सत्य का अनुसरण कैसे करें (2) भाग तीन

ङ. परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के बारे में लोगों की धारणाएँ और कल्पनाएँ

लोग मानते हैं कि परमेश्वर के कार्य में उसके आयोजन और व्यवस्थाएँ शामिल हैं। तो लोगों की धारणाओं और कल्पनाओं में परमेश्वर के आयोजन और व्यवस्थाएँ क्या हैं? वे एक तरह की हेरा फेरी हैं, यानी परमेश्वर गुप्त रूप से लोगों को एक बड़े जाल में ढक रहा है, उनके सभी व्यवहारों और जिन परिवेशों में वे हैं उनमें हेरा-फेरी कर रहा है और वे जो कुछ भी करते हैं उस पर निगरानी रख रहा है। लोगों में यही धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं, है ना? (हाँ।) नतीजतन, लोग अपने दिलों में परमेश्वर से चौकस रहना और डरना शुरू कर देते हैं और यह परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के बारे में उनकी धारणाओं और कल्पनाओं के कारण होता है। उनका इस तरीके से डरना और चौकस रहना परमेश्वर के प्रति सच्चा समर्पण और भय नहीं है, बल्कि यह विद्रोहीपन और प्रतिरोध का एक रूप है। लोग सोचते हैं कि परमेश्वर सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी है और चाहे वे कुछ भी करें, यह सच है कि “जब मनुष्य काम करता है, तो स्वर्ग देख रहा होता है।” वे सोचते हैं कि परमेश्वर उनके दिलों, उनके हाथ-पैरों पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से लगातार उनकी निगरानी कर रहा है और उन पर नजर रख रहा है, उन्हें चुनने की आजादी नहीं दे रहा है और उन्हें सत्य का अभ्यास करने के लिए मजबूर कर रहा है, उन्हें अपने विचार और नजरिये बदलने के लिए मजबूर कर रहा है और उन्हें परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चीजें करने के लिए मजबूर कर रहा है। ये सभी मानवीय धारणाएँ हैं। सच पूछो तो यह परमेश्वर के खिलाफ एक प्रकार की ईशनिंदा है। दरअसल परमेश्वर का इरादा कभी भी लोगों को मजबूर करने, बाँधने या हेरा फेरी करने का नहीं रहा है। परमेश्वर कभी भी लोगों को बाधित नहीं करता है या उन पर दबाव नहीं डालता है और वह लोगों को मजबूर तो बिल्कुल नहीं करता है। परमेश्वर लोगों को भरपूर आजादी देता है—वह लोगों को वह मार्ग चुनने की अनुमति देता है जिस पर उन्हें चलना चाहिए। भले ही तुम परमेश्वर के घर में हो और भले ही तुम परमेश्वर द्वारा पूर्वनिर्धारित और चुने गए हो, फिर भी तुम आजाद हो। तुम परमेश्वर की विभिन्न अपेक्षाओं और व्यवस्थाओं को अस्वीकार करना चुन सकते हो या तुम उन्हें स्वीकारना चुन सकते हो; परमेश्वर तुम्हें मुक्त भाव से चुनने का अवसर देता है। लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुम क्या चुनते हो या तुम किस तरह से कार्य करते हो या तुम जिस मामले का सामना करते हो उसे सँभालने के प्रति तुम्हारा दृष्टिकोण क्या है या उसे हल करने के लिए अंत में तुम किन साधनों और पद्धतियों का उपयोग करते हो, तुम्हें अपने क्रियाकलापों की जवाबदेही लेनी चाहिए। तुम्हारा अंतिम परिणाम तुम्हारे व्यक्तिगत फैसलों और परिभाषाओं पर आधारित नहीं है, बल्कि परमेश्वर तुम्हारा लेखा-जोखा रख रहा है। परमेश्वर द्वारा बहुत सारे सत्य व्यक्त कर दिए जाने और लोगों द्वारा बहुत सारे सत्य सुन लिए जाने के बाद परमेश्वर हर व्यक्ति के सही और गलत को सख्ती से मापेगा और परमेश्वर ने जो कहा है, वह जो अपेक्षा करता है और उसने लोगों के लिए जो सिद्धांत तैयार किए हैं उनके आधार पर वह हर व्यक्ति का अंतिम परिणाम निर्धारित करेगा। इस मामले में परमेश्वर की जाँच-पड़ताल और परमेश्वर के आयोजन और व्यवस्थाएँ परमेश्वर द्वारा लोगों के साथ हेरा फेरी करना या उसके द्वारा लोगों को बाँधना नहीं है—तुम आजाद हो। तुम्हें परमेश्वर से चौकस रहने की जरूरत नहीं है और न ही तुम्हें डरने या बेचैन होने की जरूरत है। तुम शुरू से आखिर तक एक आजाद व्यक्ति हो। परमेश्वर तुम्हें एक स्वतंत्र परिवेश, स्वतंत्र चयन करने की इच्छाशक्ति और मुक्त भाव से चुनने की स्वतंत्रता देता है, वह तुम्हें अपने लिए चुनने की अनुमति देता है और अंत में तुम जो भी परिणाम प्राप्त करते हो वह पूरी तरह से तुम्हारे द्वारा चुने गए मार्ग से निर्धारित होता है। यह न्यायसंगत है, है ना? (हाँ।) अगर अंत में तुम्हें बचा लिया जाता है और तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के प्रति समर्पण करता है और परमेश्वर के अनुरूप है और तुम ऐसे व्यक्ति हो जिसे परमेश्वर द्वारा स्वीकार किया जाता है, तो यह वही है जो तुम्हें अपने सही चयनों के कारण मिलता है; अगर अंत में तुम्हें नहीं बचाया जाता है और तुम परमेश्वर के अनुकूल होने में समर्थ नहीं हो और तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त नहीं किए जाते हो और तुम ऐसे व्यक्ति नहीं हो जिसे परमेश्वर द्वारा स्वीकार किया जाता है तो वह भी तुम्हारे अपने चयनों के कारण ही है। इसलिए परमेश्वर अपने कार्य में लोगों को चुनने की बहुत स्वतंत्रता देता है और वह लोगों को पूरी आजादी भी देता है। वह इसलिए क्योंकि परमेश्वर सभी लोगों, घटनाओं और चीजों को मापने के लिए सत्य का उपयोग करता है जिसमें लोगों के परिणाम और गंतव्य शामिल हैं। लोगों के परिणाम और गंतव्य भी सत्य का उपयोग करके इसी तरह से तय किए जाते हैं—यह परमेश्वर के कार्य का सिद्धांत है जो कभी भी नहीं बदलता। परमेश्वर तुम्हें स्वीकार नहीं करेगा, तुम्हें अनुग्रह नहीं दिखाएगा और तुम्हें बचाए जाने की अनुमति नहीं देगा क्योंकि तुम उससे डरते हो, उससे चौकस रहते हो, और