अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (16) खंड तीन

ख. धारणाएँ फैलाने वाले लोगों के साथ कैसे पेश आएँ

जब कलीसिया में कोई व्यक्ति परमेश्वर के बारे में धारणाएँ और असंतोष फैलाता है तो इसके क्या नतीजे होते हैं? क्या यह सीधे तौर पर कलीसियाई जीवन के नतीजों को प्रभावित करता है? क्या यह सामान्य कलीसियाई जीवन और कलीसिया के कार्य में बाधा डालता है? (हाँ।) यह परमेश्वर में लोगों की आस्था पर असर डालता है और अपने कर्तव्य सामान्य रूप से निभाने की उनकी क्षमता को प्रभावित करता है। इसलिए जो लोग धारणाएँ फैलाते हैं, उन्हें प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। अगर वे कभी-कभार ही ऐसी बातों का जिक्र करते हैं तो भी उन्हें प्रतिबंधित करने और उनका भेद पहचानने की आवश्यकता है; देखो कि उनमें किस तरह की मानवता है, क्या उनके धारणाएँ फैलाने का कारण अस्थायी नकारात्मकता और कमजोरी है या इसका कारण उनके प्रकृति सार का कोई मसला है—क्या वे लगातार सत्य का अनुसरण नहीं कर रहे हैं और ज्यादा लोगों को गुमराह करने और कलीसियाई जीवन में बाधा डालने और नुकसान पहुँचाने के लिए जानबूझकर धारणाएँ फैला रहे हैं। अगर यह कभी-कभार की ही नकारात्मकता और कमजोरी है तो सत्य की संगति के जरिये उनको सहारा देना और उनकी सहायता करना पर्याप्त है। अगर वे सलाह पर ध्यान नहीं देते और धारणाएँ फैलाना और कलीसियाई जीवन में विघ्न डालना जारी रखते हैं—यहाँ तक कि दूसरों को भी नकारात्मक और कमजोर बनाते हैं जिससे उनकी सामान्य रूप से अपने कर्तव्य निभाने की क्षमता प्रभावित होती है—तो इसका मतलब यह है कि वे शैतान के सेवक हैं और उन्हें सिद्धांतों के अनुसार बाहर निकाल दिया जाना चाहिए। उन्हें एक और मौका क्यों नहीं दिया जाता? क्या तुम्हें लगता है कि ऐसे लोग छद्म-विश्वासी होते हैं? (हाँ।) उनकी मानवता चाहे जैसी हो, ऐसे लोग छद्म-विश्वासी होते हैं। छद्म-विश्वासी गेहूँ के बीच जंगली घास की तरह होते हैं—उन्हें बाहर निकाल दिया जाना चाहिए। अगर वे सिर्फ छद्म-विश्वासियों की कुछ अभिव्यक्तियाँ ही प्रदर्शित करते हैं और कलीसियाई जीवन में विघ्न नहीं डालते और अभी भी कलीसिया के मित्र बनकर सेवा प्रदान कर सकते हैं तो उन्हें अकेला छोड़ा जा सकता है। लेकिन जो लोग लगातार धारणाएँ फैलाते हैं वे हमेशा छद्म-विश्वासियों के दृष्टिकोण और टिप्पणियाँ व्यक्त करते हैं। वे यूँ ही बातें नहीं कहते; उनका उद्देश्य ज्यादा लोगों को परमेश्वर से दूर करने के लिए भड़काना, गुमराह करना और अपने साथ मिलाना होता है। उनका इरादा होता है : “अगर मैं आशीष प्राप्त नहीं कर सकता तो मैं अब और विश्वास नहीं करूँगा। तुम लोगों में से किसी को भी आशीष पाने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए और तुम्हें विश्वास भी नहीं करना चाहिए! अगर तुम लोग विश्वास करते रहे, अगर तुम लोगों ने दृढ़ रहकर अंततः किसी दिन आशीष प्राप्त कर ही लिए तो क्या होगा—क्या यह मुझे मुश्किल में नहीं डाल देगा? तब मैं आंतरिक रूप से संतुलित कैसे महसूस कर सकूँगा? यह नहीं चलेगा। भविष्य में पछतावे से बचने के लिए मैं तुम लोगों को परेशान करके तुम्हारी आस्था डाँवाडोल कर दूँगा, तुम लोगों को परमेश्वर से दूर करने, परमेश्वर को धोखा देने और अपने साथ कलीसिया छोड़ने के लिए बाध्य कर दूँगा—यह सबसे अच्छा होगा।” यही उनका उद्देश्य होता है। क्या ऐसे छद्म-विश्वासियों को बाहर नहीं निकाल दिया जाना चाहिए? (हाँ।) उन्हें बाहर निकाल दिया जाना चाहिए। अगर कुछ छद्म-विश्वासी विश्वास करना बंद कर देते हैं तो कलीसिया बस उनसे परमेश्वर के वचनों की किताबें