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35. यह क्या है जिसने मेरी आत्मा को धोखा दिया है?

ज़ू लेई झाओझुआंग शहर, शैंडॉन्ग प्रांत

एक दिन मुझे एक सभा के बारे में सूचना मिली। आम तौर पर, यह एक सुखद घटना होती है, लेकिन जैसे ही मैंने हाल ही में अपने कार्य की वजह से हुई पूरी गड़बड़ी के बारे में सोचा, तो मैं खुद को चिंतित महसूस करने से नहीं रोक पाया। यदि मेरे वरिष्ठ जान जाते कि मैंने अपना कोई भी कार्य समाप्त नहीं किया है, तो उन्हें निश्चित रूप से मुझसे निपटना पड़ता, और वे संभवत: मेरा स्थान भी बदल सकते थे। फिर मैं क्या करूँगा? अगले दिन मैं भारी दिल के साथ सभा में गया। जब मैं वहाँ गया, तो मैंने देखा कि मेरा वरिष्ठ अभी तक नहीं आया था, लेकिन कुछ सहकर्मी वहाँ पहले से ही थे। मैंने सोचा: "मुझे पता नहीं कि उनके किसी भी कार्य की क्या स्थिति है। आखिरी सभा में, मैंने उन्हें यह कहते हुए सुना था कि कैसे उन्होंने अपना ज्यादातर कार्य कर लिया था, और इस बार उन्होंने निश्चित रूप से वह सब खत्म कर लिया होगा। अगर उन्होंने अपना सारा कार्य पूरा कर लिया है और केवल मैं ही हूँ जो इतना बुरा हूँ, तो मैं मुसीबत में पड़ जाऊँगा।" मैं तो हैरान था कि, जब हम अपने कार्य की परिस्थितियों के बारे में एक साथ बात कर रहे थे, तो मेरे बहुत से सहकर्मी कह रहे थे कि कैसे उन्होंने अपने कार्य के कुछ हिस्सों को ख़त्म नहीं किया था। जब मैंने यह सुना, तो मेरा दिल जो पहले बहुत भारी हो रहा था, अचानक बहुत हल्का महसूस होने लगा। मैंने सोचा: "ऐसा लगता है कि सिर्फ़ मैंने ही नहीं बल्कि किसी ने भी अपना कार्य ख़त्म नहीं किया है। फिर चिंता करने की ज़रूरत नहीं है। हम सभी को नहीं बदला जा सकता है।" मेरी असहज भावनाओं का बड़ा हिस्सा एक पल में गायब हो गया।

