अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (16) खंड एक

मद बारह : उन विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों की तुरंत और सटीक रूप से पहचान करो, जो परमेश्वर के कार्य और कलीसिया की सामान्य व्यवस्था में विघ्न-बाधा उत्पन्न करती हैं; उन्हें रोको और प्रतिबंधित करो, और चीजों को बदलो; इसके अतिरिक्त, सत्य के बारे में संगति करो, ताकि परमेश्वर के चुने हुए लोग ऐसी बातों के माध्यम से समझ विकसित करें और उनसे सीखें (भाग चार)

विभिन्न लोग, घटनाएँ और चीजें जो कलीसियाई जीवन को अस्त-व्यस्त करती हैं

VIII. धारणाएँ फैलाना

क. धारणाएँ फैलाने की अभिव्यक्तियाँ

आज हम अगुआओं और कार्यकर्ताओं की बारहवीं जिम्मेदारी के बारे में संगति जारी रखेंगे : “उन विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों की तुरंत और सटीक रूप से पहचान करो, जो परमेश्वर के कार्य और कलीसिया की सामान्य व्यवस्था में विघ्न-बाधा उत्पन्न करती हैं; उन्हें रोको और प्रतिबंधित करो, और चीजों को बदलो; इसके अतिरिक्त, सत्य के बारे में संगति करो, ताकि परमेश्वर के चुने हुए लोग ऐसी बातों के माध्यम से समझ विकसित करें और उनसे सीखें।” कलीसियाई जीवन में उत्पन्न होने वाली विघ्न-बाधाओं की विभिन्न समस्याओं के संबंध में हमने ग्यारह मुद्दे सूचीबद्ध किए थे। पिछली बार हमने सातवें मुद्दे के बारे में संगति की थी : आपसी हमलों और मौखिक झगड़ों में लिप्त होना। आज हम आठवें मुद्दे के बारे में संगति करेंगे : धारणाएँ फैलाना। धारणाएँ फैलाना कलीसियाई जीवन में भी अक्सर होता है। कुछ लोग, जो सत्य बिल्कुल नहीं स्वीकारते, परमेश्वर में अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर विश्वास करते हैं और कलीसियाई जीवन में विघ्न डालने के लिए अक्सर कुछ धारणाएँ फैलाते हैं। कलीसिया को इस व्यवहार को प्रतिबंधित करना चाहिए और कलीसियाई जीवन में सत्य की संगति के माध्यम से इसका समाधान करना चाहिए। इसके नाम से ही कोई भी देख सकता है कि धारणाएँ फैलाना उचित व्यवहार नहीं है, यह कोई सकारात्मक चीज नहीं है बल्कि एक नकारात्मक चीज है। इसलिए कलीसियाई जीवन में इसे रोका और प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। चाहे किसी भी किस्म के लोग धारणाएँ फैलाते हों, चाहे उनके जो भी इरादे होते हों, चाहे वे जानबूझकर धारणाएँ फैलाते हों या अनजाने में, अगर वे धारणाएँ फैलाते हैं तो यह कलीसियाई जीवन में विघ्न-बाधा डालेगा, जिसका हानिकारक प्रभाव होगा। इसलिए इस मामले को सौ प्रतिशत प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। धारणाएँ फैलाना किसी भी परिप्रेक्ष्य से लोगों के सत्य के अनुसरण में, परमेश्वर को जानने के अनुसरण में या उनके सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने में कोई सकारात्मक, स्वीकारात्मक भूमिका संभवतः नहीं निभा सकता; इसका सिर्फ इन चीजों में विघ्न डालने और इन्हें नुकसान पहुँचाने का ही प्रभाव हो सकता है। इसलिए जब कोई कलीसियाई जीवन में धारणाएँ फैलाता है तो सभी को—कलीसिया के अगुआओं और भाई-बहनों को समान रूप से—इस मामले को समझना चाहिए और उस व्यक्ति को दूसरों को गुमराह और बाधित करने के लिए आँख मूँदकर धारणाएँ फैलाने की खुली छूट देने के बजाय उसे तुरंत रोकने और प्रतिबंधित करने के लिए कदम उठाना चाहिए। आओ, पहले इस बारे में संगति करते हैं कि किन बातों को धारणाएँ फैलाना माना जाता है। इस भेद की पहचान के साथ लोग सटीक रूप से परिभाषित कर सकते हैं कि धारणाएँ फैलाना क्या होता है और उसे अनदेखा करने और उदासीनता से लेने के बजाय सटीक रूप से रोक भी सकते हैं और प्रतिबंधित भी कर सकते हैं।

1. परमेश्वर के बारे में धारणाएँ फैलाना

