सत्य का अनुसरण कैसे करें (10) भाग तीन
कलुषता
आओ हम एक और अभिव्यक्ति के बारे में बात करें : कलुषता। यह किस तरह की समस्या है? (यह नीच चरित्र की समस्या है।) कलुषता नीच चरित्र के तहत आती है और इसे मानवता के तहत श्रेणीबद्ध किया जाता है। क्या कलुषता कुछ हद तक घटियापन के समान है? (हाँ।) यह भी नीच चरित्र की अभिव्यक्ति है। कलुषता का मतलब है नियमों का पालन किए बिना, छलपूर्ण तरीके से कार्य करना और न सिर्फ सिद्धांतों या जमीर और नैतिकता की सीमाओं के बिना कार्य करना बल्कि ऐसे ढंग से भी चीजें करना जो विशेष रूप से घिनौना और नीच हो। कलुषता की क्या अभिव्यक्तियाँ हैं? उदाहरण के लिए, एक कलुषित व्यक्ति देखता है कि किसी ने एक अच्छी सी गाड़ी खरीदी है जिसे खरीदने की खुद उसकी आर्थिक क्षमता नहीं है। उस व्यक्ति के पास से गुजरते समय वह ऊपरी तौर पर उसका अभिवादन करता है और कहता है, “अच्छी कार है! तुम जरूर अमीर होगे!” उसके शब्द सुखद लगते हैं, लेकिन कार मालिक के वहाँ से जाते ही वह कार पर थूक देता है—थू! क्या यह कलुषित होना नहीं है? (हाँ।) थूकना किस तरह का व्यवहार है? (कलुषित होने का।) इसे कलुषित होना कहते हैं। कलुषता विशेष रूप से घिनौना, गंदा और अधम होना है—यह शर्मनाक ढंग से व्यवहार करना है जिसके कारण दूसरे लोग तुम्हारा मजाक उड़ाते हैं और तुम्हारा तिरस्कार करते हैं, जो लोगों को यह महसूस करवाता है कि तुम्हारा चरित्र अधम है और तुम एक कलंक हो। उदाहरण के लिए, कुछ लोग देखते हैं कि उनके पड़ोसी के पास एक अच्छा कुत्ता है और उन्हें अंदर ही अंदर जलन होती है : “उसके परिवार के पास एक बहुत ही अच्छा कुत्ता है। मैंने वह कुत्ता क्यों नहीं खरीदा?” इसलिए वे कुत्ते को मार डालने का तरीका ढूँढ़ लेते हैं और बाद में वे खुशी से फूले नहीं समाते हैं। घर पहुँचते ही वे जश्न मनाते हैं, शैम्पेन पीते हैं और दावत करते हैं और इतने ज्यादा खुश होते हैं जितना इससे पहले कभी नहीं हुए। मुझे बताओ, यह व्यक्ति भयानक है या नहीं? (है।) यह कलुषित होना है। जब तक दूसरों के साथ कुछ अच्छा होता है और वे खुश होते हैं, तब तक वे दुखी रहते हैं और दूसरों के लिए चीजें बिगाड़ने के तरीके सोचते रहते हैं। जब वे दूसरों को मुसीबत का सामना करते देखते हैं तब वे उनके दुख पर संतुष्टि से खुश होते हैं। ऐसे लोग बहुत कलुषित होते हैं।
कलुषित लोगों के विचार बहुत नकारात्मक होते हैं। वे नकारात्मक कैसे होते हैं? उदाहरण के लिए, जब तुम सामान्य हालात में किसी को कुछ देते हो तब उसे एहसानमंद महसूस करना चाहिए और कहना चाहिए, “यह चीज बहुत अच्छी है। तुम इसे सच में पसंद किया करते थे, लेकिन अब तुम्हें इसकी जरूरत नहीं है। तुमने इसे किसी और को नहीं दिया, बल्कि तुरंत मुझे दे दिया—हम सच में दोस्त हैं!” जमीर और विवेक वाला कोई भी व्यक्ति इस तरीके से सोचेगा; वह इस मामले को सकारात्मक रूप से बूझेगा। लेकिन कलुषित लोगों की सोच विकृत होती है। वे मन ही मन कहेंगे : “तुमने यह मुझे सिर्फ इसलिए दी क्योंकि तुम्हें इसकी अब और जरूरत नहीं है। अगर तुम्हें अब भी इसकी जरूरत होती तो क्या तुम इसे मुझे दे देते? तुम अच्छी चीजें अपने लिए रख लेते हो और बुरी चीजें मुझे दे देते हो—ऐसा कौन चाहता है! क्या तुम मुझे भिखारी की तरह टरका रहे हो? क्या तुम्हें लगता है मुझे नहीं पता कि क्या अच्छा है? तुमने यह चीज मुझे सिर्फ इसलिए दी क्योंकि तुम्हें इसकी अब और जरूरत नहीं है और फिर भी तुम मुझसे एहसानमंद होने की उम्मीद करते हो। तुमने मुझे बेवकूफ समझा है क्या?” देखो, इतने साधारण से मामले पर वे कितने घिनौने, गंदे और नीच तरीके से सोचते हैं। उन्हें कोई चीज देने से तुम उल्टा अपने लिए मुसीबत खड़ी कर लेते हो। इससे मुसीबत क्यों खड़ी हो जाती है? क्योंकि जिस व्यक्ति को तुमने यह चीज दी है वह एक कलुषित व्यक्ति है—कोई ऐसा है जो घिनौने, गंदे और नीच विचारों वाला है। वह किसी के भी बारे में नकारात्मक सोचता है। जब वह किसी