सत्य का अनुसरण कैसे करें (3) भाग छह
कुछ लोग दस, बीस या तीस साल से भी ज्यादा समय से परमेश्वर में विश्वास करते आए हैं, फिर भी उन्हें अब जाकर एहसास हुआ है कि इतने सालों के बाद, केवल उनके बाहरी व्यवहार में थोड़ा बदलाव आया है और उन्होंने अपने दिलों में थोड़ी जागृति महसूस की है, लेकिन उनके भ्रष्ट स्वभावों में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया है। कुछ लोग अपने व्यवहार में कुछ बदलाव देखकर सोचते हैं कि यह जीवन स्वभाव में बदलाव है, यहाँ तक कि दूसरों के सामने शेखी भी बघारते हैं, “देखो, क्या मेरा जीवन स्वभाव बदल नहीं गया है?” असल में, तुम्हारा सिर्फ व्यवहार बदला है; तुममें स्वभावगत बदलाव के वास्तविक लक्षण नहीं दिखते और तुमने सामान्य मानवता को नहीं जिया है। तो फिर कोई कैसे कह सकता है कि तुम्हारे स्वभाव में कोई बदलाव आया है? यह चेहरा पढ़ना नहीं है; कोई तुम्हारे बाहरी रूप को देखकर यह नहीं कह सकता, न ही तुम जो कहते हो उसे सुनकर कह सकता है, तुम्हें अपने संकल्प और इच्छाएँ व्यक्त करते हुए सुनकर तो बिल्कुल भी नहीं कह सकता—संकल्प और इच्छाएँ सबसे खोखली चीजें हैं। तो फिर कोई कैसे बता सकता है? कोई यह देखकर ही बता सकता है कि क्या बिना किसी के कहने, पर्यवेक्षण करने, यहाँ तक कि समर्थन और सहायता के, तुम्हारे पास परमेश्वर के वचनों के अनुसार हर मामले को देखने और सँभालने का मार्ग और क्षमता है, और क्या तुम्हारे हर कार्य में तुम्हें नियंत्रित करने के लिए तुम्हारे हृदय में तुम्हारे जीवन के रूप में परमेश्वर के वचन हैं। अगर तुम इस स्तर तक नहीं पहुँचे हो, तो आओ एक निम्न स्तर के बारे में बात करते हैं : तुम जो कुछ भी कहते और करते हो, क्या उसके लिए तुममें सिद्धांत के रूप में परमेश्वर के वचनों का इस्तेमाल करने की जागरूकता है। अगर तुम इसे हासिल नहीं कर सकते तो दुर्भाग्यवश, सत्य तुम्हारा जीवन नहीं है। अभी भी तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव ही तुम्हारा जीवन हैं; वे अभी भी तुम्हें कभी भी, कहीं भी नियंत्रित कर सकते हैं, तुम्हारी चेतना और तुम्हारे विचारों और दृष्टिकोणों पर हावी हो सकते हैं। तुम कभी भी, कहीं भी किसी भी व्यक्ति, घटना या वस्तु के साथ अपनी भावनाओं, मनोदशा, इच्छाओं, निर्णय, परिप्रेक्ष्य और प्राथमिकताओं के आधार पर व्यवहार करोगे और उन्हें सँभालोगे। तुम अभी भी बड़े खतरे में हो; तुम अभी भी स्वतंत्र रूप से अपना कर्तव्य नहीं निभा सकते और तुम स्वतंत्र रूप से जीने में सक्षम नहीं हो—तुम्हें हमेशा दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है और दूसरों के सहारे के बिना तुम गिर जाओगे। इसका मतलब है कि तुम्हारा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है; यह साबित करता है कि तुमने सत्य को अपने जीवन के रूप में प्राप्त नहीं किया है। सत्य को जीवन के रूप में प्राप्त न करने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि तुम्हारे पास सिर्फ एक-दो सिद्धांत हैं जो तुम्हें बुरी चीजें करने या बड़ी गलतियाँ करने से रोकते हैं। अर्थात्, जब तुम्हारी तर्कसंगतता सामान्य होती है और कोई तुम्हें उकसा या भड़का नहीं रहा होता, तो तुम जानबूझकर परमेश्वर की निंदा बिल्कुल नहीं करोगे, परमेश्वर को बिल्कुल नहीं कोसोगे या कलीसिया के कार्य को अस्त-व्यस्त बिल्कुल नहीं करोगे। लेकिन इस तथ्य का कि तुम जानबूझकर ऐसा नहीं करोगे, यह मतलब नहीं है कि तुम ऐसा करने में असमर्थ हो; हो सकता है तुम उसे अग्रसक्रिय रूप से न करो, लेकिन तुम उसे निष्क्रिय रूप से कर सकते हो। यहाँ निष्क्रिय रूप से का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव कभी भी उभरकर