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"परमेश्वर के कार्य का दर्शन" पर परमेश्वर के वचन के तीन अंशों से एक संकलन

1. यूहन्ना ने यीशु के लिए सात साल तक काम किया, और यीशु के आने से पहले ही मार्ग तैयार कर दिया था. इसके पहले, यूहन्ना द्वारा प्रचारित स्वर्गराज्य का सुसमाचार पूरे देश में सुना जा चुका था, इस प्रकार यह पूरे यहूदिया में फैल गया, और सभी ने उसे नबी कह कर पुकारा। उस समय राजा हेरोदस, यूहन्ना को मारने की इच्छा रखता था, फिर भी उसने हिम्मत नहीं की, क्योंकि लोग यूहन्ना को बहुत सम्मान देते थे, और हेरोदस को डर था कि अगर वह यूहन्ना को मार देगा तो वे उसके खिलाफ विद्रोह कर देंगे। यूहन्ना द्वारा किया गया काम, आम लोगों के बीच जड़ें जमा चुका था और उसने यहूदियों को विश्वासी बना दिया था। सात सालों तक उसने यीशु के लिए मार्ग तैयार किया, ठीक उस समय तक जब यीशु ने अपना सेवा-कार्य शुरू किया। और इसलिए, यूहन्ना सभी नबियों में सबसे महान था। यीशु ने अपना आधिकारिक काम यूहन्ना के कारावास के बाद ही शुरू किया। यूहन्ना से पहले, कभी भी कोई ऐसा नबी नहीं हुआ जिसने परमेश्वर के लिए मार्ग प्रशस्त किया हो, क्योंकि यीशु से पूर्व, परमेश्वर पहले कभी देह धारण नहीं किया था। और इसलिए, यूहन्ना तक के सभी नबियों में से केवल उसने ही परमेश्वर के देहधारण का मार्ग साफ़ किया, और इस तरह से यूहन्ना, पुराने और नए विधान के महानतम नबी बन गया। यूहन्ना ने, यीशु के बपतिस्मा के सात वर्ष पहले से स्वर्गराज्य के सुसमाचार को फैलाना शुरू कर दिया था। लोगों को उसका किया गया काम यीशु के अनुवर्ती काम से ऊँचा लगता था, फिर भी, वह था तो केवल एक नबी ही। वे मंदिर के भीतर बात या काम नहीं करते था, बल्कि इसके बाहर के कस्बों और गांवों में ऐसा करते था। उसने, निश्चय ही यह यहूदी राष्ट्र के बीच किया, विशेष रूप से उन के बीच जो गरीब थे। यूहन्ना, समाज की ऊपरी श्रेणी के लोगों के संपर्क में कम ही आया, वो केवल यहूदिया के आम लोगों के बीच सुसमाचार फैलाता रहा ताकि प्रभु यीशु के लिए उचित लोगों को तैयार कर सके, और उसके लिए काम करने की उपयुक्त जगह तैयार कर सके। मार्ग प्रशस्त करने के लिए, यूहन्ना जैसे एक नबी के होने के कारण, प्रभु यीशु आने के साथ ही सीधे अपने क्रूस के रास्ते पर चलने में सक्षम हुआ। जब परमेश्वर ने अपना काम करने के लिए शरीर धारण किया, तो उसे लोगों को चुनने का काम करने की ज़रूरत नहीं थी, और व्यक्तिगत रूप से लोगों को या काम करने की जगह तलाशने की आवश्यकता नहीं थी। जब वह आया तो उसने ऐसा काम नहीं किया; उसके आने के पहले ही उचित व्यक्ति ने तैयारी कर दी थी। यूहन्ना ने, यीशु के अपना काम शुरू करने के पहले ही यह काम पूरा कर लिया था, इसलिए जब देहधारी परमेश्वर अपने काम करने के लिए पहुंचा, वह सीधे उन पर काम करने लगा जो लंबे समय से उसका इंतजार कर रहे थे। यीशु मनुष्य का काम करने, या मनुष्य पर जो सुधार का काम आ पड़ा, वह करने नहीं आया था। वह केवल सेवा करने आया था जिसे करना उसका काम था, और बाकि सब कुछ के साथ उसका कोई रिश्ता नहीं था। जब यूहन्ना आया, तो उसने, मंदिर से और यहूदियों के बीच से स्वर्गराज्य का सुसमाचार स्वीकारने वाले लोगों के एक समूह को बाहर लाने के अलावा और कुछ नहीं किया, ताकि वे प्रभु यीशु के काम का प्रयोजन बन सकें। यूहन्ना ने सात सालों के लिए काम किया, अर्थात उसने सात साल तक सुसमाचार फैलाया। अपने काम के दौरान, यूहन्ना ने बहुत से चमत्कार नहीं किये, क्योंकि उसका काम मार्ग प्रशस्त करना था, यह तैयारी का काम था। अन्य सभी कामों का, यीशु जो काम करने वाला था, उनसे उसका कोई संबंध नहीं था; उसने केवल मनुष्य को अपने पापों को स्वीकारने और पश्चाताप करने के लिए कहा, और लोगों को बपतिस्मा दिया ताकि वे बचाए जा सकें। यद्यपि उसने नया काम किया, और ऐसा मार्ग खोला जिस पर मनुष्य पहले कभी नहीं चला था, फिर भी उसने केवल यीशु के लिए मार्ग प्रशस्त किया। वह केवल एक नबी था जिन्होंने तैयारी का काम किया, और वे यीशु का काम करने में असमर्थ था। यद्यपि यीशु स्वर्गराज्य के सुसमाचार का प्रचार करने वाला पहला व्यक्ति नहीं था, और यद्यपि वह उस रास्ते पर चलता रहा जो कि यूहन्ना ने शुरू किया था, फिर भी ऐसा कोई और नहीं था जो उसका काम कर सके, और यह यूहन्ना के काम से ऊँचा था। यीशु अपना खुद का रास्ता तैयार नहीं कर सकता था; उसका काम सीधे परमेश्वर की ओर से किया गया था। और इसलिए, इससे फर्क नहीं पड़ता कि यूहन्ना ने कितने साल काम किया, वो फिर भी एक नबी था, और फिर भी वह व्यक्ति था जिसने मार्ग प्रशस्त किया। यीशु द्वारा किया गया तीन साल का काम, यूहन्ना के सात साल के काम को मात देता था, क्योंकि उनके काम का सत्व समान नहीं था। जब यीशु ने अपना सेवाकार्य शुरू किया, उसी समय जब यूहन्ना का कार्य समाप्त हुआ, तब तक यूहन्ना ने प्रभु यीशु द्वारा उपयोग हेतु पर्याप्त लोगों और जगहों को तैयार कर दिया था, और यह प्रभु यीशु के तीन साल के काम को शुरू करने के लिए पर्याप्त था। और इसलिए, जैसे ही यूहन्ना का कार्य समाप्त हुआ, प्रभु यीशु ने आधिकारिक तौर पर अपना काम शुरू किया, और यूहन्ना द्वारा कहे गए शब्दों को किनारे कर दिया गया। इसका कारण यह है कि यूहन्ना द्वारा किया गया कार्य केवल अवस्था परिवर्तन की खातिर था, और उसके शब्द जीवन के शब्द नहीं थे जो मनुष्य को नए विकास की ओर ले जाएं; अंततः, उनके शब्द केवल क्षणिक लाभ के लिए थे।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (1)" से

2. उस समय, यीशु के काम का कुछ हिस्सा पुराने विधान के अनुसार था और साथ ही मूसा के नियमों और व्यवस्था के युग में यहोवा के शब्दों के अनुसार भी था। यीशु ने अपने काम के कुछ हिस्से को करने में इन सबका प्रयोग किया। उसने लोगों को उपदेश दिया और उन्हें यहूदियों के मंदिरों में पढ़ाया, और उसने पुराने विधान में नबियों की भविष्यवाणियों को काम में लाया ताकि वह उन फरीसियों को, जो उससे बैर करते थे, फटकार सके, और उनकी अवज्ञा को प्रकट करने के लिए शास्त्रों के शब्दों का इस्तेमाल किया और इस तरह उनकी निंदा की। क्योंकि यीशु ने जो किया वे उसे तुच्छ मानते थे; विशेष रूप से, यीशु के बहुत से काम शास्त्रों के कानून के अनुसार नहीं थे, और इसके अलावा, जो उसने सिखाया वह उनके अपने शब्दों से अधिक ऊँचा था, और शास्त्रों में नबियों ने भविष्यवाणी में जो बताया था उससे भी कहीं अधिक ऊँचा था। यीशु का काम केवल मनुष्य के उद्धार और क्रूसित होने के लिए था। इस प्रकार, किसी भी व्यक्ति को जीतने के लिए उसे अधिक शब्द कहने की कोई जरूरत नहीं थी। उसने जो कुछ भी सिखाया उसमें से काफी कुछ शास्त्रों के शब्दों से लिया गया था, और भले ही उसका काम शास्त्रों से आगे नहीं बढ़ा, फिर भी वह क्रूसित होने के काम को पूरा कर पाया। उसका काम शब्द का नहीं था, न ही मानव जाति पर विजय पाने के लिए था, बल्कि मानव जाति का उद्धार करने के लिए था। उसने मानव जाति के लिए बस पापबलि का काम किया, और मानव जाति के लिए शब्द के स्रोत के समान कार्य नहीं किया। उसने गैर यहूदियों का काम नहीं किया, जो कि मनुष्य को जीतने का काम था, बल्कि क्रूसित होने का काम किया, वह काम जो उन लोगों के बीच किया गया था जो एक परमेश्वर के होने में विश्वास करते थे। यद्यपि उसका काम शास्त्रों की बुनियाद पर किया गया था, और उसने पुराने नबियों की भविष्यवाणी का इस्तेमाल फरीसियों की निंदा करने के लिए किया, यह क्रूसित होने के काम को पूरा करने के लिए पर्याप्त था। यदि अब भी आज का काम, शास्त्रों में पुराने नबियों की भविष्यवाणियों की बुनियाद पर किया जाता, तो तुम लोगों को जीतना नामुमकिन होता, क्योंकि पुराने विधान में तुम चीनियों की अवज्ञा और पापों का कोई भी लेखा नहीं है, वहां तुम लोगों के पापों का कोई इतिहास नहीं है। और इसलिए, अगर यह काम बाइबल में अब भी होता, तो तुम कभी भी प्रतिफल न देते। बाइबल में इस्राएलियों का एक सीमित इतिहास दर्ज है, जो कि यह स्थापित करने में असमर्थ है कि तुम लोग बुरे हो या अच्छे हैं, या तुम लोगों का न्याय करने में असमर्थ है। कल्पना करो कि मुझे तुम लोगों का न्याय इस्राएलियों के इतिहास के अनुसार करना होता-क्या तुम लोग मेरा वैसे ही अनुसरण करते जैसा कि आज करते हो? क्या तुम लोग जानते हो कि तुम लोग कितने जिद्दी हो? अगर इस चरण के दौरान कोई शब्द न बोले जायें, तो विजय का काम पूरा करना असंभव होगा। क्योंकि मैं क्रूस पर ठोंके जाने के लिए नहीं आया हूँ, मुझे उन शब्दों को बोलना ही होगा जो बाइबल से अलग हैं, ताकि तुम लोगों पर विजय प्राप्त हो सके।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (1)" से