वापस ले लेगी और उन्हें हटा देगी। ऐसे अन्य छद्म-विश्वासी भी हैं जो परमेश्वर में विश्वास करने और विश्वासियों के प्रति कुछ सकारात्मक भावनाएँ रखते हैं। वे कलीसिया में सकारात्मक, स्वीकारात्मक भूमिका नहीं निभाते; वे बस कभी-कभी कलीसिया के मित्रों के रूप में मदद करते हैं। ऐसे लोग भले ही सत्य का अनुसरण या सत्य की संगति न करते हों, लेकिन वे धारणाएँ नहीं फैलाते या कलीसियाई जीवन में बाधा नहीं डालते। अगर वे थोड़ी-बहुत सेवा कर सकते हैं तो उन्हें कलीसिया में रहने दिया जाना चाहिए और उन्हें बाहर निकालने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन जो छद्म-विश्वासी लगातार धारणाएँ फैलाते हैं, उन पर कोई दया नहीं दिखाई जानी चाहिए। वे परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाएँ और गलतफहमियाँ फैलाते हैं, कलीसियाई जीवन में बाधा डालते हैं और कलीसिया के कार्य में विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न करते हैं। ये छद्म-विश्वासी शैतान के सेवक हैं। वे धारणाएँ रखते हैं; लेकिन वे न सिर्फ उन्हें हल करने के लिए सत्य नहीं खोजते, बल्कि परमेश्वर के चुने हुए लोगों को गुमराह करने के लिए अपनी धारणाएँ भी फैलाते हैं। वे परमेश्वर को धोखा देते हैं और अपने साथ कुछ और लोगों को भी उनके विनाश की ओर घसीटना चाहते हैं। ऐसे इरादों से ही वे कलीसिया के कार्य में बाधा डालते हैं। क्या परमेश्वर उन्हें माफ कर सकता है? नहीं, उन्हें बख्शा नहीं जाना चाहिए। यह उन्हें प्रतिबंधित या अलग-थलग करने का मामला नहीं है; उन्हें बिना किसी नरमी के हमेशा के लिए दूर करके हटा दिया जाना चाहिए!

कलीसिया में कुछ लोग कभी सत्य का अनुसरण नहीं करते और कभी नहीं समझते कि परमेश्वर लोगों को बचाने के लिए कैसे कार्य करता है। कुछ चीजों का अनुभव करने के बाद वे परमेश्वर के प्रति गलतफहमियाँ, प्रतिरोध और शिकायतें विकसित कर लेते हैं; जो वे कहते और करते हैं उनमें से कुछ चीजें धारणाएँ फैलाने का काम करती हैं। वे जो धारणाएँ फैलाते हैं, वे सिर्फ परमेश्वर के वचनों और कार्य को समझने में विचलन या परमेश्वर के बारे में गलतफहमियाँ नहीं होतीं। कुछ धारणाएँ कहीं ज्यादा गंभीर होती हैं, वे सीधे तौर पर इस बात से इनकार करती हैं कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं—वे पूरी तरह से परमेश्वर की आलोचना और निंदा करती हैं। और वे जो दूसरी धारणाएँ फैलाते हैं वे परमेश्वर पर खुले तौर पर हमला और उसकी ईशनिंदा तक करती हैं। वे लोग एक सृजित प्राणी या परमेश्वर के अनुयायी के परिप्रेक्ष्य से आज्ञा मानने वाले दिल से अपनी भ्रष्टता और विद्रोह का गहन-विश्लेषण या उन्हें जानने की कोशिश नहीं करते, न ही वे सत्य स्वीकार कर परमेश्वर के कार्य और उसके इरादों की अपनी समझ-बूझ के बारे में संगति करते हैं। वे जो धारणाएँ व्यक्त करते हैं वे इस सकारात्मक समझ-बूझ के बिल्कुल विपरीत होती हैं। जब दूसरे लोग उनकी धारणाएँ सुनते हैं तो उन्हें परमेश्वर की समझ नहीं मिलती, न ही उनमें सच्ची आस्था विकसित होती है और निश्चित रूप से परमेश्वर में उनकी आस्था बढ़ती भी नहीं है। इसके बजाय परमेश्वर में उनकी आस्था अस्पष्ट हो जाती है, कम हो जाती है, यहाँ तक कि पूरी तरह से खत्म भी हो जाती है। साथ ही, परमेश्वर के कार्य की परिकल्पना उनके लिए धुँधली हो जाती है। लोग उनके द्वारा फैलाई गई धारणाएँ जितनी ज्यादा सुनते हैं, उतने ही ज्यादा उनके दिल भ्रमित हो जाते हैं, इस हद तक कि वे इस बारे में भी अस्पष्ट महसूस करते हैं कि उन्हें परमेश्वर में विश्वास क्यों करना चाहिए और वे संदेह करने लगते हैं कि