तुम्हें नियंत्रित कर सकते हैं और तुमसे कुछ भी कहलवा सकते हैं और करवा सकते हैं, और तुम्हें किसी भी व्यक्ति या मामले को कभी भी भ्रामक दृष्टिकोणों से देखने और फिर किसी मामले को सँभालने या किसी खास व्यक्ति से निपटने के लिए अपने भ्रष्ट स्वभावों का इस्तेमाल करने पर मजबूर कर सकते हैं। उदाहरण के लिए मान लो, तुमने कुछ गलत किया है और तुम सोचते हो कि तुम ऊपरवाले, अगुआओं या किसी और को उसका पता नहीं लगने दे सकते। इसके पीछे जो भी कारण हो, तुम्हारे अपने शैतानी विचार होते हैं, इसलिए तुम उसे छिपाते हो और कुछ नहीं कहते। यहाँ तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव प्रभारी हैं या सत्य प्रभारी है? स्पष्ट रूप से, तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव प्रभारी हैं। तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव तुम पर हावी हो जाते हैं, जिससे तुम उन्हें छिपाते हो और कुछ नहीं कहते, और तुम उनसे मुक्त नहीं हो सकते। मुक्त नहीं हो पाने का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि हालाँकि तुम उन सत्यों का अभ्यास करने के लिए तैयार हो जिन्हें तुम समझते हो, लेकिन तुममें ऐसा करने की ताकत नहीं है; तुम बस अपने भ्रष्ट स्वभावों पर विजय नहीं पा सकते। इसका मतलब है कि तुम मुसीबत में हो; तुम सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते। अगर तुम चीजें छिपाना और दूसरों को धोखा देना चाहते हो, तो तुम छिपाने और धोखा देने के काम करने में पूरी तरह से सक्षम हो, खासकर ऊपरवाले के प्रति, सिर्फ अच्छी खबरों की रिपोर्ट करते हो, बुरी खबरों की नहीं, यहाँ तक कि ऊपर वालों को धोखा देते हो और नीचे वालों से चीजें छिपाते हो। तुम कहते हो, “मुझे सच में सत्य से प्रेम है और मैं एक ऐसा व्यक्ति हूँ जो सत्य का अभ्यास करता है। मैं परमेश्वर द्वारा कहे गए हर सत्य को ध्यानपूर्वक लिखता हूँ, उस पर विचार करता हूँ और उसका सारांश लिखता हूँ, और फिर वास्तविक जीवन में उसका अभ्यास करता हूँ।” तुम इसी तरह सोचते हो, तुम्हारी यही इच्छा होती है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि तुमने सत्य का अभ्यास किया है। क्यों? क्योंकि तुम्हारे भीतर कई भ्रामक विचार और दृष्टिकोण हैं जो पहले ही तुम्हारे दिल पर कब्जा कर चुके हैं। नतीजतन, भ्रष्ट स्वभाव तुम्हारा जीवन बन गए हैं। तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव प्रभारी हैं, वे तुम्हारे विचारों और कार्यों पर हावी रहते हैं। अगर तुम सत्य का अभ्यास करना भी चाहो तो यह बेकार है; तुम खुद को ऐसा करने के लिए तैयार नहीं कर सकते। इसलिए, अगर तुम्हारे भ्रष्ट स्वभावों का समाधान नहीं होता तो भले ही तुम अपना कर्तव्य निभा रहे हो, तुम्हारे लिए सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना असंभव है—अगर तुम अग्रसक्रिय रूप से और खुले तौर पर परमेश्वर की आलोचना, प्रतिरोध या निंदा करने से बच सको तो यही काफी अच्छा है। लेकिन तुम्हारे दिल में भ्रष्ट स्वभावों द्वारा शासन करने के कारण तुम परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह और उसका प्रतिरोध किए बिना नहीं रह सकते। शायद तुम सोचते हो कि तुम सिर्फ उन्हीं स्थितियों में ऊपरवाले को धोखा देने और उससे चीजें छिपाने और परमेश्वर को धोखा देने की कोशिश करते हो जब तुम निष्क्रिय होते हो या फिर निराशा के क्षणों में होते हो, और तुम सिर्फ निराशा के क्षणों में लोगों को दबाते हो या उतावलापन प्रकट करते हो। क्या यह वास्तव में निराशा के अस्थायी क्षणों के कारण होता है? नहीं, यह गहराई से जड़ जमा चुके तुम्हारे भ्रष्ट स्वभावों के प्रभारी होने का नतीजा है। यह अपरिहार्य