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परमेश्वर के वचन के बारे में धर्मोपदेश और सहभागिता "तुम्हें मसीह की अनुकूलता में होने के तरीके की खोज करनी चाहिए"

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आओ, हम परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ें, "तुम्हें मसीह की अनुकूलता में होने के तरीके की खोज करनी चाहिए"

मैं मनुष्य के मध्य में बहुत कार्य कर चुका हूं, और इस दौरान जो वचन मैंने व्यक्त किये हैं, वे बहुत हो चुके हैं। ये वचन मनुष्य के उद्धार के लिए ही हैं, और इसलिए व्यक्त किये गए थे ताकि मनुष्य मेरे अनुसार, मुझ से मेल खाने वाला बन सके। फिर भी, पृथ्वी पर मैंने ऐसे बहुत थोड़े ही लोग पाये हैं जो मुझ से मेल खाते हैं, और इसलिए मैं कहता हूं कि मनुष्य मेरे वचनों को बहुमूल्य नहीं समझता, क्योंकि मनुष्य मेरे अनुकूल नहीं है। इस तरह, मैं जो कार्य करता हूं वह सिर्फ़ इसलिए नहीं है कि मनुष्य मेरी आराधना कर सके; पर उस से अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि, यह इसलिए किया जाता है ताकि मनुष्य मेरे अनुकूल, मुझ से मेल खाने वाला बन सके। वे लोग, जो भ्रष्ट हो चुके हैं, सब शैतान के फंदे में जीवन जी रहे हैं, वे शरीर में जीवन जीते हैं, स्वार्थी अभिलाषाओं में जीवन जीते हैं, और उनके मध्य में एक भी नहीं है जो मेरे अनुकूल हो। कई ऐसे हैं जो कहते हैं कि वे मेरी अनुकूलता में हैं, परन्तु वे सब अस्पष्ट मूर्तियों की आराधना करते हैं। हालाँकि वे मेरे नाम को पवित्र रूप में स्वीकार तो करते हैं, पर वे उस रास्ते पर चलते हैं जो मेरे विपरीत जाता है, और उनके वचन घमण्ड और आत्मविश्वास से भरे हुए हैं, क्योंकि, जड़ से तो, वे सब मेरे विरोध ही में हैं, और मेरे अनुकूल नहीं हैं। प्रत्येक दिन वे बाइबल में मेरे बारे में संकेतों की खोज करते हैं, और यूं ही "उपयुक्त" अंशों को ढूँढते हैं जिन्हें वे निरंतर पढ़ते रहते हैं, और जिन्हें वे "पवित्र शास्त्र" के रूप में बयान करते हैं। वे नहीं जानते कि मेरे अनुकूल कैसे बनें, नहीं जानते कि मेरे साथ शत्रुता में होने का क्या अर्थ होता है, और "पवित्र शास्त्र" को नाममात्र के लिए, अंधेपन के साथ ही पढ़ते रहते हैं। वे बाइबल के भीतर ही, एक ऐसे अज्ञात परमेश्वर को संकुचित कर देते हैं, जिसे उन्होंने स्वंय भी कभी नहीं देखा है, और देखने में अक्षम हैं, और इस पर अपने खाली समय के दौरान ही विचार करते हैं। उनके लिये मेरे अस्तित्व का दायरा मात्र बाइबल तक ही सीमित है। उनके लिए, मैं बस बाइबल के सामान ही हूँ; बाइबल के बिना मैं भी नहीं हूँ, और मेरे बिना बाइबल भी नहीं है। वे मेरे अस्तित्व या क्रियाओं पर कोई भी ध्यान नहीं देते, परन्तु इसके बजाय, पवित्रशास्त्र के हर एक वचन पर बहुत अधिक और विशेष ध्यान देते हैं, और उनमें से कई एक तो यहाँ तक मानते हैं कि मुझे मेरी चाहत के अनुसार, ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहिए जब तक वह पवित्रशास्त्र के द्वारा पहले से बताया गया न हो। वे पवित्रशास्त्र को बहुत अधिक महत्त्व देते हैं। यह कहा जा सकता है कि वे वचनों और उक्तियों को बहुत अधिक महत्वपूर्ण तरीकों से देखते हैं, इस हद कि हर एक वचन जो मैं बोलता हूं उसकी तुलना बाइबल की आयतों के साथ करते हैं, और उसका उपयोग मुझे दोषी ठहराने के लिए करते हैं। वे जिसकी खोज कर रहे हैं वह मेरे अनुकूल होने का रास्ता या ढंग नहीं है, या सत्य के अनुकूल होने का रास्ता नहीं है, बल्कि बाइबल के वचनों की अनुकूलता में होने का रास्ता है, और वे विश्वास करते हैं कि कोई भी बात जो बाइबल के अनुसार नहीं है, बिना किसी अपवाद के, मेरा कार्य नहीं है। क्या ऐसे लोग फरीसियों के कर्तव्यनिष्ठ वंशज नहीं हैं? यहूदी फरीसी यीशु को दोषी ठहराने के लिए मूसा की व्यवस्था का उपयोग करते थे। उन्होंने उस समय के यीशु के अनुकूल होने की खोज नहीं की, बल्कि नियम का अक्षरशः पालन कर्मठतापूर्वक किया, इस हद तक किया कि अंततः उन्होंने निर्दोष यीशु को, पुराने नियम की व्यवस्था का पालन न करने और मसीहा न होने का आरोप लगाते हुए, क्रूस पर चढ़ा दिया। उनका सारतत्व क्या था? क्या यह ऐसा नहीं था कि उन्होंने सत्य के अनुकूल होने के मार्ग की खोज नहीं की? उनमें पवित्रशास्त्र के हर एक वचन का जुनून सवार हो गया था, जबकि मेरी इच्छा और मेरे कार्य के चरणों और कार्य की विधियों पर कोई भी ध्यान नहीं दिया। ये वे लोग नहीं थे जो सत्य को खोज रहे थे, बल्कि ये वे लोग थे जो कठोरता से पवित्रशास्त्र के वचनों का पालन करते थे; ये वे लोग नहीं थे जो सत्य की खोज करते थे, बल्कि ये वे लोग थे जो बाइबल में विश्वास करते थे। दरअसल वे बाइबल के रक्षक थे। बाइबल के हितों की सुरक्षा करने, और बाइबल की मर्यादा को बनाये रखने, और बाइबल की प्रतिष्ठा को बचाने के लिए, वे यहाँ तक गिर गए कि उन्होंने दयालु यीशु को भी क्रूस पर चढ़ा दिया। यह उन्होंने सिर्फ़ बाइबल की रक्षा करने के लिए, और लोगों के हृदय में बाइबल के हर एक वचन के स्तर को बनाये रखने के लिए ही किया। इस प्रकार उन्होंने यीशु को, जिसने पवित्रशास्त्र के सिद्धान्त का पालन नहीं किया, मृत्यु दंड देने के लिये अपने भविष्य और प्रायश्चित हेतु पापबलि को त्यागना बेहतर समझा। क्या वे पवित्रशास्त्र के हर एक वचन के नौकर नहीं थे?

और आज के लोगों के विषय में क्या कहें? मसीह सत्य को बताने के लिए आया है, फिर भी वे निश्चय ही स्वर्ग में प्रवेश प्राप्त करने और अनुग्रह को पाने के लिए उसे मनुष्य के मध्य में से बाहर निकाल देंगे। वे निश्चय ही बाइबल के हितों की सुरक्षा करने के लिए सत्य के आगमन को भी नकार देंगे, और निश्चय ही मसीह के वापस देह में आने के कारण उसे बाइबल के अस्तित्व को अनंतकाल तक सुनिश्चित करने के लिए सूली पर चढ़ा देंगे। कैसे मनुष्य मेरे उद्धार को ग्रहण कर सकता है, जब उसका हृदय इतना अधिक द्वेष से भरा है, और मेरे प्रति उसका स्वभाव ही इतना विरोध से भरा है? मैं मनुष्य के मध्य में रहता हूं, फिर भी मनुष्य मेरे अस्तित्व के बारे नहीं जानता है। जब मैं अपना प्रकाश लोगों पर फैलाता हूं, फिर भी मेरे वह अस्तित्व के बारे में अज्ञानी ही बना रहता है। जब मैं लोगों पर क्रोधित होता हूँ, तो वह मेरे अस्तित्व को और अधिक प्रबलता से नकारता है। मनुष्य शब्दों, बाइबल के साथ अनुकूलता की खोज करता है, फिर भी सत्य के अनुकूल होने के रास्ते को खोजने के लिए एक भी व्यक्ति मेरे पास नहीं आता है। मनुष्य मुझे स्वर्ग में खोजता है, और स्वर्ग में मेरे अस्तित्व के लिए विशेष समर्पण करता है, फिर भी कोई इस बात की परवाह नहीं करता कि मैं देह में उन्हीं के बीच रहता हूं। जो लोग सिर्फ़ बाइबल के शब्दों के और एक अज्ञात परमेश्वर के अनुकूल होने में ही अपना सर्वस्व समझते हैं, वे मेरे लिए एक घृणित हैं। क्योंकि वे मृत शब्दों की आराधना करते हैं, और एक ऐसे परमेश्वर की आराधना करते हैं जो उन्हें अवर्णनीय खज़ाना देने में सक्षम है। जिस परमेश्वर की वह आराधना करते हैं वो एक ऐसा परमेश्वर है जो अपने आपको मनुष्य की दया पर छोड़ देता है, और जिसका अस्तित्व है ही नहीं। तो फिर, ऐसे लोग मुझ से क्या लाभ प्राप्त कर सकते हैं? मनुष्य वचनों के लिए बहुत ही नीचा है। जो मेरे विरोध में हैं, जो मेरे सामने असीमित मांगें रखते हैं, जिन में सत्य के लिए प्रेम ही नहीं है, जो मेरे प्रति बलवा करते हैं—वह मेरे अनुकूल कैसे हो सकते हैं?

