सत्य का अनुसरण कैसे करें (10) भाग पाँच

साहित्य पसंद करना, तकनीक पसंद करना आदि

आओ हम एक और अभिव्यक्ति के बारे में बात करें, साहित्य पसंद करना। यह किस प्रकार की अभिव्यक्ति है? (एक जन्मजात स्थिति।) यानी ऐसे लोग स्वाभाविक रूप से साहित्य पसंद करते हैं। क्योंकि उन्हें साहित्य पसंद होता है, इसलिए जब साहित्य से संबंधित विषयों, किताबों और मामलों की बात आती है तब वे एक विशेष लगाव और जिज्ञासा अभिव्यक्त करते हैं या वे एक विशेष रवैया अभिव्यक्त करते हैं—यह जन्मजात स्थिति है। तो फिर तकनीक पसंद करने के बारे में क्या कहते हो? (यह एक जन्मजात स्थिति है।) यानी बाहरी दुनिया की चीजों की दखलंदाजी न होने या उनके बीच में न पड़ने पर लोग कुछ विशेष तरह की चीजों में बहुत रुचि रखते हैं, वे उस प्रकार की किताबें पढ़ना पसंद करते हैं और वे उस प्रकार के विषयों पर ध्यान देना और चर्चा करना भी पसंद करते हैं; साथ ही उनकी आकांक्षा उस प्रकार की चीजों से संबंधित किसी पेशे या क्षेत्र में शामिल होने की भी होती है। यह जन्मजात है—इसके लिए यह जरूरत नहीं होती कि दूसरे लोग बीच में पड़ें और न ही इसे सिखाने की जरूरत होती है और यकीनन इसके लिए यह जरूरत नहीं होती कि उनके जीवनकाल के दौरान दूसरे लोग जानबूझकर उन्हें प्रभावित करें या मतारोपण करें। वे जन्म से ही कुछ चीजों को पसंद करते हैं। तकनीक पसंद करना जन्मजात स्थिति है तो पौधों और जानवरों को पसंद करने के बारे में क्या कहते हो? (वह भी जन्मजात स्थिति है।) पौधों और जानवरों को पसंद करना—पेड़ों, कीड़ों और पक्षियों की परवाह करना; विशेष रूप से छोटे जानवरों के साथ घुलना-मिलना पसंद करना, उनके साथ करीबी संपर्क रखना और उनके प्रति विशेष रूप से प्रेमपूर्ण और सहनशील होना—एक जन्मजात स्थिति है। देखो, जन्मजात स्थितियों के भीतर शामिल ये चीजें बहुत सामान्य हैं, है ना? (हाँ।) इनमें अहंकार और दुष्टता जैसी भ्रष्ट स्वभावों वाली नकारात्मक चीजें शामिल नहीं हैं। फिर ये चीजें जैसे कि विमानन पसंद करना, इतिहास पसंद करना, खगोल विज्ञान और भूगोल पसंद करना, पोषण विज्ञान और चिकित्सा विज्ञान पसंद करना, कानून पसंद करना, खेती पसंद करना—ये किस प्रकार की अभिव्यक्तियाँ हैं? (जन्मजात स्थितियाँ।) कुछ लोग खेती पसंद करते हैं; वे विभिन्न पौधों की कलम लगाने, उनमें सुधार करने और उनकी उपज, इन सभी पर शोध करना पसंद करते हैं; वे पौधों पर जलवायु और तापमान के प्रभावों पर शोध करना पसंद करते हैं; वे सब्जियाँ, फसलें, पेड़ और फूल लगाना पसंद करते हैं। रोजाना उनके हाथ मिट्टी से सने रहते हैं और वे मेहनत के कारण सख्त हो जाते हैं। इन लोगों को डॉक्टर, वकील या अधिकारी बनना पसंद नहीं आएगा—वे बस खेती करना और पौधों को सँभालना पसंद करते हैं और इस तरह से जीकर वे बहुत सहज महसूस करते हैं। क्या लोगों को जो