"जो पुत्र पर विश्‍वास करता है, अनन्त जीवन उसका है; परन्तु जो पुत्र की नहीं मानता, वह जीवन को नहीं देखेगा" (यूहन्ना 3:36)।

"मार्ग और सत्य और जीवन मैं ही हूँ; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुँच सकता" (यूहन्ना 14:6)।

"फिलिप्पुस ने उससे कहा, हे प्रभु, पिता को हमें दिखा दे... यीशु ने उससे कहा... जिसने मुझे देखा है उसने पिता को देखा है। ...मैं पिता में हूँ और पिता मुझ में है" (यूहन्ना 14:8-10)।

"मैं और पिता एक हैं" (यूहन्ना 10:30)।

"मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा" (यूहन्ना 16:12-13)।

I. परमेश्वर में विश्वास करने के लिए, एक व्यक्ति को यह अवश्य पहचानना चाहिए कि मसीह देह में प्रकट परमेश्वर है, और कि वह स्वयं परमेश्वर है

बाइबिल के अभिलेख के अनुसार, पवित्र आत्मा ने गवाही दी थी कि प्रभु यीशु परमेश्वर का प्यारा पुत्र है, और प्रभु यीशु ने भी स्वर्ग के परमेश्वर को "पिता" कहा था। इस प्रकार, बहुत से लोग मानते हैं कि प्रभु यीशु मसीह परमेश्वर का पुत्र है, और यह कि स्वर्ग में पिता परमेश्वर भी है । और फिर भी प्रभु यीशु ने कहा था: "जिसने मुझे देखा है उसने पिता को देखा है। …मैं पिता में हूँ और पिता मुझ में है" (यूहन्ना 14:9-10)। "मैं और पिता एक हैं" (यूहन्ना 10:30)। इसलिए यह देखा जा सकता है कि केवल एक ही परमेश्वर है। यीशु मसीह देहधारी हुआ यहोवा परमेश्वर था—वह स्वयं परमेश्वर था।

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सुसमाचार के प्रश्नोत्तर

उत्तर

II. परमेश्वर में विश्वास करने के लिए, एक व्यक्ति को यह अवश्य पहचानना चाहिए कि "केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को शाश्वत जीवन का मार्ग दे सकता है"

प्रभु ईशु ने कहा था: "मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा" (यूहन्ना 16:12-13)। अंत के दिनों में, प्रभु यीशु अपना कार्य करने और अपने वचनों को कहने के लिए बहुत समय पहले ही मनुष्य के पुत्र के प्रकटन के रूप में देह में लौट आया था। मनुष्य का यह पुत्र अंत के दिनों का मसीह है, सत्य का आत्मा है, और वह उन सभी सत्यों को व्यक्त करता है जो मनुष्यों का न्याय करते हैं, उन्हें शुद्ध करते और बचाते हैं। ये सत्य वास्तव में शाश्वत जीवन के मार्ग हैं जो परमेश्वर मानवजाति को प्रदान करता है, इसलिए केवल वे लोग अनंत जीवन को प्राप्त करेंगे जो उस मसीह में विश्वास करते हैं जो कि अंत के दिनों में देह बन गया है और उस शाश्वत जीवन के मार्ग को स्वीकार करते हैं, जो वह मनुष्यों को देता है।

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परमेश्वर के वचन के पाठ

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III. क्या अंत के दिनों के मसीह में विश्वास किए बिना प्रभु यीशु में विश्वास करना पुत्र में एक सच्चा विश्वास है, और क्या यह शाश्वत जीवन की ओर ले जा सकता है?

बाइबल कहती है: "जो पुत्र पर विश्‍वास करता है, अनन्त जीवन उसका है; परन्तु जो पुत्र की नहीं मानता, वह जीवन को नहीं देखेगा" (यूहन्ना 3:36)। पुत्र में विश्वास देहधारी मसीह में एक विश्वास है। बहुत से लोग पूछ सकते हैं: प्रभु यीशु मनुष्य का पुत्र है, वह मसीह है, और इसलिए प्रभु यीशु में विश्वास करके, हमें शाश्वत जीवन प्राप्त करना चाहिए। तो फिर इससे पहले कि हम शाश्वत जीवन प्राप्त कर सकें हमें तब भी क्यों अंत के दिनों में मसीह के वचनों और कार्यों पर विश्वास करना पड़ेगा?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद

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सुसमाचार के प्रश्नोत्तर

प्रश्न: सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "केवल अंतिम दिनों का मसीह मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग प्रदान कर सकता है," तो मुझे वह याद आया जो प्रभु यीशु ने एक बार कहा था, "परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूँगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा; वरन् जो जल मैं उसे दूँगा, वह उसमें एक सोता बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा" (यूहन्ना 4:14)। हम पहले से ही जानते हैं कि प्रभु यीशु जीवन के सजीव जल का स्रोत हैं, और अनन्‍त जीवन का मार्ग हैं। क्या ऐसा हो सकता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर और प्रभु यीशु समान स्रोत हों? क्या उनके कार्य और वचन दोनों पवित्र आत्मा के कार्य और वचन हैं? क्या उनका कार्य एक ही परमेश्‍वर करते हैं?

उत्तर

IV. यहूदी फरीसियों ने केवल यहोवा परमेश्वर में विश्वास किया, और प्रभु यीशु में नहीं। उन्होंने प्रभु यीशु की निंदा और विरोध भी किया, और इसलिए परमेश्वर द्वारा दण्डित और शापित हुए। यह हमें क्या चेतावनी देता है?

01

क्या एक अस्पष्ट, स्वर्गिक परमेश्वर में विश्वास करना और देहधारी मसीह में विश्वास नहीं करना परमेश्वर में सच्चा विश्वास है?

वास्तव में कैसे किसी को परमेश्वर में विश्वास करना चाहिए? प्रभु यीशु ने कहा: "यदि तुम विश्‍वास न करोगे कि मैं वही हूँ तो अपने पापों में मरोगे" (यूहन्ना 8:24)। आरंभिक दिनों के बारे में सोचने पर, यहूदी फरीसियों ने केवल एक अस्पष्ट स्वर्गिक परमेश्वर में विश्वास किया था, और जब देहधारी परमेश्वर—यीशु मसीह—प्रकट हुआ और उसने अपना कार्य किया, तो न केवल उन्होंने उस पर विश्वास नहीं किया बल्कि उन्होंने उसका विरोध और उसकी निंदा भी की। अंततः, उन्होंने प्रभु यीशु को क्रूस पर कीलों से जड़ दिया और इसलिए वे परमेश्वर द्वारा दंडित और शापित किए गए थे। अंत के दिनों में, परमेश्वर ने अपना कार्य करने के लिए एक बार पुनः मनुष्य के पुत्र के प्रकटन के रूप में देहधारण किया है, और यदि लोग इस देहधारी, व्यावहारिक परमेश्वर—अंत के दिनों के मसीह में विश्वास नहीं करते हैं—और केवल एक अस्पष्ट, स्वर्गिक परमेश्वर में विश्वास करते हैं, तो क्या यह परमेश्वर में सच्चा विश्वास है?

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परमेश्वर के वचन के पाठ

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02

यदि कोई व्यक्ति अपने विश्वास में केवल बाइबल के पत्रों और नियमों को पकड़े रहता है और मसीह के साथ संगत होने के तरीके की तलाश नहीं करता है, तो क्या वह शाश्वत जीवन प्राप्त कर सकता है?