मेरे विरुद्ध वे ही हैं जो मेरी अनुकूलता में नहीं हैं। ऐसे ही वे लोग भी हैं जिनमें सत्य के लिए प्रेम नहीं है, और जो मेरे प्रति विद्रोह करते हैं, ऐसे लोग और भी अधिक मेरे विरुद्ध हैं और मेरे अनुकूल नहीं हैं। वे सब जो मेरे अनुकूल नहीं हैं मैं उन्हें दुष्ट के हाथों में छोड़ देता हूं। मैं उन्हें दुष्ट की भ्रष्टता के लिए छोड़ देता हूं, उन्हें अपने दुष्कर्म प्रकट करने के लिए स्वतंत्र लगाम दे देता हूं, और अंत में उन्हें दुष्ट के हाथों में दे देता हूं कि वह उन्हें फाड़ खाए। मैं परवाह नहीं करता हूँ कि कितने लोग मेरी आराधना करते हैं, अर्थात्, मैं परवाह नहीं करता हूँ कि कितने लोग मुझ पर विश्वास करते हैं। मुझे सिर्फ इस बात की फिक्र रहती है कि कितने लोग मेरे अनुकूल हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि हर वह व्यक्ति जो मेरे अनुकूल नहीं हैं, वह ऐसे दुष्ट हैं जो मुझे धोखा देते हैं; वे मेरे शत्रु हैं, और मैं अपने शत्रुओं को अपने घर में "प्रतिष्ठापित" नहीं करूंगा। वे जो मेरी अनुकूलता में हैं, वह मेरे घर में हमेशा के लिए मेरी सेवा करेंगे, और वे जो अपने आप को मेरे शत्रु बनाते हैं हमेशा के लिए मेरी सज़ा को भोगेंगे। वे जो सिर्फ़ बाइबल के वचनों पर ही ध्यान देते हैं, जो सत्य के बारे में या मेरे नक्शे-कदम के बारे में बेफ़िक्र हैं—वे मेरे विरुद्ध हैं, क्योंकि वे मुझे बाइबल के अनुसार सीमित बना देते हैं, और मुझे बाइबल में ही सीमित कर देते हैं, और वे ही मेरे बहुत अधिक निंदक हैं। ऐसे लोग मेरे सामने कैसे आ सकते हैं? वे मेरे कार्यों, या मेरी इच्छा, या सत्य पर कुछ भी ध्यान नहीं देते हैं, बल्कि वचनों से ग्रस्त हो जाते हैं, वचन जो मार देते हैं। कैसे ऐसे लोग मेरे अनुकूल हो सकते हैं?

मैंने बहुत सारे वचन कहे हैं, और अपनी इच्छा और स्वभाव को भी व्यक्त किया है, और फिर भी, लोग अभी भी मुझे जानने और मुझ में विश्वास करने में अक्षम ही हैं। या, यह भी कहा जा सकता है कि, वे अभी भी मेरी आज्ञा का पालन करने में अक्षम हैं। वे जो बाइबल में जीते हैं, जो व्यवस्था में जीते हैं, जो सलीब पर जीते हैं, वे जो शिक्षा-सिद्धान्त के अनुसार जीते हैं, वे जो उस कार्य के मध्य में जीते हैं जिन्हें मैं आज करता हूं—उनमें से कौन मेरे अनुकूल हैं? तुम सब सिर्फ़ आशीष और पुरस्कार पाने के बारे में ही सोचते हो, और कभी एक बार भी तुम लोगों ने यह विचार नहीं किया कि मेरे अनुकूल कैसे बन सकते हो, या अपने आप को मेरे साथ शत्रुता होने से कैसे रोक सकते हो। मैं तुम सबसे बहुत निराश हूं, क्योंकि मैंने तुम लोगों को बहुत अधिक दिया है, फिर भी मैंने तुम लोगों से बहुत ही कम हासिल किया है। तुम लोगों का छल, तुम लोगों का घमण्ड, तुम लोगों लालच, तुम लोगों की ज़रूरत से अधिक अभिलाषाएं, तुम लोगों का धोखा, तुम लोगों का आज्ञा-उल्लंघन—इनमें से कौनसी चीज मेरी नज़र से बच सकती है? तुम लोग मेरे साथ चाल चलते हो, तुम लोग मुझे मूर्ख बनाते हो, तुम लोग मेरा अपमान करते हो, तुम लोग मुझे धोखा देते हो, तुम लोग मुझ से ज़बरदस्ती वसूल करते हो, तुम लोग बलिदानों के लिए मुझ पर बल प्रयोग करते हो—ऐसे दुष्कर्मी मेरी सज़ा से कैसे बच निकल सकते हैं? तुम लोगों की बुराई मेरे साथ तुम्हारी शत्रुता का प्रमाण है, और मेरी अनुकूलता में न होने का प्रमाण है। तुम सब में से प्रत्येक अपने आप में यह विश्वास करता है कि वह मेरे अनुकूल है, परन्तु यदि ऐसा है, तो फिर यह अखंडनीय प्रमाण किस पर लागू होता है? तुम लोगों को लगता है कि तुम्हारे अंदर मेरे प्रति बहुत निष्कपटता और ईमानदारी है तुम सब सोचते हो कि तुम लोग बहुत ही रहमदिल, बहुत ही करुणामय हो, और तुम सबने मुझे बहुत कुछ समर्पित किया है। तुम सब सोचते हो कि तुम लोगों ने मेरे लिए पर्याप्त काम कर दिया है। फिर भी, क्या तुम लोगों ने कभी इन धारणाओं की अपने ख़ुद के स्वभाव से तुलना की है? मैं कहता हूं कि तुम लोग बहुत ही घमण्डी, बहुत ही लालची, बहुत ही यन्त्रवत् हो; और तुम सब मुझे बहुत ही गहरी चालबाज़ियों से मूर्ख बनाते हो, और तुम्हारे इरादे घृणित हैं और तुम्हारी विधियाँ घृणित हैं। तुम लोगों की ईमानदारी बहुत ही थोड़ी है, तुम्हारी गम्भीरता बहुत ही थोड़ी है, और तुम्हारी अंतरात्मा तो और अधिक क्षुद्र है। तुम लोगों के हृदय में बहुत ही अधिक द्वेष है, और इससे कोई भी नहीं बचा है, यहाँ तक कि मैं भी नहीं। तुम सब मुझे अपने बच्चों, या अपने पति, या आत्म-संरक्षण के लिए बाहर निकाल देते हो। मेरी चिंता करने की बजाय—तुम सब अपने परिवार, अपने बच्चों, अपने सामाजिक स्तर, अपने भविष्य, और अपनी ख़ुद की संतुष्टि की चिंता करते हो। तुमने कभी बातचीत करते समय या कार्य करते समय मेरे बारे में सोचा है? जब मौसम ठंडा होता है, तो तुम लोगों की सोच अपने बच्चों, अपने पति, अपनी पत्नी, या अपने माता-पिता के लिए ही होती है। जब मौसम गरम होता है, तब भी, तुम सबके हृदय में मेरे लिए कोई स्थान नहीं होता है। जब तुम अपना कर्तव्य निभाते हो, तुम अपने ख़ुद के फायदों, अपनी ख़ुद की व्यक्तिगत सुरक्षा, अपने परिवार के सदस्यों के बारे में ही सोच रहे होते हो। तुमने कभी भी ऐसा क्या काम किया है जो सिर्फ मेरे लिए ही हो? तुमने कब सिर्फ मेरे बारे में ही सोचा है? कब तुमने अपने आप को, हर कीमत पर, केवल मेरे लिए और मेरे कार्य के लिए ही समर्पित किया है? मेरे साथ तुम्हारी अनुकूलता का प्रमाण कहाँ है? मेरे साथ तुम्हारी ईमानदारी की वास्तविकता कहाँ है? मेरे साथ तुम्हारी आज्ञाकारिता की वास्तविकता कहाँ है? कब तुम्हारे इरादे केवल मेरी आशीषों का लाभ पाने के लिए ही नहीं रहे हैं? तुम सब मुझे मूर्ख बनाते और धोखा देते हो, तुम सब सत्य के साथ खेलते हो, और सत्य के अस्तित्व को छुपाते हो, और सत्य के सार-तत्व को धोखा देते हो, और तुम लोग इस प्रकार अपने आप को मेरा शत्रु बनाते हो, अतः भविष्य में क्या तुम लोगों की प्रतीक्षा कर रहा है? तुम लोग केवल एक अज्ञात परमेश्वर से अनुकूलता की ही खोज करते हो, और मात्र ही एक अज्ञात विश्वास की खोज करते हो, फिर भी तुम सब मसीह की अनुकूलता में नहीं हो। क्या तुम्हारी दुष्टता को भी वही कठोर दण्ड नहीं मिलेगा जो पापी को मिलता है? उस समय, तुम सबको अहसास होगा कि कोई भी जो मसीह के अनुकूल नहीं होता, क्रोध के दिन से वह बच नहीं पायेगा, और तुम लोगों पता चलेगा कि जो मसीह के शत्रु हैं उन्हें किस प्रकार का कठोर दण्ड दिया जायेगा। जब वह दिन आएगा, परमेश्वर में विश्वास के कारण भाग्यवान होने के तुम लोगों के सभी सपने, और स्वर्ग में जाने का अधिकार, सब बिखर जायेंगे। परंतु, यह उनके लिए नहीं है जो मसीह के साथ मेल खाते हैं, उसके अनुकूल हैं। यद्यपि उन्होंने बहुत कुछ खो दिया है, जबकि उन्होंने बहुत अधिक कठिनाइयों का सामना भी किया है, वह उस सब उत्तराधिकार को प्राप्त करेंगे जो मैं मानवजाति को वसीयत के रूप में दूंगा। अंततः, तुम समझ जाओगे कि सिर्फ़ मैं ही धर्मी परमेश्वर हूं, और केवल मैं ही मानवजाति को उसकी खूबसूरत मंजिल तक ले जाने में सक्षम हूँ।

