सत्य का अनुसरण कैसे करें (1) भाग एक
सत्य का अनुसरण करने का पहला अभ्यास : त्याग देना
हमने काफी लंबे समय तक इस विषय पर संगति की है कि सत्य का अनुसरण कैसे करें और हमने जिन चीजों पर संगति की है उन सभी में सत्य का अनुसरण करने के तरीके के संबंध में अभ्यास का एक पहलू शामिल है : त्याग देना। यानी, हमारी संगति की सारी विषय-वस्तु उन चीजों के बारे में रही है जिन्हें लोगों को परमेश्वर में विश्वास रखने और सत्य का अनुसरण करने की प्रक्रिया में त्याग देना चाहिए, जो ऐसी चीजें भी हैं जिन्हें लोगों को अपने जीवन में और उस जीवन पथ पर त्याग देना चाहिए जिस पर वे चलते हैं। ये वास्तव में कुछ ऐसी चीजें हैं जो लोगों के सत्य के अनुसरण को प्रभावित करती हैं। तो त्याग देने पर हमारी विषय-वस्तु की पहली मद क्या थी? (लोगों की विभिन्न नकारात्मक भावनाओं को त्याग देना।) और दूसरी मद क्या थी? (लोगों के अनुसरणों, आकांक्षाओं और इच्छाओं को त्याग देना।) त्याग देने पर हमारी विषय-वस्तु की पहली मद विभिन्न नकारात्मक भावनाओं को त्याग देना थी और दूसरी मद लोगों के अनुसरणों, आकांक्षाओं और इच्छाओं को त्याग देना थी। हर मद में बहुत सारे उप-विषय और विवरण शामिल थे, है ना? (हाँ।) इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हम किस विषय पर संगति कर रहे थे या इस विषय-वस्तु में कौन-सी श्रेणियाँ और मदें थीं और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कितनी सारी मिसालें दी गईं या कितनी सारी दशाएँ और समस्याओं के कितने सार उजागर किए गए, संक्षेप में, हमने जिन तमाम विषय-वस्तु पर संगति की, वे उन विभिन्न समस्याओं से संबंधित हैं जिनका सामना लोग परमेश्वर में विश्वास रखने और सत्य का अनुसरण करने की प्रक्रिया में या अपने वास्तविक जीवन में करते हैं, साथ ही, इन समस्याओं का सामना करने पर लोगों को अभ्यास के जो मार्ग चुनने चाहिए और जिन सत्य सिद्धांतों का उन्हें पालन करना चाहिए, उनका भी उसमें जिक्र किया गया। इन समस्याओं से जुड़े विभिन्न पहलू खोखले नहीं हैं और ये सिर्फ लोगों के विचारों या आध्यात्मिक दुनियाओं में मौजूद नहीं होते हैं। बल्कि वे लोगों के वास्तविक जीवन में मौजूद होते हैं। इसलिए अगर तुम सत्य का अनुसरण करने को तैयार हो, तो चाहे तुम किसी भी तरह की समस्या का सामना क्यों न करो, मुझे उम्मीद है कि तुम सत्य की तलाश कर सकोगे और अपने आधार के रूप में लेने के लिए संगत सत्य सिद्धांत ढूँढ सकोगे, अभ्यास का मार्ग खोज सकोगे और इस प्रकार जब भी तुम इन समस्याओं का सामना करोगे, तुम्हारे पास अनुसरण करने का एक मार्ग होगा। यह इन तमाम विषय-वस्तु पर संगति करने का मूलभूत उद्देश्य है। हालाँकि हम इन सभी सत्यों पर संगति करना समाप्त कर चुके हैं, लेकिन लोगों को इन सत्य वास्तविकताओं में प्रवेश करने में कुछ समय लगेगा। लोगों को इन सत्यों पर संगति करने से शुरुआत करनी चाहिए और उन्हें विभिन्न सत्य सिद्धांतों को अपने आधार के रूप में लेना चाहिए और साथ ही, सभी प्रकार की चीजों के प्रति अपने दृष्टिकोणों और अपने जीवन के प्रति रवैयों और अस्तित्व के साधनों को बदलना चाहिए। इस तरह, लोग परमेश्वर में विश्वास रखने या जीने और अस्तित्व में रहने की प्रक्रिया में इन सत्य सिद्धांतों को स्वीकार करके, बिना इसे महसूस किए, पहले से मौजूद, पुराने और शैतान से निकले अपने विभिन्न भ्रामक विचारों, दृष्टिकोणों या रवैयों और अस्तित्व में रहने के साधनों को बदलने में सफल होंगे और वे अपने भ्रष्ट स्वभावों को छोड़ने में सफल होंगे। इसलिए, ये शब्द जिन पर हमने पहले संगति की थी और वे शब्द जिन पर हम भविष्य में संगति करेंगे, किसी तरह का ज्ञान या किसी तरह का पांडित्य नहीं हैं और वे यकीनन कोई सिद्धांत नहीं हैं। बल्कि उनका उपयोग दैनिक जीवन में लोगों को आने वाली विभिन्न समस्याओं और कठिनाइयों को हल करने में उनका मार्गदर्शन करने, उन्हें निर्देशन देने और उनकी मदद करने के लिए किया जाता है। जब भी तुम्हारे सामने कोई समस्या आती है या जब भी तुम्हारा सामना किसी परिस्थिति, व्यक्ति, घटना या चीज से होता है, तो तुम हमारी संगति की विषय-वस्तु में उन सत्य कसौटियों को तलाश कर सकते हो जिनका तुम्हें पालन करना चाहिए और जिन्हें तुम्हें अभ्यास में लाना चाहिए ताकि तुम अपने भ्रष्ट स्वभावों और अपने पुराने, गलत दृष्टिकोणों के अनुसार अभ्यास करने के बजाय सत्य को अपने आधार और कसौटी के रूप में लेकर कार्य कर सको। लोगों के परमेश्वर में विश्वास रखने का उद्देश्य सत्य का अनुसरण करना होता है, लेकिन सत्य का अनुसरण करने का उद्देश्य लोगों के खाली जीवन को भरना या उनके खाली जीवन को बदलना या उनकी आध्यात्मिक दुनियाओं को समृद्ध करना नहीं है। सत्य का अनुसरण करने का उद्देश्य क्या है? लोगों के लिए यह उद्देश्य बचाए जाने के लिए अपने भ्रष्ट स्वभावों को छोड़ देना है; यकीनन, अपने भ्रष्ट स्वभावों को छोड़ देना परमेश्वर के प्रति समर्पण करने और परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के लिए भी है। लेकिन परमेश्वर के लिए लोगों द्वारा