सत्य का अनुसरण कैसे करें (4) भाग एक

सत्य का अनुसरण करने का पहला अभ्यास : त्याग देना

अपने और परमेश्वर के बीच की बाधाओं और परमेश्वर के प्रति अपनी शत्रुता को त्याग देना

I. परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाओं और कल्पनाओं को त्याग देना : परमेश्वर के कार्य के बारे में अपनी धारणाओं और कल्पनाओं को त्याग देना

च. परमेश्वर का कार्य लोगों की जन्मजात स्थितियों को नहीं बदलता, बल्कि इसका लक्ष्य उनके भ्रष्ट स्वभावों को बदलना है

पिछली सभा में हमने “सत्य का अनुसरण कैसे करें” विषय पर संगति जारी रखी थी। उस संगति की मुख्य विषयवस्तु क्या थी? हमने लोगों की जन्मजात स्थितियों और उनके भ्रष्ट स्वभावों के बीच अंतरों के बारे में संगति की थी और हमने इन दो पहलुओं पर भी विशिष्ट रूप से संगति की थी। उस संगति के जरिये क्या तुम लोगों को परमेश्वर जो कार्य करना चाहता है और लोगों को बचाने में परमेश्वर लोगों के जिन पहलुओं को बदलना चाहता है उनकी एक निश्चित समझ प्राप्त हुई है? (हाँ। परमेश्वर की पिछली संगति के जरिये मैंने समझा कि परमेश्वर अपने कार्य से लोगों के भ्रष्ट स्वभाव बदलना चाहता है।) लोगों को बचाने में परमेश्वर उन्हें उनके भ्रष्ट स्वभावों से छुटकारा दिलाना चाहता है; वह उनकी जन्मजात स्थितियाँ बदलने का इरादा नहीं रखता, है न? (हाँ।) परमेश्वर सत्य व्यक्त करता है, लोगों को सत्य प्रदान करता है और कार्य के विभिन्न तरीके इस्तेमाल करता है—यह सब लोगों के भ्रष्ट स्वभावों पर लक्षित होता है। अपने कार्य के जरिये परमेश्वर लोगों को वे स्वभाव उतार फेंकने में सक्षम बनाता है जिन पर वे जीवित रहने के लिए निर्भर करते हैं, जिन्हें शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है। इस तरह परमेश्वर के वचन और सत्य लोगों में समाहित किए जाते हैं और वे उनका जीवन बन जाते हैं। यह वह अंतिम नतीजा है जिसे परमेश्वर का कार्य हासिल करना चाहता है। इस पहलू पर की गई संगति से तुम लोगों ने क्या समझा? किस विषयवस्तु ने तुम लोगों पर सबसे गहरी छाप छोड़ी? एक पल के लिए इस बारे में सोचो। (परमेश्वर की पिछली संगति ने मेरा एक भ्रामक दृष्टिकोण सही करने में मेरी मदद की। अतीत में मैं सोचता था कि परमेश्वर लोगों की अंतर्निहित काबिलियत, योग्यताएँ और व्यक्तित्व बदलेगा, लेकिन परमेश्वर की संगति के जरिये मैंने समझा कि परमेश्वर अलौकिक कार्य नहीं करता। परमेश्वर का कार्य लोगों के भ्रष्ट स्वभाव और उनके विभिन्न भ्रामक विचार और दृष्टिकोण बदलना है, जो शैतान की चीजें हैं। परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करने से लोगों की सामान्य मानवता बहाल होती है और उनका जमीर और विवेक अधिकाधिक सामान्य होते जाते हैं। साथ ही मैंने सत्य का अनुसरण करने का महत्व भी समझा। सत्य का अनुसरण और अभ्यास करने से ही हमारे भ्रष्ट स्वभावों का समाधान हो सकता है; जब परमेश्वर के वचन हमारा जीवन बन जाते हैं, तब हम परमेश्वर द्वारा बचाया जाना हासिल करते हैं। परमेश्वर की संगति के इन दो पहलुओं ने मुझ पर अपेक्षाकृत गहरी छाप छोड़ी।) पिछली संगति की विषयवस्तु में दर्शनों से संबंधित सत्य शामिल था; उसमें परमेश्वर के कार्य के कुछ विशिष्ट पहलू, परमेश्वर के कार्य के लक्ष्य और वे नतीजे शामिल थे जिन्हें वह हासिल करना चाहता है। जिस विषयवस्तु पर