क्या परमेश्वर मौजूद है। क्या परमेश्वर के वचन सत्य हैं, क्या परमेश्वर के वचन और उसका कार्य लोगों को शुद्ध कर बचा सकते हैं और ऐसी ही अन्य बातें—ये सब उनके लिए धुँधली और संदेहास्पद हो जाती हैं। जब लोग ऐसे व्यक्तियों द्वारा फैलाई गई धारणाएँ और गलतफहमियाँ सुनते हैं तो वे परमेश्वर पर संदेह करने लगते हैं और उससे सतर्क रहने लगते हैं; वे अपने दिलों में परमेश्वर को परिसीमित करना शुरू कर देते हैं, परमेश्वर के प्रति गलतफहमियाँ और शिकायतें विकसित कर लेते हैं, यहाँ तक कि आंतरिक रूप से खुद को परमेश्वर से दूर भी कर लेते हैं। यह बहुत तकलीफदेह है। जब उनमें ये नकारात्मक, प्रतिकूल विचार, दृष्टिकोण, योजनाएँ और साजिशें आ जाती हैं तो यह स्पष्ट हो जाता है कि उन्होंने जो जानकारी और टिप्पणियाँ स्वीकार की हैं वे सामान्य मानवता की जरूरतों के अनुरूप नहीं हैं, सत्य की तो बात ही छोड़ दो—यह सौ प्रतिशत निश्चित है कि वे शैतान से आती हैं। धारणाएँ फैलाने वालों के इरादे या उद्देश्य चाहे जो भी हों, वे भ्रांतियाँ और निराधार अफवाहें चाहे जानबूझकर फैलाएँ या अनजाने में, अगर वे कलीसिया में हानिकारक प्रभाव डालते हैं तो उन्हें प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। बेशक, अगर ऐसे लोग कलीसियाई जीवन के बाहर मिलें और उनका भेद पहचाना जाए, तो उन्हें भी तुरंत रोका और प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। अगर कोई ऐसा व्यक्ति जो सत्य समझता है, ऐसी चीजें फैलाने वालों का खंडन और खुलासा करने के लिए परमेश्वर के वचनों या अपनी समझ का इस्तेमाल कर सके जिससे भाई-बहनों को उनका भेद पहचानने में मदद मिले तो यह और भी बेहतर है। यह शैतान के खिलाफ लड़ना है। अगर तुम्हारा आध्यात्मिक कद नहीं है तो तुम्हें उनका भेद पहचानकर उनसे दूर रहना सीखना चाहिए। अगर तुम्हारा आध्यात्मिक कद है तो तुम्हें उन्हें उजागर करना चाहिए। क्या तुम लोगों में ऐसा करने की हिम्मत है? क्या तुम जानते हो कि यह कैसे करना है? इससे सबसे ज्यादा पता चलता है कि व्यक्ति के पास सत्य वास्तविकता है या नहीं। जब कुछ नए विश्वासी ऐसे लोगों द्वारा परमेश्वर के बारे में फैलाई गई धारणाएँ और गलतफहमियाँ सुनते हैं तो उन्हें धक्का लगता है और वे कहते हैं, “परमेश्वर में विश्वास करने वाला व्यक्ति इस तरह कैसे बोल सकता है?” अगर नींव रहित लोग ये धारणाएँ और भ्रांतियाँ सुनेंगे तो क्या वे नकारात्मक और कमजोर हो जाएँगे? क्या वे ये भ्रांतियाँ स्वीकार लेंगे? क्या वे गुमराह होकर कलीसिया छोड़ देंगे? ये सब संभव है। जब कोई धारणाएँ फैलाने वाला व्यक्ति कहता है, “मैं फिर कभी परमेश्वर में विश्वास नहीं करूँगा,” तो चाहे वह ऐसा कहते समय जैसी भी दशा में हो, यह दर्शाता है कि उसने परमेश्वर में पूरी तरह से आस्था खो दी है और वह छद्म-विश्वासी है। चाहे ऐसे शब्द फैलाने के पीछे उसका जो भी उद्देश्य हो, क्या तुम उसे सुनकर कोई शिक्षा प्राप्त कर सकते हो? (नहीं।) जब तुम कमजोर होते हो और ये शब्द सुनते हो तो तुम्हें लग सकता है, “यह व्यक्ति मेरा दर्द साझा करता है; जब यह अपनी धारणाओं के बारे में बात करता है तो ऐसा लगता है कि यह मेरे अपने अंतरतम विचारों को ही स्वर दे रहा है।” लेकिन अगर कोई आस्थावान व्यक्ति ये शब्द सुनता है तो वह सोचेगा, “यह घोर विद्रोही है! ऐसे शब्द कैसे बोले जा सकते हैं? क्या यह परमेश्वर की ईशनिंदा करना नहीं है? मैं ऐसी बातें कहने की हिम्मत नहीं करूँगा, क्योंकि यह परमेश्वर के स्वभाव को ठेस पहुँचाता है!” यह तथ्य कि वे लोग ये धारणाएँ फैला सकते हैं, दर्शाता है कि ये विचार बहुत पहले विकसित हुए थे