परमेश्वर में कई विश्वासियों का मानना है कि बाइबल परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करती है, और यह कि परमेश्वर में विश्वास बाइबल में विश्वास है, और बाइबल को पकड़े रह कर वे अनंत जीवन प्राप्त कर सकते हैं। और फिर भी प्रभु यीशु ने कहा था: "तुम पवित्रशास्त्र में ढूँढ़ते हो, क्योंकि समझते हो कि उसमें अनन्त जीवन तुम्हें मिलता है; और यह वही है जो मेरी गवाही देता है; फिर भी तुम जीवन पाने के लिये मेरे पास आना नहीं चाहते" (यूहन्ना 5:39-40)। प्रभु यीशु द्वारा बोले गए इन वचनों का वास्तविक अर्थ क्या है? यदि कोई केवल बाइबिल को पकड़े रहता है और मसीह के साथ संगत होने के तरीके की तलाश नहीं करता है, तब क्या वह शाश्वत जीवन प्राप्त कर सकता है?

परमेश्वर के अति-उत्कृष्ट वचन

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सुसमाचार के प्रश्नोत्तर

प्रश्न: बाइबल परमेश्वर के कार्य की गवाही है, यह मानवजाति के लिए लाभदायक रही है। बाइबल के माध्यम से, हम समझ जाते हैं कि परमेश्‍वर सभी चीजों के सृष्टिकर्ता हैं, हम परमेश्‍वर के अद्भुत, महान कार्यों और उनकी सर्वक्षमता को देख पाते हैं। यदि बाइबल परमेश्वर के वचन और परमेश्वर को गवाही का अभिलेख है, तो बाइबल में शाश्‍वत जीवन का तरीका क्यों नहीं है? बाइबल में परमेश्वर के वचन हैं, तो शाश्वत जीवन का मार्ग बाइबिल में क्‍यों नहीं पाया जाता है?

उत्तर
03

परिणाम क्या होंगे यदि कोई अपने विश्वास में केवल यहोवा के नाम और प्रभु यीशु के नाम को पकड़े रहता है, और लौटे हुए परमेश्वर के नए नाम को स्वीकार नहीं करता है?

कई हज़ार वर्षों तक, जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते थे, उनका मानना था कि परमेश्वर का नाम अपरिवर्तनशील है, और परमेश्वर के नाम को पकड़े रहने को परमेश्वर में विश्वास होना समझते थे। तो फिर ऐसा क्यों है कि यहूदी धर्म में विश्वास करने वाले केवल यहोवा के नाम को पकड़े रहते हैं और प्रभु यीशु के नाम को स्वीकार नहीं करते हैं, और फिर भी निकाल दिए जाते हैं? बाइबल ने भविष्यवाणी की थी कि अंत के दिनों में परमेश्वर का नया नाम होगा: "और मैं अपने परमेश्‍वर का नाम और अपने परमेश्‍वर के नगर अर्थात् नये यरूशलेम का नाम, जो मेरे परमेश्‍वर के पास से स्वर्ग पर से उतरनेवाला है, और अपना नया नाम उस पर लिखूँगा" (प्रकाशितवाक्य 3:12)। यदि हम केवल प्रभु यीशु के नाम को पकड़े रहते हैं और लौटे हुए परमेश्वर के नए नाम को स्वीकार नहीं करते हैं, तो इस तरह से परमेश्वर में विश्वास करने के क्या परिणाम होंगे?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद

"प्रभु परमेश्‍वर, जो है और जो था और जो आनेवाला है, जो सर्वशक्‍तिमान है, यह कहता है, मैं ही अल्फ़ा और ओमेगा हूँ" (प्रकाशितवाक्य 1:8)।

"चारों प्राणियों के छ: छ: पंख हैं, और चारों ओर और भीतर आँखें ही आँखें हैं; और वे रात दिन बिना विश्राम लिये यह कहते रहते हैं, पवित्र, पवित्र, पवित्र प्रभु परमेश्‍वर, सर्वशक्‍तिमान, जो था और जो है और जो आनेवाला है" (प्रकाशितवाक्य 4:8)।

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बाइबल स्पष्ट रूप से कहती है कि प्रभु यीशु का बपतिस्मा होने के बाद, स्वर्ग के द्वार खुल गए थे, और पवित्र आत्मा एक कबूतर की तरह प्रभु यीशु पर उतर आया था, एक आवाज ने कहा था: "यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ" (मत्ती 3:17)। और हम सभी विश्वासी मानते हैं कि प्रभु यीशु ही मसीह यानी परमेश्वर के पुत्र हैं। फिर भी आप लोगों ने यह गवाही दी है कि देहधारी मसीह परमेश्वर का प्रकटन यानी स्वयं परमेश्वर हैं, यह कि प्रभु यीशु स्वयं परमेश्वर हैं और सर्वशक्तिमान परमेश्वर भी स्वयं परमेश्वर हैं। और हमारी पिछली समझ से अलग है। तो क्या देहधारी मसीह स्वयं परमेश्वर हैं या परमेश्वर के पुत्र हैं? दोनों ही स्थितियां हमें उचित लगती हैं, और दोनों ही बाइबल के अनुरूप हैं। तो कौन सी समझ सही है?

"परमेश्वर देहधारी हुआ और मसीह कहलाया, और इसलिए वह मसीह, जो लोगों को सत्य दे सकता है, परमेश्वर कहलाता है। इसमें कुछ भी अतिशयोक्ति नहीं है, क्योंकि वह परमेश्वर के तत्व को स्वयं में धारण किए रहता है, और अपने कार्य में परमेश्वर के स्वभाव और बुद्धि को धारण करता है, और ये चीजें मनुष्य के लिये अप्राप्य हैं। जो अपने आप को मसीह कहते हैं, फिर भी परमेश्वर का कार्य नहीं कर सकते, वे सभी धोखेबाज़ हैं। मसीह पृथ्वी पर केवल परमेश्वर की अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि वह देह है जिसे धारण करके परमेश्वर लोगों के बीच रहकर कार्य पूर्ण करता है। यह वह देह नहीं है जो किसी भी मनुष्य के द्वारा प्रतिस्थापित कियाजा सके, बल्कि वह देह है, जो परमेश्वर के कार्य को पृथ्वी पर अच्छी तरह से करता है और परमेश्वर के स्वभाव को अभिव्यक्त करता है, और अच्छी प्रकार से परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है, और मनुष्य को जीवन प्रदान करता है।"

"मनुष्य के पुत्र के देहधारण ने परमेश्वर की मानवता के द्वारा उसकी ईश्वरीयता को प्रकट किया था और परमेश्वर की इच्छा को मानव जाति तक पहुँचाया था। और परमेश्वर की इच्छा और स्वभाव के प्रकटीकरण के द्वारा, उसने लोगों के सामने उस परमेश्वर को प्रकाशित किया जिसे आध्यात्मिक आयाम क्षेत्र में देखा और छुआ नहीं जा सकता था। जो लोगों ने देखा वह स्वयं परमेश्वर था, स्पृश्य और हड्डी एवं माँस के साथ। इस प्रकार मनुष्य के पुत्र के देहधारण ने ऐसी चीज़ों को बनाया जैसे परमेश्वर की स्वयं की पहचान, स्तर, स्वरूप, स्वभाव, और जो उसके पास है तथा जो वह है उसे ठोस और मानवीय किया। यद्यपि परमेश्वर के स्वरूप सम्बन्ध में मनुष्य के पुत्र के बाहरी रूप में कुछ सीमाएँ थीं, फिर भी उसका सार और जो उसके पास है तथा जो वह है वे पूर्णत: परमेश्वर की स्वयं की पहचान और स्थिति को दर्शाने में सक्षम हैं—प्रकटीकरण के रूप में वहाँ केवल कुछ भिन्नताएँ थीं।"

