सत्य का अनुसरण कैसे करें (2) भाग दो

परमेश्वर में विश्वास रखते समय, व्यक्ति को यह समझना चाहिए कि परमेश्वर का कार्य लोगों में वास्तव में क्या बदलने के लिए है, परमेश्वर लोगों की भ्रष्टता की समस्या को कैसे हल करता है और वह लोगों में क्या हासिल करने का इरादा रखता है—ये ऐसे मुद्दे हैं जिन पर स्पष्ट रूप से संगति की जानी चाहिए, है ना? कुल मिलाकर, व्यक्ति को यह समझना चाहिए कि परमेश्वर अपने कार्य के माध्यम से लोगों में वास्तव में क्या प्रभाव प्राप्त करने का इरादा रखता है। सबसे पहले, परमेश्वर के कार्य के इस चरण में वह सत्य व्यक्त कर रहा है और जीवन प्रदान कर रहा है। लोगों को सत्य प्रदान करने का कार्य उन सत्य सिद्धांतों पर स्पष्ट रूप से संगति करना है जिनका लोगों को वास्तविक जीवन में तब पालन करना चाहिए जब उनका सामना सभी तरह के लोगों, घटनाओं और चीजों से होता है ताकि इन सत्य सिद्धांतों को समझ लेने के बाद वे इनके आधार पर लोगों और चीजों को देख सकें और आचरण और कार्य कर सकें और इस आधार पर उनके भ्रष्ट स्वभाव हल हो जाएँ और वे ये भ्रष्ट स्वभाव छोड़ देने और सही मायने में और पूरी तरह से परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में सक्षम हो जाएँ। यकीनन यह बचाए जाने का भी संकेत है, और यह बचाए जाने की सच्ची अभिव्यक्ति है जिसे अंत में लोगों में देखा जा सकता है। परमेश्वर द्वारा लोगों को सत्य प्रदान करने की पूरी प्रक्रिया में वे मुख्य मुद्दे क्या हैं जिन्हें हल करने की जरूरत है? मुख्य रूप से दो प्रकार के मुद्दे हैं जिन्हें हल किया जाना है। हल करने के लिए पहले प्रकार का मुद्दा लोगों की धारणाएँ हैं। लोगों के विभिन्न प्रकार के भ्रामक, विकृत और कसकर जकड़े हुए विचार और नजरिये जो शैतान से आते हैं उन्हें सामूहिक रूप से लोगों की धारणाएँ कहा जाता है। ये गलत विचार और नजरिये लोगों के विचारों और व्यवहारों को नियंत्रित करते हैं और ये पहले से ही एक बुनियादी वैचारिक सिद्धांत बन चुके हैं जिसके द्वारा वे लोगों और चीजों को देखते हैं और आचरण और कार्य करते हैं, और इसलिए उन्हें पूरी तरह से हल किया जाना चाहिए। यह लोगों के विचारों से संबंधित मुद्दा है जिसे हल किए जाने की जरूरत है। हल करने के लिए दूसरे प्रकार का मुद्दा है लोगों के भ्रष्ट स्वभाव। भ्रष्ट स्वभाव एक ऐसा विषय है जिस पर कलीसियाई जीवन में अक्सर संगति और चर्चा की जाती है और जिसका गहन-विश्लेषण किया जाता है। कुछ भ्रष्ट स्वभाव लोगों के भ्रामक विचारों और नजरियों के कारण होते हैं जबकि दूसरे भ्रष्ट स्वभाव पूरी तरह से शैतानी स्वभाव होते हैं। परमेश्वर अपने कार्य और वचनों के जरिये लोगों में जिन दो चीजों को हल करने का इरादा रखता है वे उनकी धारणाएँ और उनके भ्रष्ट स्वभाव हैं। पहली चीज इससे संबंधित है कि व्यक्ति लोगों और चीजों को कैसे देखता है जबकि दूसरी चीज इससे संबंधित है कि व्यक्ति किस तरह से आचरण और कार्य करता है। जब ये दोनों चीजें हल हो जाती हैं और लोग सत्य प्राप्त कर लेते हैं और परमेश्वर के प्रति समर्पण करने और उसके अनुरूप होने में समर्थ हो जाते हैं तो परमेश्वर का कार्य अपना प्रभाव प्राप्त कर लेता है और परमेश्वर का कार्य समाप्त हो जाता है। लेकिन परमेश्वर के कार्य की पूरी प्रक्रिया में—चाहे वह परमेश्वर के कार्य करने का तरीका हो, उसके कार्य के विशिष्ट चरण हों या उसके द्वारा व्यक्त प्रत्येक सत्य हो—इनमें से कोई भी चीज लोगों के व्यक्तित्वों, काबिलियतों, क्षमताओं, सहज प्रवृत्तियों, जीवन की आदतों और जीने के तौर-तरीकों, या उनकी रुचियों और उनके शौकों जैसे पहलुओं पर लक्षित नहीं होती है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य, प्रयोजन और महत्व लोगों की अंतर्निहित काबिलियतों और क्षमताओं, सहज प्रवृत्तियों, व्यक्तित्वों वगैरह को बदलना नहीं है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुम्हारे पास क्या काबिलियत और कार्य क्षमता है या तुम्हारा जन्मजात व्यक्तित्व, जीवन की आदतें, सहज प्रवृत्तियाँ और दूसरे विभिन्न पहलू कैसे हैं, परमेश्वर इनमें से किसी भी चीज को नहीं देखता है। वह सिर्फ यह देखता है कि क्या तुम सामान्य मानवता वाले व्यक्ति हो, और फिर इस आधार पर वह तुम्हें सत्य प्रदान करता है और तुम पर कार्य करता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि परमेश्वर तुम्हें सत्य के कौन से पहलू प्रदान करता है या वह तुम पर किस प्रकार का कार्य करता है, अंत