अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (26) खंड एक

मद चौदह : सभी प्रकार के बुरे लोगों और मसीह-विरोधियों को तुरंत पहचानो और फिर बहिष्कृत या निष्कासित कर दो (भाग पाँच)

कलीसिया की सफाई के कार्य के प्रति अगुआओं और कार्यकर्ताओं का क्या रवैया होना चाहिए

इस वर्ष हम अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियों और इसमें शामिल सभी प्रकार के लोगों की अभिव्यक्तियों पर लगातार संगति करते आ रहे हैं। संगति के विषय और ज्यादा विस्तृत और विशिष्ट हो गए हैं जिसमें सभी प्रकार के लोगों की विभिन्न समस्याएँ शामिल हैं और इन लोगों की विशिष्ट अभिव्यक्तियों और उन्हें जिन श्रेणियों में विभाजित किया जाना चाहिए, इस पर संगति भी बहुत विशिष्ट और स्पष्ट रही है। इन विस्तृत समस्याओं पर जितनी ज्यादा विशिष्ट और स्पष्ट रूप से संगति की जाती है, इसे परमेश्वर के चुने हुए लोगों के जीवन प्रवेश के लिए उतनी ही ज्यादा सकारात्मक मदद और मार्गदर्शन प्रदान करना चाहिए, और उतना ही ज्यादा मार्गदर्शन और सहायता इसे अगुआओं और कार्यकर्ताओं को कार्य करने और अपने कर्तव्य पूरे करने के लिए प्रदान करनी चाहिए। लेकिन संगति चाहे कैसे भी की जाए, संगति चाहे कितनी भी विशिष्ट क्यों न हो, कुछ अगुआ और कार्यकर्ता अब भी इस बारे में अस्पष्ट हैं कि कलीसिया में विभिन्न प्रकार के लोगों और मुद्दों को कैसे सँभालना और निपटाना है। सभी प्रकार के लोगों के मुद्दों पर बहुत स्पष्टता से संगति की जाती है, फिर भी कुछ अगुआ और कार्यकर्ता अब भी यह नहीं समझ पाते हैं कि विभिन्न प्रकार के लोगों को कैसे पहचानना है और उनसे कैसे व्यवहार करना है। वे अब भी सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य नहीं कर पाते हैं और न ही वे कलीसिया में विभिन्न प्रकार के लोगों और मुद्दों को सँभालने के लिए सत्य का उपयोग कर पाते हैं। इसका क्या कारण है? ऐसे लोगों में सत्य वास्तविकता की कमी है। सभी प्रकार के लोगों की अभिव्यक्तियों पर संगति के जरिए व्यक्ति को कलीसिया में उन लोगों की मूलभूत पहचान हो जानी चाहिए और उनके लिए उचित व्यवस्थाएँ करनी चाहिए जो अपने कर्तव्य करते हैं और जो नहीं करते हैं, जो सत्य का अनुसरण करते हैं और जो नहीं करते हैं, जो आज्ञाकारी और विनम्र हैं और जो विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न करते हैं। लेकिन कलीसिया में सभी प्रकार के लोगों की परिस्थिति देखी जाए तो सिर्फ स्पष्ट कुकर्मियों को ही बहिष्कृत या निष्कासित किया गया है; कई छद्म-विश्वासियों को पूरी तरह से बहिष्कृत या निष्कासित नहीं किया गया है। कलीसिया की सफाई के कार्य में अगुआओं और कार्यकर्ताओं को इसे निष्क्रिय रूप से सँभालने, खुशामदी लोगों के रूप में कार्य करने या यह सोचने के बजाय कि सिर्फ स्पष्ट कुकर्मियों को दूर कर देने का यह अर्थ है कि सब कुछ निपट गया है और ठीक है, उन्हें कुकर्मियों और छद्म-विश्वासियों को जल्द से जल्द दूर करने के लिए परमेश्वर के कार्य में सहयोग करना चाहिए। अगुआओं और कार्यकर्ताओं को हर टीम के कार्य का सक्रिय रूप से निरीक्षण करना चाहिए, हर टीम के सदस्यों की परिस्थितियों को इस संबंध में सत्यापित करना चाहिए कि क्या वहाँ कोई छद्म-विश्वासी सिर्फ गिनती पूरी करनी के लिए मौजूद है या वहाँ कोई ऐसा छद्म-विश्वासी है जो कलीसिया के कार्य में बाधा डालने के लिए नकारात्मकता और धारणाएँ फैला रहा है, और पता चलने पर इन लोगों को पूरी तरह से उजागर किया जाना चाहिए और उन्हें बहिष्कृत या निष्कासित किया जाना चाहिए। अगुआओं और कार्यकर्ताओं को यही कार्य करना चाहिए; उन्हें निष्क्रिय नहीं होना चाहिए, कार्य करने के लिए ऊपरवाले से आदेश और आग्रह प्राप्त करने की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए और न ही उन्हें सिर्फ तभी थोड़ा-सा कार्य कर देना चाहिए जब सभी भाई-बहन इसकी माँग करें। अपने कार्य में, अगुआओं और कार्यकर्ताओं को परमेश्वर की इच्छा के प्रति विचारशील होना चाहिए और उसके प्रति वफादार रहना चाहिए। उनके लिए व्यवहार करने का सबसे अच्छा तरीका सक्रिय रूप से समस्याओं को पहचानना और हल करना है। उन्हें निष्क्रिय नहीं रहना चाहिए, खासकर तब जब उनके पास कार्य करने के लिए आधार के रूप में ये मौजूदा वचन और संगति है। उन्हें सत्य पर संगति करके वास्तविक समस्याओं और मुश्किलों को पूरी तरह से सुलझाने की पहल करनी चाहिए, और अपना कार्य ठीक उसी तरह से करना चाहिए जैसा उनसे अपेक्षित है। उन्हें कार्य की प्रगति पर फौरन और सक्रियता से खुद आगे बढ़कर अनुवर्ती कार्यवाही करनी चाहिए; वे अनिच्छा से क्रियाकलाप करने से पहले हमेशा ऊपरवाले से आदेशों और आग्रह की प्रतीक्षा में बैठे नहीं रह सकते हैं। अगर अगुआ और कार्यकर्ता हमेशा नकारात्मक और निष्क्रिय रहते हैं और वास्तविक कार्य नहीं करते हैं, तो वे अगुआओं और कार्यकर्ताओं के रूप में सेवा करने के लायक नहीं हैं, और उन्हें बर्खास्त करके कोई दूसरा काम दे दिया जाना चाहिए। फिलहाल ऐसे बहुत-से अगुआ और कार्यकर्ता हैं जो अपने काम में बहुत निष्क्रिय हैं। वे थोड़ा सा भी कार्य सिर्फ तभी करते हैं जब ऊपरवाला आदेश भेजता है और उन्हें प्रेरित करता है; अन्यथा, वे सुस्त पड़ जाते हैं और टालमटोल करते हैं। कुछ कलीसियाओं में काम में काफी अस्तव्यस्तता होती है, वहाँ कार्य करने वालों में से कुछ लोग बहुत ही सुस्त और लापरवाह हैं, और उन्हें कोई वास्तविक परिणाम नहीं मिलते हैं। ये समस्याएँ पहले से ही बहुत गंभीर और भयानक प्रकृति की हैं, लेकिन अब भी उन कलीसियाओं के अगुआ और कार्यकर्ता अधिकारियों और अधिपतियों की तरह कार्य करते हैं। वे न तो कोई