डरते-डरते और दबे-दबे चलते हुए सड़क के आखिर तक जाते हो; न ही परमेश्वर तुम्हारे द्वारा किए गए किसी भी योगदान के लिए अंत में तुम्हें बचाए जाने की अनुमति देगा। दूसरे शब्दों में, ऐसे कोई अपवाद नहीं होंगे जहाँ किसी व्यक्ति को ऐसा परिणाम या अच्छा गंतव्य मिलता है जिसका वह हकदार न हो—हर व्यक्ति का अंत में जो भी परिणाम होगा वह उसके द्वारा चुने गए मार्ग द्वारा निर्धारित होगा। मैं तुम्हें एक उदाहरण दूँगा। मान लो कि परमेश्वर तुम्हारे लिए किसी परिवेश का इंतजाम करता है और इस परिवेश में तुम्हें अपने खुद के अपराधों पर चिंतन करना और उन्हें जानना चाहिए और अपने भ्रष्ट स्वभावों, अपने भ्रामक विचारों और नजरियों, अपनी कमियों और अपर्याप्तताओं या परमेश्वर के बारे में अपनी कुछ गलतफहमियों और शिकायतों को जानना शुरू करना चाहिए। तुम्हें खुद को बचाने के लिए बहाने बनाना और चालाकी भरी दलीलें देना भी बंद कर देना चाहिए और इसके बजाय समर्पण करने, अपनी मौजूदा स्थिति को बदलने के लिए संगत सत्य की तलाश करने और सत्य को अपने अंदर स्वीकार करने में समर्थ होना चाहिए और फिर सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना चाहिए। ऐसा करने से तुम इच्छित प्रभाव प्राप्त करोगे। जब तुम्हारे साथ इसी तरह की चीजें फिर से होंगी तो तुम स्वाभाविक रूप से सत्य सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करोगे और परमेश्वर को तुम्हारी सहायता करने के लिए विशेष परिवेशों का इंतजाम करने की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी। यह कुछ ऐसी चीज है जिसे लोग हासिल कर सकते हैं और अगर वे इसे हासिल कर पाए तो परमेश्वर कोई अनावश्यक कार्य नहीं करेगा। लेकिन जब उन लोगों की बात आती है जो सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं, तो परमेश्वर का रवैया अलग होता है। कुछ लोग सत्य की खोज नहीं करते हैं या जब उनके साथ चीजें घटित होती हैं तो वे आत्म-चिंतन नहीं करते हैं, बल्कि इसके बजाय वे बस नकारात्मक बने रहते हैं और नाराजगी व्यक्त करते रहते हैं, परमेश्वर और दूसरे लोगों के बारे में शिकायत करते रहते हैं। वे न सिर्फ परमेश्वर के बारे में धारणाएँ बना लेते हैं बल्कि वे उसकी आलोचना भी करते हैं। अगर कोई उनकी काट-छाँट करे और उन्हें उजागर करे, तो वे खुद को सही ठहराने के बहाने ढूँढ़ लेंगे और वे निराश भी हो सकते हैं और अपने कार्य में कामचोरी भी कर सकते हैं या यहाँ तक कि चीजों को नुकसान भी पहुँचा सकते हैं। ऐसे लोग उद्धार से परे हैं और ये वे लोग हैं जिन्हें परमेश्वर ठुकरा देता है। अगर परमेश्वर में विश्वास करते हुए तुम्हारी सत्य में कुछ रुचि है और तुम धर्मोपदेश सुनने और सत्य के लिए प्रयास करने को तैयार हो और तुम थोड़ा-सा सकारात्मक रवैया रखते हो तो परमेश्वर तुम्हारे दिल की जाँच-पड़ताल करेगा और जब तुम सत्य की तलाश करोगे, तो वह तुम्हें थोड़ा द्रवित करेगा और फिर वह यह जाँच-पड़ताल करेगा कि क्या तुम सत्य का अभ्यास करने में समर्थ हो। लेकिन अगर तुम नकारात्मक होना और अपने कार्य में कामचोरी करना, बहाने बनाना और खुद को सही ठहराना और हर जगह पर हंगामा खड़ा करना चुनते हो और खुद को जानना या पश्चात्ताप करना नहीं चुनते हो तो परमेश्वर क्या करेगा और वह तुमसे कैसे निपटेगा? परमेश्वर बस चुपचाप यह देखेगा कि क्या बदलाव होते हैं। परमेश्वर तुम्हें द्रवित नहीं करेगा और न ही वह तुम पर उसके वचनों को पढ़ने और सत्य की तलाश करने का आग्रह करेगा। परमेश्वर इसमें शामिल नहीं होगा या दखल नहीं देगा—वह तुम्हें जी भरकर तमाशा करने देगा। जब तुम्हारा जमीर जागता है और तुम सोचते हो, “मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था” या तुम कभी-कभार कोई ऐसी अनुभवजन्य गवाही सुन लेते हो जो तुम्हारी मौजूदा स्थिति से मिलती-जुलती है और तुम्हें पता चलता है कि उस व्यक्ति ने कैसे कार्य किया और फिर अचानक तुम्हें महसूस होता है कि तुमने जो किया वह अनुचित, तर्कहीन और अशोभनीय था और तुम्हारे दिल में एक हल्का-सा दर्द होता है, तो उस क्षण से फिर तुम नकारात्मक या कमजोर नहीं होगे और तुम्हें खुद को सही ठहराने के लिए अपना मुँह खोलने में शर्मिंदगी महसूस होगी और तुम्हारे जो विचार या क्रियाकलाप चीजों में बाधा डालते हैं और उन्हें नुकसान पहुँचाते हैं, उनकी तादाद लगातार कम होती जाएगी और वे लगातार कम गंभीर होते जाएँगे। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि अंत में इसमें आगे क्या होता है, जो भी हो, यह सब तुम्हारा अपना व्यवहार है। परमेश्वर बस गुप्त रूप से और चुपचाप देख रहा है जिसका उद्देश्य वह प्रमाण ढूँढना है जिसके द्वारा वह अंत में तुम्हारा आकलन करेगा। ठीक वैसे ही जैसे जब नीनवे का शहर नष्ट होने वाला था, तो परमेश्वर ने नीनवे के निवासियों को संदेश देने के लिए सिर्फ योना को भेज दिया। परमेश्वर ने उन्हें अपने पाप कबूल करने, पश्चात्ताप करने या अपनी समस्याएँ समझने के लिए द्रवित नहीं किया—उसने ये चीजें नहीं कीं। परमेश्वर ने संदेश देने के लिए सिर्फ योना को भेज दिया और साथ ही यह मालूम करने के लिए गुप्त रूप से देखा कि यह सूचना सुनने पर उन्होंने क्या प्रतिक्रियाएँ और क्रियाकलाप किए और ऊपर से नीचे तक सभी लोगों की योजनाएँ क्या थीं और परमेश्वर की इस सूचना के प्रति उनका रवैया क्या था। उसने सिर्फ गुप्त रूप से देखा। “देखने” का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि परमेश्वर एक दर्शक की तरह चीजों के आगे बढ़ने की प्रक्रिया और