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अंतिम दिनों के मसीह के कथन – संकलन

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भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है भाग एक

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भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है भाग एक

परमेश्वर ने देहधारण किया क्योंकि शैतान का आत्मा, या कोई अभौतिक चीज़ उसके कार्य का विषय नहीं है, परन्तु मनुष्य है, जो शरीर से बना है और जिसे शैतान के द्वारा भ्रष्ट किया गया है। निश्चित रूप से चूँकि मनुष्य की देह को भ्रष्ट किया गया है इसलिए परमेश्वर ने हाड़-मांस के मनुष्य को अपने कार्य का विषय बनाया है; इसके अतिरिक्त, क्योंकि मनुष्य भ्रष्टता का विषय है, उसने मनुष्य को अपने उद्धार के कार्य के समस्त चरणों के दौरान अपने कार्य का एकमात्र विषय बनाया है। मनुष्य एक नश्वर प्राणी है, और वह हाड़-मांस एवं लहू से बना हुआ है, और एकमात्र परमेश्वर ही है जो मनुष्य को बचा सकता है। इस रीति से, परमेश्वर को अपना कार्य करने के लिए ऐसा देह बनना होगा जो मनुष्य के समान ही गुणों को धारण करता है, ताकि उसका कार्य बेहतर प्रभावों को हासिल कर सके। परमेश्वर को अपने कार्य को ठीक तरह से करने के लिए देहधारण करना होगा क्योंकि मनुष्य देह से बना हुआ है, और पाप पर विजय पाने में या स्वयं को शरीर से अलग करने में असमर्थ है। यद्यपि देहधारी परमेश्वर का मूल-तत्व एवं उसकी पहचान, मनुष्य के मूल-तत्व एवं उसकी पहचान से बहुत अधिक भिन्न है, फिर भी उसका रूप मनुष्य के समान है, उसके पास किसी सामान्य व्यक्ति का रूप है, और वह एक सामान्य व्यक्ति का जीवन जीता है, और जो लोग उसे देखते हैं वे परख सकते हैं कि वह किसी सामान्य व्यक्ति से अलग नहीं है। यह सामान्य रूप एवं सामान्य मानवता उसके लिए पर्याप्त है कि वह सामान्य मानवता में अपने अलौकिक कार्य को अंजाम दे। उसका देह उसे सामान्य मानवता में अपना कार्य करने देता है, और मनुष्य के मध्य अपने कार्य को करने में उसकी सहायता करता है, इसके अतिरिक्त उसकी सामान्य मानवता मनुष्य के मध्य उद्धार के कार्य को क्रियान्वित करने के लिए सहायता करती है। यद्यपि उसकी सामान्य मानवता ने मनुष्य के बीच में काफी कोलाहल मचा दिया है, फिर भी ऐसे कोलाहल ने उसके कार्य के सामान्य प्रभावों पर कोई असर नहीं डाला है। संक्षेप में, उसके सामान्य देह का कार्य मनुष्य के लिए अत्यंत लाभदायक है। हालाँकि अधिकांश लोग उसकी सामान्य मानवता को स्वीकार नहीं करते हैं, उसका कार्य फिर भी प्रभावशाली हो सकता है, और उसकी सामान्य मानवता के कारण इन प्रभावों को हासिल किया जाता है। इसके विषय में कोई सन्देह नहीं है। देह में किए गए के उसके कार्य से, मनुष्य उसकी सामान्य मानवता के विषय में उन धारणाओं की अपेक्षा दस गुना या दर्जनों गुना ज़्यादा चीज़ों को प्राप्त करता है जो मनुष्य के मध्य मौजूद हैं, और ऐसी धारणाओं को अंततः उसके कार्य के द्वारा पूरी तरह से निगल लिया जाएगा। और वह प्रभाव जो उसके कार्य ने हासिल किया है, कहने का तात्पर्य है, मनुष्य का उसके बारे में ज्ञान, उसके विषय में मनुष्य की धारणाओं से