में यह तुम्हारी अंतर्निहित काबिलियत और सहज प्रवृत्तियों को बदलने के लिए नहीं है, यह तुम्हारी काबिलियत या सहज प्रवृत्तियों को उन्नत करने और उन्हें बेहतर बनाने के लिए या उन्हें विशेष रूप से अलौकिक बनाने के लिए नहीं है—इनमें से कोई भी पहलू ऐसा नहीं है जिसे परमेश्वर अपने कार्य के माध्यम से बदलना चाहता है। इसलिए, चाहे तुमने कितने भी वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखा हो या तुमने कितने भी धर्मोपदेश सुने हों या तुमने परमेश्वर के वचनों में कितना भी प्रयास किया हो, तुम्हारी अंतर्निहित काबिलियत वही रहेगी और नहीं बदलेगी। यह इसलिए नहीं बदल जाएगी कि तुमने बहुत सारे वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखा है, बहुत सारे वर्षों से धर्मोपदेश सुने हैं और बहुत सारे वर्षों से दौड़-धूप की है और खुद को खपाया है। यकीनन यही बात तुम्हारे व्यक्तित्व, सहज प्रवृत्तियों, जीवन की आदतों, रुचियों, शौकों वगैरह पर भी लागू होती है; ये बस इसलिए नहीं बदल जाएँगे क्योंकि तुमने बहुत सारे वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखा है और बहुत सारे वर्षों से अपना कर्तव्य किया है। लोगों की धारणाओं में निश्चित रूप से इस बदलाव का मतलब नीचे लाना नहीं है, बल्कि उन्नत करना है—इन चीजों को पहले से ऊँचा और बेहतर बनाना है। यानी, भले ही परमेश्वर का कार्य किसी भी चरण में हो या वह इसे करने के लिए किसी भी पद्धति का उपयोग करे, उसका कार्य लोगों की अंतर्निहित काबिलियतों, कार्य क्षमताओं, सहज प्रवृत्तियों, व्यक्तित्वों वगैरह को नहीं बदलता है। इसलिए, अगर तुम्हारी काबिलियत खराब है और फिलहाल तुममें अगुआ या कार्यकर्ता बनने या कार्य की किसी खास मद के लिए पर्यवेक्षक बनने की काबिलियत नहीं है तो तुममें 20 या 30 वर्ष बाद भी यह काबिलियत नहीं होगी; और भले ही सत्य का अनुसरण करने के कारण अंत में तुम्हें बचा लिया जाए, तब भी तुममें यह काबिलियत नहीं होगी। तुम्हारी काबिलियत नहीं बदलेगी। तो क्या तुम्हारी सहज प्रवृत्तियाँ बदल जाएँगी? हर व्यक्ति जन्म, बुढ़ापा, बीमारी और मृत्यु का अनुभव करता है और बड़ी घटनाओं से सामना होने पर वह घबरा जाता है, डर जाता है, आतंकित हो जाता है, वगैरह-वगैरह—ये सहज प्रवृत्तियाँ भी नहीं बदलेंगी। उदाहरण के लिए, जब लोग कोई विशेष रूप से तेज शोर सुनते हैं तो वे सभी अपने सिर ढक लेते हैं और किसी सुरक्षित जगह छिप जाते हैं—यह सहज प्रवृत्ति है। जब तुम्हारा हाथ लौ या किसी दूसरी गर्म चीज को छूता है तो तुम सहज प्रवृत्तिवश उसे हटा लेते हो या जब तुम कोई खेदजनक खबर सुनते हो तो तुम सहज प्रवृत्तिवश अंदर से काँप उठते हो और आतंकित हो जाते हो। जब तुम खतरे का सामना करते हो तब सहज प्रवृत्तिवश तुम्हारा पहला विचार होता है, “क्या मैं सुरक्षित हूँ? क्या यह खतरा मेरी तरफ आ रहा है?” यह सहज प्रवृत्ति है। साथ ही, जब कोई तुम्हें मारने के लिए तुम्हारी तरफ बढ़ता है तब तुम सहज प्रवृत्तिवश खुद को बचाने के लिए झटके से हट जाते हो; जब धूल या पानी तुम्हारी आँखों में चला जाता है तब तुम सहज प्रवृत्तिवश उन्हें बंद कर लेते हो; और जब तुम्हारे दाँत में दर्द होता है तब तुम अपने हाथ से बार-बार अपना दाँत छूते रहते हो। सहज प्रवृत्तिवश तुम्हारी एक प्राकृतिक प्रतिक्रिया होगी, एक निश्चित अभिव्यक्ति होगी या तुम एक सहज क्रिया करोगे। लोग इन सहज प्रतिक्रियाओं के साथ पैदा हुए हैं। कोई भी उन्हें छीन नहीं सकता है और परमेश्वर भी उन्हें नहीं बदलेगा। ये सहज प्रतिक्रियाएँ परमेश्वर द्वारा लोगों के लिए तब स्थापित की गईं जब उसने उन्हें बनाया, और ये लोगों की रक्षा करने के लिए हैं। ये कुछ ऐसी चीजें हैं जो सृजित मनुष्य में होनी चाहिए। परमेश्वर इन सहज प्रवृत्तियों को दूर नहीं करेगा और तुम भी उन्हें सिर्फ इसलिए नहीं खोओगे कि तुम सत्य का अनुसरण कर रहे हो। मेरा ऐसा कहने का क्या मतलब है? मेरा मतलब यह है कि ऐसा नहीं है कि जब आग लगेगी तो तुम्हें डर नहीं लगेगा या जब तुम अपना हाथ गर्म तेल की कड़ाही में डालोगे तो तुम अपने हाथ का जलना महसूस नहीं करोगे क्योंकि तुम सत्य का अनुसरण करते हो, तुमने बहुत सारे सत्य समझे हैं और तुममें परमेश्वर के प्रति सच्चा समर्पण है—यह असंभव है। अगर कोई ऐसी गवाही दे तो तुम क्या सोचोगे? क्या तुम उससे ईर्ष्या करोगे और उसकी सराहना करोगे? तुम इसका किस प्रकार का आकलन और निरूपण करोगे? कम-से-कम, यह एक अलौकिक परिघटना है और परमेश्वर