पसंद है, उनकी जो रुचियाँ और शौक हैं उसका उनकी मानवता से कोई संबंध है? (नहीं।) क्या यह उनकी मानवता को प्रभावित करता है? (नहीं।) मूल रूप से, यह उसे प्रभावित नहीं करता है। किसानों को बहुत नेक नहीं कहा जा सकता; उनमें भी भ्रष्ट स्वभाव होते हैं। इसी तरह, वे उच्च-स्तरीय बुद्धिजीवी, जैसे कि वे लोग जो प्रौद्योगिकी, साहित्य, चिकित्सा या कानून जैसे क्षेत्रों में शामिल हैं, उनमें किसानों से ज्यादा मानवता नहीं होती है। इतना ज्ञान प्राप्त करने, इतनी सारी किताबें पढ़ने और इतने लंबे समय तक शिक्षित होने के बाद अंत में उन्हें परमेश्वर की बिल्कुल भी समझ नहीं होती है—उन्होंने बस किताबों से जरा-सा ज्यादा सीखा है और थोड़ा-सा ज्यादा ज्ञान और अंतर्दृष्टि प्राप्त की है। लेकिन जब यह बात आती है कि उन्हें कैसे आचरण करना चाहिए, किस तरह के जीवन मार्ग का अनुसरण करना चाहिए, उन्हें परमेश्वर में कैसे विश्वास रखना चाहिए और उसकी आराधना कैसे करनी चाहिए और जीवन के तमाम तरह के मामलों में स्व-आचरण के सिद्धांतों के अनुरूप होने के लिए किस तरह से कार्य करना चाहिए—तो उन्हें इनमें से किसी भी चीज के बारे में कुछ भी पता नहीं होता है। विभिन्न क्षेत्रों में रुचि और शौक रखने वाले लोगों की समान विशेषता यह होती है कि वे जो भी पसंद करते हैं उसे करने को तैयार रहते हैं और वे उस क्षेत्र के कार्य में शामिल होने को तैयार रहते हैं और फिर वे खुद को उस क्षेत्र के लिए समर्पित कर देते हैं। वे खुद को चाहे किसी भी क्षेत्र के लिए समर्पित क्यों न कर दें, जब तक वे इस समाज के भीतर हैं तब तक उन्हें शैतान द्वारा अनुकूलित और भ्रष्ट किया गया है। किसी भी व्यक्ति की मानवता सिर्फ इसलिए नेक नहीं बन जाती है कि उसकी रुचियाँ और शौक या वह जिस क्षेत्र में निरत रहता है वे दूसरों की रुचियों, शौक या क्षेत्र से ज्यादा नेक या सम्मानजनक हैं। इसी प्रकार, कोई भी व्यक्ति सिर्फ इसलिए दूसरों से ज्यादा अधम या भ्रष्ट नहीं बन जाता क्योंकि वह जिस पेशे में है वह निचले दर्जे का है, नीचा है या दूसरों द्वारा नीची नजर से देखा जाता है। इसके विपरीत, किसी व्यक्ति की रुचियाँ और शौक चाहे जो भी हों, वह चाहे किसी भी शक्ति या गुण का उपयोग करके किसी भी क्षेत्र में जुटा हो, अंत में उसके पास जो विचार और दृष्टिकोण होते हैं वे सत्य के अनुरूप नहीं होते हैं। सभी लोगों का सत्य के प्रति और परमेश्वर के प्रति समान रवैया होता है और वे जो प्रकट करते हैं वह सब भ्रष्ट स्वभाव होता है। लोगों का साझापन यह है कि वे भ्रष्ट स्वभावों को अपने जीवन के रूप में जीते हैं। इसलिए, तुम्हारी रुचियाँ और शौक चाहे कुछ भी हों और तुम चाहे किसी भी पेशे में लगे हो, इसका मतलब यह नहीं है कि तुम्हारी मानवता इससे प्रभावित होगी और न ही इसका मतलब यह है कि तुम्हारी मानवता किसी हद तक उन्नत