संगति की गई थी, उसके आधार पर कुछ विशिष्ट प्रश्न उठे। इन प्रश्नों में शामिल हैं कि दैनिक जीवन में कौन-सी अभिव्यक्तियाँ व्यक्ति की जन्मजात स्थितियाँ मानी जाती हैं, कौन-सी अभिव्यक्तियाँ व्यक्ति के चरित्र या उसके मानवता सार को—यानी जिसे हम आम तौर पर व्यक्ति की मानवता के अच्छे या बुरे होने की कुछ अभिव्यक्तियों के रूप में संदर्भित करते हैं—प्रतिबिंबित करती हैं और कौन-सी अभिव्यक्तियाँ भ्रष्ट स्वभावों के प्रकाशन हैं। ये विशिष्ट प्रश्न हैं, है न? हालाँकि जब हमने पहले इस विषय पर संगति की थी तो हमने कुछ उदाहरण दिए थे, लेकिन वे बहुत लक्षित या विशिष्ट नहीं थे। आज हम इस मुद्दे पर विशेष रूप से संगति करेंगे ताकि लोगों द्वारा प्रकट की जाने वाली उन अभिव्यक्तियों के बीच अंतर किया जा सके जो जन्मजात स्थितियाँ हैं, जो उनके चरित्र से संबंधित हैं और जो भ्रष्ट स्वभावों की श्रेणी में आती हैं और इन तीन पहलुओं की विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ पहचानेंगे। इस तरह यह स्पष्ट हो जाएगा कि लोगों को अपने दैनिक जीवन में आने वाले असंख्य मुद्दों को परमेश्वर के वचनों और सत्य के आधार पर इन तीन पहलुओं के साथ कैसे परस्पर जोड़ना चाहिए। इसमें यह शामिल है कि लोगों के कौन-से प्रकाशन सामान्य मानवता के जन्मजात पहलू हैं जिनसे निपटने या जिन्हें नियंत्रित करने की जरूरत नहीं है; कौन-से पहलू लोगों की मानवता से जुड़ी समस्याओं के प्रकाशन हैं और उन्हें कैसे बदलना और ठीक करना चाहिए या सत्य की खोज के जरिये कैसे हल करना चाहिए; और कौन-सी अभिव्यक्तियाँ भ्रष्ट स्वभावों की श्रेणी में आती हैं और लोगों को इन स्वभावों का सार कैसे समझना चाहिए और सत्य स्वीकारने और उसका अभ्यास करने के जरिये उन्हें कैसे हल करना और उतार फेंकना चाहिए। इन सभी की विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ होती हैं और बेशक इनमें अभ्यास के विशिष्ट मार्ग शामिल हैं। लोगों की विभिन्न अभिव्यक्तियों के अनुसार हम अभ्यास के सिद्धांतों और मार्गों पर संगति करेंगे ताकि लोग समझ सकें कि इन मुद्दों का सामना और समाधान कैसे करें और लोगों के पास विभिन्न समस्याओं के लिए ज्यादा ठोस रवैये और अभ्यास के मार्ग हो सकें। क्या इस तरह से संगति करना अच्छा प्रतीत होता है? (हाँ।)

4. जन्मजात स्थितियाँ क्या हैं

हमने जन्मजात स्थितियों, मानवता और भ्रष्ट स्वभावों के तीन मुद्दों पर पहले दो बार संगति की है। हालाँकि हमने विशिष्ट रूप से लक्षित तरीके से यह स्पष्ट नहीं किया कि लोगों की अभिव्यक्तियाँ और प्रकाशन इन तीन मुद्दों में से किससे संबंधित हैं, फिर भी हमने प्रत्येक मुद्दे पर संगति करते समय कुछ उदाहरण दिए। पिछली संगतियों में इन तीन मुद्दों पर बात करते समय हमने इन मुद्दों के सार या इनमें शामिल अभ्यास के मार्गों और सिद्धांतों पर भी संगति की थी। मैंने अभी जिन तीन मुद्दों का उल्लेख किया है, उनके बारे में अब मैं चाहता हूँ कि सभी लोग पहले इस बात पर चर्चा करें कि जन्मजात स्थितियाँ किससे संबंधित हैं। तुम सभी लोग पहले मूल अवधारणा को समझने के लिए मोटे तौर पर इस पर संगति कर सकते हो। (परमेश्वर, क्या जन्मजात स्थितियाँ व्यक्ति की काबिलियत, योग्यताओं, जन्मजात व्यक्तित्व और सहज प्रवृत्तियों को संदर्भित करती हैं?) हमने इस विषय-वस्तु पर पहले संगति