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हमने अभी-अभी परमेश्वर के बहुत महत्वपूर्ण वचन के एक अंश को पढ़ा है जिसका नाम है, "तुम्हें मसीह की अनुकूलता में होने के तरीके की खोज करनी चाहिए"। इस अंश में परमेश्वर के वचन किस स्तर पर इतने महत्वपूर्ण हैं? यदि लोग इस अंश में परमेश्वर के वचनों में प्रवेश नहीं कर सकते हैं, अगर वे परमेश्वर की अपेक्षा को संतुष्ट नहीं कर सकते हैं, तो क्या वे स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं? सर्वशक्तिमान परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास तुमको स्वर्ग के राज्य में सहभागी होने का कोई आश्वासन नहीं देता है, न ही तुम्हारी इस कथित स्वीकृति का, कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर देहधारी परमेश्वर, मसीह का प्रकटन है, मतलब यह है कि तुम बच गए हो। तुम सर्वशक्तिमान परमेश्वर पर विश्वास करते हो, तुम अपना कर्तव्य कर सकते हो, और तुम परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए सब कुछ त्याग सकते हो, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि स्वर्ग में तुम्हारे लिए एक हिस्सा होना ही चाहिए। परमेश्वर के वचनों को सुनो, और जान लो कि उसकी सबसे बुनियादी बात यह है कि तुम्हें मसीह के साथ अनुकूल होना चाहिए। किस परिणाम को हासिल करना है? तुम परमेश्वर के अंतिम दिनों के कार्य का अनुभव करो और मसीह के तख़्त के समक्ष तुम न्याय और ताड़ना को पाओ। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि क्या तुम अंततः मसीह के साथ अनुकूल हो, क्या तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जो मसीह के प्रति समर्पण कर सकता है, एक ऐसा व्यक्ति जो परमेश्वर की आज्ञा का अनुसरण और परमेश्वर की आराधना कर सकता है। जब लोग प्रभु यीशु में विश्वास करते थे, परमेश्वर उनके साथ सख्त नहीं था, लेकिन जब वह अंतिम दिनों में न्याय का कार्य करता है, तो वह मनुष्य के साथ गंभीर होता है। वह किस हद तक गंभीर होता है? वह देखता है कि एक व्यक्ति वास्तव में अंतिम दिनों के मसीह के साथ अनुकूल है या नहीं। यदि कोई व्यक्ति सही मायने में अनुकूल हो, तो उसकी अवज्ञा, उसका प्रतिरोध, उसका शैतानी स्वभाव, उसके दृष्टिकोण, ये सब परिशुद्ध हो जाएँगे। वह व्यक्ति पूरी तरह से मसीह का अनुसरण कर सकता है, और मसीह के वचन के प्रभुत्व के प्रति आज्ञा-पालन कर सकता है, और केवल एक ऐसा व्यक्ति ही है जो बच सकता है और राज्य की प्रजा में से एक हो सकता है। क्या अब यह दर्शन स्पष्ट है? कुछ ऐसे नए विश्वासी भी हो सकते हैं जो अभी भी इसे स्पष्ट रूप से नहीं देखते हैं। यह सामान्य बात है। लेकिन उन लोगों में होकर जो कई सालों से विश्वासी रहे हैं, यदि तुम अभी भी इसे स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते हो, तो तुम्हारा परमेश्वर के वचन को पढ़ना अर्थहीन रहा है और इसका कोई लाभ नहीं है। तुम कुछ भी नहीं समझते!

परमेश्वर का वचन कहता है: "मैं मनुष्य के मध्य में बहुत कार्य कर चुका हूं, और इस समय के दौरान जो वचन मैंने व्यक्त किये हैं, वे बहुत हो चुके हैं। ये वचन मनुष्य के उद्धार के लिए ही हैं, और इसलिए व्यक्त किये गए थे ताकि मनुष्य मेरे अनुसार, मुझ से मेल खाने वाला बन सके। फिर भी, पृथ्वी पर मैंने ऐसे बहुत थोड़े ही लोग पाये हैं जो मुझ से मेल खाते हैं, और इसलिए मैं कहता हूँ कि मनुष्य मेरे वचनों को बहुमूल्य नहीं समझता, क्योंकि मनुष्य मेरे अनुकूल नहीं है।" परमेश्वर यहाँ क्या कहना चाहता है? क्या तुम समझते हो? देहधारी परमेश्वर ने आखिरी दिनों में कई वचन कहे हैं, और ये वचन मनुष्य की मुक्ति के लिए हैं। लेकिन जहाँ तक इस कार्य के परिणाम की बात है, परमेश्वर कहता है: "फिर भी, पृथ्वी पर मैंने ऐसे बहुत थोड़े ही लोग पाये हैं जो मुझ से मेल खाते हैं, और इसलिए मैं कहता हूँ कि मनुष्य मेरे वचनों को बहुमूल्य नहीं समझता, क्योंकि मनुष्य मेरे अनुकूल नहीं है।" आखिरकार मसीह के साथ अनुकूल होने का क्या मतलब है? कौन-से लोग मसीह के साथ अनुकूल नहीं हैं? शायद अधिकांश लोग वास्तव में इस बारे में स्पष्ट नहीं हैं, और मुमकिन है कि जिन लोगों ने अभी हाल में सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार किया है, वे विशेष रूप से जवाबों के बारे में अनिश्चित हों। एक व्यक्ति जिसने अभी हाल में सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार किया है, संभवतः सोच सकता है: "मैंने इतने सालों से परमेश्वर में विश्वास किया है और पहले से ही उसके लिए सब कुछ छोड़ दिया है, मैंने परमेश्वर के लिए पहले से ही इतना काम किया है और बहुत मुश्किलों का सामना किया है, इसलिए मैं परमेश्वर के साथ अनुकूल हूँ।" ये एक नए आस्तिक के विचार हैं। जिन लोगों ने मसीह के तख़्त के सामने न्याय का अनुभव किया है, उन्हें क्या लगता है? "मसीह के तख़्त के सामने मैंने न्याय और ताड़ना को पाया है। मैं पहले से ही अपनी भ्रष्टता, अपनी प्रकृति, और अपने सार के बारे में जानता हूँ। मैं अपने पुराने स्व से घृणा करता हूँ, इस भ्रष्ट देह से घृणा करता हूँ। मैं अपने समग्र ह्रदय से परमेश्वर से प्रेम करने को तैयार हूँ, सच्चाई को स्वीकार करने को तैयार हूँ, सच्चाई की तलाश करने को तैयार हूँ। मैं परमेश्वर के लिए अपना सर्वस्व दे देने को तैयार हूँ, यही वह है जिसकी मैं अभिलाषा रखता हूँ। क्या यह संभव है कि मैं परमेश्वर के साथ अनुकूल नहीं हूँ?" क्या ये दो विचार सही हैं? दोनों गलत हैं। बिना किसी अनुभव के तुम परमेश्वर के वचन की वास्तविक समझ प्राप्त नहीं कर सकते हो। परमेश्वर के वचन की समझ अनुभव के माध्यम से प्राप्त की जाती है। कुछ लोग कहते हैं, "मैं क्षमता वाला व्यक्ति हूँ, मेरे पास तेज बुद्धि है, मैं किसी भी अड़चन के बिना, शीघ्र ही परमेश्वर के वचन को समझ सकता हूँ।" यह कथन मान्य नहीं है। यह क्यों मान्य नहीं है? वे क्षमताधारी लोग जो बूझ सकते हैं, परमेश्वर के वचन को पढ़ने और समझने में सक्षम हैं, लेकिन यह समझ बहुत उथली होती है; यह सिर्फ चीजों की सतह को छूती है। परमेश्वर के वचन का सच्चा अर्थ, उसके वचन का सार, और उसके इरादे, इन्हें समझने के लिए आठ से दस वर्षों के लिए इनको अनुभूत करना चाहिए। इस उदाहरण पर गौर करो। एक धार्मिक व्यक्ति जो परमेश्वर पर विश्वास करता है अपने पापों को स्वीकार करता है, परमेश्वर के सामने वह उन सभी पापों को स्वीकार करता है जो उसने कभी भी किये हों, वह सब कुछ प्रकट कर देता है। लेकिन क्या वह वास्तव में पाप के सार को जानता है? क्या वह पाप की उत्पत्ति को जानता है? वह अक्सर प्रार्थना में अपने पापों को कबूल करता है और तथापि, बाद में वह फिर से पाप करता है। वह पश्चाताप करने में सक्षम क्यों नहीं है? क्या कोई यह समझ सकता है? वास्तव में कोई भी नहीं कर सकता, सभी प्रचारकों और पादरियों को, यहाँ तक ​​कि पौलुस को भी, यह समझ नहीं है। पौलुस केवल इतना ही कर सकता था कि