परमेश्वर के दैनिक वचन : परमेश्वर को जानना | अंश 18
परमेश्वर का भय मानने का आरंभिक बिन्दु उसके साथ परमेश्वर के समान व्यवहार करना है अभी थोड़ी देर पहले, किसी ने एक प्रश्न उठाया था : ऐसा कैसे...
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ऐसा व्यवहार जो पूरी तरह से मेरी आज्ञा का पालन नहीं कर सकता है, विश्वासघात है। ऐसा व्यवहार जो मेरे प्रति निष्ठावान नहीं हो सकता है विश्वासघात है। मेरे साथ छल करना और मेरे साथ धोखा करने के लिए झूठ का उपयोग करना, विश्वासघात है। धारणाओं से भरा होना और हर जगह उन्हें फैलाना विश्वासघात है। मेरी गवाहियों और हितों की रक्षा नहीं कर पाना विश्वासघात है। दिल में मुझसे दूर होते हुए भी झूठमूठ मुस्कुराना विश्वासघात है। ये सभी विश्वासघात के काम हैं जिन्हें करने में तुम लोग हमेशा सक्षम रहे हो, और ये तुम लोगों के बीच आम बात है। तुम लोगों में से शायद कोई भी इसे समस्या न माने, लेकिन मैं ऐसा नहीं सोचता हूँ। मैं अपने साथ किसी व्यक्ति के विश्वासघात को एक तुच्छ बात नहीं मान सकता हूँ, और निश्चय ही, मैं इसे अनदेखा नहीं कर सकता हूँ। अब, जबकि मैं तुम लोगों के बीच कार्य कर रहा हूँ, तो तुम लोग इस तरह से व्यवहार कर रहे हो—यदि किसी दिन तुम लोगों की निगरानी करने के लिए कोई न हो, तो क्या तुम ऐसे डाकू नहीं बन जाओगे जिसने खुद को राजा घोषित कर दिया है? जब ऐसा होगा और तुम विनाश का कारण बनोगे, तब तुम्हारे पीछे उस गंदगी को कौन साफ करेगा? तुम सोचते हो कि विश्वासघात के कुछ कार्य तुम्हारे सतत व्यवहार नहीं, बल्कि मात्र कभी-कभी होने वाली घटनाएँ हैं, और उनकी इतने गंभीर तरीके से चर्चा नहीं होनी चाहिए कि तुम्हारे अहं को ठेस पहुँचे। यदि तुम वास्तव में ऐसा मानते हो, तो तुम में समझ का अभाव है। इस तरीके से सोचना विद्रोह का एक नमूना और विशिष्ट उदाहरण है। मनुष्य की प्रकृति उसका जीवन है; यह एक सिद्धांत है जिस पर वह जीवित रहने के लिए निर्भर करता है और वह इसे बदलने में असमर्थ है। विश्वासघात की प्रकृति भी वैसी ही है—यदि तुम किसी रिश्तेदार या मित्र को धोखा देने के लिए कुछ कर सकते हो, तो यह साबित करता है कि यह तुम्हारे जीवन और तुम्हारी प्रकृति का हिस्सा है जिसके साथ तुम पैदा हुए थे। यह कुछ ऐसा है जिससे कोई भी इनकार नहीं कर सकता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति अन्य लोगों की चीजें चुराना पसंद करता है, तो यह "चुराना पसंद करना" उसके जीवन का एक हिस्सा है, भले ही कभी-कभी वह चोरी करता है, और अन्य समय वह नहीं करता है। चाहे वह चोरी करता है अथवा नहीं, इससे यह साबित नहीं हो सकता कि उसका चोरी करना केवल एक प्रकार का व्यवहार है। बल्कि, इससे साबित होता है कि उसका चोरी करना उसके जीवन का एक हिस्सा, अर्थात्, उसकी प्रकृति है। कुछ लोग पूछेंगे : चूँकि यह उसकी प्रकृति है, तो ऐसा क्यों है कि वह कभी-कभी अच्छी चीजें देखता है लेकिन उन्हें चोरी नहीं करता है? उत्तर बहुत आसान है। उसके चोरी नहीं करने के कई कारण हैं। हो सकता है कि वह इसलिए चोरी न करता हो क्योंकि चौकस निगाहों के नीचे से निकाल ले जाने के लिए वस्तु बहुत बड़ी हो, या चोरी करने के लिए उपयुक्त समय न हो, या वस्तु बहुत महँगी हो, बहुत कड़े पहरे में हो, या शायद उसकी इस चीज में विशेष रूप से रुचि न हो, या उसे यह न समझ आये कि उसके लिए इसका क्या उपयोग है, इत्यादि। ये सभी कारण संभव हैं। लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह कोई वस्तु चुराता है या नहीं, इससे यह साबित नहीं होता है कि यह विचार उसके अंदर केवल क्षण भर के लिये रहता है, एक पल के लिए कौंधता है। इसके विपरीत, यह उसकी प्रकृति का एक हिस्सा है जिसमें सुधार लाना कठिन है। ऐसा व्यक्ति केवल एक बार चोरी करके संतुष्ट नहीं होता है; बल्कि जब भी कोई अच्छी वस्तु या उपयुक्त स्थिति उसके सामने आती है, तो दूसरों की चीजों को अपनी बना लेने के ऐसे विचार उसमें जाग जाते हैं। यही कारण है कि मैं कहता हूँ कि यह विचार केवल समय-समय पर नहीं उठता है, बल्कि इस व्यक्ति की स्वयं की प्रकृति में ही शामिल है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, एक बहुत गंभीर समस्या : विश्वासघात (1)
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