बहुत अधिक है। वह कार्य जिसे वह शरीर में करता है उसकी कल्पना करने या उसे मापने हेतु कोई तरीका नहीं है, क्योंकि उसका देह हाड़-मांस के मनुष्य के समान नहीं है; यद्यपि बाहरी आवरण एक समान है, फिर भी मूल-तत्व एक जैसा नहीं है। उसका देह परमेश्वर के विषय में मनुष्य के मध्य कई धारणाओं को उत्पन्न करता है, फिर भी उसका देह मनुष्य को अत्यधिक ज्ञान अर्जित करने भी दे सकता है, और वह किसी भी व्यक्ति पर विजय प्राप्त कर सकता है जो वैसा ही बाहरी आवरण धारण किए हुए है। क्योंकि वह महज एक मनुष्य नहीं है, परन्तु मनुष्य के बाहरी आवरण के साथ परमेश्वर है, और कोई भी पूरी तरह से उसकी गहराई को माप नहीं सकता है एवं उसे समझ नहीं सकता है। सभी लोगों के द्वारा ऐसे अदृश्य एवं अस्पृश्य परमेश्वर से प्रेम एवं उसका स्वागत किया जाता है। यदि परमेश्वर बस एक आत्मा होता जो मनुष्य के लिए अदृश्य है, तो परमेश्वर पर विश्वास करना मनुष्य के लिए कितना आसान होता। मनुष्य अपनी कल्पना को बेलगाम कर सकता है, और अपने आपको प्रसन्न करने तथा अपने आपको खुश करने के लिए किसी भी आकृति को परमेश्वर की आकृति के रूप में चुन सकता है। इस रीति से, मनुष्य बिना किसी संकोच के कुछ भी कर सकता है जो उसके स्वयं के परमेश्वर को अति प्रसन्न करता है, और वह कार्य कर सकता है जिसे यह परमेश्वर करने की अत्यधिक इच्छा करता है। इसके अलावा, मनुष्य मानता है कि उसकी अपेक्षा परमेश्वर के प्रति कोई भी उससे अधिक भरोसेमंद एवं भक्त नहीं है, और यह कि बाकी सब बुतरस्त कुत्ते हैं, एवं परमेश्वर के प्रति वफादार नहीं हैं। ऐसा कहा जा सकता है कि यह वह है जिसे उन लोगों के द्वारा खोजा जाता है जिनका विश्वास परमेश्वर में अस्पष्ट है और सिद्धान्तों पर आधारित है; जो कुछ वे खोजते हैं वह सब थोड़ी बहुत विभिन्नता के साथ काफी कुछ एक जैसा ही होता है। यह महज ऐसा है कि उनकी कल्पनाओं में परमेश्वर की आकृतियां भिन्न-भिन्न होती हैं, फिर भी उनका मूल-तत्व वास्तव में एक जैसा ही होता है।

मनुष्य परमेश्वर में अपने निश्चिन्त विश्वास के द्वारा परेशान नहीं होता है, और जैसा उसे भाता है परमेश्वर में विश्वास रखता है। यह मनुष्य का एक "अधिकार एवं आज़ादी" है, जिसमें कोई भी हस्तक्षेप नहीं कर सकता है, क्योंकि मनुष्य अपने स्वयं के परमेश्वर में विश्वास करता है तथा किसी और के परमेश्वर पर नहीं; यह उसकी अपनी निजी सम्पत्ति है, और लगभग हर कोई इस तरह की निजी सम्पत्ति रखता है। मनुष्य इस सम्पत्ति को एक बहुमूल्य ख़ज़ाने के रूप में मानता है, किन्तु परमेश्वर के लिए इससे अधिक निम्न या निकम्मी चीज़ और कोई नहीं है, क्योंकि मनुष्य की इस निजी सम्पत्ति की तुलना में परमेश्वर के विरोध का इससे और अधिक स्पष्ट संकेत नहीं है। यह देहधारी परमेश्वर के कार्य के कारण है कि परमेश्वर ने देह धारण किया है जिसके पास एक स्पर्शगम्य आकार है, और जिसे मनुष्य के द्वारा देखा एवं स्पर्श किया जा सकता है। वह एक निराकार आत्मा नहीं है, बल्कि एक शरीर है जिससे मनुष्य द्वारा सम्पर्क किया जा सकता है और देखा जा सकता है। फिर भी, अधिकांश ईश्वर जिन पर लोग विश्वास करते हैं वे देहरहित देवता हैं जो निराकार हैं, जो स्वतंत्र आकार के हैं। इस