या क्षरित हो जाएगी। इन तथ्यों से यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर लोगों को जो जन्मजात स्थितियाँ देता है वे उनके स्व-आचरण और क्रियाकलापों की कसौटियों को प्रभावित नहीं करती हैं या उनके क्रियाकलापों के मार्ग और दिशा को नहीं बदलती हैं। ज्यादा-से-ज्यादा ये रुचियाँ और शौक सिर्फ ऐसे साधन या एक प्रकार की जन्मजात पूँजी हैं जिन पर वे जीवित रहने के लिए निर्भर करते हैं ताकि वे जिस क्षेत्र में लगे हैं, उसके जरिये वे आमदनी कमा सकें और इस प्रकार अपनी आजीविका बनाए रख सकें। लेकिन अपनी आजीविका बनाए रखने की प्रक्रिया में विभिन्न क्षेत्रों के लोगों के समूहों के बीच लोग जिन विभिन्न विचारों और दृष्टिकोणों को स्वीकार करते हैं, वे समान ही होते हैं। इसलिए, अंततः कोई व्यक्ति चाहे किसी भी क्षेत्र में हो, वह समाज के किसी भी कोने में हो या वह लोगों के किसी भी समूह या किसी भी जाति से संबंधित हो, वह जो भ्रष्टता प्राप्त करता है वह समान ही होती है। तुम सिर्फ इसलिए दूसरों से ज्यादा नेक या कम गहराई में भ्रष्ट नहीं हो जाते कि तुम जरा-सा ज्यादा ऊँचे स्तर की नौकरी या पेशे में लगे हो और न ही तुम सिर्फ इसलिए दूसरों से ज्यादा गहराई में भ्रष्ट हो जाते हो कि तुम जिस क्षेत्र में लगे हो वह निम्न श्रेणी का है। संक्षेप में, तुम्हारी जन्मजात रुचियाँ और शौक चाहे जो भी हों, अंत में तुम इस समाज में और लोगों के बीच शैतान द्वारा अनिवार्य रूप से और प्रतिरोध की क्षमता के बिना भ्रष्ट कर दिए जाते हो।

वित्तीय और लेखा-जोखा रखने का कार्य पसंद करना

अब आओ हम एक और अभिव्यक्ति के बारे में बात करें। कुछ लोग वित्तीय और लेखा-जोखा रखने का कार्य पसंद करते हैं; वे संख्याओं से निपटना पसंद करते हैं और अपना पूरा जीवन वित्तीय कार्य में जुटकर बिता देते हैं। वे हर रोज लेखा-जोखा रखते हैं, खातों का निपटान करते हैं, भुगतान और धन की प्राप्तियों को सँभालते हैं—उनका दिमाग सारा समय आँकड़ों से भरा रहता है, फिर भी यह उन्हें कभी थकाऊ नहीं लगता है। वित्तीय और लेखा-जोखा रखने का कार्य पसंद करना—यह किस पहलू के तहत आता है? (जन्मजात स्थितियों के।) यह एक ऐसी खूबी है जो परमेश्वर लोगों को देता है। चूँकि तुम इसमें अच्छे हो, इसलिए तुम स्वाभाविक रूप से यह पेशा अपना सकते हो और फिर तुम अपने जीवन भर के लिए एक आजीविका सुरक्षित कर लेते हो—इसी तरह से तुम अपना भरण-पोषण करते हो। यह परमेश्वर द्वारा तुम्हारे लिए स्वर्ग से मन्ना या बटेर नीचे भेजने के समान है ताकि तुम्हारे पास खाने के लिए कोई चीज हो। यह रुचि और शौक आसमान से गिरते सुनहरे हंस की तरह है जो तुम्हारे हाथों में उतरता है, तुम्हें यह रुचि और शौक रखने में सक्षम करता है। फिर तुम स्वाभाविक रूप से अपनी रुचि और शौक से संबंधित पेशे में जुट जाते हो और इसे अपनी आजीविका बनाकर अब तक खुद को बनाए रखे हुए हो। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम इसे अच्छी तरह से करते हो या नहीं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम कितने वर्षों से इसमें शामिल हो, अगर यह कोई ऐसी चीज है जिसके साथ तुम पैदा हुए तो यह वही है जिसे परमेश्वर ने तुम्हारे लिए नियत किया है—यह एक जन्मजात स्थिति है। संक्षेप में, यह सब कुछ परमेश्वर से आता है—यहाँ लोगों के लिए शेखी बघारने के वास्ते कुछ भी नहीं है। क्या यह सही नहीं है? (हाँ।)

व्यापार करने में कुशल होना

व्यापार करना पसंद करना, व्यापार करने में कुशल होना—यह किस पहलू के तहत आता है? (जन्मजात स्थितियों के।) व्यापार करने में कुशल होने का मतलब है अपना व्यवसाय ज्यादातर लोगों से बेहतर ढंग से चलाना। हो सकता है कि दूसरे लोग दो-तीन महीने व्यवसाय चलाएँ और फिर उनका दिवाला निकल जाए, यहाँ तक कि वे अपनी शुरुआती पूँजी भी गँवा दें, लेकिन वे दो-तीन वर्ष अपना व्यवसाय चलाते हैं और उत्तरोत्तर बेहतर करते जाते हैं। धीरे-धीरे उनका जीवन खुशहाल होता जाता है—उनका परिवार बेहतर खाता-पहनता है, उनका छोटा घर बड़े घर में बदल जाता है, उनकी छोटी कार बड़ी कार में बदल जाती है और उनका जीवन बेहतर होता जाता है; वे दौलतमंद व्यवसायी बन जाते हैं। व्यवसाय करने में कुशल होना—क्या यह जन्मजात स्थिति है? (हाँ।) व्यवसाय करने में कुशल होना, यह जन्मजात स्थिति उनकी खूबी है। उन्होंने व्यवसाय करने के तरीके का कभी विशेष रूप से अध्ययन नहीं किया और न ही वे अपने माता-पिता से प्रभावित हुए, फिर भी वे एक छोटा व्यवसाय चलाने और पैसे कमाने में आसानी से सफल हो जाते हैं। तुम उनसे पूछते हो, “क्या तुम्हें व्यापार करना मुश्किल लगता है?” वे कहते हैं, “बिल्कुल नहीं। मैं बस अपने दिमाग का उपयोग करता हूँ और इस बारे में सोचता हूँ कि चीजों को ऐसे किस तरीके से किया जाए जो उपयुक्त हो और पैसा कमा सके और फिर मैं आगे बढ़ता हूँ और उसी तरीके से चीजें करता हूँ—और अंत में पैसा मेरा होता है।” तुम कहते हो, “व्यापार करना तुम्हें बहुत सरल और आसान लगता है। मैं ऐसा क्यों नहीं कर सकता?” क्यों? क्योंकि परमेश्वर ने तुम्हें वह खूबी नहीं दी है, इसलिए तुममें वह हुनर बस है ही नहीं। इसलिए जिनके पास कोई खूबी है उन्हें घमंड नहीं करना चाहिए और जिनके पास वह खूबी नहीं है उन्हें जलन नहीं होनी चाहिए। परमेश्वर जो देता है उसे कोई छीन नहीं सकता—अगर तुम उसे न भी चाहो तो भी तुम उसे मना नहीं कर सकते। परमेश्वर ने बस तुम्हें इसमें कुशल बना दिया है और इस खूबी के जरिये उसने तुम्हें आजीविका का साधन या अपना जीवन कायम रखने के लिए एक व्यवसाय प्रदान किया है। यह परमेश्वर का अनुग्रह है। दूसरे लोग सीखते हैं, उन्हें सिखाया जाता है और वे अभ्यास करते हैं, फिर भी वे चाहे कैसे भी प्रयास क्यों न करें, अच्छे नतीजे हासिल नहीं कर सकते हैं। लेकिन तुम इसे बिना सीखे ही कर सकते हो। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे कैसे सोचते हैं, उनका दिमाग तुम्हारे दिमाग जितना तेजी से काम नहीं करता है और वे तुम्हारे जितना अच्छी तरह से काम नहीं कर सकते हैं। तो तुम्हारी यह खूबी कहाँ से आती है? क्या यह जन्मजात नहीं है? और जो चीज जन्मजात होती है क्या वह परमेश्वर प्रदत्त नहीं होती है? तुम हमेशा उन्हीं चीजों के बारे में बात करते हो जो तुम्हें अच्छी लगती हैं, जिनमें तुम कुशल हो—लेकिन क्या यह ऐसा कुछ है जो तुमने माँगा था? कुछ लोग कहते हैं कि उन्हें यह विरासत में अपने माता-पिता से मिला है। तो फिर तुम्हें कुछ और विरासत में क्यों नहीं मिला? यह खूबी अपनी अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का कोई तरीका ढूँढ़ने का प्रयास करो—क्या तुम ऐसा कर सकते हो? क्या इस मामले में तुम्हारा फैसला चलता है? (नहीं।) निश्चित रूप से नहीं। तुम्हारे पास जो खूबी है वह परमेश्वर ने दी है—दूसरे तुमसे चाहे कितना भी क्यों न जलें, वे इसे हटा नहीं सकते हैं और न ही छीन सकते हैं और अगर तुम इसे न भी चाहो तो भी परमेश्वर तुम्हें यह खूबी देता है। चूँकि परमेश्वर ने तुम पर अनुग्रह किया है, इसलिए तुम्हें यह उससे स्वीकार करना चाहिए। अभिमानी मत बनो और शेखी मत बघारो। अभिमान करना और शेखी बघारना मानव अज्ञानता की अभिव्यक्तियाँ हैं।

तो तुम्हें उस खूबी से कैसे सही से पेश आना चाहिए जो तुम्हें परमेश्वर ने दी है? अगर परमेश्वर के घर को इस क्षेत्र में कर्तव्य निभाने के लिए तुम्हारी जरूरत पड़ती है तो तुम्हें अपनी खूबी का उपयोग अपने कर्तव्य में, कलीसिया के कार्य में करना चाहिए। इसे अपने पास रोककर मत रखो—इसे उपयोग में लाओ और ऐसा चरम सीमा तक करो। इस तरीके से परमेश्वर ने तुम्हें जो खूबी दी है, वह व्यर्थ में नहीं दी गई होगी; तुमने परमेश्वर से जिस अनुग्रह और विशेष व्यवहार का आनंद लिया है उसका आभार परमेश्वर को चुका दिया जाएगा। ऐसा करने से तुम जमीर वाले व्यक्ति बन जाते हो—तुम बस अपने लिए लाभ नहीं खोज रहे हो बल्कि परमेश्वर का आभार चुका रहे हो। यही सही ढंग से कार्य करना है। भले ही तुम यह सोचते हो कि “मेरे पास यह खूबी, यह रुचि और शौक है और मेरे लिए यह बाएँ हाथ का काम है,” जब तक तुम इसे अपना कर्तव्य मानते हो, तुम सिर्फ अपनी खूबी, रुचि और शौक पर निर्भर नहीं रह सकते। तुम्हें यह परमेश्वर के बताए सिद्धांतों और परमेश्वर के घर की जरूरतों के अनुसार करना चाहिए और फिर इसे अपनी खूबी के साथ जोड़ना चाहिए। इस तरीके से तुम्हारा कर्तव्य सही ढंग से पूरा होगा और तुमने अपनी वफादारी अर्पित कर दी होगी। यह ठीक वैसा ही है जैसे परमेश्वर ने अब्राहम को एक पुत्र प्रदान किया था—जब परमेश्वर ने