3. यीशु द्वारा किया गया कार्य पुराने विधान से महज एक चरण ऊँचा था; एक युग शुरू करने के लिए और उस युग की अगुआई करने के लिए इसका उपयोग किया गया था। उसने क्यों कहा था, "यह न समझो, कि मैं व्यवस्था या भविष्यवक्ताओं की पुस्तकों का लोप करने आया हूँ, लोप करने नहीं किन्तु पूरा करने आया हूँ"? फिर भी उसके काम में बहुत कुछ ऐसा था जो पालन किये जाने वाले कानून और पुराने विधान के इस्त्राएलियों द्वारा पालन किए जाने वाली आज्ञाओं से अलग था, क्योंकि वह नियमों का पालन करने नहीं आया था, बल्कि इसे पूरा करने के लिए आया था। इसे पूरा करने की प्रक्रिया में कई वास्तविक चीजें शामिल थीं: उसका काम अधिक व्यावहारिक और वास्तविक था, और इसके अलावा, वह जीवंत था, और सिद्धांतों का अंधा पालन नहीं था। क्या इस्राएली विश्रामदिन का पालन नहीं करते थे? जब यीशु आया, तो उसने विश्रामदिन का पालन नहीं किया, क्योंकि उसने कहा था कि मनुष्य का पुत्र विश्रामदिन का प्रभु है, और जब विश्रामदिन का प्रभु आ पहुंचा, तो वह जैसा करना चाहेगा वह वैसा करेगा। वह पुराने विधान के नियमों को पूरा करने और कानून को बदलने के लिए आया था। आज जो कुछ किया जाता है वह वर्तमान पर आधारित है, फिर भी यह अब भी व्यवस्था के युग में यहोवा के कार्य की नींव पर निर्भर है, और इस गुंजाइश का उल्लंघन नहीं करता है। उदाहरण के लिए, अपनी ज़बान सम्भालना, व्यभिचार न करना, क्या ये पुराने विधान के कानून नहीं हैं? आज, तुम लोगों से जो अपेक्षित है वह केवल दस वचनों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें ऐसी आज्ञायें और कानून शामिल हैं जो पहले मिली आज्ञाओं के मुकाबले अधिक ऊचे स्तर की हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि जो कुछ पहले आया था, उसे खत्म कर दिया गया है, क्योंकि परमेश्वर के काम का प्रत्येक चरण, पूर्व के चरण के नींव पर किया जाता है। जहाँ तक यहोवा ने इस्राएल का जिससे परिचय कराया उसकी बात है, जैसे कि लोगों से, बलिदान चढ़ाने, माँ-बाप का आदर करने, मूर्ति-पूजा न करने, दूसरों पर वार न करने या अपशब्द न बोलने, व्यभिचार न करने, धूम्रपान न करने, मदिरापान न करने, मरी चीज़ों को न खाने, और लहू न पीने की अपेक्षाएं, क्या यह सब आज भी तुम लोगों के अभ्यास की नींव नहीं बनती है? अतीत की नींव पर ही आज तक काम पूरा होता आया है। हालांकि, अतीत के नियमों का अब और उल्लेख नहीं किया जाता और तुमसे कई नई मांगें अपेक्षित हैं, लेकिन इन कानूनों के समाप्त होने की बात तो दूर है, उन्हें इसके बजाय, और ऊँचे स्तर पर उठा दिया गया है। यह कहना कि उन्हें समाप्त कर दिया गया है, इसका मतलब है कि पिछला युग पुराना हो गया है, जबकि कुछ ऐसी आज्ञाएं हैं जिनका तुम्हें अनंतकाल तक सम्मान करना चाहिए। अतीत की आज्ञाएं पहले से ही लागू की जा चुकी हैं, वे पहले से ही मनुष्य का अस्तित्व बन चुकी हैं, और धूम्रपान न करने, मदिरापान न करने, आदि आज्ञाओं को दोहराने की कोई आवश्यकता नहीं है। इस नींव पर, आज तुम लोगों की जरुरत के अनुसार, कद के अनुसार और आज के काम के अनुसार, नई आज्ञाएं निर्धारित की गई हैं। नए युग की आज्ञाओं का निर्धारण करने का मतलब, अतीत की आज्ञाओं को खत्म करना नहीं, बल्कि उन्हें इस आधार पर और ऊँचा उठाना, मनुष्य के क्रियाकलापों को और अधिक पूर्ण और वास्तविकता के अनुसार बनाना है। यदि, आज केवल तुम लोगों को आज्ञाओं का पालन करना होता और इस्राएलियों की तरह, पुराने विधान के नियमों का पालन करना होता, और यदि, तुम लोगों को यहोवा द्वारा निर्धारित कानूनों को याद तक रखना होता तो भी तुम लोगों के बदल सकने की कोई संभावना नहीं होती। यदि तुम लोगों को केवल उन कुछ सीमित आज्ञाओं का पालन करना होता या असंख्य नियमों को याद करना होता, तो तुम्हारी पुरानी प्रकृति गहराई में गड़ी रहती, और इसे उखाड़ने का कोई रास्ता नहीं होता। इस प्रकार तुम लोग और अधिक भ्रष्ट हो जाते, और तुम लोगों में से कोई एक भी आज्ञाकारी नहीं बनता। कहने का अर्थ यह है कि कुछ सरल आज्ञाएं या अनगिनत कानून तुम्हें यहोवा के कामों को जानने में मदद करने में असमर्थ हैं। तुम लोग इस्राएलियों के समान नहीं हो: कानून का पालन करते हुए और आज्ञाओं को याद करते हुए वे यहोवा के कार्यों को देख पाए, और सिर्फ उसकी ही भक्ति कर सके, लेकिन तुम लोग इसे प्राप्त करने में असमर्थ हो, और पुराने विधान के युग की कुछ आज्ञाएं न केवल तुम्हें अपना दिल देने में मदद करने में या तुम्हारी रक्षा करने में असमर्थ हैं, बल्कि ये तुम लोगों को शिथिल बना देंगीं, और तुम्हें अधोलोक पहुंचा देंगी। क्योंकि मेरा काम विजय का काम है, और तुम लोगों की पुरानी प्रकृति और अवज्ञा की ओर केंद्रित है। आज, यहोवा और यीशु के दया भरे शब्द, न्याय के कड़े शब्दों के सामने काफी नहीं पड़ते हैं। ऐसे कड़े शब्दों के बिना, तुम "विशेषज्ञों" पर विजय प्राप्त करना असंभव हो जायेगा, जो हजारों सालों से अवज्ञाकारी रहे हैं। पुराने विधान के नियमों ने बहुत पहले तुम लोगों पर अपनी शक्ति खो दी थी, और आज का न्याय पुराने नियमों की तुलना में कहीं ज्यादा भयंकर है। तुम लोगों के लिए न्याय सबसे उपयुक्त है, कानून के तुच्छ प्रतिबंध नहीं, क्योंकि तुम लोग बिल्कुल प्रारम्भ वाली मानवजाति नहीं हो, बल्कि वो मानवजाति हो जो हजारों वर्षों से भ्रष्ट रही है। आज मनुष्य को जो हासिल करना है, वो मनुष्य की आज की वास्तविक दशा के अनुसार है, वर्तमान-दिन के मनुष्य की क्षमता और वास्तविक कद के अनुसार है, और इसकी आवश्यकता नहीं है कि तुम सिद्धांतों का पालन करो। ऐसा इसलिए है कि तुम्हारी पुरानी प्रकृति में परिवर्तन हो सके, और ताकि तुम अपनी अवधारणाओं को त्याग को।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (1)" से