सत्य का अनुसरण करने के उद्देश्य और महत्व इतने साधारण नहीं हैं; यह सिर्फ किसी के बचाए जाने के बारे में नहीं है। बल्कि यह परमेश्वर द्वारा ऐसे व्यक्ति को प्राप्त करने के बारे में है जो अब शैतान के भ्रष्ट स्वभावों से बेवकूफ नहीं बनता है और यकीनन, यह इस प्रकार के व्यक्ति को प्राप्त करने के बारे में भी है जो परमेश्वर के साथ संगत हो सकता है; इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह परमेश्वर द्वारा सृजित मानवजाति में से ऐसे व्यक्ति को प्राप्त करने में समर्थ होने के बारे में है जिसे वह चाहता है, जो सभी चीजों का प्रबंधन कर सकता है और सभी चीजों के साथ हमेशा के लिए मौजूद रह सकता है। यह महत्व बस बचाए जाने जितना सरल नहीं है, जैसा कि यह लोगों के लिए है। इसलिए, चाहे यह लोगों के लिए हो या परमेश्वर के लिए, सत्य का अनुसरण करना बहुत महत्वपूर्ण है। चूँकि यह इतना महत्वपूर्ण है, इसलिए सत्य का अनुसरण करने के संबंध में अभ्यास के एक पहलू—यानी “त्याग देना”—की विषय-वस्तु हर उस व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण है जो उद्धार प्राप्ति का अनुसरण करना चाहता है। चूँकि “त्याग देने” का अभ्यास इतना महत्वपूर्ण है, इसलिए “त्याग देने” से संबंधित विभिन्न सत्य सिद्धांत और विभिन्न दशाएँ, भ्रष्ट स्वभावों के खुलासे और “त्याग देने” के अभ्यास से संबंधित भ्रष्ट विचार और दृष्टिकोण जिन्हें उजागर किया जा चुका है ऐसी चीजें हैं जिन्हें लोगों को अच्छी तरह से समझना चाहिए। जब लोग रोजमर्रा के जीवन में अक्सर प्रकट किए जाने वाले भ्रामक विचारों और दृष्टिकोणों और साथ ही, अपने भ्रष्ट स्वभावों और भ्रष्टता के खुलासों की जाँच करते हैं और उन्हें समझ लेते हैं और इस तरह से खुद को जानने लगते हैं और सत्य के एक पहलू को समझ और स्वीकार लेते हैं और फिर संगत सत्य सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करते हैं, सिर्फ तभी वे सत्य का अनुसरण करने का उद्देश्य हासिल करेंगे। हम इस समय मूल रूप से सत्य का अनुसरण कैसे करें के अंतर्गत “त्याग देने” की दो प्रमुख मदों पर अपनी संगति की समाप्ति पर आ गए हैं। पहली मद क्या थी? लोगों की विभिन्न नकारात्मक भावनाओं को त्याग देना। दूसरी मद क्या थी? लोगों के अनुसरणों, आकांक्षाओं और इच्छाओं को त्याग देना। हालाँकि हमने इन दो मदों पर अपनी संगति में बहुत सारी विषय-वस्तु पर चर्चा कर ली है, लेकिन ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि तुम्हें इन विषयों से जुड़े हर विशिष्ट सत्य सिद्धांत को समझने की जरूरत है। जब लोग सत्य सिद्धांतों को समझते हैं, सिर्फ तभी वे अपने रोजमर्रा के जीवन में और अपने जीवन मार्ग पर इन सत्य सिद्धांतों के अनुसार आचरण और कार्य कर सकते हैं, धीरे-धीरे सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर सकते हैं और सत्य का अनुसरण करने की प्रक्रिया में धीरे-धीरे सत्य समझने और उसे प्राप्त करने के नतीजे हासिल कर सकते हैं।
अपने और परमेश्वर के बीच की बाधाओं और परमेश्वर के प्रति अपनी शत्रुता को त्याग देना
इससे पहले हमने सत्य का अनुसरण कैसे करें के अंतर्गत “त्याग देने” का अभ्यास करने के जिन दो मदों पर संगति की, वे लोगों के भ्रष्ट स्वभावों, उनके विभिन्न विचारों और दृष्टिकोणों, और उनके रोजमर्रा के जीवन में सामने आने वाली विभिन्न समस्याओं से संबंधित हैं। लेकिन “त्याग देने” में एक और ज्यादा महत्वपूर्ण या यह कह सकते हैं कि एक उससे भी बड़ी मद है जिस पर हमें वाकई संगति करनी चाहिए। वह मद क्या है? यह परमेश्वर के प्रति लोगों के रवैये, परमेश्वर के संबंध में उनके विचारों और दृष्टिकोणों और अभ्यास के उन सिद्धांतों से जुड़ी हुई है जिनके द्वारा वे अपने रोजमर्रा के जीवन में परमेश्वर के साथ व्यवहार करते हैं। कह सकते हैं कि यह मद पहले दो मदों से थोड़ी ज्यादा महत्वपूर्ण है। क्योंकि यह मद सीधे परमेश्वर के प्रति लोगों के रवैये, परमेश्वर के संबंध में उनके विचारों और दृष्टिकोणों, और लोगों और परमेश्वर के बीच रिश्ते से संबंधित है, इसलिए यह वह अंतिम मद है जिसके बारे में हम “त्याग देने” की इस मद के तहत बात करेंगे और यकीनन यह सबसे महत्वपूर्ण मद भी है। हमने पहले जिन दो मदों पर चर्चा की उनमें से कुछ विषय परमेश्वर के बारे में लोगों के विशेष रवैयों और दृष्टिकोणों से संबंधित हैं या लोगों और परमेश्वर के बीच रिश्ते से संबंधित हैं, लेकिन हमने अपनी संगति में जो नजरिया अपनाया, उसके लिहाज से हमने मूल रूप से लोगों की विभिन्न समस्याओं का मानवीय नजरिये से गहन-विश्लेषण किया—हमने लोगों की अलग-अलग प्रकार की समस्याओं के संदर्भ में उनके विभिन्न भ्रष्ट स्वभावों या भ्रामक विचारों और दृष्टिकोणों का गहन-विश्लेषण किया। आज हम जिस विषय पर संगति करने जा रहे हैं, वह परमेश्वर के प्रति लोगों के रवैयों और परमेश्वर के संबंध में उनके विचारों और दृष्टिकोणों से संबंधित है। ये सबसे महत्वपूर्ण चीजें हैं जिन्हें लोगों को सत्य का अनुसरण करने की प्रक्रिया में त्याग देना चाहिए। यह मद भी इतनी सरल नहीं