ऐसा नहीं करेगा। जहाँ तक उन सहज प्रवृत्तियों की बात है जो परमेश्वर ने मानवजाति के लिए बनाई हैं, सिर्फ इसलिए कि तुम सत्य का अनुसरण करते हो, परमेश्वर तुम्हारी ये सहज प्रवृत्तियाँ दूर नहीं करेगा और न ही वह इन सहज प्रवृत्तियों को अलौकिक शक्तियों में परिवर्तित करेगा। उदाहरण के लिए, मान लो कि तुम किसी अँधेरी जगह में हो और तुम कुछ भी देख नहीं पा रहे हो; तुम अपने आस-पास टटोलने के लिए सहज प्रवृत्तिवश अपने हाथ आगे बढ़ाते हो और अपने आस-पास की आवाजें पहचानने के लिए बड़े ध्यान से अपने कानों से सुनते हो, सहज प्रवृत्तिवश महसूस करते हुए आगे बढ़ते हो। तुम देह से परे नहीं जाओगे क्योंकि तुम सत्य का अनुसरण करते हो—ऐसा नहीं होगा कि अँधेरा जितना गहरा होता जाएगा, तुम्हारी आँखें उतनी ही चमकदार महसूस होने लगेंगी और तुम चीजों को उतनी ही स्पष्टता से देख पाओगे और तुम्हारे लिए अपनी दिशा का पता लगाना उतना ही आसान हो जाएगा—यह अलौकिक है और यह कुछ ऐसा है जो परमेश्वर नहीं करता है। भले ही तुमने बहुत सारे सत्य समझ लिए हों और तुम सत्य के प्रति समर्पण करने और सत्य को अभ्यास में लाने में समर्थ हो, लेकिन अगर इस संबंध में तुम्हारी सहज प्रवृत्तियाँ वैसी ही बनी रह सकती हैं और खराब नहीं होती हैं तो यह पहले से ही बहुत बढ़िया है और फिर भी तुम चाहते हो कि वे अलौकिक बन जाएँ—यह असंभव है! इसके अलावा, किसी व्यक्ति की चीजों को देखने और सँभालने की क्षमता और समस्याएँ हल करने की क्षमता वे चीजें नहीं हैं जिन्हें परमेश्वर अपने कार्य के माध्यम से बदलने का इरादा रखता है। किसी व्यक्ति की चीजें सँभालने की क्षमता एक लिहाज से उसकी काबिलियत पर और दूसरे लिहाज से उसके जन्मजात बुद्धिमत्ता-स्तर पर निर्भर करती है और उसके बुद्धिमत्ता-स्तर में उसकी खूबियाँ शामिल होती हैं। कुछ लोग बाहरी मामले सँभालने के लिए विशेष रूप से कुछ क्षमताओं और खूबियों के साथ पैदा होते हैं, यानी वे सोचने और लोगों से घुलने-मिलने में अच्छे होते हैं, वे एक विशेष सामाजिक क्षमता के साथ पैदा होते हैं और उन्हें पता होता है कि लोगों से कैसे बातचीत करनी है, चीजों को कैसे देखना है और कुछ मामलों को कैसे सँभालना है। जब सभी तरह की चीजों की बात आती है तो उनके मन में विचारों की विशेष रूप से स्पष्ट श्रृंखलाएँ होती हैं, जो बहुत तर्कसंगत भी होती हैं। जब वे किसी चीज को देखते हैं तो वे किसी भटकाव या बेतुकेपन के बिना मामले के सार को गहराई से समझ सकते हैं और समस्याओं को अपेक्षाकृत सटीक ढंग से सँभाल सकते हैं। इस प्रकार के व्यक्ति में मामलों को सँभालने की क्षमता होती है। कुछ लोग इस क्षमता के साथ पैदा नहीं होते हैं और उन्हें बस किताबें पढ़ना, फूल उगाना, घास लगाना, पक्षी पालना और इसी तरह की चीजें पसंद होती हैं। इसे क्या कहते हैं? इसे परिष्कृत और फुरसत भरी जीवन-शैली का होना कहा जाता है। ये वे लोग हैं जो लालित्य और परिष्कृति का अनुसरण करते हैं। वे लोगों से घुलने-मिलने या बाहरी मामले सँभालने में अच्छे नहीं होते हैं, उनमें यह क्षमता नहीं होती है। जब उन्हें बाहर जाकर मामले सँभालने, वकील से सलाह लेने या किसी गणमान्य व्यक्ति से बातचीत करने की जरूरत होती है तो वे पूरी तरह से दब्बू बन जाते हैं और डरने लगते हैं और उस व्यक्ति की आँखों में देखने की हिम्मत नहीं करते हैं और जब उनसे प्रश्न पूछे जाते हैं तो वे हूँ-हाँ करते रहते हैं और उन्हें पता नहीं होता है कि क्या कहना है। वे निकम्मे हैं, है ना? जब इस तरह के व्यक्ति को किसी मुद्दे का सामना नहीं करना पड़ता है तो वह डींग मारने में बहुत अच्छा होता है, वह कहता है, “मैंने ऐसी-ऐसी चीजें कीं, मेरा इतना शानदार अतीत रहा है, मैंने एक बार ऐसे-ऐसे लोगों से बातचीत की और मैं फलाँ-फलाँ मशहूर हस्तियों को जानता हूँ...।” लेकिन जब उसे वास्तव में कुछ सँभालने के लिए भेजा जाता है तो वह ऐसे गायब हो जाता है जैसे गधे के सिर से सींग। यह बात पता चलती है कि वह सिर्फ डींग मारने में सक्षम है और उसके पास कोई वास्तविक प्रतिभा या ज्ञान और मामले सँभालने की कोई क्षमता नहीं है। क्या किसी व्यक्ति द्वारा सत्य का अनुसरण करके यह तथ्य बदला जा सकता है कि वह मामले सँभालने में बुरा है? बदकिस्मती से नहीं, इसे नहीं बदला जा सकता। उन व्यक्तियों को देखो जो अंतर्मुखी व्यक्तित्व वाले हैं और बचपन से दूसरे लोगों का सामना करने से डरते हैं। जब वे बीस या तीस वर्ष के हो जाते हैं तब भी वे लोगों के साथ व्यवहार करते