सत्य का अनुसरण कैसे करें (2) भाग पाँच

परमेश्वर द्वारा इंतजाम किए गए परिवेशों में सत्य कैसे प्राप्त करें

एक बार जब लोग परमेश्वर के लोगों के उद्धार के सिद्धांतों और उद्देश्य को और हर चीज पर परमेश्वर की संप्रभुता को समझ जाएँगे, तो क्या इस संबंध में परमेश्वर के बारे में उनकी धारणाएँ और कल्पनाएँ कुछ हद तक हल नहीं हो जाएँगी? (हाँ।) लोगों को इस संबंध में क्या समझना चाहिए? वह यह कि चाहे ऐसा सभी प्रकार के मामलों में हो या एक विशिष्ट मामले में जिस पर परमेश्वर संप्रभुता रखता है, उसमें लोगों के सहयोग का हिस्सा 80 या 90 प्रतिशत होता है, और परमेश्वर की नजर में उनके विचार और नजरिये और संबंधित मामले के प्रति उनके रवैये बहुत महत्वपूर्ण हैं। यह मत सोचो कि अगर तुम कुछ नहीं कहते हो और तुम्हारे साथ चीजें घटित होने पर तुम अपना रुख नहीं दिखाते हो तो परमेश्वर तुम पर कोई ध्यान नहीं देगा और तुम्हें नजरअंदाज कर देगा। अगर तुम चाहते हो कि परमेश्वर तुम्हें नजरअंदाज करे तो तुम्हारे लिए परमेश्वर में विश्वास नहीं रखना ही बेहतर होगा। चूँकि तुम परमेश्वर के घर में हो और चूँकि परमेश्वर ने तुम्हें चुना है, इसलिए परमेश्वर तुम्हें बिल्कुल भी नजरअंदाज नहीं करेगा। परमेश्वर की नजर में सभी चीजों की पड़ताल की जाती है, तुम्हारी, एक छोटे-से व्यक्ति की, तो और भी ज्यादा। अगर तुम चींटी होते, तो भी अगर तुम्हें परमेश्वर ने चुना होता तो परमेश्वर तब भी लगातार तुम्हारी पड़ताल करता रहता और तुम्हारी अगुआई करता रहता। चूँकि परमेश्वर तुम्हारी पड़ताल करता है, इसलिए तुम्हें उन चीजों को बस स्वीकार कर लेना होगा जो तुम्हारे साथ घटित होती हैं। उनसे मत बचो—बचना बुद्धिमानी भरा विकल्प नहीं है। तुम्हें उनका सामना करना चाहिए। सिर्फ जब तुम उनका सामना करोगे और एक स्पष्ट रवैया रखोगे, तभी तुम्हें उसके द्वारा तुम्हारे लिए इंतजाम किए गए परिवेशों में वे सत्य प्राप्त करने का अवसर मिलेगा जिन्हें परमेश्वर तुम्हें समझने देता है, जबकि उनसे बचने से तुम अपनी चुप्पी में सत्य समझने में सक्षम नहीं बनोगे। दर्शनों से संबंधित सत्यों के अलावा दूसरे सत्य—यानी मानव जीवन और अस्तित्व से संबंधित सभी प्रकार के सत्य—किसी परिवेश के जरिये या एक प्रकार के व्यक्ति के व्यवहार की अभिव्यक्ति के संदर्भ के जरिये व्यक्त किए जाते हैं। लोग इन सत्यों की वास्तविकताओं को सही मायने में सिर्फ तभी समझ पाते हैं जब वे वास्तविक अनुभव और समझ प्राप्त कर लेते हैं। ज्यादातर लोग इस बिंदु को स्पष्ट रूप से नहीं देख पाते हैं और विभिन्न प्रकार के सत्यों के प्रति उनका रवैया न गरम न ठंडा होता है और वे लगातार इन परिवेशों से बचना भी चाहते हैं और वे वास्तविक समस्याओं के बारे में सत्य की तलाश नहीं करना चाहते हैं। वे न तो सत्य के आधार पर विभिन्न प्रकार के लोगों और घटनाओं का भेद पहचानना सीखते हैं और न ही वे विभिन्न समस्याओं को हल करने के लिए सत्य लागू करने का प्रशिक्षण लेते हैं। चाहे उनके साथ कुछ भी क्यों न घटित हो, उनका कोई रवैया या नजरिया नहीं होता है और वे संगति और चर्चाओं में हिस्सा नहीं लेते हैं। वे सिर्फ परमेश्वर से प्रार्थना करने, परमेश्वर के वचन पढ़ने, भजन सीखने और हर रोज अपने कर्तव्य पूरे करने से ही संतुष्ट हैं, और उनके लिए बस इतना काफी है। मैं तुम लोगों को एक बात बताता हूँ, जो यह है कि मजदूर की विशेषताएँ यह होती हैं कि वह सिर्फ प्रयास करने को तैयार रहता है और उसे सत्य के किसी भी पहलू में कोई दिलचस्पी नहीं होती है या वह सत्य के किसी भी पहलू को गंभीरता से करने को तैयार नहीं रहता है और ऐसा करना उसे परेशानी वाली बात लगती है—यह मजदूर है। अगर तुम शैतान के सेवक नहीं हो या कुकर्मी या मसीह-विरोधी नहीं हो, तो ज्यादा-से-ज्यादा तुम सिर्फ मजदूर हो सकते हो। लेकिन यह परमेश्वर के लोगों के लिए अलग है जो उद्धार प्राप्त कर सकते हैं। वे सिर्फ श्रम करने और थोड़ा-सा प्रयास करने से संतुष्ट नहीं होते हैं बल्कि सभी प्रकार के लोगों, घटनाओं और चीजों में विभिन्न सत्य सीखते और समझते हैं और फिर इन सत्यों के आधार पर विभिन्न प्रकार के लोगों और घटनाओं को देखते हैं और उनसे निपटते हैं। इस तरह से विभिन्न सत्य धीरे-धीरे उनमें ढल जाते हैं और वे धीरे-धीरे उनका जीवन बन जाते हैं और उनके क्रियाकलापों और आचरण के लिए सिद्धांत बन जाते हैं। जब सत्य तुम्हारा जीवन बन जाएगा, सिर्फ तभी तुम परमेश्वर के प्रति समर्पण करने और परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने में समर्थ होगे; नहीं तो यह प्रभाव प्राप्त नहीं किया जा सकता है। चीजों का अनुभव