I. परमेश्वर के घर से शुरू होने वाले न्याय के कार्य को करने के लिए प्रभु अंत के दिनों में प्रकट हुआ है और वचनों को बोला है। यह बाइबल की भविष्यवाणियों को पूर्णतः पूरा करता है: "जिसके कान हों वह सुन ले कि आत्मा कलीसियाओं से क्या कहता है। जो जय पाए, मैं उसे उस जीवन के पेड़ में से जो परमेश्‍वर के स्वर्गलोक में है, फल खाने को दूँगा" (प्रकाशितवाक्य 2:7)। "क्योंकि वह समय आ पहुँचा है कि पहले परमेश्‍वर के लोगों का न्याय किया जाए" (1 पतरस 4:17)। केवल बुद्धिमान कुँवारियाँ ही प्रभु की आवाज़ सुन सकती हैं और उसका स्वागत कर सकती हैं।

संदर्भ के लिए बाइबिल के पद

"देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूँ; यदि कोई मेरा शब्द सुनकर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आकर उसके साथ भोजन करूँगा और वह मेरे साथ" (प्रकाशितवाक्य 3:20)।

"जिसके कान हों वह सुन ले कि आत्मा कलीसियाओं से क्या कहता है।" (प्रकाशितवाक्य 2:7)।

"मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं; मैं उन्हें जानता हूँ, और वे मेरे पीछे पीछे चलती हैं" (यूहन्ना 10:27)।

"क्योंकि वह समय आ पहुँचा है कि पहले परमेश्‍वर के लोगों का न्याय किया जाए" (1 पतरस 4:17)।

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परमेश्वर के अति-उत्कृष्ट वचन

"परमेश्वर कहाँ प्रकट होता है? परमेश्वर के पदचिन्ह कहाँ हैं? क्या तुम लोगों को उत्तर मिला है? कई लोगों का उत्तर यह होगाः परमेश्वर उनके बीच में प्रकट होता है जो उसका अनुसरण करते हैं और उसके पदचिन्ह हमारे बीच में हैं; यह इतना आसान है! कोई भी व्यक्ति एक सूत्रबद्ध उत्तर दे सकता है, लेकिन क्या तुम लोग परमेश्वर के प्रकटीकरण को, और परमेश्वर के पदचिन्ह को समझते हो? परमेश्वर का प्रकट होना पृथ्वी पर कार्य करने के लिए उसके व्यक्तिगत आगमन को दर्शाता है। उसकी स्वयं की पहचान और स्वभाव के साथ, और उसकी निहित विधि में, वह एक युग की शुरुआत और एक युग के समाप्त होने के कार्य का संचालन करने के लिए मनुष्यों के बीच में उतरता है। इस प्रकार का प्रकट होना किसी समारोह का रूप नहीं है। यह एक संकेत नहीं है, एक चित्र, एक चमत्कार, या एक भव्यदर्शन नहीं है, और उससे भी कम यह एक धार्मिक प्रक्रिया भी नहीं है। ..."  और पढ़ें

"... चूँकि हम परमेश्वर के पदचिन्हों को खोज रहे हैं, हमें अवश्य ही परमेश्वर की इच्छा, परमेश्वर के वचन, परमेश्वर के कथन की खोज करनी चाहिए; क्योंकि जहां परमेश्वर के नए वचन हैं, वहाँ परमेश्वर की वाणी है, और जहां परमेश्वर के पदचिन्ह हैं, वहाँ परमेश्वर के कार्य हैं। जहां परमेश्वर की अभिव्यक्ति है, वहाँ परमेश्वर का प्रकट होना है, और जहां परमेश्वर का प्रकट होना है,वहाँ मार्ग, सत्य और जीवन का अस्तित्व है। ..."  और पढ़ें

"यद्यपि यीशु ने मनुष्यों के बीच अधिक कार्य किया है, उसने केवल समस्त मानवजाति के छुटकारे के कार्य को पूरा किया और वह मनुष्य की पाप-बलि बना, मनुष्य को उसके भ्रष्ट स्वभाव से छुटकारा नहीं दिलाया। शैतान के प्रभाव से मनुष्य को पूरी तरह बचाने के लिये यीशु को न केवल पाप-बलि के रूप में मनुष्यों के पापों को लेना आवश्यक था, बल्कि मनुष्य को उसके भ्रष्ट स्वभाव से पूरी तरह मुक्त करने के लिए परमेश्वर को और भी बड़े कार्य करने की आवश्यकता थी जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया था। और इसलिए, मनुष्य को उसके पापों के लिए क्षमा कर दिए जाने के बाद, एक नये युग में मनुष्य की अगुवाई करने के लिए परमेश्वर वापस देह में लौटा, और उसने ताड़ना एवं न्याय के कार्य को आरंभ किया, और इस कार्य ने मनुष्य को एक उच्चतर क्षेत्र में पहुँचा दिया। ..."  और पढ़ें