रीति से, देहधारी परमेश्वर उनमें से अधिकांश लोगों का शत्रु बन गया है जो परमेश्वर में विश्वास रखते हैं, और ऐसे लोग जो परमेश्वर के देहधारण के तथ्य को स्वीकार नहीं कर सकते हैं वे भी, उसी प्रकार से, परमेश्वर के विरोधी बन गए हैं। सोचने के अपने तरीके के कारण, या अपने विद्रोहीपन के कारण नहीं, किन्तु मनुष्य की इस निजी सम्पत्ति के कारण मनुष्य धारणाओं को धारण किए हुए है। यह इस निजी सम्पत्ति के कारण ही है कि अधिकांश लोग मर जाते हैं, और यह वह अस्पष्ट परमेश्वर है जिसे स्पर्श नहीं किया जा सकता है, देखा नहीं जा सकता है, और मौजूद नहीं है वास्तव में वह मनुष्य के जीवन को बर्बाद कर देता है। मनुष्य के जीवन को देहधारी परमेश्वर के द्वारा ज़ब्त नहीं किया जाता है, और स्वर्ग के परमेश्वर के द्वारा तो बिलकुल भी नहीं, बल्कि मनुष्य की स्वयं की कल्पना के परमेश्वर द्वारा ज़ब्त किया जाता है। यह वह एकमात्र वज़ह है कि भ्रष्ट मनुष्य की आवश्यकताओं के कारण ही देहधारी परमेश्वर देह में होकर आया है। यह मनुष्य की आवश्यकताओं के कारण है परन्तु परमेश्वर की आवश्यकताओं के कारण नहीं, और उसके समस्त बलिदान एवं कष्ट मानवजाति के लिए हैं, और स्वयं परमेश्वर के लाभ के लिए नहीं हैं। परमेश्वर के लिए कोई पक्ष एवं विपक्ष या प्रतिफल नहीं है; वह भविष्य की कोई फसल नहीं काटेगा, बल्कि वह जो मूल रूप से उसे दिया जाना था। वह सब जिसे वह मानवजाति के लिए करता है और बलिदान करता है यह इसलिए नहीं है ताकि वह बड़ा प्रतिफल अर्जित कर सके, परन्तु यह विशुद्ध रूप से मानवजाति के लिए है। यद्यपि देह में किए गए परमेश्वर के कार्य में अनेक अकल्पनीय मुश्किलें शामिल होती हैं, फिर भी वे प्रभाव जिन्हें वह अंततः हासिल करता है वे उन कार्यों से कहीं बढ़कर होते हैं जिन्हें आत्मा के द्वारा सीधे तौर पर किया जाता है। देह के कार्य में काफी कठिनाईयां साथ में जुड़ी होती हैं, और देह आत्मा के समान वैसी ही बड़ी पहचान को धारण नहीं कर सकता है, और आत्मा के समान उन्हीं अलौकिक कार्यों को क्रियान्वित नहीं कर सकता है, और वह आत्मा के समान उसी अधिकार को तो बिलकुल भी धारण नहीं कर सकता है। फिर भी इस साधारण देह के द्वारा किए गए कार्य का मूल-तत्व आत्मा के द्वारा सीधे तौर पर किए गए कार्य से कहीं अधिक श्रेष्ठ है, और यह देह स्वयं ही मनुष्य की समस्त आवश्यकताओं का उत्तर है। क्योंकि उनके लिए जिन्हें बचाया जाना है, आत्मा की उपयोगिता का मूल्य देह की अपेक्षा कहीं अधिक निम्न है: आत्मा का कार्य समूचे विश्व, सारे पहाड़ों, नदियों, झीलों एवं महासागरों को ढंकने में सक्षम है, फिर भी देह का कार्य और अधिक प्रभावकारी ढंग से प्रत्येक व्यक्ति से सम्बन्ध रखता है जिसके साथ उसका सम्पर्क है। इसके अलावा, मनुष्य के द्वारा परमेश्वर की देह को उसके स्पर्श्गम्य आकार के साथ बेहतर ढंग से समझा जा सकता है और उस पर भरोसा किया जा सकता है, और यह परमेश्वर के विषय में मनुष्य के ज्ञान को और गहरा कर सकता है, और यह मनुष्य पर परमेश्वर के वास्तविक कार्यों का और अधिक गंभीर प्रभाव छोड़ सकता है। आत्मा का कार्य रहस्य से ढका हुआ है, इसकी गहराई को मापना नश्वर प्राणियों के लिए कठिन है, और यहाँ तक कि