समय या ऐसे मामले सँभालते समय बहुत घबराते हैं जिनमें लोगों से बातचीत करना शामिल होता है। जब वे अधेड़ उम्र के हो जाते हैं तब भी वे भीड़ के सामने बोलते समय शरमाते और झेंपते हैं। ऐसे लोग जब तक जिंदा रहेंगे तब तक वे व्यापक विश्व का सामना नहीं कर पाएँगे। दूसरे लोग अलग हैं क्योंकि उन्हें किशोरावस्था से ही लोगों से गपशप करना और उनके साथ व्यवहार करना पसंद है। चाहे वे किसी भी गणमान्य व्यक्ति के साथ व्यवहार करें, उन्हें डर नहीं लगेगा और चाहे वे कुछ भी कर रहे हों, वे चिंतित या आतंकित नहीं होंगे। उनमें बुद्धि है और इसलिए उनमें मंच पर आने का भय नहीं होता है। जितने ज्यादा लोग होते हैं, उतने ही ज्यादा वे खुश और जोश से भरे होते हैं और उतना ही ज्यादा वे करके दिखाना चाहते हैं। क्या किसी व्यक्ति द्वारा परमेश्वर के कार्य के अनुभव के जरिये अपने व्यक्तित्व और मामले सँभालने की क्षमता को बदला जा सकता है? (नहीं।) परमेश्वर लोगों के बारे में इन चीजों को नहीं बदलता है। कुछ लोगों को पता है कि मामले सँभालने की उनकी खराब क्षमता उनकी मानवता में एक दोष है, इसलिए वे इस पर काबू पाने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं। यह हो सकता है कि जब वे अधेड़ उम्र के या बूढ़े हो जाएँगे तो कई दशकों तक तपाए जाने का अनुभव प्राप्त करने और व्यापक अनुभव इकट्ठा करने के बाद वे मुश्किल से कुछ तात्कालिक मामलों से निपटने में कामयाब हो पाएँगे; लेकिन फिर भी उनमें महत्वपूर्ण, जीवन-मरण के मामले सँभालने की क्षमता नहीं होगी। विशेष रूप से, ऐसे कुछ लोग हैं जो बुढ़ापे तक पहुँचने पर खुद कुछ भी नहीं सँभाल पाते हैं; वे जो भी सँभालने का प्रयास करते हैं, उसे पूरी तरह से गड़बड़ कर देते हैं—वे बस इसकी जिम्मेदारी उठा ही नहीं पाते हैं—और यहाँ तक कि वे अपने पारिवारिक मामले सँभालने का बोझ भी नहीं उठा पाते हैं। और वे क्या करते हैं? कुछ स्थितियों में उनके बच्चों में मामले सँभालने की क्षमता होती है, इसलिए ये लोग अपने बच्चों को उनकी मदद करने देते हैं जबकि वे उन चीजों का आनंद लेते रहते हैं जो उनके लिए पहले से ही की जा चुकी हैं। वे सोचते हैं, “मैंने योगदान दिया है, मेरे पास मामले सँभालने की क्षमता है,” लेकिन वास्तव में उनके पास यह क्षमता नहीं होती है। उनके बच्चे, जो अब बड़े हो गए हैं और जिम्मेदारी सँभालने में सक्षम हैं, उन्होंने इन मामलों को सँभाला। हो सकता है कि ये लोग अब चीजों से निपटने के बारे में उतने घबराए हुए और भयभीत नहीं हैं जितना कि वे छोटी उम्र में होते थे, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि मामले सँभालने की उनकी क्षमता बदल गई है या सुधर गई है। इसका क्या मतलब है? इसका यह मतलब है कि वे बड़े हो गए हैं, उन्होंने अनुभव प्राप्त किया है और अब उन्हें चीजों से डर नहीं लगता है। “अब उन्हें चीजों से डर नहीं लगता है” का क्या मतलब है? इसका यह मतलब है कि वे मामलों को ज्यादा खुले दिमाग से देखने में समर्थ हैं क्योंकि उन्होंने ढेर सारी चीजों का अनुभव किया है और चीजों के तौर-तरीकों को समझ लिया है और इसलिए अगर वे वाकई छोटे-मोटे खतरे में पड़ जाते हैं तो उन्हें डर नहीं लगेगा और वे सोचेंगे : “देखो, मेरी यह स्थिति है। अगर तुम्हें पैसे चाहिए तो मेरे पास बिल्कुल नहीं हैं; अगर तुम्हें मेरा जीवन चाहिए तो वह मेरे पास है—तुम्हें जो भी अच्छा लगे वह करो!” क्या ऐसे लोगों ने कोई प्रगति की है? उन्होंने बिल्कुल भी प्रगति नहीं की है—जब चीजें सँभालने की बात आती है तो वे अब भी काफी लापरवाह और भ्रमित हैं। वे पहले की तरह ही जल्दबाज और बेसब्र हैं। वे पहले भी चीजें पूरी करने में विफल रहे और वे अब भी रत्ती भर भी नहीं बदले हैं। वे बस ऐसे ही हैं। मुझे बताओ, क्या चीजें वाकई ऐसी ही नहीं हैं? (हाँ।)

तुम लोगों के बीच हर उम्र के लोग हैं। अब तक क्या तुमने कभी किसी विशेष चीज का अनुभव किया है—सत्य का अनुसरण करने की प्रक्रिया में क्या तुम्हारी काबिलियत पूरी तरह से बदल गई है और पहले से बहुत बेहतर हो गई है या क्या तुम्हारी सहज प्रवृत्तियाँ बदल गई हैं? क्या तुम्हें कभी ऐसा अनुभव हुआ है? (नहीं।) अच्छा तो फिर, क्या कभी किसी ने यह कहा है, “मैं पहले बहुत निकम्मा था। मैं वाक्पटु नहीं था, मेरे पास कोई क्षमताएँ या कौशल नहीं थे और मेरे पास कोई सामाजिक क्षमताएँ नहीं थीं। अब जब मैंने परमेश्वर का कार्य स्वीकार कर लिया है तो मैं वाक्पटुता से बोलने में समर्थ हूँ, मेरे पास