की है, इसलिए तुम सभी लोगों को इससे परिचित होना चाहिए। क्या और भी कुछ है? क्या खूबियों और रूप-रंग को जन्मजात स्थितियाँ माना जाता है? (हाँ।) व्यक्ति की पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में क्या कहना है? (हाँ, इसे भी।) और जीवनशैली की दिनचर्याएँ और आदतें, है ना? और कुछ? (रुचियाँ और शौक भी।) रुचियाँ और शौक खूबियों से थोड़े भिन्न होते हैं। रुचियाँ और शौक जोड़ने से ज्यादा विशिष्टताएँ सामने आती हैं। आओ उन्हें क्रम से सूचीबद्ध करें : पहली है पारिवारिक पृष्ठभूमि। दूसरी है रूप-रंग। तीसरी है व्यक्तित्व। चौथी है सहज प्रवृत्तियाँ। पाँचवीं है काबिलियत। छठी है खूबियाँ। सातवीं है रुचियाँ और शौक। आठवीं है योग्यताएँ। और फिर जीवनशैलीगत आदतें और जीवनशैलीगत दिनचर्या। ये आख़िरी दो समान हैं, लेकिन इनमें कुछ विशिष्ट अंतर हैं। ये कुल दस हैं। आगे बढ़ो और इन्हें पढ़ो। (एक : पारिवारिक पृष्ठभूमि। दो : रूप-रंग। तीन : व्यक्तित्व। चार : सहज प्रवृत्तियाँ। पाँच : काबिलियत। छह : खूबियाँ। सात : रुचियाँ और शौक। आठ : योग्यताएँ। नौ : जीवनशैलीगत आदतें। दस : जीवनशैलीगत दिनचर्या।) ये सब लोगों की जन्मजात स्थितियाँ हैं। क्या हमें जन्मजात स्थितियों के बारे में भी विशिष्ट रूप से संगति नहीं करनी चाहिए? संगति किए बिना क्या तुम लोग अपने आप उचित अंतर कर सकते हो? (नहीं।) किन स्थितियों में तुम अंतर नहीं कर सकते? (कभी-कभी जब हम किसी व्यक्ति में कुछ अभिव्यक्तियाँ देखते हैं तो हम यह नहीं बता सकते कि वे उस व्यक्ति के व्यक्तित्व को प्रतिबिंबित कर रही हैं या सहज प्रवृत्तियों को या क्या वे भ्रष्ट स्वभावों के प्रकाशन हैं।) (साथ ही, जीवनशैलीगत आदतें और जीवनशैलीगत दिनचर्या—मैं सोचा करता था कि ये उपार्जित जीवन-स्थितियों और पृष्ठभूमि के आधार पर बनती हैं; मैं नहीं जानता था कि ये जन्मजात स्थितियाँ हो सकती हैं।) देखो, जब हम एक प्रमुख विषय के भीतर कुछ विस्तृत और विशिष्ट विषय-वस्तु को विभाजित करते हैं तो ऊपरी तौर पर तो लगता है कि तुम ये विशिष्टताएँ जानते हो, लेकिन वास्तविक जीवन में तुम उन्हें थोड़ा उलझा देते हो; तुम अभी भी स्पष्ट नहीं हो कि उनमें कैसे भेद किया जाए, है न? (सही है।) हमें अभी भी इस मुद्दे पर कुछ विशिष्ट संगति करने की जरूरत है।

5. जन्मजात स्थितियों, मानवता और भ्रष्ट स्वभावों के बीच अंतर और संबंध

हमने अभी जिन तीन पहलुओं का उल्लेख किया—जन्मजात स्थितियाँ, मानवता और भ्रष्ट स्वभाव—आओ जन्मजात स्थितियों के लिए कुछ विशिष्ट विषयवस्तुएँ सूचीबद्ध करें और उन पर एक-एक करके विस्तार से संगति करें। मानवता और भ्रष्ट स्वभावों के लिए हम उन्हें सूचीबद्ध नहीं करेंगे। जन्मजात स्थितियों की विशिष्ट विषयवस्तुओं और अभिव्यक्तियों पर संगति करते समय हम मानवता की कुछ अभिव्यक्तियों और भ्रष्ट स्वभावों के प्रकाशनों पर भी बात करेंगे। हमारे इन पर संगति करने पर तुम लोग यह पहचान सकते और अंतर कर सकते हो कि क्या वे जन्मजात स्थितियों से संबंधित हैं जिन्हें बदलने की जरूरत नहीं है या वे लोगों के चरित्र या उनके भ्रष्ट स्वभावों से संबंधित हैं जिन्हें सत्य की खोज के जरिये हल करने की जरूरत है। विशिष्ट उदाहरणों और मुद्दों का उपयोग करके विशिष्ट संगति में संलग्न होने से भेद स्पष्ट हो जाएँगे, है न? (हाँ।)