4. उस समय यीशु का कार्य समस्त मानव जाति का छुटकारा था। उन सभी के पापों को क्षमा कर दिया गया था जो उसमें विश्वास करते थे; जितने समय तक तुम उस पर विश्वास करते थे, उतने समय तक वह तुम्हें छुटकारा देगा; यदि तुम उस पर विश्वास करते थे, तो तुम अब और पापी नहीं थे, तुम अपने पापों से मुक्त हो गए थे। यही है बचाए जाने, और विश्वास द्वारा उचित ठहराए जाने का अर्थ। फिर भी जो विश्वास करते थे उन लोगों के बीच, वह रह गया था जो विद्रोही था और परमेश्वर का विरोधी था, और जिसे अभी भी धीरे-धीरे हटाया जाना था। उद्धार का अर्थ यह नहीं था कि मनुष्य पूरी तरह से यीशु द्वारा प्राप्त कर लिया गया था, लेकिन यह कि मनुष्य अब और पापी नहीं था, कि उसे उसके पापों से क्षमा कर दिया गया था: बशर्ते कि तुम विश्वास करते थे, तुम कभी भी अब और पापी नहीं बनोगे। उस समय, यीशु ने बहुतायत से ऐसे कार्य किये जो उसके शिष्यों की समझ से बाहर थे, और बहुतायत से ऐसा कहा जो लोगों की समझ में नहीं आया। इसका कारण यह है कि, उस समय, उसने व्याख्या नहीं की। इस प्रकार, उसके जाने के कई वर्ष बाद, मत्ती ने उसकी वंशावली बनायी, और अन्य लोगों ने भी बहुतायत से कार्य किये जो मनुष्य की इच्छा के थे। यीशु मनुष्य को पूर्ण करने और प्राप्त करने के लिए नहीं, बल्कि कार्य का एक चरण करने के लिए आया था: स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार को आगे बढ़ाना और क्रूसीकरण के कार्य को पूरा करना—और इसलिए एक बार जब यीशु को सलीब पर चढ़ा दिया गया, तो उसके कार्य का पूरी तरह से अंत हो गया। किन्तु वर्तमान चरण—विजय के कार्य—में अधिक वचन अवश्य बोले जाने चाहिए, अधिक कार्य अवश्य किया जाना चाहिए, कई प्रक्रियाएँ अवशय होनी चाहिए। इसलिए भी यीशु और यहोवा के कार्यों के रहस्य अवश्य प्रकट किये जाने चाहिए, ताकि सभी लोगों को अपने विश्वास में समझ और स्पष्टता मिल जाए, क्योंकि यह अंत के दिनों का कार्य है, और अंत के दिन परमेश्वर के कार्य की समाप्ति है, इस कार्य के समापन का समय है। कार्य का यह चरण तुम्हारे लिए यहोवा की व्यवस्था और यीशु द्वारा छुटकारे को स्पष्ट करेगा, और मुख्य रूप से इसलिए है ताकि तुम परमेश्वर की छह-हजार वर्षीय प्रबंधन योजना के पूरे कार्य को समझ सको, और इस छः-हज़ार वर्ष की प्रबंधन योजना के महत्व और सार की सराहना कर सको, और यीशु द्वारा किए गए सभी कार्यों और उसके द्वारा बोले गए वचनों के प्रयोजन, और यहाँ तक कि बाइबल में तुम्हारे अंध विश्वास और श्रद्धा को समझ सको। यह तुम्हें इन सबको समझने की अनुमति देगा। यीशु द्वारा किया गया कार्य और परमेश्वर का आज का कार्य दोनों तुम्हारी समझ में आ जाएँगे; तुम समस्त सत्य, जीवन और मार्ग को समझ जाओगे और देख लोगे। यीशु द्वारा किए गए कार्य के चरण में, यीशु परमेश्वर के कार्य का समापन किए बिना क्यों चला गया? क्योंकि यीशु के कार्य का चरण समापन का कार्य नहीं था। जब उसे सलीब पर ठोका गया था, तब उसके वचनों का भी अंत हो गया था; उसके सलीब पर चढ़ने के बाद, उसका कार्य पूरी तरह समाप्त हो गया। वर्तमान चरण भिन्न है: केवल वचनों के अंत तक बोले जाने और परमेश्वर के समस्त कार्य का उपसंहार हो जाने के बाद ही उसका कार्य समाप्त हुआ होगा। यीशु के कार्य के चरण के दौरान, बहुत से वचन थे जो अनकहे रह गए थे, या जो पूरी तरह स्पष्ट नहीं थे। फिर भी यीशु ने जो कहा या जो नहीं कहा उसकी परवाह नहीं की, क्योंकि उसकी सेवकाई वचन की सेवकाई नहीं थी, और इसलिए उसे सलीब पर ठोके जाने के बाद, वह चला गया। कार्य का वह चरण मुख्यतः सलीब पर चढ़ने के वास्ते था, और आज के चरण से भिन्न है। कार्य का यह चरण मुख्य रूप से पूर्णता, स्वच्छ करने, और समस्त कार्य का समापन करने के लिए है। यदि वचनों को उनके बिल्कुल अंत तक नहीं कहा जाता है, तो इस कार्य का समापन करने का कोई तरीका नहीं होगा, क्योंकि कार्य के इस चरण में समस्त कार्य को अंत तक लाया जाता है और वचनों का उपयोग करके सम्पन्न किया जाता है। उस समय, यीशु ने बहुतायत से कार्य किया जो मनुष्य के लिए समझ से बाहर था। वह चुपचाप चला गया, और आज भी ऐसे कई लोग हैं जो उसके वचनों को नहीं समझते हैं, जिनकी समझ त्रुटिपूर्ण है मगर फिर भी उनके द्वारा सही मानी जाती है, जो नहीं जानते हैं कि वे गलत हैं। अंत में, यह वर्तमान चरण परमेश्वर के कार्य का पूर्णतः अंत करेगा, और इसका उपसंहार प्रदान करेगा। परमेश्वर की प्रबंधन योजना सभी की समझ और सभी के ज्ञान में आ जाएगी। मनुष्य के भीतर धारणाएँ, उसके इरादे, उसकी त्रुटिपूर्ण समझ, यहोवा और यीशु के कार्यों के प्रति उसकी धारणाएँ, अन्य जतियों के बारे में उसके विचार और उसके अन्य विचलन और उसकी सभी त्रुटियाँ ठीक कर दी जाएँगी। और जीवन के सभी सही मार्ग, और परमेश्वर द्वारा किया गय समस्त कार्य और संपूर्ण सत्य मनुष्य की समझ में आ जाएँगे। जब ऐसा होगा, तो कार्य का यह चरण समाप्त हो जाएगा।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (2)" से

5. यहोवा का कार्य दुनिया का सृजन था, यह आरंभ था; कार्य का यह चरण कार्य का अंत है, और यह समापन है। आरंभ में, परमेश्वर का कार्य इस्राएल के चुने हुए लोगों के बीच किया गया था, और यह सभी जगहों में से सबसे पवित्र में एक नए युग का उद्भव था। कार्य का अंतिम चरण, दुनिया का न्याय करने और युग को समाप्त करने के लिए, सभी देशों में से सबसे अशुद्ध में किया जाता है। पहले चरण में, परमेश्वर का कार्य सबसे प्रकाशमान स्थान में किया गया था, और अंतिम चरण सबसे अंधकारमय स्थान में किया जाता है, और इस अंधकार को बाहर निकाल दिया जाएगा, प्रकाश को प्रकट किया जाएगा, और सभी लोगों पर विजय प्राप्त की जाएगी। जब सभी जगहों में इस सबसे अशुद्ध और सबसे अंधकारमय स्थान के लोगों पर विजय प्राप्त कर ली जाएगी, और समस्त आबादी स्वीकार कर लेगी कि एक परमेश्वर है, जो सच्चा परमेश्वर है, और हर व्यक्ति सर्वथा आश्वस्त हो जाएगा, तब समस्त जगत में विजय का कार्य करने के लिए इस तथ्य का उपयोग किया जाएगा। कार्य का यह चरण प्रतीकात्मक है: एक बार इस युग का कार्य समाप्त हो गया, तो प्रबंधन का 6,000 वर्षों कार्य पूरा हो जाएगा। एक बार सबसे अंधकारमय स्थान के लोगों को जीत लिया, तो कहने की आवश्यकता नहीं कि हर अन्य जगह पर भी ऐसा ही होगा। वैसे तो, केवल चीन में विजय का कार्य सार्थक प्रतीकात्मकता रखता है। चीन अंधकार की सभी शक्तियों का मूर्तरूप है, और चीन के लोग उन सभी लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो देह के हैं, शैतान के हैं, मांस और रक्त के हैं। ये चीनी लोग हैं जो बड़े लाल अजगर द्वारा सबसे ज़्यादा भ्रष्ट किए गए हैं, जिनका परमेश्वर के प्रति सबसे मज़बूत विरोध है, जिनकी मानवता सर्वाधिक अधम और अशुद्ध है, और इसलिए वे समस्त भ्रष्ट मानवता के मूलरूप आदर्श हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि अन्य देशों में कोई भी समस्या नहीं है; मनुष्य की धारणाएँ पूरी तरह से समान हैं, और यद्यपि इन देशों के लोग अच्छी क्षमता वाले हो सकते हैं, किन्तु यदि वे परमेश्वर को नहीं जानते हैं, तो यह अवश्य होगा कि वे उसका विरोध करते हैं। यहूदियों ने भी क्यों परमेश्वर का विरोध किया और उसकी अवहेलना की? फ़रीसियों ने भी क्यों उसका विरोध किया? यहूदा ने क्यों यीशु के साथ विश्वासघात किया? उस समय, बहुत से अनुयायी यीशु को नहीं जानते थे। क्यों यीशु को सलीब पर चढ़ाये जाने और उसके फिर से जी उठने के बाद भी, लोगों ने फिर भी उस पर विश्वास नहीं किया? क्या मनुष्य की अवज्ञा पूरी तरह से समान नहीं है? यह केवल ऐसा है कि चीन के लोग इसका एक उदाहरण बनाए जाते हैं, और जब उन पर विजय प्राप्त कर ली जाएगी तो वे एक नमूना और प्रतिदर्श बन जाएँगे, और दूसरों के लिए संदर्भ के रूप में कार्य करेंगे। मैंने हमेशा क्यों कहा है कि तुम लोग मेरी प्रबंधन योजना के सहायक हो? यह चीन के लोगों में है कि भ्रष्टाचार, अशुद्धता, अधार्मिकता, विरोध और विद्रोहशीलता सर्वाधिक पूर्णता से व्यक्त होते हैं और अपने सभी विविध रूपों में प्रकट होते हैं। एक ओर, वे खराब क्षमता के हैं, और दूसरी ओर, उनके जीवन और उनकी मानसिकता पिछड़े हुए हैं, और उनकी आदतें, सामाजिक वातावरण, जन्म का परिवार—सभी गरीब और सबसे पिछड़े हुए हैं। उनकी हैसियत भी कम है। इस स्थान में कार्य प्रतीकात्मक है, और इस परीक्षा के कार्य के इसकी संपूर्णता में पूरा कर दिए जाने के बाद, उसका बाद का कार्य बहुत बेहतर तरीके से होगा। यदि कार्य के इस चरण को पूरा किया जा सकता है, तो इसके बाद का कार्य ज़ाहिर तौर पर होगा ही। एक बार कार्य का यह चरण सम्पन्न हो जाता है, तो बड़ी सफलता पूर्णतः प्राप्त कर ली गई होगी, और समस्त विश्व में विजय का कार्य पूर्णतः पूरा हो गया होगा। वास्तव में, एक बार तुम लोगों के बीच कार्य सफल हो जाता है, तो यह समस्त विश्व में सफलता के बराबर होगा। यही इस बात का महत्व है कि क्यों मैं तुम लोगों से एक प्रतिदर्श और नमूने के रूप में कार्यकलाप करवाता हूँ। विद्रोहशीलता, विरोध, अशुद्धता, अधार्मिकता—इन लोगों में सभी पाए जाते हैं, और इनमें मानव जाति की सभी विद्रोहशीलता का प्रतिनिधित्व होता है। वे वास्तव में कुछ और ही हैं। इस प्रकार, उन्हें विजय के प्रतीक के रूप में प्रदर्शित किया जाता है, और एक बार जब वे जीत लिए जाते हैं तो वे स्वाभाविक रूप से दूसरों के लिए एक प्रतिदर्श और आदर्श बन जाएँगे।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (2)" से