जैसे ही, मैंने अपने आत्म-सांत्वना की स्थिति में सहज महसूस करना शुरू ही किया था, कि ऊपर वाले से संगति में एक अंश में मेरे दिमाग में आ गया: "अगर कोई संसार के विचारों को परमेश्वर के परिवार में लाता है, तो वे धारणाएँ हैं और वे परमेश्वर अनादर करती हैं। बहुत से लोगों के विचार चीज़ों पर अविश्वासियों के समान ही होते हैं। क्योंकि उनके भीतर कोई सत्य नहीं होता है, इसलिए जब वे एक बार परमेश्वर के परिवार में पहुँच जाते हैं, तो वे परमेश्वर के परिवार के कार्यों को देखने, परमेश्वर के परिवार के मामलों में टिप्पणी करने के लिए सांसारिक दृष्टिकोणों का उपयोग करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप, वे खुद को रोक लेते हैं, जिस वजह से वे हमेशा कमज़ोर और नकारात्मक रहते हैं, सत्य की तलाश करने या कीमत चुकाने में असमर्थ रहते हैं। क्या यह उनकी अज्ञानता से पैदा नहीं होता है?" (जीवन प्रवेश के बारे में संगति और उपदेश III में "मनुष्य की धारणाओं और आलोचनाओं को कैसे जानें")। इन वचनों की वजह से मैंने एक पल पहले की अपनी प्रतिक्रिया के बारे में विचार किया। जब मैंने इस बारे में सोचा कि कैसे मैंने अपने कार्य को पूरा नहीं किया था, तो मेरा दिल बहुत भारी महसूस करने लगा और मैं चिंता करने से नहीं रुक पाया। लेकिन जब मुझे पता चला कि मेरे सहकर्मियों ने भी अपना कार्या पूरा नहीं किया था, तो मुझे तुरंत ही राहत महसूस हुई, और मैंने सहज विवेक से सोचा कि केवल मैं ही नहीं था जिसके कार्य ने कुछ हासिल नहीं किया है। अगर हमारे वरिष्ठ को हमसे निपटना था, तो हर किसी को उसका हिस्सा मिलेगा। चूँकि हममें से कई लोगों ने अपना कार्य पूरा नहीं किया था, इसलिए हमारा वरिष्ठ निश्चित रूप से हम सभी को नहीं बदल सकता था। क्या इस तरह की सोच शैतान के दृष्टिकोण से प्रभावित नहीं थी: "अगर हर कोई इसे करता है तो यह कोई पाप नहीं है?" क्या मैं वाकई कलीसिया के कार्य के सिद्धांतों को मापने के लिए शैतान के दृष्टिकोण का उपयोग नहीं कर रहा था? मैंने कलीसिया में शैतान का तार्किक दृष्टिकोण लागू किया था, खुद को सांत्वना देने, खुद को तुष्ट करने के लिए इसका उपयोग किया था—लेकिन क्या मैं केवल खुद को ही नुकसान नहीं पहुँचा रहा था? मैं असल में कितना अंधा और मूर्ख था! बीती बातों को सोचने पर, ऐसा कई बार हुआ था जब मैंने खुद को सांत्वना देने के लिए शैतान के इस दृष्टिकोण के प्रभुत्व को स्वीकार किया था। कुछ समय तक, मैं जीवन में प्रवेश के बिना देह में जीया और, भले ही मैं खुद के उद्धार के बारे में चिंतित था, लेकिन जब मैंने कुछ भाइयों और बहनों को भी सत्य में प्रवेश न करते हुए देखा, तो मैं चिंतामुक्त हो गया और मैंने खुद परेशान होना बंद कर दिया। मैं सोचता था कि अगर इतने सारे लोगों ने जीवन में प्रवेश नहीं किया था, तो परमेश्वर हम सभी को छान कर बाहर नहीं कर सकता है, क्या वह ऐसा कर सकता है? इसलिए मैं अपने खुद के जीवन के लिए कोई वास्तविक जिम्मेदारी वहन नहीं करते हुए, भोगासक्ति के बारे में अहस्तक्षेप नीति की स्थिति में जीता था। जब मैं काफी समय तक कोई लेख नहीं लिखता और मुझमें आत्मनिंदा की भावनाएँ आती, तो मैं उन दूसरे लोगों को देखा करता जिन्होंने भी कुछ नहीं लिखा था, और मेरे दिल में मौजूद निंदा गायब हो जाया करती थी। मैं सोचा करता: एक लेख न लिखना कोई बड़ी बात नहीं है, और खैर, केवल मैं ही ऐसा नहीं हूँ जिसने कुछ नहीं लिखा है। जब मुझे कभी भी अपने सुसमाचार के कार्य से कोई परिणाम नहीं मिलता, तो मैं चिंता महसूस किया करता था। लेकिन जब मैं देखता कि अन्य लोगों के सुसमाचार कार्य से भी कोई फल नहीं मिला है, तो मैं यह सोचते हुए शांत महसूस करने लगता, कि हर कोई ऐसा ही है, कि केवल मैं ही ऐसा नहीं हूँ जो कभी भी किसी को भी कलीसिया में नहीं लाया है। … उस समय, मैं देखता था कि शैतान के दृष्टिकोण कि— "अगर हर कोई इसे करता है तो यह कोई पाप नहीं है" ने मेरे दिल में बहुत गहराई से जड़ जमा ली थी। इस दृष्टिकोण के प्रभुत्व के अधीन, मैं अपने कर्तव्यों को पूरा करते हुए लगातार खुद को तुष्ट कर रहा था, उनमें अपना सर्वस्व नहीं लगा रहा था और सर्वोत्तम संभव परिणाम नहीं खोज रहा था। इससे न केवल कलीसिया के कार्य को बहुत भारी नुकसान हुआ था, बल्कि इससे मेरे खुद के जीवन में भी बहुत भारी नुकसान हुआ था। क्योंकि मैंने शैतान के इस भ्रामक जहर को स्वीकार कर लिया था कि—"अगर हर कोई इसे करता है तो यह कोई पाप नहीं है"— इसलिए मैं कलीसिया के लिए अपने कार्य में कोई वास्तविक ज़िम्मेदारी नहीं लेता था, हमेशा ही अधूरे मन से कार्य करता था और किसी भी परिणाम की खोज नहीं करता था; मैंने उस विवेक और तर्क को गँवा दिया था जो परमेश्वर की रचनाओं में होने चाहिए। क्योंकि मैंने "अगर हर कोई इसे करता है तो यह कोई पाप नहीं है" के शैतान के दृष्टिकोण की बेड़ियों को स्वीकार कर लिया था, इसलिए मैं हमेशा ही परमेश्वर के अपने अनुसरण के दौरान बस गड़बड़ी करता रहता था। मैं परमेश्वर में अपने विश्वास को बिल्कु ल भी किसी परिणाम का नहीं मानता था, मैं ईमानदारी से सत्य की खोज नहीं करता था, जीवन में अपने खुद के प्रवेश के बारे में परवाह या ध्यान केन्द्रित नहीं करता था; मेरे पास अनुसरण करने के लिए कोई उद्देश्य नहीं था, जीवन में कोई दिशा नहीं थी। मैं बस गड़बड़ किया करता था और बच निकलने के लिए न्यूनतम कोशिश करता था। केवल तभी मैंने देखा था कि मुझे "अगर हर कोई इसे करता है तो यह कोई पाप नहीं है" के शैतान के दृष्टिकोण से बहुत बुरी तरह से नुकसान पहुँचा है, और एक आम व्यक्ति के पास जो विवेक, तर्क, सत्यनिष्ठा और गरिमा होनी चाहिए, मैंने वह सब पूरी तरह से गँवा दी है। सावधानी से विचार करने पर, मैं "अगर हर कोई इसे करता है तो यह कोई पाप नहीं है", कि अगर बहुत सारे लोग पाप करते हैं तो परमेश्वर हमें अनदेखा कर देगा और किसी को भी जिम्मेदार नहीं ठहराएगा, में विश्वास करते हुए, हमेशा अपनी खुद की कल्पना और धारणाओं के अंदर जी रहा था, मैं कभी भी यह नहीं सोचता था कि वाकई परमेश्वर लोगों के साथ इस तरह का बर्ताव करेगा या नहीं। उस समय, मैं परमेश्वर के उन वचनों को सोचने के अलावा कुछ नहीं कर सका, जो कहते हैं: "वह जो परमेश्वर के कार्य की अवज्ञा करता है नष्ट कर दिया जाएगा; कोई भी राष्ट्र जो परमेश्वर के कार्य को अस्वीकार करता है, उसे नष्ट कर दिया जाएगा; कोई भी देश जो परमेश्वर के कार्य का विरोध करने के लिए उठता है, वह इस पृथ्वी पर से मिटा दिया जाएगा; और उसका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियन्ता है" से)। परमेश्वर के वचनों से मैं डर से काँपने लगा, क्योंकि मैंने देखा कि परमेश्वर का स्वभाव किसी को भी अपराध करने की अनुमति नहीं देगा और कि वह मनुष्य को नष्ट करने या नहीं करने का अपना निर्णय पापियों की संख्या के आधार पर नहीं करेगा। अतीत के बारे याद करने पर, नोआ के समय में लोग पापी और कामुकतापूर्ण थे और परमेश्वर ने नोआ के परिवार के अलावा उस समय के सभी जीवों को नष्ट कर दिया था। सोदोम के शहर का उसका विध्वंस भी इसी प्रकार का था। अब अंत के दिनों में लोग कई अरब हो गए हैं, जो संख्या नोआ के दिनों की संख्या से बहुत ज्यादा है। लेकिन परमेश्वर ने अपनी व्यवस्था को दरकिनार करके दया नहीं दिखाई है क्योंकि अंत के दिनों में बहुत से पापी हैं; इन लोगों के लिए परमेश्वर के पास केवल घृणा, दंड, नफ़रत और अस्वीकृति है, और वह उन्हें धीरे—धीरे ख़त्म करने के लिए सभी प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं और मानव—निर्मित दुर्भाग्यों का उपयोग कर रहा है। अंत में, बचाए गए कुछ लोगों के अलावा, परमेश्वर बाकी सब को पूरी तरह से नष्ट कर देगा। केवल तभी, मैंने देखा कि मैं परमेश्वर के स्वभाव को कितना कम समझता हूँ। मैं यह नहीं समझता था कि परमेश्वर धार्मिक, पवित्र परमेश्वर है जो मनुष्य को अपराध करने की अनुमति नहीं देता है, इस हद तक कि मैं शैतान के झूठों में उलझ गया था और उसके कपटी षड़यंत्रों में गिर गया था। आज, अगर परमेश्वर से प्रबुद्धता न हुई होती, तो मैं पाप को पाप माने बिना अभी भी पाप में ही जी रहा होता, और अंत में यह भी जाने बिना कि मुझे क्यों मरना था मैं परमेश्वर द्वारा दंडित किया जाता—यह वाकई बहुत ख़तरनाक होता!