करने से मत डरो और लोगों का भेद पहचानने से मत डरो। यह कोई बुरी बात नहीं है कि सभी प्रकार की घटनाएँ घटित होती हैं और इस पर परमेश्वर संप्रभु है। जब परमेश्वर संप्रभु है और वह व्यवस्थाएँ करता है तो तुम्हें किस बात का भय है? जब परमेश्वर संप्रभु है और वह व्यवस्थाएँ करता है तो तुम्हारे लिए किसी घटना का घटित होना कम-से-कम दुर्भावनापूर्ण या प्रलोभन तो नहीं है। बल्कि इसका यह उद्देश्य है कि तुम सबक सीखो, तुम्हारी आध्यात्मिक उन्नति हो और तुम्हें फायदा हो और यह उद्देश्य है कि तुम्हें पूर्ण बनाया जाए। अगर तुम परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण कर पाते हो, तुम्हारे साथ जो कुछ भी होता है उसे सकारात्मक शिक्षण सामग्री मानकर उसके साथ पेश आते हो और सत्य की तलाश कर पाते हो और वे सबक सीख पाते हो जो तुम्हें सीखने चाहिए, तो सत्य स्वाभाविक रूप से और अदृश्य रूप से तुममें ढल जाएगा और तुम्हारा जीवन बन जाएगा। इसलिए, ज्यादातर लोगों के लिए उदासीनता, टालमटोल, गैर-भागीदारी और गैर-संलिप्तता का रवैया अपनाना और विभिन्न घटनाओं का सामना करने पर नजरिये व्यक्त नहीं करना या संगति नहीं करना गलत है—यह सलाहयोग्य नहीं है। मैं क्यों कहता हूँ कि यह गलत है और सलाहयोग्य नहीं है? यह रवैया परमेश्वर को दिखाता है कि तुम्हें उसके उद्धार या उसके अच्छे इरादों में दिलचस्पी नहीं है और तुम्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने में दिलचस्पी नहीं है और तुम इस पर कोई ध्यान नहीं देते हो और इसे अस्वीकार करते हो। जब परमेश्वर यह देखता है कि तुम्हारा यह रवैया है तो क्या वह फिर भी तुम्हें बचाना चाहेगा? और अगर परमेश्वर तुम्हें बचाना चाहे तो भी वह तुम्हें कैसे बचा सकता है अगर तुम सहयोग न करो? जैसा कि कहावत है, “इसका कुछ नहीं हो सकता,” और यह कहावत ठीक इसी प्रकार के व्यक्ति की बात करती है।

परमेश्वर की पूरी प्रबंधन योजना में, विशेष रूप से उसके कार्य के इस अंतिम चरण में उसने बहुत बड़ी तादाद में सत्य व्यक्त किए हैं और तुम उन सभी को सुन चुके हो। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुमने उनमें से कितनों का अनुभव किया है या कितनों को समझा है, कम-से-कम तुम उन्हें जानते हो, इसलिए परमेश्वर दखल देने और मदद करने का कोई अतिरिक्त कार्य नहीं करेगा। परमेश्वर बस तुम्हारे रवैये की और तुम्हारे साथ घटित होने वाली हर चीज में तुम्हारे सहयोग की प्रतीक्षा करता है—वह तुम्हारा रवैया, तुम्हारे विचार, तुम्हारे अनुसरण और यह देखना चाहता है कि तुम कौन-सा मार्ग अपनाते हो। हर बार जब तुम लोगों, घटनाओं या चीजों का सामना करते हो तब अगर परमेश्वर यह दर्ज करता है कि तुम्हारा कोई रवैया और कोई विचार नहीं है और तुम्हारे पास कहने के लिए हमेशा कुछ नहीं होता है तो मुझे बताओ, क्या तुम बेवकूफ नहीं हो? किन लोगों के पास कहने के लिए हमेशा कुछ नहीं होता है? क्या ये वही लोग नहीं हैं जो बहरे, गूँगे, मंदबुद्धि या बेवकूफ हैं? परमेश्वर यह दर्ज करता है कि तुम्हारा कोई रवैया नहीं है इसलिए जब अंत में वह तुम्हें अंक देगा तो तुम्हें शून्य अंक ही मिलेंगे। जब तुम्हारे साथ कुछ घटित होता है तो परमेश्वर पूछता है, “क्या तुम कीमत चुकाने को तैयार हो?” और तुम कहते हो, “हाँ, मैं तैयार हूँ!” और वह पूछता है, “क्या तुम्हारे पास संकल्प है? क्या तुमने कोई शपथ ली है?” और तुम जवाब देते हो, “हाँ!” अगर तुम्हारे पास सिर्फ यह संकल्प है लेकिन जब तुमसे पूछा जाता है कि इस परिवेश का अनुभव करके तुमने क्या प्राप्त किया है तो तुम्हारे पास कहने के लिए कुछ नहीं होता है और तुमने अपने द्वारा अनुभव किए हर परिवेश से कुछ भी प्राप्त नहीं किया है, तो जब अंत में परमेश्वर तुम्हें अंक देगा तो ये सिर्फ दो अंक होंगे। दो अंक क्यों? तुम्हारे उस जरा-से संकल्प के कारण तुमने दो अंक प्राप्त किए होंगे। मुझे बताओ, क्या तब तुम्हारा काम तमाम नहीं हो जाएगा? क्या तब भी तुम्हें उद्धार की उम्मीद होगी? उद्धार की उम्मीद तुम्हारे खुद प्रयास करने से प्राप्त होती है। यह वह फल है जो तुम्हें सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चलने का चयन करने के बदले में मिलता है। इसलिए चाहे तुम्हारे साथ कुछ भी क्यों न घटित हो, उससे डरो मत या उससे बचो मत और अपने हाथों से अपना सिर छिपाकर कछुए की तरह अपने खोल में वापस मत लौट जाओ—बल्कि उसका सकारात्मक और सक्रिय रूप से सामना करो। अगर तुम डरपोक हो और चीजों से डरते हो और इस डर से कि अगर तुमने कुछ गलत कह दिया तो दूसरे लोग तुम्हें उजागर कर देंगे और वे तुम्हारी असलियत देख लेंगे, तुम