उदाहरण 1 : गरीबी में पलना-बढ़ना और अमीरी में पलना-बढ़ना

कुछ लोग गरीब परिवारों से आते हैं और आर्थिक रूप से वंचित होते हैं। वे तंगहाल रहते हैं; उनके पास हमेशा पैसे की कमी रहती है और उन्हें हर खर्च का हिसाब-किताब रखना पड़ता है और उसकी योजना बनानी पड़ती है। जब पैसे खर्च करने की बात आती है तो उनका तरीका हर पैसे को जितना हो सके मितव्ययिता से खर्च करना होता है। वे ऐसे परिवारों और ऐसी परिस्थितियों में पैदा हुए थे। हमने जिन तीन पहलुओं पर संगति की थी, उनमें से यह किसमें आता है? क्या यह जन्मजात स्थिति है, मानवता है या भ्रष्ट स्वभाव है? यह उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि का एक पहलू है, जो एक जन्मजात स्थिति है, है न? (हाँ।) क्या यह पारिवारिक पृष्ठभूमि अच्छी है या बुरी है? (मानवीय परिप्रेक्ष्य से यह बुरी है।) वे मुश्किल से गुजारा करते हैं, उनके परिवार दरिद्र होते हैं, उनकी आर्थिक स्थितियाँ समृद्ध या संपन्न नहीं होतीं—ये उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि से जुड़े मुद्दे हैं। हालाँकि ऐसा व्यक्ति एक गरीब परिवार में पैदा हुआ था, उसने कभी महँगा पकवान नहीं खाया, कभी ब्रांडेड कपड़े नहीं पहने, कभी विविध विलासिताओं का अनुभव नहीं किया और कभी किसी उच्च-स्तरीय चीज या किसी धनी या प्रसिद्ध व्यक्ति के संपर्क में नहीं आया, फिर भी उसमें जमीर और विवेक होता है। दूसरों से मिलने-जुलने पर वह कभी उनका फायदा नहीं उठाता। जब वह किसी को अच्छी चीजों का आनंद लेते हुए देखता है या किसी धनी व्यक्ति को देखता है तो हालाँकि वह ईर्ष्या महसूस करता है, फिर भी वह कभी दूसरों की संपत्ति चुराने या हड़पने के बारे में नहीं सोचता। ऐसे व्यक्ति का खुलासा किस पहलू से संबंधित है? (उसके चरित्र, उसकी मानवता से।) यह उसकी मानवता से संबंधित है। इस पहलू में उसकी मानवता की अभिव्यक्ति अच्छी है या बुरी? (उसकी मानवता अच्छी और खरी है।) इसे अभी भी खरा नहीं माना जा सकता; इसका मतलब सिर्फ इतना है कि वह छोटे-मोटे लाभों का फायदा नहीं उठाता और अमीरों की चापलूसी नहीं करता। वह ऐसे मामले सही तरीके से सँभालने में सक्षम है। ऐसे व्यक्ति की मानवता कैसी होती है? (उसकी मानवता अपेक्षाकृत अच्छी होती है।) यह एक वस्तुनिष्ठ कथन है; उसकी मानवता अपेक्षाकृत अच्छी होती है, जिसका अर्थ है कि अपने चरित्र के संदर्भ में उसमें अपेक्षाकृत सत्यनिष्ठा और गरिमा होती है। हालाँकि उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि गरीब होती है और कुलीन नहीं होती, फिर भी वह गरीबों से घृणा नहीं करता और अमीरों का पक्ष नहीं लेता, न ही वह दूसरों का फायदा उठाता है। एक और तरह का व्यक्ति होता है : वह एक अमीर परिवार में पैदा हुआ था, या जैसा कि अविश्वासी कहेंगे, “मुँह में चाँदी का चम्मच लेकर पैदा हुआ था।” उसे कभी भोजन या कपड़ों की चिंता नहीं करनी पड़ी और उसके लिए सब कुछ आसानी से उपलब्ध है; जो भी खाना वह खाना चाहता है वह उसे सुलभ है। उसकी पारिवारिक स्थितियाँ विशेष रूप से अच्छी हैं और उसके माता-पिता उसके साथ बहुत अच्छा व्यवहार करते हैं। यह किस पहलू से संबंधित है? (यह भी उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि से संबंधित है।) व्यक्ति की पारिवारिक पृष्ठभूमि एक जन्मजात स्थिति होती है। हालाँकि ऐसे व्यक्ति की पारिवारिक पृष्ठभूमि