वह प्रमुख पापी होना स्वीकार करे। क्या उसने कहा कि उसका स्वभाव और उसका सार क्या था? क्या उसने अपने प्रतिरोध की उत्पत्ति की, या उसने प्रभु यीशु की निंदा क्यों करी, इसकी व्याख्या की थी? वह इसे नहीं कह सका था। वास्तव में, ऐसा कुछ भी नहीं था जो वह कह सके। ऐसा क्यों है? उसने परमेश्वर से न्याय और ताड़ना को प्राप्त नहीं किया था। अनुग्रह के युग में, परमेश्वर ने मनुष्य के पापी स्वभाव के सार के बारे में, मनुष्य के स्वभाव के तत्व के बारे में, इस तथ्य के बारे में कि मनुष्य शैतान द्वारा भ्रष्ट हो चुका है, कुछ भी नहीं कहा। क्यों प्रभु यीशु ने कुछ नहीं कहा और केवल लोगों को उनके पापों को कबूल करने दिया? बाइबल के, प्रभु यीशु के वचनों के मूल तत्व को कौन खोज सकता है? परमेश्वर का कार्य सशक्त और सुस्पष्ट है, स्वर्गीय वस्त्र का एक अखंड अंश। प्रभु यीशु ऐसा कुछ भी नहीं करेगा जो कि पूर्ण न हो, ठोस न हो। तो ऐसा क्यों है कि यीशु ने कुछ नहीं कहा? क्यों उसने आखिरी दिनों के न्याय के बारे में कुछ भी नहीं कहा? क्या तुम कह सकते हो कि प्रभु यीशु की क्षमता कम है? क्या तुम कह सकते हो कि प्रभु यीशु देहधारी परमेश्वर नहीं है? कोई भी यह नहीं कह सकता। लेकिन यीशु ने कुछ भी क्यों नहीं कहा? जो कोई भी इस मामले का अर्थ समझ सकता है, वास्तव में बाइबल का तत्व पा लेता है। प्रभु यीशु ने क्या कहा था? ऐसा नहीं है कि हमारे पास कोई स्पष्टीकरण उपलब्ध है, इसके बजाय हम प्रभु यीशु के वचनों के एक आधार का पता लगाएँ। प्रभु यीशु ने ऐसा कहा: "मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा परन्तु जो कुछ सुनेगा वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा।"(यूहन्ना 16: 12-13)। क्या यही आधार है? बाइबल कहती है: "जो पुत्र पर विश्‍वास करता है, अनन्त जीवन उसका है; परन्तु जो पुत्र की नहीं मानता, वह जीवन को नहीं देखेगा, परन्तु परमेश्‍वर का क्रोध उस पर रहता है।"(यूहन्ना 3:36) इन शब्दों का क्या अर्थ है? अनुग्रह के युग में तुमने प्रभु यीशु के कार्य का अनुभव किया है, प्रभु यीशु के लिए अपना जीवन बिताया है, फिर तुम्हारे पास अनन्त जीवन क्यों नहीं है? बाइबल क्या कहती है इस पर गौर करो: "जो पुत्र पर विश्‍वास करता है, अनन्त जीवन उसका है; परन्तु जो पुत्र की नहीं मानता, वह जीवन को नहीं देखेगा।"यह एक विरोधाभास नहीं है। यह बात कैसे विरोधाभासी नहीं है? सर्वशक्तिमान परमेश्वर आ गया है, लेकिन क्या वह प्रभु यीशु का आत्मा है? यदि तुम केवल प्रभु यीशु के कार्य को स्वीकार करते हो, लेकिन सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार नहीं करते, तो क्या तुम वास्तव में पुत्र में विश्वास रखने वाले हो? तुम नहीं हो। आखिरी दिनों में, इस वचन का "जो पुत्र पर विश्‍वास करता है, अनन्त जीवन उसका है" साक्षात्कार होगा और यह सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही होगा जो उन्हें अनन्त जीवन देगा। यह स्पष्ट है, है ना? तुम्हें बाइबल के वचनों को गलत नहीं समझना चाहिए। अब सर्वशक्तिमान परमेश्वर आ गया है और तुमने उसके आखिरी दिनों के कार्य को स्वीकार कर लिया है, लेकिन प्रभु यीशु ने इस बारे में हमसे क्या वादा किया है? प्रभु यीशु की भविष्यवाणी में, क्या तुम इस बात की पुष्टि करने के लिए कोई आधार पा सकते हो कि जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार करते हैं, वे अनन्त जीवन प्राप्त करेंगे और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर पाएँगे? फिल्म मेरा प्रभु कौन है इन सवालों के जवाब देती है, इसलिए मैं यहाँ कुछ और नहीं कहूँगा।

मैं परमेश्वर के वचन के इस अंश के बारे में सहभागिता जारी रखूँगा, जो कि आखिरी दिनों के मसीह के द्वारा कहा गया था। प्रभु यीशु द्वारा मुक्ति के कार्य को पूरा करने और मृत्यु से पुनरुत्थान कर स्वर्ग में आरोहित होने को दो हजार साल बीत चुके हैं। तब से इन दो हजार वर्षों के दौरान किसी भी समय, क्या हमने परमेश्वर की आवाज सुनी है? हमने नहीं सुनी है। उन दो हजार वर्षों के दौरान, मानव जाति ने प्रभु यीशु का नाम फैलाया है, और उसके लिए गवाही दी है, अनुग्रह के युग के दौरान कलीसिया का जीवन जीते हुए। प्रभु में विश्वास करने वाले सभी लोगों ने परमेश्वर की कृपा प्राप्त की है, और पापों की क्षमा और परमेश्वर के अनुग्रह की बहुतायत के साथ आने वाली शांति और आनंद का उपभोग किया है। परन्तु प्रभु यीशु के अंतिम दिनों में प्रकट होने के बाद, उसने "वचन देह में प्रकट होता है" में कई वचनों को अभिव्यक्त किया है। आज हम "तुम्हें मसीह की अनुकूलता में होने के तरीके की खोज करनी चाहिए" पढ़ते हैं, जो "वचन देह में प्रकट होता है" में उपलब्ध है। इस अंश को सुनने के बाद, तुम्हें कैसा महसूस होता है? प्रभु यीशु, जो दो हजार से अधिक वर्षों पहले चला गया, वापस आ गया है और उसने हमसे इतने सारे वचन कहे हैं। तुम्हें लगता है कि यह परमेश्वर की आवाज़ है। तुम ऐसा क्यों कह रहे हो? हम यह कैसे कह सकते हैं कि यह परमेश्वर की आवाज़ है? दरअसल, ऐसा कहना कोई आसान बात नहीं है। ऐसी एक भावना होती है कि, "आह, ये वचन परमेश्वर के शब्द हैं, लोग तो ऐसी बातें नहीं कह सकते, वे मानव और परमेश्वर के बीच के संबंधों को, मानवता की वर्तमान स्थिति, और मानवता की हड्डियों के अंदर निहित चीज़ों को पूरी तरह से उघाड़ नहीं सकते हैं।" तुम बस महसूस करते हो कि कोई मनुष्य ऐसी बातें नहीं कह सकता है, केवल परमेश्वर ही ऐसे वचनों को बोलने में सक्षम है, और फिर तुम स्वीकार करते हो कि, "हाँ, ये परमेश्वर के वचन हैं, वह परमेश्वर की आवाज़ है।" लेकिन क्या यह वाकई इतना सरल है? क्या तुम मानते हो कि परमेश्वर के वचनों का यह अंश संतों की सभी पिछली पीढ़ियों के लिए उसका न्याय है? ये वचन भ्रष्ट मानव जाति के लिए परमेश्वर का न्याय है, और वे मसीह के तख़्त के सामने परमेश्वर के घराने के सभी ऐतिहासिक विश्वासियों को कहे गए न्याय के वचन हैं।