चीजों के बदलने की दिशा देख रहा है और वह किसी भी तरह से दखल नहीं देता। योना से वे कुछ वाक्य कहलवाने के अलावा परमेश्वर ने कोई अतिरिक्त कार्य नहीं किया और न ही उसने लोगों को प्रोत्साहित करने का कोई कार्य किया और इससे भी बढ़कर यह कि कहलवाने के लिए कोई अतिरिक्त वचन नहीं थे, सिर्फ वही कुछ वाक्य थे जो योना के मुँह से निकले थे। यकीनन आज के लोगों पर परमेश्वर के कार्य के सिद्धांत अपरिवर्तित रहते हैं—वह अब भी इसी तरह से कार्य करता है और शुरू से अंत तक मानवजाति के प्रति परमेश्वर का यही रवैया है। चाहे वह किसी को बदलना चाहता हो या किसी व्यक्ति में कुछ पूरा करना चाहता हो, अपने कार्य में परमेश्वर का रवैया, सिद्धांत और पद्धतियाँ नहीं बदलती हैं। ऐसा क्यों है? परमेश्वर ने जीवित लोग बनाए, स्वतंत्र इच्छाशक्ति वाले मनुष्य बनाए, मशीनें या कठपुतलियाँ नहीं बनाईं। जब परमेश्वर सत्य व्यक्त करता है या कोई चीज पूरी करना चाहता है तो वह अक्सर सबसे पहले लोगों को उसके इरादे गहराई से समझने में सक्षम बनाने के लिए एक परिवेश का इंतजाम करता है और कभी-कभी वह लोगों को सीधे यह बता देता है कि उसके इरादे और अपेक्षाएँ क्या हैं; बाकी सब कुछ लोगों पर निर्भर करता है जो अपनी स्वतंत्र इच्छाशक्ति और अपनी विभिन्न स्थितियों के आधार पर फैसले लेते हैं। नीनवे के निवासियों के प्रति परमेश्वर का यही रवैया था और वह अब जिन लोगों को बचाना चाहता है उनके प्रति उसका रवैया अपरिवर्तित है। परमेश्वर के कार्य के सिद्धांत नहीं बदले हैं; परमेश्वर हमेशा इसी तरह से कार्य करता है और उसके द्वारा सृजित मनुष्यों पर उसके कार्य के सिद्धांत हमेशा ऐसे ही होते हैं। नीनवे के निवासियों को सूचना देने के बाद योना आराम करने के लिए किसी जगह की तलाश में चला गया और उसने यह मालूम करने के लिए किनारे से शहर के लोगों पर नजर रखी कि जब परमेश्वर का संदेश शहर में ऊपर से नीचे हर व्यक्ति तक पहुँच जाएगा और सभी को यह खबर हो जाएगी कि परमेश्वर नीनवे को नष्ट करने जा रहा है, तो नीनवे के निवासियों में सदमे की किस तरह की लहरें उठेंगी और किस तरह की गतिविधियाँ शुरू हो जाएँगी—वह सिर्फ देखता रहा। यकीनन इस अवलोकन में समय लगा और इस प्रक्रिया के दौरान परमेश्वर इन सभी चीजों में होने वाले बदलाव देख रहा था। अगर चीजें अच्छी दिशा में आगे बढ़ीं तो यकीनन परमेश्वर खुश होगा; अगर चीजें बुरी दिशा में आगे बढ़ीं तो हो सकता है वह शोक करे, लेकिन यह स्थिति पर निर्भर करेगा। परमेश्वर शोक करेगा क्योंकि मनुष्य परमेश्वर द्वारा बनाए गए थे और जब मनुष्य विनाश का सामना कर रहा होता है या जब कोई जीवन खत्म होने वाला होता है तो परमेश्वर शोक करता है। लेकिन जब परमेश्वर का सामना ऐसे भ्रष्ट लोगों से होता है जो इतने सुन्न और मंदबुद्धि हैं और इतने विद्रोही हैं, तो परमेश्वर शोक नहीं करता है। परमेश्वर वह करेगा जो उसे अपनी मूल योजना के अनुसार, अपने कार्य करने के तरीकों के अनुसार और उन तरीकों और सिद्धांतों के अनुसार करना चाहिए जिनसे वह सृजित प्राणियों से निपटता है। यहाँ कोई मानवीय भावनाएँ या संवेदनाएँ नहीं हैं, सिर्फ चीजें करने के सृष्टिकर्ता के सिद्धांत और कसौटियाँ हैं। इसलिए, इस संबंध में लोगों को अपनी खुद की धारणाएँ त्याग देनी चाहिए और परमेश्वर के विचारों और चिंतनों के बारे में अनुमान और अटकलें लगाने के लिए सृजित मनुष्यों की संकीर्ण मानसिकता का उपयोग करने के बजाय लोगों से पेश आने के लिए परमेश्वर के रवैये और पद्धतियों को सटीकता से समझना चाहिए। परमेश्वर तुम पर कार्य करता है, तुम्हारे लिए परिवेशों का इंतजाम करता है और तुम्हें प्रशिक्षित करने के लिए और तुम्हें अभ्यास करने में सक्षम बनाने के लिए लोगों, घटनाओं और चीजों की व्यवस्था करता है और वह तुममें सत्य कार्यान्वित करना चाहता है—इस तरह से कार्य करने के पीछे परमेश्वर का मूल इरादा किस पर आधारित है? यह जीवन का सम्मान करने और उसे सँजोने के सिद्धांत पर आधारित है। यह कोई भावना नहीं है जो सृष्टिकर्ता की सृजित मनुष्यों के प्रति है—परमेश्वर में कोई भावनाएँ नहीं हैं। इस मूल इरादे का सिद्धांत मानवीय दैहिक रिश्तेदारी की भावनाओं से परे जाता है और यकीनन यह किसी प्रकार का स्नेह भी नहीं है—यह जीवन को सँजोने और उसका सम्मान करने के सिद्धांत के कारण उत्पन्न होता है। कुछ लोग कहते हैं : “क्या यह परमेश्वर के मन की व्यापकता है? क्या यह उसकी आध्यात्मिक अवस्था का उच्च स्तर है?” क्या तुम लोग सोचते हो कि यही बात है? (नहीं।) तुम लोगों का वर्णन करने के लिए “आध्यात्मिक अवस्था का स्तर” और “मन की व्यापकता” जैसे शब्दों का उपयोग कर सकते हो, लेकिन उन्हें परमेश्वर पर लागू मत करो। यह न तो मन की व्यापकता है और न ही आध्यात्मिक अवस्था का कोई स्तर है। एक लिहाज से इसे सृष्टिकर्ता की सुंदरता कहा जा सकता है और दूसरे लिहाज से यह भी कहा जा सकता है कि यह परमेश्वर की पहचान और सार का प्रकाशन है। परमेश्वर किसी भी सृजित प्राणी के जीवन को सँजोता है और उसका सम्मान करता है, लेकिन इस सँजोने और सम्मान करने के आधार पर परमेश्वर अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करता और ये सिद्धांत भावनाओं के या देह के नहीं हैं। ये किसके हैं? ये सत्य के सिद्धांत हैं, जो सिर्फ परमेश्वर के हैं। इस बारे में सोचो, अगर लोगों के बच्चे हों तो वे उनसे अत्यधिक लाड़ करते हैं और उनके लिए उनमें बहुत गहरी भावनाएँ होती हैं। यहाँ तक कि वे चाहते हैं कि काश वे दिन भर अपने बच्चों को अपनी बाहों