6. इस्राएल में किए जा रहे पहले चरण की तुलना में कुछ भी अधिक प्रतीकात्मक नहीं था: इस्राएली सभी लोगों में से सबसे पवित्र और सबसे कम भ्रष्ट थे, और इसलिए इस देश में नए युग का उद्भव सर्वाधिक महत्व रखता था। ऐसा कहा जा सकता है कि मानव जाति के पूर्वज इस्राएल से आये, और यह कि इस्राएल परमेश्वर के कार्य का जन्मस्थान था। आरंभ में, ये लोग सर्वाधिक पवित्र थे, और वे सभी यहोवा की उपासना करते थे, और उन में परमेश्वर का कार्य सबसे बड़े परिणाम प्राप्त करने में सक्षम था। पूरी बाइबिल में दो युगों का कार्य दर्ज किया गया है: एक व्यवस्था के युग का कार्य था, और एक अनुग्रह के युग का कार्य था। पुराने विधान (ओल्ड टेस्टामेंट) में इस्राएलियों के लिए यहोवा के वचनों को और इस्राएल में उसके कार्यों कोदर्ज किया गया है; नये विधान में यहूदिया में यीशु के कार्य को दर्ज किया गया है। किन्तु बाइबल में कोई चीनी नाम क्यों नहीं है? क्योंकि परमेश्वर के कार्य के पहले दो हिस्से इस्राएल में किये गए थे, क्योंकि इस्राएल के लोग चुने हुए लोग थे—जिसका अर्थ है कि वे यहोवा के कार्य को स्वीकार करने वाले सबसे पहले लोग थे। वे समस्त मानवजाति में सबसे कम भ्रष्ट थे, और आरंभ में, वे परमेश्वर की खोज करने और उसका आदर करने का मन रखने वाले लोग थे। वे यहोवा के वचनों का पालन करते थे, और हमेशा मंदिर में सेवा करते थे, और याजकीय लबादे या मुकुट पहनते थे। वे परमेश्वर की पूजा करने वाले सबसे आरंभिक लोग थे, और उसके कार्य के सबसे आरंभिक विषयवस्तुथे। ये लोग संपूर्ण मानवजाति के लिए एक प्रतिदर्श और नमूना थे। वे पवित्रता और धार्मिकता के प्रतिदर्श और नमूने थे। अय्यूब, इब्राहीम, लूत या पतरस और तीमुथियुस जैसे लोग—सभी इस्राएली, और सर्वाधिक पवित्र प्रतिदर्श और नमूने थे। इस्राएल मानव जाति के बीच परमेश्वर की पूजा करने वाला सबसे आरंभिक देश था, और कहीं अन्यत्र की तुलना में अधिक धर्मी लोग यहाँ से आते थे। परमेश्वर ने उनमें कार्य किया ताकि भविष्य में वह पूरे देश में मानव जाति को बेहतर ढंग से प्रबंधित कर सके। उनकी उपलब्धियाँ और यहोवा की उनकी आराधना की धार्मिकता दर्ज की गई थी, ताकि वे अनुग्रह के युग के दौरान इस्राएल से परे लोगों के लिए प्रतिदर्शों और नमूनों के रूप में काम कर सकें; और उनकी क्रियाओं ने, आज के दिन तक, कई हजार वर्षों के कार्य को कायम रखा है।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (2)" से

7. अनुग्रह का युग यीशु के नाम से शुरु हुआ। जब यीशु ने अपनी सेवकाई आरंभ की, तो पवित्र आत्मा ने यीशु के नाम की गवाही देनी आरंभ कर दी, और यहोवा का नाम अब और नहीं बोला जाता था; इसके बजाय, पवित्र आत्मा ने मुख्य रूप से यीशु के नाम से नया कार्य आरंभ किया। जो यीशु में विश्वास करते थे उन लोगों की गवाही, यीशु मसीह के लिए दी गई थी, और उन्होंने जो कार्य किया वह भी यीशु मसीह के लिए था। पुराने विधान के व्यवस्था के युग के समापन का यह अर्थ था कि मुख्य रूप से यहोवा के नाम पर आयोजित किया गया कार्य समापन पर पहुँच गया है। इसके बाद, परमेश्वर का नाम यहोवा अब और नहीं था; इसके बजाय उसे यीशु कहा जाता था, और यहाँ से पवित्र आत्मा ने मुख्य रूप से यीशु के नाम के तहत कार्य करना आरंभ किया। इसलिए, आज, जो अभी भी यहोवा के वचनों को खाता और पीता है, और अभी भी व्यवस्था के युग के अनुसार सब कुछ करता है—क्या तुम यहाँ विनियमों का अंधानुकरण नहीं कर रहे हो? क्या तुम अतीत में अटके हुए नहीं हो? अब तुम लोग जानते हो कि अंत के दिन आ चुके हैं। जब यीशु आता है, तो क्या ऐसा हो सकता है, कि वह अभी भी यीशु कहलाएगा? यहोवा ने इस्राएलियों को कहा था कि एक मसीहा आएगा, फिर भी जब वह आया, तो उसे मसीहा नहीं बल्कि यीशु कहा गया था। यीशु ने कहा कि वह पुनः आएगा, और वह वैसे ही आएगा जैसे वह गया था। ये यीशु के वचन थे, किन्तु क्या तुमने यीशु के जाने के तरीके को देखा था? यीशु एक सफेद बादल पर चढ़ कर गया, किन्तु क्या क्या ऐसा हो सकता है कि वह व्यक्तिगत रूप से एक सफेद बादल पर मनुष्यों के बीच वापस आएगा? यदि ऐसा हुआ, तो क्या उसे तब भी यीशु नहीं कहा जाएगा? जब यीशु पुनः आएगा, तब तक युग पहले से ही बदल चुका होगा, तो क्या उसे तब भी यीशु कहा जा सकता है? क्या ऐसा है कि परमेश्वर को केवल यीशु के नाम से ही जाना जा सकता है? क्या उसे एक नए युग में एक नए नाम से नहीं बुलाया जा सकता है? क्या एक व्यक्ति की छवि और एक विशेष नाम परमेश्वर का उसकी संपूर्णता से प्रतिनिधित्व कर सकते हैं? प्रत्येक युग में, परमेश्वर नया कार्य करता है और उसे एक नए नाम से बुलाया जाता है; वह भिन्न-भिन्न युगों में एक ही कार्य कैसे कर सकता है? वह पुराने से कैसे चिपका रह सकता है? यीशु का नाम छुटकारे के कार्य के वास्ते लिया गया था, तो क्या जब वह अंत के दिनों में लौटेगा तो तब भी उसे उसी नाम से बुलाया जाएगा? क्या वह अभी भी छुटकारे का कार्य करेगा? ऐसा क्यों है कि यहोवा और यीशु एक ही हैं, फिर भी उन्हें भिन्न-भिन्न युगों में भिन्न-भिन्न नामों से बुलाया जाता है? क्या यह इसलिए नहीं है क्योंकि उनके कार्य के युग भिन्न-भिन्न हैं? क्या केवल एक अकेला नाम परमेश्वर का उसकी संपूर्णता में प्रतिनिधित्व कर सकता है? ऐसा होने पर, परमेश्वर को भिन्न युग में भिन्न नाम के द्वारा अवश्य बुलाया जाना चाहिए, युग को परिवर्तित करने और युग का प्रतिनिधित्व करने के लिए नाम का उपयोग अवश्य किया जाना चाहिए। क्योंकि कोई भी एक नाम पूरी तरह से स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है, और प्रत्येक नाम केवल एक दिए गए युग के दौरान परमेश्वर के स्वभाव के उस समय से संबंधित पहलू का ही प्रतिनिधित्व कर सकता है; और प्रत्येक नाम को केवल उसके कार्य का प्रतिनिधित्व ही करना है। इसलिए, समस्त युग का प्रतिनिधित्व करने के लिए परमेश्वर ऐसे किसी भी नाम को चुन सकता है जो उसके स्वभाव के अनुकूल है। इस बात की परवाह किए बिना कि यह यहोवा का युग है, या यीशु का युग है, प्रत्येक युग का एक नाम के द्वारा प्रतिनिधित्व किया जाता है। अनुग्रह के युग के अंत में, अंतिम युग आ गया है, और यीशु पहले ही आ चुका है। उसे अब भी यीशु कैसे कहा जा सकता है? वह अब भी मनुष्यों के बीच यीशु के रूप को कैसे अपना सकता है? क्या तुम भूल गए हो कि यीशु केवल नाज़री की छवि से अधिक नहीं था? क्या तुम भूल गए हो कि यीशु केवल मनुष्यजाति को ही छुटकारा दिलाने वाला था? वह अंत के दिनों में मनुष्य को जीतने और सिद्ध करने का कार्य हाथ में कैसे ले सकता था?

"वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)" से

8. हर बार जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, तो वह अपना नाम, अपना लिंग, अपनी छवि, और अपना कार्य बदल देता है; वह अपने कार्य को दोहराता नहीं है। वह ऐसा परमेश्वर है हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता है। जब वह पहले आया, तो उसे यीशु कहा गया था; जब वह इस बार फिर से आता है तो क्या उसे अभी भी यीशु कहा जा सकता है? जब वह पहले आया, तो वह पुरुष था; क्या वह इस बार फिर से पुरुष हो सकता है? जब वह अनुग्रह के युग के दौरान आया तो उसका कार्य, सलीब पर ठोंका जाना था; जब वह फिर से आता है, तो क्या तब भी वह मनुष्यजाति को पाप से छुटकारा दिला सकता है? क्या उसे फिर से सलीब पर ठोंका जा सकता है? क्या वह उसके कार्य की पुनरावृत्ति नहीं होगी? क्या तुम्हें नहीं पता था कि परमेश्वर हमेशा नया रहता है और कभी भी पुराना नहीं पड़ता है? ऐसे लोग हैं जो कहते हैं कि परमेश्वर अपरिवर्तशील है। यह सही है, किन्तु यह परमेश्वर के स्वभाव और सार की अपरिवर्तनशीलता का संकेत करता है। उसके नाम और कार्य में परिवर्तन से यह साबित नहीं होता है कि उसका सार बदल गया है; दूसरे शब्दों में, परमेश्वर हमेशा परमेश्वर रहेगा, और यह कभी नहीं बदलेगा। यदि तुम कहते हो कि परमेश्वर का कार्य हमेशा अपरिवर्तित रहता है, तो क्या वह अपनी छः-हजार वर्षीय प्रबंधन योजना को पूरा करने में सक्षम होगा? तुम केवल यह जानते हो कि परमेश्वर हमेशा ही अपरिवर्तनीय है, किन्तु क्या तुम जानते हो कि परमेश्वर हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता है? यदि परमेश्वर का कार्य अपरिवर्तनशील था, तो क्या वह मानवजाति की आज के दिन तक अगुआई कर सकता था? यदि परमेश्वर अपरिवर्तशील है, तो ऐसा क्यों है कि उसने पहले ही दो युगों का कार्य कर लिया है? उसका कार्य आगे बढ़ने से कभी नहीं रुकता है, कहने का अर्थ है कि उसका स्वभाव धीरे-धीरे मनुष्य के सामने प्रकट होता है, और जो कुछ प्रकट होता है वह उसका अंतर्निहित स्वभाव है। आरंभ में, परमेश्वर का स्वभाव मनुष्य से छिपा हुआ था, उसने कभी भी खुल कर मनुष्य के सामने अपना स्वभाव प्रकट नहीं किया था, और मनुष्य को बस उसका कोई ज्ञान नहीं था। इस वजह से, वह धीरे-धीरे मनुष्य के सामने अपने स्वभाव को प्रकट करने हेतु अपने कार्य का उपयोग करता है, किन्तु इस तरह कार्य करने का यह अर्थ नहीं है कि परमेश्वर का स्वभाव हर युग में बदलता है। ऐसा मामला नहीं है कि परमेश्वर का स्वभाव लगातार बदल रहा है क्योंकि उसकी इच्छा हमेशा बदल रही है। बल्कि, ऐसा है कि, क्योंकि उसके कार्य के युग भिन्न-भिन्न हैं, इसलिए परमेश्वर अपने अंतर्निहित स्वभाव को इसकी समग्रता में लेता है और, कदम दर कदम, उसे मनुष्य के सामने प्रकट करता है, ताकि मनुष्य उसे जानने में समर्थ हो जाए। किन्तु यह किसी भी भाँति इस बात का साक्ष्य नहीं है कि परमेश्वर का मूलतः कोई विशेष स्वभाव नहीं है या युगों के गुज़रने के साथ उसका स्वभाव धीरे-धीरे बदल गया है—इस प्रकार की समझ ग़लत होगी। युगों के गुज़रने के अनुसार परमेश्वर मनुष्य को अपना अंतर्निहित, विशेष स्वभाव—अपना स्वरूप—प्रकट करता है; एक अकेले युग का कार्य परमेश्वर के समग्र स्वभाव को व्यक्त नहीं कर सकता है। और इसलिए, "परमेश्वर हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता है" वचन उसके कार्य के संदर्भ में हैं, और "परमेश्वर अपरिवर्तशील है" वचन उस संदर्भ में हैं जो परमेश्वर का अंतर्निहित स्वरूप है। इसके बावज़ूद, तुम छह-हज़ार-वर्ष के कार्य को एक बिंदु निर्भर नहीं कर सकते हो, या इसे केवल मृत शब्दों से सीमित नहीं कर सकते हो। मनुष्य की मूर्खता ऐसी ही है। परमेश्वर इतना सरल नहीं है जितना मनुष्य कल्पना करता है, और उसका कार्य किसी एक युग में नहीं रुका रह सकता है। उदाहरण के लिए, यहोवा हमेशा परमेश्वर के नाम के लिए नहीं हो सकता है; परमेश्वर यीशु के नाम के तहत भी अपना कार्य कर सकता है। यह एक संकेत है कि परमेश्वर का कार्य हमेशा आगे की ओर प्रगति करते हुए बढ़ रहा है।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)" से