जो लोग प्रभु में विश्वास करते हैं, चाहे कितने ही साल से वे विश्वास करते रहे हों, उनके पास एक स्वप्न होता है। वह स्वप्न क्या है? स्वर्गीय राज्य का स्वप्न। क्या प्रभु में विश्वास करने वाले लोगों का उद्देश्य स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना नहीं है? क्या वे सभी स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने का स्वप्न नहीं देखते? एक कहता है, "स्वर्गीय राज्य का मेरा सपना ऐसा है," और दूसरा कहता है, "स्वर्गीय राज्य का मेरा सपना वैसा है।" और उनमें से प्रत्येक का मानना ​​है कि वह स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकता है। इस प्रकार, लोग स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के लिए प्रभु के आने का इंतजार करते हैं, ताकि उनका सपना सच हो जाए। परमेश्वर के वचनों का वह अंश जो कहता है "तुम्हें मसीह की अनुकूलता में होने के तरीके की खोज करनी चाहिए", उन सभी लोगों को जो स्वर्गीय राज्य का सपना देखते हैं, एक उत्तर और स्पष्टीकरण देता है। इस प्रवचन को पढ़ने के बाद, तुम को अपने स्वप्न के साथ कैसे व्यवहार करना चाहिए? क्या सपना बिखर जाता है, क्या यह पूरी तरह से गायब हो जाता है, या यह सिर्फ हटाकर रख दिया जाता है? क्या सपना सच हो सकता है? एक उत्तर होना चाहिए, है ना? यहीं पर परमेश्वर लोगों को एक राह देता है—“तुम्हें मसीह की अनुकूलता में होने के तरीके की खोज करनी चाहिए" यदि तुम सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अंतिम दिनों के मसीह, को स्वीकार करते हो, तो तुम कहते हो, "मैं उसके न्याय और उसकी ताड़ना को स्वीकार करता हूँ; चाहे परमेश्वर जो भी प्रकट करे, मुझे इसे स्वीकार करना ही होगा, मुझे इसके प्रति समर्पण करना ही होगा, मैं परमेश्वर की सभी माँगों को पूरा करूँगा, मैं परमेश्वर के वचनों को खाऊँगा और पीऊँगा, और परमेश्वर के वचनों का पालन करूँगा।" यदि तुम मसीह के तख़्त के सामने न्याय और ताड़ना को समर्पित हो सकते हो, यदि तुम परमेश्वर के सभी कार्यों के प्रति समर्पण कर सकते हो, तो परमेश्वर स्वर्गीय राज्य के तुम्हारे सपने को मान लेगा और तुम्हारे सपने को सच कर देगा। क्या तुम्हें लगता है कि यह सच है? कुछ लोग कहते हैं कि परमेश्वर केवल हमारे सपने को समाप्त करने के लिए, जानबूझकर हमारे सपने को तोड़ देने के लिए, और अंत में हमें नरक में निन्दित करने के लिए आया है। क्या बात ऐसी है? ऐसा क्यों है कि बहुत सारे लोग अंतिम दिनों के मसीह के न्याय और उसकी ताड़ना को स्वीकार करने की हिम्मत नहीं करते? कुछ लोग अवचेतन मन में सोचते हैं कि यदि वे अंतिम दिनों के मसीह के न्याय को स्वीकार करते हैं और इसे मान लेते हैं, तो उन्हें दोषी ठहराया जाएगा और परिणामस्वरूप उन्हें नरक में डाल दिया जाएगा, और स्वर्गीय राज्य का उनका सपना टूट जाएगा। लेकिन अगर वे इस न्याय को स्वीकार नहीं करते हैं, तो सपना नहीं टूटेगा और वे अभी भी उम्मीद कर सकते हैं कि यह सच हो जाएगा। क्या ऐसे धार्मिक लोग नहीं हैं जो इस तरह से सोचते हैं? ऐसे लोग हैं। ऐसा व्यक्ति मसीह के तख़्त के सामने न्याय को स्वीकार नहीं करता, आखिरी दिनों के परमेश्वर के न्याय को स्वीकार नहीं करता। "हम प्रभु में विश्वास करते हैं, अपने पापों की क्षमा पर विश्वास करते हैं, तो हमारा न्याय क्यों किया जाए? क्या परमेश्वर द्वारा बोले गए वचनों का कोई मोल नहीं है? यदि क्षमा है, तो न्याय क्यों होगा? क्या यह हमारे साथ पुराना हिसाब ठीक करना नहीं है?" तो अंतिम दिनों के न्याय का क्या अर्थ है? प्रभु यीशु ने हमारे पापों को क्षमा किया है, तो न्याय का अर्थ क्या है? तुम इसे कैसे समझते हो? न्याय पुराने खातों को पलटना नहीं है, न ही अतीत में किए गए पापों की खुदाई कर हमारी निंदा करना है। हमारे साथ न्याय किया जा रहा है क्योंकि हम शैतान के द्वारा भ्रष्ट हुए हैं; हमारी शैतानी प्रकृति, हमारे शैतानी सार और हमारे शैतानी स्वभाव के कारण हमारे साथ न्याय किया जाता है। जो कुछ भी हमारे अंदर ऐसा है जो कि परमेश्वर के साथ अनुकूल नहीं, उसी की वजह से हमारे साथ न्याय किया जाता है। अंतिम विश्लेषण में, न्याय हमें शुद्ध करने के लिए होता है, न्याय का परिणाम हमें शुद्ध करना है; न्याय हमारी शैतानी प्रकृति और हमारे शैतानी स्वभाव को, हमारी उन चीजों को जो अशुद्ध हैं, शुद्ध करता है। इसलिए, जब परमेश्वर न्याय का कार्य करता है, तो वह पुराने खातों का निपटारा नहीं कर रहा है या पिछले पापों के लिए फिर से मनुष्य की निंदा नहीं कर रहा है, वह मनुष्य को उसकी शैतानी प्रकृति और उसके शैतानी स्वभाव से परिशुद्ध कर रहा है। तुम्हें तुम्हारे शैतानी स्वभाव से शुद्ध करने के लिए, परमेश्वर न्याय करता है और परमेश्वर समस्या के सार को प्रकट कर स्पष्ट रूप से तुम को बताता है। अगर वह तुम्हारी भ्रष्ट प्रकृति और इस भ्रष्टता के मूल कारण को स्पष्ट रूप से न बताता, तो क्या तुम इन्हें पहचान पाते? इन्हें पहचानने में कोई भी सक्षम नहीं होता। लोग चतुर हैं और उनके पास अच्छे दिमाग हैं, लेकिन वे आध्यात्मिक दुनिया को भेद नहीं सकते हैं और सीधे सत्य को नहीं समझ सकते हैं। यह एक तथ्य है। कुछ लोग कहते हैं, "क्या यह सही है कि लोग सच्चाई को वास्तव में समझ नहीं सकते हैं? यदि हम सच्चाई को समझ नहीं सकते हैं, तो हमें परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने के लिए और सच्चाई के बारे में सहभागिता करने के लिए क्यों कहा जाता है,? क्या यह एक विरोधाभास नहीं है?" तुम को क्या लगता है? क्या यह एक विरोधाभास है? नहीं। सत्य को समझना लोगों की सहज प्रवृत्तियों पर निर्भर रहना नहीं है। लोगों को ज्ञान और विज्ञान जैसी बाहरी चीजों को समझने के लिए, उनका अध्ययन करना होता है और फिर वे कोई परिणाम प्राप्त कर सकते हैं, कुछ बातों को समझने के लिए। लेकिन जब सत्य के रहस्य की बात आती है, तो मनुष्य शक्तिहीन है। इसलिए, वैज्ञानिक लोग कई सालों तक विज्ञान का अध्ययन कर सकते हैं, लेकिन वे परमेश्वर की खोज नहीं करते हैं, वे परमेश्वर को नहीं जानते हैं। परमेश्वर में विश्वास करने वाले धर्मशास्त्र के विशेषज्ञ कई सालों से बाइबल का अध्ययन कर सकते हैं, लेकिन वे सत्य को नहीं समझते हैं, वे परमेश्वर को नहीं जानते हैं। वह एक बात कौन-सी है जिसे हम इसके माध्यम से अच्छी तरह से समझ सकते हैं? यदि लोग बाइबल का अध्ययन करने और मानव जीवन का अनुभव करने के लिए स्वयं पर ही निर्भर हैं, तो वे सत्य को समझने में सक्षम नहीं हैं, वे परमेश्वर को नहीं जान पाते हैं। सच्चाई को समझने के लिए लोगों को किस पर निर्भर होना चाहिए? वे पवित्र आत्मा के कार्य पर निर्भर हैं! क्यों, पवित्र आत्मा स्वयं परमेश्वर ही है! केवल पवित्र आत्मा के कार्य के आधार पर लोग सत्य को समझ सकते हैं। यदि पवित्र आत्मा लोगों को प्रबुद्ध नहीं करता है और उन्हें प्रेरणा नहीं देता, और उन्हें प्रकाश नहीं दिखाता है, तो वे सत्य को कभी नहीं समझेंगे। यह प्रेरणा ही है जो कि वैज्ञानिक विकास को चलाता है। प्रेरणा के बिना, मानव जाति का काम पसीने का उत्पादन तो करता है, लेकिन अन्यथा बेकार है। यदि वैज्ञानिक विकास प्रेरणा पर निर्भर करता है, तो मानवता की सच्चाई की समझ और परमेश्वर का ज्ञान प्रेरणा पर और भी अधिक निर्भर हैं और प्रेरणा देना पवित्र आत्मा का कार्य है। अगर हम इन वचनों की इस तरह से सहभागिता नहीं करते हैं, तो कोई भी नहीं समझ सकता है। मैंने अपने आप इसे नहीं किया। यदि पवित्र आत्मा ने मुझे प्रबुद्ध नहीं किया होता, तो मैं समझ नहीं पाया होता।