किसी भी चीज का—चाहे वह किसी से भी संबंधित क्यों न हो—आकलन करने की हिम्मत नहीं करते, और तुम हमेशा डरते रहते हो और कभी हिस्सा नहीं लेते तो इसका मतलब है कि तुम खुद अपना अवसर छोड़ रहे हो! हालाँकि तुमने अपना कर्तव्य करने में बहुत सारी ऊर्जा लगाई है, लेकिन सच्चाई यह है कि तुम बहुत पहले ही अपना परिणाम निर्धारित कर चुके हो। अंत में तुम्हें सिर्फ दो अंक ही मिलेंगे, तो क्या तुम दो कौड़ी के बेवकूफ नहीं हो? क्या दो अंक प्राप्त करना दो कौड़ी के बेवकूफ होने के बराबर नहीं है? और चूँकि तुम्हें सिर्फ दो अंक मिलेंगे तो फिर क्या इस जीवनकाल के दौरान परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास व्यर्थ नहीं जाएगा? यह परमेश्वर के कार्य का अंतिम चरण है, अगर इस बार तुम्हारी आस्था व्यर्थ गई तो तुम्हारा परिणाम तय हो जाएगा। परमेश्वर फिर कभी मनुष्यों को बचाने का कार्य नहीं करेगा। यही आखिरी मौका है—अगर तुम अब भी इसके लिए प्रयास नहीं करते हो, इसे गँवा देते हो और तुम उद्धार प्राप्त नहीं कर पाते हो, तो यह कितना दुखद होगा! इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुमने कितने वर्ष परमेश्वर के कार्य का अनुभव किया है, तुम्हें कम-से-कम उत्तीर्ण होने लायक अंक तो प्राप्त करने ही होंगे, तब फिर भी तुम्हारे जिंदा बचने की उम्मीद रहेगी। अगर तुम्हारा श्रम मानक-स्तर का नहीं है और तुमने बहुत सारी विघ्न-बाधाएँ भी उत्पन्न की हैं तो तुमने बिल्कुल भी कोई फल प्राप्त नहीं किया होगा और तुम्हारे उद्धार प्राप्त करने की उम्मीद शून्य हो चुकी होगी। परमेश्वर जिस भी परिवेश का इंतजाम करता है उसमें दर्शक मत बनो; प्रतिभागी बनो, उसका एक हिस्सा बनो। लेकिन एक सिद्धांत है जिसका कम-से-कम तुम्हें पालन करना चाहिए : बाधाएँ उत्पन्न मत करो। तुम भाग ले सकते हो और अपनी राय और आकलन व्यक्त कर सकते हो और भले ही तुम एक सामान्य, अनुभवहीन व्यक्ति की तरह बोलते हो और सिर्फ शब्द और धर्म-सिद्धांत बोलते हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। लेकिन तुम्हें हर मामले में सत्य की तलाश करने, सत्य का अभ्यास करने और सत्य के प्रति समर्पण करने के सिद्धांत और इरादे से भाग लेना चाहिए—सिर्फ तभी तुम्हारे उद्धार की उम्मीद है। उद्धार की उम्मीद किस आधार पर स्थापित की जाती है? यह तुम्हारे द्वारा सत्य की तरफ प्रयास करने, सत्य पर सोच-विचार करने और हर मामला होने पर सत्य में मेहनत करने में समर्थ होने के आधार पर स्थापित की जाती है। तुम सिर्फ इसी आधार पर सत्य समझ सकते हो, सत्य का अभ्यास कर सकते हो और उद्धार प्राप्त कर सकते हो। लेकिन अगर मामले होने पर तुम हमेशा दर्शक बने रहते हो—कोई आकलन या निरूपण प्रदान नहीं करते हो और कोई व्यक्तिगत राय व्यक्त नहीं करते हो—और किसी भी चीज पर तुम्हारा कोई विचार नहीं होता है या अगर कुछ विचार भी हों तो भी तुम उन्हें व्यक्त नहीं करते हो और तुम्हें पता नहीं होता है कि वे सही हैं या गलत हैं, तुम बस उन्हें अपने मन में तालाबंद करके रखते हो और उनके बारे में सोचते हो, तो अंत में तुम सत्य प्राप्त किए बिना ही रह जाओगे। इस बारे में सोचो, यह तो एक बड़े भोज में बैठकर भूखे रहने जैसा है। क्या तुम दयनीय नहीं हो? अगर तुमने दस वर्षों से परमेश्वर के कार्य में विश्वास रखा है और इस पूरे समय में तुम दर्शक बने रहे हो या तुमने 20 या 30 वर्षों से विश्वास रखा है और इस पूरे समय में तुम दर्शक बने रहे हो तो अंत में जब तुम्हारे परिणाम निर्धारण का समय आएगा, तो परमेश्वर तुम्हारे रिकॉर्ड को दो अंक देगा और इसलिए तुम दो कौड़ी के बेवकूफ होगे और सत्य प्राप्त करने का अपना अवसर और बचाए जाने की अपनी उम्मीद खुद ही पूरी तरह से बर्बाद कर चुके होगे। अंत में तुम पर दो कौड़ी के बेवकूफ का ठप्पा लग जाएगा और तुम इसी के लायक होगे, है ना? (हाँ।) दो कौड़ी के बेवकूफ न होने के पीछे क्या राज़ है? (इसका रहस्य है दर्शक न बनना।) दर्शक मत बनो। तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो, तो फिर तुम्हें सत्य प्राप्त करने के लिए परमेश्वर के कार्य का अनुभव करना चाहिए। कुछ लोग पूछ सकते हैं, “तो, क्या तुम मुझसे हर चीज में भाग लेने के लिए कह रहे हो? लेकिन लोग तो कहते हैं, ‘दूसरे के फटे में टाँग मत अड़ाओ।’” तुम्हें भाग लेने के लिए कहने का मतलब यह है कि तुमसे सत्य खोजने और उन चीजों से सबक सीखने के लिए कहा जा रहा है जिनका तुम सामना करते हो। मिसाल के तौर पर, जब तुम एक विशेष प्रकार के व्यक्ति से मिलते हो, तो तुम्हें उसकी अभिव्यक्तियों और उसकी की हुई चीजों के जरिये भेद पहचानने