अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (21) खंड चार
IV. मसीह-विरोधियों द्वारा गुमराह किए गए लोगों की परवाह नहीं करना या उनकी खैरियत नहीं पूछना
नकली अगुआओं की एक और ऐसी अभिव्यक्ति है जो और भी ज्यादा क्रोध दिलाने वाली है। कुछ नकली अगुआ अपनी बातचीत के दौरान कुछ हद तक मसीह-विरोधियों का भेद पहचान सकते हैं लेकिन फौरन उनसे निपटने में असफल रहते हैं। वे मसीह-विरोधियों के विभिन्न व्यवहारों के जरिए फौरन उनके बुरे कर्मों और सार को उजागर करने और उसका गहन-विश्लेषण करने में भी असफल रहते हैं, जिससे भाई-बहनों को मसीह-विरोधियों का भेद पहचानने और उन्हें अस्वीकार करने में सक्षम बनाया जा सके। इसे पहले ही अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियों को पूरा न करना माना जाता है। जब कुछ भाई-बहन मसीह-विरोधियों से गुमराह होते हैं और उनका अनुसरण करने लगते हैं, तो ये नकली अगुआ उदासीन रहते हैं, मानो इसका उनसे कोई लेना-देना ही नहीं है। इसके अलावा, उन्हें अपने दिल में कोई आत्म-ग्लानि या आत्म-दोष महसूस नहीं होता। उन्हें ऐसा महसूस नहीं होता कि उन्होंने परमेश्वर या भाई-बहनों को निराश किया है। इसके बजाय वे अक्सर यह “आदर्श” पंक्ति कहते हैं : “इन लोगों को मसीह-विरोधियों ने गुमराह किया था। वे इसी के लायक थे! यह उनकी गलती है कि उनमें समझ नहीं है। अगर वे मसीह-विरोधियों का अनुसरण नहीं भी करते, तो भी परमेश्वर के घर द्वारा उन्हें बाहर निकाला जाना तय था।” मसीह-विरोधियों द्वारा भाई-बहनों को गुमराह किए जाने के बाद न केवल इन नकली अगुआओं को आत्म-ग्लानि या अपराध-बोध नहीं होता, बल्कि इससे भी बढ़कर वे चिंतन-मनन या पश्चात्ताप तक नहीं करते। इसके बजाय, वे ऐसी अमानवीय बातें कहते हैं और दावा करते हैं कि ये भाई-बहन मसीह-विरोधियों द्वारा गुमराह होने लायक ही थे। इन शब्दों से क्या स्पष्ट होता है? क्या ऐसे लोगों में मानवता होती है? (नहीं।) उनमें मानवता का अभाव होना निश्चित है। तो वे ऐसी बातें क्यों कहते हैं? (अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए।) सबसे पहले, यह जिम्मेदारी से बचने, लोगों को गुमराह करने और सुन्न करने के लिए है। उनका मानना है : “उन लोगों को मसीह-विरोधियों ने गुमराह किया था क्योंकि उनमें समझ की कमी थी, जिसका मुझसे कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने सत्य का अनुसरण नहीं किया, इसलिए वे गुमराह होने के ही लायक थे!” “लायक थे” का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि इन लोगों को मसीह-विरोधियों द्वारा गुमराह और नियंत्रित किया जाना चाहिए, और मसीह-विरोधियों द्वारा गंभीर रूप से नुकसान पहुँचाया जाना चाहिए—मसीह-विरोधी उनके साथ जो भी व्यवहार करते हैं, वे उसी के लायक हैं; वे मसीह-विरोधियों का अनुसरण करने के ही लायक हैं। इसका निहितार्थ यह है कि इन लोगों को परमेश्वर का नहीं बल्कि मसीह-विरोधियों का अनुसरण करना चाहिए, परमेश्वर का अनुसरण करना उनके लिए एक गलती थी, परमेश्वर का उन्हें चुनना भी एक गलती थी; यहाँ तक कि परमेश्वर के घर में आने के बाद भी, मसीह-विरोधियों द्वारा उन्हें बहकाया जाना अपरिहार्य था। क्या नकली अगुआ यही बात नहीं समझाना चाहते हैं? वे न केवल भाई-बहनों की बदनामी करते हैं, बल्कि परमेश्वर का तिरस्कार भी करते हैं। क्या ऐसे लोग घृणास्पद नहीं हैं? (हाँ।) वे अत्यधिक घृणास्पद हैं! अपनी जिम्मेदारी से बचने और इस तथ्य और सत्य को छिपाने के अलावा कि उन्होंने भाई-बहनों को नहीं बचाया, उन्होंने यह कहते हुए उन पर हमला भी किया कि ये लोग मसीह-विरोधियों द्वारा गुमराह होने के लायक ही थे और परमेश्वर में विश्वास करने और उसके उद्धार को प्राप्त करने के अयोग्य थे। यह एक कथन उनके घिनौने चरित्र को बेनकाब करता है! भले ही वे मसीह-विरोधियों की तरह भाई-बहनों को सीधे तौर पर बाधित या गुमराह नहीं करते थे या दबाते नहीं थे, लेकिन भाई-बहनों के प्रति, परमेश्वर के आदेश और परमेश्वर के घर द्वारा सौंपे गए झुंड के प्रति उनका रवैया दर्शाता है कि वे वास्तव में कितने कठोर और निर्मम हैं! परमेश्वर के कार्य को स्वीकारने वाला कोई भी व्यक्ति इसे इतनी आसानी से नहीं करता; इसमें सुसमाचार का प्रचार करने वालों का बलिदान और सहयोग शामिल होता है। इसमें बहुत अधिक जनबल और संसाधन लगते हैं, और सबसे बढ़कर, इसमें परमेश्वर के हृदय का रक्त समाहित होता है। यह परमेश्वर ही है जो लोगों को अपने सामने लाने के लिए विभिन्न लोगों, घटनाओं, चीजों और परिवेशों की व्यवस्था करता है। नकली अगुआ इसमें से किसी पर भी कोई ध्यान नहीं देते। मसीह-विरोधियों द्वारा गुमराह किए गए किसी भी व्यक्ति के बारे में, वे एक ही वाक्य में बात खत्म कर देते हैं : “वे इसी के लायक थे!” ऐसा कहते हुए, वे