9. परमेश्वर हमेशा परमेश्वर रहेगा, और कभी भी शैतान नहीं बनेगा; शैतान हमेशा शैतान रहेगा, और कभी भी परमेश्वर नहीं बनेगा। परमेश्वर की बुद्धि, परमेश्वर की चमत्कारिकता, परमेश्वर की धार्मिकता, और परमेश्वर का प्रताप कभी नहीं बदलेंगे। उसका सार और उसका स्वरूप कभी नहीं बदलेगा। जहाँ तक उसके कार्य की बात है, हालाँकि, यह हमेशा आगे की ओर प्रगति कर रहा है, हमेशा गहरा होता जा रहा है, क्योंकि वह हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता है। हर युग में परमेश्वर एक नया नाम अपनाता है, हर युग में वह नया कार्य करता है, और हर युग में वह अपने प्राणियों को अपनी नई इच्छा और नए स्वभाव को देखने देता है। यदि लोग नए युग में परमेश्वर के नए स्वभाव की अभिव्यक्ति को देखने में असफल रहते हैं, तो क्या वे उसे हमेशा के लिए सलीब पर नहीं ठोंक देंगे? और ऐसा करके, क्या वे परमेश्वर को परिभाषित नहीं करेंगे?

"वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)" से

10. युग का समापन करने के अपने अंतिम कार्य में, परमेश्वर का स्वभाव ताड़ना और न्याय का है, जिसमें, सार्वजनिक रूप से सभी लोगों का न्याय करने, और उन लोगों को सिद्ध बनाने के लिए, जो एक ईमानदार हृदय से उसे प्यार करते हैं, वह सब कुछ प्रकट करता है जो अधार्मिक है। केवल इस तरह का एक स्वभाव ही युग का समापन कर सकता है। अंत के दिन पहले ही आ चुके हैं। सृष्टि की सभी चीज़ों को उनके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत किया जाएगा, और उनकी प्रकृति के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में विभाजित किया जाएगा। यही वह क्षण है जब परमेश्वर लोगों के परिणाम और उनकी मंज़िल को प्रकट करता है। यदि लोग ताड़ना और न्याय से नहीं गुज़रते हैं, तो उनकी अवज्ञा और अधार्मिकता को प्रकट करने का कोई तरीका नहीं होगा। केवल ताड़ना और न्याय के माध्यम से ही सभी सृजनों का अंत प्रकट हो सकता है। मनुष्य केवल तभी अपने वास्तविक रंगों को दिखाता है जब उसे ताड़ना दी जाती है और उसका न्याय किया जाता है। दुष्ट को दुष्ट के साथ, भले को भले के साथ रखा जाएगा, और समस्त मानव जाति को उनके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत किया जाएगा। ताड़ना और न्याय के माध्यम से, सभी सृजनों का अंत प्रकट किया जाएगा, ताकि दुष्ट को दंडित किया जा सके और अच्छे को पुरस्कृत किया जा सके, और सभी लोग परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन हो जाएँगे। यह समस्त कार्य धार्मिक ताड़ना और न्याय के माध्यम से अवश्य प्राप्त किया जाना चाहिए। क्योंकि मनुष्य की भ्रष्टता अपने चरम पर पहुँच गई है और उसकी अवज्ञा अत्यंत गंभीर हो गई है, इसलिए केवल परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव ही, जो मुख्यत: ताड़ना और न्याय से संयुक्त है और जो अंत के दिनों दिनों में प्रकट होता है, मनुष्य को रूपान्तरित और पूर्ण बना सकता है। केवल यह स्वभाव ही दुष्टता को उजागर कर सकता है और इस तरह सभी अधार्मिकों को गंभीर रूप से दण्डित कर सकता है। इसलिए, इस तरह का स्वभाव युग के महत्व से सम्पन्न होता है, और उसके स्वभाव का प्रकटन और प्रदर्शन प्रत्येक नए युग के कार्य के वास्ते अभिव्यक्त किया जाता है। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर अपने स्वभाव को मनमाने ढंग से और महत्व के बिना प्रकट करता है। माना कि, जब अंत के दिनों के दौरान मनुष्य का परिणाम प्रकट करने में, मनुष्य को धार्मिक न्याय के अधीन नहीं करके, बल्कि इसके बजाय उसके प्रति सहिष्णुता, धैर्य और क्षमा दर्शाते हुए, और चाहे मनुष्य का पाप कितना ही गंभीर क्यों न हो उसे माफ़ करते हुए, रत्ती भर भी धार्मिक न्याय के बिना, परमेश्वर अभी भी मनुष्य पर अनन्त करुणा और प्रेम प्रदान करता और उसके प्रति प्रेममय रहना जारी रखता: तब परमेश्वर के समस्त प्रबंधन का कभी भी कब अंत किया जाता? इस तरह का कोई स्वभाव कब मानव जाति की उचित मंज़िल में अगुआई करने में सक्षम होगा? उदाहरण के लिए, ऐसे न्यायाधीश को लें जो हमेशा प्रेममय है, ऐसा न्यायाधीश जिसका उदार चेहरा और सौम्य हृदय हो। वह लोगों को उनके द्वारा किए गए अपराधों के बावजूद प्यार करता हो, और चाहे कोई भी हो वह उसके प्रति प्रेममय और सहिष्णु रहता हो। ऐसी स्थिति में, वह कब न्यायोचित निर्णय तक पहुँचने में समर्थ होगा? अंत के दिनों के दौरान, केवल धार्मिक न्याय ही मनुष्य का उसके प्रकार के अनुसार वर्गीकरण कर सकता है और मनुष्य को एक नए राज्य में ला सकता है। इस तरह, परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के धार्मिक स्वभाव के माध्यम से समस्त युग का अंत किया जाता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)" से

