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60. जो कुछ परमेश्वर कहता है वह ही मनुष्य का न्याय है

बहन शुन्किउ नानयांग शहर, हेनान प्रांत

मैं सोचा करती थी कि परमेश्वर केवल तभी मनुष्य का न्याय एवं उसकी ताड़ना करता है जब वह मनुष्य के अंतर्निहित भ्रष्टाचार को प्रकट करता है या कठोर वचनों को सूचित करता है जो मनुष्य के अंत का फैसला करते है। यह तो सिर्फ काफी बाद में हुआ कि किसी घटना ने यह एहसास करने में मेरी अगुवाई की कि परमेश्वर के कोमल वचन भी उसके न्याय एवं ताड़ना थे। मुझे एहसास हुआ कि हर एक वचन जिसे परमेश्वर ने बोला वह मनुष्य के प्रति उसका न्याय था।

हाल ही में, मेजबान परिवार की वरिष्ठ बहन शारीरिक भावनाओं में फंस गई, और इसके परिणामस्वरूप उसने अत्यधिक कष्ट सहा। मैं ने उसके साथ कई बार बातचीत की, परन्तु वह व्यर्थ प्रतीत हुआ। वह वैसी ही रही। धीरे-धीरे मैं अधीर होती गई, स्वयं में यह सोचते हुए, "मैं ने आपके साथ कई बार बात की है, परन्तु आप नहीं बदली हैं। कदाचित् आपको सच्चाई में कोई दिलचस्पी नहीं है। मैं आपके साथ फिर कभी बातचीत नहीं करूंगी।" उसके पश्चात्, मैं ने आगे से उससे मिलने के लिए कोई झुकाव महसूस नहीं किया और कभी कभार ही उसके विषय में चिंतित होती थी। एक दिन, एक और बहन जिसके साथ मैं ने भागीदारी की थी उसने सुझाव दिया कि हमें उस वरिष्ठ बहन के साथ प्रार्थना करनी चाहिए। यह सुनकर, मुझे घृणा का एहसास हुआ, "क्यों? उसके साथ बने रहना समय की बर्बादी होगी, और हमारी प्रार्थनाएं निष्फल होंगी।" वास्तव में मैं जानती थी कि इसने मेरे अहंकार को प्रकट किया था, जो शैतान का स्वभाव था। मैं दूसरों से रुखा व्यवहार कर रही थी और दूसरों के लिए कोई प्रेम नहीं दिखा रही थी। फिर भी, मैं बस इसे रोक नहीं सकती थी। जब हमने एक साथ प्रार्थना की, तो अपने भीतरी विचारों एवं भावनाओं को जाने देना मेरे लिए अभी भी कठिन था यहाँ तक कि मैं आध्यात्मिक अंधकार में डूब गई और यह महसूस नहीं कर सकी कि परमेश्वर मेरे साथ था। इसके अतिरिक्त, मुझे भीतर से घुटन महसूस हुई मानो मेरा हृदय अवरुद्ध हो गया था और छुटकारा नहीं मिल पा रहा था। इसके पश्चात्, मैं ने अपनी कठिन परिस्थिति के विषय में परमेश्वर के सामने प्रार्थना की, "परमेश्वर, मैं अपने अहंकार एवं अमानवीयता के विषय में जागरूक थी। मैं ने उस वरिष्ठ बहन के लिए न तो कोई विचार किया और न ही कोई सहानुभूति दिखाई। परन्तु मैं बस स्वयं को बदलने में असफल हो गई थी। परमेश्वर, मैं तुझ से अनुरोध करती हूँ कि मुझे सत्य के विषय में और स्वयं को बेहतर ढंग से जानने के लिए प्रकाशित कर।" जब मैं ने वह प्रार्थना अर्पित की, तो मैं ने अस्पष्ट रूप से परमेश्वर के कुछ वचनों का स्मरण किया। तुरन्त ही मैं ने परमेश्वर के वचन की पुस्तक खोली और निम्नलिखित कथनों को पाया: "ऐसा क्यों कहा जाता है कि परमेश्वर से प्रेम करने के तुम्हारे निश्चय की सीमा, और कि क्या तुमने शरीर के कार्यों को त्याग दिया है, इस बात पर निर्भर करता है कि क्या तुम अपने मन में तुम्हारे भाइयों और बहनों के प्रति पूर्वाग्रह रखते हो, और यदि तुम रखते हो तो क्या ऐसे पूर्वाग्रहों को अपने से दूर कर सकते हो। कहने का अर्थ है कि जब तुम्हारा संबंध अपने भाइयों और बहनों के साथ सामान्य होता है, तब परमेश्वर के समक्ष तुम्हारी परिस्थितियाँ भी सामान्य हो जाती हैं। जब तुम्हारा कोई भाई या तुम्हारी बहन कमजोर हो, तो तुम उनसे घृणा नहीं करोगे, उन्हें तुच्छ नहीं जानोगे, उनका मज़ाक नहीं उड़ाओगे, या उन्हें नजरअंदाज नहीं करोगे। यदि तुम उनके लिए कुछ कर पाओ, तो तुम उनके साथ बातचीत करोगे… यदि तुम महसूस करते हो कि तुम उनकी जरूरतें पूरी करने में असमर्थ हो, तो तुम उनसे भेंट कर सकते