व्यक्ति को देखता है तब वह उसे सिद्धांतों के आधार पर नहीं देखता और न ही उस व्यक्ति के चरित्र या स्व-आचरण के सिद्धांतों के आधार पर देखता है जिन्हें वह उसके साथ बहुत सारे साल बिताने से जानता है। इसके बजाय वह दूसरों को अपने ही चरम, अड़ियल विचारों और दृष्टिकोणों के आधार पर देखता है। ऐसे लोग बहुत कलुषित होते हैं। अगर तुम उनसे मेलजोल नहीं रखते हो या उन्हें कुछ नहीं देते हो तो सब कुछ शांतिपूर्ण बना रहता है। लेकिन अगर तुम सच में उनके साथ मेलजोल रखते हो और उनकी मदद करते हो तो वे अक्सर तुम्हारे बारे में राय बनाते हैं और तुम्हारी आलोचना करते हैं। जब वे तुम्हें किसी अच्छी चीज का उपयोग करते देखते हैं तब वे हमेशा उसकी चाह करते हैं। अगर तुम उन्हें वह चीज नहीं देते हो तो उन्हें लगता है कि तुम अनुदार और कंजूस हो। ऐसे लोग बहुत परेशान करने वाले लोग होते हैं और उनके साथ मिलजुलकर रहना बहुत ही मुश्किल होता है। हो सकता है कि वे प्रत्यक्ष कुछ न कहें, लेकिन दिल की गहराई में, गुप्त रूप से वे हमेशा तुमसे प्रतिस्पर्धा करते रहते हैं, अपने दिलों में तुम्हारे प्रति नकारात्मक विचार उत्पन्न करते रहते हैं। सादे शब्दों में कहा जाए तो ऐसे लोगों के पास ओछे दिल और ओछे विचार होते हैं। मुझे लगता है कि “ओछा” शब्द किसी व्यक्ति के विचारों और दिल को गंदा बताने के लिए बिल्कुल उपयुक्त है—इसका मतलब है कि वह साफ नहीं है, सकारात्मक नहीं है और दयालु नहीं है। कोई बात चाहे कितनी भी सकारात्मक क्यों न हो, जब वह उसके बारे में बोलता है तब वह किसी नकारात्मक चीज में बदल जाती है। तुम उसके लिए चाहे कितनी भी अच्छी चीजें क्यों न करो, वह न सिर्फ इसकी सराहना नहीं करता है, बल्कि तुम्हारा अपमान भी करता है और तुम्हें फँसाता भी है, कहता है कि तुम्हारे इरादे बुरे हैं। अगर तुम उसे कुछ फायदा पहुँचाते हो तो वह सोचेगा कि कहीं तुम उसका शोषण करने का प्रयास तो नहीं कर रहे। अगर तुम उसके प्रति उदासीन होते हो तो वह सोचेगा कि क्योंकि तुम दौलतमंद और ताकतवर हो, इसलिए तुम गरीबों को नीची नजर से देखते हो। उसे लगेगा कि तुममें मानवीय स्पर्श की कमी है, तुम लोगों के साथ मिलजुलकर रहना नहीं जानते हो और दूसरों की भावनाओं का ध्यान रखने में अक्षम हो। अगर तुम उससे दूरी बना लेते हो तो वह भी कारगर नहीं होगा—अब भी उसके पास इस बारे में कहने को कुछ न कुछ होगा। ऐसे लोग बहुत परेशान करने वाले लोग होते हैं। तुम उनके साथ चाहे जैसे भी मेलजोल रख लो, तुम उन्हें कभी संतुष्ट नहीं कर सकते। तुम नहीं जानते कि वे क्या सोचेंगे और तुम नहीं जानते कि तुम जो चीजें अच्छे इरादों से करते हो उनसे क्या मुसीबतें खड़ी होंगी। इसलिए ऐसे लोगों से निपटने का एक ही तरीका है—उनसे दूर रहना और उनसे कोई मेलजोल न रखना। दोस्त बनाते समय ऐसे लोगों को मत चुनना क्योंकि वे बहुत ही ज्यादा कलुषित होते हैं; उनसे मेलजोल रखने से तुम पर बड़ी मुसीबत और बड़ा संकट आएगा और यह सारा संकट और परेशानी पूरी तरह से अनावश्यक है। क्या कलुषित लोगों में तार्किकता होती है? (नहीं।) यह कहने का क्या मतलब है कि उनमें कोई तार्किकता नहीं होती है? (उनमें कोई जमीर या विवेक नहीं होता है और न ही कोई नैतिक सीमाएँ होती हैं।) इसके क्या विवरण हैं? (उनमें सामान्य लोगों की सोच नहीं होती है।) सामान्य लोगों की सोच न होना एक पहलू है। मुझे बताओ, क्या ऐसे लोगों में कोई शर्म होती है? (नहीं।) उनमें कोई शर्म नहीं होती है, सामान्य मानवता की सोच नहीं होती है और वे सिर्फ विकृत और भ्रामक तर्क ही बोलते हैं। उनके तर्क का लक्ष्य अपने ही हितों की रक्षा करना है—यह सब कुछ विकृत तर्क है। अगर तुम उन्हें कोई चीज देते हो तो वे कहते हैं कि तुम उन्हें नीची नजर से देखते हो और उन्हें सिर्फ वही चीजें देते हो जिनकी तुम्हें जरूरत नहीं है। अगर तुम उन्हें कुछ भी नहीं देते हो तो वे कहते हैं कि तुम बहुत ही ज्यादा कंजूस हो। क्या ये शब्द विकृत तर्क नहीं हैं? (हाँ।) वे