वास्तविक कार्य कर पाते हैं, न ही समस्याओं को पहचानकर उन्हें हल कर पाते हैं। इससे कलीसिया का काम रुक जाता है और फिर काम ठप ही पड़ जाता है। जहाँ भी किसी कलीसिया का कार्य बुरी तरह से अस्त-व्यस्त हो जाता है और वहाँ व्यवस्था का कोई नामोनिशान नहीं होता है, तो निश्चित रूप से वहाँ कोई नकली अगुआ या मसीह-विरोधी सत्ता सँभाले होता है। हर कलीसिया में जहाँ कोई नकली अगुआ सत्ता सँभाले होता है, वहाँ कलीसिया का कार्य खस्ताहाल और पूरी तरह से अस्त-व्यस्त होता है—इसमें कोई संदेह नहीं है। मिसाल के तौर पर, अमेरिकी कलीसियाओं के बहुत सारे मसलों के बारे में मुझे खुद सुनकर या देखकर ही पता चला। मैंने जितने भी मसले देखे, उनमें से ज्यादातर को मौके पर ही सुलझा दिया गया; कुछ अन्य मसले सुलझाने के लिए मैंने अमेरिकी कलीसियाओं के अगुआओं से कहा। लेकिन, अगुआओं और कार्यकर्ताओं का ज्यादातर कार्य बहुत ही निष्क्रिय तरीके से किया जाता है, जिसमें अनुवर्ती कार्रवाइयाँ बहुत ही धीमी होती हैं और कुशलता बहुत ही कम होती है, उनके ज्यादातर दैनिक कार्य सिर्फ ऊपरवाले के आदेशों और उसके आग्रह के बाद ही किए जाते हैं। ऊपरवाले द्वारा कार्य की व्यवस्था किए जाने के बाद वे कुछ समय के लिए व्यस्त रहते हैं, लेकिन जैसे ही वह जरा-सा कार्य पूरा हो जाता है, तो वे नहीं जानते हैं कि आगे क्या करना है, क्योंकि उन्हें समझ नहीं आता है कि उन्हें कौन से कर्तव्य करने चाहिए। जहाँ तक अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियों के दायरे में आने वाले कार्य की बात है, उन्हें कभी पता नहीं होता है कि कौन-से कार्य करने हैं; उनकी नजर में ऐसा कोई कार्य नहीं है जिसे करने की जरूरत है। जब लोगों को लगता है कि ऐसा कोई काम ही नहीं है जिसे करना जरूरी है तो इसका मतलब क्या है? (वे कोई भार वहन नहीं करते।) सटीक रूप से कहें तो वे कोई भार वहन नहीं करते; वे बेहद आलसी भी होते हैं और सुख-सुविधाओं के लालची होते हैं, यथासंभव अवकाश ले लेते हैं और किसी भी अतिरिक्त कार्य से बचने का प्रयास करते हैं। ये आलसी लोग अक्सर सोचते हैं, “मैं इतनी चिंता क्यों करूँ? बहुत ज्यादा चिंता करने से मेरी उम्र तेजी से बढ़ने लगेगी। ऐसा करके और इतनी भागदौड़ से और अपने आपको इतना थकाकर मुझे क्या लाभ होगा? अगर मैं जी-तोड़ मेहनत करके बीमार पड़ गया तो? मेरे पास तो इलाज के लिए पैसे भी नहीं हैं। और जब मैं बूढ़ा हो जाऊँगा तो मेरी देखभाल कौन करेगा?” ये आलसी लोग इतने निष्क्रिय और पिछड़े होते हैं। उनमें रत्ती भर भी सत्य नहीं होता और वे कुछ भी स्पष्ट रूप से नहीं देख पाते। जाहिर है कि वे भ्रमित लोगों का एक समूह हैं, है न? वे सब भ्रमित होते हैं; वे सत्य से बेखबर होते हैं और उन्हें इसमें कोई दिलचस्पी नहीं होती है, तो उन्हें कैसे बचाया जा सकता है? लोग हमेशा अनुशासनहीन और आलसी क्यों होते हैं, मानो वे जिंदा लाशें हों? यह उनकी प्रकृति के मुद्दे से जुड़ा है। मानव-प्रकृति में एक प्रकार का आलस्य होता है। लोग चाहे कोई भी काम कर रहे हों, उन्हें हमेशा किसी-न-किसी निगरानी करने वाले और आग्रह करने वाले की जरूरत पड़ती है। कभी-कभी लोग देह के प्रति विचारशील होते हैं, देह-सुख के लिए ललचाते हैं और हमेशा अपने लिए बच निकलने का रास्ता छोड़कर रखते हैं—ये लोग शैतानी इरादों और धूर्त योजनाओं से भरे होते हैं; ये लोग सचमुच बिल्कुल अच्छे लोग नहीं होते। वे कभी भरसक प्रयास नहीं करते, चाहे वे कोई भी महत्वपूर्ण कर्तव्य क्यों न कर रहे हों। यह गैर-जिम्मेदार और बेवफा होना है। मैंने ये बातें आज तुम्हें यह याद दिलाने के लिए कही हैं कि तुम काम में निष्क्रिय मत होना। तुम लोगों को मेरी कही हर बात का अनुसरण करने में समर्थ होना चाहिए। अगर मैं विभिन्न कलीसियाओं में जाऊँ और मुझे पता चले कि तुम लोगों ने बहुत सारा कार्य किया है, तुमने बहुत कुशलता से कार्य किया है और यह कार्य बहुत जल्दी प्रगति कर रहा है, यह संतोषजनक स्तर पर पहुँच गया है और सभी ने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास किया है तो मुझे बहुत खुशी होगी। अगर मैं विभिन्न कलीसियाओं में जाऊँ और देखूँ कि कार्य की प्रगति सभी पहलुओं में धीमी है, जो यह साबित करता है कि तुम लोगों ने अपने कर्तव्य अच्छी तरह से नहीं किए हैं और तुम लोग सुसमाचार फैलाने की सामान्य गति के साथ कदम मिलाकर नहीं चले हो तो तुम लोगों को क्या लगता है, तब मेरा मिजाज कैसा होगा? क्या तब भी मुझे तुम लोगों को देखकर खुशी होगी? (नहीं।) मुझे खुशी नहीं होगी। यह कार्य तुम लोगों को सौंपा गया है और मैं वह सब कुछ कह चुका हूँ जो कहने की जरूरत है; अभ्यास के विशिष्ट सिद्धांत और मार्ग भी तुम लोगों को बता दिए गए हैं। फिर भी तुम लोग कार्यवाही नहीं करते हो, कार्य नहीं करते हो, बस इसी प्रतीक्षा में रहते हो कि मैं व्यक्तिगत रूप से तुम लोगों का पर्यवेक्षण करूँ और तुम लोगों से आग्रह करूँ, तुम लोगों की काट-छाँट करूँ या यहाँ तक कि कार्य करने के लिए तुम्हें आदेश भी दूँ। यहाँ क्या समस्या है? क्या इसका गहन-विश्लेषण नहीं किया जाना चाहिए? जब तुम वह कार्य नहीं कर रहे हो जो स्पष्ट रूप से किया जाना चाहिए और तुम उसकी जिम्मेदारी उठाने में असमर्थ हो—क्या मैं तुम लोगों के प्रति अच्छा रवैया रख सकता हूँ? (नहीं।) मैं तुम लोगों के प्रति अच्छा रवैया क्यों नहीं रख सकता? (हम अपने कर्तव्य करने में बहुत ही गैर-जिम्मेदार हैं।) क्योंकि तुम लोग अपने पूरे दिल और ताकत से अपने कर्तव्य नहीं कर रहे हो, बल्कि उन्हें सिर्फ लापरवाही से कर रहे हो। अपने कर्तव्यों के प्रति वफादार व्यक्ति को कम-से-कम अपनी पूरी ताकत लगा देनी चाहिए लेकिन तुम