इसमें शामिल सभी लोगों की मेहनत और परमेश्वर के हृदय के रक्त को बेकार करके शून्य कर देते हैं। “वे इसी के लायक थे” का क्या मतलब है? इसका मतलब है : “तुम्हें उनके सामने सुसमाचार प्रचार करने के लिए किसने कहा? वे परमेश्वर में विश्वास करने के अयोग्य हैं। उनके सामने सुसमाचार प्रचार करना एक गलती थी। उन्हें मसीह-विरोधियों का अनुसरण करने के लिए किसने कहा था? भले ही मैंने कोई वास्तविक काम नहीं किया, लेकिन मैंने उन्हें मसीह-विरोधियों का अनुसरण करने के लिए भी मजबूर नहीं किया। यह उनकी ही जिद थी; वे मसीह-विरोधियों का अनुसरण करने के लायक थे!” ऐसे व्यक्ति में किस प्रकार की मानवता होती है? क्या उसमें तनिक भी दिल है? वह रखवाली करने वाले कुत्ते से भी बदतर निर्दयी जानवर है और फिर भी वह एक अगुआ है? वह इसके लायक नहीं है! तुम लोगों में भेद पहचानने की क्षमता होनी चाहिए : ऐसे लोगों को देखकर, जिनमें जमीर और विवेक की कमी है और जो इतने निर्मम हैं, उन्हें अगुआ के रूप में चुनना नहीं चाहिए। भ्रमित मत हो! वे न केवल मसीह-विरोधियों द्वारा गुमराह हुए लोगों को वापस लाने और नुकसान की भरपाई करने के लिए हर संभव प्रयास करने में असफल रहते हैं, बल्कि वे ऐसी निर्दयी बातें भी कहते हैं—वे कितने दुष्ट हैं! इस प्रकार के व्यक्ति की समस्या की प्रकृति सामान्य नकली अगुआ से कहीं अधिक गंभीर है। भले ही उन्हें मसीह-विरोधी नहीं कहा जा सकता, उनकी अभिव्यक्तियों के आधार पर यह स्पष्ट है कि उनमें कोई मानवता नहीं है और वे अगुआ या कार्यकर्ता बनने के योग्य नहीं हैं। वे केवल एक कुरूप, कृतघ्न गद्दार हैं! उन्हें यह भी नहीं पता कि परमेश्वर का आदेश क्या है और न ही इस बात का कोई बोध है कि उन्हें क्या कार्य करना चाहिए। वे इसे जमीर और विवेक के साथ नहीं करते; वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों के अगुआ बनने के योग्य नहीं हैं और न ही परमेश्वर का आदेश स्वीकारने के योग्य हैं। विशेष रूप से, नकली अगुआओं में परमेश्वर के चुने हुए लोगों के प्रति कोई प्रेम नहीं होता। जब भाई-बहन गुमराह हो जाते हैं, तो उनकी स्थिति खराब होने पर किसी भी प्रकार की सहानुभूति दिखाए बिना यह कहते हुए उन्हें लात भी मार देते हैं, “वे इसी के लायक थे।” ऐसा व्यक्ति जब किसी को कठिनाइयों या विपत्ति में देखता है, तो उसकी मदद करने के बजाय उसकी स्थिति खराब होने पर उसे लात मारने का काम करेगा। उसका जमीर कोई आत्म-ग्लानि महसूस नहीं करेगा और वह हमेशा की तरह अगुआ बना रहेगा। क्या यह बेशर्मी नहीं है? (हाँ।) भाई-बहनों की तो बात ही छोड़ दो, अगर दानव किसी अच्छे अविश्वासी को भी गंभीर रूप से नुकसान पहुँचाते हैं, तो परमेश्वर में विश्वास रखने वाले और एक सृजित प्राणी के रूप में, सामान्य मानवता वाला कोई भी व्यक्ति सहानुभूति महसूस करेगा; और अगर वही भाई-बहन हों—जो ईमानदारी से परमेश्वर में विश्वास रखते हैं—जिन्हें मसीह-विरोधियों द्वारा गुमराह किया और नुकसान पहुँचाया गया है, तो उनके दिल को और भी अधिक पीड़ा होनी चाहिए। जब मसीह-विरोधी बुराई करते हैं और परमेश्वर के चुने हुए लोगों को नुकसान पहुँचाते हैं, उस दौरान ये नकली अगुआ कोई वास्तविक कार्य नहीं करते। वे न तो मसीह-विरोधियों के बुरे कर्मों और सार को उजागर करते हैं, और न ही उनका गहन-विश्लेषण करते हैं। उनमें भाई-बहनों को मसीह-विरोधियों की समझ प्राप्त करने देने और दिल से उन्हें अस्वीकार करने में उनकी मदद करने को लेकर दायित्व की कोई भावना तो बिल्कुल नहीं होती। इस मामले में उन्हें कोई जिम्मेदारी महसूस नहीं होती। यहाँ तक कि जब मसीह-विरोधी कुछ लोगों को गुमराह करते हैं, तो वे केवल भाव-शून्य और निर्मम टिप्पणी करते हैं, “वे इसी के लायक थे।” यह वास्तव में क्रोध दिलाने वाला है! अपनी जिम्मेदारी से बचने, खुद को सुरक्षित रखने, अधिक लोगों को गुमराह और सुन्न करने और परमेश्वर द्वारा दोषी ठहराए जाने से बचने के लिए, वे ऐसी अमानवीय बातें कहते हैं। क्या यह घृणास्पद नहीं है? (हाँ।) तुम चाहे कुछ भी कहो, तुमने अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी नहीं कीं और न ही अपना कार्य सही ढंग से किया—ये नकली अगुआ की अभिव्यक्तियाँ हैं; तुम चाहे जितना भी प्रयास करो, इन बातों से इनकार नहीं कर सकते। तुम नकली अगुआ हो।
