वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

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वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

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अंतिम दिनों के मसीह के कथन – संकलन

सब वस्तुओं के जीवन का स्रोत परमेश्वर है (IV)     भाग दो के क्रम में

1. परमेश्वर किस प्रकार आत्मिक संसार पर शासन करता है और उसे चलाता है

2) विभिन्न विश्वासी लोगों के जीवन और मृत्यु का चक्र

हमने अभी अविश्वासियों की पहली श्रेणी के जीवन और मृत्यु चक्र पर चर्चा की। अब आओ हम द्वितीय श्रेणी, आस्था के विभिन्न लोगों पर चर्चा करें। "विभिन्न आस्था रखने वाले लोगों के जीवन और मृत्यु का चक्र" भी एक महत्वपूर्ण विषय है और यह समयोचित है कि इस विषय के संबंध में तुम कुछ समझो। सबसे पहले, आओ हम इस बात को समझें कि "आस्थावान लोगों" में आस्था का अभिप्राय क्या है: इसका अभिप्राय है यहूदी धर्म, ईसाई धर्म, कैथोलिक धर्म, इस्लाम और बुद्धधर्म, ये पांच प्रमुख धर्म हैं। अविश्वासियों के अतिरिक्त, जो लोग इन पांच धर्मों में विश्वास रखते हैं उनका संसार की जनसंख्या में एक बड़ा अनुपात है। इन पांच धर्मों के बीच, जिन्होंने अपने विश्वास के चलते एक जीवनवृत्ति बनाई-जो अपने विश्वास के लिये पूर्णकालिक कार्य करते हैं-बहुत कम हैं, फिर भी इन धर्मों में अनेक विश्वासी हैं। उनके विश्वासी मरणोपरान्त भिन्न-भिन्न स्थानों में जाते हैं। किससे "भिन्न"? अविश्वासियों से, वे लोग जिनमें कोई विश्वास नहीं है हम अभी उन्हीं के विषय में बात कर रहे थे। इन पांचों धर्मों के विश्वासी मरने के पश्चात किसी अन्य स्थान में जाते हैं, जो अविश्वासियों के स्थान से भिन्न होता है। आध्यात्मिक या आत्मिक जगत भी मरने के पूर्व जो कुछ उन्होंने किया, इस आधार पर उनका निर्णय करेगा, उसके पश्चात् उसी के अनुसार उन्हें छांटा जायेगा और कार्यवाई की जायेगी। परन्तु कार्यवाई करने हेतु उन्हें किसी अलग स्थान में रखने की क्या जरुरत है? इसका एक महत्वपूर्ण कारण है। और वह कारण क्या है? मैं एक उदाहरण से तुम्हें बताऊंगा।