लोग इतना भी नहीं कर पाते हो; तुम लोग बहुत ही अपर्याप्त हो! ऐसा नहीं है कि तुम लोगों की काबिलियत अपर्याप्त है; बात यह है कि तुम लोगों की मानसिकता गलत है और तुम लोग गैर-जिम्मेदार हो। तुम लोगों के दिलों में ऐसी कुछ बेतुकी बातें हैं जो तुम्हें अपने कर्तव्य निभाने से रोकती हैं। इसके अलावा खुशामदी होने की मानसिकता तुम लोगों को कलीसिया की सफाई का कार्य पूरा करने से रोकती है। क्या तुम लोगों को कलीसिया की सफाई का महत्व मालूम है? परमेश्वर क्यों कलीसिया की सफाई करना चाहता है? कलीसिया की सफाई नहीं करने के क्या परिणाम होते हैं? तुम सभी इन मामलों के बारे में अस्पष्ट हो और सत्य की तलाश नहीं करते हो, जो साबित करता है कि तुम लोग परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील नहीं हो। तुम लोग अपने पद के सामान्य, नियमित कार्य का सिर्फ थोड़ा-सा भाग करने के इच्छुक हो और विशेष कार्यों से कतराते हो, विशेष रूप से ऐसे कार्यों से जो दूसरों को नाराज कर सकते हैं। तुम सभी ये कार्य किसी और को सौंप देना पसंद करते हो। क्या तुम लोग इसी तरीके से नहीं सोचते हो? क्या यह ऐसा मुद्दा नहीं है जिसका समाधान किया जाना चाहिए? तुम लोग हमेशा कहते हो, “मेरी काबिलियत खराब है, सत्य के बारे में मेरी समझ सीमित है और मेरे पास पर्याप्त कार्य अनुभव नहीं है। मैं कभी भी कलीसियाई अगुआ नहीं रहा हूँ और न ही मैंने कलीसिया की सफाई का कार्य किया है।” क्या यह बहानेबाजी नहीं है? कलीसिया की सफाई के कार्य पर बहुत स्पष्टता से संगति की गई है। मसीह-विरोधियों, कुकर्मियों और छद्म-विश्वासियों को दूर करना बहुत ही सरल मामला है। क्या उन कुछ सिद्धांतों को समझना वाकई इतना कठिन है? अगर ऐसे सरल मुद्दे बहुत स्पष्टता से समझाए जाते हैं और फिर भी लोगों को समझ नहीं आता है तो इसका क्या अर्थ है? इससे पता चलता है कि या तो उनकी काबिलियत इतनी कम है कि वे मानव भाषा समझ ही नहीं सकते या वे बस बदमाश हैं जो उचित कार्यों पर ध्यान केंद्रित नहीं करते हैं। अगुआओं और कार्यकर्ताओं में यकीनन कुछ ऐसे लोग हैं जिनकी काबिलियत खराब है और यकीनन कुछ ऐसे खुशामदी लोग हैं जो वास्तविक कार्य में शामिल नहीं होते हैं; यकीनन ऐसे कुछ बदमाश भी हैं जो उचित कार्यों को नजरअंदाज करते हैं और लापरवाही से गलत कर्म करते हैं—ये सभी परिस्थितियाँ मौजूद हैं। सबसे पहले उचित कार्यों को नजरअंदाज करने वाले इन बदमाशों को दूर किया जाना चाहिए। जो भी व्यक्ति वास्तविक कार्य कर सकता है उसका उपयोग किया जाना चाहिए, अगुआओं के रूप में कार्य करने वाले खुशामदी लोगों को यकीनन बर्खास्त किया जाना चाहिए और कम काबिलियत वाले जो लोग मानव भाषा समझ सकते हैं और कुछ वास्तविक कार्य कर सकते हैं उन्हें रखा जाना चाहिए। इन मुद्दों को ऐसे ही हल किया जाना चाहिए। अगर परमेश्वर द्वारा संगति किए जाने के बाद तुम कलीसिया के कार्य में उन समस्याओं को स्पष्ट रूप से देख पाते हो जिन्हें अगुआओं और कार्यकर्ताओं को सुलझाना चाहिए तो तुम्हें और देरी किए बिना उनका तुरंत समाधान करना चाहिए। तुम्हें कार्य करने की पहल करने में समर्थ होना चाहिए, ऊपरवाले द्वारा कार्य सौंपने या आदेश जारी किए जाने की प्रतीक्षा करने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए। चाहे कोई भी समस्या क्यों न उत्पन्न हो, इससे पहले कि वह कार्य को प्रभावित करे उसे हल किया जाना चाहिए। इससे पहले कि ऊपरवाला इन मुद्दों की जाँच करना शुरू करे, तुम्हें इन मुद्दों के बारे में अपनी समझ और उनके समाधानों, उन्हें सँभालने के सिद्धांतों और उन्हें सँभालने के परिणामों की सूचना दे देनी चाहिए। यह कितना शानदार होगा! क्या तब भी ऊपरवाला तुमसे असंतुष्ट रह पाएगा? एक अगुआ या कार्यकर्ता के रूप में अगर तुम अपनी खुद की जिम्मेदारियों के दायरे में कार्य को देखने में लगातार विफल होते हो या भले ही तुम्हारे पास कुछ जागरूकता या विचार हों लेकिन तुम टालमटोल करते रहते हो और कुछ नहीं करते हो, हमेशा ऊपरवाले द्वारा तुम्हारे लिए कार्यों की व्यवस्था किए जाने की प्रतीक्षा करते हो तो क्या यह जिम्मेदारी के प्रति लापरवाही नहीं है? (है।) यह जिम्मेदारी की गंभीर उपेक्षा है! तुमने कर्तव्य के साथ कैसे पेश आया जाए, इस बारे में किसी अगुआ या कार्यकर्ता की भूमिका के साथ आने वाले रवैये या जिम्मेदारी को खो दिया है। अपने कार्य में अगुआओं और कार्यकर्ताओं को ऊपरवाले की अपेक्षाओं का ध्यान से पालन करना चाहिए; ऊपरवाले ने जो भी संगति की है तुम्हें उसे ही कार्यान्वित करना चाहिए, एक बार उसे समझ लेने पर तुम्हें जल्द से जल्द कार्य करना चाहिए और उसे कार्यान्वित करना चाहिए। सत्य से समस्याओं का समाधान करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है और तुम्हें कुछ भी करने से पहले ऊपरवाले द्वारा कार्य की व्यवस्था करने की निष्क्रिय रूप से प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। अगर तुम हमेशा निष्क्रिय रूप से प्रतीक्षा करते रहते हो तो तुम अगुआ या कार्यकर्ता बनने के लिए उपयुक्त नहीं हो, तुम इस कार्य की जिम्मेदारी नहीं उठा सकते हो और अपनी जवाबदेही मानकर इस्तीफा देना ही एकमात्र उचित बात होगी।

परमेश्वर में विश्वास रखने वाले तीन प्रकार के लोगों की अभिव्यक्तियाँ और परिणाम

I. श्रमिक