कुछ नकली अगुआ मसीह-विरोधियों द्वारा कुछ भाई-बहनों के गुमराह होने के बाद यह कहते हुए न केवल बेरहम, निर्मम और गैर-जिम्मेदाराना तरीके से व्यवहार करते हैं कि ये लोग गुमराह होने के ही लायक थे, बल्कि जब परमेश्वर के घर की कार्य व्यवस्थाओं के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वे उन लोगों को बचाने के लिए अपनी जिम्मेदारी पूरी करें जिनमें अपेक्षाकृत अच्छी मानवता है और उनमें से कुछ लोगों को यथासंभव काफी हद तक बचाए जाने की आशा है, तब भी ये नकली अगुआ कोई वास्तविक कार्य नहीं करते हैं। यहाँ तक कि जब कुछ लोग कलीसिया में लौटने का अनुरोध करते हैं, तो भी वे उदासीन और लापरवाह बने रहते हैं, लोगों के जीवन को सबसे अनमोल चीज के रूप में नहीं देखते जिसे सँजोना चाहिए। वे काफी हद तक गुमराह हुए भाई-बहनों को यथासंभव बचाने में असफल रहते हैं। वे इस जिम्मेदारी को पूरा नहीं कर सकते और इसे पूरा करने का कोई प्रयास नहीं करते। भले ही परमेश्वर के घर की कार्य व्यवस्थाएँ बार-बार यह कार्य अच्छी तरह से करने की माँग करती हैं, फिर भी नकली अगुआ निष्क्रिय रहते हैं, कोई कार्रवाई नहीं करते और कोई काम नहीं करते। परिणामस्वरूप, मसीह-विरोधियों द्वारा गुमराह हुए और अलग-थलग कर दिए गए या बाहर निकाल दिए गए कुछ लोग अभी भी परमेश्वर के घर में वापस नहीं लौट सके हैं और उन्होंने सामान्य कलीसियाई जीवन फिर से शुरू नहीं किया है। बेशक, कुछ लोग विभिन्न पहलुओं में परमेश्वर के घर द्वारा बचाए जाने की शर्तों को पूरा नहीं करते हैं, लेकिन अन्य लोग हैं जिन्हें बचाया जा सकता है। यदि उन्हें प्रेमपूर्ण मदद और धैर्यपूर्वक समर्थन दिया जाए, तो वे सत्य समझ सकते हैं, मसीह-विरोधियों का भेद पहचान सकते हैं और उन्हें अस्वीकार कर सकते हैं, जिससे उन्हें बचाया जा सकता है। हालाँकि, क्योंकि अगुआ और कार्यकर्ता वास्तविक कार्य नहीं करते, परमेश्वर के घर की कार्य व्यवस्थाओं को लागू नहीं करते और इन लोगों के जीवन को महत्वपूर्ण नहीं मानते, इस वजह से कुछ लोग अब भी बाहर भटक रहे हैं। ये अगुआ और कार्यकर्ता परमेश्वर के घर की कार्य व्यवस्थाओं को विभिन्न बहानों का सहारा लेकर नजरअंदाज करते हैं। वे उन भाई-बहनों को भी अनदेखा कर देते हैं जो कलीसिया में लौटना चाहते हैं और कलीसिया की स्वीकार्यता की शर्तों को पूरा करते हैं। वे यह कहते हुए तरह-तरह के बहाने बनाते हैं कि ये लोग खराब मानवता वाले हैं, सुरक्षा के लिए जोखिम पैदा करते हैं, सजने-संवरने के शौकीन हैं, दैहिक सुखों का आनंद लेते हैं, रुतबे से लगाव रखते हैं, इत्यादि। इन गढ़े हुए बहानों और तर्कों का उपयोग करके वे उन्हें कलीसिया में लौटने से मना कर देते हैं। ये लोग मसीह-विरोधियों द्वारा गुमराह और नियंत्रित किए गए हैं, लेकिन उनका खो जाना नकली अगुआओं के लिए कोई चिंता की बात नहीं है। उनमें न तो कोई जिम्मेदारी का भाव है और न ही कोई जमीर। हो सकता है कि वे सोचते हों कि इन लोगों को वापस लाना मुश्किल या खतरनाक है, या हो सकता है कि वे मन-ही-मन इसे करने के लिए अनिच्छुक या असहमत हों। किसी भी स्थिति में, विभिन्न कारणों से, वे परमेश्वर के घर की उपरोक्त कार्य व्यवस्था को बिल्कुल भी लागू नहीं करते। ये ऐसे नकली अगुआओं की अभिव्यक्तियाँ हैं। वे न केवल परमेश्वर या परमेश्वर के घर द्वारा सौंपे गए किसी भी कार्य में सक्रिय रूप से सहयोग करने और अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने में असफल रहते हैं, बल्कि जब कोई उनके द्वारा की गई जिम्मेदारी की उपेक्षा को उजागर करता है, तो वे अपना बचाव करने, अपनी जिम्मेदारी से बचने और अपनी उपेक्षा की सच्चाई को छिपाने के लिए खुद को सही ठहराने वाले बहाने बनाने लगते हैं। क्या ऐसे नकली अगुआ और भी अधिक घृणास्पद नहीं हैं? (हाँ।) सारांश रूप में, ये नकली अगुआ भी मसीह-विरोधियों द्वारा परमेश्वर के चुने हुए लोगों को गंभीर रूप से नुकसान पहुँचाने से निपटने में लापरवाह रहते हैं और कोई वास्तविक कार्य नहीं करते। वे परमेश्वर के घर द्वारा अपेक्षित इस कार्य की हर बारीकी को अनदेखा करते हैं। वे न तो कष्ट सहने को इच्छुक होते हैं और न ही कोई कीमत चुकाने को। इसके बजाय, वे केवल अपनी मनमर्जी से और इच्छानुसार काम करना पसंद करते हैं—मन हुआ तो थोड़ा कर लिया और अगर मन नहीं हुआ तो बिल्कुल भी कुछ नहीं करते। वे परमेश्वर के घर की कार्य व्यवस्थाओं की पूरी तरह से अनदेखी करते हैं। वे परमेश्वर के घर द्वारा सौंपी गई जिम्मेदारियों और कर्तव्यों की उपेक्षा करते हैं और विशेष रूप से, परमेश्वर के इरादों और अपेक्षाओं की भी उपेक्षा करते हैं। ऐसे लोगों में न तो मानवता होती है और न ही कोई जमीर; वे चलती-फिरती लाशें हैं। क्या तुम लोग परमेश्वर में विश्वास करते हुए उद्धार का अनुसरण करने के अपने जीवन के इस महत्वपूर्ण विषय को ऐसे लोगों को सौंपने की हिम्मत करोगे जिनमें मानवता नहीं है? (नहीं।) भले ही वे तुम्हें मसीह-विरोधियों के हवाले न करें, लेकिन जब मसीह-विरोधी परमेश्वर के चुने हुए लोगों को गुमराह करते हैं और गंभीर रूप से नुकसान पहुँचाते हैं, तो क्या वे मसीह-विरोधियों के खिलाफ पूरी ताकत से लड़ेंगे? नहीं, वे ऐसा नहीं करेंगे, क्योंकि ऐसे लोग निर्दयी जानवर हैं, जिनमें जिम्मेदारी का कोई भाव नहीं होता। वे केवल अपने फायदे के लिए अगुआ के रूप में सेवा करते हैं।