है। यह अपरिहार्य क्यों है? क्योंकि तुम जिन सत्यों को समझते हो, वे तुम्हारे लिए मात्र एक तरह की इच्छा, एक तरह का विश्वास होते हैं; वे अभी तक तुम्हारा जीवन नहीं बने होते हैं। चाहे तुम्हारे पास ज्ञान हो या न हो या तुम्हारी काबिलियत ऊँची हो या नीची, कम से कम, सत्य तुम्हारा जीवन नहीं बना है। अर्थात्, सत्य तुम्हारे भीतर प्रभारी नहीं है; तुम्हारे भीतर शैतानी स्वभाव और शैतानी फलसफे प्रभारी हैं। जब तुम शैतानी स्वभावों के अधीन होते हो, तो तुम शैतानी स्वभावों के अनुसार जी रहे होते हो, और तुम अभी भी शैतान के प्रभाव में जी रहे होते हो। जब तुम्हारे हितों और गौरव को कोई नुकसान नहीं पहुँचता, जब तुम्हारा रुतबा, शोहरत और लाभ शामिल नहीं होते, तब तुम थोड़ा सत्य का अभ्यास करने के इच्छुक होते हो। लेकिन जैसे ही तुम्हारी शोहरत, लाभ, रुतबा या मंजिल इसमें शामिल हो जाते हैं, तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव तुम्हें मजबूती से और कसकर जकड़ लेते हैं और नियंत्रित कर लेते हैं। तुममें अभी भी परमेश्वर के प्रति सच्चा समर्पण नहीं है; तुम्हारे अभी भी परमेश्वर और सत्य के साथ विश्वासघात करने की सौ प्रतिशत संभावना है। इन घटनाओं को देखते हुए, क्या तुम्हारे भ्रष्ट स्वभावों का समाधान हो गया है? क्या उन्हें त्याग दिया गया है? क्या सत्य तुम्हारा जीवन बन गया है? जब कुछ घटित होता है, तब अगर वे सत्य जिन्हें तुम समझते हो, तुम्हारे भ्रष्ट स्वभावों पर विजय नहीं पा सकते, तुम्हारी पसंद और लालसाओं पर विजय नहीं पा सकते, तुम्हारी इच्छाओं, महत्वाकांक्षाओं, रुतबे और प्रतिष्ठा पर विजय नहीं पा सकते, तो वे सत्य जिन्हें तुम समझते हो, तुम्हारा जीवन नहीं हैं। जब सत्य तुम्हारा जीवन बन जाता है तब तुम प्राकृतिक रूप से इन भ्रष्ट स्वभावों पर विजय पा सकते हो। अगर तुम अपने भ्रष्ट स्वभावों पर विजय नहीं पा सकते तो यह दर्शाता है कि सत्य अभी तुम्हारे भीतर प्रभारी नहीं है और वह अभी तुम्हारा जीवन नहीं बना है। तुम कहते हो कि तुम सत्य से प्रेम करते हो, लेकिन यह सिर्फ तुम्हारी लालसा और इच्छा है; यह तुम्हारे जीवन का प्रतिनिधित्व नहीं करता। सामान्य मानवता वाले सभी लोगों में सकारात्मक लालसाएँ होती हैं। क्या अच्छा इंसान बनने की लालसा करने का यह अर्थ है कि तुम अच्छे इंसान हो? (नहीं।) क्या सत्य, निष्पक्षता और धार्मिकता से प्रेम करने का यह अर्थ है कि तुममें सत्य, निष्पक्षता और धार्मिकता है? नहीं—तुममें ये चीजें नहीं हैं, तुम बस इनकी लालसा करते हो। लालसा करने का क्या मतलब है? (व्यक्ति की अद्भुत इच्छा।) हाँ, यह बस एक इच्छा है। इसका इस बात से कोई लेना-देना नहीं है कि तुम कैसा आचरण करते हो, या है? (नहीं।)
क्या अब तुम लोगों के पास जीवन के रूप में सत्य है? (नहीं।) कोई कैसे बता सकता है कि तुम लोगों के पास जीवन के रूप में सत्य है या नहीं? देखकर कोई यह बता सकता है कि जिन सत्यों को तुम समझते हो वे तब तुम्हारे भ्रष्ट स्वभावों पर विजय पा सकते हैं या नहीं, जब तुम्हारे हित सत्य से टकराते हैं, जब तुम्हारे हितों को नुकसान होने वाला होता है या जब वे खतरे में पड़ने वाले होते हैं। अगर वे ऐसा कर सकते हैं तो तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जिसके पास जीवन के रूप में सत्य है। अगर वे ऐसा नहीं कर सकते तो यह साबित करता है कि तुम्हारा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है। कितना छोटा? तुम्हारे पास जीवन के रूप में सत्य नहीं है। यही वास्तविकता है। कुछ लोग कहते हैं, “अगर हमारे पास जीवन के रूप में सत्य नहीं है तो हम परमेश्वर के घर में अपने कर्तव्य निभाने के लिए सब कुछ कैसे त्याग सकते हैं? हम