"जीवन का मार्ग कोई साधारण चीज़ नहीं है जो चाहे कोई भी प्राप्त कर ले, न ही इसे सभी के द्वारा आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। यह इसलिए कि जीवन केवल परमेश्वर से ही आता है, कहने का अर्थ है कि केवल स्वयं परमेश्वर ही जीवन के तत्व का अधिकारी है, स्वयं परमेश्वर के बिना जीवन का मार्ग नहीं है, और इसलिए केवल परमेश्वर ही जीवन का स्रोत है, और जीवन के जल का सदा बहने वाला सोता है। जब से उसने संसार को रचा है, परमेश्वर ने बहुत सा कार्य जीवन को महत्वपूर्ण बनाने के लिये किया है, बहुत सारा कार्य मनुष्य को जीवन प्रदान करने के लिए किया है और बहुत अधिक मूल्य चुकाया है ताकि मनुष्य जीवन को प्राप्त करे, क्योंकि परमेश्वर स्वयं ही अनन्त जीवन है, और वह स्वयं ही वह मार्ग है जिससे मनुष्य नया जन्म लेता है। परमेश्वर मनुष्य के हृदय से कभी भी दूर नहीं रहा है और हर समय उनके मध्य में रहता है। वह मनुष्यों के जीवन यापन की असली ताकत है, मनुष्य के अस्तित्व का आधार है, जन्म के बाद मनुष्य के अस्तित्व के लिए उर्वर संचय है। वह मनुष्य को नया जन्म लेने देता है, और प्रत्येक भूमिका में दृढ़तापूर्वक जीने के लिये सक्षम बनाता है। उसकी सामर्थ्य के लिए और उसकी सदा जीवित रहने वाली जीवन की शक्ति के लिए धन्यवाद, मनुष्य पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रहता है, जिसके द्वारा परमेश्वर के जीवन की सामर्थ्य मनुष्य के अस्तित्व के लिए मुख्य आधार बनती है और जिसके लिए परमेश्वर ने कीमत चुकाई है जिसे कोई भी साधारण मनुष्य कभी भी नहीं चुका सकता। परमेश्वर की जीवन शक्ति किसी भी शक्ति पर प्रभुत्व कर सकती है; इसके अलावा, वह किसी भी शक्ति से अधिक है। उसका जीवन अनन्त काल का है, उसकी सामर्थ्य असाधारण है, और उसके जीवन की शक्ति आसानी से किसी भी प्राणी या शत्रु की शक्ति से पराजित नहीं हो सकती। परमेश्वर की जीवन-शक्ति का अस्तित्व है, और अपनी शानदार चमक से चमकती है, चाहे वह कोई भी समय या स्थान क्यों न हो। परमेश्वर का जीवन सम्पूर्ण स्वर्ग और पृथ्वी की उथल-पुथल के मध्य हमेशा के लिए अपरिवर्तित रहता है। हर चीज़ का अस्तित्व समाप्त हो जायेगा, परन्तु परमेश्वर का जीवन फिर भी अस्तित्व में रहेगा। क्योंकि परमेश्वर ही सभी चीजों के अस्तित्व का स्रोत है, और उनके अस्तित्व का मूल है। मनुष्य का जीवन परमेश्वर से निकलता है, स्वर्ग का अस्तित्व परमेश्वर के कारण है, और पृथ्वी का अस्तित्व भी परमेश्वर की जीवन शक्ति से ही उद्भूत होता है। कोई वस्तु कितनी भी महत्वपूर्ण हो, परमेश्वर के प्रभुत्व से बढ़कर श्रेष्ठ नहीं हो सकती।, और कोई भी वस्तु शक्ति के साथ परमेश्वर के अधिकार की सीमा को तोड़ नहीं सकती है। इस प्रकार से, चाहे वे कोई भी क्यों न हों, सभी को परमेश्वर के अधिकार के अधीन ही समर्पित होना होगा, प्रत्येक को परमेश्वर की आज्ञा में रहना होगा, और कोई भी उसके नियंत्रण से बच कर नहीं जा सकता है।"

"परमेश्वर का जीवन सतत विद्यमान है, और उसका सत्य और जीवन एक साथ उपस्थित रहते हैं। यदि तुम सत्य के स्रोत को नहीं प्राप्त कर पाते, तो तुम जीवन के पोषण को प्राप्त नहीं कर पाओगे; यदि तुम जीवन के प्रावधान को प्राप्त नहीं कर सकते तो तुम्हारे जीवन में निश्चय ही सत्य नहीं होगा, और इसलिए कल्पनाओं और धारणाओं से दूरी होगी, तुम्हारी सम्पूर्ण देह केवल देह होगी, तुम्हारी घिनौनी देह। ध्यान रखो कि किताबों की बातें जीवन के तौर पर नहीं गिनी जाती हैं, इतिहास के लेखों को सत्य के रूप में चित्रित नहीं किया जा सकता, और अतीत के सिद्धांत आज के समय में परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचनों का लेखा-जोखा नहीं माने जा सकते। केवल वही बात जो परमेश्वर ने पृथ्वी पर आकर और लोगों के बीच रहकर कही है, सत्य, जीवन, परमेश्वर की इच्छा है और कार्य करने का असली तरीका है। यदि तुम अतीत के युगों में परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचनों को आज के संदर्भ में लागू करते हो, और अगर तुम अतीत के युगों में परमेश्वर द्वारा कहे गए वचनों को आज लागू करते हो, तो तुम एक पुरातत्ववेत्ता हो, और तुम्हें सबसे बेहतर ढंग से चित्रित करने के लिए ऐतिहासिक विरासत का विशेषज्ञ कहा जा सकता है। क्योंकि तुम हमेशा उन कार्यों के सुरागों के बारे में विश्वास करते हो जो परमेश्वर ने अतीत में किए हैं, केवल उन पदचिन्हों पर विश्वास करते हो जो तब के हैं जब परमेश्वर लोगों के बीच रह कर कार्य किया करता था। और तुम केवल उसी मार्ग पर विश्वास करते हो जो परमेश्वर ने पुराने समय में अपने अनुयायियों को दिया था। आज के समय में तुम परमेश्वर के कार्य के मार्गदर्शन के बारे में विश्वास नहीं करते, महिमामय मुखाकृति में विश्वास नहीं करते, और परमेश्वर के द्वारा आज के समय में व्यक्त किये गये सत्य के मार्ग पर विश्वास नहीं करते। अत: तुम एक ऐसे दिवास्वप्न दर्शी हो जो सच्चाई से कोसों दूर है। यदि तुम अभी भी उन वचनों से चिपके रहोगे जो जीवन प्रदान करने में असमर्थ हैं, तो तुम आशाहीन और एक निर्जीव काष्ठ【क】के समान हो। क्योंकि तुम बहुत ही रूढ़िवादी, असभ्य हो जो चीजों को तर्क की कसौटी पर नहीं कसते हो।"

