सत्य का अनुसरण कैसे करें (10) भाग चार

बड़ी-बड़ी बातें करना

अगली अभिव्यक्ति है बड़ी-बड़ी बातें करना और कुछ भी वास्तविक न करना। आओ हम पहले यह चर्चा करें कि यह किस प्रकार की समस्या है। ऐसे लोगों को ऊँचे-ऊँचे धर्म-सिद्धांत बोलने और बड़ी-बड़ी बातें करने में आनंद आता है। सभाओं में वे अक्सर अपनी आकांक्षाओं, संकल्पों, अपनी खुद की समझ और कार्य के लिए अपनी योजनाओं पर चर्चा करते हैं। लेकिन जब कुछ वास्तविक करने का समय आता है तब वे कोई ऊर्जा नहीं जुटा पाते हैं। ऐसे लोगों में किस प्रकार की समस्या होती है? क्या यह जन्मजात स्थितियों, मानवता या भ्रष्ट स्वभावों का मुद्दा है? (मुझे लगता है कि यह भ्रष्ट स्वभावों के तहत आता है।) क्या यह भ्रष्ट स्वभावों के तहत आता है? यहाँ दो समस्याएँ शामिल हैं, है ना? एक है मानवता में दोष—वे कुछ भी वास्तविक करने के इच्छुक नहीं होते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इसके लिए उन्हें चिंता करने, कष्ट सहने, कीमत चुकाने और ऊर्जा खपाने की जरूरत होगी। क्या यहाँ थोड़ा-सा आलसीपन का संकेत नहीं है? क्या आलसीपन मानवता का दोष है? (हाँ।) जो लोग इतने आलसी होते हैं, वे कुछ भी वास्तविक नहीं करते हैं, फिर भी वे बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। वे अब भी खुद को ऊँचे आसन पर बिठाना और दूसरे लोगों को ऊँचे धर्म-सिद्धांतों का उपदेश देना पसंद करते हैं। क्या यह खराब स्वभाव को दर्शाता है? क्या इसमें भ्रष्ट स्वभाव के तत्व भी शामिल हैं? (हाँ।) यह किस प्रकार का भ्रष्ट स्वभाव है? (अहंकार।) यह एक अहंकारी भ्रष्ट स्वभाव है। और तो और, वे आलसी होते हैं, आराम पसंद करते हैं जबकि कार्य से नफरत करते हैं, वे चीजों को व्यावहारिक रूप से नहीं करते हैं और वे वास्तविक क्रियाकलाप में शामिल होने के अनिच्छुक होते हैं, फिर भी वे रौब जमाना, अपने रुतबे का हक जताना और दूसरों को उपदेश देना चाहते हैं—वे सिर्फ बातें करने के इच्छुक होते हैं, लेकिन एक तिनका तक उठाना नहीं चाहते। उनकी मानवता में कमियाँ बहुत गंभीर होती हैं और उनका भ्रष्ट स्वभाव बहुत स्पष्ट होता है। क्या ये दोनों बहुत जाहिर समस्याएँ नहीं हैं? (हाँ।) क्या ऐसे लोग बहुत सारे नहीं हैं? (हाँ।) कार्य पर चर्चा करते समय वे बड़ी-बड़ी बातें करते हैं और रुकने का नाम ही नहीं लेते हैं, लेकिन जब कुछ वास्तविक करने की बात आती है तब वे एक कदम नहीं उठा सकते हैं। चलो हम इस बारे में बात न करें कि उनकी काबिलियत कैसी है—सिर्फ इस तथ्य के आधार पर कि वे खाली बातें ही करते हैं और कुछ भी वास्तविक नहीं करते हैं, उन्हें निकम्मे लोगों के रूप में निरूपित किया जा सकता है। वे कुछ भी वास्तविक नहीं करते हैं, फिर भी रोब दिखाना और रुतबे के फायदे लेना चाहते हैं—क्या वे विवेकहीनता की हद तक अहंकारी नहीं हैं? वे खाली बातें करते हैं, कुछ भी वास्तविक नहीं करते हैं और वे आलसी और अहंकारी दोनों हैं—वे निकम्मे लोग हैं, है ना? अगर उनसे कोई कार्रवाई करने और कुछ वास्तविक करने, कार्य को व्यवस्थित करने, उसकी योजना बनाने और उसे कार्यान्वित करने के लिए कहा जाता है तो वे ऐसा करने के अनिच्छुक होते हैं; वे अपने दिलों की गहराइयों में इसके प्रति प्रतिरोध महसूस करते हैं। ऐसे लोग बस कितने आलसी होते होंगे! ये लफंगे लोग हैं जो अपने उचित कार्य पर ध्यान नहीं देते हैं। उन्हें बस गपशप करने में आनंद आता है, वे कुछ भी करना नहीं चाहते हैं, वे बस बेतरतीब ढंग से जीवन जीना, अच्छा खाना खाना और अच्छे कपड़े पहनना चाहते हैं और इसके बावजूद वे यह भी चाहते हैं कि दूसरे उनका बहुत सम्मान करें और उन्हें ऊँचे स्तर के व्यवहार से और रुतबे वाले लोगों को दिए जाने वाले व्यवहार से आनंद मिलता है। उनकी मानवता कैसी है? (खराब।) क्या तुम्हें ऐसे लोग घिनौने लगते हैं? (हाँ।) जब कुछ लोग ऐसे लोगों को देखते हैं जो वाक्पटु तो होते हैं लेकिन कुछ भी वास्तविक नहीं करते हैं, तब वे उनसे ईर्ष्या करते हैं। वे सोचते हैं, “वे लगातार बोल सकते हैं और वे जो भी कहते हैं वह सुगठित और सुव्यवस्थित होता है—इससे पता चलता है कि उनके पास सत्य वास्तविकता है।” सभी विवेकशील लोगों को यह पता चल सकता है कि अक्सर वे जो कुछ भी कहते हैं वह सब परमेश्वर के घर के धर्मोपदेशों और संगतियों से सीखा हुआ होता है, उनके अपने अनुभवों से प्राप्त किया हुआ नहीं होता है। इसलिए, वैसे तो सुनने में उनका उपदेश देना प्रभावशाली लगता है, लेकिन वे कोई भी समस्या बिल्कुल हल नहीं कर सकते हैं। समय के साथ लोग स्पष्ट रूप से यह देख सकते हैं कि ऐसे लोग शुरू से ही धोखेबाज थे। तुम जो भी प्रश्न पूछते हो, वे उसका जवाब नहीं दे सकते हैं और न ही वे कोई सिद्धांत या अभ्यास के मार्ग बता सकते हैं, फिर भी वे चाहते हैं कि तुम उनके बारे में ऊँची राय रखो। वे तुमसे अपने बारे में ऊँची राय कैसे रखवाते हैं? वे अपने प्रदर्शनों और बातों का उपयोग तुम्हारे दिल में जगह बनाने के लिए करते हैं जिससे तुम उनसे ईर्ष्या करते हो, उनकी सराहना करते हो और उनका आदर करते हो। क्या ऐसे लोग बेशर्म नहीं हैं? वे कोई वास्तविक कार्य नहीं करते हैं और न ही वे वास्तविक कार्य करने में सक्षम होते हैं, फिर भी वे चाहते हैं कि दूसरे लोग उनके बारे