"न्याय का कार्य जिस चीज़ को उत्पन्न करता है वह है परमेश्वर के असली चेहरे और उसकी स्वयं की विद्रोहशीलता के सत्य के बारे में मनुष्य में समझ। न्याय का कार्य मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा की, परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य की, और उन रहस्यों की अधिक समझ प्राप्त करने देता है जो उसके लिए अबोधगम्य हैं। यह मनुष्य को उसके भ्रष्ट सार तथा उसकी भ्रष्टता के मूल को पहचानने और जानने, साथ ही मनुष्य की कुरूपता को खोजने देता है। ये सभी प्रभाव न्याय के कार्य के द्वारा निष्पादित होते हैं, क्योंकि इस कार्य का सार वास्तव में उन सभी के लिए परमेश्वर के सत्य, मार्ग और जीवन का मार्ग प्रशस्त करने का कार्य है जिनका उस पर विश्वास है। यह कार्य परमेश्वर के द्वारा किया गया न्याय का कार्य है। ..."  और पढ़ें

"राज्य के युग में, परमेश्वर नए युग की शुरूआत करने, अपने कार्य के साधन बदलने, और संपूर्ण युग में काम करने के लिये अपने वचन का उपयोग करता है। वचन के युग में यही वह सिद्धांत है, जिसके द्वारा परमेश्वर कार्य करता है। वह देहधारी हुआ ताकि विभिन्न दृष्टिकोणों से बातचीत कर सके, मनुष्य वास्तव में परमेश्वर को देख सके, जो देह में प्रकट होने वाला वचन है, और उसकी बुद्धि और आश्चर्य को जान सके। उसने यह कार्य इसलिए किये ताकि वह मनुष्यों को जीतने, उन्हें पूर्ण बनाने और ख़त्म करने के लक्ष्यों को बेहतर ढंग से हासिल कर सके। वचन के युग में वचन को उपयोग करने का यही वास्तविक अर्थ है। वचन के द्वारा परमेश्वर के कार्यों को, परमेश्वर के स्वभाव को, मनुष्य के मूल तत्व और इस राज्य में प्रवेश करने के लिए मनुष्य को क्या करना चाहिए ..."  और पढ़ें

"अंततः, मेरे वचनों के कारण सारे राष्ट्र धन्य हों जाएँगे, और मेरे वचनों के कारण टुकड़े-टुकड़े भी कर दिए जाएँगे। इस तरह, अंत के दिनों के दौरान सभी लोग देखेंगे कि मैं ही वह उद्धारकर्त्ता हूँ जो वापस लौट आया है, मैं ही वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर हूँ जो समस्त मानवजाति को जीतता है, और मैं एक समय मनुष्य के लिए पाप बलि था, किन्तु अंत के दिनों में मैं सूरज की आग की ज्वाला भी बन जाता हूँ जो सभी चीज़ों को जला देती है, और साथ ही मैं धार्मिकता का सूर्य भी बन जाता हूँ जो सभी चीज़ों को प्रकट कर देता है। अंत के दिनों का मेरा कार्य ऐसा ही है। ..."  और पढ़ें

सम्पूर्ण पाठ

Ⅱ. बुद्धिमान कुँवारियों ने निर्धारित किया है कि परमेश्वर की आवाज़ सुनकर, उसका प्रकटन और कार्य देख कर प्रभु लौटा है। इस प्रकार, उन्होंने परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार कर लिया और मेम्ने के पदचिह्नों का अनुसरण कर रही हैं और प्रभु के साथ भोज में उपस्थित हैं।

बुद्धिमान कुँवारियाँ असल में क्या हैं?

संदर्भ के लिए बाइबिल के पद

"तब स्वर्ग का राज्य न दस कुँवारियों के समान होगा जो अपनी मशालें लेकर दूल्हे से भेंट करने को निकलीं।...परन्तु समझदारों ने अपनी मशालों के साथ अपनी कुप्पियों में तेल भी भर लिया।...आधी रात को धूम मची : 'देखो, दूल्हा आ रहा है! उससे भेंट करने के लिये चलो।' तब वे सब कुँवारियाँ उठकर अपनी मशालें ठीक करने लगीं।......और जो तैयार थीं, वे उसके साथ विवाह के घर में चली गईं और द्वार बन्द किया गया" (मत्ती 25:1,4,6-7,10)।

"ये वे ही हैं कि जहाँ कहीं मेम्ना जाता है, वे उसके पीछे हो लेते हैं" (प्रकाशितवाक्य 14:4)।

"क्योंकि मेम्ना जो सिंहासन के बीच में है उनकी रखवाली करेगा, और उन्हें जीवन रूपी जल के सोतों के पास ले जाया करेगा; और परमेश्‍वर उनकी आँखों से सब आँसू पोंछ डालेगा" (प्रकाशितवाक्य 7:17)।

"माँगो, तो तुम्हें दिया जाएगा; ढूँढ़ो तो तुम पाओगे; खटखटाओ, तो तुम्हारे लिये खोला जाएगा" (मत्ती 7:7)।

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परमेश्वर के अति-उत्कृष्ट वचन