सामाजिक क्षमताएँ हैं और जब चीजें सँभालने की बात आती है तो मैं बुद्धिमान हूँ और मेरे पास हुनर है, और मुझे पता है कि चीजों से कैसे निपटना है”? क्या किसी को इस प्रकार का अनुभव हुआ है? (नहीं।) कुछ लोग कहते हैं, “वैसे तो मेरे साथ ऐसी चीजें नहीं हुई हैं, लेकिन परमेश्वर में विश्वास रखना शुरू करने के बाद परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने की प्रक्रिया में मुझे लगता है कि मेरा व्यक्तित्व बदल गया है। पहले मैं धीरे-धीरे बोलता था और हर कोई मुझे ‘छकड़ागाड़ी’ कहकर बुलाता था। मेरा एक और उपनाम भी था, वह था “कछुआ”। जब से मैंने परमेश्वर में विश्वास रखना शुरू किया है, तब से मेरी प्रतिक्रियाएँ पहले से ज्यादा तेज हो गई हैं और मैं तेजी से बोलता और कार्य करता हूँ। मैं चीजें भी ज्यादा तेजी और कुशलता से सँभालता हूँ।” क्या ऐसी चीजें होती हैं? (नहीं।) एक स्थिति में यह संभव हो सकता है। उदाहरण के लिए, जब कुछ लोग कोई विदेशी भाषा सीखते हैं और पहले उसे बोलने का अभ्यास करते हैं तो वे बहुत धीरे-धीरे बोलते हैं, एक बार में एक शब्द बोलते हैं। दूसरों को लगता है कि ये लोग शायद इसलिए धीरे-धीरे बोलते हैं क्योंकि वे धीमा मिजाज लेकर पैदा हुए हैं। तीन या पाँच साल बाद, क्योंकि ये लोग उस विदेशी भाषा बोलने वालों के लगातार संपर्क में रहे हैं, वे आखिरकार इसे बहुत फर्राटे से बोलने लगते हैं, उतनी ही तेजी से बोलने लगते हैं जितनी कि वे अपनी मूल भाषा बोलते हैं और दूसरे लोग जिन्हें कुछ पता नहीं होता, वे सोचते हैं, “उन लोगों का व्यक्तित्व बदल गया है। पहले वे धीरे-धीरे बोलते थे और लोग उन्हें सुनते समय बेसब्र हो जाते थे, लेकिन अब वे बहुत फर्राटे से बोलते हैं—वे एक तेजतर्रार व्यक्ति बन गए हैं। वे जिस बेबाक और स्पष्ट तरीके से बोलते हैं उससे तुम बता सकते हो कि वे मामलों को फुर्ती से सँभालते हैं और वे अच्छे व्यक्तित्व वाले हैं।” ऐसे में क्या उनके व्यक्तित्व में कोई बदलाव आया है? (नहीं।) दरअसल, यह एक सामान्य ढर्रा है। यह कोई पेशा सीखने में सामान्य प्रगति की प्रक्रिया है—यह व्यक्तित्व बदलने की प्रक्रिया नहीं है। चाहे यह काबिलियत, क्षमता और सहज प्रवृत्तियाँ हों या व्यक्तित्व, आदतें, रुचियाँ और शौक हों, इनमें से कोई भी ऐसा पहलू नहीं है जिसे परमेश्वर अपने कार्य के जरिये बदलना चाहता है। अगर तुम हमेशा यही मानते हो कि परमेश्वर के कार्य करने और लोगों को सत्य प्रदान करने के लिए बोलने का उद्देश्य मनुष्यों के इन सभी जन्मजात गुणों को बदलना है और सोचते हो कि सिर्फ तभी व्यक्ति को पूरी तरह से फिर से जन्मा, सही मायने में वैसा नया व्यक्ति माना जा सकता है जैसा परमेश्वर ने कहा है, तो तुम्हारा सोचना बहुत ही गलत है। यह एक मानवीय धारणा और कल्पना है। इसे समझ लेने के बाद तुम्हें ऐसी धारणाएँ, कल्पनाएँ, अनुमान या भावनाएँ छोड़ देनी चाहिए। यानी सत्य का अनुसरण करने की प्रक्रिया में तुम्हें ऐसी चीजों का निचोड़ निकालने के लिए हमेशा भावनाओं या अटकलों पर भरोसा नहीं करना चाहिए, जैसे : “क्या मेरी काबिलियत में सुधार हुआ है? क्या मेरी सहज प्रवृत्तियाँ बदल गई हैं? क्या मेरा व्यक्तित्व अब भी पहले जैसा ही खराब है? क्या मेरे जीने के ढर्रे बदल गए हैं?” इन पर सोच-विचार मत करो; ऐसा सोच-विचार करना निष्फल है क्योंकि परमेश्वर का इरादा इन पहलुओं को बदलना नहीं है और परमेश्वर के वचनों और कार्यों ने कभी भी इन चीजों को लक्ष्य नहीं बनाया है। परमेश्वर के कार्य का लक्ष्य कभी भी लोगों की काबिलियत, सहज प्रवृत्तियाँ, व्यक्तित्व, वगैरह को बदलना नहीं रहा है और न ही परमेश्वर ने कभी लोगों के इन पहलुओं को बदलने के उद्देश्य से बात की है। मतलब यह है कि परमेश्वर का कार्य लोगों को उनकी जन्मजात स्थितियों के आधार पर सत्य प्रदान करता है, जिसका लक्ष्य पहले लोगों को सत्य समझाना और फिर उनसे सत्य स्वीकार करवाना और उसके प्रति समर्पण करवाना है। दूसरे शब्दों में, चाहे तुम्हारी काबिलियत कैसी भी हो और चाहे तुम्हारा व्यक्तित्व और सहज प्रवृत्तियाँ कैसी भी हों, परमेश्वर तुम्हारी जन्मजात काबिलियत, सहज प्रवृत्तियों और तुम्हारे व्यक्तित्व को बदलने के बजाय तुममें सत्य ढालना और तुम्हारी पुरानी धारणाएँ और भ्रष्ट स्वभाव बदलना चाहता है। अब तुम समझ गए हो, है ना? परमेश्वर का कार्य क्या बदलने का लक्ष्य रखता है? (परमेश्वर का कार्य लोगों में निहित पुरानी धारणाओं और भ्रष्ट स्वभावों को बदलने का लक्ष्य रखता