में ऊँची राय रखें और वे फिर भी अपनी बड़ी-बड़ी बातों से दूसरों की ऊर्जा और समय बरबाद करना चाहते हैं, लेकिन अंत में वे कतई कोई भी समस्या हल नहीं कर सकते हैं। जिन लोगों को परमेश्वर में विश्वास रखते हुए बस एक-दो वर्ष ही हुए हैं, वे अब भी उनके द्वारा गुमराह हो सकते हैं, लेकिन जिन लोगों को परमेश्वर में विश्वास रखते हुए बहुत सारे वर्ष हो चुके हैं और जो सत्य वास्तविकता को जरा-सा भी समझते हैं वे उनकी बड़ी-बड़ी बातें नहीं सुनना चाहते हैं। फिर भी अगर तुम सुनने से इनकार करते हो तो वे तुम्हारे बारे में नकारात्मक राय बनाते हैं और कहते हैं कि तुम सत्य से प्रेम नहीं करते हो। क्या ऐसे लोग बहुत परेशान करने वाले नहीं होते हैं? (हाँ।) उन्हें सत्य के किसी भी पहलू की सिर्फ आंशिक समझ होती है और जब वे थोड़े-से धर्म-सिद्धांत समझ लेते हैं तो वे उन्हें स्पष्ट रूप से नहीं समझा सकते हैं, फिर भी वे दूसरों को इन धर्म-सिद्धांतों का उपदेश देना चाहते हैं और दूसरों से इन्हें स्वीकार करवाना चाहते हैं। अगर तुम सुनने से इनकार करते हो तो वे कहते हैं कि तुम सत्य से प्रेम नहीं करते हो और उनका सम्मान नहीं करते हो। लेकिन अगर तुम उनकी बात सुन ही लेते हो तो तुम्हें बेचैनी महसूस होती है और तुम शांत नहीं बैठ सकते। तुम शांत क्यों नहीं बैठ सकते? क्योंकि तुममें ऐसी बहुत-सी समस्याएँ हैं जिन्हें हल करने की जरूरत है और ऐसा बहुत-सा कार्य है जिसे करने की जरूरत है और तुम्हारे पास उनकी बड़ी-बड़ी बातें सुनने का समय नहीं है। अगर कोई सच में उन लोगों की सराहना करता है जो बड़ी-बड़ी बातें करते हैं तो वह किस तरह का व्यक्ति है? वह एक निठल्ला, बेवकूफ और ऐसा व्यक्ति है जिसके पास करने के लिए कोई बेहतर चीज नहीं है। जब कर्तव्य निभाने की बात आती है, तब ऐसे लोगों में कोई लगन का भाव नहीं होता है और वे किसी भी प्रकार कोई बोझ नहीं उठाते हैं; वे जीवन में बस खानापूरी करना चाहते हैं, वे मुफ्तखोरी करते हैं और मरने की प्रतीक्षा करते हैं। वे हर रोज समय गुजारने के लिए कुछ गहन धर्म-सिद्धांत सुनते हैं, फिर भी वे सोचते हैं कि उन्होंने कुछ प्राप्त किया है और परमेश्वर में अपने विश्वास में प्रगति की है : “वे जिन सत्यों का उपदेश दे रहे हैं वे दिन-ब-दिन और ऊँचे होते जा रहे हैं—उनका उपदेश देना जल्द ही तीसरे स्वर्ग के स्तर तक पहुँच जाएगा! ये सभी स्वर्ग से प्राप्त रहस्य हैं!” वे बड़ी-बड़ी बातें करने वाले लोगों द्वारा बोले गए ढेरों धर्म-सिद्धांत सुनते हैं, फिर भी वे यह नहीं जानते हैं कि अपना कर्तव्य निभाने में कैसे समर्पित रहना है या अपना कर्तव्य निभाने में किन सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। तो क्या इन चीजों को सुनना उपयोगी है? (नहीं।) जब तुम लोगों का सामना बड़ी-बड़ी बातें करने और ऊँचे-ऊँचे धर्म-सिद्धांतों का उपदेश देने वाले लोगों से हो तो तुम्हें क्या करना चाहिए? क्या तुम्हें ध्यान से उनका अनुसरण करना चाहिए या उन्हें अस्वीकार कर देना चाहिए? (उन्हें अस्वीकार कर देना चाहिए।) तुम्हें उन्हें कैसे अस्वीकार करना है? तुम्हें यह जानने की जरूरत है कि उन्हें कैसे अस्वीकार करना है और तुम उन्हें क्यों अस्वीकार कर रहे हो। अगर तुम्हें यह नहीं पता हो तो जब तुम उन्हें अस्वीकार करोगे तब हो सकता है कि तुम अब भी अपने दिल में यह सोचो, “क्या उन्हें अस्वीकार करने का मतलब यह है कि मुझे सत्य से प्रेम नहीं है?” अगर तुम्हारा यह विचार है तो यह परेशानी की बात है—यह साबित करता है कि तुममें कोई विवेकशीलता नहीं है और तुम यह नहीं समझते कि सत्य वास्तविकता क्या है। अगर तुम उन्हें धर्म-सिद्धांत बोलते हुए सुनते हो और अब भी यही सोचते हो कि वे सत्य पर संगति कर रहे हैं और यहाँ तक कि अपने दिल में उनका अनुमोदन भी करते हो तो तुम निरे बेवकूफ हो। अगर तुममें बड़ी-बड़ी बातें करने वाले ऐसे लोगों द्वारा बोले गए धर्म-सिद्धांतों के बारे में विवेकशीलता है तो तुम्हें उन्हें अस्वीकार कर देना चाहिए। इसका कारण यह है कि वे जो कुछ भी बोलते हैं वह सब कुछ धर्म-सिद्धांत और खोखले शब्द हैं—यह बेकार है। यह भूख मिटाने के लिए केक का चित्र बनाने या प्यास बुझाने के लिए आलूबुखारों को निहारने जैसा है—यह वास्तविक समस्याओं को बिल्कुल भी हल नहीं कर सकता है। वे बहुत-से धर्म-सिद्धांत बोलते हैं, लेकिन ये धर्म-सिद्धांत उन वास्तविक समस्याओं से मेल नहीं खाते हैं जिनका सामना लोग अपने कर्तव्य करते समय करते हैं और ये उन्हें बिल्कुल हल नहीं कर सकते हैं। उन्हें सुनना न सुनने से बिल्कुल भी भिन्न नहीं है। वे नहीं जानते कि सुसमाचार कार्य और कलीसियाई जीवन में उठने वाली समस्याओं को कैसे हल किया जाए; वे नहीं जानते कि कार्य व्यवस्थाओं को कैसे कार्यान्वित किया जाए या किस कार्य में ऐसी कमियाँ और खामियाँ हैं जिन्हें ठीक करने की जरूरत है या जिन पर अनुवर्ती कार्रवाई करने की जरूरत है; और वे नहीं जानते कि जब दूसरे लोग विकृत धारणाओं को उठाते हैं तो कैसे उनका समाधान या खंडन करना है। वे इसमें से कुछ भी नहीं जानते हैं तो क्या उनकी बड़ी-बड़ी बातें सुनना समय की बरबादी नहीं है? यही कारण है कि तुम्हें उन्हें अस्वीकार कर देना चाहिए। लिहाजा, इन बड़ी-बड़ी बातों को इसलिए