चीजों को बस सही ढंग से समझ ही नहीं पाते हैं और बहुत नकारात्मक तरीके से सोचते हैं—यह विकृत तर्क है। अविश्वासी अक्सर कहते हैं कि लोगों को उचित ढंग से आचरण करना चाहिए—अगर कोई अविवेकी है और सिर्फ विकृत तर्क देता है तो वह अच्छा नहीं है। अगर कोई व्यक्ति तुम्हें कोई चीज देता है तो इसका मतलब है कि वह तुम्हारा कुछ सम्मान करता है; अगर वह तुम्हें वह चीज नहीं देता है तो यह भी उचित है—वह अपनी चीजें जिसे चाहे दे सकता है। अगर जब वह तुम्हें कोई चीज देता है तब भी तुम दोष ढूँढ़ते हो, लेकिन अगर वह नहीं देता है तो तुम उसे कंजूस कहते हो तो क्या यह विवेक से परे होना नहीं है? क्या इस तरह से विकृत तर्क करने वाले लोग कलुषित नहीं होते हैं? (होते हैं।) वे बेहद कलुषित होते हैं! कलुषित लोग विवेक से परे होते हैं, इसलिए कोई भी तर्क उनकी समझ में नहीं आता है। जमीर और विवेक के अनुसार या सत्य सिद्धांतों के आधार पर कार्य करने का उनके लिए कोई मतलब नहीं होता है। कलुषता कुछ हद तक घटियापन के समान है, है ना? (हाँ।) उदाहरण के लिए, कुछ लोग कोई चीज खरीदने के लिए पैसे खर्च करते हैं और हमेशा महसूस करते हैं कि वह उस कीमत के लायक नहीं है, मानो उनका कोई नुकसान हुआ हो। फिर वे सोचते हैं, “तुमने मेरा फायदा उठाया है, इसलिए मुझे कोई ऐसा रास्ता ढूँढ़ निकालना होगा जिससे तुम्हारा नुकसान करवा सकूँ—सिर्फ तभी मैं अंदर से संतुलित महसूस करूँगा।” इस तरह के लोग जो घिनौने और कलुषित होते हैं हमेशा यही सोचते रहते हैं कि दूसरों का कैसे फायदा उठाया जाए। अगर उन्हें लगता है कि उन्हें नुकसान हुआ है तो वे दूसरों के लिए चीजें मुश्किल बना देते हैं; वे हमेशा यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उन्हें नुकसान न हो और सिर्फ तभी वे संतुष्ट होते हैं। अगर वे किसी और का फायदा उठाते हैं तो वे जश्न मनाते हैं और इतने खुश होते हैं कि हँसते हुए अपने सपनों से जाग जाते हैं। तुम किसी चीज पर कितना पैसा खर्च करते हो यह तुम्हारी अपनी पसंद है—किसी ने तुम्हें उसे अपना पैसा देने के लिए मजबूर नहीं किया। चूँकि तुमने इसे खुशी से खरीदा, फिर तुम अब भी नाराज क्यों हो और अब भी दूसरों का फायदा उठाने और अपना नुकसान होने से बचने का प्रयास क्यों कर रहे हो? क्या ऐसे लोग बहुत कलुषित नहीं होते हैं? (हाँ।) जब वे किराने का सामान खरीदने सुपरमार्केट जाते हैं और उन्हें लगता है कि वह बहुत ही ज्यादा महँगा है तब अपना नुकसान होने से बचने के लिए वे कुछ अतिरिक्त प्लास्टिक बैग ले लेते हैं। अगर यह नए साल या किसी छुट्टी के दौरान होता है और सुपरमार्केट कैलेंडर दे रहा होता है तो उन्हें कई और कैलेंडर लेने पड़ते हैं और सिर्फ तभी वे संतुष्ट होते हैं। जब वे दूसरों का फायदा उठाते हैं तब वे आनंदित होते हैं और घूम-घूमकर यह तक दिखावा करते हैं कि वे कितने सक्षम और कुशल हैं। मुझे बताओ, ऐसे लोगों में किस तरह की मानसिकता होती है? चाहे यह कुछ भी हो, वे हमेशा इस आधार पर चीजों को मापते हैं कि क्या वे फायदा उठा सकते हैं और अपना नुकसान होने से बच सकते हैं। बस इस तरह का विचार और दृष्टिकोण बहुत कलुषित और घिनौना है। यकीनन इसका एक दबंगई पहलू भी है और एक बुरा पहलू भी। ऐसे लोगों से निपटना मुश्किल होता है और वे मीन-मेख निकालने वाले लोग होते हैं। ऐसे लोगों में मानवता के कई दोष प्रदर्शित होते हैं—मानवता के परिप्रेक्ष्य से उनके सोचने के तरीके सामान्य समझ या व्यवहार के किसी भी नियम के अनुरूप बिल्कुल नहीं होते हैं और सामान्य मानवता की मूलभूत नैतिक आधाररेखा से नीचे आते हैं; यकीनन वे मानवता के जमीर और विवेक के अनुरूप भी नहीं होते हैं। वे बहुत विकृत, बहुत नीच और बहुत दबंग भी होते हैं। क्या ऐसे लोग अक्सर लोगों के समूहों में नहीं देखे जाते हैं? (हाँ।) कलुषित लोग नीच चरित्र वाले लोग होते हैं और उनसे निपटना बहुत मुश्किल होता है। जब तक किसी चीज से उनके हित जुड़े होते हैं, चाहे वह भौतिक हित हो या उनका अहंकार और रुतबा हो, तब तक इस लिहाज से उनका आचरण प्रकट हो जाएगा; यह बहुत ही स्पष्ट रूप से प्रदर्शित हो जाएगा। वे विकृत और भ्रामक तर्क बोलना शुरू कर देंगे, उन पर तर्क का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। ठीक है, कलुषित लोगों पर हमारी चर्चा यहीं समाप्त होती है।