है।) अब जब तुम यह सत्य समझ गए हो, तो तुम्हें वे कल्पनाएँ और धारणाएँ छोड़ देनी चाहिए जो अवास्तविक हैं और अलौकिक चीजों से संबंधित हैं और तुम्हें इन धारणाओं और कल्पनाओं का उपयोग खुद को मापने या खुद से माँगें करने के लिए नहीं करना चाहिए। इसके बजाय तुम्हें परमेश्वर द्वारा तुम्हें दी गई विभिन्न जन्मजात स्थितियों के आधार पर सत्य खोजना और स्वीकारना चाहिए। इसमें अंतिम लक्ष्य क्या है? वह यह है कि तुम अपनी जन्मजात स्थितियों के आधार पर सत्य सिद्धांतों को समझो, हर उस सत्य सिद्धांत को समझो जिसका तुम्हें विभिन्न स्थितियों का सामना करने पर अभ्यास करना चाहिए और इन्हीं सत्य सिद्धांतों के अनुसार तुम लोगों और चीजों को देख सकते हो और आचरण और कार्य कर सकते हो। ऐसा करने से परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी होती हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर के वचनों और कार्य का उद्देश्य लोगों को अतिमानव या अलौकिक शक्तियों वाले लोगों में बदल देने के बजाय उनमें सत्यों को ढालना है ताकि वे उनके लिए अभ्यास के सिद्धांत और कसौटियाँ बन जाएँ और ताकि वे ऐसे आधार बन जाएँ जिनसे वे लोगों और चीजों को देखते हैं और आचरण और कार्य करते हैं, और ताकि वे उनका जीवन बन जाएँ। “अतिमानवों” और “अलौकिक शक्तियों वाले लोगों” से मेरा क्या मतलब है? अपनी सहज प्रवृत्तियों से परे जाने में, अपनी क्षमता के दायरे से परे जाने में, अपनी काबिलियत से परे जाने में और यहाँ तक कि अपने लिंग से परे जाने में समर्थ होना और अपने लिंग से परे जीने में समर्थ होना—क्या ये अलौकिक शक्तियाँ नहीं हैं? (हाँ।) उदाहरण के लिए, कुछ लोग भाषाओं का विशिष्ट अध्ययन किए बिना ही कई भाषाएँ या दस से भी ज्यादा भाषाएँ बोल सकते हैं। क्या यह अलौकिक है? (हाँ।) यह अलौकिकता मानवीय काबिलियत, क्षमता और सहज प्रवृत्ति से परे जाती है, है ना? (हाँ।) इतना ही नहीं, विभिन्न भाषाएँ बोलते समय वे लचीले ढंग से अलग-अलग पुरुषों और महिलाओं की आवाजों में भी बोल सकते हैं। क्या यह और भी अलौकिक नहीं है? (हाँ।) चाहे वे कितनी भी भाषाएँ बोलें, वे उनकी खिचड़ी नहीं बनाते हैं और चाहे वे कितनी भी देर तक बोलते रहें, उन्हें थकान महसूस नहीं होती है और अगर वे थोड़ा-सा पानी न भी पिएँ तो भी उन्हें प्यास नहीं लगती है। इसके अलावा, वे जितना ज्यादा बोलते हैं, उनकी आँखें उतनी ही चमकदार होती जाती हैं, उनका चेहरा उतना ही चमकने लगता है और वे ऊपर से नीचे तक दमकने लगते हैं। क्या यह अलौकिक नहीं है? (हाँ।) अगर बात करते समय उन्हें गोली भी लग जाए तो भी वे ठीक रहते हैं और बस बात करते रहते हैं। यह तो और भी अलौकिक है, है ना? (हाँ।) जब उन्हें गोली नजर आती है तो वे उससे बचने का प्रयास भी नहीं करते हैं, बल्कि सीधे उसका सामना करते हैं। गोली उनकी छाती के आर-पार निकल जाती है, लेकिन वे डटे रहते हैं और डगमगाते नहीं हैं। वे किसी भी तरह से प्रभावित नहीं होते हैं और उनके सिर का एक बाल भी बाँका नहीं होता है। यह सहज प्रवृत्ति से परे जाना है, है ना? (हाँ।) ये सभी परिघटनाएँ मानवीय सहज प्रवृत्ति से परे हैं। इन सबमें सबसे गंभीर बात यह है कि वे एक असामान्य व्यक्ति बन गए हैं, यानी एक ऐसा व्यक्ति बन गए हैं जो साधारण लोगों से अलग है, जो सामान्य लोगों की काबिलियत और क्षमताओं से परे है और जो सामान्य लोगों की सहज प्रवृत्तियों से भी परे है। सभी पहलुओं में उनकी अभिव्यक्तियाँ साधारण लोगों से अलग होती हैं और विशेष रूप से अलौकिक होती हैं। यह मुसीबत का संकेत है। क्या वे अब भी एक सामान्य व्यक्ति हैं? (नहीं।) तो वे क्या हैं? (बुरी आत्मा हैं।) वे एक बुरी आत्मा हैं। क्या तुम लोग इसका अनुसरण करना चाहते हो? (नहीं।) तुम लोगों में से कोई भी यह नहीं चाहता है, तो क्या तुम सोचते हो कि परमेश्वर का कार्य लोगों को उस हद तक बदल देगा? क्या परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य व्यक्तियों को असामान्य लोगों में बदलना है? (नहीं।) यह इसलिए है कि तुम सत्य स्वीकार करो और परमेश्वर ने सामान्य मानवता के दायरे में तुम्हारे लिए जिन परिवेशों का इंतजाम किया है उनका अनुभव करो ताकि इससे तुम उन श्रमसाध्य इरादों को समझ सको जिनसे परमेश्वर अपना कार्य करता है, या अपनी खुद की अपर्याप्तताओं और कमियों या अपने खुद के भ्रष्ट स्वभावों को समझ सको और फिर इस समझ के आधार पर सत्य खोज सको और उसे अभ्यास में ला सको और उत्तरोत्तर सत्य में प्रवेश कर