परमेश्वर के लिए अब भी कष्ट कैसे उठा सकते हैं और कीमत कैसे चुका सकते हैं?” कुछ तो यहाँ तक कहते हैं, “मुझमें पहले से ही कुछ भक्ति है; मुझे पहले ही विजेता बनाया जा चुका है।” दरअसल, ऐसे कथनों में लोगों की धारणाओं और कल्पनाओं की मिलावट होती है। लोगों का संकल्प और आकांक्षाएँ रखना गलत नहीं है। लोगों की प्रकाश के लिए, न्याय के लिए लालसा, और उनकी सत्य का अनुसरण करने, उद्धार पाने आदि के लिए लालसा—ये अद्भुत इच्छाएँ उनकी कुछ जागरूकता, उनके मार्ग की दिशा और बेशक, उनके कुछ व्यवहार, और बाहरी तौर पर उनके हाव-भाव के और उनके जीने के तरीके के कुछ पहलू बदल सकती हैं। यहाँ बदलने का क्या अर्थ है? उदाहरण के लिए मान लो, तुममें वर्तमान में आस्था है, तुम्हारी अवस्था बहुत अच्छी है, तुम नकारात्मक नहीं हो और तुम्हारा कर्तव्य विशेष रूप से सुचारु रूप से चल रहा है। नतीजतन, तुम महसूस करते हो कि तुम विशेष रूप से वफादार हो, और तुम्हें उद्धार पाने की अपनी इच्छा पूरी होने की आशा है, और तुम्हें कोई भी कठिनाई सहन करना स्वीकार्य है। लेकिन अच्छा समय स्थायी नहीं होता। अपना कर्तव्य निभाने की प्रक्रिया में तुम कुछ रुकावटों और असफलताओं का सामना करते हो, तुम्हारी काट-छाँट की जाती है, तुम कई चक्कर लगाते हो, यहाँ तक कि मसीह-विरोधियों द्वारा गुमराह किए जाते हो और दबाए जाते हो, और बहुत सारी ज्यादतियाँ सहते हो। तब तुम अपने दिल में तकलीफ महसूस करते हो। तुम सत्य नहीं समझते, तुम नहीं जानते कि ये चीजें क्यों हुईं, और तुम्हें परमेश्वर से प्रार्थना करने पर कोई उत्तर नहीं मिलता, इसलिए तुम व्यथित महसूस करते हो। इन चीजों का होना काफी हद तक सत्य और प्रकाश की लालसा के तुम्हारे संकल्प पर एक निश्चित आघात और विनाश लाता है। यह विनाश झेलने के बाद तुम अपना कर्तव्य नहीं निभाना चाहते, तुम महसूस करते हो कि यह व्यर्थ है। यहाँ क्या हो रहा है? तुम इतनी तेजी से कैसे बदल गए? तुम पहले से बिल्कुल अलग व्यक्ति क्यों हो? अगर तुम्हारा आध्यात्मिक कद होता और सत्य तुम्हारा जीवन होता, तो तुम्हारी भक्ति नहीं बदलती। लेकिन चूँकि सत्य तुम्हारा जीवन नहीं है, इसलिए तुम्हारी आंतरिक अवस्था, मानसिकता और परमेश्वर में विश्वास करने और खुद को खपाने की तुम्हारी प्रेरणा हमेशा अस्थिर रहती है और गर्म और ठंडे के बीच उतार-चढ़ाव करती रहती है। जब सब कुछ सुचारु रूप से चल रहा होता है और तुम्हारा मूड अच्छा होता है, तो तुममें प्रेरणा रहती है, प्रार्थना में कहने के लिए तुम्हारे पास बहुत कुछ होता है, तुम परमेश्वर के वचन पढ़ने के इच्छुक रहते हो, अपने कर्तव्य में कड़ी मेहनत करते हो, और तुम्हें व्यस्त होना या थकना और कोई भी कठिनाई सहना स्वीकार्य होता है। लेकिन जैसे ही चीजें थोड़ी प्रतिकूल होती हैं, तुम नकारात्मक और कमजोर हो जाते हो, अपना कर्तव्य निभाने की प्रेरणा खो देते हो। जब तुम एक बार का खाना नहीं खा पाते या थोड़ा कम सो पाते हो, तो तुम्हें लगता है कि यह बहुत बड़ी कठिनाई है, और तुम्हारे दिल में शिकायतें उठती हैं : “मैं क्यों कष्ट सहूँ? मैं अपना कर्तव्य निभाने से पैसे भी नहीं कमाता, यह इस लायक नहीं है!” देखो, तुम्हारी मानसिकता बिल्कुल अलग है। इतना बड़ा बदलाव क्यों आया है? इसलिए कि तुम्हारे पास जीवन के रूप में सत्य नहीं है और तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव अभी भी तुम्हारे भीतर मौजूद हैं। जब लोग उत्साही होते हैं तो उन्हें लगता है कि उनकी कोई महत्वाकांक्षा, इच्छा या परमेश्वर से कोई माँग नहीं है। वास्तव में, उनके भ्रष्ट स्वभाव अभी भी उनके भीतर प्रभारी होते हैं; ये चीजें अपरिवर्तित रहती हैं। जब लोग सकारात्मक होते हैं, तो वे बहुत उत्साही