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13. कठिनाइयों के बीच परमेश्वर की इच्छा को समझना

ज़ियाओ रुई पैंज़िहुआ सिटी, सिचुआन प्रांत

जब मैं सुसमाचार का प्रचार कर रहा था, तो मेरा सामना विधर्मी अगुआओं से हुआ जो प्रतिरोध और गड़बड़ी करने के लिए झूठी गवाही देते थे, और पुलिस बुला लेते थे। इस वजह से जिन लोगों को मैं उपदेश दे रहा था वे हमारे संपर्क में आने की हिम्मत नहीं कर रहे थे, और जिन्होंने अभी-अभी सुसमाचार को स्वीकार किया था, वे परमेश्वर के कार्य में विश्वास करने में असमर्थ हो रहे थे। जब मैं बहुत मेहनत करता और फिर भी परिणाम बहुत ख़राब होते थे, तो मैंने सोचता था कि: इंजील के कार्य को संप न्न करना बहुत कठिन है। कितना अद्भुत होता यदि परमेश्वर ने बस कुछ चमत्कार दिखाये होते और उन लोगों को जो झूठी गवाही देते हैं और साथ ही उन लोगों को जो छले गए लोगों को दिखाने के लिए गंभीरता से परमेश्वर का विरोध करते हैं, दंड दिया होता। तब क्या सुसमाचार का कार्य ज्यादा शीघ्रता से नहीं कर दिया जाता? हमारे लिए सुसमाचार का उपदेश देना इतना कठिन नहीं होता। इसी वजह से, जब भी मैं इस प्रकार की कठिनाइयों का सामना करता था, तो हर बार मेरे दिल में इस तरह की उम्मीद आती थी। बाद में, मैं दंड के उदाहरणों की गवाही देने के लिखित विवरणों को देखता था और संगति के दौरान परमेश्वर के कुछ चिह्नों और अद्भुत कामों की गवाही भी सुनता था, और मैं अपने दिल में बहुत खुशी महसूस करता था। मैं और भी उम्मीद करता था कि मैंने जिन क्षेत्रों में कार्य किया है वहाँ परमेश्वर कुछ चीज़ें करेगा ताकि हमारे सुसमाचार के कार्य की दुर्दशा का अधिक शीघ्रता से समाधान किया जा सके। लेकिन मैंने चाहे कितनी भी उम्मीद क्यों न की, मैंने फिर भी यहाँ परमेश्वर को कोई चमत्कार करते हुए या लोगों को दंड देते हुए नहीं देखा था। वे विधर्मी अभी भी पूरी तरह से परमेश्वर का विरोध कर रहे थे, और इंजील के कार्य में अभी भी बहुत सारी कठिनाइयाँ थी। मैं इस बारे में नकारात्मक हो गई थी: परमेश्वर हमारे लिए कोई रास्ता क्यों नहीं खोलता है? कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारा विश्वास अपर्याप्त है?