"अंतिम दिनों का मसीह जीवन लेकर आता, और सत्य का स्थायी एवं अनन्त मार्ग प्रदान करता है। इसी सत्य के मार्ग के द्वारा मनुष्य जीवन को प्राप्त करेगा, और एक मात्र इसी मार्ग से मनुष्य परमेश्वर को जानेगा और परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त करेगा। यदि तुम अंतिम दिनों के मसीह के द्वारा प्रदान किए गए जीवन के मार्ग को नहीं खोजते हो, तो तुम कभी भी यीशु के अनुमोदन को प्राप्त नहीं कर पाओगे और कभी भी स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के योग्य नहीं बन पाओगे क्योंकि तुम इतिहास के कठपुतली और कैदी दोनों हो। जो लोग नियमों, संदेशों के नियंत्रण में हैं और इतिहास की ज़ंजीरों में जकड़े हुए हैं वे कभी भी जीवन को प्राप्त नहीं कर सकते हैं, और कभी भी सतत जीवन के मार्ग को प्राप्त करने के योग्य नहीं बन सकते हैं। क्योंकि सिंहासन से प्रवाहित जीवन जल की अपेक्षा, उनके भीतर मैला पानी भरा है जो हज़ारों सालों से वहीं ठहरा हुआ है, जिनके पास जीवन का जल नहीं है वे हमेशा के लिए एक लाश, शैतान के खेलने की वस्तु और नरक की संतान बन जाएंगे। फिर वे परमेश्वर को कैसे देख सकते हैं? यदि तुम केवल अतीत को पकड़े रहने की कोशिश करोगे, केवल ठहरी हुई चीज़ों को पकड़ने की कोशिश में लगे रहोगे, और यथास्थिति को बदलने और इतिहास को तिलांजलि देने की कोशिश नहीं करोगे, तो क्या तुम हमेशा परमेश्वर के विरोध में नहीं रहोगे? परमेश्वर के कार्य के चरण बहुत ही विशाल और सामर्थी हैं, जैसे कि हिलोरे मारती हुई लहरें और गरजता हुआ तूफान - फिर भी तुम बैठकर निष्क्रियता से विनाश का इंतजार करते हो, अपनी ही मूर्खता से चिपके रहते हो और कुछ भी नहीं करते। इस प्रकार से, तुम्हें मेमने का अनुसरण करने वाले के रूप में कैसे देखा जा सकता है? और तुम इस बात को कैसे न्यायोचित ठहरा सकते हो कि तुम उस परमेश्वर पर निर्भर रहोगे जो हमेशा नया है और कभी पुराना नहीं होता? तुम्हारी पीली पड़ चुकी किताब के वचन तुम्हें नए युग में कैसे ले जा सकते हैं? वे कैसे तुम्हें परमेश्वर के चरणबद्ध तरीके से चलने वाले कार्यों तक लेकर जायेंगे? वे तुम्हें कैसे स्वर्ग लेकर जायेंगे? तुम्हारे हाथों में जो संदेश हैं वे तुम्हें केवल अस्थायी सांत्वना ही दे सकते हैं, वह सत्य नहीं दे सकते जो जीवन देने में सक्षम है। जो शास्त्र तुम पढ़ते हो वे तुम्हारी जिव्हा को आनंदित तो कर सकते हैं लेकिन ये वे विवेकपूर्ण वचन नहीं हैं जो तुम्हें मानव जीवन का बोध करा सकें। ये वह मार्ग तो दिखा ही नहीं सकते जो तुम्हें पूर्णता की ओर ले जायें। क्या यह भिन्नता तुम्हारे विचार-मंथन का कारण नहीं है? क्या यह तुम्हें अपने भीतर समाहित रहस्यों को समझने के लिए अनुमति नहीं देता है? क्या तुम अपने आप को परमेश्वर से मिलने के लिए स्वर्ग में ले जाने के योग्य हो? परमेश्वर के आये बिना, क्या तुम अपने आप को परमेश्वर के साथ पारिवारिक आनन्द मनाने के लिए स्वर्ग में ले जा सकते हो क्या तुम अभी भी स्वप्न देख रहे हो? मैं तुम्हें सुझाव देता हूं, कि तुम स्वप्न देखना बंद कर दो, और उनकी ओर देखो जो अभी कार्य कर रहे हैं, इन अंतिम दिनों में कौन मनुष्यों को बचाने के लिए कार्य कर रहा है। यदि तुम ऐसा नहीं करते हो, तो तुम कभी भी सत्य को नहीं प्राप्त कर सकते, और कभी भी जीवन प्राप्त नहीं कर सकते हो।"

प्रभु यीशु ने कहा: "परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूँगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा; वरन् जो जल मैं उसे दूँगा, वह उसमें एक सोता बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा।" (यूहन्ना 4:14)। अधिकांश लोग सोचते हैं कि प्रभु यीशु ने हमें पहले से ही अनन्त जीवन का मार्ग प्रदान किया है, लेकिन मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ा है: "केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है।" यह सब क्या है? यह क्यों कहता है कि आखिरी दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है?

"यदि कोई मेरी बातें सुनकर न माने, तो मैं उसे दोषी नहीं ठहराता; क्योंकि मैं जगत को दोषी ठहराने के लिये नहीं, परन्तु जगत का उद्धार करने के लिये आया हूँ। जो मुझे तुच्छ जानता है और मेरी बातें ग्रहण नहीं करता है उसको दोषी ठहरानेवाला तो एक है: अर्थात् जो वचन मैं ने कहा है, वही पिछले दिन में उसे दोषी ठहराएगा" (यूहन्ना 12:47-48)।

"पिता किसी का न्याय नहीं करता, परन्तु न्याय करने का सब काम पुत्र को सौंप दिया है” (यूहन्ना 5:22)।

"यद्यपि यीशु ने मनुष्यों के बीच अधिक कार्य किया है, उसने केवल समस्त मानवजाति के छुटकारे के कार्य को पूरा किया और वह मनुष्य की पाप-बलि बना, मनुष्य को उसके भ्रष्ट स्वभाव से छुटकारा नहीं दिलाया। शैतान के प्रभाव से मनुष्य को पूरी तरह बचाने के लिये यीशु को न केवल पाप-बलि के रूप में मनुष्यों के पापों को लेना आवश्यक था, बल्कि मनुष्य को उसके भ्रष्ट स्वभाव से पूरी तरह मुक्त करने के लिए परमेश्वर को और भी बड़े कार्य करने की आवश्यकता थी जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया था। और इसलिए, मनुष्य को उसके पापों के लिए क्षमा कर दिए जाने के बाद, एक नये युग में मनुष्य की अगुवाई करने के लिए परमेश्वर वापस देह में लौटा, और उसने ताड़ना एवं न्याय के कार्य को आरंभ किया, और इस कार्य ने मनुष्य को एक उच्चतर क्षेत्र में पहुँचा दिया। वे सब जो परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन समर्पण करेंगे उच्चतर सत्य का आनंद लेंगे और अधिक बड़ी आशीषें प्राप्त करेंगे। वे वास्तव में ज्योति में निवास करेंगे, और सत्य, मार्ग और जीवन को प्राप्त करेंगे।"