अगुआओं और कार्यकर्ताओं की कुल पंद्रह जिम्मेदारियाँ हैं और हम पहले ही चौदहवीं जिम्मेदारी तक संगति कर चुके हैं। अगुआओं और कार्यकर्ताओं को कलीसिया में जो समस्याएँ हल करने की जरूरत होती है उनकी और साथ ही इन समस्याओं में शामिल सभी प्रकार के लोगों के मुद्दों की लगभग अस्सी से नब्बे प्रतिशत तक संगति की जा चुकी है। ये सब वही कार्य हैं जिनकी अगुआओं और कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी स्वीकार करने की जरूरत है और वही समस्याएँ हैं जिन्हें उन्हें हल करने की जरूरत है। इसमें कई मुद्दे शामिल हैं। एक तरफ, यह उन जिम्मेदारियों का जिक्र करता है जो अगुआओं और कार्यकर्ताओं को पूरी करनी चाहिए; दूसरी तरफ, यह कलीसिया में सभी प्रकार के लोगों के विभिन्न मुद्दों से भी संबंधित है। वैसे तो इस अवधि के दौरान हमारी संगति का विषय अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ और नकली अगुआओं को उजागर करना है लेकिन हमने उन विभिन्न प्रकार के लोगों के मुद्दों के बारे में—और विभिन्न प्रकार के लोगों की दशाओं और सारों के बारे में भी—बहुत संगति की है जिनका इस विषय में जिक्र किया गया है। यकीनन इस विशिष्ट विषय-वस्तु का कलीसिया में परमेश्वर का अनुसरण करने वाले सभी प्रकार के लोगों पर अलग-अलग प्रभाव पड़ता है। उनमें से एक प्रकार का व्यक्ति ऐसा है जो यह सारी संगति सुनने के बाद भी यह रवैया बनाए रखता है कि “मेरे पास अच्छी मानवता है, मैं सही मायने में परमेश्वर में विश्वास रखता हूँ, मैं परमेश्वर में अपनी आस्था में चीजों का त्याग करने का इच्छुक हूँ और मैं अपना कर्तव्य करने के लिए कीमत चुकाने और कष्ट सहने का इच्छुक हूँ।” वह सभी प्रकार के लोगों की विभिन्न दशाओं, विभिन्न दशाओं से संबंधित सत्य या लोगों को जो सत्य सिद्धांत समझने चाहिए उनकी परवाह नहीं करता है, जिनके बारे में इस अवधि के दौरान संगति की गई। क्या यह व्यक्तियों का एक प्रकार नहीं है? क्या इस प्रकार का व्यक्ति बहुत प्रतिनिधिक नहीं है? (है।) इस प्रकार का व्यक्ति हमेशा एक निश्चित नजरिया रखता है। यह नजरिया मुख्य रूप से किन चीजों से बना है? मैंने अभी-अभी जिन तीन बिंदुओं का जिक्र किया वे हैं : पहला, वह मानता है कि उसकी मानवता बुरी नहीं है और यह भी मानता है कि वह अच्छी है। दूसरा, उसे लगता है कि वह सही मायने में परमेश्वर में विश्वास रखता है जिसका अर्थ यह है कि वह सचमुच में परमेश्वर के अस्तित्व और हर चीज पर परमेश्वर की संप्रभुता में विश्वास रखता है, वह मानता है कि मानव नियति परमेश्वर द्वारा नियंत्रित है, यह परमेश्वर की संप्रभुता के अंतर्गत आती है जो कि “सही मायने में विश्वास रखने” की एक व्यापक व्याख्या है। तीसरा, वह मानता है कि वह परमेश्वर में अपनी आस्था में चीजों का त्याग कर सकता है और अपने कर्तव्य पूरे करने के लिए कष्ट सह सकता है और कीमत चुका सकता है। ये तीन बिंदु सबसे मूलभूत, प्राथमिक और प्रमुख तत्व कहे जा सकते हैं जिन्हें इस प्रकार के लोग परमेश्वर में अपनी आस्था में पकड़े रहते हैं। यकीनन ये चीजें परमेश्वर में विश्वास रखने में उनकी पूँजी मानी जा सकती हैं और साथ ही उनके द्वारा अनुसरण किए जाने वाले लक्ष्य और कार्य करने की उनकी प्रेरणा और दिशा भी मानी जा सकती हैं। वे मानते हैं कि इन तीन बिंदुओं का अपने पास होना उन्हें बचाए जाने की तीन मूलभूत शर्तों के लिए उन्हें योग्य बनाता है जिससे वे ऐसे लोग बन जाते हैं जिनसे परमेश्वर प्रेम करता है और जिन्हें स्वीकार करता है। यह एक गंभीर गलती है; इन तीन बिंदुओं का होना सिर्फ थोड़ी-सी मानवता का होना दर्शाता है। क्या सिर्फ थोड़ी-सी मानवता का होना परमेश्वर की स्वीकृति अर्जित कर सकता है? बिल्कुल नहीं; परमेश्वर उन लोगों को स्वीकृति देता है जो उसका भय मानते हैं और बुराई से दूर रहते हैं। ये तीन बिंदु सत्य वास्तविकता का मानक पूरा नहीं करते हैं; ये सिर्फ श्रमिक होने के तीन मानक हैं। इसके बाद मैं इन तीनों बिंदुओं के विवरणों पर संगति करूँगा ताकि तुम लोग स्पष्ट रूप से समझ सको। पहला बिंदु अच्छी मानवता का होना है। उनका मानना है कि कोई कुकर्म न करना, विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न न करना और परमेश्वर के घर के हितों को नुकसान न पहुँचाना पर्याप्त है और इसका अर्थ यह है कि वे परमेश्वर के इरादे पूरे कर सकते हैं और सिद्धांतों के अनुसार कार्य कर सकते हैं। दूसरा बिंदु “सही मायने में परमेश्वर में विश्वास रखना” है। वे जिसे “सही मायने में परमेश्वर में विश्वास रखना” कहते हैं उनके लिए उसका अर्थ है परमेश्वर के अस्तित्व पर या हर चीज पर उसकी संप्रभुता की सच्चाई पर कभी संदेह न करना और यह विश्वास रखना कि मानव नियति परमेश्वर के हाथों में है, और उन्हें लगता है कि यह विश्वास उन्हें अंत तक परमेश्वर का अनुसरण करने में समर्थ बनाएगा। उनका मानना है कि जब तक वे सही मायने में परमेश्वर में विश्वास रखेंगे तब तक वे उसकी स्वीकृति अर्जित करते रहेंगे। इसलिए चाहे परमेश्वर कैसे भी अगुवाई करे या कार्य करे या वे किसी भी समस्या का सामना करें, वे कहते हैं, “बस परमेश्वर से प्रेम करो, परमेश्वर का अनुसरण करो, परमेश्वर के प्रति समर्पण करो।” समस्याएँ सुलझाने का उनका तरीका बहुत ही सरल है; क्या ऐसे सामान्यीकृत शब्द कोई समस्या सुलझा सकते हैं? तीसरा बिंदु है परमेश्वर में अपनी आस्था में चीजों का त्याग करने में समर्थ होना और अपने कर्तव्य करने के लिए कष्ट सहने और कीमत चुकाने में समर्थ होना। वे इसे अभ्यास में कैसे लाते हैं? क्योंकि वे सही मायने में परमेश्वर में विश्वास रखते हैं इसलिए जब कलीसिया के कार्य में कोई जरूरत होती है या जब उन्हें परमेश्वर के तत्काल इरादे महसूस होते हैं तो वे सक्रियता से अपने परिवार, शादियाँ और करियर त्याग सकते हैं, अपनी सांसारिक संभावनाओं को एक तरफ रख सकते हैं और परमेश्वर का अनुसरण कर सकते हैं और अटल दृढ़ निश्चय के साथ अपने कर्तव्य कर सकते हैं, उन्हें कभी कोई पछतावा नहीं होता है। वे कष्ट सहने