सको—यह प्रक्रिया धीमी है और बिल्कुल भी अलौकिक नहीं है। जब कुछ लोग नकारात्मक हो रहे होते हैं तो वे यह कहना पसंद करते हैं : “इतने वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखने से मुझे क्या प्राप्त हुआ है?” तुम कहते हो कि तुमने कुछ भी प्राप्त नहीं किया है, लेकिन तुम्हें इन बातों के बारे में ध्यान से सोचना चाहिए। इतने वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखने के बाद क्या अब तुम्हारे पास बहुत-सी चीजों के बारे में एक स्पष्ट नजरिया है? क्या ऐसा है कि जितना ज्यादा समय तुम विश्वास रखते हो, उतनी ही ज्यादा तुम्हें शांति और स्थिरता महसूस होती है और उतना ही ज्यादा तुम्हें लगता है कि जीवन में यही सही मार्ग है? अगर तुम्हें ऐसा महसूस होता है तो इसका मतलब है कि तुमने सचमुच कुछ प्राप्त किया है। हालाँकि तुमने कोई भौतिक वस्तु प्राप्त नहीं की है, हालाँकि तुमने पैसा, रुतबा, शोहरत, लाभ—ऐसी चीजें जिन्हें तुम अपने हाथ में पकड़ सकते हो या अपनी आँखों से देख सकते हो—प्राप्त नहीं की हैं, फिर भी तुमने अपने दिल में कुछ सत्य समझ लिए हैं। तुमने परमेश्वर के वास्तविक अस्तित्व और हर चीज पर उसकी संप्रभुता की कुछ समझ प्राप्त कर ली है। इसके अलावा, तुम परमेश्वर के इरादों और लोगों से उसकी अपेक्षाओं को भी समझ गए हो और तुम्हें पता है कि सृजित प्राणी क्या है और तुम्हें क्या कर्तव्य करना चाहिए। और अगर अभी तुम्हें कोई कर्तव्य करने की अनुमति नहीं दी जाए तो तुम व्यथा का अनुभव करोगे और तुम्हें लगेगा कि तुम्हारा जीवन खाली है। क्या यह सब यह नहीं दर्शाता है कि तुमने परमेश्वर में विश्वास रखकर पहले ही लाभ अर्जित कर लिए हैं? तुमने जो अर्जित किया है, उसकी कीमत किसी भी भौतिक चीज से ज्यादा है। ये वे प्रभाव हैं जो परमेश्वर का कार्य लोगों में हासिल करता है। वह लोगों को कुछ ऐसे अलौकिक, अवास्तविक बदलावों से गुजरने में सक्षम बनाने का इरादा नहीं रखता है जो मानवता, मानवीय सहज प्रवृत्तियों या देह की सामान्य जरूरतों और सामान्य अभिव्यक्तियों से परे हों। बल्कि वह लोगों को सामान्य मानवता के दायरे में सभी प्रकार के परिवेशों का अनुभव करने और इस प्रक्रिया में उत्तरोत्तर और धीरे-धीरे सभी प्रकार की समझ और अनुभव प्राप्त करने में सक्षम बनाने का इरादा रखता है। संक्षेप में, इस प्रगतिशील और धीमी प्रक्रिया के दौरान धीरे-धीरे लोगों के विचार और धारणाएँ बदल जाती हैं, वे जिन परिप्रेक्ष्यों से लोगों और चीजों को देखते हैं वे बदल जाते हैं, सभी प्रकार के लोगों, घटनाओं और चीजों के बारे में उनके नजरिये और उनसे निपटने के उनके तरीके बदल जाते हैं, उनके कुछ भ्रष्ट स्वभाव अब उतने स्पष्ट नहीं रहते हैं जितने कि वे पहले थे और उनके जमीर और विवेक कुछ हद तक बहाल हो जाते हैं। वे उन अवास्तविक, भ्रामक, खाली, खोखली या यहाँ तक कि अलौकिक चीजों के बजाय ये वास्तविक लाभ प्राप्त करते हैं।

परमेश्वर मानवजाति को बचाने का कार्य क्रमिक तरीके से करता है, और यकीनन एक और ज्यादा प्राथमिक सिद्धांत है, जो यह है कि परमेश्वर अपना कार्य करने में चीजों को उनके अपने ढंग से चलने देता है। “चीजों को उनके अपने ढंग से चलने देने” का यह सिद्धांत लोगों के लिए समझना थोड़ा कठिन हो सकता है। चीजों को उनके अपने ढंग से चलने देने का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि चाहे परमेश्वर लोगों पर कार्य कर रहा हो या उनसे बात कर रहा हो, वह कभी भी किसी को भी चीजें करने के लिए मजबूर नहीं करता है। परमेश्वर ठीक उसी तरह से तुम्हारे लिए परिवेशों का इंतजाम करता है और तुम्हें सत्य प्रदान करता है जैसे वह दूसरे लोगों के लिए करता है। तुम्हें उसके द्वारा इंतजाम किए गए परिवेशों को कैसे देखना और समझना चाहिए और तुम्हें किस दृष्टिकोण और रवैये से उनके साथ पेश आना चाहिए, इस बारे में परमेश्वर के पास स्पष्ट वचन हैं और उसने तुम्हें स्पष्ट सत्य सिद्धांत बता दिए हैं। जहाँ तक यह प्रश्न है कि तुम उनसे कैसे पेश आते हो, यह तुम्हारा अपना स्वतंत्र चयन है। तुम सत्य स्वीकारना और खुद को जानना चुन सकते हो या तुम सत्य अस्वीकार करना चुन सकते हो; तुम उन परिवेशों द्वारा अपना प्रकाशन स्वीकारना चुन सकते हो जिनका परमेश्वर आयोजन करता है या तुम परमेश्वर का कार्य अनदेखा करना चुन सकते हो—तुम्हारे पास चुनने की आजादी है, तुम चुनने के लिए आजाद हो। उदाहरण के लिए, जब उस कर्तव्य की बात आती है जो तुम्हें करना चाहिए तो तुम