कभी-कभी नकली अगुआ भाई-बहनों के लिए चिंता जाहिर करते हैं; वे उनसे पूछते हैं कि क्या उन्हें किसी चीज की जरूरत है, उनका खाना-पीना और आवास कैसा है, इत्यादि। वे रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी बातों को लेकर काफी सजग रहते हैं, लेकिन जब बात परमेश्वर के आदेश, भाई-बहनों के जीवन-मरण और सत्य सिद्धांतों की आती है, तो चाहे कोई भी उनसे पूछे, वे उदासीन रहते हैं और कुछ नहीं करते। वे केवल लोगों के दैहिक आनंद, भोजन, वस्त्र, आश्रय, परिवहन या भौतिक लाभों के बारे में ही चिंता करते हैं और इन्हीं मामलों को निपटाते हैं। कुछ लोग कहते हैं, “तुम्हारे शब्दों में विरोधाभास है। क्या तुमने नहीं कहा कि वे लोग निर्दयी हैं? क्या कोई निर्दयी व्यक्ति दूसरों की खातिर ये सब करने के लिए तैयार होगा?” क्या कोई निर्दयी व्यक्ति हर किसी के लिए इतना दयालु होगा? (नहीं।) वास्तव में, कुछ निर्दयी लोग वाकई ये काम कर सकते हैं और इसके दो कारण हैं। पहला, जब वे सबके लिए कुछ कर रहे होते हैं, तो वे अपने लिए भी कुछ कर रहे होते हैं और इसका फायदा उठाते हैं। यदि उन्हें कुछ फायदा नहीं मिल रहा हो, तब देखना, क्या वे फिर भी ये काम करेंगे—वे तुरंत अपना रवैया बदल देंगे और रुक जाएँगे। इसके अलावा, वे इन कार्यों को करने के लिए किसके पैसों का इस्तेमाल कर रहे हैं और सबके लिए लाभ प्राप्त कर रहे हैं? यह परमेश्वर का घर है जो इसका खर्च उठाता है। परमेश्वर के घर के संसाधनों के प्रति उदारता दिखाना इन लोगों की विशेषता है। जब उन्हें व्यक्तिगत लाभ प्राप्त होते हैं, तो वे ये काम कैसे नहीं करेंगे? जब वे सबके लिए लाभ हासिल कर रहे होते हैं, तो असल में वे अपने लिए ही कुछ कर रहे होते हैं। वे इतने दयालु नहीं हैं कि सिर्फ दूसरों की खातिर ही लाभ हासिल करें! यदि वे वास्तव में सभी के लिए लाभ चाहते, तो उनमें कोई स्वार्थी मंशाएँ नहीं होनी चाहिए थीं और उन्हें परमेश्वर के घर के सिद्धांतों के अनुसार काम करना चाहिए था। लेकिन, इसके बजाय वे हमेशा अपने लिए ही लाभ ढूँढ़ रहे होते हैं और परमेश्वर के चुने हुए लोगों के जीवन प्रवेश के बारे में वे कोई विचार नहीं करते। इसके अलावा, वे हर किसी के लिए काम करते हैं ताकि लोग उन्हें महत्व दें और कहें, “यह व्यक्ति हमारा लाभ चाहता है और हमारे हितों की रक्षा करने की कोशिश करता है। अगर हमें किसी चीज की कमी हो, तो हमें उनसे इसका ख्याल रखने के लिए कहना चाहिए। उनके आसपास रहने से, हमें कोई भी बुरा व्यवहार नहीं सहना पड़ेगा।” वे ये सब करते हैं ताकि हर कोई उनका धन्यवाद करे। इस तरह से काम करके, वे शोहरत और लाभ दोनों प्राप्त करते हैं, तो वे ये काम क्यों नहीं करेंगे? अगर वे सभी के लिए लाभ चाहते, लेकिन कोई नहीं जानता कि यह उनका काम था, सभी परमेश्वर का धन्यवाद करते, कोई भी उनके प्रति आभार व्यक्त नहीं करता, तो क्या वे फिर भी ये काम करते? वे बिल्कुल भी ऐसा करने की मनःस्थिति में नहीं होंगे; उनका असली रूप उजागर हो जाएगा। जब इस तरह के लोग कुछ करते हैं, तो उनका प्रकृति सार पूरी तरह से उजागर हो जाता है। इसलिए, जब मसीह-विरोधी कलीसिया को बाधित करते हैं, तो ये लोग कभी भी परमेश्वर के चुने हुए लोगों को बचाने के लिए कोई वास्तविक काम नहीं करेंगे।
अभी हमने इस विषय पर संगति की कि जब मसीह-विरोधी परमेश्वर के चुने हुए लोगों को गुमराह करते हैं, नियंत्रित करते हैं और नुकसान पहुँचाते हैं, तब भी नकली अगुआ इसे नजरअंदाज कर देते हैं। वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों को बचाने के लिए कोई उपाय नहीं सोचते, न ही वे अपने दायित्वों और जिम्मेदारियों को पूरा करते हैं। वे केवल अपनी भावनाओं, मनोदशा और हितों के बारे में सोचते हैं। वे अपनी जिम्मेदारियाँ नहीं निभाते और न ही अपने आप को जवाबदेह ठहराते हैं; इसके बजाय, वे अपनी जिम्मेदारियों से भागते हैं और उन्हें टालते हैं। जब मसीह-विरोधी परमेश्वर के चुने हुए लोगों को गुमराह और नियंत्रित करते हैं, तो वे यह कहते हुए उनकी आलोचना करते हैं कि वे ईमानदारी से परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते, ताकि वे अपने जमीर की किसी कचोट के बिना अपनी जिम्मेदारी से बच सकें। ये नकली अगुआ सबसे घृणित हैं। हमने नकली अगुआओं की जिन विभिन्न अभिव्यक्तियों पर चर्चा की है, वे सभी काफी घिनौनी हैं, लेकिन इस अंतिम प्रकार के व्यक्ति में तो मानवता बिल्कुल भी नहीं होती है। इस प्रकार का व्यक्ति एक निर्दयी जानवर है, इंसान की खाल में जंगली जानवर है; इसे मानवजाति का हिस्सा नहीं माना जा सकता, बल्कि इसे जंगली जानवरों के समूह में रखा जाना चाहिए। वे अपनी जिम्मेदारियाँ क्यों नहीं निभाते? क्योंकि उनके पास मानवता नहीं है, उनके पास जमीर या विवेक नहीं है। जिम्मेदारियाँ, दायित्व, प्रेम, धैर्य, करुणा, भाई-बहनों की रक्षा करना—इनमें से कुछ भी उनके दिल में नहीं है; इनमें से कोई भी गुण उनके पास नहीं है। उनकी मानवता में इन गुणों का न होना, मानवता का नहीं होना ही है। यही नकली अगुआओं के चौथे प्रकार की अभिव्यक्तियाँ हैं।