और विशेष रूप से प्रेरित होते हैं, और कोई भी उन्हें रोक नहीं सकता। जब वे नकारात्मक होते हैं तो वे दलदल के गड्ढों की तरह होते हैं, जहाँ से कोई भी उन्हें ऊपर नहीं खींच सकता। वे हमेशा अतियों पर चले जाते हैं और पूरी तरह से अस्थिर होते हैं। यह दर्शाता है कि उनकी सामान्य मानवता में किसी चीज की कमी है। उसमें किस चीज की कमी होती है? उनके पास जीवन के रूप में सत्य नहीं होता—यही वह चीज है। तुम्हारी अवस्था गर्म और ठंडे के बीच उतार-चढ़ाव करती रहती है, एक पल नकारात्मक और अगले ही पल सकारात्मक। इसका क्या कारण है? वे तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव हैं जो परेशानी पैदा करते हैं। आज वे तुम्हें एक चीज सोचने पर मजबूर करते हैं, कल दूसरी; हर हाल में ये विचार तुम्हारी इच्छाओं, तुम्हारे उतावलेपन और तुम्हारी वर्तमान अवस्था, मनोदशा और भावनाओं के अनुरूप होते हैं। लेकिन जब लोगों के भीतर सत्य होता है तो बात अलग होती है। अगर सत्य तुम्हारा जीवन बन जाता है तो वह तुम्हें हमेशा अपने कार्यों की एक सटीक और सच्ची परिभाषा रखने में सक्षम बनाएगा और यह कभी नहीं बदलेगा। तुम गर्म और ठंडे के बीच नहीं झुलोगे, और न ही असफलता और गिरावट या थोड़ी-सी काट-छाँट या जरा-सी विफलता से नकारात्मक बनोगे और सुस्ती में फँसोगे। न ही तुम इतने सकारात्मक होगे कि किसी उत्साही युवा की तरह तीन दिन और तीन रात जागते रहकर क्रियाकलाप करो। इसके बजाय तुममें सामान्य तर्कसंगतता होगी। है ना? (हाँ।) एक बार जब लोग सत्य समझ लेते हैं और सत्य उनका जीवन बन जाता है, तो उनके दर्शन स्पष्ट हो जाते हैं। वे जानते हैं कि उन्हें परमेश्वर का अनुसरण क्यों करना चाहिए, उन्हें अपना कर्तव्य क्यों निभाना चाहिए, अपने कर्तव्य के प्रदर्शन में उन्हें क्या नतीजे हासिल करने चाहिए, और इन कष्टों को सहने का उद्देश्य, महत्व और मूल्य क्या है। वे इन सभी सत्य सिद्धांतों को अपने दिल में, बिना किसी भ्रम या अस्पष्टता के, अच्छी तरह समझते हैं। इसलिए वे स्वेच्छा से और बिना किसी शिकायत के कष्ट सहते हैं, उनके हर काम में नियम और सिद्धांत होते हैं, और वे परमेश्वर में आस्था कभी नहीं खोते; जब वे नकारात्मक महसूस करते हैं तो वे परमेश्वर के बारे में शिकायत नहीं करते या उसका परित्याग नहीं करते, और जब वे सकारात्मक महसूस करते हैं तो परमेश्वर से उनकी कोई अतिरिक्त माँग नहीं होती और उनकी अवस्था बहुत सामान्य होती है। क्या अब तुम लोग ऐसे हो? (नहीं।) तो फिर क्या करना चाहिए? (अब से हमें अपने भ्रष्ट स्वभावों का समाधान करने के लिए सत्य का अनुसरण करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए; कोई दूसरा मार्ग नहीं है।) सत्य का अनुसरण करने के अलावा कोई दूसरा मार्ग नहीं है। मैं तुम्हें बता दूँ : अगर तुम सत्य का अनुसरण नहीं करते और भ्रष्ट स्वभाव हमेशा तुम्हारे जीवन के रूप में प्रभारी रहते हैं, तो तुम्हारी मंजिल अच्छी नहीं होगी; ज्यादा से ज्यादा, तुम एक मजदूर बनकर रह जाओगे। लेकिन अगर तुम सत्य का अनुसरण करते हो तो उद्धार पाने की तुम्हारी आशा बड़ी होगी और अंततः तुम्हें मिलने वाले आशीष भी बड़े होंगे। अगर तुम सत्य का अनुसरण करते हो तो तुम भ्रष्ट स्वभावों के बंधन से मुक्त हो जाओगे, भ्रष्ट स्वभाव फिर तुम्हारा जीवन नहीं रहेंगे और नतीजतन तुम्हें सच में उद्धार पाने की आशा दिखाई देगी। अगर तुम सत्य का अनुसरण नहीं करते और तुम्हारे भ्रष्ट स्वभावों का समाधान नहीं होता, और तुम अच्छी चीजें करने और बुराई न करने के लिए सिर्फ आत्म-संयम और इच्छाशक्ति पर निर्भर रहना चाहते हो, तो यह कहना मुश्किल है कि तुम इस मार्ग के अंत तक पहुँच भी पाओगे या नहीं। समझे? (समझ गए।) परमेश्वर