विशेष रूप से अच्छी होती है, उसकी आर्थिक स्थिति अच्छी होती है और उसे भोजन या कपड़ों की कोई चिंता नहीं होती, उसने अच्छी चीजें देखी होती हैं और दुनिया की हर सौगात का अनुभव किया होता है, फिर भी दूसरों से मिलने-जुलने पर अगर वह किसी ऐसे व्यक्ति को देखता है जो उससे बेहतर और ज्यादा सक्षम है या जो किसी क्षेत्र में उल्लेखनीय रूप से उत्कृष्ट है या लोगों के बीच प्रतिष्ठित है तो वह ईर्ष्या महसूस करता है और उसे नीचा दिखाने के तरीके सोचने में दिमाग खपाता है। ये अभिव्यक्तियाँ किस पहलू से संबंधित हैं? (मुझे लगता है कि ये भ्रष्ट स्वभावों और मानवता दोनों से संबंधित हैं।) यह सही है। ये अभिव्यक्तियाँ उसकी मानवता और उसके भ्रष्ट स्वभावों दोनों से संबंधित हैं। जब ऐसा व्यक्ति किसी को खुद से बेहतर देखता है तो वह ईर्ष्या, नफरत महसूस करता है और उसे दबाना, सताना और अलग करना चाहता है; वह उससे आगे निकलना चाहता है। अगर वह सिर्फ ये विचार रखता है लेकिन उन्हें अमल में नहीं लाता तो वह खराब मानवता वाला व्यक्ति है—क्या उसकी मानवता बुरी है? (हाँ।) अगर, इस बुरी मानवता के आधार पर, जब वह देखता है कि कोई व्यक्ति उससे बेहतर है तब वह इसे स्वीकार करने से इनकार करता है, उसके पीठ पीछे उसकी आलोचना करता है और उसे दबाने के लिए कुटिल चालें चलता है तो ये भ्रष्ट स्वभाव की विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ हैं। इस भ्रष्ट स्वभाव का सार क्या है? यह क्रूरता है। ये अभिव्यक्तियाँ मानवता और भ्रष्ट स्वभाव दोनों से संबंधित हैं। भले ही ऐसे व्यक्ति की पारिवारिक परिस्थितियाँ अच्छी हों और वह अच्छा खाता-पहनता हो और तुम उससे यह अपेक्षा कर सकते हो कि वह अंतर्दृष्टि से युक्त और दूसरों के प्रति सहिष्णु होगा, लेकिन लोगों से मिलते-जुलते समय वह हमेशा उनका फायदा उठाना चाहता है और हमेशा अत्यधिक हिसाब-किताब करता है। जब वह दूसरों के साथ कहीं बाहर जाता है तो वह तुच्छ बातों का हिसाब-किताब करता है कि किसने ज्यादा पैसे खर्च किए और किसने यात्रा का खर्च उठाया, वह एक भी अतिरिक्त पैसा खर्च करने को तैयार नहीं होता। दूसरों के साथ काम करते समय वह हमेशा यह हिसाब लगाता है कि किसने ज्यादा काम किया और किसने कम और हमेशा ढिलाई बरतने के तरीके सोचता है। यह किस पहलू से संबंधित है? (यह उसकी मानवता से संबंधित है।) मानवता के किस पहलू से? (स्वार्थ और नीचता से।) स्वार्थ और नीचता, दूसरों का फायदा उठाने की चाहत, सत्यनिष्ठा और गरिमा की कमी—यह उसके चरित्र से संबंधित है। लोगों के साथ मिलते-जुलते समय वह हिसाब-किताब करता है और दूसरों का फायदा उठाना पसंद करता है, भले ही उसे मिलने वाला फायदा धेले भर का ही क्यों न हो और वह फायदा उठाने के लिए हर अवसर की तलाश में रहता है। चाहे सार्वजनिक स्रोत हो या निजी स्रोत या युवा लोग हों या वृद्ध लोग, वह सभी का फायदा उठाता है। चाहे जो भी व्यक्ति हो, वह हिचकता नहीं और जब भी अवसर मिलता है, वह फायदा उठाता है। दूसरों के साथ मेल-जोल रखने में वह विशेष रूप से कठोर और हिसाब-किताब करने वाला होता है। उदाहरण के लिए, पिछली बार तुमने उससे कोई उपकार करने के लिए कहा था और अब उसे लगता है कि तुम उसके ऋणी हो। वह इसके बदले में तुमसे उपकार करवाने के लिए विशेष प्रयास करेगा और यह उपकार उसके द्वारा तुम पर किए गए उपकार से