकतम प्रभाव को पाने के लिए उनके द्वारा किये गए कार्य को बिना शिकायत किये स्वीकार करना चाहिए, और यहां तक कि मृत्यु तक आज्ञाकारी बने रहना चाहिए। यही वह लक्ष्य है जो तुमको हासिल करना है। यही परमेश्वर के कार्य का अंतिम लक्ष्य और अपेक्षाएं हैं जो परमेश्वर इस समूह के लोगों से चाहता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "क्या परमेश्वर का कार्य उतना सरल है, जितना मनुष्य कल्पना करता है?")। परमेश्वर के वचनों को समझने की कोशिश में, मैंने यह जाना कि कष्टों व परीक्षा के बाद ही परमेश्वर का आशीर्वाद आता है, और ये मेरे लिए परमेश्वर की सबसे उपयोगी आपूर्ति व जिंदगी की सिंचाई हैं। अब, भले ही वे वचन जो परमेश्वर ने मुझे दिए हैं, वे संतों की कई पीढ़ियों से गुजरकर आए हैं, फिर भी मुझे अपनी परीक्षाओं व आपत्तियों के दौरान अटल रह कर, परमेश्वर की व्यवस्थाओं को मानने के लिए, और परमेश्वर का उद्धार पाने के लिए श्रद्धा व धीरज रखने की जरूरत है। फिर मैं परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करने में और परमेश्वर के अनोखे कर्म को देखने में सक्षम होउंगा। अगर यह इस तकलीफ की कीमत के लिए पर्याप्त नहीं होता, तो मैं परमेश्वर के आश्वासन व आशीर्वाद को पाने के योग्य नहीं होता। परमेश्वर के वचनों की प्रबुद्धता ने मुझे अंदर से ज्यादा दृढ़ व सशक्त बना दिया था; मैंने एक संकल्प लिया: इस दर्द भरे वातावरण के बीच कर्मठता के साथ परमेश्वर का सहयोग करो और परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करो, परमेश्वर के गवाह बनो ताकि मुझे महानतम फल मिल सके।

एक माह के बाद, सीसीपी की पुलिस ने मुझ पर "समाज की व्यवस्था को बिगाड़ने और कानून के कार्यान्वयन को बाधित करने के संदिग्ध अपराधी होने" का आरोप लगाया; और मुझे एक साल का सश्रम कारावास दे दिया गया। जब मैं लेबर कैम्प में पहुंचा, तो दुष्ट पुलिस वालों ने कैदियों के बीच अफवाहें व बेतुकी बातें फैला रखी थीं, जिनमें कहा गया था कि मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर का भक्त हूँ, जो कि उन लोगों के लिए हत्या व चोरी से भी बुरी बात थी, उन लोगों ने मुझे प्रताड़ित करने के लिए कैदियों को भी भड़का रखा था। इसलिए मुझे बिना किसी कारण के ही कैदियों द्वारा अक्सर मारा जाता था और बेहद कठिन परस्थितियों में रखा जाता था। इससे मैं सच में यह देख पाया कि चीन एक जीता जागता नरक है, जिस पर आसुरी शैतान की मजबूत पकड़ है। यह हर तरह से अंधकारमय है, जहां प्रकाश के अस्तित्व की भी अनुमति नहीं है; यहां सर्वशक्तिमान परमेश्वर के भक्तों हेतु जिंदगी जीने के लिए कोई स्थान नहीं है। दिन के समय में, दुष्ट पुलिस वाले जबरदस्ती मुझसे कार्यशाला में काम करवाया करते थे। अगर मैं कोटा पूरा नहीं कर पाता था, तो जब मैं अपने कैदी सेल में वापस लौटता तो वे कैदियों से मुझे पिटवाते थे और ढिंढोरा पीटते कि "बंदर को डराने के लिए मुर्गी को मारो।" जब मैं कार्यशाला में बोरियां गिन रहा होता, तो मैं 100 बोरियों को गिनता और फिर उन्हें एक साथ बांध देता। कैदी हमेशा ही जान-बूझकर वहां आते थे और मैंने जो बोरियां गिनी होती थी उसमें से एक या कई बोरियां निकालकर ले जाते थे, फिर मुझसे कहा करते थे कि मैंने ठीक से गिनती नहीं की है और उस मौके का प्रयोग मुझे मुक्का व लात मारने के लिए किया करते थे। जब संरक्षक मुझे मार खाते हुए देखता था, तो वह भी वहां आ जाता था और पाखंडपूर्ण ढंग से मुझसे पूछता था कि यहां क्या हो रहा है और कैदी गलत साक्ष्य प्रस्तुत कर दिया करते थे कि मैं बोरियों की गिनती ठीक से नहीं कर रहा था। फिर मुझे संरक्षक की कठोर आलोचना की गोलीबारी सहनी पड़ती थी। इसके अलावा, वे मुझे हर सुबह "आचरण के नियमों" को याद करने का आदेश दिया करते थे, और अगर मैं याद नहीं कर