में विश्वास करने में लोगों को कौन-सी सबसे बड़ी समस्या हल करने की जरूरत है? (भ्रष्ट स्वभाव।) भ्रष्ट स्वभावों का समाधान करना सबसे महत्वपूर्ण चीज है। ऐसा मत सोचो, “मैं अब परमेश्वर के घर में पूर्णकालिक कर्तव्य निभा रहा हूँ, खुद को पूरे समय खपा रहा हूँ, इसलिए मैं एक विजेता हूँ!” परमेश्वर विजेताओं का एक समूह बनाने की बात करता है—विजेताओं का क्या अर्थ है? “ये वे लोग हैं जो जहाँ कहीं भी मेमना जाता है, उसके पीछे हो लेते हैं” (प्रकाशितवाक्य 14:4)। सरल शब्दों में विजेता का यही अर्थ है। व्यक्ति सिर्फ विजेता होने से संतुष्ट नहीं हो सकता। इस सरल अर्थ में विजेता होने का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति के भ्रष्ट स्वभाव त्याग दिए गए हैं, और इसका यह मतलब नहीं है कि उसके पास जीवन के रूप में सत्य है। जो अंततः बचाए जाते हैं वे सिर्फ विजेता नहीं होते—यह इतना सरल नहीं है। विजेता सिर्फ सांसारिक दुनिया, शैतान, बुरी प्रवृत्तियों और बुरे शासनों पर विजय प्राप्त करते हैं—यही होते हैं विजेता। अगर तुम सिर्फ कुछ सत्य सिद्धांत समझते हो और तुम अस्थायी रूप से देह और भावनाओं पर विजय पा सकते हो, या विभिन्न निराधार अफवाहों से बाधित नहीं होते, या दुष्ट लोगों या छद्म-विश्वासियों से परेशान नहीं होते, तब भी यह पूरी तरह से विजेता के मानक पर खरा नहीं उतरता। सिर्फ ये कुछ छोटे-मोटे अनुभव होना ज्यादा मूल्यवान नहीं है। मूल्यवान क्या है? सत्य को अपना जीवन बनाना सबसे मूल्यवान चीज है। व्यक्ति सत्य को अपना जीवन कैसे बना सकता है? सिर्फ एक मार्ग है : तुम्हें परमेश्वर के वचन ज्यादा पढ़ने चाहिए और परमेश्वर के वचनों का ज्यादा अभ्यास और अनुभव करना चाहिए। सिर्फ इसी तरह तुम परमेश्वर के वचनों से सत्य प्राप्त कर सकते हो और सत्य को अपना जीवन बना सकते हो। अगर तुम सत्य का उपयोग अपने पूरे जीवन, अपने रोजमर्रा के जीवन और उन सिद्धांतों के मार्गदर्शन के लिए करते हो जिनके द्वारा तुम क्रियाकलाप और आचरण करते हो—अगर तुम इस तरह अभ्यास करते हो—तो तुम्हारे पास सत्य वास्तविकता होगी। जब तुम्हारे पास सत्य वास्तविकता होगी तब तुम्हारे पुराने शैतानी स्वभाव हटाकर किनारे कर दिए जाएँगे। यह तय करने से पूर्व कि कैसे क्रियाकलाप करना है, पहले चिंतन करो, “मैं जो सोचता हूँ वह सत्य सिद्धांतों का प्रतिनिधित्व नहीं करता। मुझे देखना चाहिए कि परमेश्वर के वचन क्या कहते हैं।” अगर तुम हर बार इस तरह विचार करो और अगर तुम हर बार परमेश्वर के वचनों के अनुसार बोलो और अभ्यास करो, तो क्या सत्य धीरे-धीरे तुम्हारे जीवन में प्रवेश नहीं करेगा? छोटी-छोटी बहुत सारी बूँदों से सागर बन जाता है। सत्य को धीरे-धीरे अपने दिल में प्रवेश करने दो ताकि तुम्हारा रोजमर्रा का जीवन, तुम्हारे विचार, तुम्हारे अस्तित्व की वर्तमान स्थिति और तुम्हारी अवस्था बदल जाए। जैसे-जैसे तुम्हारी अवस्था धीरे-धीरे बदलती और अच्छी दिशा में विकसित होती है, तुम्हारे बुराई करने और विघ्न-बाधाएँ पैदा करने की संभावना घटती जाएगी, तुम्हारे दिखावा करने की संभावना घटती जाएगी, जबकि सत्य सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करने की तुम्हारी गवाहियाँ बढ़ती जाएँगी। जब सही-गलत के नाजुक मामले उभरते हैं तब सत्य सिद्धांत तुम्हारे शैतानी भ्रष्ट स्वभावों और तुम्हारी व्यक्तिगत इच्छाओं, प्राथमिकताओं और योजनाओं पर विजय प्राप्त कर लेते हैं। सिर्फ तभी तुम एक सच्चे विजेता बनोगे, ऐसे व्यक्ति बनोगे जिसके पास जीवन के रूप में सत्य होता है और ऐसे व्यक्ति बनोगे जो उद्धार प्राप्त कर सकता है। वरना अगर तुम सिर्फ अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर क्रियाकलाप