और पहले ही उनके दिलों में जड़ें जमा चुके हैं। अगर ऐसे विचार अभी बनने शुरू हुए हैं और अभी प्रारंभिक अवस्था में ही हैं और पूरी तरह से धारणाएँ नहीं बने हैं, अगर व्यक्ति उन्हें मौखिक रूप से व्यक्त नहीं करता और उसने दूसरों को गुमराह या बाधित नहीं किया है तो यह दर्शाता है कि उसके पास थोड़ा विवेक है; वह अपनी जबान पर लगाम लगा सकता है और इस तरह बाहर निकाल दिए जाने के परिणाम से बच सकता है। लेकिन अगर वह उन्हें बोलकर कलीसियाई जीवन में विघ्न डालता है तो उसके प्रति और ज्यादा शिष्टाचार नहीं दिखाया जा सकता; उसे उजागर कर बाहर निकाल दिया जाना चाहिए। जो लोग सत्य से प्रेम नहीं करते और सत्य समझने की क्षमता नहीं रखते, वे अक्सर धारणाएँ विकसित करने में प्रवृत्त होते हैं। लेकिन जो लोग अक्सर परमेश्वर के वचन पढ़ते हैं और जिनमें समझने की क्षमता होती है, अगर उनमें धारणाएँ पैदा भी होती हैं तो वे उन्हें हल करने के लिए सत्य खोजेंगे। जो लोग अक्सर धारणाएँ फैलाते हैं, वे परमेश्वर के कार्य से बेनकाब होकर हटा दिए जाते हैं; वे वो लोग हैं जो सत्य से बिल्कुल भी प्रेम नहीं करते और जो सत्य नहीं स्वीकार सकते, वे सब सत्य से विमुख होते हैं और सत्य से घृणा करते हैं। यह सभी संदेहों से परे है।

विभिन्न देशों और स्थानों में कलीसियाई जीवन में धारणाएँ फैलाने की समस्या निश्चित रूप से मौजूद है क्योंकि जो लोग सत्य से प्रेम नहीं करते वे सर्वत्र मौजूद हैं। जो सत्य का अनुसरण नहीं करते, जो सत्य से विमुख हैं, जो दैहिक सुख खोजते हैं, वे लोग और साथ ही छद्म-विश्वासी, बुरे और अन्य लोग चूँकि सत्य का अनुसरण नहीं करते, इसलिए वे हमेशा परमेश्वर के वचनों और देहधारी परमेश्वर के बारे में धारणाएँ रखते हैं। उनके दिल धारणाओं से भरे रहते हैं, परमेश्वर के बारे में कल्पनाओं और उससे की जाने वाली माँगों से भरे रहते हैं और वे परमेश्वर के कहे गए प्रत्येक वचन को शुद्ध रूप से समझ-बूझ नहीं सकते; वे उन्हें सिर्फ अपनी धारणाओं, प्राथमिकताओं, यहाँ तक कि अपने व्यक्तिगत लाभ और हानि के आधार पर समझते हैं। उनके दिल परमेश्वर के प्रति विभिन्न धारणाओं, कल्पनाओं और अनुचित माँगों से और साथ ही परमेश्वर के बारे में विभिन्न गलतफहमियों और आलोचनाओं इत्यादि से भरे रहते हैं। इसलिए इन लोगों का धारणाएँ फैलाना स्वाभाविक है—यह कोई नई बात नहीं है। जब तक ऐसे लोग मौजूद हैं, धारणाओं का फैलना समय-समय पर होता रहेगा और यह किसी भी क्षण हो सकता है। परमेश्वर जो कहता या करता है जब वह उनकी धारणाओं और इच्छाओं के अनुरूप नहीं होता और जब वह उनके हितों को नुकसान पहुँचाता है तो वे गुस्से से भड़क उठते हैं और अपने हितों की खातिर बोलना शुरू कर देते हैं और परमेश्वर और उसके कार्य के साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं। ये लोग हमेशा सत्य और परमेश्वर के विरोध में खड़े होते हैं, परमेश्वर के वचनों, परमेश्वर के स्वभाव और परमेश्वर के कार्य का विश्लेषण और पड़ताल करते हैं। वे लगातार परमेश्वर के वचनों और कार्यों के सही होने की जाँच-पड़ताल करते हैं और यह भी सत्यापित करना चाहते हैं कि परमेश्वर का देहधारी देह परमेश्वर की पहचान और हैसियत के अनुरूप है या नहीं। सत्यापन की अपनी प्रक्रिया के दौरान उन्हें सटीक उत्तर पाना बहुत मुश्किल लगता है; उनकी नजर में परमेश्वर के वचनों का पूरा होना और सच होना और भी ज्यादा मुश्किल है। इसलिए धारणाएँ फैलाते समय उनके पास कहने के लिए बहुत कुछ होता है। चाहे जो भी समय, स्थान या संदर्भ हो, वे अपनी धारणाएँ फैलाते हैं। जब भी वे परमेश्वर से किसी भी तरह से असंतुष्ट महसूस करते