"अंत के दिनों का कार्य वचनों को बोलना है। वचनों के माध्यम से मनुष्य में बड़े परिवर्तन किए जा सकते हैं। इन वचनों को स्वीकार करने पर इन लोगों में हुए परिवर्तन उन परिवर्तनों की अपेक्षा बहुत अधिक बड़े हैं जो चिन्हों और अद्भुत कामों को स्वीकार करने पर अनुग्रह के युग में लोगों पर हुए थे। क्योंकि, अनुग्रह के युग में, हाथ रखने और प्रार्थना करने के साथ ही दुष्टात्माएँ मनुष्य से निकल जाती थी, परन्तु मनुष्य के भीतर का भ्रष्ट स्वभाव तब भी बना रहता था। मनुष्य को उसकी बीमारी से चंगा किया गया था और उसके पापों को क्षमा किया गया था, परन्तु बस वह कार्य, कि किस प्रकार मनुष्य के भीतर से उन शैतानी स्वभावों को निकला जा सकता है, उसमें नहीं किया गया था। मनुष्य को केवल उसके विश्वास के कारण ही बचाया गया था और उसके पापों को क्षमा किया गया था, परन्तु उसका पापी स्वभाव उसमें से निकाला नहीं गया था और वह तब भी उसके अंदर बना रहा था। मनुष्य के पापों को देहधारी परमेश्वर के द्वारा क्षमा किया गया था, परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य के भीतर कोई पाप नहीं है। पाप बलि के माध्यम से मनुष्य के पापों को क्षमा किया जा सकता है, परन्तु मनुष्य इस मसले को हल करने में असमर्थ रहा है कि वह कैसे आगे और पाप नहीं कर सकता है और कैसे उसके पापी स्वभाव को पूरी तरह से दूर किया जा सकता है और उसे रूपान्तरित किया जा सकता है। परमेश्वर के सलीब पर चढ़ने के कार्य की वजह से मनुष्य के पापों को क्षमा किया गया था, परन्तु मनुष्य पुराने, भ्रष्ट शैतानी स्वभाव में जीवन बिताता रहा। वैसे तो, मनुष्य को भ्रष्ट शैतानी स्वभाव से अवश्य पूरी तरह से बचाया जाना चाहिए ताकि मनुष्य का पापी स्वभाव पूरी तरह से दूर किया जाए और फिर कभी विकसित न हो, इस प्रकार मनुष्य के स्वभाव को बदले जाने की अनुमति दी जाए। इसके लिए मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह जीवन में उन्नति के पथ को, जीवन के मार्ग को, और अपने स्वभाव को परिवर्तित करने के मार्ग को समझे। साथ ही इसके लिए मनुष्य को इस मार्ग के अनुरूप कार्य करने की आवश्यकता है ताकि मनुष्य के स्वभाव को धीरे-धीरे बदला जा सके और वह प्रकाश की चमक में जीवन जी सके, और यह कि वह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सभी चीज़ों को कर सके, और भ्रष्ट शैतानी स्वभाव को दूर कर सके, और शैतान के अंधकार के प्रभाव को तोड़कर आज़ाद हो सके, उसके परिणामस्वरूप पाप से पूरी तरह से ऊपर उठ सके। केवल तभी मनुष्य पूर्ण उद्धार प्राप्त करेगा। जब यीशु अपना काम कर रहा था, तो उसके बारे में मनुष्य का ज्ञान तब भी अज्ञात और अस्पष्ट था। मनुष्य ने हमेशा यह विश्वास किया कि वह दाऊद का पुत्र है और उसके एक महान भविष्यद्वक्ता और उदार प्रभु होने की घोषणा की जिसने मनुष्य को पापों से छुटकारा दिया था। विश्वास के आधार पर मात्र उसके वस्त्र के छोर को छू कर ही कुछ लोग चंगे हो गए थे; अंधे देख सकते थे और यहाँ तक कि मृतक को जिलाया भी जा सकता था। हालाँकि, मनुष्य अपने भीतर गहराई से जड़ जमाए हुए शैतानी भ्रष्ट स्वभाव को नहीं समझ सका और न ही मनुष्य यह जानता था कि उसे कैसे दूर किया जाए। मनुष्य ने बहुतायत से अनुग्रह प्राप्त किया, जैसे देह की शांति और खुशी, एक व्यक्ति के विश्वास करने पर पूरे परिवार की आशीष, और बीमारियों से चंगाई के इत्यादि। शेष मनुष्य भले कर्म और उनका ईश्वरीय प्रकटन था; यदि मनुष्य इस तरह के आधार पर जीवन जी सकता था, तो उसे एक अच्छा विश्वासी माना जाता था। केवल ऐसे विश्वासी ही मृत्यु के बाद स्वर्ग में प्रवेश कर सकते थे, जिसका अर्थ है कि उन्हें बचा लिया गया था। परन्तु, अपने जीवन काल में, उन्होंने जीवन के मार्ग को बिलकुल भी नहीं समझा था। उन्होंने बस पाप किए थे, फिर परिवर्तित स्वभाव की ओर बिना किसी मार्ग वाले निरंतर चक्र में पाप-स्वीकारोक्ति की थी; अनुग्रह के युग में मनुष्य की दशा ऐसी ही थी। क्या मनुष्य ने पूर्ण उद्धार पा लिया था? नहीं! इसलिए, उस चरण के पूरा हो जाने के पश्चात्, अभी भी न्याय और ताड़ना का काम है। यह चरण वचन के माध्यम से मनुष्य को शुद्ध बनाता है ताकि मनुष्य को अनुसरण करने का एक मार्ग प्रदान किया जाए। यह चरण फलप्रद या अर्थपूर्ण नहीं होगा यदि यह दुष्टात्माओं को निकालना जारी रखता है, क्योंकि मनुष्य के पापी स्वभाव को दूर नहीं जाएगा और मनुष्य केवल पापों की क्षमा पर आकर रुक जाएगा। पापबलि के माध्यम से, मनुष्य के पापों को क्षमा किया गया है, क्योंकि सलीब पर चढ़ने का कार्य पहले से ही पूरा हो चुका है और परमेश्वर शैतान को जीत लिया है। परन्तु मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव अभी भी उनके भीतर बना हुआ है और मनुष्य अभी भी पाप कर सकता है और परमेश्वर का प्रतिरोध कर सकता है; परमेश्वर ने मानवजाति को प्राप्त नहीं किया है। इसीलिए कार्य के इस चरण में परमेश्वर मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव को प्रकट करने के लिए वचन का उपयोग करता है और मनुष्य से सही मार्ग के अनुसार अभ्यास करने के लिए कहता है। यह चरण पिछले चरण की अपेक्षा अधिक अर्थपूर्ण और साथ ही अधिक लाभदायक भी है, क्योंकि अब वचन ही है जो सीधे तौर पर मनुष्य के जीवन की आपूर्ति करता है और मनुष्य के स्वभाव को पूरी तरह से नया बनाए जाने में सक्षम बनाता है; यह कार्य का ऐसा चरण है जो अधिक विस्तृत है। इसलिए, अंत के दिनों में देहधारण ने परमेश्वर के देहधारण के महत्व को पूरा किया है और मनुष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर की प्रबंधन योजना का पूर्णतः समापन किया है।"