में झुला पाते और उनके साथ रह पाते। मनुष्यों के प्रति परमेश्वर में ऐसी कोई भावना या स्नेह नहीं है। लोग अपने खून के रिश्तों के कारण अपने बच्चों के प्रति उस प्रकार की भावनाएँ विकसित कर लेते हैं और उस प्रकार की भावनाओं के कारण लोग अपना विवेक और अपने सिद्धांत खो बैठेंगे। ये सामान्य मानवता के प्राकृतिक या सामान्य प्रकाशन नहीं हैं और न ही ये प्रेम की अभिव्यक्ति हैं। ये पूरी तरह से भावनाएँ और उग्रता हैं—ये भावनाएँ हैं जो खून के रिश्तों से उत्पन्न होती हैं। भावनाएँ सत्य नहीं हैं और ये वे नहीं हैं जो सामान्य मानवता में होनी चाहिए; ये नकारात्मक चीजें हैं। परमेश्वर मानवजाति से लाड़ नहीं करता है या उसे बिगाड़ता नहीं है। मानवजाति के प्रति परमेश्वर का क्या रवैया है? परमेश्वर ने तुम्हें चुना और वह तुम्हारे लिए जिम्मेदार है और तुम पर कार्य करता है और कीमत चुकाता है और सृजित मनुष्यों का जीवन सँजोने और जीवन का सम्मान करने के सिद्धांत के आधार पर तुम्हें सत्य और जीवन प्रदान करने के लिए वचन बोलता है। लेकिन परमेश्वर जिस तरीके से कार्य करता है वह लोगों की कल्पना जैसा नहीं है, यानी वह तुम्हें कसकर पकड़कर या बोलचाल की भाषा का उपयोग करें तो तुमसे जबरन वसूली करके कार्य नहीं करता है। यह ऐसा नहीं है। परमेश्वर लोगों से जबरन वसूली नहीं करता; वह कभी भी कोई भी चीज करने के लिए लोगों पर दबाव नहीं डालता है। आशीषें प्राप्त करने के लिए लोग परमेश्वर में अपने विश्वास में हमेशा परमेश्वर से जबरन वसूली करना चाहते हैं और हमेशा परमेश्वर को उन्हें आशीषें देने के लिए मजबूर करना चाहते हैं और परमेश्वर को कसकर पकड़ना और उससे जबरन वसूली भी करना चाहते हैं ताकि वह उन्हें स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने दे। क्या यही बात नही है? (हाँ।) परमेश्वर तुमसे जबरन वसूली नहीं करता है। बोलचाल की भाषा का यह वाक्यांश “तुमसे जबरन वसूली करता है” का उपयोग करना अच्छा नहीं है, लेकिन यह कुछ हद तक जीवंत है और लोगों के लिए इसे समझना आसान है। परमेश्वर तुम्हें कसकर नहीं पकड़े हुए है—तुम आजाद हो। अगर तुम यह सारा कार्य सँजोते हो जो परमेश्वर तुम पर करता है क्योंकि वह तुम्हारे जीवन का सम्मान करता है, उसे संजोता है और उसे कीमती मानता है, तो जब परमेश्वर तुम्हारे लिए किसी भी परिवेश का आयोजन करता है और उसे व्यवस्थित करता है तो तुम्हें परमेश्वर से चौकस रहना, उसके बारे में गलतफहमियाँ रखना, उसके प्रति प्रतिरोध महसूस करना या उसे अस्वीकार करना नहीं चुनना चाहिए। बल्कि तुम्हें वह करना चाहिए जो एक सृजित प्राणी को करना चाहिए और वह रवैया दिखाना चाहिए जो एक सृजित प्राणी को सृष्टिकर्ता के प्रति रखना चाहिए—समर्पण और स्वीकृति। क्या यह ऐसा नहीं है? (हाँ।) इस पहलू पर अब स्पष्ट रूप से संगति हो चुकी है।

लोग जिस तरह से परमेश्वर के कार्य के साथ पेश आते हैं उससे पहले ही उनकी एक धारणा और कल्पना उजागर हो चुकी है। यह धारणा और कल्पना क्या है? लोग परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं की व्याख्या इस रूप में करते हैं कि वह उनके साथ हेरा फेरी करता है और उन्हें नियंत्रित करता है। क्या परमेश्वर इसी तरह से कार्य करता है? (नहीं।) लोग अपने दिलों की गहराई में परमेश्वर से अस्पष्ट रूप से डरे हुए हैं। परमेश्वर का जिक्र होते ही उन्हें लगता है कि वह डरावना है और सुंदर नहीं है। वे मानते हैं कि अगर तुम परमेश्वर के वचन नहीं सुनते हो और उसके आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण नहीं करते हो तो वह तुमसे तब तक नाराज रहेगा जब तक तुम उसके वचन नहीं सुनते और उसके आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण नहीं करते, और जब तक वह तुम्हें पूर्ण नहीं करता है तब तक वह हार नहीं मानेगा। क्या लोगों की यह धारणा नहीं है? लोग परमेश्वर के क्या होने की कल्पना करते हैं? क्या वे यह कल्पना नहीं करते हैं कि वह तानाशाह है? वे सोचते हैं कि तुम्हें उसका शासन स्वीकारना चाहिए, उसकी नीतियाँ स्वीकारनी चाहिए और उसके प्रति आदरभाव रखना चाहिए और वह तुम्हें जो कुछ भी करने के लिए कहता है वह तुम्हें करना चाहिए, और तुम उसकी पीठ पीछे उसके बारे में बात नहीं कर सकते और तुम्हें उन सारे परिवेशों को स्वीकार करना होगा जिनका वह तुम्हारे लिए इंतजाम करता है, और अगर तुम स्वीकार नहीं करते हो तो तुम्हें सजा दी जाएगी और तुम्हें प्रतिशोध भुगतना पड़ेगा। क्या परमेश्वर वाकई इस तरह से चीजें करता है? (नहीं।) परमेश्वर तुम्हारा सम्मान करता है और तुम्हारे लिए जिम्मेदारी लेता है। परमेश्वर सृजित मनुष्यों का जीवन सँजोता है। लोगों को यह पहचानने में विफल नहीं होना चाहिए कि उनके लिए क्या अच्छा है या उसकी दयालुता की बेकद्री नहीं करनी चाहिए। अगर तुम परमेश्वर की दयालुता की सराहना करते हो तो तुम्हें उन परिवेशों को स्वीकार करना चाहिए जिनका वह तुम्हारे लिए इंतजाम करता है और उन्हें उससे स्वीकार करना चाहिए। भले ही तुम उनमें सत्यों को स्वीकार न करो, उनमें सत्य सिद्धांतों को न समझो और यह न समझो कि तुम्हें क्या अभ्यास करना चाहिए या क्या बदलना चाहिए, लेकिन कम-से-कम तुम्हें परमेश्वर से चौकस नहीं रहना चाहिए या उसे गलत नहीं समझना चाहिए—तुम्हें यही चीज हासिल करनी चाहिए। भले ही तुम इन परिवेशों से कुछ भी प्राप्त न करो, लेकिन परमेश्वर की इच्छाओं को गलत मत समझो। परमेश्वर तुमसे कुछ भी प्राप्त करने की इच्छा नहीं कर रहा है। तुम तो बस एक छोटे-से सृजित