खुदगर्जी
एक और अभिव्यक्ति खुदगर्जी है। क्या खुदगर्जी अच्छी होती है? (नहीं।) तो पहले मुझे बताओ, क्या खुदगर्जी जन्मजात होती है? (नहीं।) खुदगर्जी जन्मजात नहीं होती है, तो यह किस प्रकार की समस्या है? (मानवता का दोष है।) (मुझे लगता है कि यह चरित्र की समस्या है।) खुदगर्जी को परिस्थिति के आधार पर श्रेणीबद्ध किया जाना चाहिए। खुदगर्जी के कुछ उदाहरण मानवीय सहजप्रवृत्ति की अभिव्यक्तियाँ हैं; वे एक प्रकार की मानवीय सहजप्रवृत्ति हैं, ऐसा अधिकार हैं जो लोगों के पास होना चाहिए, अपने हितों की रक्षा करने का अधिकार। अगर यह मानवीय सहजप्रवृत्ति की अभिव्यक्ति है तो यह ऐसी चीज है जो लोगों के पास जरूर होनी चाहिए। इस तरह की खुदगर्जी अपने मानवाधिकारों की रक्षा करने और अपने वैध अधिकारों और हितों की रक्षा करने की अभिव्यक्ति है। इस तरह की खुदगर्जी जायज है; यह मानवता का दोष नहीं है। लेकिन एक और तरह की अभिव्यक्ति है जो इस तरह की खुदगर्जी से ज्यादा गंभीर है—यह दूसरों के हितों को नुकसान पहुँचाने से जुड़ी है और यह मानवता का दोष है; यह चरित्र की समस्या तक बढ़ चुकी है। इन मुद्दों का भेद पहचाना जाना चाहिए : खुदगर्जी की कौन-सी अभिव्यक्तियाँ जायज हैं, खुदगर्जी की कौन-सी अभिव्यक्तियाँ मानवता का दोष हैं और खुदगर्जी की कौन-सी अभिव्यक्तियाँ चरित्र की समस्या से जुड़ी हैं। अगर इन मुद्दों को स्पष्ट रूप से देखा जा सके तो व्यक्ति जान जाएगा कि सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास कैसे करना है। उदाहरण के लिए, लोग अपने जीवन का अच्छी तरह से ध्यान रखना चाहते हैं, अपनी जिम्मेदारियों और दायित्वों को पूरी तरह से निभाना चाहते हैं और दूसरों की चिंता किए बिना खुद को अच्छी तरह से सँभालना चाहते हैं, दूसरों के हितों का अतिक्रमण किए बिना बस खुद को अच्छी तरह से सँभालना चाहते हैं—मानवता के परिप्रेक्ष्य से यह भी एक तरह की खुदगर्जी है, है ना? लेकिन दूसरे परिप्रेक्ष्य से यह लोगों में एक सहजप्रवृत्ति वाली प्रतिक्रिया भी है। यकीनन यह परमेश्वर द्वारा लोगों को दिया गया एक मूलभूत अधिकार भी है—यानी तुम्हें दूसरों की चिंता किए बिना पहले अपना ध्यान रखने का अधिकार है। अपने मानव जीवन को कायम रखकर तुम अपनी उत्तरजीविता कायम रख रहे हो। यह जायज है। यकीनन मानवता के परिप्रेक्ष्य से सिर्फ अपना ध्यान रखना और दूसरों की चिंता न करना भी खुदगर्जी की अभिव्यक्ति है। लेकिन इस तरह की खुदगर्जी मानवता की एक सामान्य अभिव्यक्ति है और जायज है। वैसे तो मानव परिप्रेक्ष्य से इसे मानवता का दोष माना जाता है, लेकिन वास्तव में यह मानवता का दोष नहीं है। दूसरों का ध्यान रखने में समर्थ हुए बिना या दूसरों का ध्यान रखने की इच्छा रखे बिना सिर्फ अपनी परवाह करना—अच्छा खाना खाना और गर्म कपड़े पहनना, अपना कार्य अच्छी तरह से करना, अपने दायित्व पूरे करना और बस हो गया—यह तुम्हारा अधिकार है और यह परमेश्वर द्वारा तुम्हें दी गई सहजप्रवृत्ति भी है। जन्मजात स्थितियों के परिप्रेक्ष्य से अगर कोई व्यक्ति अपना ध्यान रखना तक नहीं जानता, अगर उसमें इस जन्मजात सहजप्रवृत्ति की कमी है तो फिर वह वयस्क होने का मानक पूरा नहीं करता है। इस तरह की खुदगर्जी लोगों में एक सहज प्रतिक्रिया होती है। वैसे तो वे सिर्फ अपनी परवाह करते हैं, सिर्फ अपने अधिकारों और हितों की रक्षा करते हैं, जीवन-यापन करने के लिए अपनी मूलभूत जरूरतों का और साथ ही अपने जीवन और कार्य के दायरे के भीतर मामलों का ध्यान रखते हैं, फिर भी जब तक वे दूसरों के हितों का अतिक्रमण नहीं करते हैं, तब तक इस तरह की खुदगर्जी