11. अपने समस्त प्रबंधन में परमेश्वर का कार्य पूर्णतः स्पष्ट है: अनुग्रह का युग अनुग्रह का युग है, और अंत के दिन अंत के दिन हैं। प्रत्येक युग के बीच सुस्पष्ट भिन्नताएँ हैं, क्योंकि प्रत्येक युग में परमेश्वर उस कार्य को करता है जो उस युग का प्रतिनिधि होता है। क्योंकि अंत के दिनों का कार्य किए जाने के लिए, युग का अंत करने के लिए ज्वलन, न्याय, ताड़ना, कोप, और विनाश अवश्य होने चाहिए। अंत के दिन अंतिम युग को संदर्भित करते हैं। अंतिम युग के दौरान, क्या परमेश्वर युग का अंत नहीं करेगा? युग को समाप्त करने के लिए, परमेश्वर को अपने साथ ताड़ना और न्याय अवश्य लाने चाहिए। केवल इसी तरह से वह युग को समाप्त कर सकता है। यीशु का प्रयोजन ऐसा था ताकि मनुष्य अस्तित्व में रहना जारी रख सके, जीवित रह सके, और ताकि एक बेहतर तरीके से विद्यमान रह सके। उसने मनुष्य को पाप से बचाया ताकि वह चरित्रहीनता में उतरने से रुक सके और अधोलोक और नरक में अब और नहीं रहे, और मनुष्य को अधोलोक और नरक से बचा कर उसने मनुष्य को जीवित रहने दिया। अब, अंत के दिन आ गए हैं। वह मनुष्य का सर्वनाश कर देगा, मनुष्य जाति को पूरी तरह से नष्ट कर देगा, अर्थात्, वह मनुष्यजाति की विद्रोहशीलता को रूपान्तरित कर देगा। इस कारण से, अतीत के करुणामय और प्रेममय स्वभाव के साथ, परमेश्वर के लिए युग को समाप्त करना असमर्थ होगा, और प्रबंधऩ की अपनी छः-हजार-वर्षीय योजना को पूरा सफल बनाना असंभव होगा। हर युग में परमेश्वर के स्वभाव का एक विशिष्ट प्रतिनिधित्व होता है, और हर युग ऐसे कार्य से युक्त होता है जिसे परमेश्वर द्वारा किया जाना चाहिए। इसलिए, प्रत्येक युग में स्वयं परमेश्वर के द्वारा किया गया कार्य उसके सच्चे स्वभाव की अभिव्यक्ति से युक्त होता है, और उसका नाम और वह जो कार्य करता है दोनों युग के साथ बदल जाते हैं; वे सभी नए होते हैं। व्यवस्था के युग के दौरान, मनुष्यजाति का मार्गदर्शन करने का कार्य यहोवा के नाम के तहत किया गया था, और कार्य का पहला चरण पृथ्वी पर आरंभ किया गया था। इस चरण में, कार्य में मंदिर और वेदी का निर्माण करने, और इस्राएल के लोगों का मार्गदर्शन करने के लिए व्यवस्था का उपयोग करने और उनके बीच कार्य करने का समावेश था। इस्राएल के लोगों का मार्गदर्शन करके, उसने पृथ्वी पर अपने कार्य के लिए एक आधार स्थापित किया। इस आधार से, उसने अपने कार्य का विस्तार इस्राएल से बाहर किया, जिसका अर्थ है, कि इस्राएल से शुरू करके, उसने अपने कार्य का बाहर विस्तार किया, जिससे बाद की पीढ़ियों को धीरे-धीरे पता चला कि यहोवा परमेश्वर था, और यह कि यह यहोवा ही था जिसने ही स्वर्ग और पृथ्वी का और सभी चीजों का निर्माण किया था, और कि यह यहोवा ही था जिसने सभी प्राणियों को बनाया था। उसने इस्राएल के लोगों के माध्यम से अपने कार्य को उनसे परे फैलाया। इस्राएल की भूमि पृथ्वी पर यहोवा के कार्य का पहला पवित्र स्थान था, और यह इस्राएल का देश ही था जिस पर परमेश्वर पृथ्वी पर सबसे पहले कार्य करने गया। वह व्यवस्था के युग का कार्य था। जहाँ तक अनुग्रह के युग के कार्य की बात है, यीशु ऐसा परमेश्वर था जिसने मनुष्य को बचाया। उसका स्वरूप अनुग्रह, प्रेम, करुणा, सहनशीलता, धैर्य, विनम्रता, देखभाल और सहिष्णुता था, और उसने जो इतना अधिक कार्य किया वह मनुष्य के छुटकारे के वास्ते था। जहाँ तक उसके स्वभाव की बात है, यह करुणा और प्रेम का था, और क्योंकि वह करुणामय और प्रेममय था, इसलिए उसे मनुष्य के वास्ते सलीब पर ठोंक दिया जाना था, ताकि यह दिखाया जाए कि परमेश्वर मनुष्य से उसी प्रकार प्रेम करता था जैसे वह स्वयं से करता था, इस हद तक कि उसने स्वयं को अपनी सम्पूर्णता में बलिदान कर दिया। शैतान ने कहा, "चूँकि तू मनुष्य से प्यार करता है, इसलिए तुझे उसे अत्यंत चरम तक प्यार अवश्य करना चाहिए: मनुष्य को सलीब से, पाप से मुक्त करने के लिए, तुझे अवश्य सलीब पर ठोंका जाना चाहिए, और तू सभी मानव जाति के बदले में स्वयं को अर्पित कर देगा।" शैतान ने निम्नलिखित शर्त लगाई: "चूँकि तू एक प्रेममय और करुणामय परमेश्वर है, इसलिए तुझे मनुष्य को अत्यंत चरम तक प्यार अवश्य करना चाहिए: तुझे अवश्य स्वयं को सलीब पर अर्पित कर देना चाहिए।" यीशु ने उत्तर दिया, "जब तक यह मनुष्यजाति के लिए है, तो मैं अपना सर्वस्व अर्पित करने को तैयार हूँ।" और फिर, वह स्वयं की जरा सी भी परवाह किए बिना सलीब पर चढ़ गया, और समस्त मानव जाति को छुटकारा दिला दिया। अनुग्रह के युग के दौरान, परमेश्वर का नाम यीशु था, अर्थात्, परमेश्वर ऐसा परमेश्वर था जिसने मनुष्य को बचाया, और वह एक करुणामय और प्रेममय परमेश्वर था। परमेश्वर मनुष्य के साथ था। उसका प्यार, उसकी करुणा, और उसका उद्धार हर एक व्यक्ति के साथ था। केवल यीशु के नाम और उसकी उपस्थिति को स्वीकार करके ही मनुष्य शांति और आनन्द प्राप्त करने, उसके आशीष को प्राप्त करने, उसके विशाल और विपुल अनुग्रह को प्राप्त करने, और उसके द्वारा उद्धार को प्राप्त करने में समर्थ था। यीशु को सलीब पर चढ़ाने के माध्यम से, उसका अनुसरण करने वाले सभी लोगों को उद्धार प्राप्त हुआ और उनके पापों को क्षमा कर दिया गया। अनुग्रह के युग दौरान, परमेश्वर का नाम यीशु था। दूसरे शब्दों में, अनुग्रह के युग का कार्य मुख्यतः यीशु के नाम से किया गया था। अनुग्रह के युग के दौरान, परमेश्वर को यीशु कहा गया था। उसने पुराने विधान से परे नये कार्य के एक चरण को किया, और उसका कार्य सलीब पर चढ़ाए जाने के साथ समाप्त हो गया। यह उसके कार्य की संपूर्णता थी। इसलिए, व्यवस्था के युग के दौरान परमेश्वर का नाम यहोवा था, और अनुग्रह के युग में यीशु के नाम ने परमेश्वर का प्रतिनिधित्व किया। अंत के दिनों के दौरान, उसका नाम सर्वशक्तिमान परमेश्वर—सर्वशक्तिमान है, जो मनुष्य का मार्गदर्शन करने, मनुष्य पर विजय प्राप्त करने, और मनुष्य को प्राप्त करने, और अंत में, युग का समापन करने के लिए अपनी सामर्थ्य का उपयोग करता है। हर युग में, कार्य के उसके हर चरण में, परमेश्वर का स्वभाव स्पष्ट होता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)" से

12. आरंभ में, पुराने विधान के व्यवस्था के युग के दौरान मनुष्य का मार्गदर्शन करना एक बच्चे के जीवन का मार्गदर्शन करने जैसा था। आरंभिक मनुष्यजाति यहोवा की नवजात थी; वे इस्राएली थे। उनकी समझ में नहीं आता था कि कैसे परमेश्वर का सम्मान करें या पृथ्वी पर रहें। जिसका अर्थ है, कि यहोवा ने मनुष्यजाति का सृजन किया, अर्थात्, उसने आदम और हव्वा का सृजन किया, किन्तु उसने उन्हें यह समझने की क्षमताएँ नहीं दी कि कैसे यहोवा का सम्मान करें या पृथ्वी पर यहोवा की व्यवस्था का अनुसरण करें। यहोवा के प्रत्यक्ष मार्गदर्शन के बिना, कोई भी इसे सीधे नहीं जान सकता था, क्योंकि आरंभ में मनुष्य के पास ऐसी क्षमताएँ नहीं थीं। मनुष्य केवल इतना ही जानता था कि यहोवा परमेश्वर है, किन्तु जहाँ तक यह बात है कि उसका सम्मान कैसे करना है, किस प्रकार का आचरण उसका सम्मान करना कहा जा सकता है, किस प्रकार के मन के साथ किसी को उसका सम्मान करना है, या उसके आदर में क्या चढ़ाना है: मनुष्य का कोई भी मत नहीं था। मनुष्य केवल इतना ही जानता था कि उस चीज का आनंद कैसे लिया जाए जिसका यहोवा द्वारा निर्माण की गई सभी चीजों के बीच आनंद उठाया जा सकता है, किन्तु मनुष्य को किसी भी तरह का कोई आभास नहीं था कि धरती पर किस प्रकार का जीवन परमेश्वर के एक प्राणी के योग्य होता है। निर्देशित किए जाने के लिए किसी के बिना, उनका व्यक्तिगत रूप से मार्गदर्शन करने वाले किसी के बिना, यह मनुष्यजाति कभी भी ऐसे जीवन को मानव जाति के लिए अनुकूल उचित रूप से नहीं जी सकती थी, बल्कि केवल शैतान द्वारा ही चुपचाप बंदी बना ली गयी होती। यहोवा ने मनुष्यजाति का निर्माण किया, अर्थात्, उसने मनुष्यजाति के पूर्वजों, हव्वा और आदम, का सृजन किया, किन्तु उसने उन्हें आगे कोई ज्ञान या बुद्धि प्रदान नहीं की। यद्यपि वे पहले से ही पृथ्वी पर रह रहे थे, किन्तु उन्हें समझ में लगभग कुछ नहीं आता था। और इसलिए, मनुष्यजाति का सृजन करने का यहोवा का कार्य केवल आधा-समाप्त हुआ था, और पूर्ण नहीं था। उसने केवल मिट्टी से मनुष्य का एक नमूना बनाया था और उसे अपनी साँस दे दी थी, किन्तु परमेश्वर का सम्मान करने की मनुष्य को पर्याप्त इच्छा प्रदान किए बिना। आरंभ में, मनुष्य का मन परमेश्वर का सम्मान करने, या उससे डरने का नहीं था। मनुष्य केवल इतना ही जानता था कि उसके वचनों को कैसे सुनना है, किन्तु पृथ्वी पर जीवन के बुनियादी ज्ञान और जीवन के उचित नियमों के बारे में अनभिज्ञ था। और इसीलिए, यद्यपि यहोवा ने पुरुष और स्त्री का सृजन किया और सात दिन की परियोजना को पूरा किया, फिर भी उसने किसी भी प्रकार से मनुष्य के सृजन को पूरा नहीं किया, क्योंकि मनुष्य केवल एक भूसा था, और उसमें मनुष्य होने की वास्तविकता का अभाव था। मनुष्य केवल इतना ही जानता था कि यह यहोवा था जिसने मनुष्यजाति का सृजन किया था, किन्तु उसे इस बात का कोई आभास नहीं था कि कैसे यहोवा के वचनों और व्यवस्थाओं का पालन किया जाए। और इसलिए, मनुष्यजाति के सृजन के बाद, यहोवा का कार्य अभी ख़त्म होने से बहुत दूर था। उसे अभी भी मनुष्यजाति का पूरी तरह से मार्गदर्शन करना था ताकि वह उसके सामने आए, ताकि वे धरती पर एक साथ रहने और उसका सम्मान करने में समर्थ हो जाएँ, और ताकि वे उसके मार्गदर्शन से धरती पर एक उचित मानव जीवन के सही रास्ते पर प्रवेश करने में समर्थ हो जाएँ। केवल इसी तरह से वह कार्य पूर्णतः सम्पन्न हुआ जिसे मुख्यतः यहोवा के नाम के अधीन आयोजित किया गया था; अर्थात्, केवल इसी तरह से दुनिया का सृजन करने का यहोवा का कार्य पूरी तरह से सम्पन्न हुआ था। और इसलिए, मनुष्यजाति का सृजन करके, उसे पृथ्वी पर हजारों वर्षों तक मनुष्यजाति के जीवन का मार्गदर्शन करना था, ताकि मनुष्यजाति उसके आदेशों और व्यवस्थाओं का पालन करने, और पृथ्वी पर एक सामान्य मानव जीवन की सभी गतिविधियों में हिस्सा ले पाने में समर्थ हो जाए। केवल तभी यहोवा का कार्य पूर्णतः सम्पन्न हुआ था। उसने मनुष्यजाति के सृजन के बाद इस कार्य को आरंभ किया, और याकूब के समय इसे जारी रखा, जब याकूब के बारह पुत्रों के इस्राएल के बारह कबीले बना दिए गए। उस समय के बाद, इस्राएल में सभी लोग ऐसी मानव जाति बन गए, जिसकी पृथ्वी पर आधिकारिक रूप से उसके द्वारा अगुआई की गई थी, और इस्राएल पृथ्वी पर ऐसा विशेष स्थान बन गया जहाँ उसने अपना कार्य किया। यहोवा ने इन लोगों को ऐसे लोगों का पहला समूह बनाया जिन पर उसने पृथ्वी पर अपना आधिकारिक कार्य किया, तथा, और भी अधिक बड़े कार्य की शुरुआत के रूप में उनका उपयोग करते हुए, उसने इस्राएल की संपूर्ण भूमि को अपने कार्य का उद्गम बनाया, ताकि पृथ्वी पर उससे उत्पन्न सभी लोग जान जाएँ कि उसका सम्मान कैसे करें और पृथ्वी पर कैसे रहें। और इसलिए, इस्राएलियों के कर्म अन्य जातियों के देशों द्वारा अनुसरण किए जाने के लिए एक उदाहरण बन गए, और इस्राएल के लोगों के बीच जो कहा गया था वह अन्य जातियों के देशों द्वारा सुने जाने वाले वचन बन गए। क्योंकि ये ही वे प्रथम लोग थे जिन्होंने यहोवा की व्यवस्थाओं और आदेशों को प्राप्त किया था, और इसलिए भी वे इस बात को जानने वाले सर्व प्रथम लोग थे कि कैसे यहोवा के मार्गों का सम्मान करें। वे मानव जाति के पूर्वज थे जो यहोवा के मार्गों को जानते थे, और साथ ही यहोवा द्वारा चयनित मानव जाति के प्रतिनिधि थे। जब अनुग्रह का युग आया, तो यहोवा ने अब और इस तरह से मनुष्य का मार्गदर्शन नहीं किया। मनुष्य ने पाप किया था और पाप के प्रति स्वयं को उन्मुक्त कर दिया था, और इसलिए उसने मनुष्य को पाप से बचाना शुरू किया। इस तरह से, उसने मनुष्य को तब तक तिरस्कृत किया जब तक कि मनुष्य को पाप से पूरी तरह से मुक्त नहीं कर दिया गया था। अंत के दिनों में, मनुष्य ऐसी चरित्रहीनता में डूब गया है कि इस चरण का कार्य केवल न्याय और ताड़ना के माध्यम से ही किया जा सकता है। केवल इसी तरह से कार्य सम्पन्न किया जा सकता है। यह कई युगों का कार्य रहा है। युगों से युगों को विभाजित करने और उनके बीच संक्रमण करने के लिए परमेश्वर के नाम, परमेश्वर के कार्य, और परमेश्वर की विभिन्न छवियों का उपयोग करने में, परमेश्वर का नाम और उसका कार्य उसके युग का प्रतिनिधित्व करते हैं और प्रत्येक युग में उसके कार्य का प्रतिनिधित्व करते हैं।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)" से