यह नकली अगुआओं की कमोबेश चार प्रकार की अभिव्यक्तियाँ हैं जिन्हें अगुआओं और कार्यकर्ताओं की तेरहवीं जिम्मेदारी के तहत उजागर करना आवश्यक है। बेशक, कुछ अन्य समान अभिव्यक्तियाँ भी हैं, लेकिन ये चार प्रकार की अभिव्यक्तियाँ इस कार्य को करने और साथ ही उनके मानवता सार में नकली अगुआओं की विभिन्न अभिव्यक्तियों का पहले ही मूल रूप से प्रतिनिधित्व करती हैं। चाहे हम इनकी अभिव्यक्तियों को कितनी भी श्रेणियों में बाँट लें, नकली अगुआओं की दो प्रमुख अभिव्यक्तियाँ, किसी भी स्थिति में, इन चार श्रेणियों के भीतर पाई जाती हैं : एक है वास्तविक कार्य नहीं करना और दूसरी है वास्तविक कार्य करने में असमर्थ होना। ये नकली अगुआओं की दो सबसे प्रमुख अभिव्यक्तियाँ हैं। चाहे नकली अगुआओं की मानवता और काबिलियत कैसी भी हो और चाहे वे सत्य के साथ कैसा भी व्यवहार करें, किसी भी स्थिति में, ये दोनों अभिव्यक्तियाँ इन चार श्रेणियों के भीतर सन्निहित हैं। यह अगुआओं और कार्यकर्ताओं की तेरहवीं जिम्मेदारी के संबंध में आज की हमारी संगति में नकली अगुआओं को उजागर करने की विषय-वस्तु का समापन है।
परिशिष्ट : सवालों के जवाब
क्या तुम लोगों के कोई सवाल हैं? (परमेश्वर, मुझे एक सवाल पूछना है। सभा की शुरुआत में, परमेश्वर ने हमसे पूछा था कि मसीह-विरोधियों के स्वभाव वाले लोगों और वास्तविक मसीह-विरोधियों में क्या अंतर है और मसीह-विरोधियों के स्वभाव की सामान्य विशेषताएँ क्या हैं। उस समय, हमें कोई स्पष्ट जवाब समझ नहीं आया और थोड़ी देर चिंतन-मनन करने के बाद, हम केवल कुछ बहुत साधारण शब्दों और धर्म-सिद्धांतों को ही समझ सके। परमेश्वर एक साल से भी अधिक समय से मसीह-विरोधियों को उजागर करने वाले सत्य की संगति कर रहा है, लेकिन हम अभी तक उस सत्य का बहुत छोटा-सा हिस्सा ही समझने और अभ्यास करने में समर्थ हुए हैं। इसका एक कारण यह है कि हमने इन सत्यों पर पर्याप्त कोशिश नहीं की और दूसरा कारण यह है कि हमने अपेक्षाकृत बहुत कम मसीह-विरोधियों का सामना किया है, और हम इस सत्य को यह देखकर नहीं समझ पाए हैं कि यह वास्तविक स्थितियों से कैसे जुड़ता है। इसलिए, अब भी हम इन सत्यों में कोई विशेष प्रवेश नहीं कर पाए हैं, हमें मसीह-विरोधियों की ज्यादा समझ नहीं है और हमारे अंदर मसीह-विरोधियों के स्वभाव की कई अभिव्यक्तियाँ हैं जिन्हें हम अभी तक पहचान नहीं पाए हैं। मैं यह पूछना चाहता हूँ कि इस समस्या को कैसे हल किया जाए।) सत्य के किसी भी पहलू के लिए, तुम्हें कुछ वास्तविक अनुभव और अनुभवजन्य ज्ञान होना चाहिए और एक सच्ची समझ प्राप्त होनी चाहिए, ताकि सत्य वचन तुम्हारे दिल में अंकित हो जाएँ। सत्य को प्राप्त करने की प्रक्रिया हमेशा ऐसी ही होती है। वे बातें जिन्हें तुम याद रख सकते हो, वही हैं जिन्हें तुमने अपने अनुभवों के जरिए प्राप्त किया है; उनकी छाप सबसे गहरी होती है। इसलिए, आज जब हम मसीह-विरोधियों के विषय पर संगति कर रहे थे, तो मैंने तुम लोगों को पहले इस विषय-वस्तु की समीक्षा करने के लिए कहा। तुम लोग इसमें से कुछ याद कर पाए। जो तुम लोग याद कर पाए, उनमें से कुछ तुम्हारे लिए सैद्धांतिक है, लेकिन स्वाभाविक रूप से मसीह-विरोधियों की कुछ अभिव्यक्तियाँ हैं जिन्हें तुम कमोबेश वास्तविक जीवन से जोड़ सकते हो—हर किसी को इसे इसी तरह से अनुभव करना होता है। लोगों के लिए सामान्य स्थिति यह है कि लोग जब धर्मोपदेश सुनते हैं तो वे चाहे इसे जितनी अच्छी तरह से समझने का प्रयास करें, वे केवल सैद्धांतिक और धर्म-सिद्धांतों के हिसाब से समझते हैं, उन्हें सत्य का ज्ञान नहीं होता। सत्य को कब समझा जा सकता है? ऐसा केवल तभी होता है जब किसी ने इन चीजों का अनुभव किया हो तभी उसे कुछ व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त हो सकता है। वास्तविक परिस्थितियों का अनुभव किए बिना कोई भी ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता। इसलिए, आज जब हम मसीह-विरोधियों के विषय पर संगति कर रहे थे, तो यह जरूरी था कि एक त्वरित समीक्षा की जाए और तुम्हें सीधे स्मरण कराया जाए। इसके बाद, चाहे हम अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियों या नकली अगुआओं की विभिन्न अभिव्यक्तियों के बारे में संगति करें या नहीं, कम से कम यह तुम लोगों के लिए ज्यादा थोथला नहीं होगा—बस इतना ही। हालाँकि, तुम लोगों को अभी भी मसीह-विरोधियों की विभिन्न अभिव्यक्तियों