भी बड़ा होना चाहिए; तभी उसे लगेगा कि यह एक सही सौदा है। क्या यह अत्यधिक हिसाब-किताब करने वाला होना नहीं है? (हाँ, है।) यह अत्यधिक हिसाब-किताब करने वाला होना, दूसरों के साथ विशेष रूप से कठोर होना और बहुत ही षड्यंत्रकारी होना है। भले ही उसे खाने और कपड़े की दृष्टि से कोई कमी न हो और वह दूसरों की तुलना में हर तरह से बेहतर जीवन का आनंद लेता हो, फिर भी जब वह किसी व्यक्ति को ऐसी चीज के साथ देखता है जिसे उसने पहले न देखा हो तो वह उसका कुछ देर इस्तेमाल करके और उसे आजमाकर देखना चाहता है। उसे दूसरों के पास जो कुछ भी है उसे पाने की जरूरत महसूस होती है। अगर वह उसे नहीं मिलता तो वह अपने दिल में इस हद तक असहज और असंतुलित महसूस करता है कि उसकी भूख मर जाती है और वह सो भी नहीं पाता; उसके मिलने पर ही वह संतुष्ट महसूस करता है। यह किस तरह का मुद्दा है? (यह भी मानवता का ही मुद्दा है।) ये विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ उसकी मानवता के मुद्दे हैं, उसकी जन्मजात स्थितियों के नहीं। जन्मजात स्थितियाँ सिर्फ उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि और पारिवारिक परिस्थितियों को संदर्भित करती हैं जिनका वह आनंद ले सकता है, जबकि उसके आचरण करने और चीजों से निपटने के तरीके उसकी मानवता से संबंधित हैं। उसके प्रकाशन और अभिव्यक्तियाँ, जैसे कि उसके आचरण करने और चीजों से निपटने के तरीके के पीछे के उसके रवैये, तरीके और प्रेरणाएँ, उसके चरित्र के मुद्दे से संबंधित हैं; यह अभी भ्रष्ट स्वभावों के स्तर तक नहीं पहुँचता। वह स्वार्थी, कठोर, अत्यधिक हिसाब-किताब करने वाला, चालाकी करने वाला होता है और दूसरों का फायदा उठाना पसंद करता है—क्या ये अच्छी मानवता की अभिव्यक्तियाँ हैं या खराब मानवता की? (ये खराब मानवता की अभिव्यक्तियाँ हैं।) ये सब निम्न चरित्र और खराब मानवता की अभिव्यक्तियाँ हैं। क्या खराब मानवता की ये अभिव्यक्तियाँ दूसरों को दिखाई देती और महसूस होती हैं? (हाँ।)

उदाहरण 2 : अच्छी शक्ल-सूरत और उच्च शैक्षणिक योग्यताएँ

कुछ लोगों का चेहरा-मोहरा खूब तराशा हुआ होता है और वे सजीव और अभिव्यंजक दिखने वाली बड़ी, चमकदार और बुद्धिमान आँखों के साथ पैदा होते हैं। बचपन से ही वे काफी पसंद किए जाते रहे हैं। यह किस पहलू के अंतर्गत आता है? (यह उनके रूप-रंग से संबंधित है।) रूप-रंग जन्मजात स्थितियों से संबंधित है, है न? (हाँ।) बड़ी आँखें और तराशा हुआ चेहरा-मोहरा होना, जन्मजात रूप से आकर्षक दिखने का फायदा होना—क्या यह भ्रष्ट स्वभावों का एक पहलू है? (नहीं।) क्या यह मानवता के मुद्दों से संबंधित है? (नहीं, यह उससे भी संबंधित नहीं है।) यह मानवता या भ्रष्ट स्वभावों से संबंधित नहीं है, इसलिए कुछ भी बदलने की जरूरत नहीं है। जन्मजात स्थितियाँ नैसर्गिक होती हैं; वे इस रूप-रंग के साथ पैदा हुए थे और उन्होंने उसमें कोई कृत्रिम सुधार या फेरबदल नहीं करवाया। वे बस ऐसे ही हैं। हालाँकि वे प्राकृतिक रूप से आकर्षक होते हैं, लेकिन दैनिक जीवन में जटिल मुद्दों से निपटने में वे हमेशा उलझन में रहते हैं और नहीं जानते कि उन्हें कैसे सँभालें। उनमें लोगों, घटनाओं और चीजों का भेद पहचानने की क्षमता भी नहीं होती। वे इस बारे में स्पष्ट नहीं होते कि वे किसके साथ जुड़ सकते हैं और उन्हें किससे दूर रहना