अस्वीकार कर देना चाहिए क्योंकि ये लोग जो बोलते हैं वह सत्य नहीं होता, बल्कि धर्म-सिद्धांत होते हैं। धर्म-सिद्धांत क्या होते हैं? धर्म-सिद्धांत ऐसे शब्दों से बने होते हैं जो मानवीय धारणाओं और कल्पनाओं के अनुरूप होते हैं। ये लोग समस्या के सार पर ध्यान केंद्रित करने वाले सत्य सिद्धांतों पर संगति नहीं करते हैं। वैसे तो उनके शब्द सुनने में सुखद लगते हैं और स्पष्ट और तार्किक ढंग से व्यक्त किए जाते हैं, लेकिन वे समस्याओं को बिल्कुल हल नहीं कर सकते हैं। इसलिए ये शब्द धर्म-सिद्धांत हैं; चाहे वे कितने भी सही क्यों न लगें, वे सत्य सिद्धांत नहीं हैं। कुछ लोगों के शब्द उथले लग सकते हैं, लेकिन वे समस्या के मूल पर वार कर सकते हैं और उसका सार स्पष्ट रूप से समझा सकते हैं। भले ही उनके कुछ शब्द गालियों जैसे बुरे लगें, फिर भी वे ऐसे शब्द होते हैं जिन्हें लोग स्वीकार कर सकते हैं और वे वास्तविक समस्याओं को हल कर सकते हैं। निस्संदेह, ये शब्द सत्य सिद्धांतों के अनुरूप होते हैं। कुछ शब्द सुखद, चातुर्यपूर्ण, परिमार्जित और गहन लग सकते हैं, लेकिन वे वास्तविक समस्याओं को बिल्कुल हल नहीं कर सकते हैं। वे सत्य सिद्धांतों से रत्ती भर भी संबंधित नहीं होते हैं और न ही वे लोगों को कोई मार्ग या दिशा दिखा सकते हैं। ये सभी सत्याभासी धर्म-सिद्धांत हैं। इसलिए इन शब्दों को अस्वीकार कर देना चाहिए। ऐसे लोगों को अस्वीकार करने का कारण यह है कि उनकी बड़ी-बड़ी बातें वह समय बरबाद करती हैं जिसका उपयोग तुम्हें अपना कर्तव्य निभाने में करना चाहिए, वह समय बरबाद करती हैं जिसका उपयोग तुम्हें सत्य खोजने में करना चाहिए और ये तुम्हारी व्यक्तिगत ऊर्जा को बरबाद करती हैं—इसलिए, तुम्हें उन्हें अस्वीकार कर देना चाहिए। तुम्हें उन्हें कैसे अस्वीकार करना चाहिए? तुम बस “अलविदा” कहकर उन्हें अस्वीकार कर दोगे, है ना? या तुम कह सकते हो, “चुप हो जाओ, मुझे तुम्हारी हर बात समझ में आ रही है। तुम मेरे उस प्रश्न का उत्तर कब दोगे जो मैंने तुमसे पूछा था? अगर तुम उसका उत्तर नहीं दे सकते हो तो तुरंत यहाँ से चले जाओ और मेरा समय बरबाद करना बंद करो।” क्या उन्हें अस्वीकार करने का यह तरीका अच्छा है? (हाँ।) मुझे यह काफी अच्छा लगता है—वरना तुम उन्हें और कैसे अस्वीकार करोगे? उनकी बड़ी-बड़ी बातों, धर्म-सिद्धांतों और नारों को अस्वीकार करना बिल्कुल फरीसियों को अस्वीकार करने जैसा है। इस तरह के लोग कुछ भी वास्तविक नहीं कर सकते हैं। उनकी मानवता मानक स्तर की नहीं होती है, उनकी काबिलियत खराब होती है और वे वास्तविक कार्य करने में मूल रूप से अक्षम होते हैं। इसके बावजूद वे अब भी तुम्हें गुमराह करने का प्रयास करने के लिए ऊँचे-ऊँचे धर्म-सिद्धांतों का उपयोग करते हैं। अगर तुम उन्हें अस्वीकार नहीं करते हो तो तुम निरे बेवकूफ हो। ऐसे लोगों से सामना होने पर उन्हें अस्वीकार करना सही है। बस “अलविदा” कहो और चले जाओ—यह बहुत आसानी से हल होने वाली चीज है, है ना? ठीक इसी तरीके से उन लोगों से पेश आना चाहिए जो बड़ी-बड़ी बातें तो करते हैं लेकिन कोई वास्तविक चीज नहीं करते हैं। इस तरह के लोग उचित और गंभीर तरीके से चीजें करने वाले लोग नहीं हैं; ये लोग व्यावहारिक ढंग से चीजें करने वाले लोग नहीं हैं। वे जो कहते हैं उसमें विश्वसनीयता नहीं होती है, वह ऐसा कुछ नहीं होता है जिसमें भावनात्मक लगाव हो और वह ऐसा कुछ नहीं है जो ऐसे सुने जाने योग्य हो, मानो वह कोई प्रभावशाली सलाह या कोई प्रभावशाली मार्ग हो। इसलिए जब उनकी बड़ी-बड़ी बातों की बात आती है, तो बस उन्हें सीधे अस्वीकार कर दो—उनकी कही बातों को लिख लेने की कोई जरूरत नहीं है और यह सँजोने योग्य नहीं है। इसी के साथ बड़ी-बड़ी बातों के मुद्दे पर हमारी चर्चा यहीं समाप्त होती है।

राजनीति पर चर्चा करना पसंद करना

आओ हम एक और अभिव्यक्ति के बारे में बात करें : राजनीति पर चर्चा करना पसंद करना। कुछ लोग अपने देश की राजनीतिक स्थिति या वैश्विक राजनीतिक स्थिति और साथ ही उच्च-स्तरीय राजनीतिक हस्तियों की नीतियों और बयानों, उनके शासन की कार्यसूची और राजनीतिक दिशा, विभिन्न नीतियों को कार्यान्वित करने के उनके तरीकों और साधनों वगैरह-वगैरह पर चर्चा करना पसंद करते हैं। संक्षेप में, वे अक्सर राजनीति से जुड़े विषयों पर चर्चा करते हैं; चाहे ये विषय प्राचीन राजनीति से संबंधित हों या आधुनिक राजनीति से या घरेलू राजनीति से संबंधित हों या अंतर्राष्ट्रीय राजनीति से, उन्हें समय-समय पर इन विषयों को उठाने में आनंद आता है। क्या राजनीति पर चर्चा करना पसंद करना जन्मजात स्थितियों, मानवता या भ्रष्ट स्वभावों के तहत आता है? तुम्हें नहीं पता, है ना? वह इसलिए क्योंकि यह विषय कुछ हद तक विशेष है। वे राजनीति पर चर्चा करना पसंद करते हैं और तुम लोगों की नजर में राजनीति कोई सकारात्मक चीज नहीं है। तुम सोचते हो : “अगर राजनीति पर चर्चा करना जन्मजात स्थितियों के भीतर कोई रुचि और शौक होता तो परमेश्वर लोगों को इस तरह की रुचि और शौक नहीं देता; अगर यह खराब मानवता का मुद्दा होता तो बिना कुछ खराब किए सिर्फ इस पर चर्चा करना खराब मानवता के समान नहीं होना चाहिए और यह भ्रष्ट स्वभाव के स्तर तक तो और भी कम पहुँच सकता है। तो इसे कहाँ वर्गीकृत