करते हो और सोचते हो, “इस तरह क्रियाकलाप करना अच्छा है, मैं ये चीजें खुशी-खुशी और स्वेच्छा से करता हूँ और मुझे कोई शिकायत नहीं है,” तो इसका क्या फायदा है? तुम्हें कोई शिकायत नहीं है लेकिन तुम्हारे अभ्यास के सिद्धांत क्या हैं? तुम्हारा अभ्यास पूरी तरह से तुम्हारे भ्रष्ट स्वभावों की प्राथमिकताओं, गलत विचारों और दृष्टिकोणों, स्वार्थपूर्ण इरादों, महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं, भावनाओं और उतावलेपन से आता है—यह पूरी तरह से तुम्हारे भ्रष्ट स्वभावों द्वारा निर्देशित होता है। यह ऐसा जीवन है जो भ्रष्ट स्वभावों को प्रकट करता है, न कि ऐसा जीवन जो सत्य प्रकट करता है। परमेश्वर न सिर्फ इसे याद नहीं रखता, बल्कि वह इसकी निंदा भी करेगा। तुम्हें हर संभव प्रयास करना चाहिए ताकि तुम अपने आचरण में जो प्रदर्शित करते हो, जो शब्द तुम बोलते हो और जो चीजें तुम करते हो और जो विचार और दृष्टिकोण तुम प्रकट करते हो, वे सब सत्य के अनुरूप हों; ताकि भ्रष्ट स्वभावों से उत्पन्न वे भ्रामक विचार और दृष्टिकोण तुम्हारे दिल में कम से कम होते जाएँ; और ताकि तुम अपने दिल में जो सोचते हो वह और मामलों पर तुम्हारे विचार, सब सत्य से संबंधित हों और सब सत्य के अनुरूप हों। तुम्हें इस पहलू का अनुसरण करना चाहिए और इस पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, तब तुम्हारे भीतर अधिकाधिक बदलाव होंगे और तुम्हारी अवस्था अधिकाधिक बेहतर होती जाएगी। आजकल बहुत-से लोग शब्दों और धर्म-सिद्धांतों को स्पष्ट और तार्किक रूप से व्यक्त कर सकते हैं, लेकिन जब सत्य वास्तविकता के बारे में बोलने की बात आती है तब उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं होता और वे थोड़ी-सी भी व्यावहारिक समझ व्यक्त करने में असमर्थ रहते हैं। यहाँ क्या हो रहा है? (हमारे पास सत्य नहीं है।) तुम्हारा जीवन अभी भी भ्रष्ट स्वभावों का जीवन है, शैतान का जीवन है, वह सत्य का जीवन नहीं है।
क्या तुम समझ गए हो कि हमने अभी क्या संगति की है? अगर तुम लोग सचमुच यह पहचानते हो कि तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव अभी तक त्याग नहीं दिए गए हैं और तुम अभी भी भ्रष्ट स्वभावों के अनुसार जीते हो, तो क्या तुम लोग नकारात्मक हो जाओगे? (अभी-अभी, जब मैंने परमेश्वर को यह कहते सुना कि हमारे भ्रष्ट स्वभाव नहीं बदले हैं, तब मुझे अपने दिल में एक बड़ी विषमता का एहसास हुआ, मैंने सोचा कि मैं इन तमाम वर्षों में लगातार परमेश्वर के वचन खाता-पीता रहा हूँ और विशेष परिस्थितियों में मैंने सत्य का अभ्यास करने पर ध्यान केंद्रित किया है—तो फिर मेरे भ्रष्ट स्वभाव अभी भी कैसे नहीं बदले हैं? मुझे थोड़ी निराशा और नकारात्मकता महसूस हुई। लेकिन परमेश्वर के थोड़ा-थोड़ा करके मार्गदर्शन और संगति प्रदान करने से मुझे समझ में आया कि मैं सिर्फ कुछ बाहरी अच्छे व्यवहार प्रदर्शित करता हूँ, लेकिन मेरे भ्रष्ट स्वभाव अभी भी मेरे भीतर प्रभारी हैं; वास्तव में कोई बदलाव नहीं हुआ है। परमेश्वर ने कहा कि चीजें करते समय लोगों को पहले चिंतन करना चाहिए, और चाहे उनके विचार कितने भी अच्छे हों, वे सत्य सिद्धांतों का प्रतिनिधित्व नहीं करते, और उन्हें यह देखना चाहिए कि परमेश्वर के वचनों में सत्य क्या कहता है, और हर बार कुछ करते समय उन्हें सत्य खोजने और परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास करने का प्रशिक्षण लेना चाहिए, और फिर धीरे-धीरे उनकी अवस्था बदल जाएगी। परमेश्वर की संगति सुनने के बाद मुझे फिर से आशा दिखती प्रतीत हुई, और मुझे लगा कि एक मार्ग है, और फिर मैं नकारात्मक नहीं रहा।) नकारात्मक होना गलत है; तुम्हें किसी भी