है, क्योंकि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे कौन हैं या वे किस प्रकार के व्यक्ति हैं, किसी का भी परमेश्वर के प्रति सिर्फ एक तरह का रवैया या परमेश्वर के बारे में सिर्फ एक तरह का विचार और दृष्टिकोण नहीं होता है और यकीनन, लोगों और परमेश्वर के बीच का रिश्ता सिर्फ एक तरह का रिश्ता नहीं होता है और इसमें सिर्फ एक तरह की मानवीय स्थिति ही शामिल नहीं होती है। परमेश्वर के प्रति लोगों के विभिन्न रवैयों के कारण और परमेश्वर की पहचान, रुतबे और छवि के प्रति लोगों के विभिन्न विचारों और दृष्टिकोणों के कारण और दूसरे कारणों से भी, लोगों और परमेश्वर के बीच विभिन्न प्रकार के संबंध बनते हैं। इसलिए आज हम इसी मद पर संगति करेंगे और देखेंगे कि लोगों और परमेश्वर के बीच अब भी कौन-सी गंभीर समस्याएँ या असमाधेय टकराव मौजूद हैं और लोगों को वास्तव में और क्या त्याग देने की जरूरत है। अगर तुम सत्य का अनुसरण करने वाले व्यक्ति हो, तो इसे समझ लेने के बाद परमेश्वर के साथ तुम्हारा रिश्ता बेहतर हो जाएगा और परमेश्वर के बारे में तुम्हारा दृष्टिकोण धीरे-धीरे सही, सकारात्मक या सत्य के साथ संगत होने के करीब आ जाएगा। त्याग देने की विषय-वस्तु की तीसरी मद अपने और परमेश्वर के बीच की बाधाओं और परमेश्वर के प्रति अपनी शत्रुता को त्याग देना होनी चाहिए—यह उन चीजों की तीसरी मद है जो लोगों को त्याग देनी चाहिए। इससे पहले कि हम इस विषय पर औपचारिक रूप से संगति करें, चलो पहले संक्षेप में इस पर चर्चा करें कि रोजमर्रा के जीवन की कौन-सी समस्याएँ लोगों और परमेश्वर के बीच की बाधाओं और परमेश्वर के प्रति लोगों की शत्रुता से जुड़ी हैं। खुद लोगों से संबंधित कुछ व्यक्तिपरक मुद्दों के अलावा, क्या लोगों के परमेश्वर में विश्वास रखने और सत्य का अनुसरण करने की प्रक्रिया में उनके परमेश्वर के साथ व्यवहार करने के तरीके को लेकर कई तरह की समस्याएँ नहीं हैं? विभिन्न घटनाओं और चीजों के साथ पेश आने के तरीके को लेकर लोगों में सभी तरह के भ्रामक विचार, दृष्टिकोण और अभ्यास के गलत सिद्धांत हैं और इसी तरह, परमेश्वर के साथ पेश आने के तरीके को लेकर उनमें सभी तरह के भ्रामक विचार, दृष्टिकोण और अभ्यास के गलत सिद्धांत हैं। अगर तुम सभी प्रकार के लोगों, घटनाओं और चीजों के साथ सत्य सिद्धांतों के आधार पर पेश आने और अभ्यास करने में समर्थ हो—यानी अगर तुम सभी प्रकार के लोगों, घटनाओं और चीजों के बारे में अपने भ्रामक विचार और दृष्टिकोण जान लेते हो और साथ ही, इन भ्रामक विचारों और दृष्टिकोणों को सुधारते हो और त्याग देते हो, और फिर परमेश्वर द्वारा लोगों को बताए गए सही विचारों और दृष्टिकोणों के अनुसार विभिन्न समस्याओं का सामना करते हो और उन्हें हल करते हो—तो सभी प्रकार के लोगों, घटनाओं और चीजों के साथ तुम्हारे पेश आने के अभ्यास के सिद्धांत सत्य सिद्धांतों के अपेक्षाकृत अनुरूप होंगे। क्या इसे इस बात का संकेत माना जा सकता है कि किसी को बचाया गया है? अभी इसे देखते हुए, नहीं, ऐसा नहीं माना जा सकता। अगर मैंने आज की संगति की विषय-वस्तु नहीं उठाई होती, तो लोग सोच सकते थे, “जब सभी प्रकार की चीजों की बात आती है, तो मैं उन्हें परमेश्वर के वचनों में सत्य सिद्धांतों के अनुसार देखने और अभ्यास करने में समर्थ हूँ, इसलिए मुझे लगता है कि मैं एक ऐसा व्यक्ति हूँ जो सत्य का अनुसरण करता है, एक ऐसा व्यक्ति हूँ जिसने सत्य के अनुसरण में परिणाम प्राप्त किए हैं और एक ऐसा व्यक्ति हूँ जिसे बचाया गया है।” आज मैंने जो विषय उठाया है—परमेश्वर के प्रति लोगों के विभिन्न रवैये—उसके आधार पर देखा जाए, तो क्या उनका यह विचार तथ्यों के अनुरूप है? (नहीं।) यह स्पष्ट रूप से तथ्यों के अनुरूप नहीं है। भले ही इस बारे में तुम्हारा एक विशिष्ट आधार और एक विशिष्ट सकारात्मक रवैया हो कि तुम सभी प्रकार के लोगों, घटनाओं और चीजों के साथ कैसे पेश आते हो, लेकिन फिर भी तुम्हारे और परमेश्वर के बीच सभी प्रकार की बाधाएँ हैं और जब विभिन्न मुद्दों की बात आती है, तो परमेश्वर के प्रति तुम्हारा रवैया अब भी शत्रुतापूर्ण है। यह समस्या गंभीर है और सभी समस्याओं में से यह सबसे बड़ी समस्या है। जिस अवधि में तुम परमेश्वर का अनुसरण करते रहे हो और अपना कर्तव्य करते रहे हो, उस दौरान सभी पहलुओं में तुम्हारा निर्वहन दूसरों को काफी अच्छा लगता है और बाहरी तौर पर सत्य और सिद्धांतों के अनुरूप दिखाई देता है। लेकिन तुम्हारे दिल में परमेश्वर के बारे में बहुत-सी धारणाएँ हैं और तुम्हारे और परमेश्वर के बीच बाधाएँ हैं और जब भी तुम्हें बहुत-सी समस्याओं का सामना करना पड़ता है, तो अब भी तुम परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण रवैया रखते हो। ये मुद्दे बहुत गंभीर हैं। अगर ये मुद्दे तुम्हारे दिल में मौजूद हैं तो इससे यह साबित नहीं होता है कि तुम एक बचाए गए व्यक्ति हो। चूँकि अब भी तुम्हारे और परमेश्वर के बीच बहुत-सी बाधाएँ हैं और जब मुख्य, बड़े मुद्दों की बात आती है तो तुम अब भी परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण रवैया रखते हो, अतः न सिर्फ तुम बचाए गए व्यक्ति नहीं हो, बल्कि तुम खतरे में भी हो। अगर तुम यह मानते भी हो कि जब तुम्हारे जीवन में ढेरों समस्याएँ आती हैं तो तुम सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने में समर्थ होते हो और तुम्हारे क्रियाकलाप सत्य के साथ अपेक्षाकृत संगत होते हैं, तो भी यह कहा जा सकता है कि यह सिर्फ एक बाहरी दिखावा है और यह इस बात को साबित नहीं कर सकता है कि तुम्हे बचा लिया गया है। वह इसलिए क्योंकि तुमने परमेश्वर के साथ अपने रिश्ते में अनुरूपता प्राप्त नहीं की है और तुम अब भी परमेश्वर के प्रति समर्पण नहीं करते हो या उसका भय नहीं मानते हो। इसलिए, जब भी तुम्हारे साथ विभिन्न चीजें घटित होती हैं, तो तुम्हारा बाहरी व्यवहार या तुम्हारे विचार और दृष्टिकोण सिर्फ यह दिखा पाते हैं कि तुमने सत्य सिद्धांतों का पालन करने के बजाय उन धर्म-सिद्धांतों, नारों और विनियमों का पालन किया है जिन्हें तुम इन मामलों में सही मानते हो। भले ही यहाँ यह कुछ हद तक अनुमिति का संबंध हो और भले ही यह जटिल हो, लेकिन जब हम अपने और परमेश्वर के बीच की बाधाओं और परमेश्वर के प्रति शत्रुता को त्याग देने की विशिष्ट विषय-वस्तु पर संगति कर लेंगे और लोग सावधानीपूर्वक जाँच में लग चुके होंगे, तो वे मेरे वचनों का अर्थ समझ जाएँगे।
इससे पहले कि हम अपने और परमेश्वर के बीच बाधाओं और परमेश्वर के प्रति शत्रुता को त्याग देने के विषय पर औपचारिक रूप से संगति करें, चलो पहले इस पर चर्चा करें कि लोगों और परमेश्वर के बीच क्या बाधाएँ मौजूद हैं। लोगों और परमेश्वर के बीच क्या बाधाएँ हैं और परमेश्वर के प्रति क्या शत्रुता है जिसका तुम अपने रोजमर्रा के जीवन में आभास कर पाते हो और जिसके बारे में जानते हो या जो दूसरे लोगों में होती हैं? ये अभिव्यक्तियाँ यकीनन मौजूद हैं। वे हर रोज लोगों के आसपास होती हैं और वे हर रोज तुम्हारे साथ होती हैं, इसलिए तुम्हें सोचने में बहुत ज्यादा ऊर्जा खपाने की जरूरत नहीं है—जब तुम अपना मुँह खोलोगे तो इन समस्याओं की एक सूची तुरंत बाहर आ जाएगी। क्या यही बात नही है? (हाँ।) लोगों और परमेश्वर के बीच वास्तव में क्या बाधाएँ हैं? आओ सबसे पहले इस बारे में बात करें कि “बाधा” शब्द में क्या शामिल है। इसमें टकराव, अवज्ञा, धारणाएँ, गलतफहमियाँ और इसी तरह की दूसरी चीजें शामिल हैं, है ना? मुझे और बताओ। (जब किसी व्यक्ति को उसका कर्तव्य करते समय बेनकाब किया जाता है या उसकी काट-छाँट की जाती है, तो उसे परमेश्वर के बारे में कुछ गलतफहमियाँ हो सकती हैं और वह परमेश्वर के प्रति सतर्क हो सकता है, यह सोच सकता है कि वह जितना ज्यादा महत्वपूर्ण कर्तव्य करेगा, उतनी ही तेजी से वह बेनकाब किया जाएगा। इसलिए, उसके दिल में उसके और परमेश्वर के बीच कुछ बाधाएँ होंगी और वह शुद्ध और खुले दिल से कुछ कर्तव्य और आदेश स्वीकार नहीं कर पाएगा।) यहाँ क्या बाधा है? (सतर्कता और गलतफहमियाँ।) सतर्कता और गलतफहमियाँ। यह एक प्रकार की बाधा है। और कौन इसमें जोड़ सकता है? क्या तुममें से बाकी लोगों और परमेश्वर के बीच कोई बाधा नहीं है? क्या तुम्हारे दिल स्वच्छ और पवित्र हो चुके हैं? क्या तुम्हारे मन में परमेश्वर के बारे में कभी कोई नकारात्मक विचार नहीं आया है? (परमेश्वर, मैं इसमें कुछ जोड़ सकता हूँ। जब भी उन हालातों में चीजें सुचारू रूप से चल रही होती हैं जिनकी परमेश्वर मेरे लिए योजना बनाता है, तो मेरे और परमेश्वर के बीच रिश्ता अपेक्षाकृत सामान्य लगता है। लेकिन अगर कभी मुझे किसी मुसीबत या किसी ऐसी चीज का सामना करना पड़ता है जो मेरी धारणाओं के अनुरूप नहीं होती है, तो मैं इस बारे में अटकलें लगाना शुरू कर देता हूँ कि परमेश्वर क्या करेगा और आगे मेरे साथ क्या घटित होगा और इसका परिणाम क्या होगा। मैं बहुत सोच-विचार करता हूँ और यहाँ तक कि मैं शिकायतें भी करता हूँ और अपने मन में परमेश्वर की आलोचना करता हूँ और उसे गलत समझता हूँ और तब मेरा दिल बंद हो जाता है। मैं एक ऐसी चीज के बारे में भी बात करना चाहता हूँ जो मैंने देखी है। कुछ लोग जब अप्रिय परिस्थितियों का सामना करते हैं, तो वे अपने दिलों में प्रतिरोध महसूस करते हैं और कहते हैं, “परमेश्वर मुझे इन परिस्थितियों में क्यों डाल रहा है? ये दूसरे लोगों पर क्यों नहीं आई?” वे उन परिस्थितियों के आगे समर्पण नहीं कर पाते हैं जिनका इंतजाम परमेश्वर उनके लिए करता है और उनके और परमेश्वर के बीच टकराव उत्पन्न हो जाता है।) तुमने जिस मुद्दे का जिक्र सबसे पहले किया वह यह था कि लोगों और परमेश्वर के बीच बाधाएँ हैं, कुछ परिस्थितियों के प्रति एक अनुकूलित प्रतिक्रिया के रूप में लोग अपने और परमेश्वर के बीच बाधाएँ, परमेश्वर के प्रति सतर्कता और परमेश्वर के बारे में गलतफहमियाँ उत्पन्न कर लेते हैं। तुमने जिस दूसरे मुद्दे की बात की वह यह था कि लोग परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण हो जाते हैं क्योंकि वे आंतरिक रूप से अवज्ञापूर्ण होते हैं। कौन इसमें कुछ और जोड़ सकता है? (जब भी ऊपरवाला मेरी काट-छाँट