जो धारणाएँ फैलाई जाती हैं, वे लक्षित होती हैं। पहले हमें यह देखने की जरूरत है कि वे किस पर लक्षित हैं और कौन-सी धारणाएँ फैलाई जा रही हैं। इन्हें समझने से तुम्हें यह जानने में मदद मिलेगी कि लोगों द्वारा कहे गए कौन-से कथन और उनके द्वारा फैलाए गए कौन-से दृष्टिकोण धारणाएँ हैं। यह जानना कि कौन-से शब्द लोगों की धारणाएँ हैं और कौन-से कार्य धारणाएँ फैलाना हैं, लोगों को धारणाएँ फैलाने को अधिक सटीक रूप से और अधिक प्रासंगिकता के साथ प्रतिबंधित करने में सक्षम बनाएगा। सबसे पहले, सबसे गंभीर धारणाएँ फैलाने में लोगों के परमेश्वर संबंधी विचार और गलतफहमियाँ शामिल हैं। यह एक प्रमुख श्रेणी है। परमेश्वर की पहचान, परमेश्वर के सार, परमेश्वर के स्वभाव, परमेश्वर के वचनों, परमेश्वर के कार्य और परमेश्वर के अस्तित्व के बारे में गैर-तथ्यात्मक दृष्टिकोण और कथन फैलाना, ये सब धारणाएँ फैलाना है। यह एक सामान्य कथन है; विशेष रूप से, किन कथनों को धारणाएँ फैलाना माना जाता है? परमेश्वर के बारे में गलतफहमियाँ फैलाना, परमेश्वर की आलोचना और निंदा करना, यहाँ तक कि परमेश्वर की ईशनिंदा करना, ये सब धारणाएँ फैलाना है। सरल शब्दों में कहें तो परमेश्वर के बारे में ऐसी समझ फैलाना जो वास्तविकता के अनुरूप न हो और ऐसे कथन और गलत व्याख्याएँ फैलाना जो परमेश्वर की पहचान और सार के अनुरूप न हों, यह सब धारणाएँ फैलाना है। उदाहरण के लिए, कलीसियाई जीवन में कुछ लोग अक्सर परमेश्वर की पहचान और परमेश्वर के सार के बारे में बात करते हैं। उन्हें परमेश्वर की पहचान और उसके सार की सच्ची समझ नहीं होती। वे अक्सर अपने दिलों में परमेश्वर पर संदेह करते हैं और उसे गलत समझते हैं, वे अन्य चीजों के अलावा परमेश्वर द्वारा उनके लिए व्यवस्थित जीवन परिवेश और कर्तव्य निभाने के परिवेश के प्रति समर्पण करने में असमर्थ रहते हैं। तब वे परमेश्वर के बारे में अपनी गलतफहमियाँ और परमेश्वर को नहीं समझने के बारे में अपने विचार फैलाते हैं। संक्षेप में, ये विचार एक सृजित मानव के परिप्रेक्ष्य से परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाएँ स्वीकारने और उनके प्रति समर्पण करने के बारे में नहीं होते, बल्कि इसके बजाय व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों, गलतफहमियों, यहाँ तक कि आलोचनाओं और निंदाओं से भरे होते हैं। इन्हें सुनने के बाद अन्य लोग परमेश्वर के बारे में गलतफहमियाँ और उसके प्रति सतर्कता विकसित कर लेते हैं, जिससे वे परमेश्वर में अपनी सच्ची आस्था खो देते हैं, वास्तविक समर्पण की तो बात ही छोड़ दो।

कुछ लोग सोचते हैं कि परमेश्वर में विश्वास रखने से शांति और आनंद की प्राप्ति होनी चाहिए और अगर वे मुश्किल परिस्थितियों का सामना करते हैं, तो उन्हें सिर्फ परमेश्वर से प्रार्थना करने की जरूरत है और परमेश्वर उन पर ध्यान देगा, उन्हें अनुग्रह और आशीषें देगा और यह सुनिश्चित करेगा कि उनके लिए सब कुछ शांतिपूर्वक और सुचारू रूप से चले। परमेश्वर में विश्वास रखने का उनका उद्देश्य अनुग्रह माँगना, आशीषें प्राप्त करना और शांति और खुशी का आनंद लेना है। इन दृष्टिकोणों के कारण ही वे परमेश्वर की खातिर खुद को खपाने के लिए अपने परिवारों का त्याग कर देते हैं या अपनी नौकरी छोड़ देते हैं और कष्ट सहन कर सकते हैं और कीमत चुका सकते हैं। उनका मानना है कि जब तक वे चीजों का त्याग करेंगे, परमेश्वर के लिए खुद को खपाएँगे, कष्ट सहन करेंगे और लगन से कार्य करेंगे, असाधारण व्यवहार प्रदर्शित करेंगे, तब तक वे परमेश्वर के आशीष और अनुग्रह प्राप्त करेंगे और कि चाहे वे कैसी भी मुश्किलों का सामना क्यों न करें, जब तक वे परमेश्वर से प्रार्थना करेंगे, वह उन्हें सुलझाएगा और हर चीज में उनके लिए एक मार्ग खोल देगा। परमेश्वर में विश्वास रखने वाले अधिकांश लोगों का यही नजरिया होता है। लोगों को लगता है कि यह नजरिया जायज और सही है। कई लोगों की वर्षों तक बिना अपनी आस्था छोड़े परमेश्वर में अपनी आस्था बनाए रखने की क्षमता सीधे इस नजरिये से संबंधित है। वे सोचते हैं, “मैंने परमेश्वर के लिए इतना कुछ खपाया है, मेरा व्यवहार इतना अच्छा रहा है और मैंने कोई बुरे कर्म नहीं किए हैं; परमेश्वर यकीनन मुझे आशीष देगा। चूँकि मैंने बहुत कष्ट सहे हैं और हर कार्य के लिए एक बड़ी कीमत चुकाई है, बिना कोई गलती किए परमेश्वर के वचनों और अपेक्षाओं के अनुसार सब कुछ किया है, इसलिए परमेश्वर को मुझे आशीष देना चाहिए; उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मेरे लिए सब कुछ सुचारू