बौद्धमत को लें: तुम्हें एक सच्चाई बताता हूं। पहली बात तो यह है कि एक बौद्धमत को मानने वाला, वह है जो बौद्धमत में आ गया है और वह जानता है कि उसका विश्वास क्या है। जब एक बौद्ध अपने बाल कटवाता है और भिक्षु या भिक्षुणी बन जाता है, तो इसका अर्थ है कि उन्होंने अपने आपको लौकिक संसार से पृथक कर लिया है और संसार के कोलाहल को बहुत पीछे छोड़ दिया है। प्रतिदिन वे सूत्रों का उच्चारण करते हैं और केवल शाकाहारी भोजन करते हैं, वे तपस्वी जीवन व्यतीत करते हैं। उनके दिन तेल के दिये की ठण्डी क्षीण रोशनी में गुजरते हैं। वे अपना सारा जीवन इसी प्रकार व्यतीत करते हैं। जब उनका भौतिक जीवन समाप्त होता है, वे अपने जीवन का सारांश बनाते हैं, परन्तु अंदर से उन्हें पता नहीं कि मरने के बाद वे कहां जाएंगे, किससे मिलेंगे, और उनका अंत क्या होगा – अपने हृदय में वे इन चीज़ों को लेकर स्पष्ट नहीं हैं। उन्होंने केवल एक विश्वास का दामन पकड़े हुए अपना सारा जीवन कुछ न करते हुए व्यतीत किया, इसके पश्चात वे इस संसार से अंधी इच्छाओं और आदर्शों के साथ चले जाते हैं। उनके भौतिक जीवन का अन्त इस प्रकार होता है जब वे जीवितों के संसार को छोड़ते हैं और जब उनका शारीरिक जीवन समाप्त हो जाता है, वे अपने मूल स्थान आत्मिक संसार में वापस लौट जाते हैं। क्या पृथ्वी पर वापिस आने और अपना आत्म-विकास करते रहने के लिए इस व्यक्ति का पुनर्जन्म होगा, यह मृत्यु से पहले के उसके आचरण और आत्म-विकास पर निर्भर करता है। यदि अपने जीवनकाल में उन्होंने कुछ गलत नहीं किया, तो उन्हें शीघ्र ही पुनर्जन्म दिया जाएगा और फिर पृथ्वी पर वापस भेजे जायेंगे, जहां वे एक बार फिर अपने सिर पर उस्तरां फिरवायेंगे और एक भिक्षु या भिक्षुणी बन जाएंगे। वे एक भिक्षु या भिक्षुणी तीन से सात बार तक बनते हैं। पहली बार की कार्यप्रणाली के अनुसार उनके भौतिक शरीर आत्म-विकास होता है, उसके बाद वे मर जाते हैं, वे आत्मिक जगत लौटते हैं जहां उनकी जांच की जाती है, उसके बाद-अगर कोई समस्या नहीं है तो वे एक बार फिर से मानव-जगत में आते हैं और अपना आत्म-विकास जारी रखते हैं, अर्थात वे एक बार फिर से बौद्धधर्म में जन्म ले सकते हैं और आत्म-विकास जारी रख सकते हैं। तीन से सात बार तक पुनर्जन्म होने के बाद, वे एक बार फिर आत्मिक जगत में लौटेंगे, जहां मरने के बाद हर बार वे जाते हैं। मानवीय दुनिया में यदि उनकी विभिन्न योग्यताएं और व्यवहार स्वर्गीय आज्ञाओं से, जो आत्मिक संसार से आती हैं, मिलती हैं, तो इस बिन्दु से आगे की समयावधि में वे वहीं रहेंगे; उन्हें फिर से मनुष्य के रुप में जन्म नहीं दिया जाएगा, ना ही पृथ्वी पर किये गये दुष्ट कार्यों के लिए दण्डित किये जाने का कोई जोखिम होगा। वे इस प्रक्रिया का अनुभव फिर कभी नहीं करेंगे। बल्कि अपनी परिस्थितियों के अनुसार, वे आत्मिक राज्य में एक पद ग्रहण करेंगे, जिसे बौद्ध लोग अमरता की प्राप्ति बताते हैं। अब तुम समझ गये? और बौद्ध धर्म में यह "अमरता की प्राप्ति" किसे बताते हैं? इसका अर्थ है कि आत्मिक संसार का एक अधिकारी बनना, और फिर से जन्म लेने या दण्ड भोगने का आगे कोई अवसर नहीं होगा। इसके अलावा, इसका अर्थ है कि पुनर्जन्म के बाद मनुष्य बनकर कष्ट भोगना समाप्त हो जायेगा। इसलिये क्या अभी भी उनके लिये पशु के रुप में पैदा होने का कोई अवसर है? बिल्कुल नहीं। इसका मतलब क्या है? यानी कि वे कोई भूमिका ग्रहण करने के लिए आध्यात्मिक जगत में ही रहते हैं और इंसान के रूप में उनका पुनर्जन्म नहीं होता। अमरत्व प्राप्ति का यह एक उदाहरण है।