करता है और मेरी खराब काबिलियत बेनकाब हो जाती है, तो मैं खुद पर ही फैसले देती हूँ और सोचती हूँ कि मुझे बचाया नहीं जा सकता और मेरे पास सत्य का अनुसरण करने की कोई प्रेरणा नहीं होती है, हालाँकि मैं यह करना चाहती हूँ। यह परमेश्वर के बारे में एक तरह की गलतफहमी है। इसके अलावा, जब कुछ भाई-बहन बीमार पड़ जाते हैं और उन्हें मृत्यु का सामना करना पड़ता है, तो वे सोचते हैं, “क्या परमेश्वर को मेरी वह सारी दौड़-धूप और खपाना याद नहीं है जो मैंने उसके लिए किया है?” अपने दिलों में वे परमेश्वर से बहस करते हैं, उसके खिलाफ शोर मचाते हैं और उसके खिलाफ लड़ते हैं। ऐसी दशा काफी आम है।) अपने और परमेश्वर के बीच की बाधाओं और परमेश्वर के प्रति शत्रुता के लिहाज से, ज्यादातर लोग जो समस्याएँ अभिव्यक्त करते हैं, वे कमोबेश सतर्कता और गलतफहमियाँ हैं और साथ ही, अवज्ञा और असंतोष भी हैं जिन्हें लोग कुछ चीजों का सामना करने पर प्रकट करते हैं, जो, दूसरे शब्दों में, परमेश्वर के प्रति शत्रुता हैं। मूल रूप से यह बस इतना ही है। परमेश्वर के प्रति लोगों के आंतरिक रवैयों से जुड़ी विभिन्न समस्याएँ दरअसल उन मुद्दों के दायरे से परे बहुत दूर तक जाती हैं जिन पर तुम लोगों ने संगति की है। कुछ समस्याएँ ऐसी होती हैं जिनके बारे में तुम लोग नहीं जानते। एक लिहाज से, यह इसलिए है क्योंकि लोग जब भी विभिन्न परिस्थितियों का अनुभव करते हैं, तो वे यह नहीं जाँचते हैं कि खुद उनमें क्या समस्याएँ हैं। दूसरे लिहाज से, लोगों ने कभी भी ध्यान से इस पर विचार नहीं किया है कि परमेश्वर के साथ वास्तव में उनका रिश्ता कैसा है या वे सही रवैये और दृष्टिकोण क्या हैं जो लोगों को परमेश्वर के प्रति रखने चाहिए। इसलिए, लोगों की विभिन्न अभिव्यक्तियों और इन अवस्थाओं के आधार पर जो फिलहाल लोगों में वाकई मौजूद हैं, हम आज विशेष रूप से लोगों और परमेश्वर के बीच की बाधाओं और परमेश्वर के प्रति लोगों की शत्रुता की विभिन्न अभिव्यक्तियों पर संगति करेंगे। इन विभिन्न अभिव्यक्तियों पर संगति करने का लक्ष्य लोगों को अपने और परमेश्वर के बीच की बाधाओं को और जब भी अपने रोजमर्रा के जीवन में उनमें ये चीजें उठती हैं तो वे परमेश्वर के प्रति जो शत्रुता रखते हैं उसे, सक्रियता से त्याग देने में, परमेश्वर के साथ एक सुसंगत रिश्ता बनाने में और अंत में, उसके साथ पूरी तरह से संगत होने में सक्षम बनाना है। इस तरह, वे अपने और परमेश्वर के बीच की बाधाओं और परमेश्वर के प्रति अपनी शत्रुता को पूरी तरह से हटा देंगे और परमेश्वर का भय मानने लगेंगे और सही मायने में उसके प्रति समर्पण करने लगेंगे। लोगों और परमेश्वर के बीच सिर्फ यही सामान्य रिश्ता है और सिर्फ ऐसे लोग ही सच्चे सृजित प्राणी हैं।
I. परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाओं और कल्पनाओं को त्याग देना : परमेश्वर के कार्य के बारे में अपनी धारणाओं और कल्पनाओं को त्याग देना
क. लोगों की यह कल्पना कि परमेश्वर का कार्य विशेष रूप से अलौकिक और काल्पनिक है
जब अपने और परमेश्वर के बीच की बाधाओं और परमेश्वर के प्रति अपनी शत्रुता को त्याग देने की बात आती है, तो सबसे पहले लोगों को अपनी धारणाएँ और कल्पनाएँ त्याग देनी चाहिए। यह बहुत ही महत्वपूर्ण विषय-वस्तु है, है ना? (हाँ।) क्या परमेश्वर के बारे में धारणाएँ और कल्पनाएँ हर व्यक्ति में मौजूद नहीं होती हैं? (हाँ, होती हैं।) कोई भी व्यक्ति शून्य में नहीं जीता है और कोई भी व्यक्ति मशीनी मानव नहीं है। हर व्यक्ति की स्वतंत्र इच्छा होती है और वह ऐसे विभिन्न विचार और दृष्टिकोण रखता है जो उसने बाहरी दुनिया से प्राप्त किए होते हैं; यकीनन, हर व्यक्ति में परमेश्वर के बारे में ऐसी विभिन्न धारणाएँ और कल्पनाएँ भी होती हैं जो उनकी अपनी जरूरतों, प्राथमिकताओं और चाहतों के आधार पर उनकी व्यक्तिपरक इच्छा के अधीन विकसित हुई होती हैं। यह तथ्य है कि उन्हें “धारणाएँ” और “कल्पनाएँ” कहा जाता है, इसका मतलब है कि वे यकीनन सत्य या तथ्यों के अनुरूप नहीं हैं; कम-से-कम, वे परमेश्वर के इरादों, परमेश्वर की पहचान और परमेश्वर के सार के अनुरूप नहीं हैं। इसलिए, ये धारणाएँ और कल्पनाएँ वे पहली बड़ी चीजें हैं जो लोगों को त्याग देनी चाहिए। तो परमेश्वर के बारे में धारणाओं और कल्पनाओं से संबंधित विषय-वस्तु में मुख्य रूप से क्या शामिल है? एक लिहाज से, उसमें वे पहले से मौजूद धारणाएँ शामिल हैं जो परमेश्वर में विश्वास रखना शुरू करने से पहले लोगों में उसके बारे में होती हैं। दूसरे लिहाज से, उनमें वे नई धारणाएँ शामिल हैं जो लोग परमेश्वर में विश्वास रखना शुरू करने के बाद उसके बारे में बनाते हैं और ये नई धारणाएँ ज्यादा विशिष्ट और यथार्थवादी धारणाएँ और कल्पनाएँ होती हैं। परमेश्वर में विश्वास रखना शुरू करने से पहले लोगों के दिल परमेश्वर के बारे में कल्पनाओं से भरे होते हैं और इन कल्पनाओं को ऐसी धारणाएँ भी कह सकते हैं जो सभी मनुष्यों में मौजूद होती हैं। यह वैसा ही है जैसे चीनी लोग परमेश्वर में विश्वास नहीं रखने के बावजूद उसे “आसमान में रहने