की निंदा नहीं की जाती है। जिस तरह की खुदगर्जी सचमुच नीच चरित्र के स्तर तक पहुँच जाती है, सिर्फ अपनी परवाह करने से परे चली जाती है, वह दूसरों के हितों और अधिकारों का अतिक्रमण करने या उन्हें नुकसान पहुँचाने, दूसरों के मानवाधिकारों के अतिक्रमण से भी जुड़ी होती है। यह असली खुदगर्जी है और यह नीच चरित्र की समस्या है। अगर तुम अपने खुद के हितों, प्रतिष्ठा, रुतबे और अभिमान की रक्षा करने के लिए दूसरों के हितों पर कब्जा करने या उन्हें जबरन ले लेने में कोई कसर नहीं छोड़ते हो—दूसरों के हितों को अपना मान लेते हो, सिर्फ अपने बारे में सोचते हो और दूसरों के बारे में नहीं, यहाँ तक कि दूसरों के लिए जीने का कोई रास्ता तक नहीं छोड़ते हो—तो इस तरह की खुदगर्जी नीच चरित्र को दर्शाती है। उदाहरण के लिए, रात को जब बाकी सब सो रहे होते हैं तब तुम जोशीला महसूस करते हो और तुम्हें नींद नहीं आती, इसलिए तुम कोई गाना गाना चाहते हो। जैसे-जैसे तुम बहकते जाते हो, वैसे-वैसे तुम जोर-जोर से गाने लगते हो, यहाँ तक कि गाना गाते हुए तुम संगीत भी बजाते हो और नाचते भी हो। तुम्हारी अपनी मनोदशा बेहतर हो जाती है और तुम खुश हो जाते हो, लेकिन तुम बाकी सभी को जगा देते हो जिससे वे और सो नहीं पाते हैं। इसे क्या कहते हैं? (खुदगर्जी।) इस तरह के व्यवहार को खुदगर्जी कहते हैं। क्या यह व्यवहार नीच चरित्र का संकेतक है? (हाँ।) यह व्यवहार नीच चरित्र का संकेतक क्यों है? (क्योंकि वे दूसरों के बारे में नहीं सोचते हैं और दूसरों के आराम पर असर डालते हैं।) खुद को खुश करने के लिए तुम दूसरों के आराम और नींद के समय की बलि चढ़ाने से नहीं हिचकिचाते हो और अपने गाना गाने और मौज-मस्ती करने में सभी को अपना साथ देने के लिए मजबूर करते हो। अपने खुद के मकसद हासिल करने और अपने हितों की रक्षा करने के लिए तुम दूसरों के हितों और अधिकारों का अतिक्रमण करते हो। यानी तुम्हारे अपने हितों की रक्षा करने की शर्त है दूसरे लोगों के हितों और अधिकारों को बलि चढ़ाना। इस तरह की अभिव्यक्ति को खुदगर्जी कहते हैं। इस तरह की खुदगर्जी घिनौना, नीच चरित्र इसलिए दर्शाती है क्योंकि इस तरह का व्यवहार दूसरों के हितों को नुकसान पहुँचाता है। तुम अपने हितों की रक्षा करने के लिए अनुचित साधनों का उपयोग करते हो जबकि दूसरों के हितों को नुकसान पहुँचाते हो और उन्हें कमजोर करते हो—इसे खुदगर्जी कहते हैं। उदाहरण के लिए, जब सब लोग इकट्ठे खाना खा रहे होते हैं तब कुछ लोग सिर्फ इस बात की परवाह करते हैं कि उन्हें मांस मिलता है या नहीं और यहाँ तक कि वे दूसरों के हिस्से का मांस भी खा जाते हैं। क्या ज्यादा मांस खाने वाले ऐसे लोग खुदगर्ज होते हैं? (हाँ।) वे जिस तरीके से आचरण करते हैं वह अनुचित होता है, वे सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं और दूसरों की अनदेखी करते हैं—इसे खुदगर्जी कहते हैं। इस स्थिति को खुदगर्जी क्यों कहा जाता है? इसे नीच चरित्र क्यों माना जाता है? ऐसा इसलिए है क्योंकि वे अपने हितों की रक्षा करने के लिए दूसरों के हितों का अतिक्रमण करते हैं, दूसरों की चीजें जब्त कर लेते हैं और उन्हें अपना मानकर ले लेते हैं। इसे खुदगर्जी कहते हैं और इस तरह की खुदगर्जी घिनौनी मानवता और नीच चरित्र को दर्शाती है। इसलिए अगर तुम दूसरों के हितों का अतिक्रमण करके और उन्हें नुकसान पहुँचाकर अपने अधिकारों और हितों की रक्षा करते हो तो तुम खुदगर्ज व्यक्ति हो, नीच चरित्र वाले व्यक्ति हो। यह भी कहा जा सकता है कि तुम खराब मानवता वाले व्यक्ति हो। लेकिन अगर तुमने दूसरों के हितों को नुकसान नहीं पहुँचाया है, दूसरों के रिश्तों को तार-तार नहीं किया है या उन्हें नुकसान नहीं पहुँचाया है और दूसरों की चिंता किए बिना सिर्फ अपने बारे में सोचा है तो इस प्रकार की खुदगर्जी अब भी कुछ हद तक जायज कही जाने योग्य है। ज्यादा-से-ज्यादा यह कहा जा सकता है कि तुम बहुत दयालु नहीं हो और तुम ओछे और आत्म-केंद्रित हो, लेकिन तुम खराब व्यक्ति नहीं हो; यह नीच चरित्र के स्तर तक नहीं पहुँचता है। क्या इन दो तरह की खुदगर्जी की प्रकृति में कोई अंतर है? (हाँ।) लोगों की खुदगर्जी के स्तर और वे कैसे व्यवहार करते हैं इसके सार के आधार पर उनके चरित्र का भेद पहचानकर यह देखा जा सकता है कि लोगों के भीतर का चरित्र अलग-अलग होता है—इसमें भेद होते हैं।
