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41. बुरे कर्म क्या हैं? बुरे कर्मों की अभिव्यक्तियाँ क्या हैं?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

भाइयों और बहनों के बीच जो हमेशा अपनी नकारात्मकता का गुबार निकालते रहते हैं, वे शैतान के अनुचर हैं और वे कलीसिया को परेशान करते हैं। ऐसे लोगों को अवश्य ही एक दिन निकाल और हटा दिया जाना चाहिए। परमेश्वर में अपने विश्वास को लेकर, अगर लोगों के अंदर परमेश्वर के प्रति श्रद्धा-भाव से भरा दिल नहीं है, अगर ऐसा दिल नहीं है जो परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी है, तो ऐसे लोग न सिर्फ परमेश्वर के लिये कोई कार्य कर पाने में असमर्थ होंगे, बल्कि वे ऐसे लोग बन जायेंगे जो परमेश्वर के कार्य में बाधा उपस्थित करते हैं और उनकी उपेक्षा करते हैं। जब कोई परमेश्वर में विश्वास करने वाला व्यक्ति परमेश्वर की आज्ञा का पालन नहीं करता या उसके प्रति श्रद्धा-भाव व्यक्त नहीं करता, बल्कि उसकी उपेक्षा करता है, तो एक विश्वासी या आस्तिक के लिये इससे अधिक कलंक की बात और क्या हो सकती है। यदि किसी विश्वासी की वाणी और आचरण में हमेशा एक अविश्वासी की तरह लापरवाही हो और नियंत्रण न हो, तो ऐसा विश्वासी एक अविश्वासी से भी अधिक दुष्ट है; ये प्रतीकात्मक राक्षस हैं। जो कलीसिया में रहते हुए विष-वमन करते हैं, भाईयों और बहनों के बीच से ऐसे जो अफवाह फैलाते हैं, सौहार्द खराब करते हैं और गुटबाजी करते हैं, उन्हें कलीसिया से निकाल दिया जाना चाहिये था। लेकिन, चूँकि अब परमेश्वर के काम का नया युग है ऐसे लोगों पर पाबंदी लगा दी गई है, क्योंकि ऐसे लोगों का हटाया जाना तय है। शैतान के द्वारा दूषित लोगों का स्वभाव भी दूषित हो गया है। जहां कुछ लोग ऐसे हैं जिनका स्वभाव-मात्र ही दूषित हुआ है, वहां ऐसे लोग भी हैं, जो न केवल दूषित शैतानी स्वभाव के हैं, बल्कि उनकी प्रकृति में भी चरम विद्वेष समा गया है। ऐसे लोग जो कुछ भी करते हैं और जो कुछ कहते हैं, उससे न केवल उनका दूषित शैतानी स्वभाव ही उजागर होता है, बल्कि वे स्वयं साक्षात दुष्ट शैतान ही हैं।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "जो सत्य का पालन नहीं करते, उनके लिये चेतावनी" से

ऐसा कोई कलीसिया नहीं है जहां लोग कलीसिया को परेशान न करते हों, जहां लोग परमेश्वर के कार्य में बाधा न उपस्थित करते हों। ऐसे लोग परमेश्वर के परिवार में छ्द्म वेष में शैतान का ही रूप हैं। ऐसे लोग छ्द्म वेष धारण करने में निपुण होते हैं, मेरे समक्ष विनीत भाव से आकर, नमन करते हुए, नत-मस्तक होते हैं, खुजली वाले कुत्ते की तरह व्यवहार करते हैं, अपने निहित मंसूबों को साधने के लिये अपना "सर्वस्व" न्योछावर करने को तत्पर रहते हैं, लेकिन भाइयों और बहनों के समक्ष अपना घिनौना रूप प्रकट कर देते हैं। ऐसे लोग जब किसी को सत्य का अनुपालन करते देखते हैं तो उस पर आक्रमण करते हैं, उसे अलग-थलग कर देते हैं, और जब किसी ऐसे व्यक्ति को देखते हैं जो उनसे भी अधिक भयंकर अवस्था में हो तो फिर उसकी चाटुकारिता करने लगते हैं, प्रेम प्रदर्शित करने लगते हैं, और कलीसियामें किसी तानाशाह की तरह पेश आने लगते हैं। अधिकतर कलीसियाओं में इसी प्रकार के "स्थानीय दुर्जन नाग", और "पालतू कुत्तों" की पैठ है। ऐसे लोग मिलकर आस-पास मुखबिरी करते हैं, आंखों से और हाव-भाव से एक-दूसरे को इशारे करते हैं, और इनमें से सत्य का पालन कोई भी नहीं करता। जिसमें सबसे अधिक विष होता है वह इन "राक्षसों का मुखिया" होता है, और जिसकी इनमें सबसे अधिक प्रतिष्ठा होती है, वह इनका नेतृत्व करता है और इनका परचम बुलंद करके रखता है। ऐसे लोग कलीसियामें उपद्रव करते हैं, नकारात्मकता फैलाते हुए, मौत का तांडव करते हैं, मनमर्जी करते हैं, जो चाहे बकते हैं, और किसी की हिम्मत नहीं होती कि इन्हें कुछ कहे। इनका आचरण और स्वभाव पूरी तरह से शैतानी होता है। जैसे ही ये लोग परेशानियां खड़ी करने लगते हैं, कलीसिया में जैसे मौत की घुटन-सी छाने लगती है। … यदि किसी कलीसिया में दुर्जन नागों और उनका अनुसरण करने वाले कीड़े-मकौड़ों का बाहुल्य है और उनमें किसी तरह का कोई विवेक नहीं रह गया है, और यदि सत्य देख लेने के बाद भी ऐसे कलीसिया इन सांपों की जकड़न और कपट से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं, ऐसे मूर्खों का अंत में सफाया कर दिया जायेगा। हालांकि ऐसे कीड़े-मकौड़ों ने भले ही कोई खौफ़नाक हरकत न की हो, लेकिन ये ज़्यादा धूर्त, शातिर और बहानेबाज़ होते हैं। इसलिये ऐसे तमाम लोगों का सफाया हो जायेगा। इनमें से बचेगा कोई नहीं!