"जो अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के कार्य के दौरान—अर्थात्, शुद्धिकरण के अंतिम कार्य के दौरान—अडिग रहने में समर्थ हैं, ये वे लोग होंगे जो परमेश्वर के साथ अंतिम विश्राम में प्रवेश करेंगे; इसलिए, जो विश्राम में प्रवेश करेंगे, वे सब शैतान के प्रभाव से मुक्त हो चुके होंगे और केवल परमेश्वर के शुद्धिकरण के अंतिम कार्य से गुज़रने के बाद ही परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा चुके होंगे। ये लोग ही जो अंततः परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा चुके हैं अंतिम विश्राम में प्रवेश करेंगे। परमेश्वर की ताड़ना और न्याय का सार मानवजाति को शुद्ध करना है, और यह अंतिम विश्राम के दिन के लिए है। अन्यथा, संपूर्ण मानवजाति अपने स्वयं के स्वभाव का अनुसरण करने या विश्राम में प्रवेश करने में समर्थ नहीं होगी। यह कार्य ही मानवजाति के लिए विश्राम में प्रवेश करने का एकमात्र मार्ग है। केवल परमेश्वर द्वारा शुद्ध करने का कार्य ही मानवजाति को उसकी अधार्मिकता से शुद्ध करेगा, और केवल उसका ताड़ना और न्याय का कार्य ही मानव जाति की अवज्ञा की बातों को प्रकाश में लाएगा, फलस्वरूप, जिन्हें बचाया नहीं जा सकता है उनमें से जिन्हें बचाया जा सकता है उन्हें, और जो नहीं बचेंगे उनमें से जो बचेंगे उन्हें अलग करेगा। जब उसका कार्य समाप्त हो जाएगा, तो जो शेष बचेंगे वे शुद्ध किए जाएँगे, और जब वे मानवजाति के उच्चतर राज्य में प्रवेश करेंगे तो एक अद्भुत द्वितीय मानव जीवन का पृथ्वी पर आनंद उठाएँगे; दूसरे शब्दों में, वे मानवजाति के विश्राम में प्रवेश करेंगे और परमेश्वर के साथ-साथ रहेंगे।"

"अंत के दिनों के देहधारी परमेश्वर का आगमन अनुग्रह के युग के अंत को लाया है। वह मुख्य रूप से अपने वचनों को कहने, मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए वचनों का उपयोग करने, मनुष्य को रोशन और प्रबुद्ध करने, और मनुष्य के हृदय से अज्ञात परमेश्वर के स्थान को हटाने के लिए आया है। यह कार्य का वह चरण नहीं है जो यीशु ने तब किया था जब वह आया था। जब यीशु आया, तो उसने कई चमत्कार किए, उसने बीमारों को चंगा किया और पिशाचों को निकाला, और सलीब पर चढ़ने का छुटकारे का कार्य पूर्ण किया। परिणामस्वरूप, अपनी धारणाओं में, मनुष्य विश्वास करता है कि परमेश्वर को ऐसा ही होना चाहिए। क्योंकि जब यीशु आया, तो उसने मनुष्य के हृदय से अज्ञात परमेश्वर की छवि को हटाने का कार्य नहीं किया; जब वह आया, तो उसे सलीब पर चढ़ा दिया गया, उसने बीमारों को चंगा किया और पिशाचों को बाहर निकाला, और उसने स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार को फैलाया। एक विचार से, अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर का देहधारण मनुष्य की धारणाओं में अज्ञात परमेश्वर द्वारा धारण किए गए स्थान को हटाता है, ताकि मनुष्य के हृदय में अज्ञात परमेश्वर की छवि अब और नहीं रहे। अपने वास्तविक कार्य और वचनों का उपयोग करके, वह सम्पूर्ण देशों में जाता है और मनुष्यों के बीच वह जो कार्य करता है वह असाधारण रूप से वास्तविक और सामान्य होता है, इतना कि मनुष्य को परमेश्वर की सच्चाई पता लग जाती है, और मनुष्य के हृदय में अज्ञात परमेश्वर का स्थान समाप्त हो जाता है। दूसरे विचार से, परमेश्वर अपनी देह द्वारा कहे गए वचनों का उपयोग मनुष्य को पूर्ण करने, और सभी बातों को निष्पादित करने के लिए करता है। यही वह कार्य है जो परमेश्वर अंत के दिनों में निष्पादित करेगा।"

"क्योंकि परमेश्वर पीछे मुड़कर इतिहास को नहीं देखता है! और इसलिए, यदि तुम केवल बाइबल को ही समझते हो, और उस कार्य को नहीं समझते हो जिसे परमेश्वर आज करने का इरादा करता है, और यदि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो और पवित्र आत्मा के कार्य की खोज नहीं करते हो, तो तुम यह नहीं समझते हो कि परमेश्वर को खोजने का आशय क्या है? यदि तुम इस्राएल के इतिहास का अध्ययन करने एवं समस्त आकाश और पृथ्वी की सृष्टि के इतिहास की खोज करने के लिए बाइबल को पढ़ते हैं, तो तुम परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते हो। किन्तु आज, चूँकि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, और जीवन का अनुसरण करते हो, चूँकि तुम परमेश्वर के ज्ञान का अनुसरण करते हो, और मृत शब्दों और सिद्धांतों, या इतिहास की समझ का अनुसरण नहीं करते हो, इसलिए तुम्हें परमेश्वर की आज की इच्छा को अवश्य खोजना चाहिए, और पवित्र आत्मा के कार्य के निर्देश की तलाश अवश्य करनी चाहिए। यदि तुम एक पुरातत्त्ववेत्ता होते तो तुम बाइबल को पढ़ सकते थे—लेकिन तुम नहीं हो, तुम उन में से एक हो जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, और तुम्हारे लिए यह सब से अच्छा होगा कि तुम परमेश्वर की आज की इच्छा को खोजो।"

"उनके लिये मेरे अस्तित्व का दायरा मात्र बाइबल तक ही सीमित है। उनके लिए, मैं बस बाइबल के सामान ही हूँ; बाइबल के बिना मैं भी नहीं हूँ, और मेरे बिना बाइबल भी नहीं है। वे मेरे अस्तित्व या क्रियाओं पर कोई भी ध्यान नहीं देते, परन्तु इसके बजाय, पवित्रशास्त्र के हर एक वचन पर बहुत अधिक और विशेष ध्यान देते हैं, और उनमें से कई एक तो यहाँ तक मानते हैं कि मुझे मेरी चाहत के अनुसार, ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहिए जब तक वह पवित्रशास्त्र के द्वारा पहले से बताया गया न हो। वे पवित्रशास्त्र को बहुत अधिक महत्त्व देते हैं। यह कहा जा सकता है कि वे वचनों और उक्तियों को बहुत अधिक महत्वपूर्ण तरीकों से देखते हैं, इस हद कि हर एक वचन जो मैं बोलता हूं उसकी तुलना बाइबल की आयतों के साथ करते हैं, और उसका उपयोग मुझे दोषी ठहराने के लिए करते हैं। वे जिसकी खोज कर रहे हैं वह मेरे अनुकूल होने का रास्ता या ढंग नहीं है, या सत्य के अनुकूल होने का रास्ता नहीं है, बल्कि बाइबल के वचनों की अनुकूलता में होने का रास्ता है, और वे विश्वास करते हैं कि कोई भी बात जो बाइबल के अनुसार नहीं है, बिना किसी अपवाद के, मेरा कार्य नहीं है। क्या ऐसे लोग फरीसियों के कर्तव्यनिष्ठ वंशज नहीं हैं? यहूदी फरीसी यीशु को दोषी ठहराने के लिए मूसा की व्यवस्था का उपयोग करते थे। उन्होंने उस समय के यीशु के अनुकूल होने की खोज नहीं की, बल्कि नियम का अक्षरशः पालन कर्मठतापूर्वक किया, इस हद तक किया कि अंततः उन्होंने निर्दोष यीशु को, पुराने नियम की व्यवस्था का पालन न करने और मसीहा न होने का आरोप लगाते हुए, क्रूस पर चढ़ा दिया। उनका सारतत्व क्या था?"