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परमेश्वर के जिन वचनों पर आज हम सहभागिता कर रहे हैं, तुम्हें उन्हें अच्छी तरह से प्रार्थना की तरह पढना चाहिए। परमेश्वर का निर्णय, परमेश्वर की ताड़ना, वे आखिरकार क्या हासिल करना चाहते हैं? उनका उद्देश्य यह है कि हम मसीह के साथ सही मायने में अनुकूल हो सकें। यदि हम मसीह के साथ अनुकूल होते हैं, तो हम परमेश्वर के साथ भी अनुकूल हैं। मसीह के साथ अनुकूल होना, परमेश्वर के साथ अनुकूल होना है, क्योंकि मसीह परमेश्वर का देह्धारण है, अर्थात् स्वयं परमेश्वर ही कह रहा है, और अपनी आवाज़ में बोल रहा है। उन कई अवधारणों के बावजूद जिसके साथ तुम इस देह्धारण को देखते हो, तुम्हारा यह देखना कि यह देह्धारण कितना सामान्य है, यह देखना कि यह तो केवल एक बहुत सामान्य व्यक्ति है, फिर भी यह देहधारण परमेश्वर की आत्मा का देहधारण है, सच्चाई का देहधारण है। चूँकि मसीह बाहर से सामान्य मानवता ओढ़े हुए है, कोई भी इससे परे उसके सार को नहीं देख सकता है, यह कहते हुए: "तुम्हारी मानवता तो बहुत सामान्य है। चाहे मैं कैसे भी देखूँ, तुम केवल एक मनुष्य ही प्रतीत होते हो, तुम एक सामान्य व्यक्ति ही नज़र आते हो! तुम केवल एक साधारण और सामान्य व्यक्ति हो, तुम परमेश्वर कैसे हो सकते हो? मैं कैसे समझ नहीं सकता?" यह एक सामान्य सवाल है उनके लिए जो परमेश्वर के देहधारण में विश्वास करते हैं। यदि ऐसा प्रश्न मौजूद होता है, तो इस तरह की एक धारणा भी तुम्हारे भीतर मौजूद होनी चाहिए, इसलिए क्या तुम कोई ऐसे व्यक्ति हो जो मसीह के साथ अनुकूल है? तुम केवल मसीह की सामान्य मानवता देख सकते हो, तुम मसीह के दिव्य सार को नहीं जानते हो, और यही तुम्हारा अंत होगा। परमेश्वर कहता है: "देहधारण के महत्व को दो देहधारण पूरा करते हैं" इन वचनों का क्या अर्थ है? दस साल के अनुभव के साथ भी, तुम इन वचनों को समझ नहीं पाओगे। यद्यपि मेरे पास अनुभव के बीस, तीस वर्ष हैं, मैंने भी केवल इस स्तर तक ही समझ प्राप्त की है। कोई कहता है: "बहुत सारे लोग प्रभु यीशु के चरण के दौरान प्रभु में विश्वास करते थे। क्या प्रभु में विश्वास करने का अर्थ यह मान लेना नहीं था कि प्रभु यीशु परमेश्वर है, कि वह देहधारी परमेश्वर है? क्या वे सभी नहीं मानते थे कि प्रभु यीशु ही मसीह है, परमेश्वर का पुत्र?" क्या ऐसे लोग थे जिन्होंने प्रभु यीशु को परमेश्वर के रूप में माना? क्या किसी को पता था कि प्रभु यीशु सच्चे परमेश्वर का प्रकटन है? क्या ऐसी कोई समझ थी? नहीं। इसलिए, जब वे प्रभु यीशु से प्रार्थना करते हैं, "हे प्रभु यीशु, तुम प्रभु हो, तुम परमेश्वर के पुत्र हो, तुम मसीह हो," बस इतना ही है जो वे कहते हैं। वे यह नहीं कहते हैं, "तुम परमेश्वर हो। प्रभु यीशु मसीह, तुम पिता परमेश्वर हो, तुम यहोवा परमेश्वर हो।" इस तरह की प्रार्थनाएँ बहुत कम हैं, और उन लोगों के लिए भी जो इस तरह के शब्दों को कह सकते हैं, उनके दिलों में भी ऐसी समझ नहीं है। इसलिए, अनुग्रह के युग के दौरान, जब देहधारी परमेश्वर ने छुटकारे का कार्य पूरा किया, क्या उसने वास्तव में लोगों को परमेश्वर को जान लेने की अनुमति दी? नहीं। कोई भी परमेश्वर को नहीं जानता था। इसलिए, उस चरण के दौरान, पवित्र आत्मा केवल इस प्रकार गवाही देने में सक्षम था, "यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिस से मैं प्रसन्न हूँ: इस की सुनो।" (मत्ती 17:5). अगर उसने कहा होता, "प्रभु यीशु परमेश्वर है", तो क्या लोगों के लिए यह विश्वास करना आसान होता? उस चरण के दौरान, पवित्र आत्मा केवल इस प्रकार गवाही देने में सक्षम था। पवित्र आत्मा को इस प्रकार गवाही क्यों देनी चाहिए? क्योंकि छुटकारे का कार्य पूरा करना ही पवित्र आत्मा के कार्य का वह चरण था, इसलिए मनुष्यों से की गई माँग बहुत अधिक नहीं थी। "तुम्हें प्रभु यीशु को जानना चाहिए: वह पिता है, वह एक सच्चा परमेश्वर है जिसने आकाश और पृथ्वी और सारी चीजों को बनाया है, वही सृष्टिकर्ता है।" यह वह नहीं था जो उस चरण को पूरा करना था, इसका उद्देश्य तो केवल छुटकारे का कार्य पूरा करना था। यह पर्याप्त था कि तुम प्रभु यीशु के छुटकारे को जानते थे, कि तुमने इसे स्वीकार किया था, तब तुम प्रभु यीशु से प्रार्थना कर सकते थे और पाप स्वीकार करते थे, ताकि पश्चाताप कर उसके पास लौट सको, उसके लिए गवाही दे सको, और परमेश्वर ने अपना काम पूरा कर लिया है। उस चरण के दौरान, मनुष्यों से परमेश्वर की माँगें अधिक नहीं थीं, लेकिन वे इस चरण के दौरान अलग हैं। इस चरण के दौरान, जब परमेश्वर अपनी आवाज़ में कहता है, तो क्या उसने ऐसे वचन कहे हैं कि "सर्वशक्तिमान परमेश्वर परमेश्वर का पुत्र है, वह देहधारी मसीह है"? पवित्र आत्मा अब इस प्रकार गवाही नहीं दे रहा है; वह प्रत्यक्ष रूप से गवाही दे रहा है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर एक सच्चे परमेश्वर का प्रकटन है। वही पहला और अंतिम है, वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर है, वह स्वामी है जिसने आकाश और पृथ्वी और सब कुछ बनाया है। प्रत्यक्ष गवाही। इसलिए, जब अंतिम दिनों का मसीह आता है, तो परमेश्वर क्या पूरा करना चाहता है? सारी मानव जाति परमेश्वर के अधीन होनी चाहिए। जब परमेश्वर अंतिम दिनों में आता है, वह राज्य के साथ आता है, तो लोगों के एक समूह को परिपूर्ण करेगा, ताकि मसीह का राज्य पृथ्वी पर प्रकट हो सके। जो लोग मसीह और परमेश्वर के साथ भोज में भाग लेते हैं, वे परमेश्वर का शुद्धिकरण और परमेश्वर की पूर्णता प्राप्त करेंगे। इन लोगों को तब राज्य के भीतर लाया जाएगा, राज्य की प्रजा बनने के लिए। यह अंतिम दिनों के दौरान परमेश्वर के न्याय के कार्य का दर्शन है, जो परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य भी है, वह तथ्य जो कि परमेश्वर अंत में प्राप्त करेगा—ताकि मसीह का राज्य धरती पर प्रकट हो सके।

शैतान की बुरी ताकतें इस तरह परमेश्वर के कार्य पर हमला क्यों करती हैं, परमेश्वर के कार्य का आंकलन करते हुए? क्यों बड़े लाल अजगर की बुरी ताकतें उन्मत्त होकर परमेश्वर पर हमला और उसकी निंदा कर रही हैं, और परमेश्वर की कलीसिया को उत्पीडित कर रही हैं? क्यों शैतान की सभी बुरी ताकतें, धार्मिक मंडलियों के अंदर मसीह-विरोधी बिरादरी सहित, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की निंदा करती हैं? ऐसा इसलिए है क्योंकि शैतान जानता है कि इसका अंत निकट है, कि परमेश्वर पहले से ही अपने राज्य को सुरक्षित कर चुका है और वह आ गया है, और यह कि अगर शैतान परमेश्वर के साथ एक निर्णायक लड़ाई में नहीं जुटता है तो वह तुरंत नष्ट हो जाएगा। क्या तुमने इस तथ्य को समझा है? चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार से एक बार उन्मादी निंदा को सुनते ही, कई भ्रमित लोग तय करते हैं कि यह सही रास्ता नहीं है; एक बार जब उन्होंने पादरियों और धार्मिक मंडलियों के ज्येष्ठों (एल्डरों) से व्यापक निंदा देख ली है, तो वे तय करते हैं कि यह सही रास्ता नहीं है। ये लोग किन तरीकों से भ्रमित हैं? क्या वे दुनिया के अंधेरे और बुरे तत्वों को देख सकते हैं? बाइबिल ने कहा, "ज्योति अन्धकार में चमकती है, और अन्धकार ने उसे ग्रहण न किया।" (यूहन्ना 1:5). क्या वे वास्तव में इन शब्दों को समझते हैं? "सारा संसार उस दुष्‍ट के वश में पड़ा है।" (1 यूहन्ना 5 :19) क्या वे इन शब्दों का सही अर्थ जान सकते हैं? वे कुछ भी साफ़-साफ़ देखने में असमर्थ हैं। वे सोचते हैं कि यदि यह सही रास्ता हो, अगर परमेश्वर आ गया है, तो चीनी सरकार को इसका स्वागत करना चाहिए, धार्मिक मंडली को इसका स्वागत करना चाहिए, और वह इसे सही मार्ग बना देगा। यह किस तरह का तर्क है? क्या यह शैतान का तर्क नहीं है? कुछ लोग परमेश्वर के कार्य का अध्ययन करते हैं, वे पहले देखते हैं कि क्या विश्व सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया, पूर्वी लाइटनिंग, का स्वागत करता है और उससे सहमत है या नहीं, क्या धार्मिक मंडली इसका स्वागत करती है और इसके साथ सहमत है या नहीं। "अगर विश्व इसका स्वागत करता है, और विशेषकर, अगर चीनी कम्युनिस्ट सरकार घोषित करती है कि यही सही रास्ता है, तभी हम इसमें विश्वास कर सकते हैं। यदि सभी पादरी और धार्मिक मंडली के बुजुर्ग यह कहते हैं कि यह सच है, कि यह प्रभु यीशु की वापसी है, तभी हम इसे स्वीकार कर सकते हैं।" इस तरह के कई भ्रमित लोग हैं। कुछ लोग, जैसे ही वे परमेश्वर के लिए काम आना चाहते हैं, बड़ा लाल अजगर और शैतान उनकी परीक्षा लेने आते हैं: "सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया लोगों का अपहरण करती है। यदि तुम सर्वशक्तिमान परमेश्वर पर विश्वास करते हो, तो तुम छोड़ कर जा नहीं पाओगे, अन्यथा वे तुम्हारी आँखें निकाल लेंगे, तुम्हारे कान काट लेंगे, और तुम्हारी टाँगें तोड़ देंगे।" मुझे बताओ, अगर वास्तव में यह बात है, तो इस दुनिया में कितने लोगों की पहले से ही आँखें निकाल दी गई होंगी और उनके कान कट चुके होंगे? क्या तुमने ऐसा एक मामला भी देखा है? मुझे बताओ, परमेश्वर के लिए जिन लोगों ने योगदान दिया है, क्या तुमने उनमें से किसी एक व्यक्ति को भी देखा है जिसका अपहरण कर लिया गया हो, जिसे परमेश्वर के लिए काम आने के लिए मजबूर किया गया था क्योंकि अन्यथा वे नहीं लौट पाएंगे? यदि उनका वास्तव में अपहरण हुआ था, तो क्या उनका काम और उनका प्रचार प्रभावी होगा? एक बार जब कोई सुलझे दिमाग वाला व्यक्ति इस मामले पर विचार करता है, तो वह इस निष्कर्ष पर आ जाएगा कि: "मामला यही है, यह सीसीपी द्वारा गढ़ी गई अफवाह है, यह सीसीपी द्वारा कहा गया एक झूठ है। दुष्ट शैतान वास्तव में अफवाहों को फैलाने में निपुण है, मैं सच्चाई को कैसे नहीं देख पाया?" कुछ लोग इन बातों पर विश्वास नहीं करते हैं, जबकि अन्य लोग करते हैं। कुछ लोग, जब वे परमेश्वर के लिए काम आना चाहते हैं, तो वे सुनते हैं कि "सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया लोगों का अपहरण कर लेती है। यदि तुम्हारा उनके द्वारा अपहरण हो जाता है, तो उम्मीद नहीं है कि तुम वापस आ सकोगे। अगर तुम वापस आ भी गए, तो कम से कम, तुम्हारी आँखें निकाल ली जाएँगी, और तुम्हारे कान काट दिए जाएँगे।” एक बार जब वे यह सुनते हैं, तो वे परमेश्वर के लिए काम आने की और हिम्मत नहीं करते। "मैं खुद को समर्पित नहीं कर सकता। यह खतरनाक है, मैं अपना जीवन खो सकता हूँ!" और वे छोड़ जाते हैं। क्या इन लोगों में समझने की क्षमता है? कुछ लोग यह भी कहते हैं: "मैं देखता हूँ कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन परमेश्वर के वचन हैं, परमेश्वर की आवाज़ है। मैंने मूल रूप से यह निर्धारित किया है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन सच्चे हैं, लेकिन यह संगठन, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया, क्या है? मैंने अभी तक इसकी अच्छी तरह से जाँच नहीं की है। मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की कोई समझ नहीं है। क्या वे वास्तव में लोगों का अपहरण करने में सक्षम हैं? अगर वे मेरा अपहरण करें, तो क्या वे मेरी आँखों को निकाल लेने और मेरे कानों को काट देने में सक्षम हैं?" यहीं आकर वे भ्रमित हो जाते हैं। वे कहते हैं: "मैं नहीं जा सकता। अगर उन्होंने मेरी आँखों को निकाल लिया और मेरे कान काट दिये, तो मैं अपने बाकी जीवन के लिए अपाहिज हो जाऊँगा। मेरे लिए अभी भी सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया पर लटका हुआ एक प्रश्न-चिह्न है, मैं इसे नहीं समझ पाता; परमेश्वर की उक्तियों के बारे में, मैंने मूल रूप से उन्हें सच मान लिया है कि वे परमेश्वर की ही आवाज़ हैं, कि उनमें सच्चाई है।" वे अपनी परीक्षा में बहुत सावधान हैं, इसे दो चरणों में करते हुए: सबसे पहले सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों की जांच करो, और देखो कि क्या वे परमेश्वर के वचन हैं। अगर उन्होंने स्वीकार कर लिया कि ये वास्तव में परमेश्वर के वचन हैं, तो वे आगे इसकी जाँच करते हैं कि क्या सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया एक वास्तविक कलीसिया है। अगर सर्वशक्तिमान देवता की कलीसिया एक आपराधिक संगठन हो, जबकि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन वास्तविक हैं, तो क्या वह फिर भी उनके लिए एक समस्या खड़ी नहीं करता है? क्या यह संभव है? यदि यह बात सही हो, तो सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया एक वास्तविक कलीसिया नहीं, बल्कि एक आपराधिक संगठन है। फिर कौन उपदेश दे रहा है और परमेश्वर के वचनों की गवाही देता है? कौन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के लिए गवाही देता है? अगर चीजें ऐसी हों जैसी कि उन्होंने कल्पना की है, अर्थात सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया जो परमेश्वर के वचनों का प्रचार कर रही है और सर्वशक्तिमान परमेश्वर के लिए गवाही दे रही है, ऐसे लोगों का एक संगठन है, जो परमेश्वर के नहीं हैं, तो क्या सर्वशक्तिमान परमेश्वर का कार्य सिर्फ एक ढकोसला नहीं है? परमेश्वर कैसे एक आपराधिक संगठन के लोगों को, मनुष्यों के एक संगठन के लोगों को, उसकी स्तुति करने और उसके लिए गवाही देने की इजाजत दे सकता है? क्या यह परमेश्वर का अपमान नहीं है? क्या परमेश्वर खुद को अपमानित कर सकता है? कुछ लोग इस मामले के आर-पार देखने में असमर्थ हैं। उन्होंने परमेश्वर के वचनों को स्वीकार किया है, फिर भी वे यह स्पष्ट रूप से नहीं देख पा रहे हैं कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया एक किस प्रकार की कलीसिया है, और वे इसमें विश्वास करने की हिम्मत नहीं करते। सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के लोग कहते हैं: "क्या हम तुमसे मिलकर बात कर सकते हैं? आओ हम सहभागिता करें।" "मैं इस समय व्यस्त हूँ, मेरे पास समय नहीं है", जब कि वे सोच रहे हैं: "मैं तुम्हारे साथ संपर्क में आना नहीं चाहता हूँ। अगर तुम्हारे साथ संपर्क में आने के बाद तुम्हारी कलीसिया के लोग मेरा अपहरण कर लेते हैं, तो मैं क्या करूँगा?" ये लोग उन संतों के साथ तुलना के करीब नहीं आ सकते हैं, जिन्होंने सदियों से परमेश्वर के लिए खुद को शहीद किया है। जब प्रभु यीशु ने उन्हें प्रचार करने के लिए भेजा था, तो ऐसा लगता था कि भेड़ियों के बीच मेमनों को फेंक दिया गया था, और उन लोगों ने परमेश्वर के लिए खुद को शहीद करने की हिम्मत की। अब ये लोग सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया को एक आपराधिक संगठन के रूप में देखते हैं। वे डरपोक और भयभीत हो गए हैं। क्या परमेश्वर इससे निराश है? लोगों में विश्वास की कमी है और वे शैतान की बात सुनते हैं, यह मनुष्य की एक त्रासदी है।

