विषय-वस्तु

कैसे ढूंढें परमेश्वर के नक़्शे-कदम

ढूंढ रहे हैं चूंकि हम, परमेश्वर के नक़्शे-कदम,

परमेश्वर की क्या इच्छा है, ढूंढ कर ही रहेंगे हम,

ढूंढ कर रहेंगे हम उसके वचन और कथन।

क्योंकि जहां प्रभु के नये वचन हैं,

वहां प्रभु की वाणी है,

जहां प्रभु के नक़्शे-कदम हैं,

वहां प्रभु के काम हैं।

जहां प्रभु की अभिव्यक्ति है,

वहां प्रभु का अवतरण है,

और जहां प्रभु का अवतरण है,

वहां सत्य, मार्ग और जीवन है।

परमेश्वर के नक़्शे-कदम जब ढूंढ रहे थे,

तुमने इन वचनों को नज़रंदाज़ किया:

“प्रभु सत्य है, प्रभु मार्ग है, और प्रभु ही जीवन है।”

लोगों को जब सत्य कभी मिल जाता है,

नक़्शे-कदम पा लिये प्रभु के, यकीं नहीं हो पाता है।

नक़्शे-कदम पा लिये प्रभु के,

प्रभु अवतरण तो बिल्कुल, स्वीकार नहीं हो पाता है।

भूल बड़ी गम्भीर है! भूल बड़ी गम्भीर है!

प्रभु अवतरण लोगों के मत के, अनुकूल नहीं हो सकता है,

प्रभु अवतरण लोगों की फ़रियाद पर, कभी नहीं हो सकता है।

काम प्रभु जब करता है,

तो चयन स्वयं ही करता है, और अपनी ही योजना पर चलता है।

अपना ही मकसद है उसका, अपना ही तरीका होता है।

काम प्रभु जब करता है, ना इंसां से चर्चा करता है,

ना राय उसकी लेता है, ना ख़बर किसी को करता है।

हर कोई इसको जान ले, है स्वभाव यही परमेश्वर का।

परमेश्वर के अवतरण को, अगर देखना चाहो तुम,

परमेश्वर के पदचिन्हों का, गर अनुसरण करना चाहो तुम,

तो पहले अपने मत का त्याग करो।

तो पहले अपने मत का त्याग करो।

प्रभु ये कर दो, प्रभु वो कर दो, मत ऐसी कोई मांग करो,

बांधो मत अपनी सीमा में बिल्कुल उसको,

उलझाओ मत उसको अपनी धारणाओं में।

बल्कि ये पूछो, प्रभु के पदचिन्हों को कैसे खोजना चाहिये।

प्रभु अवतरण को कैसे, ग्रहण करना चाहिये,

प्रभु के नए काम को कैसे, मान लेना चाहिये;

ये हैं वो सब काम जो मानव को करने चाहिये।

ये हैं वो सब काम जो मानव को करने चाहिये।

चूंकि अन्य कोई भी सत्य नहीं है,

और किसी में सत्य नहीं है,

मानव को खोजना, स्वीकारना और मान लेना चाहिये।

मानव को खोजना, स्वीकारना चाहिए।

ढूंढ रहे हैं चूंकि हम, परमेश्वर के नक़्शे-कदम,

परमेश्वर की क्या इच्छा है।

और जहां प्रभु का अवतरण है,

वहां सत्य, मार्ग और जीवन है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से