"वचन देह में प्रकट होता है" से "जो सत्य का पालन नहीं करते, उनके लिये चेतावनी" से

आज तुम परमेश्वर के इन सभी क्रिया-कलापों को देखते हो, मगर तब भी तुम प्रतिरोध करते हो और विद्रोही हो, और समर्पण नहीं करते हो; तुम अपने भीतर बहुत सी चीज़ों को आश्रय देते हो, और वही करते हो जो तुम चाहते हो; तुम अपनी वासनाओं और अपनी पसंद का अनुसरण करते हो-यह विद्रोहशीलता है; और यह प्रतिरोध है। परमेश्वर पर विश्वास जो देह के लिए, किसी की वासनाओं के लिए, और किसी की पसंद के लिए, संसार के लिए, और शैतान के लिए किया जाता है, वह गंदा है; वह प्रतिरोधी व विद्रोहशील है। आज सभी विभिन्न प्रकारों के विश्वास हैं: कुछ आपदा से बचने के लिए आश्रय खोजते हैं, अन्य आशीषें प्राप्त करने की खोज करते हैं, जबकि कुछ रहस्यों को समझना चाहते हैं और कुछ अन्य कुछ धन पाने का प्रयास करते हैं; ये सभी प्रतिरोध के रूप हैं; ये सब ईशनिंदा हैं! यह कहना कि कोई व्यक्ति प्रतिरोध या विद्रोह करता है-क्या यह इन चीज़ों के संदर्भ में नहीं है? बहुत से लोग अब बड़बड़ाते हैं, शिकायतें करते हैं या आलोचनाएँ करते हैं। ये सभी चीज़ें दुष्टों के द्वारा की जाती हैं; वे मानव प्रतिरोध और विद्रोहशीलता हैं; ऐसे व्यक्ति शैतान के अधिकार और नियंत्रण में हैं।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई" से

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बुद्धिमान कुंवारियों को क्या पुरस्कार दिया जाता है? क्या मूर्ख कुंवारियाँ विपत्ति में पड़ जाएँगी? मसीह द्वारा व्यक्त किए गए सत्य को न मानने वाली मानवीय समस्या की प्रकृति क्या है? मनुष्य का मसीह को परमेश्वर के रूप में नहीं मानने का क्या परिणाम है? यह क्यों कहा जाता है कि परमेश्वर का दो बार देहधारी होना देह-धारण की महत्ता को पूरा करता है? प्रश्न 14: हम पौलुस के उदाहरण का अनुसरण करते हैं और हम प्रभु के लिए कड़ी मेहनत करते हैं, सुसमाचार फैलाते हैं और प्रभु के लिए गवाही देते हैं, और पौलुस की तरह प्रभु की कलिसियाओं की चरवाही करते हैं: "मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूँ, मैं ने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैं ने विश्‍वास की रखवाली की है।" क्या यह परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण करना नहीं है? इस तरह से अभ्यास करने का अर्थ यह होना चाहिए कि हम स्वर्गारोहित होने और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के योग्य हैं, तो हमें स्वर्ग के राज्य में लाये जाने से पहले परमेश्वर के अंतिम दिनों के न्याय और शुद्धि के कार्य को क्यों स्वीकार करना चाहिए?