उनके लिए उन्हें देखना और भी अधिक मुश्किल है, और इस प्रकार वे मात्र खोखली कल्पनाओं पर भरोसा रख सकते हैं। फिर भी, देह का कार्य साधारण है, यह वास्तविकता पर आधारित है, और समृद्ध बुद्धि धारण किए हुए है, और ऐसा तथ्य है जिसे मनुष्य की शारीरिक आँख के द्वारा देखा जा सकता है; मनुष्य परमेश्वर के कार्य की बुद्धिमत्ता का व्यक्तिगत रूप से अनुभव कर सकता है, और उसे अपनी ढेर सारी कल्पना को काम में लगाने की आवश्यकता नहीं है। यह देह में परमेश्वर के कार्य की सटीकता एवं उसका वास्तविक मूल्य है। आत्मा केवल उन कार्यों को कर सकता है जो मनुष्य के लिए अदृश्य हैं और उसके लिए कल्पना करने हेतु कठिन हैं, उदाहरण के लिए आत्मा की प्रबुद्धता, आत्मा द्वारा हृदय स्पर्श करना, और आत्मा का मार्गदर्शन, परन्तु मनुष्य के लिए जिसके पास एक मस्तिष्क है, ये कोई स्पष्ट अर्थ प्रदान नहीं करते हैं। वे केवल हृदय स्पर्शी, या एक विस्तृत अर्थ प्रदान करते हैं, और वचनों से कोई निर्देश नहीं दे सकते हैं। फिर भी, देह में परमेश्वर का कार्य बहुत ही अलग होता है: उसमें वचनों का सटीक मार्गदर्शन होता है, उसमें स्पष्ट इच्छा होती है, और उसमें स्पष्ट अपेक्षित उद्देश्य होते हैं। और इस प्रकार मनुष्य को अंधेरे में यहाँ वहाँ टटोलने, या अपनी कल्पना को काम में लगाने की कोई आवश्यकता नहीं होती है, और अंदाज़ा लगाने की तो बिलकुल भी आवश्यकता नहीं होती है। यह देह में किए गए कार्य की स्पष्टता है, और आत्मा के कार्य से बिलकुल अलग है। आत्मा का कार्य केवल एक सीमित दायरे तक उपयुक्त होता है, और देह के कार्य का स्थान नहीं ले सकता है। देह का कार्य मनुष्य को आत्मा के कार्य की अपेक्षा कहीं अधिक सटीक एवं आवश्यक लक्ष्य और कहीं अधिक वास्तविक, एवं मूल्यवान ज्ञान प्रदान करता है। वह कार्य जो भ्रष्ट मनुष्य के लिए सबसे अधिक मूल्य रखता है वह ऐसा कार्य है जो सटीक वचनों, एवं अनुसरण करने के लिए स्पष्ट लक्ष्यों को प्रदान करता है, और जिसे देखा एवं स्पर्श किया जा सकता है। केवल वास्तविकता से सम्बन्धित कार्य एवं समयानुसार मार्गदर्शन ही मनुष्य की अभिरुचियों के लिए उपयुक्त होते हैं, और केवल वास्तविक कार्य ही मनुष्य को उसके भ्रष्ट एवं दूषित स्वभाव से बचा सकता है। इसे केवल देहधारी परमेश्वर के द्वारा ही हासिल किया जा सकता है; केवल देहधारी परमेश्वर ही मनुष्य को उसके पूर्व के भ्रष्ट एवं दूषित स्वभाव से बचा सकता है। यद्यपि आत्मा परमेश्वर का अंतर्निहित मूल-तत्व है, फिर भी ऐसे कार्य को केवल उसके देह के द्वारा ही किया जा सकता है। यदि आत्मा अकेले ही कार्य करता, तब उसके कार्य का प्रभावशाली होना संभव नहीं होता—यह एक स्पष्ट सच्चाई है। यद्यपि अधिकांश लोग इस देह के कारण परमेश्वर के शत्रु बन गए हैं, फिर भी जब वह अपने कार्य को पूरा करता है, तो ऐसे लोग जो उसके विरोधी हैं वे न केवल आगे से उसके शत्रु नहीं रहेंगे, बल्कि इसके विपरीत वे उसके गवाह बन जाएंगे। वे ऐसे गवाह बन जाएंगे जिन्हें उसके द्वारा जीत लिया गया है, ऐसे गवाह जो उसके अनुकूल हैं और उससे अविभाज्य हैं। वह मनुष्य को प्रेरित करेगा कि मानव के प्रति देह में किए गए उसके कार्य के महत्व को जाने, और मनुष्य मानव