किया जाना चाहिए?” अंत में तुम किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचते हो। क्या यही बात है? (हाँ।) तो क्या तुम लोगों का इस तरीके से सोचना सही है? तुम अंत में किसी निष्कर्ष पर क्यों नहीं पहुँचते हो? तुम कहाँ अटक रहे हो? तुम “राजनीति” शब्द पर अटक रहे हो, है ना? (हाँ।) अगर मैं ललित कलाओं, संगीत, नृत्य, डिजाइन या अर्थशास्त्र पर चर्चा करना पसंद करने की बात करूँ तो इसे कहाँ वर्गीकृत किया जाएगा? (इसे जन्मजात स्थितियों में रुचि और शौक के रूप में वर्गीकृत किया जाएगा।) अगर मैं इतिहास पर चर्चा करना या विशिष्ट भोजन पर चर्चा करना पसंद करने का जिक्र करूँ तो उसे कहाँ वर्गीकृत किया जाना चाहिए? (जन्मजात स्थितियों में।) जब यह कहा जाता है कि किसी व्यक्ति को किसी चीज पर चर्चा करना पसंद है, किसी चीज का अनुसंधान करना पसंद है या वह किसी चीज में अच्छा है तब इसका मतलब है कि उसे वह क्षेत्र पसंद है और उसे इसमें रुचि होती है। इसलिए, इसे जन्मजात स्थितियों के भीतर रुचि और शौक के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। लेकिन क्योंकि इस मामले में ये लोग जिस विषय पर चर्चा करना पसंद करते हैं वह राजनीति है, इसलिए तुम इसे इस तरीके से वर्गीकृत करने का साहस नहीं करते हो। तुम इसे इस तरीके से वर्गीकृत करने का साहस क्यों नहीं करते हो? क्योंकि राजनीति बहुत ही संवेदनशील विषय है और राजनीति कोई विशेष रूप से सकारात्मक चीज नहीं है, है ना? (सही कहा।) वैसे तो राजनीति कोई विशेष रूप से सकारात्मक चीज नहीं है, लेकिन जैसा कि अभी जिक्र किया गया है राजनीति पर चर्चा करना पसंद करने में जो गतिविधि है, वह चर्चा ही है। इसलिए इसे जन्मजात स्थितियों के भीतर रुचि और शौक के रूप में वर्गीकृत किया जाना चाहिए। ऐसे व्यक्ति की जन्मजात रुचि और शौक एक सापेक्ष मात्रा तक राजनीति का अनुसरण करना और उस पर चर्चा करना पसंद करना है। लेकिन क्या वह राजनीति में भाग लेता है? हम अभी तक उस पर नहीं पहुँचे हैं; अभी के लिए हम अपना पूरा ध्यान सिर्फ चर्चा के कार्य तक ही सीमित रख रहे हैं, इसलिए इसे सिर्फ जन्मजात स्थितियों के भीतर रुचि और शौक के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है। क्या अब तुम समझ रहे हो? (हाँ।) इसे इस तरीके से कहना वस्तुनिष्ठ है; यह एक तथ्य है, है ना? (हाँ।) उदाहरण के लिए, मान लो कि किसी को प्राचीन सम्राटों पर चर्चा करना पसंद है और वह अक्सर इस बारे में बात करता है कि कुछ सम्राट अपने मंत्रियों और आम जनता से किस तरह से पेश आते थे, कुछ शासक किस तरह से लगन से शासन करते थे और लोगों की परवाह करते थे और राष्ट्र के अनाज भंडार किस तरह से पर्याप्त थे और उनके शासनकाल के दौरान जनता का रहन-सहन किस स्तर तक पहुँच गया था। वे इस बारे में भी बात करते हैं कि कौन-से सम्राट अत्याचारी थे और उनके शासन में प्रजा किस तरह से बेसहारा थी, जबकि ये सम्राट खर्चीली दावतों और ऐयाशी में लिप्त रहते थे और अपने महलों में अत्यधिक ऐशो-आराम से रहते थे। फिर वे समकालीन राजनीतिक हस्तियों की समस्याओं पर चर्चा करते हैं, इस बारे में बात करते हैं कि कौन अच्छा काम कर रहा है और कौन नहीं, वगैरह। उन्हें बस इन चीजों पर चर्चा करना पसंद है। दूसरे शब्दों में, जन्मजात रूप से इस व्यक्ति की इस प्रकार के विषयों और मामलों में अपेक्षाकृत रुचि है। अपने दैनिक जीवन में उसके आराम और मनोरंजन करने का तरीका इन राजनीतिक मामलों पर चर्चा करना है, वह इसका उपयोग समय गुजारने के साधन के रूप में करता है—यह उसके जीवन का एक हिस्सा है। अगर उसे राजनीति पर सिर्फ चर्चा करना पसंद है तो यह सिर्फ एक रुचि और शौक है। क्या इसमें उसकी मानवता शामिल है? अगर तुम उसके राजनीति पर चर्चा करना पसंद करने को देखते हो तो तुम यह नहीं बता सकते कि उसका चरित्र कैसा है क्योंकि तुम यह नहीं देख सकते कि राजनीति के प्रति उसका रवैया और दृष्टिकोण क्या है। उसे बस ऐसे विषयों पर चर्चा करने में आनंद आता है और इन मामलों में उसकी रुचि है; इसमें उसके आचरण के सिद्धांत शामिल नहीं हैं। अगर किसी को राजनीति पर बस चर्चा करना पसंद है और वह अपने दैनिक जीवन में दूसरों से बातचीत करते समय और चीजों से निपटते समय इसे एक मनोरंजक विषय, बातचीत की सामग्री या बार-बार चर्चा का केंद्र मानता है तो यह एक रुचि और शौक है और इसमें उस व्यक्ति की मानवता शामिल नहीं है। ऐसी रुचि और शौक वाले लोग दूसरे शौक रखने वाले लोगों जैसे ही होते हैं—वे बराबर हैं। इस व्यक्ति को इसलिए महत्वाकांक्षी, खराब मानवता वाला या नीच चरित्र वाला नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि उसे राजनीति पर चर्चा करना पसंद है। वैसे तो परमेश्वर में विश्वास रखने वाले लोग राजनीति में भाग नहीं लेते हैं, लेकिन जब खुद राजनीति की बात आती है तब हर व्यक्ति को इसमें भाग लेने का अधिकार है। राजनीति कोई सकारात्मक चीज नहीं है, लेकिन इसे नकारात्मक भी नहीं कहा जा सकता है—यह बस एक ऐसी चीज है जो मनुष्य के सामाजिक विकास के क्रम में अनिवार्य रूप से मौजूद रहती है। इसलिए, सिर्फ राजनीति पर चर्चा करना पसंद करना इस बात को नहीं दर्शाता है कि व्यक्ति का चरित्र कैसा है। यह किसी ऐसे व्यक्ति जैसा है जिसे नृत्य