से परिचित होना जरूरी है। कुछ लोग कहते हैं, “अगर परमेश्वर कुछ वास्तविक लोगों, घटनाओं और चीजों की व्यवस्था नहीं करता, तो हम कहाँ से परिचित हो सकते हैं? हम खुद तो मसीह-विरोधियों को ढूँढ़ नहीं सकते, क्या हम कर सकते हैं?” तुम्हें उनको ढूँढ़ने की जरूरत नहीं है। सबसे सरल समाधान यह है कि जब तुम मसीह-विरोधियों का सामना करो, तो तुम उन्हें परमेश्वर के वचनों से मिलाने की पूरी कोशिश करो। उनके बाहरी खुलासों, बयानों, क्रियाकलापों, स्वभावों, साथ ही उनके विचारों और दृष्टिकोणों, यहाँ तक कि उनके आचरण और दुनिया से निपटने के तरीके, उनकी जीवनशैली, आदि का मिलान करो—यानी, उन्हें मसीह-विरोधियों की उन पंद्रह अभिव्यक्तियों से मिलाओ जिनके बारे में हमने चर्चा की है। जितना हो सके तुम उनका मिलान कर सकते हो। यही है लोगों की समझ का तरीका : वे याददाश्त से बहुत कुछ नहीं याद रख सकते क्योंकि मानव की याददाश्त सीमित होती है। लोग उन चीजों के बारे में पूरे ढंग से बात कर सकते हैं जो उन्होंने प्रत्यक्ष अनुभव से प्राप्त की हैं। चाहे वे जितना भी कहें, यह याददाश्त पर आधारित नहीं होता है बल्कि उनके अनुभवों और जो उन्होंने सहा है, उस पर आधारित होता है। ये जो चीजें उन्होंने प्राप्त की हैं, वे सत्य और तथ्यात्मक रूप से सही चीजों के सबसे करीब हैं—ये वो चीजें हैं जो लोगों ने अनुभव से प्राप्त की हैं। इसके अलावा, जो चीजें मानव धारणाओं और कल्पनाओं के अनुरूप हैं और जो ज्ञान आधारित हैं, वे सत्य से मेल नहीं खातीं, चाहे तुम्हारे मन में प्रवेश करने के बाद कितने ही सालों से वे प्रमुख स्थान पर बैठी हों। जब तुम वास्तव में सत्य को समझते हो, तो ये चीजें हटा दी जाएँगी और मिटा दी जाएँगी। हालाँकि, जो चीजें सत्य के करीब हैं और सत्य के अनुरूप हैं, जो तुमने अनुभव से प्राप्त की हैं, वही मूल्यवान हैं। चाहे तुम लोग आज मेरे पूछे गए सवालों को पूरी तरह से समझो या नहीं, निश्चित रूप से मसीह-विरोधियों का भेद पहचानने के विषय का कुछ हिस्सा तुम लोग समझ सकते हो, क्योंकि तुम सभी लोगों ने कुछ हद तक मसीह-विरोधियों से लोगों के गुमराह होने और बाधित होने का अनुभव किया है। इसने तुम्हें थोड़ा-बहुत भेद पहचानने की समझ दी है और जब तुम लोग मसीह-विरोधियों को बुराई करते और कलीसिया के काम को नुकसान पहुँचाते हुए देखते हो, तो ये सत्य तुम लोगों के लिए प्रभावी हो सकते हैं। ये शब्द केवल तब प्रभावी होते हैं जब तुम वास्तविक परिवेशों का सामना करते हो। यदि तुमने मसीह-विरोधियों द्वारा गुमराह किए जाने का अनुभव नहीं किया है और केवल अपने मन में उनके क्रियाकलापों की कल्पना करते हो, तो यह बेकार है। चाहे तुम्हारी कल्पना कितनी भी अच्छी क्यों न हो, इसका मतलब यह नहीं कि तुम उनका भेद पहचानने में सक्षम हो पाओगे। ऐसा केवल वास्तविक परिस्थितियों का सामना करते समय ही होता है जब लोग सहज प्रतिक्रिया देते हुए, अपने विचारों और दृष्टिकोणों का, कुछ सिद्धांतों का जिनसे वे परिचित हैं, कुछ धर्म-सिद्धांतों, पद्धतियों और तरीकों का जो उन्होंने सीखे हैं, इस्तेमाल उन मामलों का सामना करने और उनसे निपटने के लिए और अंततः विभिन्न विकल्प चुनने के लिए करते हैं। लेकिन इससे पहले कि लोग इन परिस्थितियों का सामना करें, बेहद अच्छी बात है कि उनके पास पहले से ही विभिन्न सिद्धांतों की एक शुद्ध समझ और प्रभाव हो। कुछ लोग कहते हैं, “जब तक हम मसीह-विरोधियों का सामना नहीं करते, तुम्हारा इतनी सारी बातें कहने का क्या उपयोग है?” यह उपयोगी है। क्या मसीह-विरोधियों को उजागर करने वाले वचन पुस्तक में मुद्रित नहीं हैं? क्या उन वचनों को तुम एक या दो दिन में पूरी तरह से अनुभव कर सकते हो और उनकी असलियत जान सकते हो? नहीं। उन वचनों को उस पुस्तक में मुद्रित करने का उद्देश्य तुम लोगों को बचाना है ताकि तुम लोग इन वचनों को अक्सर पढ़ सको, इन सत्य को समझ सको, साथ ही जब तुम लोग भविष्य में विभिन्न परिस्थितियों का सामना करो—चाहे वह मसीह-विरोधियों से जुड़ी घटना हो, अपने स्वभाव को बदलने में कठिनाई हो या कुछ और—तब तुम लोग परमेश्वर के वचनों को पढ़कर जीवन की आपूर्ति प्राप्त कर सको। इस पुस्तक में परमेश्वर के वचन तुम्हारे लिए इन मामलों का अनुभव करने, इनसे निपटने और सत्य के इन पहलुओं में प्रवेश करने का स्रोत हैं। धर्मोपदेश सुनते समय तुम जितना समझ पाते हो, वह यह नहीं दर्शाता कि तुम्हारे पास कितनी वास्तविकता है। अगर तुम किसी बात को एक बार में समझ नहीं पाते या याद नहीं रख पाते हो, तो इसका मतलब यह नहीं है कि तुम इसे कभी अनुभव नहीं करोगे या भविष्य में इसे कभी नहीं समझ पाओगे। संक्षेप में, तुम लोगों को यह समझना चाहिए कि केवल वही चीजें जो लोग अनुभव से प्राप्त करते हैं और परमेश्वर के वचनों के आधार पर जानते हैं, सत्य से संबंधित हैं। जो बातें लोग याद रखते हैं और जो बातें वे अपने दिमाग में समझते हैं, वे ज्यादातर सत्य से संबंधित नहीं होतीं; वे केवल सैद्धांतिक होती हैं। सत्य के संबंध में सबसे महत्वपूर्ण बातें क्या हैं? सबसे महत्वपूर्ण बातें अनुभव और प्रवेश हैं। किसी भी सत्य के पहलू में, जब लोग वास्तव में इसका अनुभव करते हैं, तो उनका अंतिम फल सत्य का फल और उनके अस्तित्व के लिए मार्ग होता है। इसलिए, याद न रख पाना कोई समस्या नहीं है।