जो अमरत्व को प्राप्त नहीं करते उनके विषय में क्या? आत्मिक संसार में उनके लौटने पर संबंधित कार्यकर्ताओं द्वारा उनको जांचा और सत्यापित किया जाता है और पाया जाता है कि उन्होंने आत्म-विकास में परिश्रम नहीं किया है या बौद्धमत के अनुसार आदेशित सूत्रों का परायण ठीक प्रकार से नहीं किया, बल्कि दुष्कर्म किए और जो बुरा था वही अधिक किया है। जब वे आत्मिक संसार में लौटते हैं, तो उनके दुष्टता पूर्ण कार्यों के विषय में एक निर्णय लिया जाता है, उसके बाद वे दण्डित किये जाते हैं। इसमें कोई अपवाद नहीं है। तो कब इस प्रकार का व्यक्ति अमरत्व प्राप्त करता है? उस जीवन में जब वे कोई बुरा कार्य नहीं करते-जब उनके आत्मिक संसार में लौटने के पश्चात, यह देखा जाता है कि उन्होंने मृत्यु पूर्व कुछ गलत नहीं किया था। उनका बार-बार जन्म होना जारी रहता है वे सूत्रों का पारायण जारी रखते हैं, वे अपने दिन तेल के दिये के ठण्डे और क्षीण प्रकाश में गुज़ारते हैं, वे किसी जीवधारी की हत्या नहीं करते, मांस भक्षण नहीं करते, और मनुष्य के संसार में हिस्सा नहीं लेते, अपनी समस्याओं को दरकिनार कर देते हैं और उनका किसी दूसरे मनुष्य के साथ झगड़ा नहीं होता। इस प्रक्रिया के दौरान, वे कोई दुष्टता नहीं करते, इसके पश्चात वे अत्मिक संसार में लौट आते हैं, और उनके समस्त क्रियाकलापों की जांच के बाद उन्हें एक बार पुनः मनुष्य के संसार में भेजा जाता है, एक चक्र के अन्तर्गत जो तीन से सात बार तक चलता है। यदि इस बीच कोई गडबड़ी नहीं हुई, तब उनकी अमरत्व की प्राप्ति अप्रभावित रहेगी, और वे सफल होंगे। यह विश्वासी लोगों के जीवन और मृत्यु के चक्र का एक लक्षण है: वे अमरत्व प्राप्त करने और अत्मिक संसार में कोई भूमिका ग्रहण करने योग्य होते हैं। यही बात है जो उन्हें अविश्वासियों से अलग बनाती है। पहली बात है जब वे पृथ्वी पर जीवित होते हैं, तो उन लोगों का आचरण कैसा होता है जो आत्मिक संसार में पद ग्रहण करने योग्य हैं? उनके लिये जरुरी है कि वे कोई भी दुष्टतापूर्ण कार्य न करें। उन्हें हत्या, आगजनी, बलात्कार, या लूटपाट के कार्य नहीं करने हैं; यदि वे लूटपाट, धोखाधड़ी, चोरी या डकैती करते हैं, तब वे अमरता को प्राप्त नहीं कर सकते। कहने का अर्थ है कि यदि उनका दुष्टता के कार्य से कोई भी संबंध या लगाव है तो वे आत्मिक संसार के दण्ड से बच नहीं सकते। आत्मिक संसार उन बौद्धों के लिये उचित प्रबंध करता है जो अमरत्व को प्राप्त करते हैं: उनको एक काम दिया जा सकता है कि जो लोग बौद्धधर्म में विश्वास करते प्रतीत हों, उनकी देख-रेख करें, ऐसे ही उनकी भी जो आकाशीय वृद्ध मनुष्य में विश्वास करते प्रतीत होते हैं, और बौद्धों को एक अधिकार-क्षेत्र दिया जाएगा, वे अविश्वासियों की देख-रेख कर सकते हैं, अन्यथा वे एक छोटे-मोटे दूत हो सकते हैं। कार्य का यह बंटवारा इन आत्माओं की प्रकृति के अनुसार होगा। यह बौद्धधर्म का एक उदाहरण है।