प्राणी हो, परमेश्वर तुमसे क्या प्राप्त करने की इच्छा कर सकता है? तुम्हारा जीवन और वह सब कुछ जिसका तुम आज आनंद लेते हो, वह तुम्हें परमेश्वर ने दिया है और जो थोड़ा-सा धर्म-सिद्धांत तुम समझते हो वह भी उसी ने दिया है। तुम्हारी स्वतंत्र इच्छाशक्ति, तुम्हारी काबिलियत, तुम्हारे गुण और तुम्हारी क्षमताएँ और कौशल, चाहे बड़े हों या छोटे, ये सभी तुम्हें परमेश्वर ने दिए हैं। ऐसा क्या है जो परमेश्वर तुमसे प्राप्त करने की इच्छा करेगा? अगर परमेश्वर तुममें सत्य कार्यान्वित करने के बाद महिमा प्राप्त करता है जिससे तुम उसके प्रति समर्पण करते हो और उसका भय मानते हो और तुम सोचते हो कि परमेश्वर तुमसे यही प्राप्त करने की इच्छा करता है, तो क्या तुम अपने खुद के घिनौने मानकों से उसके बारे में राय नहीं बना रहे हो? यह परमेश्वर के खिलाफ ईशनिंदा है, है ना? (हाँ।) परमेश्वर लोगों से क्या महिमा प्राप्त कर सकता है? अंत में लोगों को ही मूर्त लाभ प्राप्त होते हैं। अपना कार्य पूरा होने से पहले ही परमेश्वर महिमा प्राप्त कर चुका है क्योंकि परमेश्वर खुद महिमावान है—उसका सत्य और अधिकार शैतान की हार का प्रमाण है और वे सभी सकारात्मक चीजों की वास्तविकता हैं। परमेश्वर खुद महिमावान है, तो क्या अब भी उसे तुम जैसे छोटे-से सृजित प्राणी से जरा-सी महिमा प्राप्त करने की जरूरत है? परमेश्वर लोगों से कुछ भी प्राप्त करने की इच्छा नहीं करता है। अगर वह कुछ प्राप्त करने की इच्छा करता है तो वह अंत में लोगों को उसकी प्रबंधन योजना के अनुसार उसकी अपेक्षाएँ पूरी करने में सक्षम बनाना है और एक बार जब लोग उद्धार प्राप्त कर लेंगे और परमेश्वर के अनुरूप होने में समर्थ हो जाएँगे, तो फिर वह आराम करेगा—मानवजाति के उद्धार के कारण बदले में परमेश्वर को आराम करने का अवसर मिलेगा—परमेश्वर यही प्राप्त करने की इच्छा करता है। तो क्या अंत में लोग ही मूर्त लाभ प्राप्त नहीं करते हैं? लोग सत्य प्राप्त कर चुके होंगे, वे अब जीवन में भ्रमित महसूस नहीं करेंगे—उनके पास एक दिशा और एक मार्ग होगा—और वे परमेश्वर के अनुरूप होंगे और अब उसके खिलाफ विद्रोह नहीं करेंगे, वे अब किसी भी बुरी शक्ति द्वारा बंदी नहीं बनाए जाएँगे, वे सच्चे सृजित प्राणी होंगे और अब वे मृत्यु का सामना नहीं करेंगे—यह कितना बड़ा सम्मान है! मनुष्य ही सबसे ज्यादा मूर्त लाभ प्राप्त करते हैं, ये वे हैं जो परमेश्वर का कार्य और परमेश्वर का उद्धार स्वीकारते हैं। क्या इस पहलू पर स्पष्ट रूप से संगति हो चुकी है? इसमें लोगों की धारणा और कल्पना क्या है? (वे परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं की व्याख्या इस रूप में करते हैं कि वह लोगों के साथ हेरा फेरी करता है और उन्हें नियंत्रित करता है।) अगर हम इस बारे में संगति नहीं करते तो लोगों के मन में हमेशा कुछ विचार और नजरिये होते जिन्हें वे व्यक्त नहीं कर पाते या जो व्यवस्थित सिद्धांत नहीं बने होते। वैसे तो ये चीजें उन्हें अपने कर्तव्य करने में बाधित नहीं करती हैं या उनके दैनिक जीवन को स्पष्ट तरीके से प्रभावित नहीं करती हैं, लेकिन फिर भी वे सत्य के उनके अनुसरण को, परमेश्वर के प्रति उनके रवैये को और परमेश्वर के साथ उनके रिश्ते को गंभीर रूप से प्रभावित करती हैं। इसलिए लोगों को ये चीजें त्याग देनी चाहिए। एक बार जब यह समस्या हल हो जाएगी तो तुम अपने और परमेश्वर के बीच की बाधा को त्याग चुके होगे और सत्य का अनुसरण करने के तुम्हारे मार्ग की एक प्रकार की रुकावट हटा दी जा चुकी होगी जिससे तुम्हारे लिए सत्य का अनुसरण करना और आसान हो जाएगा। जब वास्तविक कठिनाइयाँ हल हो जाएँगी तो तुम्हारे और परमेश्वर के बीच की बाधाएँ और रुकावटें कम हो जाएँगी, इसलिए तुम अपना कर्तव्य और सत्य का अभ्यास और ज्यादा आराम से करने में समर्थ होगे। यह ठीक जंग के मैदान में जाने जैसा है—क्या तुम लोगों को लगता है कि जंग में जाते समय हल्का बोझ लेकर जाना बेहतर है या भारी बोझ लेकर जाना? कौन-सा ज्यादा आरामदेह है? (हल्का बोझ लेकर जंग में जाना।) हल्के बोझ के साथ जंग में जाना, अपनी पीठ पर सिर्फ एक हथियार लेकर चलना ही काफी है—ऐसा करना सरल और आसान है। अगर इसके अलावा तुम बर्तन और सामान या सौंदर्य-प्रसाधन और कसरत के उपकरण लेकर चलोगे, तो बोझ बहुत ज्यादा हो जाएगा; जंग में इतनी सारी चीजें लेकर चलना कष्टदायक होगा और लड़ने में असुविधा होगी। ये धारणाएँ और कल्पनाएँ अलग-अलग तरह के बोझ की तरह हैं जिन्हें लोग उठाए फिरते हैं और वे जहाँ कहीं भी जाते हैं ये उनके लिए मुसीबतें और बाधाएँ बन जाती हैं। संक्षेप में, समय-समय पर ये चीजें तुम्हें प्रभावित करेंगी और सत्य का अनुसरण करने और उसका अभ्यास करने में बाधा डालेंगी। जब कोई गंभीर मुद्दा नहीं होगा तो ऐसा लगेगा जैसे तुम्हें कोई बड़ी समस्या नहीं है। लेकिन जब सिद्धांत की गंभीर समस्याएँ खड़ी होंगी, तो ये चीजें तुम्हें परमेश्वर से अलग करने वाली बाधा बन जाएँगी। जब ये चीजें सामने आएँगी तो तुम्हें लगेगा कि परमेश्वर के साथ तुम्हारे रिश्ते में कोई समस्या है, तुम्हारे और परमेश्वर के बीच कोई टकराव है; परमेश्वर में विश्वास रखने वाला तुम्हारा दिल अब उतना शुद्ध नहीं रहेगा और तुम्हें कई कठिनाइयाँ होंगी। लेकिन जब तुम ये चीजें त्याग दोगे, तो तुम बहुत अच्छा महसूस करोगे, तुम्हारा दिल शांत और मुक्त हो जाएगा और अब बेबस या बँधा हुआ नहीं रहेगा। वैसे तो समय-समय पर ये चीजें तुम्हारे अवचेतन मन या तुम्हारे विचारों में कौंध उठेंगी, लेकिन तुम पहले से ही उन्हें मूल रूप से हल कर चुके होगे और जब तुम फिर से चीजें करोगे, तो तुम उन्हें करने में ज्यादा सहज महसूस करोगे और ऐसा ज्यादा आसानी से करोगे। वैसे तो अब भी तुम्हारे मन की गहराइयों में ये धारणाएँ और कल्पनाएँ हल्का प्रभाव डाल सकती हैं, लेकिन कम-से-कम तुम अपनी व्यक्तिपरक इच्छा में स्पष्ट रूप से यह भेद पहचान चुके होगे कि वे सकारात्मक चीजें नहीं हैं, इसलिए व्यक्तिपरक रूप से तुम उन्हें त्याग दोगे और उनसे प्रभावित नहीं होगे। इस तरह से तुम अपने और परमेश्वर के बीच की इस बाधा को मूल रूप से त्याग चुके होगे और हल कर चुके होगे।