करने में आनंद आता है—तुम यह नहीं कह सकते कि यह व्यक्ति पथभ्रष्ट है या वह उचित काम नहीं करता है। अगर किसी को इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद पसंद हैं तो तुम यह भी नहीं कह सकते कि यह व्यक्ति बड़ी-बड़ी चीजें करने में सक्षम है या यह सकारात्मक व्यक्ति है। क्या इस तरह की राय सही होगी? (नहीं।) तो इसका मूल्यांकन कैसे किया जाना चाहिए? यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम अपनी रुचियों और शौक के साथ क्या करते हो। अगर तुम कोई न्यायसंगत ध्येय में लगते हो तो तुम्हारी रुचियाँ और शौक फायदेमंद मूल्य की रचना कर सकते हैं। अगर तुम अपनी रुचियों और शौक का उपयोग नकारात्मक चीजें करने में लगाते हो, ऐसी चीजें जो लोगों को नुकसान पहुँचाती हैं और उनके हितों को खराब करती हैं, तब भी यह नहीं कहा जा सकता कि तुम्हारी रुचियाँ और शौक नकारात्मक हैं—बल्कि इसका मतलब यह है कि तुम्हारी मानवता खराब है और तुम जिस मार्ग पर चल रहे हो वह गलत है। तुम अपनी रुचियों और शौक का उपयोग बुरी चीजें करने के लिए कर सकते हो, लेकिन तुम्हारी रुचियाँ, शौक, खूबियाँ और संबंधित पेशेवर कौशल, तकनीकी कौशल और ज्ञान अपने आप में नकारात्मक नहीं हैं। तुम्हारी रुचियाँ और शौक चाहे जो भी हों, वे तुम्हारे उपयोग के लिए हैं। अगर तुम सही मार्ग पर चलते हो तो तुम अपनी रुचियों और शौक के साथ जो करते हो वह न्यायसंगत है। अगर तुम सही मार्ग पर नहीं चलते हो तो तुम अपनी रुचियों और शौक का उपयोग जो करने में करते हो वह न्यायसंगत नहीं है, बल्कि बुराई है। उदाहरण के लिए, कंप्यूटर सिर्फ एक मशीन है—यह एक तकनीकी साधन है। तुम कंप्यूटर का उपयोग सभाओं, धर्मोपदेशों और सुसमाचार का प्रचार करने के लिए कर सकते हो, लेकिन साथ ही कई खराब लोग और बुरे लोग कंप्यूटर का उपयोग बुरी चीजें करने के लिए भी कर सकते हैं। इसलिए, जब कंप्यूटर का उपयोग किसी न्यायसंगत ध्येय में लगने के लिए किया जाता है तब तुम यह नहीं कह सकते कि कंप्यूटर खुद न्यायसंगत है; इसी तरह से जब कंप्यूटर का उपयोग बुरी चीजें करने के लिए किया जाता है तब तुम यह नहीं कह सकते कि कंप्यूटर खुद बुरा है। तुम समझ रहे हो? (हाँ।) इसी तरह से जो लोग राजनीति पर चर्चा करना पसंद करते हैं उनके लिए राजनीति पर चर्चा करने की यह अभिव्यक्ति एक रुचि और एक शौक है—इसमें उनके मानवता सार के मुद्दे शामिल नहीं हैं। इसके अतिरिक्त, जो लोग राजनीति पर चर्चा करना पसंद करते हैं वे राजनीतिक विषय पसंद करते हैं। वे हमेशा सही और गलत के मामलों पर चर्चा करना और ऐसे विषयों पर दूसरों से बहस करना पसंद करते हैं जो राजनीतिक दृष्टिकोणों से संबंधित हैं। कुछ लोगों की मशहूर लोगों और महान हस्तियों से संबंधित विषयों में विशेष रूप से रुचि होती है, जबकि कुछ लोगों की उन विषयों में विशेष रूप से रुचि होती है जो समाज के अंधकारमय पहलुओं को उजागर करते हैं। लेकिन जो भी हो, जो लोग राजनीति पर चर्चा करना पसंद करते हैं, उनके पास सत्य नहीं होता है और उनके दिलों में परमेश्वर के लिए कोई जगह नहीं होती है—यह पूरी तरह से निश्चित है। ठीक है, राजनीति पर चर्चा करना पसंद करने के मुद्दे पर हमारी चर्चा के लिए इतना ही काफी है।

राजनीति में भाग लेना पसंद करना

राजनीति पर चर्चा करना पसंद करना कुछ लोगों की रुचि और शौक होता है। अब चलो हम इस चर्चा को एक कदम और आगे बढ़ाएँ और राजनीति में भाग लेना पसंद करने के बारे में बात करें। राजनीति में भाग लेना पसंद करना राजनीति पर चर्चा करना पसंद करने के समान नहीं है—इसमें क्रियाकलाप शामिल है। राजनीति में भाग लेना पसंद करना सिर्फ किसी तरह की भोजन-पश्चात बातचीत की सामग्री या मनोरंजन नहीं है और न ही यह सिर्फ रुचियों और शौक या राजनीति की परवाह करने के स्तर तक सीमित रहती है; बल्कि इसमें वह मार्ग शामिल है जिस पर व्यक्ति चलता है। तो फिर राजनीति में भाग लेना पसंद करने वाले लोग किस मार्ग पर चलते हैं? क्या इसमें उनकी मानवता शामिल होती है? (हाँ।) तो राजनीति में भाग लेना पसंद करने को किस रूप में वर्गीकृत किया जाना चाहिए? यह तुम सभी के लिए एक मुश्किल प्रश्न है—तुम इसकी असलियत नहीं देख सकते हो। तो फिर चलो हम इसके बारे में संगति करें। जीवन के हर क्षेत्र में ऐसे लोग मौजूद हैं जो राजनीति पर चर्चा करना पसंद करते हैं। देखो, वैसे तो किसान समाज के सबसे निचले पायदान पर रहते हैं, लेकिन उनमें से कुछ राजनीति के उच्चतर स्तरों से संबंधित मामलों के बारे में बहुत जानते हैं और वे ऐसे कुछ दृष्टिकोण व्यक्त कर सकते हैं जिनमें राजनीति शामिल होती है। जो लोग व्यापार और अर्थतंत्र में जुटे हैं, वे भी राजनीति पर चर्चा करते हैं और यहाँ तक कि कला और शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े लोग भी राजनीति पर चर्चा करते हैं। कहने का मतलब यह है कि हर प्रकार के क्षेत्र में ऐसे लोग मौजूद हैं जो राजनीति पर चर्चा करना पसंद करते हैं और राजनीतिक विषयों में उनकी रुचि है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि व्यक्ति किस क्षेत्र से जुड़ा है, अगर उसे राजनीति पर चर्चा करना पसंद है तो इसका पूरी तरह से यह कारण है कि उसकी राजनीति में रुचि है। इस रुचि का उसकी अंतर्निहित काबिलियत और