हमने जिन पांच धर्मों के विषय में कहा है, उनमें से ईसाई धर्म कुछ विशेष है। और ईसाई धर्म के बारे में क्या विशेष है? ये वे लोग हैं जो सच्चे परमेश्वर में विश्वास करते हैं। वे जो सच्चे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, वे यहाँ सूचीबद्ध कैसे हो सकते हैं? क्योंकि ईसाईयत केवल इस बात को स्वीकार करती है कि एक परमेश्वर है, और वे परमेश्वर का विरोध करते हैं और उसके प्रति हिंसक हैं। उन्होंने एक बार फिर मसीह को सूली पर चढ़ा दिया और परमेश्वर के अन्तिम दिनों के कार्यों में स्वयं को उसका शत्रु बना दिया, और नतीजा यह हुआ कि वे उजागर हो गए और एक विश्वासी समूह के रूप में सिमट कर रह गए। चूंकि ईसाईयत एक प्रकार का विश्वास है, तो यह निःसंदेह केवल विश्वास से संबंधित है-यह एक प्रकार की धर्मक्रिया है, एक प्रकार का वर्ग या कोटि, एक प्रकार का धर्म, और कुछ उन लोगों के विश्वास से अलग है जो सच्चाई से परमेश्वर का अनुसरण करते हैं। ईसाईयत को पांच प्रमुख धर्मों में सूचीबद्ध करने का मेरा कारण यह है कि ईसाईयत भी घट कर उसी स्तर पर आ चुकी है जिस स्तर पर यहूदी, बौद्धधर्म और इस्लाम धर्म आ चुके हैं। अधिकतर ईसाई इस बात पर विश्वास नहीं करते कि कोई परमेश्वर है, या इस बात पर कि वह सब पर शासन करता है, यहां तक कि वे इस बात पर भी विश्वास नहीं करते कि उसका अस्तित्व भी है। बल्कि वे केवल धर्म के विषय में बातें करने के लिए धर्मशास्त्रों का उपयोग करते हैं, वे धर्म का उपयोग लोगों को शिक्षा देने में करते हैं कि वे दयालु बनें, कष्टों को सहन करने वाले बनें और वे अच्छे कार्य करें। ईसाईयत धर्म इसी प्रकार का है: यह केवल ईश्वरपरक सिद्धांतो पर ध्यान केन्द्रित करता है, इसका परमेश्वर द्वारा किये जाने वाले मनुष्य संबंधी प्रबंधन या उसको बचाने वाले कार्यों से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं होता, यह उन लोगों का धर्म है जो ऐसे परमेश्वर का अनुकरण करते हैं जिनको परमेश्वर स्वयं अंगीकार नहीं करता। लेकिन उनके प्रति अपने नज़रिये में परमेश्वर के पास एक सिद्धांत है। वह केवल अनौपचारिक रूप से अपनी मर्जी से उनसे व्यवहार ही नहीं करता, जैसा कि वह अविश्वासियों के साथ करता है। उनके लिए उसका नज़रिया बौद्धों के समान ही हैः यदि जीवित रहते हुए, एक ईसाई में आत्म-अनुशासन होता है, तो वह पूर्णरुप से दस आज्ञाओं और अन्य आज्ञाओं का पालन कर पाता है तथा उन अपेक्षाओं के नियमों का पालन कर पाता है जो वह स्वयं के व्यवहार से करता है-और यदि वे अपने सम्पूर्ण जीवन में इसे कर सकते हैं-तब उन्हें भी उतना ही समय जीवन और मृत्यु के चक्र में से गुजरने में व्यतीत करना होगा इससे पूर्व कि वे वास्तव में तथाकथित स्वर्गारोहण को प्राप्त कर सकें। इस "स्वर्गारोहण" को प्राप्त करने के पश्चात वे आत्मिक संसार में बने रहते हैं, जहां वे एक पद प्राप्त करते हैं और अनेक में से एक दूत बन जाते हैं। इसी प्रकार, यदि पृथ्वी पर वे दुष्टता करते हैं, यदि वे पाप से भरे हैं और बहुत से पाप करते हैं, तब अपरिहार्य रूप से वे दण्डित किये जाएंगे और विभिन्न स्तर की कठोरताओं से अनुशासित किये जायेंगे। बौद्ध धर्म में "अमरत्व" प्राप्त करने का अर्थ है निर्वाण में प्रवेश करना परन्तु ईसाई धर्म में वे इसे क्या कहते है? इसे "स्वर्ग में प्रवेश" करना और "स्वर्गारोहण" होना कहते हैं। वे जो वास्तव में "स्वर्गारोहण" को प्राप्त होते हैं, वे भी जीवन और मृत्यु के चक्र से तीन से सात बार तब गुजरते हैं, उसके पश्चात मर जाने पर वे आत्मिक संसार में आते हैं, मानों वे निद्रा में थे। यदि वे एक विशेष स्तर पर हैं तो वे कोई भूमिका लेने के लिये रह सकते हैं, और पृथ्वी पर के लोगों से अलग, साधारण रीति से या परिपाटी के अनुसार उनका पुनर्जन्म नहीं होगा।