और परमेश्वर के घर द्वारा उनके लिए जिस किसी कर्तव्य की व्यवस्था की जाती है उसके लिए कीमत चुकाने में समर्थ होते हैं, भले ही इसका अर्थ कम खाना और कम सोना हो। जीवनयापन की परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों या कुछ प्रतिकूल परिवेशों में भी वे अपने कर्तव्य करने में दृढ़ रह सकते हैं। इन तीन बिंदुओं के अलावा सत्य से संबंधित दूसरे सभी पहलुओं का अभ्यास उन्हें असंबद्ध लगता है। वे वही करते हैं जो उन्हें अच्छा या सही लगता है। जहाँ तक अभ्यास के उन विभिन्न सिद्धांतों का प्रश्न है जो परमेश्वर ने मनुष्य को बताए हैं और साथ ही लोगों के परमेश्वर द्वारा उजागर किए गए विभिन्न भ्रष्ट स्वभावों की दशाओं, अभिव्यक्तियों और सार का प्रश्न है, वे सोचते हैं कि उनके लिए थोड़ा जानना या बिल्कुल भी नहीं जानना ठीक है; उन्हें अपनी खुद की भ्रष्टता की जाँच करने और अपनी कमियों की भरपाई करने के लिए विभिन्न सिद्धांत विशिष्ट रूप से और सावधानी से खोजने की कोई जरूरत महसूस नहीं होती है या उन्हें दूसरों को अपनी विभिन्न अनुभवजन्य गवाहियों की संगति करते हुए सुनने के लिए अक्सर सभाओं में शामिल होने और फिर आत्म-परिवर्तन प्राप्त करने वगैरह की कोई जरूरत महसूस नहीं होती है। उन्हें लगता है कि इस तरह से परमेश्वर में विश्वास रखना बहुत परेशानी की बात है, यह अनावश्यक है। वे परमेश्वर का अनुसरण करते हैं और परमेश्वर में आस्था और स्वभावगत बदलाव की सतही समझ और परमेश्वर के कार्य के बारे में विभिन्न धारणाओं और कल्पनाओं के साथ अपने कर्तव्य करते हैं। क्या इस प्रकार के लोग काफी प्रतिनिधिक नहीं हैं? (हैं।) वे अपने लिए सबसे मूलभूत जरूरतें निर्धारित करते हैं और परमेश्वर में विश्वास रखने के प्रति सबसे मूलभूत रवैया रखते हैं। इसके परे वे सत्य, परमेश्वर के न्याय और उसके द्वारा उजागर किए जाने, काट-छाँट किए जाने और साथ ही लोगों के विभिन्न भ्रष्ट स्वभावों और विभिन्न दशाओं, अभिव्यक्तियों वगैरह की अवहेलना करते हैं। वे इन मुद्दों पर कभी चिंतन या विचार नहीं करते हैं। यानी ये लोग खुद को अच्छी मानवता वाले, अच्छे लोग और परमेश्वर में सही मायने में विश्वास रखने वाले लोग मानते हैं; और हालाँकि वे यह स्वीकार करते हैं कि लोगों के स्वभाव भ्रष्ट होते हैं, फिर भी वे परमेश्वर द्वारा लोगों के उजागर किए गए विभिन्न भ्रष्ट स्वभावों की विशिष्ट दशाओं और अभिव्यक्तियों को नजरअंदाज करते हैं, इन चीजों की जाँच करने का कोई प्रयास नहीं करते हैं। क्या यह एक प्रकार का व्यक्ति नहीं है? क्या परमेश्वर में अपनी आस्था में इस प्रकार के व्यक्ति के विचार और उसकी विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ प्रतिनिधिक नहीं हैं? (हाँ।) परमेश्वर में विश्वास रखने के संबंध में इन लोगों के नजरियों, बचाए जाने के बारे में उनकी समझ और लोगों के विभिन्न भ्रष्ट स्वभावों को उजागर करने वाले परमेश्वर के वचनों के प्रति उनके रवैये को ध्यान में रखा जाए तो इन लोगों को किस श्रेणी में रखा जाना चाहिए? (जो भ्रमित आस्था वाले हैं, जो सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं।) यह सिर्फ सतही रूप है; इन लोगों को वाकई किस श्रेणी में रखा जाना चाहिए? क्या कलीसिया में ऐसे बहुत-से लोग हैं? (हाँ।) जब भी विशिष्ट मुद्दों पर चर्चा की जाती है और संगत सत्यों पर संगति की जाती है तो उन्हें नींद आने लगती है, वे सो जाते हैं या भ्रमित हो जाते हैं, कोई दिलचस्पी नहीं दिखाते हैं। अगर उन्हें कोई कार्य या जिम्मेदारी सौंपी जाती है तो वे अपनी आस्तीनें चढ़ा लेते हैं और उसे करना शुरू कर देते हैं, कष्ट या थकान से कतराते नहीं हैं। उन्हें लगता है कि बहुत ही अच्छा होता अगर परमेश्वर में विश्वास रखना इस तरह का कार्य करने जैसा होता—तब वे प्रेरित होते। जब कष्ट सहने, कीमत चुकाने और कार्य में प्रयास करने का समय आता है तो वे सच्ची तत्परता दिखाते हैं। लेकिन क्या यह सच्ची तत्परता और उत्साह वफादार होने के समान है? क्या सत्य वास्तविकताएँ समझने के बाद यह अभिव्यक्ति होनी चाहिए? (नहीं।) मेरी संगति के जरिए क्या तुम लोग देख सकते हो कि इन लोगों को किस श्रेणी में वर्गीकृत किया जाना चाहिए? (श्रमिक।) सही कहा। ये लोग श्रमिक हैं और श्रमिक लोग परमेश्वर में इसी तरह से विश्वास रखते हैं।

हमने शुरुआत मसीह-विरोधियों के प्रकृति सार और विभिन्न अभिव्यक्तियों के बारे में और साथ ही उन लोगों की विभिन्न अभिव्यक्तियों के बारे में भी संगति करके की जिनका स्वभाव मसीह-विरोधियों वाला है लेकिन वे वास्तव में मसीह-विरोधी नहीं हैं। अब हम अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियों में जिक्र किए गए विभिन्न प्रकार के लोगों की अभिव्यक्तियों के बारे में संगति कर रहे हैं। वैसे तो संगति किए गए विषय मसीह-विरोधियों और नकली अगुआओं के बारे में रहे हैं लेकिन हर मद में जिक्र किए गए विशिष्ट मुद्दे और अभिव्यक्तियाँ भ्रष्ट मानवजाति के भ्रष्ट स्वभावों और साथ ही भ्रष्ट स्वभावों के शिकंजे में उत्पन्न विभिन्न दशाओं और अभिव्यक्तियों से भी संबंधित हैं। वैसे तो नकली अगुआ और मसीह-विरोधी सिर्फ अल्प सँख्या में हैं लेकिन नकली अगुआओं और मसीह-विरोधियों के स्वभाव और साथ ही उनकी विभिन्न दशाएँ और अभिव्यक्तियाँ अलग-अलग हदों तक हर व्यक्ति में मौजूद हैं। अब जब इन मुद्दों पर बहुत विस्तार से संगति की जा चुकी है तो सत्य का अनुसरण करने वाले लोगों के पास सत्य का अनुसरण करने, सत्य का अभ्यास करने, सत्य सिद्धांत समझने और सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने के लिए इसके बाद ज्यादा मार्ग और दिशा और ज्यादा स्पष्ट लक्ष्य