आदम और हव्वा अदनवाटिका में बहुत खुश थे, परमेश्वर के प्रति आज्ञापालन करते हुए और परमेश्वर की आवाज़ सुनते हुए, लेकिन आखिर में उनके पाप करने का कारण क्या बना? परमेश्वर द्वारा उनसे बात करने के बाद, शैतान आया, उनको प्रलोभित करने के लिए कुछ शब्द कहे, और वे धोखा खा गए, वे भूल कर गए। उनकी भूल के बाद, वे परमेश्वर से कट गए थे, परमेश्वर ने उनसे और बात नहीं की, परमेश्वर ने अपने चेहरे को उनसे छिपा लिया। क्या यह मनुष्य के लिए त्रासदी नहीं है? सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को सुनने के बाद, कई लोगों ने कहा, "ओह, यह वास्तव में परमेश्वर की आवाज़ है, यह वास्तव में सच है। ये शब्द इतने व्यावहारिक हैं, प्रभु यीशु के चरण के दौरान इतने सारे शब्द नहीं कहे गए थे।" एकाएक, ऐसा लगता था जैसे वे एक बार फिर परमेश्वर के आलिंगन में वापस आ गए हों, और उन्होंने आनंदित और संतुष्ट महसूस किया था। किसने सोचा होगा कि इसी क्षण में शैतान का प्रलोभन आ जाएगा: "क्या तुमने पूर्वी बिजली के बारे में सुना है? यह एक आपराधिक संगठन है, यह एक पंथ है। यदि तुम उनके द्वारा प्रचारित सुसमाचार पर विश्वास नहीं करते हो, तो वे तुम्हारी आँखें निकाल लेंगे और तुम्हारे कान काट लेंगे। वे भयावह हैं! इसलिए, अगर तुम पूर्वी बिजली के संपर्क में आते हो, तो तुमको सावधान रहना चाहिए, और तुमको कभी भी उनकी धोखाधड़ी का शिकार नहीं होना चाहिए।" और शैतान के इस प्रलोभन से, ये लोग फँस गए हैं। वे स्तब्ध हैं, और वे अब परमेश्वर के लिए काम में आने की हिम्मत नहीं करते। इसे कहते हैं "अपने संपूर्ण जीवन में चतुर रहना, लेकिन मूर्खता के एक क्षण में बर्बाद हो जाना।" क्या पूरे ताइवान में एक भी व्यक्ति ऐसा है जिसकी आँखें निकाल ली गयी हैं और जिसके कान काट दिए गए हैं? पूरे ताइवान में ऐसा एक भी मामला नहीं है। सम्पूर्ण मुख्यभूमि चीन में आँखें निकालने और कान काटने वाला एक भी किस्सा नहीं है। अगर ऐसा एक भी मामला हो, तो क्या सीसीपी इसे जाने देगी? उसने समस्त मीडिया को पूरी दुनिया में घोषणा करने के लिए नियुक्त कर दिया होता, यहाँ तक ​​कि कई दिनों के लिए इस तरह की घटनाओं का उत्साहपूर्वक प्रचार किया होता। ऐसा एक भी मामला नहीं मिल सकता है। सीसीपी हर जगह व्याप्त है, फिर भी शैतान द्वारा प्रलोभित उन लोगों को सीसीपी की असली पहचान का पता नहीं है, वे सीसीपी द्वारा किए गए सभी पापों, उसके किये सभी बुरे कर्मों के आर-पार नहीं देख पा रहे हैं। सीसीपी के मीडिया ने जितना भी कहा है, उसमें लेशमात्र भी सच्चाई नहीं है, फिर भी ये लोग इसकी असलियत को नहीं देख पा रहे हैं। तुम कहते हो कि परमेश्वर को जानना आसान नहीं है, क्योंकि परमेश्वर आत्मा है, क्योंकि परमेश्वर रहस्यमय है; लेकिन सीसीपी को जानना, शैतान को जानना, यह चीज़ तो ऐसी है ना जिसे इंसान जान सकता है, है ना? मैंने संयुक्त राज्य अमरिका (अमरिकियों) से परमेश्वर के चुने हुए कई लोगों के कुछ शब्दों को सुना, उन्होंने कहा: "हम सभी संयुक्त राज्य अमरिका के भाग्य से चिंतित हैं। संयुक्त राज्य का उत्थान और पतन हमारे लिए घनिष्टता से सम्बद्ध हैं। हमें यू.एस. के चुनावों के दौरान बोलना चाहिए, हमें बाहर जाना चाहिए और वोट देना चाहिए। यदि हम खलनायकों और शैतान की बुरी ताकतों को सत्ता में आने की इजाजत देते हैं, तो हम भी संकट में होंगे, इसलिए हमें चुनाव में भाग लेना और बोलना चाहिए। क्या यह राजनीति में भाग लेना है?" संयुक्त राज्य अमरिका से परमेश्वर के चुने गए लोगों ने एक सवाल उठाया है, और जब मैंने यह सुना तो मुझ पर इसका बहुत प्रभाव पड़ा। मैंने उन्हें बताया कि चीनी लोगों के पास ऐसे अधिकार नहीं हैं। चीन के नागरिको, क्या तुम्हें वोट देने का अधिकार है? तुम लोग सरकारी अधिकारियों का चुनाव करना चाहते हो, लेकिन क्या तुम्हारे पास अधिकार हैं? तुम्हारे पास ऐसे अधिकार नहीं हैं। इसलिए, चीनी लोगों को केवल करों का भुगतान करने का अधिकार है, लेकिन उनके पास वोट देने का अधिकार नहीं है। उनके पास नागरिकों के रूप में कोई अधिकार नहीं है, उनके पास धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार भी नहीं है। यदि तुम कहते हो कि तुम सही मार्ग की तलाश कर रहे हो, कि तुम सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार करते हो, कि तुम परमेश्वर के कार्य की गवाही देते हो, कि तुम परमेश्वर की गवाही देने के लिए काम आते हो, तो शैतान तुम्हें दोषी ठहराएगा। अमरिकियों के पास नागरिकों के रूप में अधिकार हैं, उनका वोट देने का अधिकार है, उनके पास बोलने की स्वतंत्रता का अधिकार है। संयुक्त राज्य अमरिका चीनी लोगों की नज़रों में अलग है, संयुक्त राज्य अमेरिका वास्तव में लोकतांत्रिक देश है, जबकि चीनी लोगों के पास ऐसे अधिकार नहीं हैं। हालांकि, अमरिकियों का कहना है, हमारे नागरिकों का चुनाव में भाग लेना, और वे सभी चीजें जो हम नागरिक होने के अधिकारों के अनुसार करते हैं, क्या उन चीज़ों का अर्थ राजनीति में भाग लेना है? ये बातें राजनीति में भाग लेना नहीं हैं, ये चीजें खुद नागरिकों के अधिकार हैं। नागरिकों का अपने अधिकारों का प्रयोग करना और अपने कर्तव्यों को पूरा करना, ये राजनीति में भाग लेना नहीं है, क्या यह सही नहीं है? अनुग्रह के युग के दौरान, प्रभु यीशु ने कहा कि हमें पृथ्वी का प्रकाश और नमक होना चाहिए, इसका क्या अर्थ है? पृथ्वी के प्रकाश और नमक होने का अर्थ है परमेश्वर के लिए गवाही देना, संतों की भद्रता को जीना, उस तथाकथित वास्तविकता को परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीना जिसकी परमेश्वर ने माँग की है। यही धरती का प्रकाश और नमक बनना है। संयुक्त राज्य अमरिका के परमेश्वर के चुने हुए लोगों में न्याय की भावना है, इसलिए वे इसकी माँग करते हैं, इसलिए उन्हें इस जिम्मेदारी को उठाना है। ऐसे लोग जब परमेश्वर के कार्य को स्वीकार करते हैं, तो वे निश्चित रूप से कई सच्चाइयों को समझ सकते हैं, और वे भविष्य में परमेश्वर के लिए गवाही देने में सक्षम होंगे। दुनिया की राजनीतिक शक्तियों के नाम पर की जाने वाली कई चीजें परमेश्वर द्वारा अनुमोदित नहीं हैं; फिर भी, परमेश्वर की इच्छा पूरी करने के नाम पर, परमेश्वर के लिए गवाही देने के नाम पर, बहुत काम किया गया है, इस तरह के काम को परमेश्वर की मंजूरी मिलेगी। क्या अब तुमने इस मुद्दे को पूरी तरह से समझ लिया है? एक नागरिक के अधिकारों का प्रयोग करो, साथ ही नागरिक के रूप में जिम्मेदारियों और कर्तव्यों को पूरा करो, लेकिन एक राजनीतिज्ञ न बनो, और ऐसे व्यक्ति बनो जो परमेश्वर के लिए गवाही देता है, यह प्रमुख है। क्या अब तुम समझते हो?