"वे जो मेरी अनुकूलता में हैं, वह मेरे घर में हमेशा के लिए मेरी सेवा करेंगे, और वे जो अपने आप को मेरे शत्रु बनाते हैं हमेशा के लिए मेरी सज़ा को भोगेंगे। वे जो सिर्फ़ बाइबल के वचनों पर ही ध्यान देते हैं, जो सत्य के बारे में या मेरे नक्शे-कदम को खोजने के बारे में बेफ़िक्र हैं—वे मेरे विरुद्ध हैं, क्योंकि वे मुझे बाइबल के अनुसार सीमित बना देते हैं, और मुझे बाइबल में ही सीमित कर देते हैं, और वे ही मेरे बहुत अधिक निंदक हैं। ऐसे लोग मेरे सामने कैसे आ सकते हैं? वे मेरे कार्यों, या मेरी इच्छा, या सत्य पर कुछ भी ध्यान नहीं देते हैं, बल्कि वचनों से ग्रस्त हो जाते हैं, वचन जो मार देते हैं। कैसे ऐसे लोग मेरे अनुकूल हो सकते हैं?"

"जोकार्य यीशु ने किया उसने यीशु के नाम का प्रतिनिधित्व किया, और अनुग्रह के युग का प्रतिनिधित्व किया; यहोवा द्वारा किए गए कार्यने यहोवा का प्रतिनिधित्व किया, और व्यवस्था के युग का प्रतिनिधित्व किया। उनका कार्य दो भिन्न-भिन्न युगों में एक ही पवित्रात्मा का कार्य था। ...यद्यपि उन्हें दो भिन्न-भिन्न नामों से बुलाया गया था, किन्तु कार्य के दोनों चरण एक ही पवित्रात्मा द्वारा किए गए थे, और दूसरा कार्य पहले के क्रम में था। चूँकि नाम भिन्न था, और कार्य की विषय-वस्तु भिन्न थी, इसलिए युग अलग था। जब यहोवा आया, तो वह यहोवा का युग था, और जब यीशु आया, तो वह यीशु का युग था। और इसलिए, हर बार जब परमेश्वर आता है, तो उसे एक नाम से बुलाया जाता है, वह एक युग का प्रतिनिधित्व करता है, और वह एक नया मार्ग खोलता है; और प्रत्येक नए मार्ग पर, वह एक नया नाम अपनाता है, जो दर्शाता है कि परमेश्वर हमेशा नया है और कभी पुराना नहीं पड़ता है, और यह कि उसका कार्य हमेशा आगे बढ़ रहा है।"

"और इसलिए, जब अंतिम युग—अंत के दिनों के युग—का आगमन होगा, तो मेरा नाम पुनः बदल जाएगा। मुझे यहोवा, या यीशु नहीं कहा जाएगा, मसीहा तो कदापि नहीं, बल्कि मुझे स्वयं सामर्थ्यवान सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहा जाएगा, और इस नाम के अंतर्गत मैं समस्त युग को समाप्त करूँगा। एक समय मुझे यहोवा के नाम से जाना जाता था। मुझे मसीह भी कहा जाता था, और लोगों ने एक बार मुझे उद्धारकर्त्ता यीशु कहा था क्योंकि वे मुझ से प्रेम करते थे और मेरा आदर करते थे। किन्तु आज मैं वह यहोवा और यीशु नहीं हूँ जिसे लोग बीते समयों में जानते थे—मैं वह परमेश्वर हूँ जो अंत के दिनों में वापस आ गया है, वह परमेश्वर जो युग को समाप्त करेगा। वह परमेश्वर मैं स्वयं हूँ जो अपने स्वभाव की परिपूर्णता के साथ, और अधिकार, आदर एवं महिमा से भरपूर होकर पृथ्वी के अंतिम छोर से उदय होता हूँ।"