होंगे। यह उनके लिए एक अच्छी चीज है और खुशी का कारण है। दूसरे शब्दों में, वे परमेश्वर में अपनी आस्था में एक महत्वपूर्ण घटना की शुरुआत करने जा रहे हैं। अब वे विनियमों, धार्मिक अनुष्ठानों या शब्दों और धर्म-सिद्धांतों और नारों के अधीन नहीं जीते हैं। बल्कि उनके पास अभ्यास के लिए ज्यादा ठोस दिशाएँ और लक्ष्य हैं और अनुसरण करने के लिए यकीनन ज्यादा विशिष्ट सिद्धांत हैं। कुछ विशेष परिस्थितियों में कैसे अभ्यास करना है और संबंधित सत्य सिद्धांत क्या हैं या लोगों की क्या दशाएँ और भ्रष्टताएँ हैं और उनके साथ कैसा व्यवहार किया जाना चाहिए और साथ ही उन्हें हल करने के लिए सत्य की तलाश कैसे करनी है—मसीह-विरोधियों और नकली अगुआओं पर संगति किए गए दो मुख्य विषय ज्यादातर इन्हीं सामग्रियों का जिक्र करते हैं। सत्य का अनुसरण करने वाले लोगों के लिए सत्य की संगति जितनी ज्यादा विशिष्ट रूप से की जाती है, उतना ही ज्यादा उनके पास अभ्यास के लिए एक मार्ग होता है। सत्य की संगति जितनी ज्यादा विशिष्ट रूप से की जाती है, लोगों के दिल उतने ही ज्यादा उज्ज्वल और स्पष्ट हो जाते हैं वे खुद को उतना ही ज्यादा जान और समझ पाते हैं, और उतनी ही ज्यादा वे यह बात जान जाते हैं कि उन्हें आगे किस चीज में प्रवेश करना चाहिए और उन्हें आगे कौन-सी समस्याएँ सुलझाने की जरूरत है। जहाँ तक अभी-अभी श्रमिकों के रूप में जिक्र किए गए लोगों के प्रकार का प्रश्न है, हमने मानवजाति के भ्रष्ट स्वभावों द्वारा उत्पन्न विभिन्न दशाओं और भ्रष्टता की उन विभिन्न समस्याओं के बारे में विस्तार से संगति की जिन्हें हल करने की जरूरत है, उसके बाद भी वे अप्रभावित रहे। अप्रभावित रहने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि वे अब भी परमेश्वर द्वारा बोले गए सत्य और उद्धार के मार्ग का अनुसरण करने के बारे में अस्पष्ट हैं और उसे समझने में असमर्थ हैं। और अधिक गंभीर रूप से, इतनी सारी मूलभूत अभिव्यक्तियों और समस्याओं पर संगति किए जाने के बाद भी वे यही सोचते हैं, “मेरे पास अच्छी मानवता है, मैं सही मायने में परमेश्वर में विश्वास रखता हूँ, मैं परमेश्वर में अपनी आस्था में चीजों का त्याग करने का इच्छुक हूँ और मैं अपना कर्तव्य करने के लिए कीमत चुकाने और कष्ट सहने का इच्छुक हूँ; यह पर्याप्त है।” परिस्थितियों से सामना होने पर वे न तो अपनी जाँच करते हैं और न ही अपनी तुलना परमेश्वर के वचनों से करते हैं, बल्कि वे सिर्फ अपनी मानवीय अच्छाई या उनके पास जो थोड़ा-सा जमीर और विवेक है उसके आधार पर समस्याएँ सुलझाने का प्रयास करते हैं। यकीनन, कुछ लोग संयम और धीरज पर भरोसा करते हैं, बार-बार कष्ट सहते हैं जबकि दूसरे लोग सांसारिक आचरण के फलसफों पर भरोसा करते हैं, बड़े मुद्दों को मामूली समस्याओं की तरह और फिर उन मामूली समस्याओं को कोई समस्या ही नहीं है की तरह दिखाते हैं। वे इस लक्ष्य का अनुसरण करते हैं : “परमेश्वर का कार्य समाप्त होने के दिन तक भी अगर मैं कलीसिया में अपना कर्तव्य करता रहा, मुझे बहिष्कृत या निष्कासित नहीं किया गया तो यही काफी है। मुझे अपने बारे में सच्ची समझ है या नहीं, मेरे भ्रष्ट स्वभाव हल हो चुके हैं या नहीं, मुझमें परमेश्वर के प्रति सच्चा समर्पण है या नहीं, मैं परमेश्वर का भय मानने वाला और बुराई से दूर रहने वाला व्यक्ति हूँ या नहीं—ये मामूली मुद्दे हैं और जिक्र करने योग्य नहीं हैं। तुम लोग हर बात को एक मुद्दा बना देते हो, बहुत विस्तार से सत्य की संगति करते हो, छोटे से छोटे मुद्दों को भी लगातार संगति के लिए उठाते हो, हमेशा हमसे पहचान करवाते हो; मैं सत्य पर इन संगतियों को सुनने का बिल्कुल भी इच्छुक नहीं हूँ, मुझे कोई दिलचस्पी नहीं है। परमेश्वर का दिन आने पर अगर हम बस सीधे राज्य में प्रवेश कर पाएँ तो यह कितना अच्छा होगा!” हालाँकि यह सच है कि हर किसी के धीरज की अपनी सीमाएँ होती हैं लेकिन ऐसे लोगों में असीमित धीरज होता है। क्यों? वह इसलिए क्योंकि वे मानते हैं कि उनमें अच्छी मानवता है, वे सही मायने में परमेश्वर में विश्वास रखते हैं, परमेश्वर में विश्वासियों के रूप में चीजों का त्याग करने की क्षमता रखते हैं और अपना कर्तव्य करने के लिए कीमत चुकाने और कष्ट सहने के इच्छुक रहते हैं; जब उन्हें किसी चीज का सामना करना पड़ता है तो उनके पास अपने समाधान होते हैं और अंत में भी वे दृढ़ता से अपने कर्तव्य करने और अटल रहने में समर्थ होते हैं। लेकिन वे अपने कर्तव्य करने में चाहे कैसे भी दृढ़ रहें या वे किसी भी तरीके से अंत तक कष्ट सहते रहें, उनकी प्रेरणा चाहे जो भी हो, एक बात तो निश्चित है : उनमें परमेश्वर के प्रति सच्चा समर्पण नहीं होता है और वे कभी भी अपना भ्रष्ट स्वभाव नहीं समझते हैं। और ज्यादा सटीक रूप से कहूँ तो ये लोग खुद में भ्रष्टता होने की बात स्वीकार नहीं करते हैं और न ही वे परमेश्वर द्वारा लोगों के उजागर किए गए भ्रष्ट स्वभावों से उत्पन्न होने वाली विभिन्न दशाओं और समस्याओं को स्वीकार करते हैं। अगर वे कभी-कभार खुद को इन दशाओं और समस्याओं के अनुरूप कर भी लेते हैं तो भी वे इसे एक उदासीन दृष्टिकोण से सँभालते हैं, वे कहते हैं, “हर कोई समान रूप से भ्रष्ट है। सभी का प्रकृति सार वही है जो राक्षसों और शैतान का है; हम सभी परमेश्वर के दुश्मन हैं। यह एक ऐसी सच्चाई है जिसे कोई नहीं बदल सकता है। लेकिन अगर व्यक्ति अपना कर्तव्य करने में दृढ़ रहता है तो परमेश्वर यकीनन उन्हें स्वीकृति देगा और जो अंत तक दृढ़ रहेंगे वे विजेता होंगे।” उनके नजरियों से देखा जाए तो वे परमेश्वर में अपने विश्वास में काफी जोशीले हैं लेकिन जब अनुभवजन्य गवाहियाँ साझा करने की बात आती है