कुछ लोग दूसरों के मामलों के बारे में कभी चिंता नहीं करते हैं और सिर्फ अपने मामलों पर ही ध्यान केंद्रित करते हैं। हो सकता है कि ऐसे लोग बहुत नेकदिल, बहुत मिलनसार और दूसरों के साथ अपने मेलजोल में बहुत गर्मजोशी भरे न लगें। लेकिन वे कभी भी बाधाएँ उत्पन्न नहीं करते हैं, कभी भी दूसरों के बारे में झूठ या अफवाहें नहीं फैलाते हैं और दूसरों की चीजों पर अतिक्रमण या उन्हें जब्त नहीं करते हैं। यकीनन वे कभी भी अपनी चीजें दूसरों को नहीं देते हैं। हो सकता है कि वे बहुत अनुदार और कंजूस लगें, लेकिन वे कभी भी दूसरों के हितों को नुकसान नहीं पहुँचाते हैं और वे अपने आचरण के तरीके में बहुत सिद्धांतनिष्ठ होते हैं। ऐसे लोगों की एक आधाररेखा होती है जो यह है : “मैं तुम्हारा फायदा नहीं उठाता हूँ और तुम्हें मेरा फायदा उठाने के बारे में नहीं सोचना चाहिए। मैं कभी भी तुम्हारा शोषण नहीं करता हूँ और तुम्हें मेरा शोषण करने के बारे में नहीं सोचना चाहिए।” वे बहुत सिद्धांतनिष्ठ होते हैं। वैसे तो ऐसे लोग दूसरों के प्रति उदासीन होते हैं, दूसरों की मदद करने के इच्छुक नहीं होते हैं, दूसरों से मेलजोल नहीं रखते हैं और दूसरों के प्रति ज्यादा मिलनसारिता या जोश नहीं दिखाते हैं, लेकिन वे कभी भी दूसरों को नुकसान नहीं पहुँचाते हैं। भले ही उनके पास कोई चीज बहुत ज्यादा मात्रा में हो तो भी वे उसे दूसरों को नहीं देते हैं। जब वे देखते हैं कि दूसरों के पास अच्छी चीजें हैं तब कभी-कभी उन्हें ईर्ष्या या जलन हो सकती है, लेकिन उन्हें लालचपूर्ण ढंग से ले लेने का उनका कोई इरादा नहीं होता है; वे चुपके से दूसरों का फायदा भी नहीं उठाते हैं, न ही वे अपने खुद के फायदे के लिए दूसरों के हितों का अतिक्रमण करते हैं। इन ऊपर बताए गए बिंदुओं को देखा जाए तो वे बुरे नहीं होते हैं। तो क्या इसका मतलब यह है कि उनकी मानवता अच्छी है? उनकी मानवता अच्छी है या नहीं, यह उनके जमीर और विवेक, सत्य स्वीकार करने के उनके रवैये और सकारात्मक चीजों के प्रति उनके रवैये पर निर्भर करता है—यह अलग मामला है। लेकिन कम-से-कम दूसरों के साथ मिलजुलकर रहने में उनके द्वारा अपनाए गए रवैये और ढंग को देखा जाए तो वे दूसरों के प्रति दुर्भावनापूर्ण नहीं होते हैं। ऊपर से ऐसा लगता है कि वे बहुत खुदगर्ज हैं, सिर्फ अपनी परवाह करते हैं, अपनी छोटी-सी दुनिया में जीते हैं और दूसरों के मामलों के बारे में चिंता नहीं करते हैं। लेकिन वे कभी भी दूसरों के हितों को नुकसान नहीं पहुँचाते हैं, इसलिए उनका चरित्र अब भी ठीक-ठाक है। यानी जब तुम उनसे बातचीत करते हो या उनके साथ भौतिक या सामाजिक लेन-देन करते हो, तब कम-से-कम वे तुम्हारे हितों को नुकसान तो नहीं पहुँचाएँगे। अगर तुम उनसे सलाह माँगते हो या उनसे कुछ सुझाव देने के लिए कहते हो तो वे तुम्हारी मदद कर देंगे, लेकिन अगर तुम नहीं कहते हो तो वे मदद करने की पहल नहीं करेंगे। इस अभिव्यक्ति से देखा जाए तो ऐसा लग सकता है कि ऐसे लोग काफी कटे-कटे रहते हैं, लेकिन इस तथ्य से देखा जाए कि वे कभी भी दूसरों का फायदा नहीं उठाते हैं या दूसरों के हितों को नुकसान नहीं पहुँचाते हैं तो उनमें अब भी मानवता मौजूद है और वे अपेक्षाकृत शालीन हैं। क्या इस तरीके से इसे देखना सटीक और वस्तुनिष्ठ है? (हाँ।) इसलिए सभी खुदगर्ज लोग कुकर्मी या खराब चरित्र वाले लोग नहीं होते हैं। तुम्हें यह भी देखना चाहिए कि क्या उनकी खुदगर्जी दूसरों के हितों को नुकसान पहुँचाने या दूसरों की संपत्ति पर कब्जा जमाने की सीमा तक पहुँच गई है और साथ ही यह भी