रूप से चले और यह कि मैं अक्सर अपने दिल में शांति और खुशी का अनुभव करूँ और परमेश्वर की मौजूदगी का आनंद लूँ।” क्या यह एक मानवीय धारणा और कल्पना नहीं है? मानवीय परिप्रेक्ष्य से देखें, तो लोग परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेते हैं और फायदे प्राप्त करते हैं, इसलिए इसके लिए थोड़ा कष्ट सहना समझ में आता है और इस कष्ट के बदले में परमेश्वर की आशीषें प्राप्त करना सार्थक है। यह परमेश्वर के साथ सौदा करने की मानसिकता है। लेकिन सत्य के परिप्रेक्ष्य से और परमेश्वर के परिप्रेक्ष्य से यह मूल रूप से न तो परमेश्वर के कार्य के सिद्धांतों के और न ही उन मानकों के अनुरूप है जिनकी परमेश्वर लोगों से अपेक्षा करता है। यह पूरी तरह से ख्याली पुलाव है, परमेश्वर में विश्वास रखने के बारे में सिर्फ एक मानवीय धारणा और कल्पना है। चाहे इसमें परमेश्वर से सौदे करना या उससे चीजों की माँग करना शामिल हो या नहीं हो, या इसमें मानवीय धारणाएँ और कल्पनाएँ शामिल हों या नहीं हों, किसी भी हालत में इनमें से कुछ भी परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं है, न ही यह लोगों को आशीष देने के लिए परमेश्वर के सिद्धांतों और मानकों को पूरा करता है। खास तौर से यह लेन-देन वाला विचार और नजरिया परमेश्वर के स्वभाव को नाराज करता है, लेकिन लोगों को इसका एहसास नहीं होता है। जब परमेश्वर जो करता है वह लोगों की धारणाओं के अनुरूप नहीं होता है, तो जल्द ही उनके दिलों में उसके बारे में शिकायतें और गलतफहमियाँ उत्पन्न होने लगती हैं। उन्हें यह भी लगता है कि उनके साथ अन्याय हुआ है और फिर वे परमेश्वर से बहस करना शुरू कर देते हैं और यहाँ तक कि वे उसकी आलोचना और निंदा भी कर सकते हैं। लोग चाहे जो भी धारणाएँ और गलतफहमियाँ बना लें, परमेश्वर के परिप्रेक्ष्य से वह कभी भी मानवीय धारणाओं या इच्छाओं के अनुसार न तो कार्य करता है और न ही किसी के साथ व्यवहार करता है। परमेश्वर हमेशा वही करता है जो उसकी इच्छा होती है, वह हमेशा अपने खुद के तरीके से और अपने स्वभाव सार के आधार पर कार्य करता है। परमेश्वर के पास हर व्यक्ति के साथ व्यवहार करने के सिद्धांत हैं; वह हर व्यक्ति के साथ जो भी करता है उसमें से कुछ भी मानवीय धारणाओं, कल्पनाओं या प्राथमिकताओं पर आधारित नहीं होता—परमेश्वर के कार्य का यही पहलू मानवीय धारणाओं से सबसे ज्यादा असंगत है। जब परमेश्वर लोगों के लिए एक ऐसे परिवेश की व्यवस्था करता है जो उनकी धारणाओं और कल्पनाओं के पूरी तरह विपरीत होता है, तो वे अपने दिलों में परमेश्वर के खिलाफ धारणाएँ, राय और निंदाएँ बना लेते हैं और यहाँ तक कि उसे अस्वीकार भी कर सकते हैं। फिर क्या परमेश्वर उनकी जरूरतों को पूरा कर सकता है? बिल्कुल नहीं। परमेश्वर कभी भी मानवीय धारणाओं के अनुसार अपने कार्य करने के तरीके और अपनी इच्छाओं को नहीं बदलेगा। तो फिर किसे बदलने की जरूरत है? लोगों को बदलने की जरूरत है। लोगों को अपनी धारणाएँ छोड़ देनी चाहिए, परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित परिवेश स्वीकारने चाहिए, उनके प्रति समर्पण करना चाहिए और उनका अनुभव करना चाहिए और अपनी धारणाओं को सुलझाने के लिए सत्य की तलाश करनी चाहिए, न कि परमेश्वर जो करता है उसे अपनी धारणाओं की कसौटी पर मापना चाहिए ताकि देख सकें कि क्या वह सही है। जब लोग अपनी धारणाओं से जकड़े रहते हैं, तो उनमें परमेश्वर के खिलाफ प्रतिरोध उत्पन्न होता है—यह स्वाभाविक रूप से होता है। प्रतिरोध की जड़ें कहाँ होती हैं? यह इस तथ्य में निहित है कि आम तौर पर लोगों के दिलों में जो कुछ होता है, वह निस्संदेह उनकी धारणाएँ और कल्पनाएँ होती हैं, सत्य नहीं होता है। इसलिए जब लोग देखते हैं कि परमेश्वर का कार्य मानवीय धारणाओं के अनुरूप नहीं है, तो वे परमेश्वर की अवहेलना कर सकते हैं और उसके खिलाफ राय बना सकते हैं। इससे साबित होता है कि मूल रूप से लोगों में परमेश्वर के प्रति समर्पण करने वाला दिल नहीं होता है, उनका भ्रष्ट स्वभाव स्वच्छ किए जाने से दूर है और वे वास्तव में अपने भ्रष्ट स्वभाव के अनुसार जीवन जीते हैं। वे अब भी उद्धार प्राप्त करने से बहुत ही ज्यादा दूर हैं।