वाला बूढ़ा आदमी” कहकर बुलाते हैं और पश्चिमी लोग—जिनमें से ज्यादातर लोग परमेश्वर में विश्वास रखते हैं—उसे “प्रभु” कहकर बुलाते हैं। वैसे तो बहुत से लोग परमेश्वर में विश्वास नहीं रखते हैं, लेकिन ज्यादातर लोग यह मानते हैं कि परमेश्वर है और वे उसके बारे में कल्पनाओं से भरे होते हैं, वे सोचते हैं कि परमेश्वर सभी चीजों के बीच मौजूद है और सभी चीजों से ऊँचा है और वह सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान है और उसके पास महान, अविश्वसनीय शक्तियाँ हैं। तो यह परमेश्वर वास्तव में कौन है? यह कोई नहीं जानता, लेकिन जो भी हो, वे जानते हैं कि परमेश्वर सबसे महान है और वह सब पर शासन करता है। तो फिर परमेश्वर की विशिष्ट छवि क्या है? हर व्यक्ति अपने मन में परमेश्वर के रंग-रूप और छवि के बारे में एक विचार रखता है जिसकी कल्पना और निर्धारण उसने किया है। हम पहले इन सार्वभौमिक मानवीय धारणाओं और कल्पनाओं पर चर्चा कर चुके हैं और वे आज की संगति की मुख्य विषय-वस्तु नहीं हैं। आज हम जिन चीजों पर संगति करने जा रहे हैं, वे लोगों और परमेश्वर के बीच की बाधाओं और परमेश्वर के प्रति उनकी शत्रुता से संबंधित सभी अलग प्रकार की धारणाओं और कल्पनाओं में ऐसी विभिन्न प्रकार की धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं जो परमेश्वर का विरोध करती हैं और जो उसके सार के साथ असंगत हैं, और जिन्हें लोगों को त्याग देना चाहिए। हम उन खोखली, अवास्तविक और गूढ़ धारणाओं और कल्पनाओं के बारे में बात नहीं करेंगे। तुम्हारे मौजूदा आध्यात्मिक कद को देखते हुए यह कह सकते हैं कि वे चीजें मूल रूप से कोई समस्या नहीं हैं और वे तुम लोगों के सत्य के अनुसरण को प्रभावित नहीं करेंगी, तुम लोगों के परमेश्वर के अनुसरण को तो बिल्कुल भी प्रभावित नहीं करेंगी और अगर कुछ व्यक्तियों के मन में अब भी कुछ काल्पनिक कल्पनाएँ हैं, तो भी ये उनके परमेश्वर के अनुसरण को प्रभावित नहीं करेंगी और इसलिए ये कोई बड़ी समस्या नहीं हैं। जिन मानवीय धारणाओं और कल्पनाओं पर हम संगति करने जा रहे हैं, वे लोगों के रोजमर्रा के जीवन में परमेश्वर के प्रति उनके रवैयों से और साथ ही, लोगों के कर्तव्यों के निर्वहन और लोगों द्वारा अपनाए जाने वाले मार्गों से संबंधित हैं और यकीनन, लोगों के अनुसरणों से तो और भी ज्यादा संबंधित हैं। परमेश्वर के बारे में लोगों की विभिन्न धारणाओं और कल्पनाओं में, सबसे पहले, लोगों में उसके कार्य के बारे में बहुत सारी धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं, जो कि परमेश्वर के बारे में अविश्वासियों की विभिन्न कल्पनाओं की तुलना में बहुत ही ज्यादा यथार्थवादी हैं और न तो खोखली हैं और न ही गूढ़ हैं। वे ऐसी चीजें हैं जो परमेश्वर का अनुसरण करते समय हर व्यक्ति के मन में मौजूद होती हैं। दूसरे शब्दों में, लोग परमेश्वर के कार्य के बारे में बहुत-सी काल्पनिक और अवास्तविक धारणाओं और कल्पनाओं से भरे होते हैं। मिसाल के तौर पर, लोग कल्पना करते हैं कि उसका कार्य चमत्कारों से भरा है और ऐसी अद्भुत चीजों से भरा है जिन्हें मनुष्य पहले से नहीं जान सकता है या प्राप्त नहीं कर सकता है। यकीनन, इस संबंध में लोगों की सबसे बड़ी धारणाएँ और कल्पनाएँ ये हैं कि परमेश्वर का कार्य किसी व्यक्ति को तुरंत पूर्ण बनाने में समर्थ हो सकता है या परमेश्वर बस कुछ शब्द कहकर या कोई चमत्कार या आश्चर्य करके किसी व्यक्ति को एक ही क्षण में बदल सकता है और उसे ऐसा व्यक्ति बना सकता है जो देह के जीवन और देह की विभिन्न व्यावहारिक कठिनाइयों की कैद से आजाद हो चुका है। वे कल्पना करते हैं कि यह व्यक्ति खाता-पीता नहीं है और एक मशीनी मानव की तरह उसकी कोई शारीरिक जरूरतें नहीं होती हैं; इसके अलावा, वे मानते हैं कि यह व्यक्ति बिना किसी मतलबी विचार के शुद्ध तरीके से सोचता है और वह भीतर से बेहद पवित्र हो चुका होता है। वे कल्पना करते हैं कि इसे प्राप्त करने के लिए सत्य का अनुसरण करना या सत्य पर संगति करना या वर्षों तक लगातार काट-छाँट किए जाने को स्वीकारने की जरूरत नहीं है; परमेश्वर यह सब कुछ सिर्फ कुछ वचनों से प्राप्त कर सकता है क्योंकि परमेश्वर जो भी कहेगा वह पूरा होगा और जो आज्ञा वह देगा वह अटल रहेगी। विशेष रूप से, शुरुआत में जब लोगों ने परमेश्वर के कार्य के तीसरे चरण को अभी-अभी स्वीकार किया था, तो वे उसके कार्य के बारे में सभी प्रकार की धारणाओं और कल्पनाओं से और भी ज्यादा भरे हुए थे। जब कुछ लोगों ने सुना, “परमेश्वर का कार्य जल्द ही समाप्त हो जाएगा” तो वे नहीं जानते थे कि यह किस वर्ष, महीने या दिन समाप्त होगा और फिर भी वे चिंतित हो गए और यहाँ तक कि उन्होंने अपनी नौकरियाँ और परिवार भी छोड़ दिए। कुछ किसानों ने फसलें उगाना बंद कर दिया और दूसरे लोगों ने मवेशी और भेड़ें पालना बंद कर दिया। कुछ लोगों ने तो अपनी जायदाद और कारें भी बेच दीं, बैंक से अपनी सारी जमा पूँजी निकाल ली, अपनी संपत्ति इकट्ठा कर ली और अपना सोना, चाँदी और कीमती सामान अपने साथ लेकर चलना शुरू कर दिया, वे परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए तैयार थे। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि लोगों को लगा कि परमेश्वर का कार्य समाप्त हो रहा है और उन्हें अब अपना जीवन जीने की जरूरत नहीं है और वे मानते थे कि परमेश्वर ने परिवार और शादियाँ तोड़ दी हैं और उन्हें अपनी शादियाँ, नौकरियाँ और भविष्य छोड़ देने चाहिए और परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए सभी सांसारिक सुख त्याग देने चाहिए। अगर कोई उनसे पूछता, “तुम वह सूटकेस और अपने पीछे-पीछे अपने पूरे परिवार को लेकर कहाँ जा रहे हो?” तो वे कहते, “मैं स्वर्ग के राज्य में जा रहा हूँ।” अगर फिर उनसे पूछा जाता, “स्वर्ग का राज्य कहाँ है?” तो वे उत्तर देते, “मुझे अभी तक नहीं पता, परमेश्वर मुझे जहाँ भी ले जाएगा, मैं वहाँ चला जाऊँगा।” इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे आवेग में आकर कार्य कर रहे थे या उन्होंने इस बारे में अच्छी तरह से सोच-समझ लिया था, जो भी हो, ये अभिव्यक्तियाँ एक तथ्य प्रकट करती हैं, जो यह है कि लोगों में परमेश्वर के कार्य के बारे में बहुत सारी कल्पनाएँ हैं। उन्हें नहीं पता कि परमेश्वर उन्हें बचाने के लिए कैसे कार्य करेगा या उन्हें कैसा महसूस होगा या जब वह उन्हें बचा लेगा, तो उसके बाद वे किस तरह की दशा और परिवेश में रहेंगे। और जहाँ तक इस बात का प्रश्न है कि वास्तव में परमेश्वर के क्या इरादे हैं या परमेश्वर लोगों पर अपने कार्य के जरिये क्या परिणाम प्राप्त करना चाहता है, तो वे इस बारे में भी कुछ नहीं जानते। तो वे क्या जानते हैं? उन्हें बस एक वाक्य याद रहता है : परमेश्वर का दिन करीब है, आपदाएँ नीचे उतर आई हैं, परमेश्वर का कार्य जल्द ही समाप्त हो जाएगा और हमें सब कुछ छोड़ देना चाहिए और परमेश्वर का अनुसरण करना चाहिए। यही उनकी सभी धारणाओं और कल्पनाओं के बनने का स्रोत और आधार है और इन्हीं धारणाओं और कल्पनाओं के जरिये उन्होंने सभी प्रकार के चुनाव किए हैं और फैसले लिए हैं। उन्होंने क्या चुनाव किए हैं और फैसले लिए हैं? उन्होंने दुनिया छोड़ देने, अपनी पढ़ाई छोड़ देने, अपना करियर छोड़ देने, अपनी शादी छोड़ देने, अपना परिवार छोड़ देने और यहाँ तक कि दैहिक, पारिवारिक प्रेम, वगैरह भी छोड़ देना चुना है और इन सभी चीजों को त्याग देने के बाद, वे परमेश्वर का कार्य समाप्त होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। परमेश्वर का कार्य समाप्त होने की प्रतीक्षा करने में उनका क्या लक्ष्य है? उनका लक्ष्य उठा लिया जाना और परमेश्वर का अनुसरण करना है। वास्तव में कहाँ उठा लिए जाना है? वे सोचते हैं कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उन्हें कहाँ उठा लिया जाना है या वे ठीक किस दिन उठा लिए जाने वाले हैं, जो भी हो, वे नरक में तो नहीं जाएँगे। वे मानते हैं कि अगर वह स्वर्ग न भी हो, तो भी वे किसी ऊँची जगह जा रहे हैं और अगर यह स्वर्ग या कोई भौतिक राज्य न भी हो, तो भी परमेश्वर का अनुसरण करके उनसे गलती नहीं हो सकती और वे संभवतः वहीं उठा लिए जाएँगे जहाँ परमेश्वर है। वैसे तो लोगों की ये धारणाएँ और कल्पनाएँ परिपूर्ण हैं, लेकिन क्या ये सच हो सकती हैं? वे जिसकी प्रतीक्षा कर रहे थे—परमेश्वर का कार्य समाप्त होने की—क्या वह क्षण आ गया है? (नहीं।) और चूँकि परमेश्वर का कार्य अभी समाप्त नहीं हुआ है, तो क्या लोग निराश या चिंतित हैं? क्या उन्हें पछतावा है? कुछ लोग निराश हैं, है ना? कुछ लोगों को जब अपना कर्तव्य करते समय कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, तो वे नकारात्मक हो जाते हैं या जब वे अपने घरेलू जीवन में क्लेश का अनुभव करते हैं या जब वे उत्पीड़न सहते हैं और उनके पास बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं होता है, तो उन्हें पछतावा होता है। यकीनन, कुछ लोगों के लिए मौजूदा क्षण तक सहन करना आसान नहीं रहा है, लेकिन अपने दिलों में वे वास्तव में बहुत चिंतित हैं। वे किस बारे में चिंतित हैं? वे सोचते हैं, “परमेश्वर का कार्य अभी तक समाप्त क्यों नहीं हुआ? परमेश्वर के कार्य में और कितना समय लगेगा? क्या मुझे घर चले जाना चाहिए और अपना जीवन जारी रखना चाहिए? क्या मुझे नौकरी पर वापस चले जाना चाहिए और दुनिया में अपने लिए भविष्य की तलाश करनी चाहिए? क्या मुझे अपना घर वापस खरीद लेना चाहिए? परमेश्वर हमें प्रतिक्रिया नहीं देता है या हमें इस बारे में कोई स्पष्ट उत्तर नहीं देता है! क्या हमें यह नहीं बताया जाना चाहिए कि परमेश्वर का कार्य कब समाप्त होगा और वह कौन-सा दूसरा कार्य करेगा ताकि हम तैयार रह सकें? परमेश्वर हमें ये बातें नहीं बताता है, वह सिर्फ सत्य व्यक्त करता रहता है, सत्यों की संगति करता रहता है और उद्धार के बारे में बात करता रहता है। वह बाद में आने वाली चीजों या भविष्य के बारे में या इस बारे में कभी भी बात नहीं करता है कि मानवजाति कब एक सुंदर गंतव्य में प्रवेश करेगी या देह का जीवन कब समाप्त होगा; वह बस हमें अनिश्चित काल तक प्रतीक्षा करवाता है।” लोगों को परमेश्वर