हैं, तभी वे अपनी धारणाओं का उपयोग करके चीजें मापते हैं। अगर परमेश्वर के वचन और कार्य उनकी धारणाओं के अनुरूप नहीं होते तो वे जल्दी से अपनी धारणाएँ व्यक्त कर देते हैं। इस तरह धारणाएँ व्यक्त करने को धारणाएँ फैलाना कहते हैं। इसे “धारणाएँ फैलाना” क्यों कहते हैं? क्योंकि वे जो चीजें व्यक्त करते हैं उनका परमेश्वर के चुने हुए लोगों, कलीसियाई जीवन या परमेश्वर के घर के कार्य पर कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता। इसके बजाय वे सिर्फ विघ्न, बाधाएँ उत्पन्न करते हैं और नुकसान पहुँचाते हैं। इसलिए ऐसी टिप्पणियाँ करने को “धारणाएँ फैलाना” कहना सही है।

धारणाएँ फैलाने की समस्या के बारे में कुछ बुनियादी भेद की पहचान हासिल कर लेने के बाद तुम्हें सत्य के आधार पर लोगों की विभिन्न गलत धारणाओं और टिप्पणियों का गहन-विश्लेषण और उनके भेद की पहचान करनी चाहिए और फिर उन्हें परमेश्वर के घर के नियमों के अनुसार सँभालना और हल करना चाहिए। बेशक, ऐसी समस्याएँ हल करने की जिम्मेदारी अगुआओं और कार्यकर्ताओं की है जिससे वे मुँह नहीं मोड़ सकते। साथ ही इस संगति को सुनने के बाद परमेश्वर के सभी चुने हुए लोगों का भी दायित्व और जिम्मेदारी है कि वे धारणाएँ फैलाने वाले लोगों को उजागर कर उनका और उनके शब्दों और व्यवहारों का गहन-विश्लेषण करें। अगर तुममें उन्हें रोकने या प्रतिबंधित करने का साहस नहीं है तो तुम परमेश्वर के वचनों और उस सत्य के आधार पर उनके साथ संगति और बहस कर सकते हो, जो तुम समझते हो। ऐसी बहस का क्या उद्देश्य है? इसका उद्देश्य छोटे आध्यात्मिक कद और सत्य की समझ नहीं रखने वाले लोगों को बहस सुनने के बाद यह समझने में सक्षम बनाना है कि किसके शब्द सत्य के अनुरूप हैं, बजाय इसके कि वे कुछ लोगों द्वारा फैलाई गई धारणाओं और भ्रांतियों से भ्रमित होकर गुमराह हो जाएँ। यह परमेश्वर के चुने हुए लोगों और कलीसियाई जीवन के लिए लाभदायक है। जब यह पता चले कि कोई व्यक्ति ऐसे शब्द बोल रहा है जो सत्य के अनुरूप नहीं हैं—चाहे वे इंसानी धारणाएँ हों या भ्रांतियाँ—तो उन पर बहस होनी चाहिए। ऐसी बहसें लोगों को शिक्षित करती हैं। कम से कम इन बहसों को सुनने के बाद दर्शक स्पष्ट रूप से देख सकते हैं कि धारणाएँ फैलाने वालों के शब्द वास्तव में धारणाएँ हैं और वे समझ सकते हैं कि उन धारणाओं के कौन-से पहलू सत्य के अनुरूप नहीं हैं, उन धारणाओं का सार क्या है, वे सत्य के अनुरूप क्यों नहीं हैं, उन्हें धारणाएँ क्यों कहा जाता है, उन्हें फैलाने वाले लोगों को प्रतिबंधित क्यों किया जाना चाहिए, इत्यादि—वे इन मामलों में सटीक अंतर्दृष्टि प्राप्त करने में सक्षम होते हैं, बजाय इसके कि वे भ्रमित होकर गुमराह हो जाएँ और कोई उनके साथ खिलवाड़ करे। हालाँकि लोगों द्वारा फैलाई गई धारणाएँ परमेश्वर के चुने हुए लोगों के जीवन प्रवेश और कलीसियाई जीवन में कुछ विघ्न उत्पन्न कर सकती हैं और उन्हें नुकसान पहुँचा सकती हैं, लेकिन इन चीजों का अनुभव करना असल में लोगों के लिए बुरी बात नहीं है। कम से कम इससे उनकी भेद पहचानने की क्षमता बढ़ती है, वे देखते हैं कि धारणाएँ फैलाने वालों का असली रंग क्या है, वे देखते हैं कि धारणाएँ फैलाते समय वे क्या स्वभाव प्रकट करते हैं और उनके द्वारा फैलाई गई धारणाओं और सत्य के बीच अंतर क्या है। एक ओर लोग इन टिप्पणियों को समझने में सक्षम होंगे और इनके प्रति प्रतिरोधक क्षमता होगी। दूसरी ओर उन्हें ऐसे लोगों के भेद की कुछ पहचान भी होगी और वे जानेंगे कि छद्म-विश्वासियों द्वारा, उन लोगों द्वारा जिनके पास बिल्कुल भी सत्य नहीं है और जो अक्सर परमेश्वर के