परिस्थिति में नकारात्मक नहीं होना चाहिए। भ्रष्ट स्वभावों को त्याग देना उद्धार पाने का बड़ा मामला है। कोई चीज जितनी ज्यादा भ्रष्ट स्वभाव हो, उतना ही ज्यादा तुम्हें उसके समाधान पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। तुम्हें भरसक प्रयास करना चाहिए और अपना पूरा ध्यान उस पर लगाना चाहिए। तुम नकारात्मक नहीं हो सकते और हार नहीं मान सकते। हालाँकि अब तुम लोग सत्य का अनुसरण करने पर ध्यान केंद्रित करना शुरू कर रहे हो, फिर भी कभी-कभी तुम अभी भी नहीं जानते कि अभ्यास कैसे करें। अब तुम लोगों से अभ्यास के मार्ग के बारे में बात करना तुम लोगों के जीवन प्रवेश के लिए ज्यादा लाभदायक है, और साथ ही, यह तुम्हारे भीतर संकट की भावना पैदा कर सकता है, और तुम्हें सत्य पर ध्यान केंद्रित करने, और सत्य समझने और यथाशीघ्र सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने में सक्षम बना सकता है। आत्मसंतुष्ट मत बनो और अपनी वर्तमान स्थिति से संतुष्ट मत हो। तुम लोग सिर्फ आज्ञाकारी और अच्छे व्यवहार वाले, और पहले से थोड़े ज्यादा समझदार हो गए हो, लेकिन तुम अभी भी अपने भ्रष्ट स्वभावों को त्याग देने से बहुत दूर हो! तथ्य स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं, इसलिए नकारात्मक होने से क्या फायदा? नकारात्मक होने से वास्तविक समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता। तुम्हें पता लगाना चाहिए कि समस्या कहाँ से उत्पन्न होती है और वहीं से उसका समाधान करना शुरू कर देना चाहिए। अभी शुरू करने में बहुत देर नहीं हुई है। बहुत देर कब होगी? बहुत देर तब होगी जब परमेश्वर का कार्य समाप्त होगा। क्या तुम लोगों में सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने और सत्य को अपने जीवन के रूप में प्राप्त करने का संकल्प है? (अब हमारे पास यह संकल्प है।) दरअसल, सत्य वास्तविकता में प्रवेश करना कठिन नहीं है। इसके बारे में सोचो, सत्य पर संगति के कई वचन कहे गए हैं और वे बहुत विस्तृत और विशिष्ट हैं। ऐसा लगता है कि विषय-वस्तु बहुत ज्यादा है, लेकिन सिद्धांत नहीं बदलते, और अभ्यास का मार्ग नहीं बदलता। जब तुम कोई भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करो, तो सचेतन रूप से उस विचार या सोच को पकड़ो और अपने दिल में चिंतन करो, “यह एक भ्रष्ट स्वभाव है, तो मैं कैसे इसका समाधान करूँ? मैंने पहले कभी इसका समाधान नहीं किया है। मैं इतने वर्षों से परमेश्वर में विश्वास करता रहा हूँ, लेकिन मैंने सिर्फ बाहरी क्रियाकलापों और दिखावा करने पर ही ध्यान केंद्रित किया है, और मैंने कभी इस तथ्य पर विचार नहीं किया है कि मुझमें अभी भी भ्रष्ट स्वभाव हैं। आज अचानक मैंने पाया कि मेरे अंदर ऐसा ही एक विचार है। यह विचार कहाँ से आया? एक भ्रष्ट स्वभाव से। तो फिर इस भ्रष्ट स्वभाव का समाधान कैसे किया जाए?” परमेश्वर से प्रार्थना करो और सत्य खोजो, और अपने आस-पास के उन लोगों से भी पूछो जिन्हें अनुभव हुए हैं; वे सत्य खोजने और समस्या का समाधान करने में तुम्हारी अगुआई करेंगे। जब सब लोग एक-साथ हों, तो तुम्हें एक-दूसरे का समर्थन और मदद करनी चाहिए और एक-दूसरे के प्रति समझदारी दिखानी चाहिए। सबका आध्यात्मिक कद एक-जैसा है और किसी को भी किसी को नीचा या ऊँचा नहीं समझना चाहिए। अगर हर कोई इसी तरह एक-दूसरे की मदद और समर्थन करे, और हरेक का आध्यात्मिक कद धीरे-धीरे बढ़े, और अंत में, तुम सब उद्धार प्राप्त करो और एक-साथ राज्य में प्रवेश करो, तो क्या यह अच्छा नहीं होगा? (हाँ।) ठीक है, चलो आज के लिए अपनी संगति यहीं समाप्त करते हैं। अलविदा!
9 सितंबर 2023
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?