के अस्तित्व के अर्थ के लिए इस देह के महत्व को जानेगा, मानव के जीवन की प्रगति के लिए उसके वास्तविक मूल्य को जानेगा, और, इसके अतिरिक्त, यह जानेगा कि यह देह जीवन का एक जीवन्त सोता बन जाएगा जिससे अलग होने की बात को मानव सहन नहीं कर सकता है। यद्यपि परमेश्वर का देहधारी शरीर परमेश्वर की पहचान एवं पद से मेल खाने से कहीं दूर है, और मनुष्य को ऐसा प्रतीत होता है कि वह उसके वास्तविक रुतबे से असंगत है, फिर भी यह देह, जो परमेश्वर के असली रूप को, या परमेश्वर की सच्ची पहचान को धारण किए हुए नहीं है, वह कार्य कर सकता है जिसे परमेश्वर का आत्मा सीधे तौर पर करने में असमर्थ है। परमेश्वर के देहधारण का असली महत्व एवं मूल्य ऐसा ही है, और यह वही महत्व एवं मूल्य है जिसे सराहने एवं स्वीकार करने में मनुष्य असमर्थ है। यद्यपि समस्त मनुष्य परमेश्वर के आत्मा को ऊँची दृष्टि से देखते हैं और परमेश्वर के देह को नीची दृष्टि से देखते हैं, फिर भी इस बात पर विचार न करते हुए कि वे किस प्रकार सोचते या देखते हैं, देह का वास्तविक महत्व एवं मूल्य आत्मा से कहीं बढ़कर है। निश्चित रूप से, यह केवल भ्रष्ट मनुष्य के सम्बन्ध में है। क्योंकि हर कोई जो सत्य की खोज करता है और परमेश्वर के प्रकट होने की लालसा करता है, आत्मा का कार्य केवल हृदय स्पर्श या प्रकाशन, और अद्भुतता का एहसास प्रदान कर सकता है जो अवर्णनीय एवं अकल्पनीय है, और ऐसा एहसास प्रदान करता है कि यह महान, सर्वोपरि, एवं प्रशंसनीय है, फिर भी सभी के लिए अप्राप्य एवं असाध्य भी है। मनुष्य एवं परमेश्वर का आत्मा एक दूसरे को केवल दूर से ही देख सकते हैं, मानो उनके बीच एक बड़ी दूरी है, और वे कभी भी एक समान नहीं हो सकते हैं, मानो किसी अदृश्य विभाजन के द्वारा अलग किए गए हों। वास्तव में, यह एक दृष्टि भ्रम है जिसे आत्मा के द्वारा मनुष्य को दिया गया है, यह इसलिए है क्योंकि आत्मा एवं मनुष्य दोनों एक ही किस्म के नहीं हैं, और आत्मा एवं मनुष्य इसी संसार में एक साथ अस्तित्व में नहीं रह सकेंगे, और इसलिए क्योंकि आत्मा मनुष्य की किसी भी चीज़ को धारण नहीं करता है। अतः मनुष्य को आत्मा की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि आत्मा सीधे तौर पर वह कार्य नहीं कर सकता है जिसकी मनुष्य को सबसे अधिक आवश्यकता होती है। देह का काम मनुष्य को अनुसरण करने के लिए वास्तविक उद्देश्य देता है, स्पष्ट वचन, और एक एहसास देता है कि परमेश्वर वास्तविक एवं सामान्य है, यह कि वह दीन एवं साधारण है। यद्यपि मनुष्य उसका भय मान सकता है, फिर भी अधिकांश लोगों के लिए उससे सम्बन्ध रखना आसान है: मनुष्य उसके चेहरे को देख सकता है, और उसकी आवाज़ को सुन सकता है, और दूर से उसे देखने की आवश्यकता नहीं है। यह देह महसूस करता है कि वह मनुष्य तक पहुंच सकता है, एवं वह दूर, या अथाह नहीं है, परन्तु दृश्यमान एवं स्पर्शगम्य है, क्योंकि यह देह मनुष्य के समान इसी संसार में है।