चाहिए। वे नहीं जानते कि कौन बुरा है और कौन-से संबंध मुसीबत ला सकते हैं। बीस-बाईस साल की उम्र में वे इन चीजों को नहीं जानते, यहाँ तक कि तीस या चालीस की उम्र में भी, जीवन के कुछ अनुभव होने के बावजूद, वे इन चीजों को नहीं जानते। हालाँकि उनकी बड़ी, अभिव्यंजक आँखें होती हैं, लेकिन उनका दिमाग काफी भ्रमित रहता है। यह किस तरह की समस्या है? (क्या यह उनकी जन्मजात काबिलियत की समस्या है?) उनकी जन्मजात काबिलियत बहुत अच्छी नहीं होती। दूसरों के साथ मिलते-जुलते समय और चीजों से निपटते समय वे कभी सिद्धांत नहीं खोज पाते और विभिन्न प्रकार के लोगों की असलियत नहीं जान पाते। उन्हें अक्सर दूसरों द्वारा धोखा दिया जाता है, ठगा जाता है और उनके साथ खिलवाड़ किया जाता है। ऐसे व्यक्ति की काबिलियत कैसी होती है? (उनकी काबिलियत अपेक्षाकृत खराब होती है।) उनकी काबिलियत अच्छी नहीं होती। अभिव्यंजक आँखें होने का यह मतलब होना जरूरी नहीं कि उनका दिमाग भी बुद्धिमत्तापूर्ण होगा। हालाँकि अपनी जन्मजात स्थिति की दृष्टि से उनका चेहरा-मोहरा अच्छा होता है लेकिन उनकी काबिलियत बहुत अच्छी नहीं होती। लेकिन एक बात है : अपने स्कूल के वर्षों के दौरान वे पाठ्यपुस्तकीय ज्ञान प्राप्त करने में उत्कृष्ट थे; वे साहित्य जल्दी याद कर सकते थे और गणित, भौतिकी और रासायनिकी या कोई नई भाषा सीखते समय वे विषय जल्दी समझ लेते थे। वे आसानी से विश्वविद्यालय में प्रवेश पा गए, स्नातकोत्तर डिग्री हासिल की और पीएचडी कर ली। यह किसमें आना चाहिए? क्या यह उनकी अच्छी काबिलियत में आ सकता है? (नहीं।) तो यह किसमें आता है? (यह उनकी खूबियों में आता है जो उनकी जन्मजात स्थिति है।) यह सही है। ऐसा व्यक्ति अध्ययन करने, ज्ञान प्राप्त करने और शैक्षिक विषयों में उत्कृष्ट होता है। वह पाठ्यपुस्तकीय ज्ञान और सैद्धांतिक और नियमों पर आधारित चीजें जल्दी समझ लेता है, जैसे कि पेशेवर कौशलों और प्रौद्योगिकी से संबंधित पहलू या गणित, भौतिकी और रासायनिकी के सूत्र और नियम, और उन्हें बहुत अच्छी तरह से याद कर लेता है। ऐसा व्यक्ति ये चीजें सीखने में उत्कृष्ट होता है और उसके पास इनके लिए एक खास हुनर होता है। वह उन्हें एक नजर में समझ सकता है और वह परीक्षाओं में और प्रश्नों के उत्तर देने में विशेष रूप से उत्कृष्ट प्रदर्शन करता है; जब प्रश्नों के उत्तर देने की बात आती है तो वह इसे आसानी से कर लेता है—यहाँ वह अपने मजबूत पक्षों को सबसे अच्छे तरीके से काम में ला सकता है। तुम कह सकते हो कि ऐसा व्यक्ति ज्ञान के सागर में सहज होता है। क्या ये अभिव्यक्तियाँ उसकी काबिलियत दर्शाती हैं? (नहीं।) ये सिर्फ यह दर्शाती हैं कि उसके पास एक विशेष खूबी है। ऐसा व्यक्ति ज्ञान के क्षेत्र में विशेष रूप से उत्कृष्ट प्रदर्शन करता है, जिससे लोगों को यह पता चलता है कि इस क्षेत्र में उसकी खूबी सबसे अलग है। चूँकि उसमें यह खूबी होती है और चूँकि उसने कुछ उपलब्धियाँ हासिल की होती हैं—स्नातकोत्तर और डॉक्टरेट की डिग्री प्राप्त की होती है और उच्च स्तर की शिक्षा प्राप्त की होती है—इसलिए अन्य लोगों के बीच वह खुद को ज्ञानी व्यक्ति, विद्वान और उच्च-स्तरीय बुद्धिजीवी समझता है। जितनी ज्यादा पुस्तकें वह पढ़ता है, उतना ही ज्यादा उसे लगता है कि वह एक प्रसिद्ध व्यक्ति, एक श्रेष्ठ व्यक्ति है और बाकी सभी साधारण