उसके परिप्रेक्ष्य की ऊँचाई से कुछ हद तक संबंध होता है। वह राजनीतिक शक्ति के दायरे के भीतर विषयों पर पकड़ बना सकता है, इसलिए समय-समय पर वह अपने खुद के दृष्टिकोण व्यक्त करता है। उसकी अभिव्यक्तियाँ जन्मजात स्थितियों के भीतर रुचि और शौक के स्तर पर ही रहती हैं। लेकिन राजनीति में भाग लेने का मतलब विचार के स्तर पर इस तरह की रुचि और शौक से संतुष्ट होना नहीं है; बल्कि इसका मतलब है अपने मूल क्षेत्र को छोड़ देना और राजनीतिक कार्य में लग जाने, राजनीतिक मंच पर कदम रखने और राजनीतिक हस्तियों से व्यवहार करने का फैसला लेना। तो ऐसे लोगों के साथ क्या समस्या है? राजनीति में भाग लेना पसंद करने वाला इस तरह का व्यक्ति हो सकता है आमतौर पर राजनीति पर बहुत चर्चा न करे, लेकिन वह चाहे कोई भी करियर क्यों न चुने, जब तक वह ऐसा कोई कार्य करता है जो राजनीति से संबंधित नहीं है तब तक उसकी उसमें कोई रुचि नहीं होती है और उसे लगता है कि उसकी संभावनाएँ निराशाजनक हैं। लेकिन जब राजनीति में भाग लेने की बात आती है तब उसकी आँखें इच्छा से रोशन हो उठती हैं और उसकी रुचि पैदा हो जाती है। जब वह सुनता है कि कोई मेयर, गवर्नर, विधायक या राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव लड़ रहा है तब उसे अपने दिल में किसी चीज की हानि का एहसास होता है और वह खुद इसमें भाग लेने के तरीके सोचने में अपना दिमाग खपाने लगता है। वह किस तरह का व्यक्ति है? क्या वह ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसे सत्ता की बेहद इच्छा है? (हाँ।) तो इस तरह के व्यक्ति की मानवता के भीतर क्या अतिरिक्त चीज है? क्या वह पैसों के प्रति पूरी तरह से जुनूनी है या सत्ता के प्रति? (वह सत्ता के प्रति पूरी तरह से जुनूनी है।) वह सत्ता को सर्वोपरि देखता है, इसे अपने जीवन के रूप में देखता है, इसे अपने पूरे जीवन के लिए अनुसरण करने का लक्ष्य मानता है। तो वह वास्तव में किस तरह का व्यक्ति है? उसकी मानवता के भीतर क्या अतिरिक्त चीज है जो आम लोगों में नहीं होती है? (महत्वाकांक्षा और इच्छा।) उसमें क्या करने की महत्वाकांक्षा और इच्छा है? (सत्ता पर वर्चस्व रखना।) सत्ता पर वर्चस्व रखने से उसे सबसे सीधा फायदा क्या मिलता है? (रुतबा हासिल होता है और दूसरे लोग बहुत सम्मान करते हैं।) ये गौण हैं, महत्वपूर्ण फायदा नहीं हैं। (वे लोगों को नियंत्रित करना चाहते हैं।) यह करीब है। अगर किसी व्यक्ति को पद पर होना अच्छा लगता है, लेकिन वह जिस पद पर आसीन है वह सिर्फ एक खोखली पदवी है और उसके अधीन एक भी मातहत नहीं है तो क्या इसे सत्ता होना माना जा सकता है? (नहीं।) इसे सत्ता होना नहीं माना जा सकता। उसके पास कोई विशेष विशेषाधिकार नहीं है और वह पद पर होने के किसी भी फायदे का आनंद नहीं उठा सकता है। उसकी नजर में क्या ऐसे पद का कोई वास्तविक मूल्य है? (नहीं।) तो इस प्रकार के व्यक्ति में एक ऐसी चीज होती है जो दूसरों में नहीं होती—सत्ता के लिए अत्यधिक प्रबल महत्वाकांक्षा और इच्छा। चूँकि उसमें इस किस्म की महत्वाकांक्षा और इच्छा है, इसलिए वह जो लक्ष्य हासिल करना चाहता है वह सिर्फ दूसरों द्वारा बहुत सम्मान से देखा जाना, पूजा जाना या ईर्ष्या किया जाना जैसा सरल नहीं है, इसके बजाय वह पद पर होना, अधिकार रखना और दूसरों की अगुआई करना चाहता है। यही उसकी महत्वाकांक्षा और इच्छा होती है—अगर उसका कोई रुतबा न हो तो क्या वह अपना लक्ष्य हासिल कर सकता है? क्या कोई उसकी बात सुनेगा? बिल्कुल नहीं। इसीलिए वह रुतबा हासिल करने के लिए दृढ़ संकल्पित होता है। जैसे ही उसके पास रुतबा आ जाएगा, तब जब वह बोलेगा तो लोग उसकी बात सुनेंगे और जब वह दूसरों से कुछ करने की माँग करेगा तब ऐसे लोग होंगे जो उसकी आज्ञा मानेंगे और उसका अनुपालन करेंगे—तब उसकी महत्वाकांक्षा और इच्छा और जिसे वह हासिल करना चाहता है, वास्तविकता बन सकेगी। जो लोग राजनीति में भाग लेना पसंद करते हैं, उन्हें नेक और आकांक्षी के रूप में भले शब्दों में वर्णित तो किया जा सकता है, लेकिन सादे शब्दों में कहा जाए तो वे सिर्फ पद पर होने के प्रति जुनूनी होते हैं—उन्हें बस पद पर होना बहुत पसंद होता है। जब वे पद पर नहीं होते हैं तब वे अपनी नहीं चला सकते हैं और उनके पास अगुआई करने के लिए कुछ मातहत नहीं होते हैं और इसलिए वे हताश हो जाते हैं और उन्हें लगता है कि जीवन निराशाजनक है। लेकिन जैसे ही वे पद पर होते हैं तब जब वे बोलते हैं तब उनकी बात सुनने वाले लोग होते हैं, उनके अनुयायी होते हैं और नतीजतन उन्हें लगता है कि जीवन आनंददायक है। तो क्या उनकी मानवता में कोई समस्या है? (हाँ।) क्या इसे उनकी मानवता का दोष कहा जा सकता है? (नहीं।) यह निश्चित रूप से इतना सरल नहीं है। तो फिर यह किस तरह की समस्या है? (भ्रष्ट स्वभावों की।) क्या उनकी मानवता के लिहाज से इस तरह का व्यक्ति भरोसेमंद होता है? (नहीं।) तो क्या उसका चरित्र अच्छा है? (नहीं।) यह अच्छा क्यों नहीं है? (वह हमेशा लोगों को नियंत्रित करना चाहता है और हमेशा अपनी चलाना चाहता है।) इस तरह के व्यक्ति में रुतबे की विशेष रूप से प्रबल इच्छा होती है—वह अपनी चलाने के लिए हमेशा विभिन्न अवसर ढूँढ़ना चाहता है और हमेशा अगुआई की भूमिका में रहना और दूसरों को नियंत्रित