मैं परमेश्वर से प्रबुद्धता के लिए उसका धन्यवाद करता हूँ जिसने मुझे शैतान के धोखे से जगाया और यह महसूस कराया कि "अगर हर कोई इसे करता है तो यह कोई पाप नहीं है" पूरी तरह से शैतान का एक विधर्मी भ्रम था। लोगों को नुकसान पहुँचाने और नष्ट करने के लिए यह शैतान की चालाक योजना थी। इसके अलावा, मैंने देखा कि परमेश्वर धार्मिक है, कि परमेश्वर का स्वभाव किसी भी अपराध की अनुमति नहीं देगा, कि परमेश्वर लोगों के अंत पर अंतिम निर्णय इस आधार पर लेगा कि उनमें सत्य है या नहीं, और कि वह किसी भी ऐसे व्यक्ति पर कोई असाधारण दया नहीं दिखाएगा जिसके पास सत्य नहीं है। आज से, मैं सत्य की खोज करने, परमेश्वर को समझने की कोशिश करने, सभी चीजों के बारे में अपने दृष्टिकोण को परमेश्वर के वचनों पर आधारित करने, परमेश्वर के वचनों को उस मानक के रूप में उपयोग करने जिसके द्वारा मैं खुद के लिए कठोर अपेक्षाएँ रखूँ, शैतान के सभी झूठों और कपटों को त्यागने, और ऐसा एक व्यक्ति बनने की कोशिश करने में जो सच्चाई पर निर्भर रह कर जीता हो, कोई प्रयास नहीं छोड़ने की इच्छा रखता हूँ।

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