के कार्य का ज्ञान नहीं है। और विशेष रूप से, वे इस बारे में स्पष्ट नहीं हैं कि परमेश्वर लोगों को कैसे बचाता है, लोगों को बचाने के लिए वह किन तरीकों का उपयोग करता है, परमेश्वर अपने सारे कार्य में कौन-सा विशिष्ट कार्य पूरा करता है ताकि वह लोगों को बचाए जाने में सक्षम बना सके, वगैरह-वगैरह। बल्कि वे हमेशा अपनी धारणाओं और कल्पनाओं में जीते हैं और परमेश्वर के कार्य को एक औपचारिकता या विलक्षण प्रकार का जादू मानते हैं। यह ऐसा है मानो उसका कार्य सिर्फ बयानबाजी हो और उसमें कोई विशिष्ट विषय-वस्तु न हो—परमेश्वर को सिर्फ कुछ वचन कहने हैं और वह जो भी कहेगा, वह पूरा हो जाएगा और वह जो भी आज्ञा देगा, वह अटल रहेगी और उसके बाद लोग बदल जाएँगे और प्रकाशित वाक्य की किताब में की गई भविष्यवाणी के अनुसार बन जाएँगे, पवित्र लोग बन जाएँगे और पावनीकृत हो जाएँगे। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर के कार्य के बारे में लोगों के क्या काल्पनिक और खोखले विचार हैं, चाहे वे विशिष्ट हों या गैर-विशिष्ट, संक्षेप में, लोग उसके कार्य के बारे में धारणाओं और कल्पनाओं से भरे हुए हैं और वे इस बारे में हमेशा खोखली धारणाओं और कल्पनाओं में जीते हैं कि वे परमेश्वर के कार्य के साथ कैसे पेश आते हैं और वे मानवजाति को बचाने के लिए परमेश्वर द्वारा किए जाने वाले हर विशिष्ट कार्य और उसके द्वारा कही गई हर विशिष्ट बात के साथ कैसे पेश आते हैं। यकीनन, ज्यादातर लोगों के पास परमेश्वर के कार्य के बारे में सिर्फ एक ही धारणा और कल्पना है, जो यह है कि जैसे ही परमेश्वर का कार्य समाप्त हो जाएगा, तो लोग अंत में इससे सफलतापूर्वक उबर आएँगे और अगर वे उसके कार्य के समाप्त होने की प्रतीक्षा कर सकते हैं और उस समय तक जीवित रह सकते हैं, तो वे जीत जाएँगे और उन्होंने जो कुछ भी छोड़ दिया है और अर्पित किया है और जो कठिनाइयाँ सही हैं और जो कीमतें चुकाई हैं, वह सब कुछ इसके लायक होगा। इस आधार पर देखा जाए तो, एक लिहाज से, लोग परमेश्वर के कार्य के बारे में सभी प्रकार की कल्पनाओं से भरे हुए हैं। दूसरे लिहाज से, लोग परमेश्वर में अपने विश्वास में सत्य का अनुसरण नहीं कर रहे हैं; बल्कि उनकी आस्था में जुआ खेलने वाली गुणवत्ता है—वे अपना जीवन और अपनी सारी संपत्ति, अपना भविष्य, अपनी शादी और जो कुछ भी उनके पास है, उसे दाँव पर लगा रहे हैं और वे सोचते हैं कि उन्हें बस तब तक सहन करने की जरूरत है जब तक परमेश्वर का कार्य समाप्त नहीं हो जाता और अगर वे परमेश्वर द्वारा अपना कार्य समाप्त होने की घोषणा करने तक जीवित रहते हैं, तो उन्हें फायदा होगा और उन्होंने जो कुछ भुगतान किया है, वह सब कुछ उन्हें वापस मिल जाएगा। क्या लोग इसी तरीके से नहीं सोचते हैं? (हाँ।) अब जबकि हम इस बारे में इतना कुछ बोल चुके हैं, तो परमेश्वर के कार्य के बारे में लोगों की मुख्य धारणाएँ और कल्पनाएँ क्या हैं? (लोग मानते हैं कि परमेश्वर का कार्य चमत्कारों से भरा है और परमेश्वर बस कुछ वचनों से ही लोगों को शुद्ध कर सकता है और वे बिना कोई कीमत चुकाए या सत्य का अनुसरण किए स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं।) परमेश्वर के कार्य के बारे में लोगों की यही धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं। दूसरी कौन-सी धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं? (लोग यह नहीं जानते हैं कि परमेश्वर लोगों पर अपने कार्य के जरिये वास्तव में क्या परिणाम प्राप्त करना चाहता है और वे सोचते हैं कि यदि वे परमेश्वर का कार्य पूरा होने तक सहन कर सकते हैं, तो उनके पास स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने की उम्मीद होगी।) यह भी एक धारणा और कल्पना है—लोग सोचते हैं कि परमेश्वर का कार्य सिर्फ एक औपचारिकता और प्रक्रिया भर है। और क्या है? (लोग परमेश्वर में अपने विश्वास में सत्य का अनुसरण नहीं कर रहे हैं, बल्कि उनकी आस्था में जुआ खेलने वाली गुणवत्ता है।) क्या यह एक धारणा और कल्पना है? यह परमेश्वर में लोगों के विश्वास का सार है और उनकी तलाश का सार है। इसमें दूसरी कौन-सी धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं? क्या लोग यह नहीं सोचते हैं कि जब तक वे सभी चीजें छोड़ देते हैं और परमेश्वर का अनुसरण करते हुए कोई कर्तव्य करते हैं, तब तक मानो जादू से वे बदल दिए जाएँगे? (हाँ।) लोगों के विचार बेहद खोखले हैं, अलौकिक चीजों से संबंधित हैं और काल्पनिक हैं। लोग सोचते हैं कि उन्हें ताड़ना, न्याय या काट-छाँट या परमेश्वर के वचनों का पोषण स्वीकारने की जरूरत नहीं है, उन्हें सिर्फ इस तरह से परमेश्वर का अनुसरण करने की जरूरत है, उनसे जो भी कर्तव्य करने को कहा जाए, उन्हें उसे करना चाहिए और जब तक वे अंत तक अनुसरण करते हैं, तब तक वे बदल दिए जाएँगे और परमेश्वर का कार्य समाप्त होने पर अंत में वे स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करेंगे। क्या ये लोगों की धारणाएँ और कल्पनाएँ नहीं हैं? (हाँ।)
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?