पाँच बुद्धिमान कुँवारियों का अर्थ जनसंख्या है,... यही कारण है कि उन्हें अंत के दिनों में तेल तैयार करने के लिए कहा गया है। (सृजन में मेरी गुणवत्ता नहीं होती है; यदि वे बुद्धिमान लोग बनाना चाहते हैं तो उन्हें तेल तैयार करने की आवश्यकता है, और इस प्रकार उन्हें मेरे वचनों से सुसज्जित होने की आवश्यकता है)। पाँच बुद्धिमान कुँवारियाँ मनुष्यों के बीच में से मेरे पुत्रों और मेरे लोगों को दर्शाती हैं जिन्हें मैंने बनाया था। उन्हें "कुँवारियाँ" संबोधित करना[क] इसलिए है क्योंकि यद्यपि वे पृथ्वी पर पैदा हुए हैं, फिर भी वे मेरे द्वारा प्राप्त कर लिए जाते हैं; कोई कह सकता है कि वे पवित्र हो गए हैं, इसलिए उन्हें "कुँवारियाँ" कहा जाता है।

"परमेश्वर उन्हें चाहता है जो नई रोशनी को स्वीकार करने में सक्षम हैं, और वह उन्हें चाहता है जो उसके नवीनतम कार्य को स्वीकार करते और जान लेते हैं। ऐसा क्यों कहा गया है कि तुम लोगों को शुद्ध कुँवारी होना चाहिए? एक शुद्ध कुँवारी पवित्र आत्मा के कार्य की तलाश करने में और नई चीज़ों को समझने में सक्षम होती है, और इसके अलावा, पुरानी अवधारणाओं को दूर करने और परमेश्वर के आज के कार्य का अनुसरण करने में सक्षम होती है। इस समूह के लोगों को, जो आज के नवीनतम कार्य को स्वीकार करते हैं, परमेश्वर ने युगों पहले ही पूर्वनिर्धारित किया था, और वे सभी लोगों में सबसे अधिक धन्य हैं। ..."  और पढ़ें

"परमेश्वर उनकी खोज कर रहा है जो उसके प्रकट होने की लालसा करते हैं। वह उनकी खोज करता है जो उसके वचनों को सुनने में सक्षम हों, जो उसके आदेश को नहीं भूले हों और अपने हृदय एवं शरीर को उसके प्रति समर्पित करते हों। वह उनकी खोज करता है जो उसके सामने बच्चों के समान आज्ञाकारी हों, और उसका विरोध न करते हों। यदि तुम परमेश्वर के प्रति अपने समर्पण में किसी भी ताकत से अबाधित हो, तो परमेश्वर तुम्हारे ऊपर अनुग्रह की दृष्टि डालेगा और अपने आशीष तुम्हें प्रदान करेगा। ..."  और पढ़ें

सम्पूर्ण पाठ
धर्मोपदेश और संगति

"अनुग्रह के युग के दौरान, यीशु ने बुद्धिमान कुँवारियों के बारे में बात की। यह समस्त रहस्य किस बारे में है? बुद्धिमान कुँवारी शब्द का क्या अर्थ है? मुख्य बात यह है कि वह परमेश्वर की आवाज़ पहचानती है। जब वह इसे सुनती है, तो वह सोचती है, 'मैं ऐसा क्यों सोचती हूँ कि जो बातें यह मनुष्य का पुत्र कह रहा है वे परमेश्वर के वचन हैं? ऐसा क्यों प्रतीत होता है कि उसके पास परमेश्वर की आवाज़ है? ये ऐसी बातें हैं जिन्हें मनुष्य नहीं कह सकता है। यह परमेश्वर की आवाज़ है। इसलिए मुझे उस में अवश्य विश्वास करना चाहिए। वह मसीह है। वह देहधारी परमेश्वर है।' देखो, इसलिए वह बुद्धिमान है। अब, मूर्ख कुँवारियाँ मूर्ख क्यों हैं? यह इसलिए है क्योंकि वे सोचती हैं, 'क्या यह बस एक मनुष्य नहीं है? क्या यह नासरत का यीशु नहीं है? क्या यह बस एक सामान्य आदमी नहीं है? वह परमेश्वर कैसे हो सकता है? हम उसमें विश्वास नहीं करेंगी। हम स्वर्ग के परमेश्वर पर विश्वास करती हैं।' आप देखो, वे आध्यात्मिक मामलों को नहीं समझते हैं, ठीक है? ये लोग मानते हैं कि वे अपने आप में सही हैं और कि वे न्यायोचित हैं। इसका परिणाम यह था कि परमेश्वर बुद्धिमानों को उनकी स्वयं की चतुराई में फँसा देता है। क्या आप बुद्धिमान नहीं हैं? क्या आप ऐसे व्यक्ति नहीं हैं जो मनुष्य में विश्वास नहीं करता है? ..."

सम्पूर्ण पाठ

बुद्धिमान कुँवारियाँ कैसे परमेश्वर की आवाज़ सुनती हैं और प्रभु का स्वागत करती हैं?