की क्षमता प्राप्त करनी चाहिए। अगर वह सत्य का उल्लंघन करता है तो तुम्हें यह भेद पहचानना चाहिए कि उसने ऐसा क्या किया जो सत्य का उल्लंघन करता है। अगर दूसरे लोग कहते हैं कि यह व्यक्ति कुकर्मी है तो तुम्हें यह भेद पहचानना चाहिए कि उसने ऐसा क्या कहा और किया और उसके पास बुरे कर्मों की ऐसी कौन-सी अभिव्यक्तियाँ हैं जिनके कारण उसे बुरे व्यक्ति के रूप में निरूपित किया गया है। अगर दूसरे लोग कहते हैं कि यह व्यक्ति परमेश्वर के घर के हितों का बचाव नहीं करता है और इसकी कीमत पर बाहर के लोगों की मदद करता है तो तुम्हें इस बारे में पूछताछ करनी चाहिए कि यह व्यक्ति क्या कर रहा है। और पूछताछ करने के बाद सिर्फ इन बातों को जान लेना ही काफी नहीं है। तुम्हें यह भी सोचना पड़ेगा : “क्या मैं ऐसा कर सकता हूँ? अगर कोई मुझे याद न दिलाए तो शायद मैं भी यही चीजें कर सकता हूँ और तब क्या मेरा परिणाम भी उस व्यक्ति जैसा ही नहीं होगा? क्या यह खतरनाक नहीं होगा? खुशकिस्मती से परमेश्वर ने मुझे सावधान करने के लिए इस परिवेश का इंतजाम किया है, जो मेरे लिए सबसे बड़ी सुरक्षा है!” इस पर सोच-विचार करने के बाद तुम्हें एक बात का एहसास होता है : तुम उस मार्ग का अनुसरण नहीं कर सकते जिसका अनुसरण उस प्रकार का व्यक्ति कर रहा है, तुम उस प्रकार के व्यक्ति नहीं बन सकते और तुम्हें खुद को चेताना होगा। तुम चाहे जिन चीजों का भी सामना करो, तुम्हें उनसे सबक जरूर सीखना चाहिए। अगर ऐसी चीजें हैं जिन्हें तुम पूरी तरह से नहीं समझते हो और जो तुम्हें अपने दिल में अजीब-सी लगती हैं तो तुम्हें उनके बारे में प्रश्न पूछने चाहिए, उनके बारे में जानकारी हासिल करनी चाहिए और सत्य खोजकर मामलों की सही स्थिति का पता लगाना चाहिए। यह जिज्ञासा नहीं है; यह गंभीर होना है। गंभीर होने का मतलब औपचारिकताएँ पूरी करना या भीड़ के पीछे-पीछे चलना नहीं है—यह तो जिम्मेदारी लेने का रवैया है। समस्याओं के बारे में स्पष्टता प्राप्त करके और फिर उन्हें हल करने के लिए सत्य खोजकर ही भविष्य में उसी तरह की परिस्थिति का सामना करने पर तुम्हारे पास अभ्यास का एक मार्ग होगा, तुम सटीकता से अभ्यास करने में समर्थ होगे और तुममें शांत और सहज होने का एहसास होगा। तुम सभी मामलों में दूसरे लोगों का अनुसरण करने और हवा के रुख के साथ चलने के बजाय तथ्यों की सच्ची स्थिति को समझने का प्रयास करने, उनसे सत्य प्राप्त करने और लोगों और चीजों को देखने का तरीका सीखने के सिद्धांत के आधार पर गंभीर हो रहे हो। सिर्फ अपने क्रियाकलापों में गंभीर होकर ही तुम सत्य का अभ्यास करना और सिद्धांतों के आधार पर कार्य करना शुरू कर सकते हो। जो लोग गंभीर नहीं हैं, उनके दूसरे लोगों का अनुसरण करने और हवा के रुख के साथ चलने की संभावना है और इस तरह से उनके सत्य सिद्धांतों का उल्लंघन करने की संभावना रहती है। उदाहरण के लिए, मान लो कि कोई व्यक्ति अपना कर्तव्य लगातार लापरवाह तरीके से करता है और इसलिए उसे उसका कर्तव्य करने के अयोग्य ठहरा दिया जाता है। तुम कहते हो, “वह ऊपरी तौर पर ठीक लगता था। मैंने यह कैसे नहीं देखा कि वह लापरवाह हो रहा है? क्या उसने मुझे गुमराह कर दिया था? वह किन तरीकों से अनमने ढंग से अपना कर्तव्य कर रहा था? उसने कौन-सी चीजें लापरवाह तरीके से कीं?” जब कोई और व्यक्ति तुम्हें उन कुछ तरीकों के बारे में बताता है जिनसे उस व्यक्ति ने लापरवाह ढंग से व्यवहार किया तो तुम कहते हो, “वह व्यक्ति दिखावा करने में वाकई अच्छा है! वह ऊपरी तौर पर ठीक लग रहा था और उसने वाकई अच्छी चीजें कहीं। उसने कहा, ‘परमेश्वर ने हमें इतना सारा अनुग्रह दिया है—हम जमीर के बिना नहीं रह सकते, हमें अपने कर्तव्य ठीक से करने चाहिए!’ जब मैंने उसे यह कहते सुना, तो मैंने सोचा कि वह अपना कर्तव्य निष्ठा से कर रहा है; मैंने कभी भी यह कल्पना तक नहीं की कि वह इतना लापरवाह है! क्या मुझे गुमराह नहीं किया गया है? मुझमें लोगों का भेद पहचानने की क्षमता नहीं थी, मैंने लोगों और चीजों को सत्य सिद्धांतों के आधार पर नहीं देखा, न ही उनके आधार पर मैं लोगों के साथ पेश आया। मैंने सिर्फ यह देखा कि वह व्यक्ति कितनी अच्छी तरह से बोलता है, मैंने यह नहीं देखा कि उसने अपने कर्तव्य में क्या नतीजे प्राप्त किए हैं या उसका विशिष्ट व्यवहार और अभिव्यक्तियाँ क्या हैं या उसका सार क्या है—मैंने इस मामले में गलती की। यह पता चला है कि जो लोग बाहरी तौर पर अच्छे दिखते हैं वे जरूरी नहीं कि सही मायने में अच्छे हों और वैसे तो वे सुखद बातें कहते हैं, लेकिन हो सकता है कि वे जो कहते हैं उसे वास्तव में न करें और जरूरी