जब लोग अपने दिलों में परमेश्वर के बारे में धारणाएँ और उसके प्रति प्रतिरोध विकसित करते हैं, तो जमीर रखने वाले कुछ लोग परमेश्वर जो करता है उसे अनिच्छा से स्वीकारेंगे और परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित परिवेश में एकीकृत होने और लोगों पर उसकी संप्रभुता स्वीकारने का अनिच्छा से प्रयास करेंगे। लोग कितनी और किस हद तक धारणाएँ छोड़ सकते हैं, यह अंशतः उनकी काबिलियत पर और अंशतः इस बात पर निर्भर करता है कि वे सत्य स्वीकारते हैं या नहीं और वे ऐसे लोग हैं या नहीं जो सत्य से प्रेम करते हैं। कुछ लोग परमेश्वर के वचन पढ़कर, खोज और संगति करके और चिंतन करके परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित परिवेशों का सक्रिय रूप से सामना करते हैं। वे हर चीज पर परमेश्वर की संप्रभुता के बारे में धीरे-धीरे कुछ समझ प्राप्त करते हैं और इस तरह अपना समर्पण और आस्था बढ़ाते हैं। लेकिन कुछ लोग चाहे जिस भी परिवेश का सामना करें, सत्य नहीं खोजते। इसके बजाय वे परमेश्वर द्वारा आयोजित सभी परिवेशों का मूल्यांकन अपनी धारणाओं, कल्पनाओं और इस बात के आधार पर करते हैं कि उनसे उन्हें लाभ होता है या नहीं। उनके विचार हमेशा उनके हितों के इर्द-गिर्द घूमते हैं; वे हमेशा इस बात की परवाह करते हैं कि वे कितना बड़ा लाभ प्राप्त कर सकते हैं, भौतिक चीजों, धन और दैहिक आनंद की दृष्टि से उनके कितने हित पूरे हो सकते हैं; और वे हमेशा इन्हीं कारकों के आधार पर निर्णय करते हैं और इन्हीं के आधार पर परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित हर चीज को लेते हैं। और अंततः अपना दिमाग खपाने के बाद वे परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित परिवेश के प्रति समर्पण करने के बजाय उससे बचकर भागने और उससे परहेज करने का चुनाव करते हैं। अपने प्रतिरोध, अस्वीकृति और परहेज के कारण वे परमेश्वर के वचनों से दूर हो जाते हैं, जीवन के अनुभव से वंचित रह जाते हैं और नुकसान उठाते हैं, जिससे उनके दिलों में दर्द और पीड़ा होती है। जितना ज्यादा वे ऐसे परिवेशों का विरोध करते हैं, उतना ही ज्यादा और उतना ही बड़ा दुख वे सहते हैं। जब ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है तो परमेश्वर में उनकी जो थोड़ी-बहुत आस्था होती है, वह भी अंततः चूर-चूर हो जाती है। इस समय उनके दिलों पर हावी होने वाली धारणाएँ एक साथ उमड़ पड़ती हैं : “मैंने इतने लंबे समय तक परमेश्वर के लिए खुद को खपाया है, फिर भी मुझे उम्मीद नहीं थी कि परमेश्वर मेरे साथ ऐसे पेश आएगा। परमेश्वर अन्यायी है, वह लोगों से प्रेम नहीं करता! परमेश्वर ने कहा था कि जो लोग ईमानदारी से उसके लिए खुद को खपाते हैं, वे निश्चित रूप से बहुत आशीष प्राप्त करेंगे। मैंने ईमानदारी से खुद को परमेश्वर के लिए खपाया है, मैंने अपना परिवार और करियर त्याग दिया है, कठिनाइयाँ सही हैं और कड़ी मेहनत की है—परमेश्वर ने मुझे बहुत आशीष क्यों नहीं दिए? परमेश्वर के आशीष कहाँ हैं? मैं उन्हें महसूस क्यों नहीं कर सकता या देख क्यों नहीं सकता? परमेश्वर लोगों के साथ अन्याय क्यों करता है? परमेश्वर अपने वचन पर कायम क्यों नहीं रहता? लोग कहते हैं कि परमेश्वर वफादार है लेकिन मैं इसे क्यों महसूस नहीं कर सकता? बाकी हर चीज को दरकिनार करते हुए सिर्फ इस परिवेश में मुझे कभी नहीं लगा कि परमेश्वर वफादार है!” चूँकि लोग धारणाएँ रखते हैं, इसलिए वे आसानी से उनसे धोखा खा जाते हैं और गुमराह हो जाते हैं। यहाँ तक कि जब परमेश्वर लोगों के स्वभाव में बदलाव और उनके जीवन विकास के लिए परिवेशों की व्यवस्था करता है, तो भी उन्हें उसे स्वीकारना मुश्किल लगता है और वे परमेश्वर को गलत समझते हैं। उन्हें लगता है कि यह परमेश्वर का आशीष नहीं है और परमेश्वर उन्हें पसंद नहीं करता। वे मानते हैं कि उन्होंने ईमानदारी से परमेश्वर के लिए खुद को खपाया है लेकिन परमेश्वर ने अपने वादे पूरे नहीं किए हैं। ये लोग जो सत्य का अनुसरण नहीं करते, किसी मामूली परिवेश के एक ही परीक्षण से इतनी आसानी से बेनकाब हो जाते हैं। जब वे बेनकाब होते हैं तो वे आखिरकार वही कहते हैं जो वे सबसे ज्यादा कहना चाहते थे : “परमेश्वर धार्मिक नहीं है। परमेश्वर वफादार परमेश्वर नहीं है। परमेश्वर के वचन शायद ही कभी पूरे होते हैं। परमेश्वर ने कहा था, ‘परमेश्वर जो कहता है उसके मायने हैं, वह जो कहता है उसे पूरा करेगा, और जो वह करता है वह हमेशा के लिए बना रहेगा।’ इन वचनों की पूर्ति कहाँ है? मैं उसे देख क्यों नहीं सकता या महसूस क्यों नहीं कर सकता? फलाँ को देखो : परमेश्वर में विश्वास करने के बाद से उसने परमेश्वर के लिए उतना त्याग नहीं किया है या खुद को उतना नहीं खपाया है जितना मैंने त्याग किया या खुद को खपाया है, न ही उसने उतना चढ़ावा चढ़ाया है जितना मैंने चढ़ाया है। लेकिन उसके बच्चे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में प्रवेश पा गए, उसके पति को पदोन्नति मिल गई, उनका व्यवसाय फल-फूल रहा है, यहाँ तक कि उनकी फसलें भी दूसरों की तुलना में ज्यादा उपज देती हैं। और मुझे क्या मिला है? मैं फिर कभी परमेश्वर में विश्वास नहीं करूँगा!” ये शब्द इन लोगों के सच्चे विचार, उनके आदर्श वाक्य हैं। वे इन धारणाओं से भरे हुए हैं, इन बेतुके विचारों और दृष्टिकोणों से भरे हुए हैं और लाभों और लेन-देन के विचारों से भरे हुए हैं। वे परमेश्वर के कार्य और उसके श्रमसाध्य इरादों को इसी तरह से समझते-बूझते हैं, इन चीजों को वे इसी तरह से लेते हैं। इसलिए उन परिवेशों में जिन्हें परमेश्वर बार-बार बहुत परिश्रम से व्यवस्थित करता है, वे बार-बार परमेश्वर को अपनी धारणाओं से मापते हैं और गलत समझते हैं और लगातार असफल होते और ठोकर खाते हैं। इसके अलावा वे लगातार यह सत्यापित करने का प्रयास करते हैं कि उनकी धारणाएँ सही हैं। जब उन्हें लगता है कि ये धारणाएँ पुष्ट हो गई हैं और उनके लिए मनमाने ढंग से परमेश्वर का मूल्यांकन, आलोचना और निंदा करने के लिए पर्याप्त सबूत हैं तो वे धारणाएँ फैलाना शुरू कर देते हैं क्योंकि उनके दिल परमेश्वर के बारे में धारणाओं से भरे होते हैं। इन धारणाओं में क्या मिला होता है? उनमें शिकायतें, असंतोष और उलाहने मिले होते हैं। जब वे इन चीजों से भर जाते हैं तो इन्हें बाहर निकालने के अवसर तलाशते हैं। वे उम्मीद करते हैं कि एक भीड़ मिलेगी जो उनके साथ हुए “अन्याय” सुनेगी; वे इन लोगों को ये चीजें सुनाकर उन्हें उस तथाकथित अनुचित व्यवहार के बारे में बताना चाहते हैं जिसे उन्होंने “सहा” है। इन लोगों द्वारा फैलाई गई धारणाएँ कलीसियाई जीवन में इसी तरह से पैदा होती हैं, इसी तरह से ऐसी धारणाएँ आती हैं। इन लोगों के दिल उलाहनों, अवज्ञा और असंतोष से और साथ ही परमेश्वर के बारे में गलतफहमियों और शिकायतों से, यहाँ तक कि परमेश्वर की आलोचना और निंदा से भी भरे होते हैं, जो अंततः उनके दिलों को ईशनिंदा से भर देता है। वे डरते हैं कि उन्हें आशीष नहीं मिलेंगे और इसलिए वे छोड़कर जाने के लिए तैयार नहीं होते, इसलिए वे लोगों के बीच परमेश्वर के बारे में अपनी गलतफहमियाँ और उससे अपनी असंतुष्टि फैलाते हैं और इससे भी बढ़कर वे परमेश्वर की आलोचना और निंदा और उसके प्रति अपनी ईशनिंदा फैलाते हैं। वे किसकी ईशनिंदा करते हैं? वे परमेश्वर की ईशनिंदा करते हैं, कहते हैं कि वह उनके साथ अन्याय करता है और उन्हें उनके किए का उचित और समान प्रतिफल नहीं देता। वे परमेश्वर की आलोचना करते हैं कि उसने उन्हें उनके चढ़ावों और बलिदानों के बाद अनुग्रह और बड़े आशीष नहीं दिए। उन्हें परमेश्वर से वे दैहिक जरूरत की चीजें—भौतिक चीजें, धन इत्यादि—नहीं मिलीं जिनकी उन्हें उम्मीद थी, इस तरह उनके दिल शिकायतों और उलाहनों से भर गए हैं। धारणाएँ फैलाने का उनका उद्देश्य एक ओर भड़ास निकालकर और बदला लेकर मनोवैज्ञानिक संतुलन की भावना प्राप्त करना होता है; और दूसरी ओर ज्यादा लोगों को परमेश्वर के बारे में गलतफहमियाँ और धारणाएँ विकसित करने के लिए उकसाकर उन्हें परमेश्वर से सतर्क करना होता है, जैसा कि वे खुद होते हैं। अगर ज्यादा लोग कहें, “हम फिर कभी परमेश्वर में विश्वास नहीं करेंगे,” तो वे अंदर से संतुष्ट महसूस करेंगे। धारणाएँ फैलाने के पीछे उनका उद्देश्य और अंतर्निहित कारण यही होता है।