हम सत्य का अनुसरण करने के विषय पर अक्सर इस तरह से संगति करते हैं। क्या तुम लोग सत्य का अनुसरण करने के महत्व को महसूस कर सकते हो? जब तुमने देखा कि तुम्हारे आस-पास के लोग जिनसे तुम परिचित हो, कलीसिया द्वारा निपटाए जा रहे हैं, और यहाँ तक कि कुछ को तो बहिष्कृत या निष्कासित भी किया जा रहा है, तो क्या तुम लोगों को इस बारे में कोई विचार आया? क्या तुमने इससे कोई अनुभव या सबक लिया? जिन लोगों को बी समूहों में भेज दिया गया और जिन्हें बाहर निकाल दिया गया उनके साथ मुख्य समस्याएँ क्या हैं? (जब मैंने देखा कि मेरे आस-पास के कुछ लोग जिनसे मैं परिचित हूँ, बी समूहों में स्थानांतरित किए जा रहे हैं या बाहर निकाले जा रहे हैं, तो इससे मेरे दिल और मन में हलचल पैदा हुई। हालाँकि उन्होंने कई वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखा है लेकिन वे वास्तव में सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं, और अगर मैं भी सत्य का अनुसरण नहीं करती हूँ और जब भी मेरे साथ चीजें घटित होती हैं तब मैं भी सत्य की खोज नहीं करती हूँ तो अंत में मुझे भी उन्हीं की तरह हटा दिया जाएगा।) क्या तुम्हें पता है कि इन लोगों से निपटने के लिए परमेश्वर के घर के सिद्धांत क्या थे? क्या परमेश्वर के घर ने उन्हें बस इसलिए बाहर निकाल दिया क्योंकि वे खराब मानवता वाले हैं और सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं और क्योंकि वह उन्हें नापसंद करता है? (नहीं।) तो फिर क्या यह बात है कि जिन सभी लोगों से नहीं निपटा गया उनकी मानवता के साथ कोई समस्या नहीं है, वे सभी सत्य से प्रेम करते हैं, सत्य का अनुसरण करते हैं और सत्य के प्रति समर्पण कर सकते हैं, और परमेश्वर से प्रेम कर सकते हैं और उसका भय मान सकते हैं? क्या यही बात है? (नहीं।) क्या उन लोगों को सिर्फ इसलिए परमेश्वर के घर से बाहर निकाल दिया गया या बी समूहों में भेज दिया गया क्योंकि वे सत्य से प्रेम नहीं करते हैं और उससे विमुख हैं? क्या उनसे इसलिए निपटा गया क्योंकि वे खराब मानवता वाले हैं और सत्य स्वीकारने से पूरी तरह इनकार करते हैं या इसका कारण उनका खराब रंग-रूप या कोई अस्थायी अपराध है? क्या यही वह सिद्धांत है जिसके द्वारा परमेश्वर का घर लोगों से निपटता है? (नहीं।) क्या किसी व्यक्ति द्वारा सत्य का अनुसरण नहीं करने के कारण परमेश्वर का घर उससे निपटता है, उससे कर्तव्य करने की योग्यता छीन लेता है और उसे बाहर निकाल देता है? (नहीं।) तो वह इन लोगों से क्यों निपटा और क्यों उसने इन्हें बाहर निकाल दिया? (क्योंकि उन्होंने सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य नहीं किया और उन्होंने कलीसिया के कार्य में गड़बड़ की और बाधा डाली जिसके कारण परमेश्वर के घर के कार्य को गंभीर नुकसान हुए।) क्या यही मुख्य कारण था? (हाँ।) दूसरे क्या कारण थे? क्या कभी किसी को लगातार झूठ बोलने के कारण बाहर निकाला गया है? (नहीं।) क्या कभी किसी को इसलिए बाहर निकाला गया है क्योंकि वह सत्य से प्रेम नहीं करता है और सत्य से विमुख है? क्या कभी किसी को इसलिए बाहर निकाला गया है क्योंकि वह अपने कर्तव्य करने में निष्ठाहीन है? (नहीं।) क्या तुम्हें लगता है कि यह अफसोस की बात है कि इन लोगों को बाहर निकाल दिया गया? क्या इनमें से किसी के साथ अन्याय किया जा रहा था? (नहीं।) इनमें से किसी के साथ भी कतई अन्याय नहीं किया जा रहा था। इन लोगों द्वारा किए गए बुरे कर्मों के अनुसार जब वे आध्यात्मिक क्षेत्र में जाते हैं तो वे अठारह बार मरने के लायक हैं और इन सभी को दंडित किया जाना चाहिए—मरना और फिर वापस जिंदा होना, और फिर से दंडित किया जाना, और फिर से मरना, और फिर से वापस जिंदा होना, और फिर से दंडित किया जाना, और फिर से मरना—वे कुल मिलाकर अठारह बार मरने के लायक हैं। उन्होंने बहुत सारे बुरे कर्म किए हैं और उनके पाप जघन्य हैं! तो फिर इन लोगों से क्यों निपटा गया और क्यों इन्हें निष्कासित किया गया? वह इसलिए क्योंकि उनसे नहीं निपटना कोई विकल्प नहीं था—वे अपने कर्तव्य नहीं कर रहे थे, वे गड़बड़ियाँ और बाधाएँ उत्पन्न कर रहे थे और वे चीजों को तोड़-फोड़ रहे थे! कुछ लोग तो यहाँ तक सोचते हैं कि इन लोगों से इसलिए निपटा गया क्योंकि वे झूठ बोलना पसंद करते हैं और खराब मानवता वाले हैं या वे रुतबे और शक्ति के लिए होड़ करते हैं और अपने कर्तव्य करने में निष्ठाहीन हैं; दूसरे भ्रमित लोग कहते हैं कि ऐसा इसलिए है क्योंकि वे सत्य से प्रेम नहीं करते हैं और सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं। तो क्या तुम लोग सत्य से प्रेम करते हो? क्या जिन लोगों को बाहर नहीं निकाला गया है वे सभी सत्य से प्रेम करते हैं और सत्य का अनुसरण करते हैं? (नहीं।) इनमें से कोई भी तथ्य नहीं है। दरअसल इन लोगों से इसलिए निपटा गया और इन्हें इसलिए निष्कासित किया गया क्योंकि इन लोगों ने अपने कर्तव्य करने की प्रक्रिया में गड़बड़ियाँ और बाधाएँ उत्पन्न करने और चीजों की तोड़-फोड़ करने की भूमिका निभाई, उन्होंने वे चीजें कीं जो शैतान और दानव और बड़ा लाल अजगर करना चाहते हैं लेकिन करने में असमर्थ हैं, परमेश्वर के घर के प्रशासनिक आदेशों का घोर उल्लंघन किया और परमेश्वर को बुरी तरह से गुस्सा दिलाया। उन्हें सिर्फ इसलिए बाहर निकाला गया क्योंकि उन्हें बाहर नहीं निकालने का बस विकल्प ही नहीं था। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर का घर लोगों के प्रति प्रेम से रहित और कठोर है, और ऐसा नहीं है कि परमेश्वर लोगों को मौके नहीं देता है। बल्कि बात यह है कि इन लोगों ने अपने क्रियाकलापों में हदें पार कर दीं जिससे गड़बड़ियाँ और बाधाएँ उत्पन्न हुईं और उन्होंने कलीसिया के कार्य को जो नुकसान पहुँचाए वे बहुत ही बड़े थे। वे अपने कर्तव्य नहीं कर रहे थे और वे तो श्रम भी नहीं कर रहे थे; वे गड़बड़ियाँ और बाधाएँ उत्पन्न कर रहे थे और बुरे कर्म कर रहे थे। परमेश्वर के चुने हुए लोगों में से कोई भी कलीसिया में ऐसे लोगों का होना पसंद नहीं करता है। अगर तुम कलीसिया में किसी को ताना मारते हो या कोई झूठ बोलते हो तो यह सिर्फ तुम्हारा व्यक्तिगत व्यवहार है, यह सिर्फ इतना ही है कि तुम सत्य से प्रेम नहीं करते और सत्य का अनुसरण नहीं करते और जब तक इससे कोई गड़बड़ी या बाधा उत्पन्न नहीं होती है तब तक कोई भी तुमसे नहीं निपटेगा; अगर कभी-कभी तुम अपना कर्तव्य करने में कुछ हद तक लापरवाह होते हो लेकिन ज्यादातर समय तुम प्रभावी होते हो तो जब तक तुम कोई गड़बड़ी या बाधा उत्पन्न नहीं करते तब तक परमेश्वर का घर तुम्हें रहने और कर्तव्य करने का अवसर देगा, तुम्हारे साथ सिद्धांतों के अनुसार व्यवहार करेगा। लेकिन इन लोगों ने गड़बड़ियाँ और बाधाएँ उत्पन्न कीं। उन्होंने बेतहाशा गलत कर्म किए और हर तरह से सिद्धांतों का उल्लंघन किया जिससे बहुत उथल-पुथल मची; कलीसिया के कार्य के सभी पहलुओं को नुकसान पहुँचाया गया और कई भाई-बहनों द्वारा किए गए कर्तव्यों के फल पूरी तरह से व्यर्थ हो गए। उनकी गड़बड़ियों और बाधाओं के दुष्परिणाम बहुत ही गंभीर हैं और उन्हें सुधारने में अनगिनत लोगों को अनगिनत घंटे लगेंगे, इसलिए इन लोगों को बाहर निकालना ही पड़ा! सिर्फ इसी तरह से भाई-बहनों की रक्षा करना संभव था ताकि वे सामान्य रूप से अपने कर्तव्य कर सकें और अच्छे नतीजे प्राप्त कर सकें। सिर्फ इन कुकर्मियों और मसीह-विरोधियों को हटाकर ही भाई-बहनों के लिए कार्य करने और रहने का उपयुक्त परिवेश बनाना संभव था। अगर ये कुकर्मी और मसीह-विरोधी कलीसिया में रह जाते तो वे सिर्फ आफत ही होते और वे जहाँ भी जाते वहाँ गंदा और गदला माहौल और अराजकता होती। उनकी की हुई किसी भी चीज ने श्रम करने का मानक भी पूरा नहीं किया। उन्होंने सिर्फ बाधा डाली, तोड़-फोड़ की और तबाह किया। उन्होंने जो कुछ भी किया वह कलीसिया के कार्य और कलीसियाई जीवन में गड़बड़ करने और बाधा डालने के लिए था। क्या वे शैतान के सेवक नहीं हैं? क्या ऐसे लोग कलीसिया में रह सकते हैं? वे साधारण भ्रष्ट मनुष्य नहीं हैं, बल्कि शैतान के सेवक हैं! इन लोगों ने क्या किया? उन्होंने परमेश्वर के चढ़ावे बरबाद किए और बिना किसी शर्त के उन्हें अविश्वासियों को दे दिया—वे अविश्वासियों को पैसे देने में बेहद उदार थे, उन्हें तब भी जबरदस्ती पैसे थमा दिए जब उन्होंने माँगे भी नहीं थे। जब उन्होंने अविश्वासियों से कुछ कार्य करने के लिए कहा और अविश्वासियों ने कहा कि सौ डॉलर काफी होंगे, तो वे तीन सौ डॉलर देने पर अड़ गए और जब अविश्वासियों ने तीन सौ डॉलर माँगे, तो वे पाँच सौ डॉलर देने पर अड़ गए, यहाँ तक कि उन्होंने अविश्वासियों की मजदूरी का भुगतान करने के बाद उन्हें अतिरिक्त बोनस भी दिया। चाहे कितने भी चढ़ावे खर्च किए जाने हों, वे इस बारे में ऊपरवाले से नहीं पूछते थे, बल्कि बस खुद ही फैसले ले लेते थे। चाहे उन्होंने कोई भी कार्य किया हो, उन्होंने इसे परमेश्वर के घर की कार्य-व्यवस्थाओं के अनुसार या परमेश्वर के घर द्वारा दिए गए सिद्धांतों के अनुसार नहीं किया और यकीनन उन्होंने इसका सत्य सिद्धांतों के अनुसार निर्वहन नहीं किया। उन्होंने बस अपनी इच्छाओं का अनुसरण किया और इसे जैसे चाहा वैसे किया, परमेश्वर के घर के हितों की बिल्कुल भी रक्षा नहीं की। वे परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करने के बजाय अविश्वासियों की रक्षा करना ज्यादा पसंद करते और उन्होंने हर जगह परमेश्वर के चढ़ावे बरबाद किए। क्या वह पैसा उन्होंने कमाया था? जब अविश्वासियों को बोनस और उपहार देने की बात आई तो उन्होंने खुद को बिल्कुल नहीं रोका और किसी को भी उनसे असहमत होने की अनुमति नहीं थी और जो कोई भी उनसे असहमत हुआ, उसे उन्होंने फटकार दिया। क्या तुम सोचते हो कि इस तरह के लोग परमेश्वर में विश्वास करने वाले और उसका अनुसरण करने वाले लोग हैं? वे तलछट हैं, है ना? क्या इस तरह के लोगों को बाहर निकाल देना चाहिए? (हाँ।) इन लोगों ने दूसरी कौन-सी बुराइयाँ कीं? सुसमाचार का प्रचार करते समय उन्होंने परमेश्वर के घर को धोखा देने के लिए झूठे आँकड़े बताए और जिस किसी ने भी झूठे आँकड़े नहीं बताए उसे उन्होंने बेरहमी से सताया और कुचल दिया। उन्होंने दूसरों को झूठे आँकड़े बताने के लिए मजबूर किया और उन्हें ऐसा करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं दिया। ये किस ढंग के लोग हैं? क्या ये लोग भी