देखना चाहिए कि उनके आचरण के और दुनिया से निपटने के सिद्धांत क्या हैं, उनके चरित्र का सार क्या है और क्या उनके आचरण करने के तरीके में सीमाएँ और सिद्धांत हैं। कुछ लोग जिस तरीके से दूसरों से मिलजुलकर रहते हैं उसमें वे ऊपर से बहुत उदार और गर्मजोशी भरे लगते हैं। वे दूसरों को देते भी हैं, दूसरों की मदद भी करते हैं और दूसरों के लिए चीजें भी करते हैं। अगर ऐसी कोई चीज है जिसमें तुम्हें मदद चाहिए और अगर वे इसे देख लेते हैं तो तुम्हारे माँगे बिना ही तुम्हारी मदद कर देते हैं। इन अभिव्यक्तियों से देखा जाए तो वे काफी दयालु लगते हैं। लेकिन अगर तुम उन्हें नाराज कर देते हो या अनजाने में ऐसा कुछ कर देते हो जो उनके हितों को नुकसान पहुँचाता है तो वे उस बात को जाने नहीं देंगे, वे मन-मुटाव पालेंगे, पुरानी रंजिशों का जिक्र करेंगे और तुम्हें कुचल डालने तक चुप नहीं बैठेंगे। ये बुरे लोग हैं—मानवता में उन लोगों से कहीं बदतर हैं जो बाहर से खुदगर्ज लगते हैं। तुम समझ रहे हो? (हाँ।) लोगों के बीच इन दोनों में से कौन-सा प्रकार ज्यादा आम है? तुम लोग किस प्रकार को पसंद करते हो? ज्यादातर लोग उन लोगों को पसंद नहीं करते हैं जो उदासीन और खुदगर्ज होते हैं। कुछ लोग जब तुम्हें मुश्किल में देखते हैं तब वे मदद करने की पहल करेंगे। अगर तुम मदद न भी माँगो तो भी वे पता करेंगे कि क्या तुम्हें मदद की जरूरत है। अगर तुम्हें जरूरत हो तो वे तुम्हारी मदद कर देंगे। ऐसे लोगों में दूसरों के प्रति प्रेम होता है और उनमें दूसरों को देने और उनकी मदद करने के प्रति झुकाव होता है। कुछ दूसरे लोग जब तुम्हें मुश्किल में देखते हैं तो वे तुम्हारी मदद करने की पहल नहीं करेंगे, फिर भी अगर तुम खुलकर बोलते हो और उनसे मदद माँगते हो तो वे तुम्हारी मदद कर देंगे। वैसे तो ऐसे लोग थोड़े से निष्क्रिय होते हैं, फिर भी वे खराब लोग नहीं होते हैं और उन्हें अच्छे लोग माना जा सकता है। एक और प्रकार का व्यक्ति होता है—तुम जिस मुश्किल का सामना कर रहे हो वह चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, वह मदद नहीं करेगा। अगर तुमने उससे मदद माँग भी ली तो भी वह मना करने के बहाने और कारण ढूँढ़ लेगा। इस तरह का व्यक्ति सबसे ज्यादा खुदगर्ज होता है। कुछ लोग अक्सर बाहरी तौर पर कहते हैं, “अगर तुम्हें किसी मदद की जरूरत हो तो बस मुझे बता देना।” जब कुछ नहीं चल रहा होता है तब वे विशेष रूप से नेकदिल, सक्रिय और सकारात्मक लगते हैं। लेकिन जब तुम वास्तव में उनसे किसी चीज के लिए मदद माँगते हो तो वे मदद के बाद चुकौती के बारे में संकेत देना शुरू कर देंगे, ऐसी चीजें कहेंगे, “मैंने उस मामले के लिए अपने बॉस को तोहफे देने में इतने पैसे खर्च किए।” देखो, ऊपर से वे काफी नेकदिल लगते हैं, बदले में कुछ माँगे बिना तुम्हें सेवाएँ देने और तुम्हारे लिए चीजें करने की पेशकश करते हैं। लेकिन जब वे मदद कर चुके होंगे तो तुम उनका यह व्यक्तिगत उपकार कभी नहीं चुका पाओगे। ऐसे लोग कितने कपटी होते हैं! क्या तुम्हें ऐसे लोगों से मेलजोल रखना चाहिए? (नहीं।) मैं बस ऐसे लोगों से मेलजोल नहीं रखता। वे मीठी-मीठी बातें करते हैं, विशेष गर्मजोशी और लिहाज दिखाते हैं। वे तुम्हारे मुँह पर अच्छी-अच्छी बातें कहते हैं, लेकिन तुम्हारी पीठ पीछे बुरी चीजें करते हैं। वे जो भी करते हैं उसमें उनका कोई सिद्धांत नहीं होता है; वे बस मुस्कुराते हुए बाघ हैं, अपनी मुस्कान के पीछे खंजर छिपाए रहते हैं। जब कुछ नहीं चल रहा होता है तब वे हमेशा तुम्हारे साथ हँसते हैं और मजाक करते हैं, ऐसा दिखाते हैं जैसे तुम उनके बहुत करीब हो। लेकिन जब तुम्हें सच में उनकी मदद की जरूरत होती है तब वे कहीं नजर नहीं आते हैं। यहाँ तक कि जो चीजें उनके लिए बहुत आसान होती हैं, उन्हें करने से बचने के लिए भी वे कारण और बहाने ढूँढ़ ही लेंगे। भले ही वह कोई ऐसी चीज हो जिसके लिए कम मेहनत की जरूरत हो, फिर भी वे तुमसे व्यक्तिगत उपकार माँगते