इन सब धर्मों के मध्य, जिस अन्त की वे बात करते हैं या जिसके लिये संघर्ष करते हैं, वैसा ही है जैसे बौद्धमत में अमरत्व को प्राप्त करना-यह बात दूसरी है कि इसे भिन्न-भिन्न साधनों से प्राप्त किया जाता है, उन सभी का एक ही प्रकार है। इन धर्मों के लोगों के लिए जो कि इन धार्मिक विचारधाराओं का कड़ाई से पालन कर पाते हैं, लोगों के इस भाग के लिये, परमेश्वर उन्हें एक उचित गंतव्य, जाने के लिये एक उचित स्थान देता है, और उचित रीति से उनकी देखभाल करता है। यह सब तर्कसंगत है, लेकिन यह ऐसा नहीं जैसा कि लोग कल्पना करते हैं। अब इस बात को सुनने के बाद कि ईसाईयों का क्या होता है, तुम कैसा अनुभव करते हो? क्या तुम उनके लिये दुःखी हो? क्या तुम उनके साथ सहानुभूति रखते हो? (थोड़ी-सी) उनके लिए कुछ भी नहीं किया जा सकता– इसके लिए वे स्वयं ही ज़िम्मेदार हैं। मै ऐसा क्यों कहता हूँ? परमेश्वर का कार्य सच्चा है, परमेश्वर जीवित है और वास्तविक है और उसके कार्य का लक्ष्य सम्पूर्ण मनुष्य जाति और प्रत्येक मनुष्य है-तो ईसाई लोग इसे स्वीकार क्यों नहीं करते हैं? वे पागलों की तरह परमेश्वर का विरोध क्यों करते हैं, उसे यातना क्यों देते हैं? वे भाग्यशाली हैं कि कम से कम उनके पास ऐसा अन्त तो है, तो तुम उनके लिये अफसोस क्यों करते हो? उनके लिये इस प्रकार से निपटा जाना बड़ी सहनशक्ति को दर्शाता है। जितने बडे रुप में वे परमेश्वर का प्रतिकार करते हैं, उन्हें नष्ट किया जाना चाहिये-फिर भी परमेश्वर ऐसा नहीं करता और वह ईसाई धर्म के साथ एक साधारण धर्म की तरह व्यवहार करता है। इसलिये क्या अभी भी आवश्यकता है कि अन्य धर्मों में विस्तार से जाया जाए? इन धर्मों का मूल मन्त्र क्या है? लोग दयालु हों और कोई दुष्टता न करें। अधिक से अधिक कठिनाइयों को सहन करें, कोई बुरा काम ना करें, अच्छी बातें बोले, अच्छे काम करें, दूसरों को गाली न दें, दूसरों के विषय में जल्दबाजी में निर्णय न लें, झगडों से स्वयं को दूर रखें, भलाई के काम करें, एक अच्छा इन्सान बनें-अधिकांश धार्मिक शिक्षाएं इसी प्रकार की हैं। और इसलिये, यदि ये विश्वासी लोग‌‌‌-ये विभिन्न धर्मो और वर्ग के लोग-यदि धार्मिक विचारधाराओं का कडाई से पालन करें तो वे पृथ्वी पर अपने निवासकाल में बड़ी-बड़ी त्रुटियां या पाप नहीं करेंगे और तीन से सात बार तक फिर से जन्म लेने के बाद, सामान्यत: ये लोग, जो धार्मिक विचारधाराओं का कड़ाई से पालन करने योग्य हैं, आत्मिक संसार में एक भूमिका लेने के लिये रहेंगे। और क्या ऐसे लोगों की संख्या अधिक है? अच्छे कार्य करना या धार्मिक नियमों और व्यवस्थाओं का पालन करना सहज नहीं है। बौद्ध धर्म लोगों को मांस भक्षण नहीं करने देता-क्या तुम ऐसा कर सकते हो? यदि तुम्हें भूरे वस्त्र पहनकर एक बौद्ध मंदिर में पूरे दिन सूत्रों का जप करना पड़े, क्या तुम ऐसा कर सकते हो? यह आसान नहीं होगा। ईसाई धर्म में दस आज्ञाएं और अन्य आज्ञाएं हैं, क्या इन आज्ञाओं और व्यवस्थाओं का पालन करना सहज है? नहीं है। दूसरों को गाली न दो: लोग इस नियम का पालन नहीं कर पाते, है ना? स्वयं को रोक नहीं पाते - और गाली देने के बाद वे उसे वापस नहीं ले पाते, इसलिये वे क्या करते हैं? रात्रि में वे अपने पापों को स्वीकार करते हैं! वे दूसरों को गाली देने से स्वयं को नहीं रोक पाते और ऐसा करने के बाद उनके दिलों में फिर भी घृणा भरी रहती है, और यहां तक कि वे योजना बनाते हैं कि कब वे उन्हें हानि पहुंचाएंगे। संक्षेप में, उनके लिये जो इस मृत धर्म सिद्धान्तों के मध्य जीते हैं, पाप न करना या दुष्टता न करना सरल नहीं है। और इसलिये प्रत्येक धर्म में, थोडे-से लोग ही अमरत्व प्राप्त कर पाते हैं। तुम सोचते हो कि क्योंकि इतने अधिक लोग इन धर्मों के अनुयायी हैं, इनमें से अनेक इस योग्य होंगे कि स्वर्गीय राज्य में रहकर किसी भूमिका का निर्वाह करें। लेकिन ऐसे लोग अधिक नहीं होते, केवल कुछ ही होते हैं जो इसे प्राप्त कर पाते हैं। विश्वासी लोगों के जीवन और मृत्यु के चक्र में साधारणतः ऐसा ही होता है। जो चीज उन्हें दूसरों से अलग करती है, वह यह है कि वे अमरत्व प्राप्त कर सकते हैं। अविश्वासियों में और उनमें यही अन्तर है।

वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VIII

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