संदर्भ के लिए बाइबिल के पद

"मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा परन्तु जो कुछ सुनेगा वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा" (यूहन्ना 16:12-13)।

"धन्य हैं वे, जो मन के दीन हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है" (मत्ती 5:3)।

"धन्य हैं वे, जो धार्मिकता के भूखे और प्यासे हैं, क्योंकि वे तृप्‍त किए जाएँगे" (मत्ती 5:6)।

"धन्य हैं वे, जिन के मन शुद्ध हैं, क्योंकि वे परमेश्‍वर को देखेंगे" (मत्ती 5:8)।

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परमेश्वर के अति-उत्कृष्ट वचन

"जो देहधारी परमेश्वर है, वह परमेश्वर का सार धारण करेगा, और जो देहधारी परमेश्वर है, वह परमेश्वर की अभिव्यक्ति धारण करेगा। चूँकि परमेश्वर देहधारी हुआ, वह उस कार्य को प्रकट करेगा जो उसे अवश्य करना चाहिए, और चूँकि परमेश्वर ने देह धारण किया, तो वह उसे अभिव्यक्त करेगा जो वह है, और मनुष्यों के लिए सत्य को लाने के समर्थ होगा, मनुष्यों को जीवन प्रदान करने, और मनुष्य को मार्ग दिखाने में सक्षम होगा। जिस शरीर में परमेश्वर का सार नहीं है, निश्चित रूप से वह देहधारी परमेश्वर नहीं है; इस बारे में कोई संदेह नहीं है। यह पता लगाने के लिए कि क्या यह देहधारी परमेश्वर है, मनुष्य को इसका निर्धारण उसके द्वारा अभिव्यक्त स्वभाव से और उसके द्वारा बोले वचनों से अवश्य करना चाहिए। कहने का अभिप्राय है, कि वह परमेश्वर का देहधारी शरीर है या नहीं, और यह सही मार्ग है या नहीं, इसे परमेश्वर के सार से तय करना चाहिए। और इसलिए, यह निर्धारित करने[अ] में कि यह देहधआरी परमेश्वर का शरीर है या नहीं, बाहरी रूप-रंग के बजाय, उसके सार (उसका कार्य, उसके वचन, उसका स्वभाव और बहुत सी अन्य बातें) पर ध्यान देना ही कुंजी है। यदि मनुष्य केवल उसके बाहरी रूप-रंग को ही देखता है, उसके तत्व की अनदेखी करता है, तो यह मनुष्य की अज्ञानता और उसके अनाड़ीपन को दर्शाता है।"

"मैं वो हूं जिसे अनंत युगों पहले पूजा जाता था, और मैं वो शिशु भी हूं जिसे अनंत युगों पहले इस्राएलियों द्वारा त्याग दिया गया था। इसके अलावा, मैं आज के युग का सर्व-महिमामय सर्वशक्तिमान परमेश्वर हूं! सभी मेरे सिंहासन के समक्ष आओ और मेरी महिमामयी मुखाकृति का अवलोकन करो, मेरी वाणी सुनो, और मेरे कर्मों को देखो। यही मेरी इच्छा की समग्रता है; यही मेरी योजना का अंत और चरम है, तथा मेरे प्रबंधन का प्रयोजन है। सभी देश मेरी आराधना करें, सभी जिह्वा मुझे स्वीकृति दें, हर व्यक्ति मुझमें निष्ठा रखे, और प्रत्येक व्यक्ति मेरी प्रजा बने! ..."  और पढ़ें

"... जब परमेश्वर के मुख से ऐसे वचन बोले जाते हैं, तो वे परमेश्वर के सच्चे स्वभाव का प्रकाशन एवं प्रकटीकरण होते हैं, वे परमेश्वर की हस्ती एवं अधिकार का एक पूर्ण प्रकाशन एवं प्रदर्शन होते हैं, और ऐसा कुछ भी नहीं है जो परमेश्वर की पहचान के प्रमाण के रूप में कहीं अधिक सही और उचित होता है। बोले गए ऐसे कथनों की रीति, अन्दाज़, और शब्द सृष्टिकर्ता की पहचान के बिलकुल उचित चिन्ह हैं, और परमेश्वर की खुद की पहचान के प्रकटीकरण से पूरी तरह से मेल खाते हैं, और उसमें कोई झूठा दिखावा, या अशुद्धता नहीं है; वे पूरी और सम्पूर्ण रीति से सृष्टिकर्ता के अधिकार और हस्ती का पूर्ण प्रदर्शन हैं। ..."  और पढ़ें

"परमेश्वर का वचन वास्तव में परमेश्वर के स्वभाव का एक प्रकटन है। आप परमेश्वर के वचन से मानवजाति के लिए परमेश्वर के प्रेम, उनके द्वारा मानवजाति का उद्धार, और जिस तरह से वे उन्हें बचाते हैं उसे देख सकते हैं.....क्योंकि परमेश्वर का वचन, परमेश्वर के द्वारा उसे लिखने हेतु मनुष्य के उपयोग के विपरीत, परमेश्वर के द्वारा ही प्रकट होता है। यह व्यक्तिगत रूप में परमेश्वर के द्वारा प्रकट किया जाता है। यह स्वयं परमेश्वर है जो अपने स्वयं के वचनों और अपने भीतर की आवाज़ को प्रकट कर रहा है। हम उन्हें हार्दिक वचन क्यों कहते हैं? क्योंकि वे बहुत गहराई से निकलते हैं, और परमेश्वर के स्वभाव, उनकी इच्छा, उनके विचारों, मानवजाति के लिए उनके प्रेम, उनके द्वारा मानवजाति उद्धार, तथा मानवजाति से उनकी अपेक्षाओं को प्रकट कर रहे हैं। परमेश्वर के वचनों के बीच कठोर वचन, शांत एवं कोमल वचन, कुछ विचारशील वचन हैं, और कुछ प्रकाशित करने से सम्बन्धी वचन हैं जो अमानवीय हैं। ..."  और पढ़ें