नहीं कि वे जमीर और मानवता वाले लोग हों। अब से मुझे लोगों को परमेश्वर के वचनों के आधार पर देखना चाहिए और लोगों का भेद पहचानना सीखना चाहिए। मैं फिर से बेवकूफ नहीं बन सकता!” देखा तुमने, चाहे कुछ भी हो जाए, जब तक तुम कुछ हद तक गंभीर हो और सत्य की तलाश करते हो, और फिर निष्कर्ष निकालते हो, तब तक तुम कुछ न कुछ प्राप्त करोगे। अगर तुम ये लाभ प्राप्त करते हो तो क्या यह अच्छी बात नहीं है? (हाँ।) तुम लोगों का भेद पहचानने के मामले में कुछ सीख चुके होगे और इससे तुम्हें कुछ हद तक लाभ हो चुका होगा—सत्य के संबंध में गंभीर होने और भरसक प्रयास करने से तुम यह प्राप्त करते हो। मान लो कि तुम इस तरह से गंभीर नहीं हो। जब तुम सुनते हो कि किसी को इसलिए विदा कर दिया गया है क्योंकि वह अपना कर्तव्य करने में हमेशा लापरवाह रहता था, तो तुम यह नहीं पूछते, “वह लापरवाह क्यों रहता था? उसे क्यों बाहर निकाल दिया गया?” इसके बजाय तुम बस मन ही मन सोचते हो, “लापरवाह होने में क्या बड़ी बात है? कुछ भी हो, मुझे तो बाहर नहीं निकाला गया है, इसलिए सब कुछ ठीक है।” ऐसे में क्या तुम्हें इस मामले से थोड़ी चेतावनी मिली होगी, तुमने थोड़ा सबक सीखा होगा या भेद पहचानने की थोड़ी क्षमता प्राप्त की होगी? नहीं। तुमने ये सब क्यों नहीं प्राप्त किया होगा? क्योंकि तुम्हें ऐसी चीजों में दिलचस्पी नहीं है या तुम उनके बारे में गंभीर नहीं हो और तुम अपने जीवन प्रवेश के लिए या सत्य के अनुसरण के लिए बिल्कुल कोई बोझ नहीं उठाते हो और तुम्हें सत्य का अनुसरण करने के और जीवन प्रवेश के मामलों पर दूसरे लोगों की संगति में दिलचस्पी नहीं है और तुम उसमें भाग नहीं लेते हो और ज्यादा-से-ज्यादा, तुम बस अनमने ढंग से सहमति के कुछ शब्द बोल देते हो, बस और कुछ नहीं करते। क्या इस प्रकार के बहुत सारे लोग हैं? जब उनके साथ चीजें घटित होती हैं तो वे विशेष रूप से लापरवाह होना पसंद करते हैं, औपचारिकताएँ पूरी करते हैं और अपने जीवन प्रवेश के लिए या सत्य का अनुसरण करने के लिए बिल्कुल भी कोई बोझ नहीं उठाते हैं। दूसरों से बातचीत करते समय थोड़ी गपशप करना पसंद करने के अलावा, उन्हें जीवन प्रवेश से जुड़ी चीजों या लोगों को परमेश्वर द्वारा इंतजाम किए गए परिवेशों में जो सबक सीखने चाहिए, उनमें कोई भी रुचि नहीं होती है। उनके हाथ में जो थोड़ा-सा काम होता है उसे पूरा करने के बाद वे वहीं बैठकर शून्य में ताकते रहते हैं, वे बस थोड़ी देर के लिए झपकी लेना या आराम करना चाहते हैं और वे अपने जीवन प्रवेश के लिए कोई बोझ नहीं उठाते हैं। थोड़े-से संकल्प और अपनी कुछ इच्छाओं के अलावा ये लोग अंत में कोई सत्य प्राप्त नहीं करेंगे और अंत में उनके कुल अंक सिर्फ दो हो सकते हैं, वे अपनी दो कौड़ी वाली बेवकूफी से छुटकारा नहीं पा सकेंगे और इसलिए वे इस जीवनकाल में खत्म हो जाएँगे। अगर तुम इस बार खत्म हो गए तो तुम वाकई खत्म हो जाओगे और तुम्हारे बचाए जाने की कोई उम्मीद नहीं रहेगी क्योंकि तुम्हारा परिणाम तय हो चुका होगा। एक सृजित प्राणी अंत में जो अंक प्राप्त करता है, वे सीधे उसके परिणाम से जुड़े होते हैं। अगर तुम पास होने लायक अंक प्राप्त करते हो, तो तुम्हारा परिणाम यह होगा कि तुम बच गए हो। अगर तुम पास होने लायक अंक प्राप्त नहीं करते हो तो तुम्हें अच्छा परिणाम नहीं मिलेगा। यह वह समय है जब अंत में लोगों के परिणाम निर्धारित होते हैं और एक बार जब परिणाम निर्धारित हो जाता है तो वह स्थायी होता है और वह नहीं बदलेगा। अच्छे परिणाम के लिए प्रयास करने का कोई दूसरा मौका नहीं होगा और इसे बदलने का कोई मौका नहीं होगा—तुम्हारी किस्मत हमेशा-हमेशा के लिए निर्धारित हो जाएगी। क्या तुम समझ गए हो? क्या यह तुम्हें डराने के लिए है? (नहीं।) इस बारे में सोचो—परमेश्वर मानवजाति को प्रबंधित करने और उसका बचाव करने का कार्य कर रहा है और वह लोगों को वे विभिन्न सत्य प्रदान कर रहा है जो उनके पास होने चाहिए—परमेश्वर इस तरह का कार्य कितनी बार कर सकता है? (सिर्फ इसी एक बार।) यह पहले कभी नहीं किया गया है और यह फिर कभी नहीं किया जाएगा। सिर्फ यही एक समय है, और एक बार जब यह पूरा हो जाएगा तो परमेश्वर का महान कार्य पूरी तरह से संपन्न हो जाएगा। “पूरी तरह से संपन्न होने” का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि वह दोबारा ऐसा नहीं करेगा और ऐसा करने की उसकी कोई योजना नहीं है। इसलिए इस बार लोगों के अंतिम परिणाम जो भी होंगे, उन्हें अंतिम रूप दे दिया जाएगा और वे नहीं बदलेंगे। परमेश्वर लोगों को फिर से स्वयं को अभिव्यक्त करने या अपने जीवन जीने का अवसर नहीं देगा। जो