धारणाएँ फैलाने वाले लोगों का आदर्श वाक्य क्या होता है? वे अक्सर कौन-सा कथन दोहराते हैं? कुछ चीजों का अनुभव करने और मनचाहा लाभ नहीं मिलने के बाद वे लगातार मन ही मन कहते हैं, “मैं फिर कभी परमेश्वर में विश्वास नहीं करूँगा।” ऐसा कहने के बाद भी उन्हें नहीं लगता कि उनकी नफरत दूर हो गई है या उन्होंने अपना लक्ष्य हासिल कर लिया है। जब वे सभाओं में जाते हैं तो दूसरे लोग चाहे जिस भी विषय पर संगति करें, वे उसे समझ नहीं पाते। उन्हें यह वाक्यांश फिर से कहना पड़ता है, इसे कई बार दोहराना पड़ता है, यहाँ तक कि दस बार से भी ज्यादा। “मैं फिर कभी परमेश्वर में विश्वास नहीं करूँगा”—क्या यह वाक्यांश अर्थ से भरा नहीं है? इसके पीछे एक कहानी है। उनका “विश्वास” क्या है? क्या वे पहले भी परमेश्वर में विश्वास करते थे? क्या उनका पिछला विश्वास सच्ची आस्था था? क्या उसमें वह समर्पण शामिल था जो एक सृजित प्राणी में होना चाहिए? (नहीं।) बिल्कुल नहीं। वे परमेश्वर के बारे में धारणाओं और कल्पनाओं से भरे हुए हैं। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि वे बिना किसी समर्पण के परमेश्वर से माँगों और अनुरोधों से भरे हुए हैं। उनके “विश्वास” का क्या अर्थ है? “मेरा विश्वास है कि परमेश्वर ही स्वर्ग और पृथ्वी तथा सभी चीजों पर संप्रभु है। मेरा विश्वास है कि परमेश्वर मुझे दूसरों द्वारा धमकाए जाने से बचा सकता है। मेरा विश्वास है कि परमेश्वर मुझे दैहिक सुख का आनंद लेने दे सकता है, एक अच्छा, समृद्ध जीवन जीने दे सकता है और मेरे लिए सब कुछ शांतिपूर्ण और सुखद बना सकता है। मेरा विश्वास है कि परमेश्वर मुझे स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने दे सकता है और बड़े आशीष प्राप्त करने दे सकता है, इस जीवन में सौ गुना और आने वाली दुनिया में अनंत जीवन पाने दे सकता है!” क्या यह विश्वास है? इन “विश्वासों” में समर्पण का कोई नामो-निशान नहीं है और इनमें से कोई भी लोगों से परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं है। ये विश्वास पूरी तरह से व्यक्तिगत लाभ के परिप्रेक्ष्य से उत्पन्न होते हैं। परमेश्वर सत्य व्यक्त करता है और लोगों पर कार्य करता है। परमेश्वर ने कब कहा है कि वह लोगों को एक खुशहाल जीवन जीने, दूसरों से बेहतर जीवन जीने या असीमित संभावनाओं के साथ समृद्ध और सफल होने में सक्षम बनाएगा? (कभी नहीं।) तो वे अपने “विश्वास” को इतना मूल्यवान क्यों मानते हैं? वे यहाँ तक कहते हैं कि वे फिर कभी परमेश्वर में विश्वास नहीं करेंगे। क्या उनके विश्वास का कुछ भी मूल्य है? क्या परमेश्वर इसे स्वीकारता है? उनमें सत्य वास्तविकता का कोई नामो-निशान नहीं है, परमेश्वर के प्रति समर्पण का कोई नामो-निशान नहीं है, वे परमेश्वर से सिर्फ आशीष, लाभ और फायदे प्राप्त करना चाहते हैं और इसे परमेश्वर में विश्वास करना कहते हैं। क्या यह परमेश्वर की ईशनिंदा नहीं है? ऐसे लोग धारणाओं से भरे हुए और आशीष प्राप्त करने के इरादे से ग्रस्त होते हैं। वे परमेश्वर के कार्य का बिल्कुल भी अनुभव नहीं करते और परमेश्वर के वचनों का अभ्यास नहीं करते। वे जो कुछ भी करते हैं उसका लक्ष्य और उद्देश्य पूरी तरह से उनके देह के लाभ के लिए होता है। वे अपने बारे में अच्छा महसूस करते हैं और परमेश्वर में अपनी तथाकथित आस्था को विशेष रूप से मूल्यवान मानते हैं। अगर परमेश्वर में तुम्हारी आस्था इतनी मूल्यवान और महान है तो जब परमेश्वर तुम्हारे लिए कुछ मामूली परिवेश व्यवस्थित करता है, तो तुम उससे सत्य क्यों नहीं समझ पाते या अपनी गवाही में अडिग क्यों नहीं रह पाते? यहाँ क्या हो रहा है? जब परमेश्वर तुम्हारी आस्था का परीक्षण करता है तो तुम परमेश्वर को वापस क्या देते हो? क्या यह संभव है कि तुम परमेश्वर को जो गलतफहमियाँ, शिकायतें और प्रतिरोध वापस देते हो, वही वह चाहता है? क्या वे सत्य के अनुरूप हैं? स्पष्ट रूप से वे सत्य के अनुरूप नहीं हैं। इसलिए यह तथ्य कि ये लोग कलीसिया में खुलेआम धारणाएँ फैला सकते हैं, एक बात साबित करता है : वे परमेश्वर को नहीं जानते