अगर मैं सभा की शुरुआत में सीधे मुख्य विषय पर चर्चा शुरू करता, तो क्या तुम लोग समय रहते प्रतिक्रिया कर पाते? इसलिए, मुझे कुछ तरीकों का इस्तेमाल करने की जरूरत पड़ी और सबसे पहले मैंने तुम लोगों से पूछा, “क्या तुम्हें मसीह-विरोधियों के सार और मसीह-विरोधियों के स्वभाव वाले लोगों के बीच का अंतर याद है?” इस सवाल को पहले पूछने का मेरा उद्देश्य यह नहीं था कि मैं तुम लोगों को अचंभित कर दूँ या तुम लोगों को बेनकाब कर दूँ, बल्कि इसका उद्देश्य तुम लोगों को सूचना देना था। फिर, हमने समीक्षा की और कुछ लोग धीरे-धीरे याद करने लगे : “हमने पहले इस बारे में संगति की थी कि मसीह-विरोधी सत्य को कैसे देखते हैं और मसीह-विरोधियों की मानवता कैसी है।” मसीह-विरोधियों से संबंधित कुछ विषय-वस्तु ने पहले ही तुम पर गहरा प्रभाव छोड़ा है; यह विषय-वस्तु उस पल के इंतजार में है जब तुम ऐसी चीजों का अनुभव करो और तब यह तुम्हारे अभ्यास के लिए मार्गदर्शक और दिशानिर्देश के रूप में काम करेगी। लेकिन इससे भी ज्यादा ऐसी विषय-वस्तु है जिसके बारे में पहली बार सुनने के बाद तुम पर उसका बिल्कुल भी कोई प्रभाव नहीं होता। इस विषय-वस्तु का भी अनुभव करना जरूरी है। जब तुम इन अनुभवों से गुजरते हो और फिर इन वचनों को खाते-पीते हो और इन्हें पढ़कर प्रार्थना करते हो, तो तुम्हें और भी लाभ होगा। चाहे इस विषय-वस्तु का तुम पर प्रभाव हो या न हो, इन चीजों के अनुभव से गुजरने के बाद, यह सब एक साथ मिल जाएगा। जो धर्म-सिद्धांत तुमने याद किए थे वे तुम्हारी व्यावहारिक समझ और उनका अनुभव करने के बाद वे तुम्हारा लाभ बन जाएँगे। जिस विषय-वस्तु का तुम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा था, उसे एक बार अनुभव करने के बाद, तुम पर थोड़ा प्रभाव हो सकता है, लेकिन यह केवल एक तरह का बोधात्मक ज्ञान रहेगा। यह बोधात्मक ज्ञान केवल धर्म-सिद्धांत के स्तर पर ही रहेगा। अब तुम्हें फिर से इसी तरह के अनुभवों से गुजरने की जरूरत होगी, तब जाकर यह तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा, दिशानिर्देश देगा और तुम्हें अभ्यास के लिए एक मार्ग प्रदान करेगा। परमेश्वर के शब्दों को अनुभव करना और सत्य का अनुभव करना ऐसी ही एक प्रक्रिया है। क्या यह शर्म की बात है कि तुम लोगों को यह नहीं पता कि उस सवाल का जवाब कैसे देना है जो मैंने पूछा था? यह शर्म की बात नहीं है। अगर तुम लोग मुझसे अचानक कोई सवाल पूछोगे, तो मुझे भी उस समय यह समझने के लिए सोचने की जरूरत पड़ेगी कि उस सवाल का क्या मतलब है और सत्य के कौन-से पहलू उसमें शामिल हैं। मानव मस्तिष्क और मन इसी तरह से काम करते हैं—उन्हें प्रतिक्रिया देने के लिए समय की आवश्यकता होती है। भले ही वह कोई ऐसी बात हो जिसकी तुम्हें अच्छी तरह से जानकारी है, अगर तुमने कई वर्षों से उसका सामना नहीं किया है, तो जब अचानक वह सामने आएगा, तब भी तुम्हें प्रतिक्रिया देने के लिए समय की आवश्यकता होगी। तुमने किसी चीज का चाहे कितना भी गहरा अनुभव किया हो, अगर कई दिनों या वर्षों बाद फिर से तुम्हारा उससे सामना होता है, तो तुम्हें फिर भी प्रतिक्रिया देने के लिए समय चाहिए होगा—यह जिक्र करने की आवश्यकता ही नहीं है कि मसीह-विरोधियों के विषय में तुम्हारी समझ केवल शब्दों और धर्म-सिद्धांतों के स्तर पर ही है, तुम अभी भी इसका मिलान उन मसीह-विरोधियों से नहीं कर सकते जिनका तुम वास्तविक जीवन में सामना करते हो और यह कहा जा सकता है कि तुम अभी भी मूल रूप से मसीह-विरोधियों का भेद नहीं पहचान सकते हो। तो ये सत्य तुम लोगों के लिए इंतजार कर रहे हैं ताकि तुम उनका व्यावहारिक अनुभव ले सको—केवल तभी तुम परमेश्वर के वचनों की प्रमाणिकता और सटीकता की पुष्टि कर सकते हो। उदाहरण के लिए, हमने पहले संगति की थी कि मसीह-विरोधी बिल्कुल भी पश्चात्ताप नहीं करते हैं। मान लो कि तुमने इसे याद कर लिया और तुम कहते हो, “परमेश्वर ने कहा कि मसीह-विरोधी बिल्कुल भी पश्चात्ताप नहीं करते हैं। वे परमेश्वर की उपेक्षा करेंगे और अंत तक उसका विरोध करेंगे। वे सत्य को स्वीकार नहीं करते और चाहे कुछ भी हो, वे कभी यह स्वीकार नहीं करेंगे कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं। वे सत्य से विमुख हैं।” यह केवल सैद्धांतिक रूप से है