समय गुजर चुका है वह कभी वापस नहीं आएगा और कोई भी बदलाव नहीं होगा। इसलिए अगर तुमने इस अवसर का फायदा नहीं उठाया तो तुम बचाए जाने का मौका खो दोगे। अगर तुम परमेश्वर द्वारा इंतजाम किए गए विभिन्न परिवेशों और विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों को अनदेखा करते हो, उनकी बात आने पर सुन्न और मंदबुद्धि बन जाते हो और उनके साथ उदासीनता से पेश आते हो, तो तुम दो कौड़ी के बेवकूफ हो। अगर तुम ही अपने परिणाम और गंतव्य को गंभीरता से नहीं लेते हो तो कौन तुम पर कोई ध्यान देगा? तुम्हें यह चीज इतनी बार बताई गई है लेकिन तुम इसे गंभीरता से नहीं लेते हो, तो अगर तुम दो कौड़ी के बेवकूफ नहीं हो तो फिर क्या हो? बचाए जाने के मामले जितना महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं है। क्या यही बात नहीं है? (हाँ।) यकीनन जैसा कि मैंने अभी कहा, व्यक्ति का अंतिम परिणाम उन विभिन्न परिवेशों में जिन पर परमेश्वर संप्रभु है, उसकी समग्र अभिव्यक्तियों द्वारा निर्धारित होता है, इसलिए लोगों को दैनिक जीवन में अपनी समग्र अभिव्यक्तियों पर ध्यान देना चाहिए। यहाँ इरादा तुम्हें गपशप करने के लिए और विवादों में उलझने के लिए कहने का नहीं है, बल्कि परमेश्वर का कार्य समाप्त होने से पहले तुम्हारे मौजूदा परिवेश और अवस्थाओं के आधार पर और यथासंभव ज्यादा से ज्यादा हद तक तुम्हें सत्य समझने लगने और सत्य में प्रवेश करने, सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चलना शुरू करने और “त्याग देने” की जिन तीन मदों पर हमने संगति की है उनमें कमोबेश प्रवेश करने का प्रयास करने के लिए कहना है—तब तुम 60 या उससे ज्यादा अंकों से पास हो चुके होगे और तुम एक बचाए गए व्यक्ति होगे। लेकिन इन तीनों मदों में से किसी से भी अगर तुम्हारा कोई लेना-देना नहीं है या अगर तुम इनमें से किसी में भी पास नहीं होते हो और अगर तुम्हारे पास इनमें से किसी में भी कोई वास्तविक प्रवेश नहीं है तो तुम्हें पास होने लायक अंक नहीं मिलेंगे और तुम उद्धार के पात्र नहीं होगे। क्या तुम समझ गए हो? (हाँ।)

अब तुम सभी को किस चीज को अभ्यास में लाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए? परमेश्वर द्वारा इंतजाम किए गए परिवेशों में सत्य खोजने और सबक सीखने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। अगर तुम हर रोज बिल्कुल भी सत्य का अनुसरण किए बिना सिर्फ प्रयास करने और कार्य का निर्वहन करने से संतुष्ट रहते हो, तो तुम सिर्फ एक मजदूर हो। अगर तुमने प्रयास किया है, परमेश्वर द्वारा इंतजाम किए गए विभिन्न परिवेशों का अनुभव किया है और कुछ सत्य समझे हैं; और इस बात की परवाह किए बगैर कि तुमने कितने सत्य प्राप्त किए हैं, अंत में तुमने लाभ प्राप्त किए हैं, चाहे वे बड़े हों या छोटे, बहुत सारे हों या थोड़े-से; और भले ही तुम्हें ये चीजें प्राप्त करने में बहुत लंबा समय लगा हो और तुम्हारी प्रगति धीमी रही हो, कम-से-कम तुम परमेश्वर के कार्य की धारा में हो और तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जिसने लाभ प्राप्त किया है; तो तुम्हारे पास बचाए जाने का एक मौका होगा। अब तुम लोगों को सबसे बुनियादी चीज क्या करनी चाहिए? तुम्हें सभी विभिन्न प्रकार के जटिल और निरर्थक मामलों से बाहर निकलकर सत्य का अनुसरण करने में अपना दिल लगाना चाहिए; तुम्हें एक छोटी अवधि में अपनी विभिन्न अवस्थाओं को पूरी तरह से समझने का प्रयास करना चाहिए, अपनी घातक कमजोरी, अपने ऐबों और अपनी समस्याओं को जानना शुरू करने और फिर उन्हें हल करने के लिए सत्य की तलाश करने का प्रयास करना चाहिए ताकि तुम्हारे पास चलने के लिए एक मार्ग हो और अनुसरण करने के लिए एक लक्ष्य हो और तुम जो कर्तव्य करते हो उसका पालन करने के लिए स्पष्ट सत्य सिद्धांत हों। तुम्हारे पास अपनी कमियों, अपने कर्तव्यों और अपने परिवेश के संबंध में अनुसरण करने के लिए एक स्पष्ट लक्ष्य और दिशा होनी चाहिए, बजाय इसके कि सिरकटी मुर्गी की तरह चारों तरफ दौड़-भाग करते रहो और तुम्हारी टाँगें जहाँ भी तुम्हें ले जाएँ वहाँ बिना सोचे-विचारे पहुँच जाओ, जो कि खतरनाक है। तुम्हें अपने जीवन की उस अवस्था और वर्तमान परिस्थिति से छुटकारा पाना होगा जिसमें तुम सिर्फ प्रयास करते हो लेकिन सत्य प्राप्त नहीं करते। दर्शक मत बनो और सभी प्रकार के विवादों में मत पड़ो। अगर तुम उनमें पड़ना नहीं चाहते हो तो तुम्हें सत्य सिद्धांतों में प्रयास करना सीखना होगा। अगर तुम हर सत्य सिद्धांत समझते हो तो तुम इस प्रकार के विवादों से बच निकलने में समर्थ होगे। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? सिर्फ जब तुम विभिन्न सत्य समझ जाते हो, तभी तुम उनमें प्रवेश कर सकते हो और सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने की उम्मीद रख सकते हो। फिर जब तुम विभिन्न चीजों में भाग लोगे तो तुम्हारे पास सिद्धांत होंगे और तुम्हें इन चीजों का सामना करने का तरीका मालूम होगा। अगर तुम बस दर्शक बनना बंद कर देते हो, लेकिन हर सत्य के बारे में पूरी तरह से भ्रमित रहते हो और कोई भी सत्य नहीं समझते हो, और तुम केवल धर्म-सिद्धांत और कुछ शब्द समझते हो और तुम्हें विभिन्न प्रकार के लोगों का भेद पहचानना नहीं आता है, और जब तुम्हारे सामने मुद्दे आते हैं तो तुम सिर्फ घटनाक्रम के बारे में बात करते हो और इस आधार पर फैसला लेते हो कि कौन सही है और कौन गलत, इससे ज्यादा कुछ नहीं, और अंत में तुम सत्य प्राप्त नहीं करते हो तो किसी भी मामले में तुम्हारी सहभागिता बेकार है। इस तरह की सहभागिता किसमें बदल जाती है? यह विवादों को भड़काने में बदल जाती है। इसलिए तुम्हें सत्य सिद्धांतों में प्रयास करना सीखना चाहिए और एक बार जब तुम उन्हें लागू करने में ज्यादा से ज्यादा स्पष्ट हो जाओगे—और ऐसा तुम बढ़ती सटीकता के साथ करोगे—तो तुम्हारे पास सत्य में प्रवेश करने की उम्मीद होगी और फिर तुम्हारे पास बचाए जाने की भी उम्मीद होगी।

लोग परमेश्वर द्वारा उनके लिए इंतजाम किए गए परिवेशों में सत्य कैसे प्राप्त कर सकते हैं, इस संबंध में अभी-अभी हमने अभ्यास के कुल कितने सिद्धांतों पर संगति की? एक है दर्शक मत बनो, और क्या है? (सिर्फ प्रयास मत करो।) उस प्रकार की अवस्था से छुटकारा पाओ जिसमें तुम बस प्रयास करके संतुष्ट रहते हो लेकिन सत्य का अनुसरण करने के अनिच्छुक होते हो। और क्या है? (सभी प्रकार के विवादों में मत पड़ो।) सभी प्रकार के विवादों में मत पड़ो, सभी प्रकार के जटिल मामलों में मत फँसो—सत्य सिद्धांतों का पालन करने की जगह इन चीजों को मत अपनाओ। तुम लोगों को इन सभी सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। अगर तुम उन्हें मजबूती से पकड़कर रखते हो तो तुम सत्य का अनुसरण करने से दूर नहीं रहोगे और जल्द ही सत्य का अनुसरण करने की वास्तविकता में प्रवेश करने में समर्थ हो जाओगे। क्या इसे अभ्यास में लाना आसान है? मैंने इतने सारे वर्षों से कलीसिया में लोगों से बातचीत की है, लेकिन बहुत ही कम लोग मुझसे जीवन प्रवेश या सत्य सिद्धांतों से जुड़े प्रश्न पूछते हैं और बहुत ही कम लोग अपनी व्यक्तिगत अवस्थाओं के बारे में बात करते हैं और फिर अभ्यास के मार्ग तलाशते हैं। बल्कि कुछ लोग ऐसे प्रश्न पूछते हैं जिनका सत्य से कोई लेना-देना नहीं होता है और वे “तलाश” जैसे शब्दों का भी उपयोग करते हैं। जब मैं “तलाश” शब्द सुनता हूँ तो मैं बहुत ध्यान से और गंभीरता से सुनता हूँ, उन पर अपना पूरा ध्यान देता हूँ, लेकिन जब पता चलता है कि वे किसी मामूली बाहरी मामले के बारे में पूछ रहे हैं तो मुझे घिन आती है। मैं कहता हूँ, “तुम जिस मामले के बारे में पूछ रहे हो उसका कलीसिया के कार्य या जीवन प्रवेश से कोई लेना-देना नहीं है। ‘तलाश’ शब्द का उपयोग मत करो। तुम ‘तलाश’ शब्द का अपमान कर रहे हो।” क्या “तलाश” शब्द का अनुचित ढंग से उपयोग किया जा सकता है? (नहीं।) किसी ने तो मुझसे यह तक पूछा, “मेरे बच्चे की पीठ पर तिल है। कुछ लोग कहते हैं कि इस तिल का मतलब है कि वह बदकिस्मत है और दूसरे लोग कहते हैं कि जिस जगह पर तिल बढ़ रहा है वहाँ बीमारी का संभावित जोखिम हो सकता है। बहरहाल, मुझे परवाह नहीं है कि वह बदकिस्मत है या नहीं, लेकिन अगर यह तिल वाकई उसकी सेहत के लिए नुकसानदेह है तो क्या तुम्हें लगता है कि इसे हटवा देना चाहिए?” अगर तुम लोगों से यह पूछा जाए तो तुम लोग इसका कैसे उत्तर दोगे? क्या तुम लोगों को लगता है कि इसका संबंध सत्य से है? क्या इसका संबंध कलीसिया के कार्य से है? (नहीं।) इसका संबंध इनमें से किसी भी चीज से नहीं है तो क्या मैं इस मामले में दिलचस्पी लेने के लिए बाध्य हूँ? (नहीं।) मेरी ऐसी कोई बाध्यता नहीं है। इसलिए मैंने कहा, “तुम्हारे बेटे के शरीर पर तिल होने की बात का सत्य से कोई लेना-देना नहीं है। इसके बारे में मुझसे मत पूछो, जाओ किसी डॉक्टर से पूछो। मैं तुम्हारा पारिवारिक डॉक्टर नहीं हूँ।” क्या तुम लोगों को लगता है कि मुझे इस मामले में दिलचस्पी लेनी चाहिए? (नहीं, तुम्हें नहीं लेनी चाहिए।) चाहे तुम किसी से भी पूछो, कोई भी इस मामले में दिलचस्पी लेने को तैयार नहीं होगा। ऐसा नहीं है कि वे जिम्मेदारी लेने से डरते हैं। बल्कि बात यह है कि उनकी ऐसी चीजों में दिलचस्पी लेने की कोई बाध्यता नहीं है। क्या तुम्हारे बेटे का तिल हटाने या नहीं हटाने से कलीसिया का कार्य प्रभावित होगा? क्या यह तुम्हारे अपने कर्तव्य-निर्वहन को प्रभावित करेगा? इस मामले का मुझसे कोई लेना-देना नहीं है। मुझसे इस बारे में मत पूछो, यह एक व्यर्थ मामला है। इसका सत्य से बिल्कुल भी कोई लेना-देना नहीं है और फिर भी तुम “तलाश” शब्द का उपयोग करते हो। तुम लोग “तलाश” शब्द को अपवित्र करते हो—यह घिनौना है! किसी ने यह भी पूछा : “मेरे अहाते में एक कछुआ घुस आया है, मुझे उसे पकड़ना चाहिए या नहीं? मैं तुमसे तलाशना चाहता हूँ।” उसने मुझसे उत्तर की तलाश करने के लिए यह प्रश्न पूछा—क्या तुम्हें लगता है कि मुझे उसे उत्तर देना चाहिए? (नहीं।) उसने कहा, “अगर उसे पकड़ने से मैं कानून तोड़ रहा हूँ तो क्या होगा? अगर मैं कानून तोड़ रहा हूँ और तुमने मुझे नहीं रोका तो तुम जिम्मेदार होगे!” तुम क्या कहोगे? (तुमने अपनी स्वतंत्र इच्छा से उसे पकड़ने का फैसला किया है—तुम्हारे कानून तोड़ने का मुझसे कोई लेना-देना नहीं है।) तुम कानून तोड़ते हो या नहीं, यह तुम्हारा मामला है और इसका मुझसे कोई लेना-देना नहीं है। तुम मुझसे कलीसिया के कार्य के सिद्धांतों और सत्य सिद्धांतों जैसी चीजों के बारे में प्रश्न पूछ सकते हो, लेकिन जब कानूनी मामलों की बात आती है, तो जाकर कोई वकील ढूँढ़ो—तुम जिस भी देश में रहते हो वहाँ के वकील की सलाह लो। मैं वकील नहीं हूँ, इसलिए मुझसे ऐसे मामलों के बारे में मत पूछो। मैं यहाँ सत्य व्यक्त करने और मानवजाति को बचाने का कार्य करने के लिए हूँ। मैं सिर्फ सत्य प्रदान करता हूँ और सिद्धांतों पर संगति करता हूँ। जहाँ तक यह प्रश्न है कि तुम बचाए जा सकते हो या नहीं तो इसका मुझसे कोई लेना-देना नहीं है; यह तुम्हारा अपना मामला है। और तुम्हारे अपने जीवन के निजी मामलों की तो बात ही छोड़ो—तुम्हें तो मुझसे उनके बारे में पूछना भी नहीं चाहिए और मैं तुम्हें उत्तर देने के लिए बाध्य नहीं हूँ। यह ऐसा ही है, है ना? (हाँ।)

परमेश्वर के कार्य से संबंधित यह विषय लोगों के अंतिम परिणामों से अटूट रूप से जुड़ा हुआ है, इसलिए जब लोग परमेश्वर का कार्य स्वीकारते हैं और उसका अनुभव करते हैं तो वे अपने साथ धारणाएँ और कल्पनाएँ लेकर नहीं चल सकते; उन्हें इन धारणाओं और कल्पनाओं को जड़ से ही त्याग देना चाहिए और उन्हें अपने और परमेश्वर के बीच नहीं रहने देना चाहिए। सिर्फ सही विचारों, नजरियों और रवैयों के साथ परमेश्वर के कार्य से पेश आकर ही लोगों को सत्य समझने और उसे प्राप्त करने का अवसर मिल सकता है; सिर्फ सही रवैयों, सही विचारों और नजरियों के साथ परमेश्वर के कार्य से पेश आकर ही लोग सही मायने में परमेश्वर का कार्य समझ सकते हैं और उसका अनुभव कर सकते हैं और अंत में परमेश्वर के कार्य में से वे उन सत्यों को प्राप्त कर सकते हैं जो उन्हें प्राप्त करने चाहिए। इसलिए इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम क्या त्याग देते हो, संक्षेप में, यह सब कुछ तुम्हें सही रास्ते पर लाने में और सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चलना शुरू करने में सक्षम बनाने के लिए है, इसका अंतिम परिणाम और उद्देश्य और कुछ नहीं बल्कि तुम्हें सत्य सिद्धांत समझने और सत्य प्राप्त करने में सक्षम बनाना है। इस विषय-वस्तु पर हमारी संगति का यही अंतिम उद्देश्य है। हमने जिस पर भी संगति की है, उसका अंतिम उद्देश्य लोगों को सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने में सक्षम बनाना है। अगर तुम सत्य समझते हो और तुम्हारे पास कई मामलों में आधार के रूप में सत्य सिद्धांत हैं और तुम अब दिशाहीन, लक्ष्यहीन नहीं हो या चीजें करने में खोए हुए नहीं हो तो इसका यह मतलब नहीं है कि तुम्हारी काबिलियत सुधर गई है, बल्कि यह है कि अपने क्रियाकलापों और अपने आचरण की कसौटियों के रूप में तुम्हारे पास परमेश्वर का सत्य, परमेश्वर के वचन हैं। यानी अपनी अंतर्निहित काबिलियत, क्षमताओं और प्रतिभाओं के आधार पर तुमने सत्य समझ लिया है और तुम्हारे पास अपने आचरण की कसौटियाँ हैं और इसलिए तुम एक सृजित मनुष्य हो जो इस दुनिया में और सभी चीजों के बीच स्वतंत्र रूप से रह सकता है। सिर्फ ऐसा मनुष्य ही सृजित मनुष्य के रूप में सही मायने में मानक-स्तर का है—यह एक मानक सृजित मनुष्य है। क्या तुम समझ गए हो? (हाँ।) तो आज के लिए हमारी संगति यहीं समाप्त होती है। फिर मिलेंगे!

15 जुलाई 2023

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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