"इस बार, परमेश्वर कार्य करने आत्मिक देह में नहीं, बल्कि एक एकदम साधारण देह में आया है। यह न केवल परमेश्वर के दूसरी बार देहधारण की देह है, बल्कि यह वही देह है जिसमें वह लौटकर आया है। यह बिलकुल साधारण देह है। इस देह में दूसरों से अलग कुछ भी नहीं है, परंतु तुम उससे वह सत्य ग्रहण कर सकते हो जिसके विषय में तुमने पहले कभी नहीं सुना होगा। यह तुच्छ देह, परमेश्वर के सभी सत्य-वचन का मूर्त रूप है, जो अंत के दिनों में परमेश्वर का काम करती है, और मनुष्यों के जानने के लिये यही परमेश्वर के संपूर्ण स्वभाव की अभिव्यक्ति है। क्या तुमने परमेश्वर को स्वर्ग में देखने की प्रबल अभिलाषा नहीं की? ..."  और पढ़ें

"वह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है और परमेश्वर के हृदय की आवाज़, परमेश्वर के सभी प्रोत्साहनों, और मनुष्यजाति के प्रति परमेश्वर के न्याय के सभी वचनों को व्यक्त करता है। उसने एक नया युग, एक नया काल आरंभ किया है, और वह एक नया स्वर्ग और पृथ्वी, नया काम लाया है, और वह हमारे लिए नई आशा लाया है, और हमारे उस जीवन का अंत किया है जिसे हम अस्पष्टता में जी रहे थे, और हमें उद्धार के मार्ग को पूर्ण रूप से देखने दिया है। उसने हमारे संपूर्ण व्यक्तित्व को जीता है, हमारे हृदयों को जीता है। उस क्षण के बाद से, हमारे मन सचेत हो गए हैं, और हमारी आत्माएँ पुर्नजीवित होती हुई प्रतीत होने लगी हैं: यह साधारण, महत्वहीन व्यक्ति, जो हमारे बीच में रहता है, जिसे हमने लंबे समय तक तिरस्कृत किया है—क्या वह प्रभु यीशु नहीं हैं; जो सदैव हमारे विचारों में हैं और जिसके लिए हम रात-दिन लालायित रहते हैं? यह वही है! यह वास्तव में वही है! वह हमारा परमेश्वर है! वह सत्य, मार्ग, और जीवन है! ..."  और पढ़ें

सम्पूर्ण पाठ
सुसमाचार के प्रश्नोत्तर

प्रभु यीशु अब वापस आ गया है और उसका एक नया नाम है—सर्वशक्तिमान परमेश्वर। पुस्तक "वचन देह में प्रकट होता है" में सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने वचनों को व्यक्त किया है, और यह दूल्हे की वाणी है, फिर भी कई भाई-बहन अभी भी परमेश्वर की वाणी को पहचानने में असमर्थ हैं। और इसलिए, आज हमने सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया से गवाहों को आमंत्रित किया है। हमने उन्हें इस बारे में हमारे साथ संगति करने के लिए आमंत्रित किया है कि परमेश्वर की वाणी को कैसे पहचानें। तो हम यह जानेंगे कि यह कैसे सुनिश्चित किया जाए कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही प्रभु यीशु की वापसी है।

उत्तर देखें

Ⅲ. मूर्ख कुँवारियाँ परमेश्वर की आवाज़ नहीं सुन सकती हैं; वे हठपूर्वक बाइबल के प्रत्येक शब्द से चिपकी रहती हैं, और पादरियों तथा बुज़ुर्गों के वचनों की आराधना करती हैं और उनमें विश्वास करती हैं। इसलिए, वे सच्चे मार्ग की तलाश या जाँच-पड़ताल नहीं करती हैं, और जिसके फलस्वरूप उन्होंने प्रभु का स्वागत नहीं किया है—उन्हें उजागर किया गया है, ख़त्म किया गया है, और वे विपत्ति में पड़ जाएँगी।

मूर्ख कुँवारियाँ असल में क्या हैं?