बारे में धारणाएँ रखते हैं, किस प्रकार के शब्द बोले जाते हैं और वे जानेंगे कि उन लोगों की आस्था वास्तविक नहीं है—कम से कम लोग भेद पहचानने की ऐसी क्षमता हासिल कर सकते हैं। बेशक, अगर तुमने अभी तक इन समस्याओं का सामना नहीं किया है तो यह कहते हुए अविवेकपूर्ण ढंग से प्रार्थना मत करना, “हे परमेश्वर, कृपा कर मेरे लिए एक परिवेश व्यवस्थित कर दो ताकि मैं देख सकूँ कि ‘लोगों द्वारा फैलाई जाने वाली धारणाओं’ का क्या मतलब है।” धारणाएँ फैलाने को देखना कोई खेल नहीं है और यह तुम्हें आसानी से गुमराह कर सकता है। और जब ये चीजें होती हैं तो तुम्हें उन्हें सही तरीके से सँभालना चाहिए। उन्हें पास से जाने मत दो या उनसे बचो मत; उनका सही तरीके से सामना करो और परमेश्वर द्वारा तुम्हारे लिए व्यवस्थित हर परिवेश को एक गंभीर और सख्त रवैये के साथ लो। सत्य प्राप्त करने के लिए सत्य का अनुसरण करने वाले व्यक्ति का यही रवैया होना चाहिए। धारणाएँ फैलाने वाले किसी व्यक्ति से सामना होने पर तुम्हें परमेश्वर से यह प्रार्थना करना सीखना चाहिए : “हे परमेश्वर, कृपया मेरे साथ रहो, मुझे प्रबुद्ध करो और मेरा मार्गदर्शन करो, ताकि मैं इन शब्दों और ऐसे व्यक्ति के भेद को पहचान सकूँ और मुझे यह पहचानने में भी सक्षम बनाओ कि क्या इन लोगों की धारणाओं में से कोई धारणा मेरे भीतर है।” फिर, प्रार्थना करने के बाद जाओ और इस मामले को अनुभव करो। बेशक, यह वह समय भी होगा जब तुम्हारी इस बात की परीक्षा होगी कि तुम वास्तव में कितना सत्य समझते हो और तुम्हारा आध्यात्मिक कद कितना बड़ा है। जब कोई धारणाएँ फैला रहा हो तो अगर तुम उसे सुनते हो और तुम्हारे मन में कोई आंतरिक प्रतिक्रिया नहीं होती या कोई विचार नहीं आते और इसके बजाय तुम एक रेडियो की तरह होते हो—वे जो भी धारणाएँ व्यक्त करते और फैलाते हैं, उन्हें बिना किसी प्रतिरोध या अस्वीकारने की क्षमता के और इससे भी बढ़कर बिना उनका भेद पहचानने की क्षमता के स्वीकार लेते हो—तो क्या यह बहुत तकलीफदेह नहीं है? कुछ लोग किसी को धारणाएँ व्यक्त करते सुनकर अपने दिल में महसूस करते हैं कि जो कहा जा रहा है वह गलत है और वे उस व्यक्ति के साथ संगति और बहस करना चाहते हैं, लेकिन वे नहीं जानते कि खुद को उचित तरीके से कैसे व्यक्त करें या कैसे उन्हें उस व्यक्ति को उजागर कर उसका गहन-विश्लेषण करना चाहिए। वे इस बात से भी डरते हैं कि अगर वे प्रभावी ढंग से बहस करने में विफल रहे तो उन्हें शर्मिंदा होना पड़ेगा और फिर जब वे अंततः हार जाएँगे तो वे अपना सम्मान खो देंगे और एक अजीब स्थिति में फँस जाएँगे। हालाँकि वे यह सोचते हुए इसे बिना बहस किए छोड़ने के लिए भी तैयार नहीं होते : “मैंने बहुत सारे धर्मोपदेश सुने हैं और काफी कुछ समझता हूँ तो मेरे पास उनका खंडन करने के लिए शब्द क्यों नहीं हैं? मैं परमेश्वर के बारे में कोई धारणा नहीं रखता और मुझे परमेश्वर में सच्ची आस्था है तो अब जबकि उनकी भ्रांतियों का खंडन करने का समय है तो मैं चीजें स्पष्ट रूप से क्यों नहीं समझा सकता?” वे देखते हैं कि धारणाएँ फैलाने वाला व्यक्ति अधिकाधिक बोलता जा रहा है और उसके शब्द अधिकाधिक अपमानजनक और घृणित होते जा रहे हैं, लेकिन वे उसका खंडन या गहन-विश्लेषण नहीं कर पाते और खड़े होकर उसे उजागर करने में असमर्थ रहते हैं, उसे रोकना तो दूर की बात है, जिससे वे अंदर से बेहद व्याकुल और चिंतित महसूस करते हैं। यही क्षण होता है जब उन्हें एहसास होता है कि उनका आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है और वे देखते हैं कि सत्य के बारे में उनकी समझ ने अभी तक एक पूर्ण और सही