पाता था, तो मुझे पीटा जाता था; इतना ही नहीं वे मुझे कम्यूनिस्ट पार्टी की प्रशंसा करने वाले गीत गाने के लिए भी विवश किया करते थे। अगर वे यह देख लेते कि मैं नहीं गा रहा हूँ या मेरे होंठ नहीं हिल रहे हैं, तो निश्चित रूप से उस रात को मुझे पीटा जाता था। वे मुझसे फर्श पर पोछा लगवाकर भी मुझे दंडित करते, और अगर मैंने उनकी उम्मीदों के अनुसार पोछा नहीं किया, तो फिर मुझे हिंसक रूप से पीटा जाता था। एक बार, कुछ कैदियों ने अचानक ही मुझे पीटना व लात मारना शुरू कर दिया। मुझे मारने के बाद, उन्होंने मुझसे पूछा: "युवा आदमी, क्या तुम जानते हो कि तुम्हें क्यों पीटा जा रहा है? क्योंकि जब संरक्षक यहां आया था तो तुमने खड़े होकर उसका अभिवादन नहीं किया था!" हर बार जब मुझे पीटा जाता, तो मैं काफी क्रोधित हो जाता था, लेकिन कुछ भी कहने की हिम्मत नहीं दिखा पाता था; मैं बस रो सकता था और चुपचाप परमेश्वर से प्रार्थना कर सकता था, उन्हें इस कानून रहित, जंगली राज के कारण मेरे दिल में उत्पन्न क्रोध व नाराजगी के बारे में बताता था। वहां पर कुछ भी उचित नहीं था, वहां केवल हिंसा थी। वहां कोई भी इंसान नहीं था, वहां पर केवल उन्मादी दानव व बिच्छू थे! मैंने उस दुर्दशा में रहकर बहुत दर्द व दबाव महसूस किया था; मैं वहां एक मिनट भी और नहीं रहना चाहता था। जब-जब मैं कमजोरी व दर्द की स्थिति में होता था, तब तब मैं हर बार सर्वशक्तिमान परमेश्वर के इन वचनों के बारे में सोचने लगता था: "क्या तुम सबने मिलने वाली आशीषों को स्वीकार किया है? क्या कभी तुम सबने मिलने वाले वायदों को पाया है? तुम लोग निश्चय ही, मेरी रोशनी के नेतृत्व में, अंधकार की शक्तियों के गढ़ को तोड़ोगे। तुम अंधकार के मध्य निश्चय ही मार्गदर्शन करने वाली ज्योति से वंचित नहीं रहोगे। तुम सब निश्चय ही सम्पूर्ण सृष्टि पर स्वामी होगे। तुम लोग शैतान पर निश्चय ही विजयी बनोगे। तुम सब निश्चय ही बड़े लाल अजगर के राज्य के पतन को देखोगे और मेरी विजय की गवाही के लिए असंख्य लोगों की भीड़ में खड़े होगे। तुम लोग निश्चय ही पाप के देश में दृढ़ और अटूट खड़े रहोगे। तुम सब जो कष्ट सह रहे हो, उनके मध्य तुम मेरे द्वारा आने वाली आशीषों को प्राप्त करोगे और मेरी महिमा के भीतर के ब्रह्माण्ड में निश्चय ही जगमगाओगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन के "अध्याय 19")। परमेश्वर के वचनों ने मुझे प्रोत्साहित किया। इस पर ध्यान दिए बिना कि परमेश्वर मेरे साथ जो भी कर रहा था वह अनुग्रुह व आशीर्वाद था या परीक्षा व परिष्करण, यह सबकुछ मुझे दिए जाने व मुझे बचाने के लिए था; यह मुझमें सत्य समाहित कर रहा था और मेरी जिंदगी को सत्य बना रहा था। आज, परमेश्वर ने इस उत्पीड़न व पीड़ा को मुझ तक आने की अनुमति दी थी। भले ही इसकी वजह से मुझे बहुत पीड़ा हुई थी, लेकिन इसने मुझे सच में यह अनुभव करने में सक्षम किया था कि परमेश्वर मेरे साथ हैं; इस वजह से परमेश्वर के वचनों को मेरी जिंदगी की खुराक और मेरे पैरों का पथ प्रदर्शक चिराग व मेरे मार्ग का प्रकाश बनते हुए देखकर मैं वाकई आनंदित हो रहा था, जो मुझे इस अंधकारमय नरक के कुण्ड से चरण दर चरण बाहर निकाल रहे थे। यह परमेश्वर का प्रेम व सुरक्षा है कि मैंने अपनी पीड़ा की प्रक्रिया के दौरान भी इसका आनंद लिया व प्राप्त किया। इस समय, मैं यह देखने में सक्षम हो गया था कि मैं कितना अंधा व स्वार्थी था और मैं बहुत लालची भी था। परमेश्वर में विश्वास करके मैं सिर्फ यह जान सका था कि परमेश्वर के अनुग्रह व आशीर्वाद का आनंद कैसे लिया जाए और इस बात की तनिक भी परवाह नहीं किया कि सत्य व जीवन की तलाश और उसका अनुसरण कैसे किया जाए। मेरी देह को थोड़ी सी भी तकलीफ सहनी पड़ने पर, मैं तुरंत ही कराहने लगता; मैं बस परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझता था और परमेश्वर के कार्य को समझने की कोशिश नहीं करता था। मैं हमेशा ही चाहता था कि परमेश्वर मेरे कारणदुख व दर्द महसूस करें। मुझमें सच में विवेक नहीं था! पश्चाताप व खुद को दोष देने की भावना में, मैंने चुपचाप परमेश्वर से प्रार्थना की: "हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, मैं देख सकता हूं कि तू जो कुछ भी करता है वह मुझे बचाने व पाने के लिए है। मुझे बस इस बात से नफरत है कि मैं कितना बागी, अंधा हूं और मुझमें मानवता नहीं है। मैंने हमेशा ही तुझे गलत समझा और तेरी इच्छा का विचार भी नहीं किया। हे परमेश्वर, आज तेरे वचन ने मेरे सुन्न दिल व आत्मा को जगा दिया है और इस वजह से मैं तेरी इच्छा को समझ गया हूं। अब मुझमेँ अपनी इच्छाएं व जरूरतें रखने की इच्छा बिल्कुल भी नहीं है; मैं बस तेरी व्यवस्था का आदर करूंगा। भले ही मुझे कितनी भी तकलीफ सहनी पड़े, फिर भी मैं कर्मठता से तेरा सहयोग करूंगा और शैतान के उत्पीड़न के दौरान भी तेरी गवाही को गुंजायमान करता रहूंगा। मैं शैतान के प्रभाव से अलग होने की कोशिश करूंगा और तुझे संतुष्ट करने के लिए एक असली इंसान की तरह जीवन जीऊँगा।" प्रार्थना करने के बाद, मैंने परमेश्वर के अच्छे प्रयोजनों को समझा, और मैं जान गया कि परमेश्वर ने जिस भी वातावरण को अनुभव करने की अनुमति मुझे दी, वह मेरे लिए परमेश्वर का महानतम प्रेम था और इसी मेँ मेरा उद्धार निहित था। इसलिए, अब मैं भविष्य मे कभी पीछे हटने या झुकने या परमेश्वर को गलत समझने के बारे में और नहीं सोचता हूँ। हालांकि परिस्थितियां अभी भी वैसी ही थीं, लेकिन मेरा दिल पूरी तरह से खुश व आनंदित था; मुझे महसूस हुआ कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करने के लिए तकलीफ व उत्पीड़न सहने योग्य होना भी एक सम्मान व गर्व का विषय था, और यह मेरे जैसे एक भ्रष्ट व्यक्ति के लिए अनोखा उपहार था; यह मेरे लिए परमेश्वर का विशेष आशीर्वाद व अनुग्रह था।

जेल में एक साल की यातना का अनुभव करने के बाद, मैंने पाया कि मेरा कद बहुत छोटा है और यह कि मुझमें सत्य की कितनी कमी है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने इस अनोखे वातावरण के माध्यम से मेरी कमियों का निराकरण किया और उन्होंने मुझे प्रगति करने दिया। मेरी विपत्ति में, उनकी वजह से मुझे जिंदगी की सबसे अनमोल धरोहर मिली और मैं उन सत्यों को समझ पाया जिन्हें मैं पहले नहीं समझ पाता था और मैं साफ तौर पर दानव शैतान के घिनौने प्रकटन, और परमेश्वर का विरोध करने की उसकी सुधार विरोधी सत्ता को देख सकता था। मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर का विरोध करने और ईसाइयों का नर संहार करने के उसके घिनौने अपराधों को पहचान गया था। मैंने नम्रता पूर्वक उस महान मुक्ति व करुणा का अनुभव किया जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर की मुझ जैसे भ्रष्ट व्यक्ति पर थी और यह महसूस किया है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों की शक्ति व जिंदगी मेरे लिए प्रकाश ला सकती है और मेरी जिंदगी बन सकती है और शैतान से जीत दिला सकती है और मुझे मृत्यु के साये की घाटी से दृढ़तापूर्वक निकाल सकती है। इसी प्रकार से, मैं यह भी जाना कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर मुझे जिंदगी के सही मार्ग पर ले जाते हैं। यह सत्य व जीवन पाने के लिए एक प्रकाशवान मार्ग है! अब से, मुझे चाहे जितनी भी प्रताड़ना, दारुण दुखों या भयानक प्रलोभानों का सामना करना पड़े, लेकिन मैं दृढ़ता से सत्य को खोजने और उस अनंत जीवन का मार्ग पाने के लिए संकल्प लेता हूं, जिसे सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने मुझे वरदान स्वरूप दिया है।

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