संदर्भ के लिए बाइबिल के पद

"तब स्वर्ग का राज्य उन दस कुँवारियों के समान होगा जो अपनी मशालें लेकर दूल्हे से भेंट करने को निकलीं। उनमें पाँच मूर्ख और पाँच समझदार थीं। मूर्खों ने अपनी मशालें तो लीं, परन्तु अपने साथ तेल नहीं लिया; ... जब दूल्हे के आने में देर हुई, तो वे सब ऊँघने लगीं और सो गईं। आधी रात को धूम मची: 'देखो, दूल्हा आ रहा है! उससे भेंट करने के लिये चलो।' तब वे सब कुँवारियाँ उठकर अपनी मशालें ठीक करने लगीं। और मूर्खों ने समझदारों से कहा, 'अपने तेल में से कुछ हमें भी दो, क्योंकि हमारी मशालें बुझी जा रही हैं।' परन्तु समझदारों ने उत्तर दिया, 'कदाचित् यह हमारे और तुम्हारे लिये पूरा न हो; भला तो यह है कि तुम बेचनेवालों के पास जाकर अपने लिये मोल ले लो।' जब वे मोल लेने को जा रही थीं तो दूल्हा आ पहुँचा, और जो तैयार थीं, वे उसके साथ विवाह के घर में चली गईं और द्वार बन्द किया गया। इसके बाद वे दूसरी कुँवारियाँ भी आकर कहने लगीं, 'हे स्वामी, हे स्वामी, हमारे लिये द्वार खोल दे!' उसने उत्तर दिया, 'मैं तुम से सच कहता हूँ, मैं तुम्हें नहीं जानता'" (मत्ती 25:1-3, 5-12)।

"उनके विषय में यशायाह की यह भविष्यद्वाणी पूरी होती है: 'तुम कानों से तो सुनोगे, पर समझोगे नहीं; और आँखों से तो देखोगे, पर तुम्हें न सूझेगा। क्योंकि इन लोगों का मन मोटा हो गया है, और वे कानों से ऊँचा सुनते हैं और उन्होंने अपनी आँखें मूंद ली हैं; कहीं ऐसा न हो कि वे आँखों से देखें, और कानों से सुनें और मन से समझें, और फिर जाएँ, और मैं उन्हें चंगा करूँ'" (मत्ती 13:14-15)।

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परमेश्वर के अति-उत्कृष्ट वचन

"वह जिसके कान हो, सुन ले कि आत्मा ने कलीसियाओं से क्या कहा।” क्या तुमने अब पवित्र आत्मा के वचन सुन लिए हैं? परमेश्वर के वचन तुम्हें अचानक मिले हैं। क्या तुम उन्हें सुनते हो? अंत के दिनों में परमेश्वर वचन का कार्य करता है, और ऐसे वचन पवित्र आत्मा के वचन हैं, क्योंकि परमेश्वर पवित्र आत्मा है और देहधारी भी हो सकता है; इसलिए, पवित्र आत्मा के वचन, जैसे अतीत में बोले गए थे, आज देहधारी परमेश्वर के वचन हैं। कई विवेकहीन मनुष्य हैं जिनका मानना है कि पवित्र आत्मा के वचन मनुष्य के कान में सीधे स्वर्ग से उतर कर आने चाहिए। इस प्रकार सोचने वाला कोई भी परमेश्वर के कार्य को नहीं जानता है। ..."  और पढ़ें

"जो लोग पवित्र आत्मा के कार्य से हटा दिए गए हैं, वे वो लोग हैं जो परमेश्वर के नवीनतम कार्य का अनुसरण करने में असमर्थ हैं, और जो परमेश्वर के नवीनतम कार्य के विरुद्ध विद्रोह करते हैं। ऐसा लोग खुले आम परमेश्वर का विरोध इसलिए करते हैं कि परमेश्वर ने नया कार्य किया है, और परमेश्वर की छवि उनकी धारणाओं के अनुरूप नहीं है—जिसके परिणामस्वरूप वे परमेश्वर का खुले आम विरोध करते हैं और परमेश्वर पर निर्णय देते हैं, जिससे वे स्वयं के लिए परमेश्वर की घृणा और अस्वीकृति उत्पन्न करते हैं। ..."  और पढ़ें

"यदि तू परमेश्वर के कथनों को ही नहीं पहचान सकता है, तो तू परमेश्वर के प्रकट होने को देखने के योग्य कैसे हो सकता है? जहाँ परमेश्वर प्रकट होता है, वहाँ सत्य की अभिव्यक्ति है, और वहाँ परमेश्वर की वाणी है। केवल वे ही लोग, जो सत्य को स्वीकार कर सकते हैं परमेश्वर की वाणी सुन सकते हैं, और केवल ऐसे लोग ही परमेश्वर के प्रकट होने को देखने के योग्य हैं। ..."  और पढ़ें

"उनके विश्वास के अनुसार, परमेश्वर से जो कुछ भी शाश्वत उद्धार प्राप्त करने के लिए आवश्यक है वह है व्यवस्था को बनाए रखना, और जब तक वे पश्चाताप करते और अपने पापों को स्वीकार करते रहेंगे, तब तक परमेश्वर का हृदय हमेशा संतुष्ट रहेगा। वे इस विचार के हैं कि परमेश्वर केवल वही हो सकता है जो व्यवस्था के अधीन है और जिसे मनुष्य के लिए सलीब पर चढ़ाया गया था; उनका यह भी विचार है कि परमेश्वर बाइबल से बढ़कर नही होना चाहिए और नही हो सकता है। ये ठीक इस प्रकार के विचार हैं जिन्होंने उन्हें पुरानी व्यवस्था में दृढ़ता से बाँध दिया है और कठोर नियमों में जकड़ कर रख दिया है। ..."  और पढ़ें