उसे अपने पूरे दिल और अपनी पूरी शक्ति से करना चुन सकते हो या तुम उसे लापरवाह रवैये से करना चुन सकते हो। यह पूरी तरह से तुम्हारे व्यक्तिगत चयन पर आधारित है और यकीनन यह तुम्हारी अपनी काबिलियत, क्षमताओं, सहज प्रवृत्तियों वगैरह पर भी आधारित है। परमेश्वर अतिरिक्त कार्य नहीं करता है—यानी सामान्य हालातों में परमेश्वर किसी पर जोर या दबाव डालने का कोई अतिरिक्त कार्य नहीं करता है। इसका क्या मतलब है? इसका यह मतलब है कि परमेश्वर तुम्हारे लिए परिवेशों का इंतजाम करता है—यह ठीक ऐसा है मानो उसने तुम्हारे लिए एक भोज की व्यवस्था की हो जिसमें गर्म और ठंडे पकवान, चावल और शोरबा, फल, पेय वगैरह हैं और जब तुम्हारे द्वारा चुनने की बात आती है तो परमेश्वर तुम्हें आजादी देता है—चाहे तुम कुछ भी चुनो, तुम्हें ऐसा करने की आजादी है और परमेश्वर इसमें दखल नहीं देता है, वह सिर्फ लोगों को प्रदान करने के लिए सत्य व्यक्त करने पर ध्यान केंद्रित करता है। कुछ लोग भोज पर सिर्फ एक सरसरी निगाह डालते हैं, बिना खुद यह चखे कि वास्तव में उसके स्वादिष्ट पकवान कैसे हैं। वे सिर्फ भोज पर टिप्पणी करते हैं, कुछ धर्म-सिद्धांत बोलते हैं और फिर चले जाते हैं। दूसरे लोग सिर्फ भोज को देखना चुनते हैं, उसके स्वादिष्ट खाने-पीने की चीजों को अनदेखा कर देते हैं और बिना किसी रवैये या राय के चले जाते हैं। दूसरे ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने व्यक्तिगत रूप से उसके स्वादिष्ट पकवान चखे हैं और उनका अनुभव किया है और उनमें से कोई एक स्वादिष्ट भोजन पकाने का तरीका भी सीखा है। परमेश्वर द्वारा इंतजाम किए गए परिवेश में इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुम्हारा क्या रवैया है—चाहे यह उसे स्वीकारना हो या उसे अस्वीकार करना और नकारना हो या उससे नफरत करना और उसके प्रति शत्रुतापूर्ण होना हो, वगैरह-वगैरह, जहाँ तक परमेश्वर का प्रश्न है उसके लिए ये सभी रवैये हैं। परमेश्वर लोगों के विभिन्न रवैयों से कैसे पेश आता है और उनसे कैसे निपटता है? लोगों को बहुत सारे सत्य प्रदान करने के बाद परमेश्वर उनके प्रति सिर्फ देखने और उनका लेखा-जोखा रखने का रवैया रखता है। जहाँ तक यह प्रश्न है कि लोग क्या चुनते हैं या उनका क्या रवैया है तो परमेश्वर इसमें दखल नहीं देता है—इस मामले का परमेश्वर से कोई लेना-देना नहीं है। तो फिर इस मामले का किससे लेना-देना है? इसका लेना-देना इस बात से है कि तुम कौन-सा मार्ग चुनते हो, अंत में तुम्हें क्या प्राप्त होता है और तुम्हारा अपना अंतिम परिणाम क्या होगा। इस मामले में परमेश्वर कोई अतिरिक्त, सहायक कार्य नहीं करता है, वह सिर्फ उन्हीं जिम्मेदारियों और दायित्वों को पूरा करता है जो उसे पूरे करने चाहिए। जब वह तुम्हें सत्य प्रदान कर देता है और तुम्हें सभी प्रकार के लोगों, घटनाओं और चीजों से निपटने के सिद्धांत बता देता है तो उसके बाद वह तुम्हारे लिए परिवेशों का इंतजाम भी कर सकता है। लेकिन परमेश्वर इस चीज में दखल नहीं देता है कि तुम अंतिम चयन क्या करते हो या तुम किस तरह का मार्ग अपनाते हो—ये वह तुम्हें खुद चुनने देता है। उदाहरण के लिए, अगर तुम्हें अगुआ या कार्यकर्ता के रूप में चुना जाता है तो तुम सत्य सिद्धांतों और परमेश्वर के घर की कार्य-व्यवस्थाओं के अनुसार कार्य करना चुन सकते हो या अपनी खुद की पसंद के अनुसार मनमाने तरीके से और बेतहाशा कार्य करना चुन सकते हो। अगर तुम सब कुछ सत्य सिद्धांतों के अनुसार सँभालना और कार्य-व्यवस्थाओं के अनुसार अपना कर्तव्य करना चुनते हो तो परमेश्वर इसे देखेगा और इसका लेखा-जोखा रखेगा, और अंत में तुम सत्य प्राप्त कर चुके होगे और परमेश्वर के प्रति समर्पण कर चुके होगे—यह एक परिणाम है। अगर तुम अपनी इच्छानुसार चीजें करते हो और मनमाने तरीके से और बेतहाशा कार्य करते हो, परमेश्वर के घर की कार्य-व्यवस्थाओं और सत्य सिद्धांतों का उल्लंघन करते हो तो यह भी एक चयन है और यह उस मार्ग को दर्शाता है जिस पर तुम चल रहे हो और परमेश्वर भी इसी तरह से उसे देखेगा और उसका लेखा-जोखा रखेगा और यकीनन यह बताने की जरूरत नहीं है कि तुम्हारा परिणाम क्या होगा। अगर तुमने सत्य और जीवन प्राप्त कर लिया है तो यह तुम्हें परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करने और अपने लिए एक अच्छा गंतव्य सुनिश्चित करने में भी सक्षम बनाएगा।

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

WhatsApp पर हमसे संपर्क करें