बाद में, अपनी भक्ति के दौरान मैंने परमेश्वर के इन वचनों को देखा: "अब, यदि परमेश्वर अलौकिक संकेत और अद्भुत कामों को करता, तो, किसी भी बड़े कार्य को किए बिना, वह सिर्फ अपने मुँह से किसी मनुष्य को मृत्यु का शाप देता, आदमी मौके पर ही मर जाता, और इस तरह हर व्यक्ति आश्वस्त हो जाता; परन्तु इससे परमेश्वर के देह बनने का लक्ष्य प्राप्त नहीं होता। यदि परमेश्वर वास्तव में ऐसा करता, तो मानवजाति, अपने चेतन मन से, उसके अस्तित्व में विश्वास करने में कभी भी सक्षम नहीं होती, वस्तुतः कभी भी शैतान पर, और उससे भी बढ़ कर, परमेश्वर की जगह दुष्ट पर विश्वास करने में समर्थ नहीं होती। इससे भी महत्वपूर्ण रूप से, मानवजाति कभी भी परमेश्वर के स्वभाव को नहीं जानती: क्या यह परमेश्वर के देह में होने के अर्थ का एक पहलू नहीं है? यदि मानवजाति परमेश्वर को जानने में असमर्थ है, तो यह हमेशा एक अस्पष्ट परमेश्वर, एक अलौकिक परमेश्वर होगा, जो मानव क्षेत्र में प्रभुत्व रखता है: क्या यह मनुष्य की अवधारणाओं का मनुष्य पर कब्ज़ा करने का मामला नहीं होगा? या, और इसे अधिक स्पष्ट रूप से दोहराने के लिए, क्या शैतान, दुष्ट, अधिकार धारण नहीं कर रहा होगा? "मैं क्यों कहता हूँ कि मैं अपनी सामर्थ्य वापस ले लूँगा? मैं क्यों कहता हूँ कि देहधारण के कई अर्थ हैं?" जिस क्षण परमेश्वर देह बनता है, ऐसा तब होता है जब वह अपनी सामर्थ्य वापस ले लेता है; ऐसा तब भी होता है जब उसकी दिव्यता अपना काम करने के लिए प्रत्यक्ष रूप से प्रकट होती है। कदम-दर-कदम, हर मनुष्य व्यावहारिक परमेश्वर को जानने लगता है, और इस वजह से परमेश्वर की जगह संवर्धित होने के समय मानव के हृदय में शैतान द्वारा धारण किया गया स्थान पूरी तरह से दब जाता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "छठे कथन की व्याख्या" से)। परमेश्वर के वचनों को समझने की कोशिश करते हुए, मेरा दिल अचानक ही चमक उठा: ऐसा पता चला कि देह में परमेश्वर के कार्य का प्रयोजन आज्ञाकारिता के लिए लोगों को डराने हेतु अपने अधिकार का प्रयोग करना नहीं है, बल्कि यह वास्तविक कार्य और वचनों के माध्यम से मानवजाति के लिए अपने स्वभाव को पूरी तरह से प्रकट करना है, और इसके माध्यम से मानवजाति के हृदयों में से अज्ञात परमेश्वर की छवि को दूर करना है। यह लोगों को उनकी धारणाओं के अवरोधों को छोड़ने, परमेश्वर के स्वभाव और कार्य को सच में पहचानने की अनुमति देने, लोगों को सत्य और विवेक को धारण करने की अनुमति देने, और इस प्रकार उन्हें जीतने और प्राप्त करने के लिए है। व्यवस्था के युग में, परमेश्वर ने इस्राएलियों को कई चमत्कार दिखाये थे और उसका विरोध करने वाले कईयों को दंड दिया था, लेकिन इस्राएलियों ने फिर भी परमेश्वर को मान्यता नहीं दी थी और अंत में वे वीराने में मरने के लिए चले गए थे। अनुग्रह के युग में, परमेश्वर ने यहूदियों के बीच अनगिनत चिह्न और अद्भुत काम भी प्रदर्शित किये थे, लेकिन फिर भी उन्होंने उसे जिंदा ही सलीब पर लटका दिया था क्योंकि वे उसे पहचानते नहीं थे। यह सब बताता है कि परमेश्वर के चिह्न और अद्भुत काम लोगों को केवल कुछ पल के लिए ही डरा सकते हैं, लेकिन ये परमेश्वर में उनके विश्वास की नींव नहीं हैं। हालाँकि, भले ही मैंने अभी तक परमेश्वर का अनुसरण किया है, लेकिन मुझे परमेश्वर के सार की लेशमात्र भी समझ नहीं आई है, और मुझे देह में परमेश्वर के कार्य के लक्ष्यों और महत्व के बारे में तो और भी कम समझ में आया है। मैंने अभी भी उसके अधिकार में और इस बात पर विश्वास किया है जो भी परमेश्वर का विरोध करेगा उसे दंड दिया जाएगा, इसलिए मैंने पूरे दिल से परमेश्वर के चिह्नों और अद्भुत कामों को देखने का प्रयास किया है। क्या इस प्रकार का विश्वास बिल्कुल फरीसियों की तरह का नहीं है, अस्पष्टता के बीच में रहना, व्यावहारिक परमेश्वर का विरोध करते हुए अलौकिक परमेश्वर में विश्वास करना? अगर परमेश्वर का मेरा अनुसरण इसी तरह से जारी रहता है, तो मैं सच्चे परमेश्वर के साथ संगत कैसे हो सकता हूँ? यह वाकई बहुत ख़तरनाक था! इसके बाद, मैं और अधिक परमेश्वर वचनों को देखता था: "परमेश्वर के लिए विशाल