करना चाहता है। ऐसे लोग गैर-भरोसेमंद होते हैं और उनका चरित्र भी अच्छा नहीं होता है। परमेश्वर के घर में इस किस्म के बहुत-से लोग हैं। अगर परमेश्वर का घर उन्हें किसी विशेष कार्य का प्रभारी बनाता है, तो वे मानते हैं कि इसका मतलब है कि वे पद पर हैं और अगुआई की भूमिका में सेवा कर रहे हैं। क्या वे सत्य सिद्धांत खोजेंगे? क्या वे कार्य-व्यवस्थाओं को कार्यान्वित करेंगे? (नहीं।) अगर वे पर्यवेक्षक या अगुआ होने को पद पर होना मानते हैं तो वे निश्चित रूप से कार्य-व्यवस्थाओं को कार्यान्वित नहीं करेंगे और वे निश्चित रूप से वास्तविक कार्य नहीं करेंगे। वे क्या करेंगे? वे अपने खुद के उद्यम में लग जाएँगे, अपना आधिपत्य खड़ा करेंगे, अपना खुद का रुतबा मजबूत करेंगे और अपने से नीचे के लोगों को अपने विचार संप्रेषित करेंगे और लोगों को अपनी बात सुनाएँगे—जिससे कार्य-व्यवस्थाएँ, परमेश्वर के इरादे और सत्य निरर्थक हो जाएँगे। ऐसे लोगों का सार बिल्कुल यही होता है। जब उनके पास कोई रुतबा नहीं होता है तब वे अपनी पूरी ताकत से उसके पीछे भागते हैं और जैसे ही उन्हें रुतबा हासिल हो जाता है, उनके लिए इसका यह मतलब होता है कि उन्हें एक अवसर मिल गया है। क्या करने का अवसर? अपनी खुद की महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने का और अपने रुतबे को हर संभव अधिकतम सीमा तक मजबूत करने का अवसर; वे ऐसे अवसर का उपयोग अपनी महत्वाकांक्षाओं को और पद पर होने की अपनी लत को पूरा करने के लिए करते हैं।

राजनीति में भाग लेना पसंद करना खराब चरित्र और भ्रष्ट स्वभाव दोनों का मामला है। यहाँ कितने भ्रष्ट स्वभाव शामिल हैं? (अहंकार और क्रूरता।) अहंकार, क्रूरता, सत्य से विमुखता और अड़ियलपन—ये सारे भ्रष्ट स्वभाव मौजूद हैं; हर एक मौजूद है। तो फिर यहाँ सबसे गंभीर भ्रष्ट स्वभाव कौन-सा है? वह क्रूरता है—जो विशिष्ट विशेषता सबसे स्पष्ट है वह है क्रूरता। जो लोग राजनीति में भाग लेना पसंद करते हैं, वे अगर दुनिया में निराश और असफल हैं, राजनीति में भाग लेना तो चाहते हैं लेकिन उन्हें अवसर नहीं मिल रहा है या राजनीतिक हलकों में घुसने का कोई रास्ता नहीं मिल रहा है तो जब वे परमेश्वर के घर में आते हैं तब उनकी महत्वाकांक्षा मर नहीं जाती है—वे अब भी राजनीति में भाग लेना चाहते हैं। इसलिए वे विभिन्न स्तरों पर अगुआओं के चुनाव से इस तरह पेश आते हैं मानो यह सरकारी अधिकारियों का चुनाव हो। हर बार जब ऐसा कोई चुनाव होता है तब वे भाग लेने के लिए बेहद उतावले रहते हैं, हर जगह लोगों से उन्हें वोट देने की पैरवी करते हैं। जैसे ही वे अगुआ बन जाते हैं, वे इसे पद पर होने, अपने लिए रुतबा पकड़कर रखने, शक्ति हथियाने और वे जैसा चाहें वैसा करने के रूप में देखते हैं। वे जैसे भी चाहें वैसे कार्य करते हैं और परमेश्वर के घर द्वारा उन्हें सौंपे गए कार्य को और जो कर्तव्य उन्हें करना चाहिए उसे अनदेखा करते हैं, सिर्फ रुतबे के फायदों में लिप्त रहने की परवाह करते हैं। वे अगुआ का कर्तव्य निभाने को पद पर होना मानते हैं, वे वही करते हैं जो उन्हें पसंद हो और वे करना चाहते हों और ऐसे किसी भी तरीके से कार्य करते हैं जो उन्हें अपना खुद का आधिपत्य खड़ा करने, अपने खुद का रुतबा मजबूत करने, दूसरों को अपनी बात सुनाने और पद पर होने की अपनी लत को पूरी तरह से संतुष्ट करने में सक्षम करता है। वे परमेश्वर के घर के कार्य पर या कार्य-व्यवस्थाओं की अपेक्षाओं पर विचार नहीं करते हैं। इस तरह के लोग बहुत खतरनाक होते हैं—अगर उन्हें अभी तक मसीह-विरोधी के रूप में प्रकट न भी किया गया हो तो भी वे मसीह-विरोधी बनने की प्रक्रिया में हैं। क्या जो लोग राजनीति में भाग लेना पसंद करते हैं उनमें अच्छे लोग होते हैं? नहीं, इनमें अच्छे लोग नहीं होते हैं। जिन लोगों में सत्ता की प्रबल इच्छा होती है, उनके लिए सत्य से प्रेम करना संभव नहीं है। क्योंकि उनमें सत्ता के लिए अत्यधिक जोरदार इच्छा होती है, इसलिए उनका जमीर और विवेक उनकी सत्ता की इच्छा और उसके अनुसरण को दबा या रोक नहीं सकते हैं। अगर कोई व्यक्ति राजनीति में भाग लेना पसंद करता है या ऐसा करने के प्रति अत्यधिक जुनूनी है और उसमें ऐसा करने की जोरदार इच्छा है तो इसका मतलब है कि उसमें रुतबे और शक्ति की जोरदार महत्वाकांक्षा है। उसके इरादे और उद्देश्य और उसके स्व-आचरण और क्रियाकलापों का आधार जमीर और विवेक द्वारा निर्धारित होने के बजाय पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करते हैं कि वह सत्ता हासिल कर सकता है या नहीं और उसकी महत्वाकांक्षा पूरी हो सकती है या नहीं। यही कारण है कि ऐसे लोगों की मानवता भयावह होती है। सत्ता की अपनी इच्छा पूरी करने और सत्ता हासिल करने के लिए वे कुछ भी करने और किसी भी चीज का बलिदान देने में सक्षम होते हैं—यहाँ तक कि उन लोगों का भी जिनके वे सबसे करीब होते हैं और जिनसे वे सबसे ज्यादा प्रेम करते हैं। इस आधार पर देखा जाए तो क्या ऐसे लोगों में मानवता होती है? (नहीं।) उदाहरण के लिए, मान लो कि एक आदमी राजनीति में भाग लेना पसंद करता है और उसकी सत्ता की अत्यधिक जोरदार इच्छा है। जब उसके लिए राजनीति में भाग लेने और रुतबे और सत्ता, जिनकी वह आकांक्षा करता है, को हासिल करने