"चूँकि मनुष्य परमेश्वर में विश्वास करता है, तो उसे परमेश्वर के पदचिन्हों का करीब से, कदम दर कदम, अनुसरण करना होगा; और उसे “जहाँ कहीं मेम्ना जाता है उसका अनुसरण” करना चाहिए। केवल ये ही ऐसे लोग हैं जो सच्चे मार्ग को खोजते हैं, केवल ये ही ऐसे मनुष्य हैं जो पवित्र आत्मा के कार्य को जानते हैं। लोग जो दासत्व से पत्रों एवं सिद्धान्तों का अनुसरण करते हैं वे ऐसे लोग हैं जिन्हें पवित्र आत्मा के कार्य के द्वारा निष्कासित किया गया है। समय की प्रत्येक अवधि में, परमेश्वर नया कार्य आरम्भ करेगा, और प्रत्येक अवधि में, मनुष्य के बीच में एक नई शुरुआत होगी। यदि मनुष्य केवल इन सच्चाईयों में ही बना रहता है कि "यहोवा ही परमेश्वर है" और "यीशु ही मसीहा है," जो ऐसी सच्चाईयां हैं जो केवल एक अकेले युग पर ही लागू होती हैं, तो मनुष्य कभी भी पवित्र आत्मा के कार्य के साथ कदम नहीं मिला पाएगा, और वह हमेशा पवित्र आत्मा के कार्य को हासिल करने में असमर्थ रहेगा। इसकी परवाह किए बगैर कि परमेश्वर कैसे कार्य करता है, मनुष्य जरा सा भी सन्देह किए बिना अनुसरण करता है, और वह करीब से अनुसरण करता है। इस रीति से, पवित्र आत्मा के द्वारा मनुष्य को कैसे निष्काषित किया जा सकता है? इसकी परवाह किए बगैर कि परमेश्वर क्या करता है, जब तक मनुष्य को निश्चय है कि यह पवित्र आत्मा का कार्य है, और वह बिना किसी आशंका के पवित्र आत्मा के कार्य में सहयोग करता है, और परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करने का प्रयास करता है, तो उसे कैसे दण्ड दिया जा सकता है? परमेश्वर का कार्य कभी नहीं रूका है, उसके पदचिन्ह कभी नहीं थमे हैं, और उसके प्रबंधन के कार्य की पूर्णता से पहले, वह सदैव से व्यस्त रहा है, और कभी नहीं रुका है। किन्तु मनुष्य अलग हैः पवित्र आत्मा के कार्य के आंशिक भाग को प्राप्त करने के बाद, वह ऐसा व्यवहार करता है मानो वह कार्य कभी नहीं बदलेगा; थोड़ा का ज्ञान प्राप्त करने के बाद, वह परमेश्वर के नए कार्य के पदचिन्हों का अनुसरण करने के लिए आगे नहीं बढ़ता है; परमेश्वर के कार्य के सिर्फ छोटे से भाग को देखने के बाद, वह तुरन्त ही परमेश्वर को लकड़ी की एक विशिष्ट आकृति के रूप में निर्धारित करता है, और यह मानता है कि परमेश्वर सदैव इस आकार में बना रहेगा जिसे वह अपने सामने देखता है, कि यह भूतकाल में ऐसा ही था और भविष्य में भी ऐसा ही बना रहेगा; सिर्फ एक सतही ज्ञान प्राप्त करने के बाद, मनुष्य इतना घमण्डी हो जाता है कि वह स्वयं को भूल जाता है और बेहूदा ढंग से परमेश्वर के स्वभाव एवं अस्तित्व के विषय में घोषणा करता है कि साधारण तौर पर उनका कोई अस्तित्व नहीं है; और पवित्र आत्मा के कार्य के एक चरण का दृढ़ता से अनुसरण करने का चुनाव करने के बाद, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है की वह किस किस्म का व्यक्ति है जो परमेश्वर के नए कार्य की घोषणा करता है, मनुष्य इसे स्वीकार नहीं करता है। ये ऐसे लोग हैं जो पवित्र आत्मा के नए कार्य को स्वीकार नहीं कर सकते हैं; वे अति रूढ़िवादी हैं, और वे नई चीज़ों को स्वीकार करने में असमर्थ हैं। इस प्रकार के लोग ऐसे हैं जो परमेश्वर में विश्वास तो करते हैं किन्तु परमेश्वर का तिरस्कार भी करते हैं। मनुष्य विश्वास करता है कि इस्राएली ग़लत थे क्योंकि उन्होंने "केवल यहोवा में विश्वास किया और यीशु में विश्वास नहीं किया," फिर भी अधिकांश लोग एक ऐसी भूमिका निभाते हैं जिसके अंतर्गत वे "केवल यहोवा में विश्वास करते हैं तथा यीशु को ठुकराते हैं" और "मसीहा के वापस लौटने की लालसा करते हैं, किन्तु उस मसीहा का विरोध करते हैं जिसे यीशु कहते हैं।" तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि लोग पवित्र आत्मा के कार्य के एक चरण को स्वीकार करने के पश्चात् अभी भी शैतान के प्रभुत्व के अधीन जीवन बिताते हैं, और उन्होंने अभी भी परमेश्वर की आशीषों को प्राप्त नहीं किया है। क्या यह मनुष्य के विद्रोहीपन का परिणाम नहीं है? ...ऐसे लोग जो अंत तक मेम्ने के पदचिन्हों का अनुसरण करते हैं केवल वे ही अन्तिम आशीष को प्राप्त कर सकते हैं, जबकि वे "चतुर लोग", जो बिल्कुल अंत तक अनुसरण करने में असमर्थ हैं फिर भी विश्वास करते हैं कि उन्हें सब कुछ प्राप्त हो चुका है, वे परमेश्वर के प्रगटीकरण की गवाही देने में असमर्थ हैं। वे सब विश्वास करते हैं कि वे पृथ्वी पर सबसे चतुर व्यक्ति हैं, और वे अकारण ही परमेश्वर के कार्य के लगातार विकास को छोटा करते हैं, और ऐसा प्रतीत होता है कि वे पूर्ण निश्चयता के साथ विश्वास करते हैं कि परमेश्वर उन्हें स्वर्ग ले जाएगा, वे जिनके "पास परमेश्वर के प्रति अत्याधिक वफादारी है, परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, और परमेश्वर के वचन में बने रहते हैं।" यद्यपि उनके पास परमेश्वर के द्वारा बोले गए वचनों के प्रति "अत्याधिक वफादारी" है, फिर भी उनके वचन एवं कार्य अत्यंत घिनौने लगते हैं क्योंकि वे पवित्र आत्मा के कार्य का विरोध करते हैं, और छल एवं दुष्टता करते हैं। ऐसे लोग जो बिल्कुल अंत तक अनुसरण नहीं करते हैं, जो पवित्र आत्मा के कार्य के साथ कदम नहीं मिलाते हैं, और जो केवल पुराने कार्य से चिपके रहते हैं और वे न केवल परमेश्वर के प्रति वफादारी हासिल करने में असफल नहीं हुए हैं, बल्कि इसके विपरीत, वे ऐसे लोग बन गए हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं, वे ऐसे लोग बन गए हैं जिन्हें नए युग के द्वारा ठुकरा दिया गया है, और जिन्हें दण्ड दिया जाएगा। क्या उनसे भी अधिक बेचारा और कोई है? अनेक लोग यह भी विश्वास करते हैं कि वे सब जो प्राचीन व्यवस्था को ठुकराते हैं और नए कार्य को स्वीकार करते हैं वे विवेकहीन हैं। ये लोग, जो केवल विवेक की ही बात करते हैं, और पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं जानते हैं, अन्ततः उनके स्वयं के विवेक द्वारा उनके भविष्य की संभावनाओं को छोटा कर दिया जाएगा। परमेश्वर का कार्य सिद्धान्त के द्वारा बना नहीं रहता है, और यद्यपि यह उसका स्वयं का कार्य है, फिर भी परमेश्वर इससे अभी भी चिपका नहीं रहता है। जिसे नकारा जाना चाहिए उसे नकारा गया है, जिसे हटाया जाना चाहिए उसे हटाया गया है। फिर भी मनुष्य परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य के सिर्फ एक छोटे से भाग को ही पकड़े रहने के द्वारा स्वयं को परमेश्वर से शत्रुता की स्थिति में रख देता है। क्या यह मनुष्य की मूर्खता नहीं है? क्या यह मनुष्य की अज्ञानता नहीं है? लोग जितना अधिक भयभीत एवं अति सतर्क होते हैं क्योंकि वे परमेश्वर की आशीषों को प्राप्त न करने के विषय में डरते हैं, उतना ही अधिक वे और बड़ी आशीषों को हासिल करने, और अंतिम आशीष को पाने में असमर्थ होते हैं। ऐसे लोग जो दासत्व से व्यवस्था में बने रहते हैं वे सभी व्यवस्था के प्रति अत्यंत वफादारी का प्रदर्शन करते हैं, और वे जितना अधिक व्यवस्था के प्रति ऐसी वफादारी का प्रदर्शन करते हैं, उतना ही अधिक वे ऐसे विद्रोही होते हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं। क्योंकि अब राज्य का युग है और व्यवस्था का युग नहीं है, और आज के कार्य को अतीत के कार्य के विरूद्ध रोका नहीं जा सकता है, और अतीत के कार्य की तुलना आज के कार्य से नहीं की जा सकती है। परमेश्वर का कार्य बदल चुका है, और मनुष्य का रीति व्यवहार भी बदल चुका है, उसे व्यवस्था को पकड़े रहना या क्रूस को उठाना नहीं है। अतः, व्यवस्था एवं क्रूस के प्रति लोगों की वफादारी परमेश्वर की स्वीकृति को प्राप्त नहीं करेगी।"