हो। जरुरी नहीं है कि यह कलीसिया के अगुवे के द्वारा किया जाए - यह प्रत्येक भाई और बहन की जिम्मेदारी है कि वे यह कार्य करें। यदि तुम देखो कि कोई भाई या बहन किसी बुरी अवस्था में है, तो तुम्हें उनसे भेंट करनी चाहिए। यह तुम में से प्रत्येक जन की जिम्मेदारी है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "पवित्र आत्मा का कार्य और शैतान का कार्य" से)। परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के पश्चात्, वह चेतावनी कि "जब तुम्हारा संबंध अपने भाइयों और बहनों के साथ सामान्य होता है, तब परमेश्वर के समक्ष तुम्हारी परिस्थितियाँ भी सामान्य हो जाती हैं" विशेष करके स्पष्ट रीति से मेरे दिमाग में छप गई थी। मैं इस कथन पर कड़ाई से मनन करते हुए कोशिश कर रही थी। पवित्र आत्मा के अद्भुत प्रकाशन के माध्यम से, मैं ने इस सरल दिखाई देनेवाले कथन को वास्तव में भव्यता एवं न्याय का मूर्त रूप लेते हुए महसूस किया, और इसने तलवार के समान मेरे हृदय को आर-पार भेद दिया। परमेश्वर ने हमेशा से ही मनुष्य को स्पष्ट रूप से बताया था कि केवल परमेश्वर के वचनों के आधार पर ही मनुष्य जाति भाइयों एवं बहनों के बीच सामान्य सम्बन्धों को स्थापित कर सकती है, और यह कि परमेश्वर के साथ मनुष्य का सम्बन्ध तब तक सामान्य रहेगा जब तक भाइयों एवं बहनों के साथ उसके सम्बन्ध सामान्य रहेंगे। जब मैं दूसरों के साथ मिलजुलकर रहती थी, तब वह सब जिसे मैं प्रदर्शित करती थी वह शैतान का भ्रष्ट स्वभाव था, मुख्यतः दूसरों की अवहेलना करने और उन्हें ठुकराने में। मेरा लोगों के साथ एक सामान्य रिश्ता नहीं था, अतः मैं परमेश्वर के साथ एक सामान्य रिश्ते का आनन्द कैसे प्राप्त कर सकती थी? यह मनुष्य की अटल ज़िम्मेदारी थी कि वह उन भाइयों एवं बहनों से मिले और सेवा करे जो निष्क्रिय एवं कमजोर थे। यह वह जीवन था जिसे उन लोगों के द्वारा जीया जाना था जिन्होंने परमेश्वर से प्रेम करने का प्रयत्न किया था; ऐसे भाइयों एवं बहनों का आचरण जो एक दूसरे से प्रेम करते थे। विषम रूप से, मैं ने बिल्कुल भी परवाह नहीं की थी जब मैं ने उस वरिष्ठ बहन की बुरी स्थिति के विषय में जाना था। यद्यपि ऐसा प्रतीत होता था कि मैं उसके साथ बातचीत करती थी, फिर भी भीतर गहराई में मैं ने उस हृदय के साथ ऐसा नहीं किया था जो परमेश्वर से प्रेम करता था। मैं ने उसकी सहायता और उसका समर्थन करने के लिए अपना बेहतरीन कार्य करने की कोशिश नहीं की। मैं ने एक उदार हृदय या ऐसे मनुष्य की समझ के साथ धैर्यपूर्वक उससे बात नहीं की जिसने कष्ट सहा था—ऐसा मनुष्य जिसने अन्धकार के जीवन बिताया था—ताकि नकारात्मक स्थिति से बाहर निकलने में उसकी सहायता कर सकूं। मैं ने यह भी निर्णय किया कि उस वरिष्ठ बहन का सच्चाई को खोजने का कोई इरादा ही नहीं था, और इसलिए मैं ने उसकी उपेक्षा की और उससे दूर रही। इस प्रकार मैं ने परमेश्वर के साथ एक स्वस्थ रिश्ते को खो दिया और उसकी ताड़ना के अधीन हो गई। मैं आध्यात्मिक अन्धकार से पीड़ित थी। क्या यह ऐसी स्थिति नहीं थी कि परमेश्वर का प्रबंध मुझमें आया था? जितना अधिक मैं ने इसके विषय में सोचा, उतनी ही दृढ़ता से मैं ने एहसास किया कि यह कथन ही मेरे विषय में परमेश्वर का आमने-सामने का न्याय था। मैं लज्जित और अत्यंत पश्चातापी थी। मुझे एहसास हुआ कि मैं मानवता के किसी चिन्ह के बिना एक निर्दयी जानवर थी। तब, फिर भी, परमेश्वर के लिए मेरा परम आदर स्वतः ही और एक साथ जागृत हुआ। मुझे एहसास हुआ कि परमेश्वर का स्वभाव वैभव एवं क्रोध में से एक है। मुझे एहसास हुआ कि परमेश्वर वास्तव में अत्यधिक धर्मी एवं पवित्र है। परमेश्वर हर एक एवं प्रत्येक विचार को बारीकी से छान सकता है, अतः उसके न्याय से कोई बचाव नहीं था।