और इससे भी बढ़कर वे यह नहीं मानते कि परमेश्वर हर चीज पर संप्रभु है—जिस परमेश्वर में वे विश्वास करते हैं वह अस्तित्व में ही नहीं है। जब ये लोग परमेश्वर की अवहेलना, निंदा और ईशनिंदा करने में ज्यादा लोगों को शामिल करने के लिए उन्हें गुमराह करने और फुसलाने के लिए खुलेआम धारणाएँ फैलाते हैं तो वे अनजाने ही सार्वजनिक रूप से घोषणा कर रहे होते हैं कि वे अब परमेश्वर के अनुयायी, विश्वासी और सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व के अधीन सृजित प्राणी नहीं हैं। वे जो धारणाएँ फैलाते हैं वे कोई साधारण विचार या कथन नहीं होते; बल्कि वे अपने दिल में परमेश्वर के खिलाफ पहले ही एक अटूट अवरोध खड़ा कर चुके होते हैं और उन्होंने यह मन बना लिया होता है कि परमेश्वर के साथ व्यवहार करने, परमेश्वर के साथ अपना रिश्ता सँभालने और परमेश्वर के वचनों और कार्य के साथ पेश आने के लिए इंसानी धारणाओं और कल्पनाओं का उपयोग करना सही है और उन्हें इसी तरीके से अभ्यास करना चाहिए। जब ऐसे लोग कलीसियाई जीवन में खुलेआम धारणाएँ फैलाते हैं तो क्या उन्हें प्रतिबंधित किया जाना चाहिए? या उनके छोटे आध्यात्मिक कद और उथली नींव की वजह से उन्हें अपने विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता और पश्चात्ताप करने के लिए पर्याप्त समय और स्थान दिया जाना चाहिए? उचित कार्रवाई क्या है? (उन्हें रोकना और प्रतिबंधित करना उचित है।) उन्हें रोकना और प्रतिबंधित करना उचित क्यों है? कुछ लोग कहते हैं, “अगर तुम उन्हें प्रतिबंधित कर स्वतंत्र रूप से नहीं बोलने देते और वे विश्वास करना और सभाओं में भाग लेना बंद कर देते हैं तो क्या इससे उन्हें नुकसान नहीं होगा? यह बहुत खेद की बात होगी! क्या परमेश्वर सभी लोगों को बचाना नहीं चाहेगा बजाय इसके कि एक भी व्यक्ति नरक का दुख भोगे? यहाँ तक कि खोई हुई एक भी भेड़ वापस पानी चाहिए—खोई हुई भेड़ वापस पाने के तमाम प्रयासों के बाद क्या वह उसे फिर से खोने दे सकता है?” क्या ये शब्द सही हैं? (नहीं।) ये सही क्यों नहीं हैं? (क्योंकि ऐसे लोग वास्तव में परमेश्वर में विश्वास नहीं करते; वे सिर्फ आशीष प्राप्त करने की आशा में परमेश्वर में विश्वास करते हैं और उनके विश्वास में अशुद्धियाँ मिली होती हैं।) ऐसा कौन है जिसके परमेश्वर में विश्वास में कुछ अशुद्धियाँ नहीं मिली हों? क्या तुम्हारे विश्वास में कुछ अशुद्धियाँ नहीं मिली हैं? क्या यह वैध कारण है? ऐसे लोगों के कथन पर विचार करो : “मैं फिर कभी परमेश्वर में विश्वास नहीं करूँगा।” ये कैसे शब्द हैं? क्या इनमें और गैर-विश्वासियों, दानवों और शैतान द्वारा की जाने वाली ईशनिंदा में कोई फर्क है? (नहीं।) इस कथन का निहितार्थ क्या है? “मेरी अब परमेश्वर में आस्था नहीं है। अतीत में मैंने पूरे दिल से परमेश्वर में विश्वास रखा और उसका अनुसरण किया, लेकिन परमेश्वर ने मुझे आशीष नहीं दिया। इसके बजाय उसने मेरे लिए चीजें कठिन बनाने और मुझे ठोकर लगवाने के लिए ऐसे परिवेश व्यवस्थित किए। परमेश्वर जो कहता है वह उससे बिल्कुल मेल नहीं खाता जो वह करता है, इसलिए मैं अब परमेश्वर में विश्वास करने की हिम्मत नहीं करता! मैं पहले बहुत मूर्ख था। मैंने परमेश्वर के लिए त्याग किया, खुद को खपाया और बहुत कठिनाई झेली, लेकिन जब बड़े लाल अजगर ने मुझे गिरफ्तार कर सताया तो मुझे परमेश्वर से कोई सुरक्षा नहीं मिली। मेरे परिवार का व्यवसाय भी दूसरों के व्यवसायों की तरह अच्छा नहीं चला, मैंने उतना पैसा नहीं कमाया जितना दूसरों ने कमाया और मेरे माता-पिता बीमार रहे। इतने सालों तक परमेश्वर में विश्वास करने से मुझे कुछ नहीं मिला। क्या परमेश्वर ने नहीं कहा था कि वह लोगों को बहुत आशीष देगा? मुझे परमेश्वर से कौन-से आशीष मिले? परमेश्वर के वचन बिल्कुल भी सत्य नहीं हुए, इसलिए मैं फिर कभी परमेश्वर में विश्वास नहीं करूँगा!” “मैं फिर कभी परमेश्वर में विश्वास नहीं करूँगा!” इस कथन में बहुत कुछ समाहित है। यह परमेश्वर के प्रति शिकायतों, असंतोष और गलतफहमियों से भरा हुआ है। संक्षेप में, जब उन्होंने कष्ट सहे और खयाली पुलाव पकाने वाली मानसिकता के साथ खुद