लाल अजगर के देश में अपना कार्य करना बहुत कठिन है, परन्तु ऐसी कठिनाईयों के बीच में अपनी बुद्धि और अद्भुत कामों को प्रकट करने के लिए परमेश्वर अपने काम का मंचन करता है। परमेश्वर इस अवसर के द्वारा इस जनसमूह के लोगों को पूर्ण करता है। इस अशुद्ध देश में लोगों के सताये जाने के कारण, उनकी क्षमता और उनके पूरे शैतानी स्वभाव का परमेश्वर शुद्धिकरण करता और जीतता है ताकि, इससे, वह महिमा प्राप्त करे और उन्हें भी जो उसके कामों के गवाह बनते हैं। परमेश्वर ने इस जनसूमह के लोगों के लिए जो बलिदान किये हैं यह उन सभी का संपूर्ण महत्व है। कहने का अभिप्राय है, परमेश्वर विजय कार्य उनके द्वारा करता है जो उसका विरोध करते हैं। इस कारण, ऐसा करने पर ही परमेश्वर की महान सामर्थ का प्रकटीकरण हो सकता है। … यह बिल्कुल वैसा ही है जैसा यह यीशु के कार्य के चरण में था; उसे सिर्फ उन फरीसियों के बीच ही महिमा मिल सकती थी जिन्होंने उसे सताया। यदि यीशु को वैसा कष्ट और यहूदा का विश्वासघात नहीं मिलता, तो यीशु का उपहास और निंदा भी नहीं होती, क्रूस पर चढ़ना तो असम्भव होता, और उसे कभी भी महिमा नहीं मिलती" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "क्या परमेश्वर का कार्य इतना सरल है, जितना मनुष्य कल्पना करता है?" से)। इस बार, परमेश्वर के वचनों से मैं यह बात और भी अधिक जान गया था कि परमेश्वर चाहे जो भी कार्य क्यों न करता हो, उस सब का अर्थ है। अगर वह कुछ चमत्कारों को प्रकट करने या कुछ दंड देने के कार्य को पूरा करता है, तो उसका अर्थ है, उसमें सिद्धांत हैं। अगर वह चमत्कारों को प्रकट करने या दंड देने के कार्य को पूरा नहीं करता है, तो इसमें और भी अधिक परमेश्वर की बुद्धि शामिल होती है। अब, परमेश्वर उन लोगों से छुटकारा पाने के लिए अपने अधिकार का उपयोग नहीं करता है जो उसकी झूठी गवाही देने हैं या गंभीर रूप से उसका विरोध करते हैं; इसमें परमेश्वर की और भी अधिक सद्भावना है। परमेश्वर हमें उसके खुद के कार्य की कठिनाइयों का अनुभव लेने की अनुमति देने, अधिकतम संभव सीमा तक मानवजाति को बचाने की उसकी इच्छा को हमें अपनी आँखों से देखने की अनुमति देने। इस प्रकार परमेश्वर की दयालुता और सुंदरता को समझने की अनुमति देने के लिए इन कठिनाइयों का उपयोग करता है। लोगों के अच्छा या दुष्टता करने का साक्ष्य इकट्ठा करने के लिए भी परमेश्वर इन कठिनाइयों का उपयोग करता है, और अंत में उन्हें उपयुक्त मंजिल प्रदान करता है ताकि हम पूरी तरह से आश्वस्त हो जाएँ, ताकि हम परमेश्वर की धार्मिकता और पवित्रता को देख सकें। इससे भी बढ़कर, परमेश्वर यह प्रकट करने के लिए इन कठिनाइयों का उपयोग करता है कि मुझमें दर्शन के सत्य का अभाव है, कि मेरी प्रकृति अत्यधिक आलसी, डरपोक, अज्ञानी, और द्रोही है, और कि कष्टों, प्रयासों और परमेश्वर के साथ सहयोग के माध्यम से, वह हमें विवेक, आत्मविश्वास, प्रेम, बुद्धि, और साहस प्रदान करेगा, और इससे भी बढ़कर हमें परमेश्वर के कार्य का सत्य देगा, इस प्रकार वह हमें पूर्ण करेगा, हमें प्राप्त करेगा। परमेश्वर का कार्य सच में बहुत बुद्धिमान, बहुत अद्भुत है! लेकिन मैं बहुत ज्यादा अंधा हूँ—मुझे परमेश्वर के कार्य के महत्व की और उसके अच्छे इरादों की कोई समझ नहीं है। मुझे बस शा रीरिक कष्ट से डर लगता है और मैं परमेश्वर के साथ सहयोग करने का इच्छुक नहीं हूँ। मैं सच में ऐसा विश्वासी हूँ जो उचित कार्य नहीं करता है और जो आराम में मस्त फिरता है!

परमेश्वर के वचनों की प्रबुद्धता का धन्यवाद जिसने मुझे देह में परमेश्वर के कार्य के प्रयोजन और बुद्धि की कुछ समझ दी और साथ ही मुझे यह भी देखने की अनुमति दी कि परमेश्वर में मेरा विश्वास अनिश्चितता में जीना था, कि पमरेश्वर को न समझना अत्यधिक ख़तरनाक है! आज से आगे, मैं खुद को दर्शन के सत्य से सुसज्जित करने, परमेश्चर के कार्य और स्वभाव को समझने वाला व्यक्ति बनाने की कोशिश करने, सच में कष्ट सहने की इच्छा धारण करने, परमेश्वर के दिल को आराम पहुँचाने के लिए अपने कर्तव्य को पराकाष्ठा से पूरा करने का इच्छुक हूँ।

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