हैं? अगर तुम कहते हो कि वे महज खराब मानवता वाले हैं, सत्य से प्रेम नहीं करते हैं और सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं तो क्या इस कथन में दम है? क्या यह बकवास नहीं है? (हाँ।) न सिर्फ वे सत्य से प्रेम नहीं करते हैं और सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं, बल्कि उनमें सामान्य मानवता भी नहीं है, फिर सत्य से प्रेम करने और उसका अनुसरण करने की बात तो छोड़ ही दो—वे और कुछ नहीं बस दानव हैं! अब यह तुम्हें स्पष्ट रूप से दिख रहा है, है ना? (हाँ।) इन लोगों की प्रकृति क्या है? (दानवों की प्रकृति है।) उनकी प्रकृति दानवों की प्रकृति है। बाहर निकाल दिए जाने के बाद ये लोग उद्दंड हो गए और उन्हें यह भी लगा कि उनके साथ अन्याय हुआ है, उन्होंने कहा “मैं बेकसूर हूँ, मैंने वह नहीं किया!” सच्चाई ठीक उनकी आँखों के सामने थी, लेकिन उन्होंने इसे स्वीकारने से इनकार कर दिया और यहाँ तक कि वे हठपूर्वक अपने बहानों पर अड़े रहे और अंत तक उद्दंड बने रहे; क्या यह साबित नहीं करता है कि उन्हें बाहर निकाल देना सही था? अगर इस तरह के लोगों को बाहर नहीं निकाला गया तो क्या नतीजे होंगे? क्या वे पश्चात्ताप करेंगे? अगर तुम उन्हें कर्तव्य करते रहने का अवसर देते भी हो और सिर्फ उनकी काट-छाँट करते हो, तो भी क्या वे पश्चात्ताप कर सकते हैं और बेहतर बन सकते हैं? (नहीं, वे नहीं बन सकते।) ऐसा कोई तरीका बिल्कुल भी नहीं है जिससे वे पश्चात्ताप कर सकते थे। यह कौन-सा प्रकृति सार है? किस तरह के लोग पश्चात्ताप नहीं कर सकते हैं और तथ्यों का सामना करने पर भी पश्चात्ताप नहीं करते हैं? (दानव।) दानव, शैतान के सार वाले लोग, बुरी आत्माएँ और अशुद्ध आत्माएँ पश्चात्ताप नहीं करेंगीं; इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुम सत्य पर कैसे संगति करते हो, वे पश्चात्ताप नहीं करेंगे। वे तो अपने कुकर्मों के तथ्यों को भी नहीं मानते हैं, तो क्या वे सत्य स्वीकार सकते हैं और खुद को जान सकते हैं? वे ऐसा बिल्कुल भी नहीं करेंगे! अगर वे अपने कुकर्मों के तथ्यों को मान सकते तो उनके पास सत्य स्वीकारने का मौका होता, लेकिन वे तो तथ्यों को भी नहीं मानते हैं और अपने कर्मों की प्रकृति को नहीं मानते हैं या स्वीकार नहीं करते हैं—ऐसे लोग पश्चात्ताप नहीं कर सकते हैं। वे बिल्कुल सदोमियों की तरह हैं—अगर तुम सदोमियों से कहते, “अगर तुम पश्चात्ताप नहीं करोगे, तो परमेश्वर इस शहर को नष्ट कर देगा” तो क्या वे इसे स्वीकारते? ये शब्द सुनने के बाद उनका रवैया क्या होता? वे ऐसे व्यवहार करते मानो उन्होंने वे शब्द सुने ही न हों और अपनी पसंद के अनुसार चीजें करते रहते, बिल्कुल भी पश्चात्ताप किए बिना जो भी अच्छा लगता वही करते। इसलिए, उनका अंतिम परिणाम नष्ट किया जाना था। जहाँ तक इन लोगों की बात है जिन्होंने कलीसिया में गड़बड़ियाँ और बाधाएँ उत्पन्न कीं, परमेश्वर ने उन्हें अवसर दिए और फिर भी उन्होंने उन्हें नहीं सँजोया या पश्चात्ताप नहीं किया और अंत तक वे परमेश्वर का विरोध करने पर अड़े रहे। इन लोगों के पास जमीर या विवेक नहीं है—क्या वे दया के लायक हैं? (नहीं, वे नहीं हैं।) क्या ऐसा कोई है जिसने इन लोगों का बचाव किया हो जो दया के लायक नहीं हैं? क्या ऐसा कोई है जो उनका समादर करता हो, यह महसूस करता हो कि उन्होंने कई वर्षों से कष्ट सहे हैं और कीमत चुकाई है और उन्होंने बेहद मेहनत से और बेहद लगन से कार्य किया है और उनमें से कुछ लोगों के पास बहुत अच्छी काबिलियत है और उनके पास शानदार कार्य क्षमता और अगुआई कौशल हैं और यह अफसोस की बात है कि उन्हें बाहर निकाल दिया गया? क्या यह अफसोस की बात है? (नहीं, यह नहीं है।) यह अफसोस की बात नहीं है जिसका मतलब है कि उन्हें बाहर निकालना सही था। बस देखो और मालूम करो कि क्या ये लोग सत्य स्वीकार सकते हैं और वे किस मार्ग पर चल रहे हैं। अगर लोग अपने कर्तव्य करते समय भी गड़बड़ियाँ या बाधाएँ उत्पन्न करते हैं तो वे मानवजाति की तलछट हैं! यह सिर्फ सही है कि सृजित प्राणी अपने कर्तव्य करें और चाहे वह कर्तव्य कुछ भी हो, उन्हें अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। भले ही उनके कर्तव्य का निर्वहन मानक-स्तर का नहीं हो, कम-से-कम उन्हें गड़बड़ियाँ और बाधाएँ उत्पन्न नहीं करनी चाहिए! गड़बड़ियाँ और बाधाएँ उत्पन्न करना कुछ ऐसी चीज है जो शैतान करता है; यह कोई ऐसी चीज नहीं होनी चाहिए जो भ्रष्ट मनुष्य करते हैं। भ्रष्ट मनुष्य शैतान द्वारा भ्रष्ट हो चुके हैं और वे परमेश्वर का प्रतिरोध करने से खुद को नहीं रोक पाते हैं; लेकिन सामान्य मानवता, जमीर और विवेक वाले लोग अपने कर्तव्य करते समय जानबूझकर गड़बड़ियाँ और बाधाएँ उत्पन्न नहीं करेंगे। वह इसलिए क्योंकि उनका जमीर और विवेक उन पर अंकुश लगाता है और इसलिए वे अपने कर्तव्य करने की प्रक्रिया में परमेश्वर के घर के कार्य को गड़बड़ नहीं करेंगे, उसमें विघ्न नहीं डालेंगे या उसे नुकसान नहीं पहुँचाएँगे। भले ही कोई व्यक्ति अपना कर्तव्य इस तरीके से न कर पाए जो मानक-स्तर का हो, लेकिन उसे औसत मानक तक करना स्वीकार्य है और यह कम-से-कम जमीर और विवेक का मानक तो पूरा करता ही है। लेकिन ये लोग इस मानक तक भी नहीं पहुँच पाते हैं, इसलिए अंत में वे सिर्फ इसी बिंदु तक पहुँच पाते हैं—अपने बहुत सारे कुकर्मों के कारण परमेश्वर के घर से वे बहिष्कृत या निष्कासित कर दिए जाते हैं। ये मानवजाति की तलछट हैं!

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