कि तुम इस कथन को समझते हो, स्वीकारते हो या तुम पर इसका कुछ प्रभाव पड़ता है; यह बस थोड़ा-सा बोधात्मक ज्ञान है। तुम्हारे अवचेतन में, तुम्हें लगता है कि यह कथन सही है, लेकिन मसीह-विरोधी कौन-से विशेष शब्द कहते हैं, कौन-से भ्रष्ट स्वभाव हैं जो वे प्रकट करते हैं और कौन सी प्रकृति उन्हें संचालित करती है, इत्यादि, क्या ये परमेश्वर के उन वचनों से मेल खाते हैं और उनसे सह-संबंधित हैं जो मसीह-विरोधियों को उजागर करते हैं? इनमें से क्या यह प्रदर्शित कर सकता है कि परमेश्वर का प्रकाशन तथ्यात्मक है? इसके लिए तुम्हें या तो किसी मसीह-विरोधी से व्यक्तिगत रूप से मिलना पड़ेगा या मसीह-विरोधी की कथनी और करनी के बारे में पर्यवेक्षकों से सुनना पड़ेगा और अंत में तुम्हें यह एहसास होगा, “परमेश्वर के वचन कितने व्यावहारिक हैं, वे पूरी तरह से सही हैं। इस व्यक्ति को कई बार मसीह-विरोधी के रूप में चित्रित किया गया है और बर्खास्त किया गया है। भले ही उसे अभी तक निष्कासित नहीं किया गया है या बाहर नहीं निकाला गया है, लेकिन उसकी अभिव्यक्तियाँ और खुलासे यह दर्शाते हैं कि वह सत्य को बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करता, वह बिल्कुल भी पश्चात्ताप नहीं करता; उसमें न केवल मसीह-विरोधी स्वभाव है, बल्कि मसीह-विरोधी का प्रकृति सार भी है—वह सचमुच में पूर्ण रूप से मसीह-विरोधी है।” फिर एक दिन, जब इस व्यक्ति को निष्कासित किया जाता है, तो तुम अपने दिल में यह पुष्टि करते हो : “परमेश्वर के वचन कितने सही हैं! मसीह-विरोधी स्वभाव वाले लोग बदल सकते हैं, लेकिन मसीह-विरोधी सार वाले लोग नहीं बदल सकते।” ये शब्द तुम्हारे दिल में अपनी जड़ें जमा लेते हैं। यह सिर्फ कोई याददाश्त या थोड़ा-सा प्रभाव नहीं है और न ही यह सिर्फ एक प्रकार का बोधात्मक ज्ञान है। इसके बजाय, तुम परमेश्वर के वचनों को गहराई से समझते और स्वीकार करते हो : “एक मसीह-विरोधी कभी नहीं बदलेगा; वह अंत तक परमेश्वर का विरोध करेगा। कोई आश्चर्य नहीं कि परमेश्वर उसे बचाता नहीं है; कोई आश्चर्य नहीं कि परमेश्वर ऐसे लोगों पर कार्य नहीं करता। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि अपना कर्तव्य निभाते समय उन्हें कभी भी प्रबोधन या प्रकाश नहीं मिलता और वे किसी भी प्रकार की प्रगति नहीं करते—उन्होंने अपने रास्ते पर चलने के लिए दृढ़ संकल्प लिया है। यह वास्तव में एक मसीह-विरोधी है!” जब तुम परमेश्वर के वचनों की सटीकता की पुष्टि करते हो, तो तुम मन ही मन सोचते हो : “परमेश्वर के वचन सचमुच सत्य हैं। ये वचन सही हैं। आमीन!” तुम्हारे लिए आमीन कहने का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि अपने अनुभवों के माध्यम से, तुमने यह समझ लिया है कि परमेश्वर के वचन सभी चीजों को परखने का मापदंड हैं, परमेश्वर के वचन सत्य हैं, भले ही यह युग और यह मानवजाति समाप्त हो जाए, परमेश्वर के वचन कभी समाप्त नहीं होंगे। वे क्यों समाप्त नहीं होंगे? क्योंकि चाहे जब भी हो, मसीह-विरोधियों का सार कभी नहीं बदलेगा और मसीह-विरोधियों के सार को उजागर करने वाले परमेश्वर के वचन भी कभी नहीं बदलेंगे। भले ही यह युग समाप्त हो जाए, भले ही यह भ्रष्ट मानवजाति समाप्त हो जाए, परमेश्वर के ये वचन हमेशा तथ्यों का सत्य होंगे—कोई भी इसे नकार नहीं सकता। यह परमेश्वर का वचन है! जब तुम्हें लगता है कि परमेश्वर के वचन उन तथ्यों के अनुरूप हैं और उनसे मेल खाते हैं जिन्हें तुम देखते हो और जिनका तुम सामना करते हो और तुम्हारे दिल को इसकी पुष्टि होती है, यह सिर्फ ऐसी भावना नहीं रह जाती है कि परमेश्वर के वचन सही हैं या परमेश्वर के वचन गलत नहीं हैं, इसके बजाय तुमने इसे देखा और व्यक्तिगत रूप से अनुभव किया है, तो तुम स्वाभाविक रूप से परमेश्वर के वचनों को आमीन कहोगे। उस समय, अगर मैं फिर से पूछूँ, “मसीह-विरोधी के सार वाले लोगों की अभिव्यक्तियाँ क्या हैं?” तो तुम्हारी आंतरिक समझ तुरंत सामने आ जाएगी। तुम्हारे पास सिर्फ एक प्रभाव, एक याद किया हुआ वाक्यांश या एक तरह की जागरूकता या बोधात्मक ज्ञान नहीं होगा। तुम तुरंत कहोगे, “मसीह-विरोधी बिल्कुल भी सत्य स्वीकार नहीं करते हैं और रत्ती भर भी पश्चात्ताप नहीं करते हैं!” भले ही इस कथन में बहुत तार्किक संरचना नहीं हो सकती, भले ही यह एकदम अचानक कहा गया है और लोगों को पहली बार में यह समझ में नहीं आएगा, तुम्हें पता है कि इसका क्या मतलब है क्योंकि तुमने इसे अनुभव किया है और इसे अपनी आँखों से देखा है। मसीह-विरोधी बिल्कुल ऐसे ही नीच लोग हैं—वे कभी पश्चात्ताप नहीं करेंगे। इन शब्दों को अनुभव करने की जरूरत है; जो कोई भी इनका अनुभव नहीं करता है, उसे कुछ भी हासिल नहीं होगा।
2 अक्तूबर 2021
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?