उसे वह प्रदान किया था तब अब्राहम बहुत आनंदित हुआ था और जब परमेश्वर ने उसे वापस लेना चाहा था तो अब्राहम को उसे खुशी से और पूरी तरह से परमेश्वर को अर्पित करना पड़ा था। वह पीछे नहीं हट सका था या शर्तें रखने का प्रयास नहीं कर सका था और उससे भी बढ़कर, वह परमेश्वर के बारे में शिकायत नहीं कर सका था या उसका अपमान नहीं कर सका था—उसे अपना पुत्र पूरे दिल से और नेकनीयती से अर्पित करना पड़ा था। जब परमेश्वर तुम पर अनुग्रह करता है तो तुम बहुत खुश और संतुष्ट होते हो, यह महसूस करते हो कि तुमने एक लाभ प्राप्त किया है और कि परमेश्वर तुम्हारे प्रति दयालुता दिखाता है। परमेश्वर के इतने अधिक अनुग्रह का आनंद लेने के बाद जब परमेश्वर तुमसे कुछ अर्पित करने के लिए कहता है तब तुम्हारा रवैया क्या होता है? क्या तुम इसे त्यागना सह सकते हो? क्या तुम यह परमेश्वर को अर्पित कर सकते हो और यह उसे पूरी तरह लौटा सकते हो? परमेश्वर ने तुम्हें जो दिया है अगर तुम वह परमेश्वर को बिना शर्त, परमेश्वर अपेक्षित सिद्धांतों के अनुसार, बिना किसी शिकायत के, पूरी तरह और उसे अपने लिए रखे बिना लौटा सकते हो, बल्कि उसे परमेश्वर को अर्पित कर सकते हो तो तुम एक सृजित प्राणी के रूप में मानक स्तर के हो; तुमने जो कर्तव्य किया है वह भी मानक स्तर का है और परमेश्वर संतुष्ट हो जाएगा। परमेश्वर की तुमसे माँगें ऊँची नहीं हैं क्योंकि परमेश्वर ने तुम्हें जो दिया है वह तुम जो अर्पित कर सकते हो उससे बहुत गुना ज्यादा है। तुम्हें जीवन देने के अलावा परमेश्वर ने तुम्हें वह पूँजी और स्थितियाँ भी दी हैं जिन पर तुम जीवित रहने के लिए निर्भर रहते हो। क्योंकि तुम्हारे पास यह खूबी, रुचि और शौक है, इसलिए तुमने कितना लाभ प्राप्त किया है? तुमने परमेश्वर के कितने अनुग्रह का आनंद लिया है? अब तक तुम परमेश्वर का कितना प्रतिफल चुका चुके हो? अगर तुमने सिर्फ अभी परमेश्वर का आभार चुकाना शुरू किया है तो तुम अत्यंत धीमे हो। अगर तुमने अतीत में अच्छा नहीं किया है तो अब से तुम्हें बिना किसी संकोच के परमेश्वर को अर्पित करना चाहिए; अपने पास बिना कुछ भी रोककर रखे अपनी खूबी, पेशेवर कौशल और अपने कर्तव्य में तुमने जिन विभिन्न पेशेवर सिद्धांतों में महारत हासिल की है उनका उपयोग करो क्योंकि तुम जो अर्पित करते हो वह मूल रूप से परमेश्वर का था—यह तुम्हें परमेश्वर ने प्रदान किया था। जब तुम ये चीजें अर्पित करते हो और उनका उपयोग अपने कर्तव्य में करते हो, तब एक बात तो यह है कि परमेश्वर इसे स्वीकार करेगा और दूसरी बात यह है कि तुम सत्य हासिल करोगे, जीवन हासिल करोगे और परमेश्वर की स्वीकृति हासिल करोगे—तुम्हें प्रचंड लाभ होंगे और तुम कतई कोई नुकसान नहीं सहोगे। साथ ही, परमेश्वर ने तुमसे तुम्हारी रुचि, शौक और खूबी का आनंद लेने का तुम्हारा अधिकार नहीं छीना