तो वे चुप्पी साध लेते हैं, एक भी शब्द बोलने में असमर्थ होते हैं। जब सभाओं में सत्य की संगति करने का समय आता है तो उन्हें नींद आने लगती है और वे इसे ग्रहण नहीं कर पाते हैं। अगर तुम उनसे पूछते हो, “तुम हर रोज अपने कर्तव्य में परमेश्वर के वचनों का अनुभव कैसे करते हो?” तो वे कहते हैं, “कलीसिया मुझसे जो कुछ भी करने के लिए कहती है मैं करता हूँ। क्या इसके लिए अनुभव करने की जरूरत है?” ऐसा लगता है कि उन्हें समझ नहीं आ रहा है। अगर तुम उनसे पूछते हो, “क्या तुममें कोई भ्रष्टता उजागर हो रही है? तुम खुद को कैसे समझते हो?” तो वे कहते हैं, “मैं बस परमेश्वर के प्रति समर्पण करता हूँ और परमेश्वर से प्रेम करता हूँ; इसमें क्या समस्याएँ हो सकती हैं?” उनकी सोच इतनी सरल होती है। उनकी यह राय है : “परमेश्वर में विश्वास रखना ऐसा ही होना चाहिए। इतने सारे तुच्छ मुद्दों से परेशान क्यों होना? तुम लोग चीजों को बहुत जटिल बना रहे हो!” इसलिए वे अपना कर्तव्य करते हैं और कार्य पूरे करते हैं, सत्य सिद्धांतों की कभी तलाश नहीं करते हैं बल्कि अच्छे इरादों और उत्साह से कार्य करते हैं। और अधिक सटीक रूप से कहूँ तो, वे जमीर और विवेक के प्रभुत्व के अंतर्गत कार्य करते हैं और सोचते हैं : “मैं पहले ही बहुत हद तक कष्ट सह चुका हूँ और कीमत चुका दी है; मैंने पहले ही काफी हद तक सत्य का अभ्यास कर लिया है और परमेश्वर को संतुष्ट कर दिया है; मुझसे और मत माँगो। मैं जैसा हूँ ठीक हूँ, मैं एक अच्छा व्यक्ति हूँ और मैं सही मायने में परमेश्वर में विश्वास रखता हूँ।” यकीनन ऐसे समय होते हैं जब ये लोग अपनी भड़ास निकालने से खुद को रोक नहीं पाते हैं और तब उनके असली चेहरे उजागर हो जाते हैं। वे कई शब्द और धर्म-सिद्धांत बड़बड़ा सकते हैं लेकिन उनका कोई वास्तविक आध्यात्मिक कद नहीं होता है; दूसरे शब्दों में, उनके पास कोई जीवन नहीं होता है। जीवन नहीं होने का विशिष्ट रूप से क्या अर्थ है? (उनके पास कोई सत्य नहीं होता है।) सत्य नहीं होना कैसे होता है? (वे सत्य से प्रेम नहीं करते हैं और न ही वे उसका अनुसरण करते हैं।) इसका संबंध इस बात से भी नहीं है कि वे सत्य से प्रेम करते हैं या नहीं; सटीक रूप से कहूँ तो वे सत्य स्वीकार नहीं करते हैं। हो सकता है कि कुछ लोग कहें, “तुम ऐसा कैसे कह सकते हो कि वे सत्य स्वीकार नहीं करते हैं? वे अपना कर्तव्य करने के लिए बहुत कष्ट सहते हैं और एक बहुत बड़ी कीमत चुकाते हैं, हर रोज भोर से सांझ तक कड़ी मेहनत करते हैं; तुम कैसे कह सकते हो कि उनके पास कोई सत्य नहीं है?” क्या यह कहना उनके साथ अन्याय करना है? लेकिन अगर तुम इन लोगों को देखो तो उनके कष्ट और कीमत चुकाने के पीछे वे जो कुछ भी करते हैं क्या वह सब कुछ सत्य सिद्धांतों के दायरे में है? क्या वे जो कुछ भी करते हैं उसमें सिद्धांतों की तलाश करते हैं? क्या वे परमेश्वर के सामने परमेश्वर का भय मानने वाले दिल के साथ आते हैं और परमेश्वर के वचनों और परमेश्वर के घर द्वारा अपेक्षित सिद्धांतों के अनुसार चीजें करते हैं? नहीं; यह सब कुछ मानवीय क्रियाकलाप हैं, मानवीय संयम है। सत्य स्वीकार नहीं करने की उनकी मुख्य अभिव्यक्ति क्या है? वह यह है कि कुछ करने से पहले वे कभी भी सक्रिय रूप से सत्य की तलाश नहीं करते हैं और न ही वे कभी गंभीरता से यह विचार करते हैं कि सत्य के सिद्धांत क्या हैं और न ही फिर परमेश्वर के वचनों के अनुसार सख्ती से अभ्यास करते हैं। क्या वे ऐसे विचार और रवैये रखते हैं? परमेश्वर द्वारा मानवजाति के उजागर किए गए भ्रष्ट स्वभाव की विभिन्न अभिव्यक्तियों के प्रति उनका रवैया क्या है? क्या वे ये वचन स्वीकार करते हैं? क्या वे स्वीकार करते हैं कि ये वचन तथ्यात्मक हैं? क्या वे स्वीकार करते हैं कि ये विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ भ्रष्टता के खुलासे हैं? हो सकता है कि वे सहमति में सिर हिला दें या बाहरी तौर पर इसे स्वीकार कर लें लेकिन अपने दिलों में वे इसे स्वीकार नहीं करते हैं; वे इसे नजरअंदाज कर देते हैं। इसे नजरअंदाज करने का क्या अर्थ है? विशिष्ट रूप से इसका अर्थ है स्वीकार नहीं करना, कोई स्पष्ट रवैया नहीं रखना और कोई स्पष्ट प्रतिरोध या विरोध नहीं होना, बल्कि परमेश्वर द्वारा बोले गए इन वचनों के प्रति उदासीन व्यवहार का रवैया अपनाना। “उदासीन व्यवहार” कहना थोड़ा-सा अमूर्त है; विशिष्ट रूप से यह ऐसा है कि वे सोचते हैं, “तुम कहते हो कि लोग घमंडी और धोखेबाज हैं लेकिन धोखेबाज कौन नहीं है? किसमें थोड़ी-सी चालाकी नहीं होती है? कौन थोड़ा-सा घमंड या अकड़ नहीं दिखाता है? इसमें क्या बड़ी बात है? अगर व्यक्ति कष्ट सह सकता है और कीमत चुका सकता है तो यही काफी है।” क्या यह स्वीकार करने से इनकार करने का रवैया और एक विशिष्ट अभिव्यक्ति नहीं है? (हाँ।) यह सत्य स्वीकार न करना है। परमेश्वर के न्याय और उजागर करने के वचनों के प्रति उनका रवैया अवहेलना और स्वीकार करने से इनकार करने का है। इसलिए जब बात उन मूल्यांकनों और चेतावनियों की आती है जो भाई-बहन उन्हें देते हैं और उन संकेतों और सहायता की भी आती है जो भाई-बहन उनके भ्रष्ट स्वभावों को लेकर उन्हें प्रदान करते हैं तो क्या वे ये चीजें स्वीकार कर पाते हैं? (नहीं।) तो फिर मुझे बताओ कि उनकी विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ क्या हैं? वे ये चीजें स्वीकार क्यों नहीं कर पाते हैं? ऐसा कहने के लिए तुम्हारे पास सबूत कहाँ है? मिसाल के तौर पर जब तुम उनसे कहते हो, “तुम इतने असावधान तरीके से अपना कर्तव्य नहीं कर सकते; यह लापरवाह तरीका है” तो उनकी कौन-सी अभिव्यक्तियाँ साबित करती हैं कि वे सत्य स्वीकार