"जो शैतान से संबंधित होते हैं वे परमेश्वर के वचनों को नहीं समझते हैं और जो परमेश्वर से संबंधित होते हैं वे परमेश्वर की आवाज़ को सुन सकते हैं। वे सभी लोग जो मेरे द्वारा बोले गए वचनों को महसूस करते और समझते हैं ऐसे लोग हैं जो बचाए जाएँगे, और परमेश्वर की गवाही देंगे; वे सभी लोग जो मेरे द्वारा बोले गए वचनों को नहीं समझते हैं परमेश्वर की गवाही नहीं दे सकते हैं, ..."  और पढ़ें

सम्पूर्ण पाठ

मूर्ख कुँवारियों को कैसे उजागर और ख़त्म किया जाता है?

संदर्भ के लिए बाइबिल के पद

"जो मेरे साथ नहीं वह मेरे विरोध में है, और जो मेरे साथ नहीं बटोरता वह बिखेरता है" (लूका 11:23)।

"उसका सूप उस के हाथ में है, और वह अपना खलिहान अच्छी रीति से साफ करेगा, और अपने गेहूँ को तो खत्ते में इकट्ठा करेगा, परन्तु भूसी को उस आग में जलाएगा जो बुझने की नहीं" (मत्ती 3:12)।

"देखो, वह बादलों के साथ आनेवाला है, और हर एक आँख उसे देखेगी, वरन् जिन्होंने उसे बेधा था वे भी उसे देखेंगे, और पृथ्वी के सारे कुल उसके कारण छाती पीटेंगे" (प्रकाशितवाक्य 1:7)।

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परमेश्वर के अति-उत्कृष्ट वचन

"जो लोग मसीहा को नहीं जानते थे वे सभी यीशु का विरोध करने में, यीशु को अस्वीकार करने में, उन्हें बदनाम करने में सक्षम थे। जो लोग यीशु को नहीं समझते हैं वे सब उसे अस्वीकार करने एवं उन्हें बुरा भला कहने में सक्षम हैं। इसके अलावा, वे यीशु के लौटने को शैतान के द्वारा दिए जाने वाले धोखे के समान देखने में सक्षम हैं और अधिकांश लोग देह में लौटने की यीशु की निंदा करेंगे। क्या इस सबसे तुम लोगों को डर नहीं लगता है? जिसका तुम लोग सामना करते हो वह पवित्र आत्मा के विरोध में ईशनिंदा होगी, कलीसियाओं के लिए पवित्र आत्मा के वचनों का विनाश होगा और यीशु के द्वारा व्यक्त किए गए समस्त को ठुकराना होगा। यदि तुम लोग इतने संभ्रमित हो तो यीशु से क्या प्राप्त कर सकते हो? यदि तुम लोग हठधर्मिता से अपनी गलतियों को मानने से इनकार करते हो, तो श्वेत बादल पर यीशु के देह में लौटने पर तुम लोग यीशु के कार्य को कैसे समझ सकते हो? यह मैं तुम लोगों को बताता हूँ: जो लोग सत्य को स्वीकार नहीं करते हैं, मगर अंधों की तरह यीशु के श्वेत बादलों पर आगमन का इंतज़ार करते हैं, निश्चित रूप से पवित्र आत्मा के विरोध में ईशनिंदा करेंगे, और ये वे प्रजातियाँ हैं जो नष्ट कर दी जाएँगीं। ..."  और पढ़ें

"दरअसल वे बाइबल के रक्षक थे। बाइबल के हितों की सुरक्षा करने, और बाइबल की मर्यादा को बनाये रखने, और बाइबल की प्रतिष्ठा को बचाने के लिए, वे यहाँ तक गिर गए कि उन्होंने दयालु यीशु को भी क्रूस पर चढ़ा दिया। यह उन्होंने सिर्फ़ बाइबल की रक्षा करने के लिए, और लोगों के हृदय में बाइबल के हर एक वचन के स्तर को बनाये रखने के लिए ही किया। इस प्रकार उन्होंने यीशु को, जिसने पवित्रशास्त्र के सिद्धान्त का पालन नहीं किया, मृत्यु दंड देने के लिये अपने भविष्य और पापबलि को त्यागना बेहतर समझा। क्या वे पवित्रशास्त्र के हर एक वचन के नौकर नहीं थे? ..."  और पढ़ें

"और आज के लोगों के विषय में क्या कहें? मसीह सत्य को बताने के लिए आया है, फिर भी वे निश्चय ही स्वर्ग में प्रवेश प्राप्त करने और अनुग्रह को पाने के लिए उसे मनुष्य के मध्य में से बाहर निकाल देंगे। वे निश्चय ही बाइबल के हितों की सुरक्षा करने के लिए सत्य के आगमन को भी नकार देंगे, और निश्चय ही वापस देह में आये हुए मसीह को बाइबल के अस्तित्व को अनंतकाल तक सुनिश्चित करने के लिए फिर से सूली पर चढ़ा देंगे। कैसे मनुष्य मेरे उद्धार को ग्रहण कर सकता है, जब उसका हृदय इतना अधिक द्वेष से भरा है, और मेरे प्रति उसका स्वभाव ही इतना विरोध से भरा है?"