13. क्या यीशु का नाम—"परमेश्वर हमारे साथ"—परमेश्वर के स्वभाव को उसकी समग्रता से व्यक्त कर सकता है? क्या यह पूरी तरह से परमेश्वर को स्पष्ट कर सकता है? यदि मनुष्य कहता है कि परमेश्वर को केवल यीशु कहा जा सकता है, और उसका कोई अन्य नाम नहीं हो सकता है क्योंकि परमेश्वर अपना स्वभाव नहीं बदल सकता है, तो ऐसे वचन वास्तव में ईशनिन्दा हैं! क्या तुम मानते हो कि हमारे पास यीशु, परमेश्वर नाम, अकेला परमेश्वर का उसकी समग्रता से प्रतिनिधित्व कर सकता है? परमेश्वर को कई नामों से बुलाया जा सकता है, किन्तु इन कई नामों में से, एक भी ऐसा नहीं है जो परमेश्वर के समस्त को संपुटित कर सकता हो, एक भी ऐसा नहीं है जो परमेश्वर का पूरी तरह से प्रतिनिधित्व कर सकता हो। और इसलिए, परमेश्वर के कई नाम हैं, किन्तु ये बहुत से नाम परमेश्वर के स्वभाव को पूरी तरह से स्पष्ट नहीं कर सकते हैं, क्योंकि परमेश्वर का स्वभाव इतना समृद्ध है, कि यह बस मनुष्य के जानने की सीमा से बढ़ कर है। मनुष्य की भाषा का उपयोग करके, परमेश्वर को पूरी तरह से संपुटित करने का मनुष्य के पास कोई तरीका नहीं है। मनुष्य के पास परमेश्वर के स्वभाव के बारे में जो कुछ वह जानता है उसे संपुटित करने के लिए सीमित शब्दावली है: महान, आदरणीय, चमत्कारिक, अथाह, सर्वोच्च, पवित्र, धार्मिक, बुद्धिमान इत्यादि। बहुत से शब्द! इतनी सीमित शब्दावली उस थोड़े से का वर्णन करने में असमर्थ है जो मनुष्य ने परमेश्वर के स्वभाव के बारे में देखा है। समय के साथ, कई अन्य लोगों ने ऐसे शब्दों को जोड़ा है जो उन्हें लगता था कि उनके हृदय के उत्साह का बेहतर ढंग से वर्णन करने में समर्थ हैं: परमेश्वर अत्यंत महान है! परमेश्वर अत्यंत पवित्र है! परमेश्वर अत्यंत प्यारा है! आज, ऐसी मानव उक्तियाँ अपने चरम पर पहुँच गई हैं, फिर भी मनुष्य अभी भी स्वयं को स्पष्ट रूप से व्यक्त करने में असमर्थ है। और इसलिए, मनुष्य के लिए, परमेश्वर के कई नाम हैं, मगर उसका कोई एक नाम नहीं है, और ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर का अस्तित्व अत्यधिक भरपूर है, और मनुष्य की भाषा अत्यधिक दरिद्र है। एक विशेष शब्द या नाम परमेश्वर का उसकी समग्रता में प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ है, तो क्या आपको लगता है कि उसके नाम को तय किया जा सकता है? परमेश्वर बहुत महान और बहुत पवित्र है फिर भी तुम उसे प्रत्येक नए युग में अपना नाम बदलने की अनुमति नहीं दोगे? इसलिए, प्रत्येक युग में जिसमें परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से अपना स्वयं का कार्य करता है, वह उस कार्य को संपुटित करने के लिए जिसे करने का वह इरादा रखता है, एक नाम का उपयोग करता है जो युग के अनुकूल होता है। वह इस विशेष नाम, एक ऐसा नाम जिसका अस्थायी महत्व है, का उपयोग उस युग के अपने स्वभाव का प्रतिनिधित्व करने के लिए करता है। यह परमेश्वर है जो अपने स्वयं के स्वभाव को व्यक्त करने के लिए मनुष्य की भाषा का उपयोग कर रहा है। फिर भी, बहुत से लोग जिन्हें आध्यात्मिक अनुभव हो चुके हैं और जिन्होंने परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से देखा है, अभी भी महसूस करते हैं कि यह एक विशेष नाम परमेश्वर का उसकी समग्रता से प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ है—आह, इसमें कोई सहायता नहीं की जा सकती है—इसलिए मनुष्य परमेश्वर को किसी भी नाम से अब और नहीं बुलाता है, बल्कि उसे केवल "परमेश्वर" कहता है। यह ऐसा है मानो कि मनुष्य का हृदय प्रेम से भरा हुआ है, फिर भी यह विरोधाभासों से घिरा हुआ भी है, क्योंकि मनुष्य नहीं जानता है कि परमेश्वर की व्याख्या कैसे की जाए। परमेश्वर जो है वह अत्यधिक भरपूर है, इसका वर्णन करने का कोई तरीका ही नहीं है। ऐसा कोई भी अकेला नाम नहीं है जो परमेश्वर के स्वभाव को संक्षेप में प्रस्तुत कर सकता हो, और ऐसा कोई भी अकेला नाम नहीं है जो परमेश्वर के स्वरूप का वर्णन कर सकता हो। यदि कोई मुझसे पूछे, "वास्तव में तुम किस नाम का उपयोग करते हो?" तो मैं उन्हें बताऊँगा, "परमेश्वर तो परमेश्वर है!" क्या यह परमेश्वर के लिए सर्वोत्तम नाम नहीं है? क्या यह परमेश्वर के स्वभाव का सर्वोत्तम संपुटन नहीं है? ऐसा होने पर, क्यों तुम लोग परमेश्वर के नाम की तलाश में इतना प्रयास लगाते हो? क्यों तुम लोगों को भूखे-प्यासे रह कर, अपने दिमाग को चलाना चाहिए, सब कुछ एक नाम के वास्ते? वह दिन आ जाएगा जब परमेश्वर को यहोवा, यीशु या मसीहा नहीं कहा जाएगा—वह केवल सृष्टिकर्ता होगा। उस समय, वे सभी नाम जो उसने पृथ्वी पर धारण किए हैं समाप्त हो जाएँगे, क्योंकि पृथ्वी पर उसका कार्य समाप्त हो गया होगा, जिसके बाद उसका कोई नाम नहीं होगा। जब सभी चीजें सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व के अधीन आ जाती हैं, तो उसे अत्यधिक उपयुक्त फिर भी अपूर्ण नाम की क्या आवश्यकता है? क्या तुम अभी भी परमेश्वर के नाम की तलाश कर रहे हो? क्या तुम अभी भी कहने का साहस करते हो कि परमेश्वर को केवल यहोवा ही कहा जाता है? क्या तुम अभी भी कहने का साहस करते हो कि परमेश्वर को केवल यीशु कहा जा सकता है? क्या तुम परमेश्वर के विरुद्ध ईशनिन्दा का पाप सहन करने में समर्थ हो? तुम्हें पता होना चाहिए कि मूल रूप से परमेश्वर का कोई नाम नहीं था। उसने केवल एक, या दो या कई नाम धारण किए क्योंकि उसके पास करने के लिए कार्य था और उसे मनुष्यजाति का प्रबंधन करना था। चाहे उसे किसी भी नाम से बुलाया जाए—क्या उसने स्वयं इसे स्वतंत्र रूप से नहीं चुना है? क्या इसे तय करने के लिए उसे तुम्हारी—एक प्राणी की—आवश्यकता होगी? जिस नाम से परमेश्वर को बुलाया जाता है वह ऐसा नाम है जो उसके अनुसार है जिसे, मनुष्यजाति की भाषा के साथ, मनुष्य समझने में समर्थ है, किन्तु यह नाम कुछ ऐसा नहीं है जिसे मनुष्य सम्मिलित कर सकता है। तुम केवल इतना ही कह सकते हो कि स्वर्ग में एक परमेश्वर है, कि वह परमेश्वर कहलाता है, कि वह महान सामर्थ्य वाला परमेश्वर स्वयं है, जो अत्यधिक बुद्धिमान, अत्यधिक उच्च, अत्यधिक चमत्कारिक, अत्यधिक रहस्यमय, अत्यधिक सर्वशक्तिमान है, और फिर तुम इससे अधिक नहीं कह सकते हो; तुम्हें बस इतना जरा सा ही पता हो सकता है। ऐसा होने पर, क्या यीशु का मात्र नाम ही परमेश्वर स्वयं का प्रतिनिधित्व कर सकता है? जब अंत के दिन आते हैं, भले ही यह अभी भी परमेश्वर ही है जो अपना कार्य करता है, तब भी उसके नाम को बदलना ही है, क्योंकि यह एक भिन्न युग है।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)" से