नहीं करते हैं? (वे कहेंगे, “मैंने पहले ही इसमें अपना दिल लगा दिया है। मैं पहले ही कष्ट सह चुका हूँ और मैंने पहले ही कीमत चुका दी है। तुम कैसे कह सकते हो कि मैं लापरवाह हो रहा हूँ?”) यह उनका खुद को सही ठहराना है। क्या वे कभी-कभी बहाने ढूँढ़ते हैं? अगर वे अपने दिल में मान भी लें तो भी वे यही सोचते हैं, “मैं लापरवाह था, तो क्या हुआ? ऐसा कौन है जिसके दिन खराब नहीं जाते हैं? कौन सामान्य भावनाओं का अनुभव नहीं करता है? लेकिन मैं लापरवाह होने की बात मान नहीं सकता; मुझे इसे छिपाने के लिए कोई बहाना ढूँढ़ना होगा। मैं शर्मिंदा नहीं हो सकता।” इस तरह, वे कुतर्क देकर अपना बचाव करने के लिए कई कारण और बहाने ढूँढ़ लेते हैं, इस सच्चाई को नहीं मानते हैं कि वे लापरवाह हो रहे थे, इस संबंध में अपने खुद के मुद्दे स्वीकार नहीं करते हैं और न ही दूसरे लोगों की सलाह स्वीकार करते हैं। यह सत्य स्वीकार नहीं करने की एक विशिष्ट अभिव्यक्ति है। जब उन्हें वास्तविक परिस्थितियों का सामना नहीं करना पड़ता है तो वे अपने बारे में यह मानते हैं कि वे “एक अच्छे व्यक्ति हैं जो सही मायने में परमेश्वर में विश्वास रखता है।” जब उन्हें परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है तो वैसे तो अब वे इसका उपयोग ढाल के रूप में नहीं कर पाते हैं, लेकिन फिर भी वे खुद को सही ठहराने और अपना बचाव करने, मुद्दा छिपाने, इसे समाप्त करने और फिर खुद को “अच्छी मानवता वाला अच्छा व्यक्ति जो सही मायने में परमेश्वर में विश्वास रखता है और जिसमें त्याग करने की क्षमता है और अपना कर्तव्य निभाने के लिए कष्ट सहने और कीमत चुकाने की क्षमता है” के रूप में देखना जारी रखते हैं। निश्चित रूप से कहा जाए तो ऐसे लोगों की अभिव्यक्तियाँ, उनका सार श्रमिकों वाला है। यह समूह कलीसिया में एक महत्वपूर्ण अनुपात रखता है। अनुपात चाहे जो भी हो, अंत में अगर ये व्यक्ति सही मायने में कष्ट सह सकते हैं और कीमत चुका सकते हैं और कोई बड़ा अपराध किए बिना परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन किए बिना या उसके स्वभाव को नाराज किए बिना अंत तक सह सकते हैं और डटे रह सकते हैं तो वे वफादार श्रमिक हैं, ऐसे श्रमिक हैं जो बने रह सकते हैं। यह एक बड़ा आशीष है! वे सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं और न ही वे परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चल पाते हैं, परमेश्वर की गवाही दे पाते हैं या परमेश्वर के वचनों और कार्य के गवाह के रूप में कार्य कर पाते हैं—यह आशीष प्राप्त करना पहले ही काफी अच्छा है। सत्य का अनुसरण किए बिना कोई क्या प्राप्त करने की उम्मीद कर सकता है? एक वफादार श्रमिक होना पहले से ही बुरा नहीं है। कुछ लोग पूछते हैं, “क्या इन व्यक्तियों के लिए परमेश्वर के लोग बनना संभव है?” संभव है। एकमात्र संभावना यह है कि अगर ये व्यक्ति त्याग करने और कष्ट सहने में समर्थ होने के आधार पर सत्य स्वीकार कर पाते हैं, अपनी भ्रष्टता स्वीकार कर पाते हैं और उसका सही तरह से सामना कर पाते हैं और फिर उसे हल करने के लिए सत्य की तलाश कर पाते हैं, मानवीय अच्छाई या मानवीय संयम, सहनशीलता और दृढ़ता के आधार पर कार्य नहीं करते हैं बल्कि सत्य सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करते हैं ताकि अंत में उनके स्वभाव में कुछ बदलाव आ सकें तो फिर उनके पास परमेश्वर के लोग बनने का कुछ मौका है। लेकिन अगर उनके क्रियाकलाप और व्यवहार स्वभावगत बदलाव से संबंधित नहीं हैं, सत्य स्वीकार करने और बचाए जाने से संबंधित नहीं हैं तो उनकी परमेश्वर के लोग बनने की संभावना शून्य है; यह एक सच्चाई है। वफादार श्रमिकों के साथ व्यवहार करने का सिद्धांत क्या है? यह इन लोगों को स्पष्ट सोच वाले लोग बनने में मदद करने के लिए सबसे बड़ा प्रयास करना है। उन्हें स्पष्ट सोच वाला बनाने का उद्देश्य क्या है? उन्हें ख्याली पुलाव पकाने से रोकना। कुछ लोग पूछ सकते हैं, “‘ख्याली पुलाव पकाना’ का क्या अर्थ है?” इसका अर्थ है जब लोग खुद को “अच्छी मानवता वाला, परमेश्वर में सही मायने में विश्वास रखने वाला और त्याग करने की क्षमता और कीमत चुकाने की इच्छा रखने वाला” मानते हैं और फिर परमेश्वर द्वारा बचाए जाने की उम्मीद करते हैं जो कि असंभव है। उन्हें यह स्पष्ट कर दिया जाना चाहिए कि यह नजरिया रखना कि “अच्छी मानवता वाला, परमेश्वर में सही मायने में विश्वास रखने वाला और त्याग करने की क्षमता और कीमत चुकाने की इच्छा रखने वाला होने से परमेश्वर का उद्धार प्राप्त किया जा सकता है” गलत और बेवकूफी भरा नजरिया है। उन्हें यह स्पष्ट कर दिया जाना चाहिए कि इन गुणों के होने का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति ने अपना भ्रष्ट स्वभाव छोड़ दिया है और न ही थोड़े से अच्छे व्यवहार का अर्थ यह है कि व्यक्ति को बचाया जा सकता है और यह अर्थ तो बिल्कुल भी नहीं है कि उसने सत्य प्राप्त कर लिया है और उन्हें यह स्पष्ट कर दिया जाना चाहिए कि उनके नजरिये बेतुके, बेहुदे और असंगत हैं और परमेश्वर द्वारा व्यक्त सत्य के साथ पूरी तरह से बेमेल हैं। ये लोग जो हठपूर्वक धार्मिक धारणाओं को पकड़े रहते हैं इनकी मदद की जानी चाहिए; उन्हें परमेश्वर के वचन पढ़कर सुनाओ और उनके साथ सत्य पर संगति करो। अगर अब भी वे सत्य स्वीकार नहीं कर पाते हैं और तुम सत्य पर संगति चाहे कैसे भी करो, वे अशिक्षित ही बने रहते हैं और खोजने का कोई इरादा नहीं दिखाते हैं तो उन्हें मजबूर करने की कोई जरूरत नहीं है। वे अंत तक सिर्फ श्रमिकों के रूप में सेवा कर सकते हैं।

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