"कुछ लोग सत्य में आनन्द नहीं मनाते हैं, न्याय की तो ही दूर है। बल्कि वे शक्ति और धन में आनन्द मनाते हैं; इस प्रकार के लोग मिथ्याभिमानी समझे जाते हैं। ये लोग अनन्य रूप से संसार के प्रभावशाली सम्प्रदायों तथा सेमिनारियों से निकलने वाले पादरियों और शिक्षकों की खोज में लगे रहते हैं। सत्य के मार्ग को स्वीकार करने के बावजूद, वे उलझन में फंसे रहते हैं और अपने तुम को पूरी तरह से समर्पित करने में असमर्थ होते हो। वे परमेश्वर के लिए बलिदान की बात करते हैं, परन्तु उनकी आखें महान पादरियों और शिक्षकों पर केन्द्रित रहती हैं और मसीह को किनारे कर दिया जाता है। ..."  और पढ़ें

"तुम लोग नहीं जानते हो कि परमेश्वर क्या है, तुम लोग नहीं जानते हो कि ईसा क्या है, तुम लोग नहीं जानते हो कि यहोवा का आदर कैसे करें, तुम लोग नहीं जानते हो कि कैसे पवित्र आत्मा के कार्य में प्रवेश किया जाए, और तुम लोग नहीं जानते हो कि परमेश्वर के स्वंय के कार्य और मनुष्य के धोखे के बीच कैसे भेद करें। तुम परमेश्वर के द्वारा व्यक्त किये गए किसी सत्य के वचन की केवल निंदा करना ही जानते हो जो तुम्हारे विचार के अनुरूप नहीं होता है। तुम्हारी विनम्रता कहाँ है? तुम्हारी आज्ञाकारिता कहाँ है? तुम्हारी सत्यनिष्ठा कहाँ है? सत्य को खोजने की तुम्हारी इच्छा कहाँ है? ..."  और पढ़ें

सम्पूर्ण पाठ
धर्मोपदेश और संगति

"तथाकथित 'बुद्धिमान कुँवारियाँ' उन लोगों का प्रतिनिधित्व करती हैं जो परमेश्वर की आवाज़ पहचान सकते हैं और 'दूल्हे' की आवाज़ सुन सकते हैं और इसलिए जो मसीह को स्वीकार कर सकते हैं और उसके प्रति समर्पित हो सकते हैं, जिससे व्यावहारिक परमेश्वर को घर ले जाते हैं। और क्योंकि 'मूर्ख कुँवारियाँ' 'दूल्हे' की आवाज़ नहीं जानती हैं और परमेश्वर की आवाज़ को नहीं पहचान सकती हैं, इसलिए वे मसीह को अस्वीकार करती हैं। वे अभी भी अस्पष्ट परमेश्वर की आशा करती हैं, इसलिए उनका परित्याग कर दिया जाता है और उन्हें निकाल दिया जाएगा। इसलिए हम देख सकते हैं कि परमेश्वर में विश्वास में वास्तविक निष्ठा के बिना मसीह को स्वीकार करना बहुत मुश्किल है।जो लोग मसीह को स्वीकार करने से इनकार करते हैं वे 'परमप्रिय की शादी के भोज' से चूक जाएँगे और उन्हें स्वर्ग के राज्य में प्रभु द्वारा उनके घर वापस नहीं ले जाया जा सकता है ..."

"बुद्धिमान कुँवारियाँ प्रभु की आवाज़ को पहचान सकती हैं, मुख्यतः क्योंकि बुद्धिमान कुँवारियाँ वे लोग हैं जो सत्य से प्रेम करते हैं और सत्य की खोज करते हैं। वे परमेश्वर के प्रकटन के लिए प्यासे होते हैं, इसलिए वे परमेश्वर के आगमन की खोज और जाँच-पड़ताल कर पाते हैं। वे प्रभु की आवाज़ में भेद कर पाने में सक्षम होते हैं। चूँकि मूर्ख कुँवारियाँ सत्य से प्रेम नहीं करती हैं, इसलिए वे प्रभु के आगमन की खोज और जाँच-पड़ताल नहीं करती हैं। वे बस हठभूर्वक नियमों से चिपकी रह सकती हैं। इनमें से कुछ लोग तब तक स्वीकार या जाँच-पड़ताल नहीं करते हैं जब तक कि वह एक बादल पर आने वाला प्रभु न हो। अन्य लोग धार्मिक दुनिया के पादरियों तथा बुज़ुर्गों की चालबाजियों के प्रति पूर्णत ..."

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सुसमाचार के प्रश्नोत्तर

क्या वह हर व्यक्ति जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार नहीं करता है, वास्तव में विपत्ति में पड़ जाएगा?

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