क्योंकि वे सभी जो देह में जीवन बिताते हैं, उन्हें अपने स्वभाव को परिवर्तित करने के लिए अनुसरण हेतु लक्ष्यों की आवश्यकता होती है, और परमेश्वर को जानने के लिए परमेश्वर के वास्तविक कार्यों एवं वास्तविक चेहरे को को देखने की आवश्यकता होती है। दोनों को सिर्फ परमेश्वर के देहधारी शरीर के द्वारा ही हासिल किया जा सकता है, और दोनों को सिर्फ साधारण एवं वास्तविक देह के द्वारा ही पूरा किया जा सकता है। इसी लिए देहधारण ज़रूरी है, और इसी लिए समस्त भ्रष्ट मानवजाति को इसकी आवश्यकता होती है। जबकि लोगों से अपेक्षा की जाती है कि वे परमेश्वर को जानें, तो अस्पष्ट एवं अलौकिक ईश्वरों की आकृतियों को उनके हृदयों से दूर हटाना जाना चाहिए, और जबकि उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे अपने भ्रष्ट स्वभाव को दूर करें, तो उन्हें पहले अपने भ्रष्ट स्वभाव को पहचानना होगा। यदि मनुष्य केवल लोगों के हृदयों से अस्पष्ट ईश्वरों की आकृतियों को हटाने के लिए कार्य करता है, तो वह उपयुक्त प्रभाव हासिल करने में असफल हो जाएगा। लोगों के हृदयों से अस्पष्ट ईश्वरों की आकृतियों को केवल शब्दों से उजागर, एवं दूर नहीं किया जा सकता है, या पूरी तरह से निकाला नहीं जा सकता है। ऐसा करके, अंततः गहराई से जड़ जमाई हुई चीज़ों को लोगों से हटाना अभी भी संभव नहीं होगा। केवल व्यावहारिक परमेश्वर और परमेश्वर का सच्चा स्वरूप ही इन अस्पष्ट एवं अलौकिक चीज़ों का स्थान ले सकता है ताकि लोगों को धीरे धीरे उन्हें जानने की अनुमति दी जाए, और केवल इसी रीति से उस तयशुदा प्रभाव को हासिल किया जा सकता है। मनुष्य पहचान गया है कि वह परमेश्वर जिसे वह पिछले समयों में खोजता था वह अस्पष्ट एवं अलौकिक है। जो इस प्रभाव को हासिल कर सकता है वह आत्मा की प्रत्यक्ष अगुवाई नहीं है, और किसी फलाने व्यक्ति की शिक्षाएं तो बिलकुल भी नहीं हैं, किन्तु देहधारी परमेश्वर की शिक्षाएं हैं। जब देहधारी परमेश्वर आधिकारिक रूप से अपना कार्य करता है तो मनुष्य की धारणाओं का भेद खुल जाता है, क्योंकि देहधारी परमेश्वर की साधारणता एवं वास्तविकता मनुष्य की कल्पना में अस्पष्ट एवं अलौकिक परमेश्वर के विपरीत है। मनुष्य की मूल धारणाओं को केवल देहधारी परमेश्वर से उनके अन्तर के माध्यम से ही प्रगट किया जा सकता है। देहधारी परमेश्वर से तुलना किए बगैर, मनुष्य की धारणाओं को प्रगट नहीं किया जा सकता था; दूसरे शब्दों में, वास्तविकता के अन्तर के बगैर अस्पष्ट चीज़ों को प्रगट नहीं किया जा सकता था। इस कार्य को करने के लिए कोई भी शब्दों का प्रयोग करने में सक्षम नहीं है, और कोई भी शब्दों का उपयोग करके इस कार्य को स्पष्टता से व्यक्त करने में सक्षम नहीं है। केवल स्वयं परमेश्वर ही अपना खुद का कार्य कर सकता है, और कोई अन्य उसके स्थान पर इस कार्य को नहीं कर सकता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मनुष्य की भाषा कितनी समृद्ध है, वह परमेश्वर की वास्तविकता एवं साधारणता को स्पष्टता से व्यक्त करने में असमर्थ है। मनुष्य केवल और अधिक व्यावहारिकता से परमेश्वर को जान सकता है, और केवल उसे और अधिक साफ साफ देख सकता है, यदि परमेश्वर व्यक्तिगत तौर पर मनुष्य के मध्य कार्य करे और पूरी तरह से अपने स्वरूप एवं अपने अस्तित्व को प्रगट करे। यह प्रभाव किसी भी शारीरिक मनुष्य के द्वारा हासिल नहीं किया जा सकता है। निश्चित रूप से, परमेश्वर का आत्मा भी इस प्रभाव को हासिल करने में असमर्थ है। परमेश्वर