हैं। जब वे तुम्हारे लिए कुछ करते हैं तब वे तुम्हें बदले में उन्हें कुछ देने के लिए मजबूर करने के सभी तरह के तरीके सोच लेंगे। तुम इस व्यक्तिगत उपकार का पूरा बदला कभी नहीं चुका पाओगे। दूसरी तरफ, जो लोग बाहर से काफी ठंडे लगते हैं और काफी खुदगर्ज दिखते हैं, उनकी अक्सर अपने आचरण में सीमाएँ होती हैं और वे अपने क्रियाकलापों में बहुत सावधान होते हैं। वैसे तो हो सकता है कि वे तुम्हारे प्रति उदासीन हों, लेकिन वे कभी तुम्हारे खिलाफ कोई साजिश नहीं रचेंगे। अगर तुम उनसे किसी चीज के लिए सचमुच मदद माँगते हो तो वे निश्चित रूप से बहुत गंभीरता से मदद करेंगे। बाद में अगर तुम किसी छोटे-मोटे व्यक्तिगत उपकार या किसी भौतिक चीज से उनका एहसान चुकाते हो तो वे इसे उचित रूप से लेंगे। लेकिन अगर तुम उन्हें कुछ नहीं देते हो तो वे तुमसे कुछ नहीं माँगेंगे और न ही वे उपकारों या चुकौती की माँग करने के लिए बार-बार यह बात छेड़ेंगे। ऐसे लोग सच्चे होते हैं; वे बाहर से जैसे दिखते हैं, अंदर से भी ठीक वैसे ही होते हैं। लेकिन अक्सर ऐसे लोगों को कोई पसंद नहीं करता है, यह कहा जाता है कि वे खुदगर्ज हैं, उनके साथ मिलजुलकर रहना मुश्किल है, वे ठंडे हैं और उनमें मानवीय स्पर्श की कमी है और कोई भी उनसे संपर्क नहीं रखना चाहता। वास्तव में इनमें से कुछ लोगों में ठीक-ठाक मानवता होती है। तुम लोग अपने आस-पास नजर दौड़ाओ और देखो कि इस तरह का व्यक्ति कौन है। वैसे तो वे वाक्पटु नहीं होते हैं, उनका व्यक्तित्व काफी ठंडा होता है और बाहर से उनमें मानवीय स्पर्श की कमी दिखाई देती है और वे दूसरों से बातचीत में शामिल होना या बातचीत शुरू करना नहीं जानते हैं, फिर भी वे अपने आचरण में काफी सिद्धांतनिष्ठ होते हैं। हो सकता है कि वे बहुत दयालु न हों, फिर भी उनके दिलों में कोई दुर्भावना नहीं होती है; कम-से-कम ज्यादातर लोगों के प्रति उनका कोई बुरा इरादा नहीं होता है। वे बाहर से जैसे दिखते हैं अंदर से भी बिल्कुल वैसे ही होते हैं। वे लोगों के दिल जीतने के लिए हथकंडों या सांसारिक आचरण के फलसफों का उपयोग नहीं करते हैं। ऐसे लोग सीधे-सादे होते हैं। क्या यही बात है? (हाँ।) तो क्या अब तुम्हारे पास एक आधार नहीं है जिस पर तुम्हें खुदगर्ज लोगों से सही ढंग से पेश आना चाहिए? तुम्हें किस आधार पर उनसे पेश आना चाहिए? यह तुम्हारी भावनाओं या पसंद पर आधारित नहीं हो सकता है और न ही इस पर आधारित हो सकता है कि तुम इन लोगों को पसंद करते हो या नहीं, तुम उनसे मिलजुलकर रहते हो या नहीं, वे तुम्हारे लिए मददगार या फायदेमंद हैं या नहीं और न ही यह तुम्हारे प्रति उनके रवैये पर आधारित हो सकता है—यह इन पर आधारित नहीं हो सकता है। इसके बजाय यह उनके चरित्र, उनके मानवता सार और लोगों के प्रति, सत्य के प्रति और सकारात्मक चीजों के प्रति उनके रवैये पर आधारित होना चाहिए। इन्हीं कारकों के आधार पर तुम्हें खुदगर्ज लोगों से पेश आना चाहिए। अगर वे सच में बुरे लोग हैं तो उसी के अनुसार उनसे निपटो। अगर वे बाहर से खुदगर्ज दिखते हैं, लेकिन उनकी मानवता बुरी नहीं है तो तुम्हें उनसे ऐसे पेश नहीं आना चाहिए कि वे बुरे लोग या बुरी मानवता वाले लोग हैं। भले ही तुम्हें ये लोग पसंद न हों या वे दूसरों के साथ मेलजोल रखने या रिश्ते बनाए रखने में अच्छे न हों, फिर भी तुम उन्हें सिर्फ इसलिए बुरे लोग या मानवता रहित नहीं मान सकते क्योंकि वे बाहर से खुदगर्ज दिखते हैं। यह इन लोगों के प्रति पूर्वाग्रह है। तो क्या अब तुम्हारे पास खुदगर्ज लोगों से पेश आने का सिद्धांत नहीं है? इसका सामान्यीकरण नहीं किया जा सकता है; बल्कि यह उनके मानवता सार पर और सत्य और अपने कर्तव्य के प्रति उनके रवैये पर और उस रवैये पर आधारित होना चाहिए जिससे वे आचरण करते हैं—तुम्हें इसी सिद्धांत के अनुसार उनसे पेश आना चाहिए। खुदगर्जी के मुद्दे पर हमारी संगति यहीं समाप्त होती है।
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?