का एक अवसर उत्पन्न होता है तब अगर उसे वह रुतबा, जिसका वह पीछा कर रहा है, हासिल करने के लिए अपनी प्रेमिका का बलिदान भी देना पड़े तो भी वह ऐसा करने से हिचकिचाएगा नहीं—उसका दिल बिल्कुल भी नर्म नहीं पड़ेगा। कुछ लोग रुतबा हासिल करने के लिए अपने माता-पिता तक का बलिदान देने से नहीं हिचकिचाएँगे—वे किसी का भी बलिदान देने में सक्षम हैं। सिर्फ एक चीज है जिसे वे कभी भी जाने नहीं देंगे और वह है रुतबा। दूसरे शब्दों में, वे किसी भी व्यक्ति, घटना या चीज का उपयोग रुतबे के लिए सौदेबाजी के सिक्कों और विनिमय की कीमत के रूप में कर सकते हैं। तो ऐसे लोगों के चरित्र को देखा जाए तो क्या उनमें वास्तव में जमीर और विवेक होता है? (नहीं।) यही कारण है कि इस तरह के लोग बहुत भयावह होते हैं। हो सकता है कि उनका जमीर और विवेक गायब हो चुके हों या हो सकता है कि शुरू से ही उनमें जमीर या विवेक रहा ही न हो—दोनों बातें संभव हैं। मैं क्यों कहता हूँ कि दोनों बातें संभव हैं? जब इन लोगों का कोई रुतबा नहीं होता है और जब राजनीतिक मामले शामिल नहीं होते हैं तब हो सकता है कि वे दूसरों के साथ मिलजुलकर रहें, हो सकता है कि वे लोगों की मदद करें, हो सकता है कि वे दूसरों का कभी फायदा न उठाएँ और हो सकता है कि वे दान दें और बहुत सहनशील हों। ऊपर से ऐसा लगता है कि उनमें मानवता है और उनका जमीर और विवेक सामान्य दिखते हैं। लेकिन तुम्हें नहीं पता कि वे अपनी आत्मा की गहराई में किस चीज से प्रेम करते हैं। जब तुम्हें पता चलता है कि अपनी आत्मा की गहराई में वे जिससे प्रेम करते हैं वह रुतबा और सत्ता है और तुम उनकी मानवता को फिर से देखते हो तब तुम्हारा नजरिया बदल जाता है और उनकी मानवता के बारे में तुम्हारी समझ और मूल्यांकन भी बदल जाता है। जब रुतबा और सत्ता शामिल नहीं होते हैं तब जब वे दूसरों से मेलजोल रखते हैं तब वे सामान्य ढंग से व्यवहार करते हैं और वे शालीन लोग लगते हैं। लेकिन जैसे ही उन्हें रुतबा और सत्ता हासिल हो जाती है, उनका व्यवहार अब पहले जैसा नहीं रहता है—तुम यह अब और नहीं देख सकते कि उनका जमीर या विवेक कहाँ है। सिर्फ तब जाकर तुम्हें एहसास होता है कि ऐसे लोग वाकई भयावह होते हैं। यह पता चलता है कि उन्होंने जो मानवता दिखाई, वह अस्थायी थी—वह बस एक विशेष परिवेश के और विशेष फायदों की लालसा के कारण ऐसे हालात में प्रकट हुई जिनमें उनकी प्रिय सत्ता और रुतबा शामिल नहीं थे। लेकिन जैसे ही रुतबा और सत्ता शामिल हो जाते हैं, उनकी असली मानवता प्रकट हो जाती है। जब तुम उनकी असली मानवता देखते हो तब तुम उन्हें ऐसे लोगों के रूप में परिभाषित करते हो जो मानवता से रहित होते हैं। यानी उनके दिलों की गहराइयों में बसी मूलभूत चीज को देखने से पहले तुम्हें लगता है कि वे दूसरों के साथ यथोचित रूप से मिलजुलकर रह सकते हैं और वे मानवता से रहित नहीं हैं। लेकिन जब तुम उनकी आंतरिक दुनिया और उनके मानवता सार को सही मायने में समझ जाते हो और देखते हो कि उन्हें रुतबे और शक्ति से प्रेम है तब तुम्हें एहसास होता है कि ऐसे लोगों में कोई मानवता नहीं होती है—वे दोगले होते हैं। अविश्वासी इस तरह की अभिव्यक्ति को क्या कहते हैं? क्या इसे खंडित व्यक्तित्व नहीं कहा जाता है? (हाँ।) एक गैर-मानव मानव देह पहन लेता है—जब वह दूसरों से मेलजोल रखता है तब तुम यह नहीं देख सकते कि उसकी आत्मा की गहराई में क्या बसा है, इसलिए तुम सोचते हो कि वह एक सामान्य व्यक्ति है—शायद तुम यह भी मानते हो कि वह एक अच्छा व्यक्ति है। लेकिन जब तुम उसका दूसरा पहलू देखते हो तब तुम न सिर्फ यह सोचना बंद कर देते हो कि वह अच्छा व्यक्ति है बल्कि तुम्हें वह भयावह भी लगने लगता है। गैर-मानव होने का यही मतलब है। गैर-मानव आखिर क्या होते हैं? भले ही वे जो प्रदर्शित करते हैं वह जरा-सा मानव के समान हो, लेकिन यह वास्तविक नहीं होता है। क्योंकि उनके पास सत्य वास्तविकता नहीं होती है, इसलिए उनकी कभी-कभार की अच्छी अभिव्यक्तियाँ उनके सार को नहीं दर्शाती हैं। जब वे सही मायने में अपना मार्ग चुनते हैं तब वे जो मानवता प्रदर्शित करते हैं, वही उनका सार होता है। इसलिए, तुम्हें ऐसे लोगों के बाहरी रूप-रंग से गुमराह नहीं होना चाहिए—मुख्य चीज यह देखना है कि वे किस मार्ग पर चलते हैं और उनका सार क्या है। क्या अब मैंने इस मामले को स्पष्ट रूप से समझा दिया है? (हाँ।) तुम लोगों को क्या समझ आया है? अगर किसी व्यक्ति को राजनीति पर चर्चा करना अच्छा लगता है और यह सिर्फ विचार के स्तर तक ही रहता है और सिर्फ एक रुचि और शौक है तो यह कोई समस्या नहीं है। लेकिन अगर उसे राजनीति में भाग लेना अच्छा लगता है तो अब यह विचार का मुद्दा नहीं रह जाता है—इसमें उसके स्व-आचरण की और जिस मार्ग पर वह चलता है उसकी समस्या शामिल है। जैसे ही इसमें उसके आचरण करने का तरीका और वह मार्ग शामिल होता है जिस पर वह चलता है, इसमें उसका चरित्र शामिल हो जाता है। और जब इसमें उसका चरित्र शामिल होता है तब ज्यादातर मामलों में इसमें भ्रष्ट स्वभाव शामिल होते हैं। क्या यह ऐसा नहीं है? (हाँ।) चलो ठीक है, राजनीति में भाग लेना पसंद करने की अभिव्यक्ति पर हमारी चर्चा यहीं समाप्त होती है।

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