है। चूँकि परमेश्वर ने तुम्हें यह रुचि और शौक प्रदान किया है, इसलिए वह इन्हें कभी नहीं छीनेगा। तुम चाहे कितना भी अर्पित क्यों न कर दो, ये फिर भी तुम्हारे पास ही रहेंगे—परमेश्वर यह सुनिश्चित करता है कि ये तुम्हारे भीतर अंतहीन रूप से मौजूद रहें; ये तुम्हारे अस्तित्व का एक भाग हैं। अगर तुम परमेश्वर को अर्पित नहीं करते हो तो सिर्फ यही कहा जा सकता है कि तुममें कोई जमीर नहीं है, कि तुम एक सृजित प्राणी के रूप में मानक स्तर के नहीं हो और कि तुममें परमेश्वर के प्रति कोई नेकनीयती नहीं है। अगर तुममें नेकनीयती जरूर है तो तुमने परमेश्वर से जो प्राप्त किया है और जो तुम्हारे पास है उसका प्रतिफल तुम्हें परमेश्वर को चुकाना चाहिए। तुम्हारा यह रवैया होना चाहिए। परमेश्वर ने तुम्हें जितना भी प्रदान किया है, तुम जितना भी समझते हो और तुम जितना भी करने में सक्षम हो तो उसे तुम्हें पूरी तरह परमेश्वर को अर्पित कर देना चाहिए। क्या तुम्हें लगता है कि परमेश्वर तुमसे इसे व्यर्थ में अर्पित करवाएगा? अब्राहम को देखो—जब परमेश्वर ने उससे इसहाक माँगा था तब उसने इसहाक को वेदी पर चढ़ा दिया था। लेकिन अब्राहम की नेकनीयती देखने के बाद क्या परमेश्वर ने सचमुच इसहाक को ले लिया था? परमेश्वर ने उसे नहीं लिया था—परमेश्वर ने इसहाक को उसे लौटा दिया था और पास ही एक मेमना तैयार कर दिया था। अब्राहम को न सिर्फ परमेश्वर को इसहाक लौटाने की जरूरत नहीं पड़ी, बल्कि उसे एक पहले से तैयार मेमना भी मिला था। अंत में परमेश्वर ने उसे जो आशीष दिया था वह उसकी कल्पना से अनगिनत गुना बढ़कर था। यकीनन यह कोई ऐसी चीज नहीं थी जिसकी अब्राहम कल्पना कर सकता था और न ही यह कोई ऐसी चीज थी जो उसने माँगी थी। लेकिन परमेश्वर लोगों से पक्षपातपूर्ण ढंग से पेश नहीं आता है; वह बस इसी तरीके से लोगों को आशीष देता है—परमेश्वर यही इच्छा करता है। यहाँ तक कि जब तुमने अभी तक परमेश्वर को कोई आभार नहीं चुकाया है, फिर भी उसने पहले ही तुम्हें बहुत कुछ दिया है। अगर तुम सच में परमेश्वर का आभार चुकाते हो, तो क्या तुम्हें लगता है कि वह तुम्हें कम चीजें प्रदान करेगा? बिल्कुल नहीं—परमेश्वर तुम्हें जो आशीष देता है वह उस सबसे बहुत बढ़कर होगा जिसकी तुम कभी कल्पना कर सकते हो। तो मुझे बताओ, परमेश्वर ने तुम्हें जो खूबियाँ दी हैं क्या उन सबको अर्पित करना और अपने कर्तव्य में उनका उपयोग करना आसान है? मान लो कि तुम सोचते हो : “ये खूबियाँ, रुचियाँ और शौक जो मेरे पास स्वाभाविक रूप से हैं, कुछ ऐसी चीजें हैं जिनके साथ मैं पैदा हुआ, मुझे ये मेरे माता-पिता से विरासत में मिली हैं। ये मेरे अच्छे गुणसूत्रों और अनुकूल पृष्ठभूमि की बदौलत हैं। ये परमेश्वर द्वारा प्रदान की गई हैं या नहीं, मुझे नहीं पता। खैर, मेरी सिर्फ खुशकिस्मती है—यह मेरी अपनी तकदीर है। जहाँ तक यह बात है कि मैं इन्हें परमेश्वर को लौटाऊँगा या नहीं, यह मैं बाद में तय करूँगा। अभी ऐसा करने की मेरी कोई योजना नहीं है।” मुझे बताओ, क्या इसका मतलब यह होगा कि तुममें जमीर है? (नहीं।) अगर परमेश्वर तुमसे तुम्हारी वे रुचियाँ, शौक, खूबियाँ और दूसरी चीजें न भी छीने जो उसने तुम्हें प्रदान की हैं, तो भी तुम्हें परमेश्वर का आशीष नहीं मिलेगा। परमेश्वर की नजर में तुम एक सृजित प्राणी के रूप में मानक स्तर के नहीं होगे—कम-से-कम परमेश्वर इस तरह के लोगों को पसंद नहीं करता है। परमेश्वर लोगों को कुछ खास रुचियाँ, शौक और खूबियाँ प्रदान करता है और उनके लिए उसकी विशिष्ट अपेक्षाएँ भी होती हैं। जहाँ तक यह सवाल है कि लोग इन रुचियों, शौक और खूबियों से कैसे पेश आएँ तो उनके पास ऐसे सिद्धांत भी होने चाहिए जो सत्य के अनुरूप हों। एक बात तो यह है कि इन्हें अपनी पूँजी के रूप में मत लेना; इसके अतिरिक्त, अगर परमेश्वर के घर का कार्य तुमसे तुम्हारी रुचियों, शौक और खूबियों से संबंधित कर्तव्य निभाने की अपेक्षा करता है तो तुम्हें इस कर्तव्य को अपने व्यक्तिगत दायित्व के रूप में स्वीकार करने के लिए कर्तव्यबद्ध महसूस करना चाहिए। तुम्हें पूरी तरह से और बिना किसी संकोच के वह अर्पित कर देना चाहिए जो परमेश्वर ने तुम्हें प्रदान किया है ताकि परमेश्वर अपने प्रति एक सृजित प्राणी की नेकनीयती और समर्पण का आनंद ले सके। क्या यह एक गरिमापूर्ण और गौरवशाली बात नहीं है? (हाँ।) अगर तुम परमेश्वर को वे गुण और खूबियाँ अर्पित नहीं कर सकते हो जो उसने तुम्हें प्रदान की हैं तो तुम परमेश्वर के कर्जदार हो—यह एक शर्मनाक चीज है। जब परमेश्वर ने तुम्हें ये गुण और खूबियाँ प्रदान की थीं तब तुम बहुत खुश हुए थे, लेकिन जब परमेश्वर तुमसे इन्हें उसे अर्पित करने के लिए कहता है तब तुम चिढ़ जाते हो, तुम नहीं चाहते कि परमेश्वर इनका उपयोग करे और तुम चाहते हो कि उन्हें सिर्फ तुम्हारे लिए उपयोग किया जाए। क्या यह कोई विवेक दर्शाता है? वे तुम्हारी निजी संपत्तियाँ नहीं हैं—वे परमेश्वर द्वारा प्रदान की गई हैं। चूँकि वे परमेश्वर द्वारा प्रदान की गई हैं, इसलिए जब उसे इनकी जरूरत होती है तब तुम्हें उन्हें अर्पित कर देना चाहिए। इन्हें अर्पित करने में समर्थ होना दर्शाता है कि तुममें परमेश्वर के प्रति समर्पण और नेकनीयती है। अगर तुम उन्हें अर्पित नहीं करना चाहते हो या ऐसा अनिच्छा और नाराजगी से करते हो तो यह साबित करता है कि तुममें परमेश्वर के प्रति न तो समर्पण है, न ही नेकनीयती है। सिर्फ यही कहा जा सकता है कि तुम्हारी मानवता और चरित्र में कोई समस्या है।

ठीक है, हमारी आज की संगति यहीं समाप्त होती है। अलविदा!

23 दिसंबर 2023

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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