दृष्टिकोण का आकार नहीं लिया है, वह सिर्फ कुछ खंडित वाक्यांश, प्रकाश और विचारों के बिखरे हुए टुकड़े भर है और सत्य का सच्चा ज्ञान बिल्कुल नहीं है। वे अच्छी तरह से जानते हैं कि यह व्यक्ति धारणाएँ फैला रहा है और लोगों को गुमराह कर रहा है और यह एक छद्म-विश्वासी है और वे उसे उजागर कर उसके विचारों का खंडन करना चाहते हैं, बस उनके पास ऐसा करने के लिए उपयुक्त और सशक्त भाषा नहीं होती। वे सिर्फ इतना कह पाते हैं, “परमेश्वर जो करता है, अच्छा ही करता है; तुम्हें इसे स्वीकारना होगा। परमेश्वर पवित्र और पूर्ण है; वह वैसा बिल्कुल नहीं है जैसा तुम कहते हो। परमेश्वर सभी चीजों पर संप्रभु है और लोग सृजित प्राणी हैं। उन्हें परमेश्वर के प्रति समर्पण करना चाहिए। परमेश्वर के प्रति समर्पण करने से लोग कुछ खोते नहीं हैं।” वे सिर्फ सतही सिद्धांतों को ही स्वर दे सकते हैं जो महत्वपूर्ण बिंदुओं पर बिल्कुल भी प्रहार नहीं करते। इस विशेष घटना का अनुभव करने के बाद उन्हें एहसास होता है कि उनका आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है और वे सोचते हैं, “मैं इतना अक्षम क्यों हूँ? आम तौर पर मैं भव्य धर्म-सिद्धांतों के बारे में बहुत कुछ कह सकता हूँ, बहुत ही वाक्पटुता से बोल सकता हूँ; मैं किसी सभा में बिना किसी समस्या के एक घंटे तक बोल सकता हूँ और बिना किसी परेशानी के तीन से पाँच पृष्ठों का धर्मोपदेश लिख सकता हूँ और इस संबंध में बहुत आत्मविश्वास महसूस करता हूँ। लेकिन जब मेरा सामना किसी ऐसे व्यक्ति से होता है जो इस तरह धारणाएँ फैलाता है, इस तरह परमेश्वर की आलोचना और निंदा करता है तो मैं सतर्क होकर कोई प्रतिक्रिया क्यों नहीं देता? मैं एक सशक्त खुलासा और खंडन क्यों नहीं कर सकता?” इससे उन्हें क्या पता चलता है? क्या इससे उन्हें यह एहसास नहीं होता कि वे सत्य नहीं समझते? यह एहसास एक अच्छी चीज है या बुरी? (यह एक अच्छी चीज है।) अंत में, उन्हें अपना वास्तविक आध्यात्मिक कद पता चलता है। अगर उनका सामना किसी धारणाएँ फैलाने वाले व्यक्ति से नहीं हुआ होता तो शायद उन्हें अभी भी यही लगता कि उनका आध्यात्मिक कद है, वे सत्य समझते हैं, उनमें भेद पहचानने की क्षमता है, वे हर चीज की असलियत जान सकते हैं, विभिन्न आध्यात्मिक धर्म-सिद्धांतों का प्रचार कर सकते हैं और हर सत्य के बारे में बहुत अच्छी जानकारी के साथ थोड़ी-बहुत संगति कर सकते हैं। लेकिन जब उनका सामना किसी धारणाएँ फैलाने वाले व्यक्ति से होता है तो भले ही वे जानते हों कि यह गलत है, फिर भी वे खुद को असहाय पाते हैं, कुछ भी करने में असमर्थ होते हैं और अंततः हार जाते हैं। क्या यह शर्मनाक है? क्या यह गौरव की बात है? (नहीं।) तो, इसका समाधान कैसे किया जाना चाहिए? अगर तुम्हारे पास उससे तर्क-वितर्क करने के लिए सही शब्द नहीं हैं और तुम शर्मिंदगी से बचना भी चाहते हो और शैतान को पूरी तरह से शर्मिंदा करने और हराने के लिए अपनी गवाही में अडिग भी रहना चाहते हो तो तुम्हें क्या करना चाहिए? मैं तुम्हें एक प्रभावी तरीका बताता हूँ : अगर तुम उसे अंतहीन रूप से धारणाएँ फैलाते हुए देखते हो और ज्यादातर लोगों में भेद पहचानने की क्षमता न हो और वे उनसे प्रभावित हो जाते हों, लेकिन तुम उसे बहस में नहीं हरा सकते तो आक्रामक होने का समय आ गया है; मेज पर हाथ पटककर कहो, “चुप करो! तुम किस बारे में बात कर रहे हो? मैं शायद तुम्हें बहस में हरा नहीं पाऊँ, लेकिन मैं जानता हूँ कि तुम छद्म-विश्वासी हो! देखो तो सही तुम क्या कह रहे हो; क्या उसमें एक भी शब्द ऐसा है जो सत्य से मेल खाता हो? तुमने इतने सालों से परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लिया है—क्या तुमने कभी परमेश्वर की प्रशंसा या गवाही का एक शब्द भी बोला है? तुम्हें परमेश्वर से शिकायते हैं; अगर तुममें दम है तो सीधे तीसरे स्वर्ग जाकर परमेश्वर से सीधे बात करो। यहाँ विघ्न उत्पन्न करना बंद करो। मैं अब औपचारिक रूप से तुम्हें आदेश देता हूँ कि दफा हो जाओ!” क्या तुम लोग यह कहने की हिम्मत करोगे? क्या यह उतावला होना है? (नहीं, यह उतावला होना नहीं है।) यह शैतान को एक घोषणा जारी करना है। बस यह करो। उससे कहो, “दफा हो जाओ, छद्म-विश्वासी! तुमने परमेश्वर के इतने अनुग्रह का मुफ्त में आनंद लिया है, बेजमीर अभागे; तुम मनुष्य होने योग्य नहीं हो!” बस तीन शब्द : “दफा हो जाओ!” यह कैसा लगता है? यह सशक्त है, लेकिन इसे लापरवाही से इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। तुम्हें आस्था में नए भाई-बहनों से यह नहीं कहना चाहिए जो अभी सत्य नहीं समझते, लेकिन छद्म-विश्वासियों और शैतान के सेवकों को तुम निर्ममतापूर्वक ऐसे आदेश दे सकते हो : “यह परमेश्वर का घर है, सच्चे भाई-बहनों का घर, उन लोगों का घर जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं। यह दानवों और शैतानों का घर नहीं है। यहाँ दानवों और शैतानों की जरूरत नहीं है। तुम दानव और शैतान हो, इसलिए दफा हो जाओ!” क्या यह उचित है? (हाँ।) यह सबसे अच्छा तरीका नहीं है; यह सिर्फ इसलिए है क्योंकि तुम्हारा आध्यात्मिक कद छोटा है, चूँकि तुम्हारे पास शैतान से लड़ने के लिए पर्याप्त आध्यात्मिक कद नहीं है, इसलिए मैं तुम लोगों को यह तरीका सिखा रहा हूँ। असल में यह आदर्श नहीं है। आदर्श तरीका यह है कि—अगर तुम लोग बहुत-से सत्य समझते हो और परमेश्वर में सच्ची आस्था और उसका वास्तविक ज्ञान रखते हो—तो तुम उसका खंडन करने में सक्षम हो और तुम उसका इतनी अच्छी तरह खंडन करते हो कि वह पूरी तरह से शर्मिंदा हो जाता है और अंततः सभी से कहता है : “मैं अपनी आस्था नहीं रख सकता; मैं शर्मिंदा हूँ कि तुममें से किसी का भी सामना नहीं कर सकता। मैं एक दानव और शैतान हूँ; मैं खुद ही कलीसिया छोड़ दूँगा।” चूँकि अभी तुम लोगों के पास यह क्षमता नहीं है, इसलिए अक्सर धारणाएँ फैलाने वाले लोगों के साथ तुम्हें उस तरीके के अनुसार व्यवहार करना चाहिए जो मैंने तुम्हें सिखाया है।

क्या अब तुम जानते हो कि कलीसिया में अक्सर धारणाएँ फैलाने वालों को कैसे सँभालना है? क्या अब तुम उनका भेद पहचान सकते हो जो लोगों को गुमराह करने के लिए धारणाएँ फैलाते हैं? (हाँ।) धारणाएँ फैलाने वाले भाषणों के मुख्य प्रकार क्या हैं? एक प्रकार परमेश्वर के वचनों को लक्षित करता है, दूसरा परमेश्वर के कार्य को लक्षित करता है और तीसरा परमेश्वर के स्वभाव और सार को लक्षित करता है। इस प्रकार के भाषण हलके-फुलके—कल्पनाओं और परमेश्वर की गलत व्याख्याओं—से लेकर गंभीर तक होते हैं, जैसे परमेश्वर की आलोचना, निंदा और ईशनिंदा करना। इनके अलावा लोगों की नकारात्मक और प्रतिरोधी टिप्पणियाँ भी होती हैं—जिनमें परमेश्वर के प्रति उनकी शिकायतें, अवज्ञा और असंतोष जैसी चीजें व्यक्त होती हैं। संक्षेप में, धारणाएँ फैलाने वाले शब्द परमेश्वर की अवहेलना, आलोचना, निंदा और ईशनिंदा करने की प्रकृति के होते हैं और उनके ये नतीजे होते हैं कि लोग परमेश्वर के प्रति शंकालु और सतर्क हो जाते हैं, उसे गलत समझते हैं और उससे दूर हो जाते हैं, यहाँ तक कि उसे अस्वीकार भी कर देते हैं। इनका भेद पहचानना आसान होना चाहिए।

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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