को खपाया तो परमेश्वर ने उन्हें उनकी माँगों के अनुसार आशीष नहीं दिए, न ही परमेश्वर ने उन्हें उनकी धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार पारिश्रमिक या पुरस्कार दिया, इसलिए वे असंतुष्ट होकर परमेश्वर के प्रति आक्रोश से भर गए और ऐसी परिस्थितियों में ही उन्होंने यह वाक्य कहा। यह वाक्य शून्य से नहीं आया; जब तक उन्होंने यह कहा, तब तक वे पहले ही कई व्यवहार और अभिव्यक्तियाँ प्रदर्शित कर चुके थे और बेनकाब हो चुके थे। परमेश्वर के साथ ऐसे लोगों के रिश्ते में क्या समस्या है? परमेश्वर के साथ उनके रिश्ते में सबसे बड़ा मुद्दा क्या है? वह यह है कि उन्होंने कभी खुद को सृजित प्राणी नहीं माना और परमेश्वर को आराधना करने के लिए बिल्कुल भी सृष्टिकर्ता माना ही नहीं। परमेश्वर में अपने विश्वास की शुरुआत से ही उन्होंने परमेश्वर को पैसों का पेड़, एक गुप्त खजाना समझा; उसे दुख और आपदा से छुटकारा दिलाने वाला बोधिसत्व और खुद को इस बोधिसत्व, इस मूर्ति का अनुयायी माना। उन्हें लगा कि परमेश्वर में विश्वास करना बुद्ध में विश्वास करने जैसा है, जहाँ सिर्फ शाकाहारी खाना खाने, शास्त्रों का पाठ करने और अक्सर धूपबत्ती जलाकर प्रणाम करने से वे जो चाहें प्राप्त कर सकते हैं। इस तरह उनके परमेश्वर में विश्वास करने के बाद विकसित हुई सभी कहानियाँ उनकी धारणाओं और कल्पनाओं के दायरे में घटित हुईं। उन्होंने सृष्टिकर्ता से सत्य स्वीकारने वाले सृजित प्राणी की कोई अभिव्यक्ति नहीं दिखाई, न ही उन्होंने सृष्टिकर्ता के प्रति सृजित प्राणी में होने वाला समर्पण प्रदर्शित किया; सिर्फ निरंतर माँगें, निरंतर हिसाब-किताब और सतत अनुरोध करते रहे। यह सब अंततः परमेश्वर के साथ उनके रिश्ते के टूटने का कारण बना। ऐसा रिश्ता लेन-देन वाला होता है और कभी स्थिर नहीं रह सकता; ऐसे लोगों का जल्दी ही बेनकाब होना निश्चित है। यहाँ तक कि अगर वे कलीसियाई जीवन में भाग भी लेते हैं, धारणाएँ नहीं फैलाते और कभी-कभार इस बारे में संगति भी करते हैं कि परमेश्वर ने उनकी कैसे अगुआई की है, परमेश्वर ने उन्हें कैसे आशीष दिया है, उन्होंने क्या आनंद लिया है, इत्यादि, तो भी वे जिस बारे में बात करते हैं, उसमें से अधिकांश में उनके द्वारा परमेश्वर से प्राप्त अनुग्रह, आनंद और दैहिक लाभ ही शामिल रहते हैं। ये चर्चाएँ सत्य से और परमेश्वर के प्रति समर्पण करने से पूरी तरह से असंबंधित होती हैं और उनमें कोई सत्य वास्तविकता नहीं होती। जब परिस्थितियाँ अनुकूल होती हैं तो वे परमेश्वर में आस्था और उसके प्रति प्रेम और अन्य लोगों के प्रति सहनशीलता और धैर्य प्रदर्शित करते हैं, यह सब एक लक्ष्य प्राप्त करने के लिए होता है : परमेश्वर के सभी आशीष प्राप्त करने का लक्ष्य। जब परमेश्वर उनसे अनुग्रह, लाभ और भौतिक फायदे छीन लेता है तो उनकी धारणाएँ प्रकट हो जाती हैं। स्वार्थ से प्रेरित होकर और व्यक्तिगत लाभ को प्राथमिकता देने वाले इन लोगों को जब वह नहीं मिलता जो वे चाहते हैं तो वे गुस्से से भड़क उठते हैं; वे परमेश्वर के प्रति अपना असंतोष जाहिर करने के लिए धारणाएँ फैलाना शुरू कर देते हैं, साथ ही अपने साथ सहानुभूति रखने और परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाएँ स्वीकारने के लिए ज्यादा लोगों को फुसलाने का प्रयास करते हैं। क्या ऐसे लोगों को रोका और प्रतिबंधित किया जाना चाहिए? (हाँ।) जिन विषयों, विचारों और दृष्टिकोणों पर वे संगति करते हैं, वे सत्य की शुद्ध समझ नहीं दर्शाते, न ही वे लोगों को परमेश्वर के प्रति समर्पण करने और उसमें सच्ची आस्था रखने में मदद करते हैं। इसके बजाय वे लोगों को परमेश्वर से दूर ले जाते हैं, परमेश्वर के प्रति गलतफहमियाँ रखने, उससे सतर्कता बरतने, यहाँ तक कि उसे अस्वीकारने का कारण भी बनते हैं और जो लोग इनके द्वारा फैलाई गई धारणाएँ सुनते हैं, उनसे अपनी तरह ही चुपचाप खुद को चेतावनी दिलवाते हैं, “मैं फिर कभी परमेश्वर में विश्वास नहीं करूँगा।” यही वह विघ्न है जो ऐसे लोगों द्वारा फैलाई गई धारणाएँ दूसरों के लिए उत्पन्न करती हैं।

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