14. जब यीशु अपना कार्य करने के लिए आया, तो यह पवित्र आत्मा के निर्देशन के तहत था; उसने वही किया जो पवित्र आत्मा चाहता था, और यह पुराने विधान के व्यवस्था के युग के अनुसार या यहोवा के कार्य के अनुसार नहीं था। यद्यपि जिस कार्य को करने के लिए यीशु आया वह यहोवा की व्यवस्थाओं या यहोवा की आज्ञाओं का पालन करना नहीं था, फिर भी उनका स्रोत एक ही था। जिस कार्य को यीशु ने किया उसने यीशु के नाम का प्रतिनिधित्व किया, और उसने अनुग्रह के युग का प्रतिनिधित्व किया; जहाँ तक यहोवा द्वारा किए गए कार्य की बात है, इसने यहोवा का प्रतिनिधित्व किया, और व्यवस्था के युग का प्रतिनिधित्व किया। उनका कार्य दो भिन्न-भिन्न युगों में एक ही पवित्रात्मा का कार्य था। जिस कार्य को यीशु ने किया वह केवल अनुग्रह के युग का प्रतिनिधित्व कर सकता था, और जो कार्य यहोवा ने किया वह केवल पुराने विधान के व्यवस्था के युग का प्रतिनिधित्व कर सकता था। यहोवा ने केवल इस्राएल और मिस्र के लोगों का, और इस्राएल से परे सभी राष्ट्रों का मार्गदर्शन किया। नए विधान के अनुग्रह के युग में यीशु का कार्य यीशु के नाम के तहत परमेश्वर का कार्य था जब उसने युग का मार्गदर्शन किया। यदि तुम कहते हो कि यीशु का कार्य यहोवा के कार्य के आधार पर था, कि उसने कोई नया कार्य आरंभ नहीं किया, और कि उसने जो कुछ भी किया वह यहोवा के वचनों के अनुसार, यहोवा के कार्य और यशायाह की भविष्यवाणियों के अनुसार था, तो यीशु देहधारी बना परमेश्वर नहीं होता। यदि उसने अपना कार्य इस तरह से संचालित किया होता, तो वह व्यवस्था के युग का एक प्रेरित या कार्यकर्ता रहा होता। यदि यह ऐसा ही है जैसा कि तुम कहते हो, तो यीशु एक युग का सूत्रपात नहीं कर सकता था, न ही वह कोई अन्य कार्य कर सकता था। उसी तरह से, पवित्र आत्मा को मुख्य रूप से अपना कार्य यहोवा के माध्यम से अवश्य करना चाहिए, और यहोवा के माध्यम के अलावा, पवित्र आत्मा कोई नया कार्य नहीं कर सकता था। मनुष्य के लिए यीशु के कार्य को इस तरह से देखना ग़लत है। यदि मनुष्य का मानना है कि यीशु द्वारा किया गया कार्य यहोवा के वचनों और यशायाह की भविष्यवाणियों के अनुसार था, तो क्या यीशु देहधारी परमेश्वर था, या वह नबियों में से कोई एक था? इस दृष्टिकोण के अनुसार, अनुग्रह का कोई युग नहीं होता, और यीशु देहधारी परमेश्वर नहीं होता, क्योंकि उसने जो कार्य किया वह अनुग्रह के युग का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था और केवल पुराने विधान के व्यवस्था के युग का प्रतिनिधित्व कर सकता था। एक नया युग केवल तभी हो सका था जब यीशु नया कार्य करने, नए युग की शुरुआत करने, इस्राएल में पहले से किए गए कार्य को तोड़ने और यहोवा द्वारा इस्राएल में किए गए कार्य के अनुसार, उसके पुराने नियमों के अनुसार, या किसी भी विनियम के अनुरूप, अपना कार्य संचालित करने करने के लिए नहीं, बल्कि इसके बजाय उस नये कार्य को करने के लिए आया जो उसे करना चाहिए था। युग का आरंभ करने के लिए परमेश्वर स्वयं आता है, और युग का अंत करने के लिए परमेश्वर स्वयं आता है। युग का आरंभ और युग का समापन करने का कार्य करने में मनुष्य असमर्थ है। यदि आने के बाद यीशु यहोवा का कार्य समाप्त नहीं करता, तो यह इस बात का सबूत होता कि वह मात्र एक मनुष्य था, और परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ था। निश्चित रूप से क्योंकि यीशु आया और यहोवा के कार्य का समापन किया, अपना स्वयं का कार्य, नया कार्य, शुरू करके यहोवा के कार्य का अनुसरण किया, इससे यह साबित होता है कि यह एक नया युग था, और यह कि यीशु स्वयं परमेश्वर था। उन्होंने कार्य के स्पष्ट रूप से भिन्न दो चरणों को किया। एक चरण मंदिर में कार्यान्वित किया गया था, और दूसरा मंदिर के बाहर संचालित किया गया था। एक चरण व्यवस्था के अनुसार मनुष्य के जीवन की अगुआई करना था, और दूसरा पापबली चढ़ाना था। कार्य के ये दो चरण सुस्पष्टता से भिन्न थे; यह नए युग को पुराने से विभाजित करता है, और यह कहना पूर्णतः सही है कि ये दो भिन्न-भिन्न युग हैं! उनके कार्य का स्थान भिन्न था, और उनके कार्य की विषय-वस्तु भिन्न थी, और उनके कार्य का उद्देश्य भिन्न था। वैसे तो, उन्हें दो युगों: नए और पुराने विधानों में, कहने का अर्थ है कि, नए और पुराने युगों में विभाजित किया जा सकता है। जब यीशु आया, तो वह मंदिर में नहीं गया, जिससे साबित होता है कि यहोवा का युग समाप्त हो गया था। उसने मंदिर में प्रवेश नहीं किया क्योंकि मंदिर में यहोवा का कार्य पूरा हो गया था, और उसे फिर से करने की आवश्यकता नहीं थी, और इसे पुनः करना इसे दोहराना होता। केवल मंदिर को छोड़ने, एक नया कार्य शुरू करने और मंदिर के बाहर एक नया मार्ग प्रशस्त करने के द्वारा ही, वह परमेश्वर के कार्य को उसके चरम तक पहुँचाने में समर्थ था। यदि वह अपना कार्य करने के लिए मंदिर से बाहर नहीं गया होता, तो परमेश्वर का कार्य मंदिर की बुनियाद पर निष्क्रिय पड़ गया होता, और कभी भी कोई नए परिवर्तन नहीं होते। और इसलिए, जब यीशु आया तो उसने मंदिर में प्रवेश नहीं किया, और अपना कार्य मंदिर में नहीं किया। उसने अपना कार्य मंदिर से बाहर किया, और, शिष्यों की अगुआई करते हुए, स्वतंत्र रूप से अपना कार्य किया। अपना कार्य करने के लिए परमेश्वर का मंदिर से प्रस्थान का अर्थ था कि परमेश्वर की एक नई योजना है। उसका कार्य मंदिर के बाहर आयोजित किया जाना था, और यह नया कार्य होना था जो इसके कार्यान्वयन के तरीके में अप्रतिबंधित था। जैसे ही यीशु का आगमन हुआ, उसने पुराने विधान के युग के दौरान यहोवा के कार्य को समाप्त किया। यद्यपि उन्हें दो भिन्न-भिन्न नामों से बुलाया गया था, फिर भी यह एक ही पवित्रात्मा था जिसने कार्य के दोनों चरण सम्पन्न किए, और जो कार्य किया जाना था वह सतत था। चूँकि नाम भिन्न था, और कार्य की विषय-वस्तु भिन्न थी, इसलिए युग भिन्न था। जब यहोवा आया, तो वह यहोवा का युग था, और जब यीशु आया, तो वह यीशु का युग था। और इसलिए, हर बार आगमन के साथ, परमेश्वर को एक नाम से बुलाया जाता है, वह एक युग का प्रतिनिधित्व करता है, और वह एक नया मार्ग खोलता है; और प्रत्येक नए मार्ग पर, वह एक नया नाम अपनाता है, जो दर्शाता है कि परमेश्वर हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता है, और यह कि उसका कार्य आगे की दिशा में प्रगति करने से कभी नहीं रुकता है। इतिहास हमेशा आगे बढ़ रहा है, और परमेश्वर का कार्य हमेशा आगे बढ़ रहा है। उसकी छः-हजार-वर्षीय प्रबंधन योजना के अंत तक पहुँचने के लिए, इसे आगे की दिशा में प्रगति अवश्य करते रहना चाहिए। प्रत्येक दिन उसे नया कार्य अवश्य करना चाहिए, प्रत्येक वर्ष उसे नया कार्य अवश्य करना चाहिए; उसे नए मार्गों को अवश्य खोलना चाहिए, नए युगों का आरंभ अवश्य करना चाहिए, अवश्य नया और अधिक बड़ा कार्य आरंभ करना चाहिए और इनके साथ, नए नाम और नया कार्य लाना चाहिए।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)" से

15. यहोवा के कार्य से ले कर यीशु के कार्य तक, और यीशु के कार्य से लेकर इस वर्तमान चरण तक, ये तीन चरण परमेश्वर के प्रबंधन की पूर्ण परिसीमा को एक सतत सूत्र में आवृत करते हैं, और यह समस्त एक ही पवित्रात्मा का कार्य है। दुनिया के सृजन के बाद से, परमेश्वर हमेशा मनुष्यजाति का प्रबंधन करता आ रहा है। वही आरंभ और अंत है, वही प्रथम और अंतिम है, और वही एक है जो युग का आरंभ करता है और वही एक है जो युग का अंत करता है। कार्य के तीन चरण, विभिन्न युगों और विभिन्न स्थानों में, निश्चय ही एक ही पवित्रात्मा का कार्य हैं। वे सभी जो इन तीन चरणों को पृथक करते हैं, परमेश्वर के विरोध में खड़े हैं। अब, तुम्हारे लिए यह समझना उचित है कि प्रथम चरण से ले कर आज तक का समस्त कार्य एक परमेश्वर का कार्य, एक पवित्रात्मा का कार्य है। इस बारे में कोई संदेह नहीं हो सकता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)" से

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