परमेश्वर के वचनों के न्याय ने मुझे वरिष्ठ बहन के विरुद्ध अपनी पूर्वधारणा को छोड़ने में सहायता की। इस प्रकार, मुझे प्रेम एवं उदारता की भावना के साथ उससे बातचीत करने की इच्छा मिल गई। अप्रत्याशित रूप से, हालाँकि, इससे पहले कि मैं उसके साथ फिर से बात करती, उस वरिष्ठ बहन ने परमेश्वर से अद्भुत प्रकाशन प्राप्त किया और वह परमेश्वर के वचन के भजनों को सुनने एवं प्रार्थना करने के द्वारा अपनी नकारात्मक विकट स्थिति से बाहर निकल गई थी। उस पल, मुझे संतुष्टि का एहसास हुआ कि उसकी स्थिति सुधर चुकी थी। मैं आभारी थी कि परमेश्वर ने हमारी अगुवाई की, जैसा वह हमेशा करेगा। मैं ने अपने उस खराब आचरण लिए भी शर्मिन्दगी का एहसास किया जिसे मैं ने प्रदर्शित किया था।

मैं ने परमेश्वर का धन्यवाद किया! उस तथ्य के बावजूद कि मैं ने इस अनुभव के दौरान सिर्फ विद्रोह एवं भ्रष्टता को दर्शाया था, मैं ने सीखा कि परमेश्वर के कम कठोर वचन भी मनुष्य के प्रति उसके न्याय एवं ताड़ना हैं, और यह कि उसकी ओर से आए हुए प्रत्येक वचन का अभिप्राय मनुष्य जाति के न्याय के लिए है। मैं फिर कभी परमेश्वर के वचनों को अपनी स्वयं की अवधारणाओं में नहीं मानूंगी। मैं सम्पूर्ण अधीनता के साथ परमेश्वर के न्याय एवं ताड़ना को वचनों में स्वीकार करूंगी। जितनी जल्दी हो सके मैं अपने स्वभाव को रूपान्तरित करने के लिए और भी अधिक सच्चाईयों को समझूंगी एवं प्राप्त करूंगी।

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