भ्रष्ट मनुष्य को शैतान के प्रभाव से बचा सकता है, परन्तु इस कार्य को सीधे तौर पर परमेश्वर के आत्मा के द्वारा पूरा नहीं किया जा सकता है, इसके बजाए, इसे केवल उस देह के द्वारा किया जा सकता है जिसे परमेश्वर के आत्मा ने पहना है, और परमेश्वर के देहधारी शरीर के द्वारा किया जा सकता है। यह देह मनुष्य एवं साथ ही परमेश्वर भी है, यह देह एक मनुष्य है जिसने एक सामान्य मानवता को धारण किया है और साथ ही परमेश्वर भी है जिसने पूर्ण ईश्वरीयता को धारण किया है। और इस प्रकार, यद्यपि यह देह परमेश्वर का आत्मा नहीं है, और आत्मा से बिल्कुल भिन्न है, फिर भी वह अब भी स्वयं देहधारी परमेश्वर है जो मनुष्य को बचाता है, जो आत्मा है और साथ ही देह भी है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उसे किस नाम के द्वारा पुकारा जाता है, अंततोगत्वा वह अभी भी स्वयं परमेश्वर है जो मानवजाति को बचाता है। क्योंकि परमेश्वर का आत्मा देह से अविभाज्य है, और देह का कार्य भी परमेश्वर के आत्मा का कार्य है; यह बस ऐसा है कि इस कार्य को आत्मा की पहचान का उपयोग करते हुए नहीं किया गया है, किन्तु इसे देह की पहचान का उपयोग करते हुए किया गया है। कार्य जिसे सीधे तौर पर आत्मा के द्वारा किए जाने की ज़रूरत है उसे देहधारण की आवश्यकता नहीं है, और कार्य जिसे करने के लिए देह की आवश्यकता है उसे आत्मा के द्वारा सीधे तौर पर नहीं किया जा सकता है, और इसे केवल देहधारी परमेश्वर के द्वारा ही किया जा सकता है। यह वह है जिसकी आवश्यकता इस कार्य के लिए होती है, और यह वह है जिसकी भ्रष्ट मनुष्य के द्वारा आवश्यकता होती है। परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों में, केवल एक ही चरण को सीधे तौर पर आत्मा के द्वारा सम्पन्न किया गया था, और शेष दो चरणों को देहधारी परमेश्वर के द्वारा सम्पन्न किया गया है, और आत्मा के द्वारा सीधे तौर पर सम्पन्न नहीं किया गया है। आत्मा के द्वारा किए गए व्यवस्था के कार्य ने मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव के परिवर्तन को शामिल नहीं किया था, और न ही यह परमेश्वर के विषय में मनुष्य के ज्ञान से कोई सम्बन्ध रखता था। फिर भी, अनुग्रह के युग में और राज्य के युग में परमेश्वर के देह का कार्य मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव एवं परमेश्वर के विषय में उसके ज्ञान को शामिल करता है, और यह उद्धार के कार्य का एक महत्वपूर्ण एवं निर्णायक भाग है। इसलिए, भ्रष्ट मानवजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार की और अधिक आवश्यकता है, और उसे देहधारी परमेश्वर के प्रत्यक्ष कार्य की और अधिक ज़रूरत है। मानवजाति को ज़रूरत है कि देहधारी परमेश्वर उसकी चरवाही करे, उसकी आपूर्ति करे, उसकी सिंचाई करे, उसका पोषण करे, उसका न्याय एवं उसे ताड़ना दे, और उसे देहधारी परमेश्वर से और अधिक अनुग्रह एवं और बड़े छुटकारे की आवश्यकता है। केवल देह में प्रगट परमेश्वर ही मनुष्य का दृढ़ विश्वासपात्र, मनुष्य का चरवाहा, मनुष्य का अति सहज सहायक बन सकता है, और पिछले समयों में एवं आज यह सब देहधारण की आवश्यकता है।

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