01जब प्रभु लौटेंगे तो वे कैसे प्रकट होंगे और कार्य करेंगे? हमें कैसे सचेत रहना और इंतज़ार करना चाहिए ताकि प्रभु का स्वागत करने में सक्षम हो सकें?

1)फिर प्रभु वापस लौटने पर वास्तव में कैसे प्रकट होंगे और कार्य करेंगे?

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"इसलिये तुम भी तैयार रहो, क्योंकि जिस घड़ी के विषय में तुम सोचते भी नहीं हो, उसी घड़ी मनुष्य का पुत्र आ जाएगा" (मत्ती 24:44)।

"क्योंकि जैसे बिजली आकाश के एक छोर से कौंध कर आकाश के दूसरे छोर तक चमकती है, वैसे ही मनुष्य का पुत्र भी अपने दिन में प्रगट होगा। परन्तु पहले अवश्य है कि वह बहुत दु:ख उठाए, और इस युग के लोग उसे तुच्छ ठहराएँ" (लूका 17:24-25)।

"देख, मैं चोर के समान आता हूँ; धन्य वह है जो जागता रहता है, और अपने वस्त्र की चौकसी करता है कि नंगा न फिरे, और लोग उसका नंगापन न देखें" (प्रकाशितवाक्य 16:15)।

"देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूँ; यदि कोई मेरा शब्द सुनकर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आकर उसके साथ भोजन करूँगा और वह मेरे साथ" (प्रकाशितवाक्य 3:20)।

2)हमें सावधान रहते हुए कैसे प्रतीक्षा करनी चाहिए कि हम प्रभु के प्रकटन का स्वागत कर सकें?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद

"माँगो, तो तुम्हें दिया जाएगा; ढूँढ़ो तो तुम पाओगे; खटखटाओ, तो तुम्हारे लिये खोला जाएगा" (मत्ती 7:7)।

"आधी रात को धूम मची: 'देखो, दूल्हा आ रहा है! उससे भेंट करने के लिये चलो'" (मत्ती 25:6)।

"देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूँ; यदि कोई मेरा शब्द सुनकर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आकर उसके साथ भोजन करूँगा और वह मेरे साथ" (प्रकाशितवाक्य 3:20)।

"जिसके कान हों वह सुन ले कि आत्मा कलीसियाओं से क्या कहता है" (प्रकाशितवाक्य 2:7)।

"ये वे हैं जो स्त्रियों के साथ अशुद्ध नहीं हुए, पर कुँवारे हैं; ये वे ही हैं कि जहाँ कहीं मेम्ना जाता है, वे उसके पीछे हो लेते हैं" (प्रकाशितवाक्य 14:4)।

02हम ये कैसे निश्चित कर सकते हैं कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन परमेश्वर की वाणी हैं, कि प्रभु कार्य करने को प्रकट हुए हैं?

प्रभु के स्वागत के लिए जो सबसे महत्वपूर्ण है वो है परमेश्वर की वाणी को सुनना और उनके प्रकटन और कार्य को पहचानना। चूँकि बुद्धिमान कुंवारियों ने प्रभु के प्रकटन को देखा, उनकी वाणी सुनी और समझी इसलिए वे उनका स्वागत करने में सक्षम हुईं। तो हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कथनों और कार्यों से यह कैसे निश्चित कर सकते हैं कि उनके वचन परमेश्वर की वाणी हैं, कि प्रभु कार्य करने को प्रकट हुए हैं?

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"यीशु ने उससे कहा, 'मार्ग और सत्य और जीवन मैं ही हूँ; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुँच सकता'" (यूहन्ना 14:6)।

"मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा परन्तु जो कुछ सुनेगा वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा" (यूहन्ना 16:12-13)।

"जो मुझे तुच्छ जानता है और मेरी बातें ग्रहण नहीं करता है उसको दोषी ठहरानेवाला तो एक है: अर्थात् जो वचन मैं ने कहा है, वही पिछले दिन में उसे दोषी ठहराएगा" (यूहन्ना 12:48)।

"जिसके कान हों वह सुन ले कि आत्मा कलीसियाओं से क्या कहता है" (प्रकाशितवाक्य 2:7)।

"क्योंकि परमेश्‍वर का वचन जीवित, और प्रबल, और हर एक दोधारी तलवार से भी बहुत चोखा है; और प्राण और आत्मा को, और गाँठ-गाँठ और गूदे-गूदे को अलग करके आर-पार छेदता है और मन की भावनाओं और विचारों को जाँचता है" (इब्रानियों 4:12)।

यीशु मसीह के दूसरे आगमन का स्वागत—प्रत्याशा

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