हैं, अज्ञानी हैं, उसके मन को समझने या उसके मन की असलियत जानने में असमर्थ हैं और उसके समान स्तर के नहीं हैं। नतीजतन, वह अक्सर दूसरों से श्रेष्ठ महसूस करता है और खुद को खास और असाधारण समझता है। यह कौन-सी अभिव्यक्ति है? (एक भ्रष्ट स्वभाव।) भ्रष्ट स्वभावों का कौन-सा पहलू? (अहंकार।) उसका अहंकारी भ्रष्ट स्वभाव उसे उच्च स्तर की शिक्षा प्राप्त करने के बाद सभी वर्गों के लोगों और आम जनता को और भी ज्यादा नीचा दिखाने के लिए प्रेरित करता है। अपनी उच्च डिग्री और डिप्लोमा के कारण, परमेश्वर में विश्वास करने के बाद वह हमेशा कलीसिया में अपनी ही चलाना चाहता है और अगुआ बनने की आकांक्षा रखता है। हर बार जब चुनाव होता है तो वह चुने जाने की उम्मीद करता है। अगर वह चुना नहीं जाता तो नकारात्मक हो जाता है और निराश होकर हार मान लेता है। अगुआ और कार्यकर्ता जो कुछ भी कहें, वह उसे सुनना नहीं चाहता और उसका विरोध करना चाहता है। चाहे उसे जो भी कर्तव्य सौंपा जाए, वह उस सौंपे गए कार्य से घृणा करता है और पर्दे के पीछे आलोचना करता है। अपने दिल में वह सोचता है, “तुम्हें ज्यादा ज्ञान नहीं है। तुम्हारे शब्द तर्कहीन हैं। अपने दिल की गहराई में मैं तुम्हें एक कलीसियाई अगुआ के रूप में तुच्छ समझता हूँ। मैं तुम्हारे सामने झुकने से इनकार करता हूँ! ऐसा मत सोचो कि तुम मुझसे बेहतर हो। चलो तुलना करते हैं—देखते हैं कि कौन कितने पानी में है। चलो देखते हैं कि कौन परमेश्वर के वचन ज्यादा सुना सकता है और कौन ज्यादा समझ साझा कर सकता है। अगर तुम्हारी संगति मेरी संगति जितनी अच्छी नहीं है तो मैं तुम्हारे सामने झुकने से इनकार करता हूँ! भले ही तुम्हें अगुआ चुना गया हो, लेकिन मुझे तुम्हारे द्वारा मुझसे कही गई कोई भी बात सुनने, लागू करने या उसका पालन करने की जरूरत नहीं है!” यह किस तरह की अभिव्यक्ति है? (भ्रष्ट स्वभाव की।) यह भ्रष्ट स्वभाव का एक विशिष्ट प्रकाशन है। क्या यह मानवता से संबंधित है? चूँकि ऐसे व्यक्ति में एक प्राकृतिक खूबी होती है और उसके आधार पर वह विस्तृत अध्ययन करता है, बहुत ज्ञान प्राप्त करता है और सामाजिक रुतबा प्राप्त करता है, इसलिए वह दूसरों से श्रेष्ठ, अद्वितीय महसूस करता है और बाकी सबसे उच्च स्थिति से बोलना चाहता है और दबंगई से काम करना चाहता है; लोगों के बीच वह हमेशा अगुआई करने वाला बनना चाहता है, चाहता है कि लोग उसकी बात सुनें—क्या ऐसे व्यक्ति के जमीर और विवेक के साथ कोई समस्या होती है? (हाँ, होती है।) यह किस तरह की समस्या होती है? उसकी खूबी ने उसके लिए अध्ययन के जरिये उच्च स्तरीय शिक्षा प्राप्त करना बहुत आसान बना दिया। क्या यह खूबी अपने आप में एक समस्या है? क्या यह खूबी अपने आप में भ्रष्ट स्वभावों का एक पहलू है? क्या यह बुरी मानवता की अभिव्यक्ति है? (नहीं।) लेकिन चूँकि उसमें यह खूबी है, इसलिए उसने बहुत सारा ज्ञान प्राप्त किया और उच्च स्तर की शिक्षा प्राप्त की, जो समाज के मूल्यांकन और रुतबे की परिभाषा के अनुरूप है। इससे उसे यह विश्वास हो गया कि कलीसिया में उसी की चलनी चाहिए, लोगों के किसी भी समूह में उसे सर्वश्रेष्ठ और बाकी सभी से ऊपर होना चाहिए। क्या ऐसी मानवता में कोई विवेक होता है? क्या ऐसी मानवता अच्छी होती है? (उसकी मानवता अच्छी नहीं होती।) उसकी मानवता किस तरह से अच्छी नहीं होती? (उसमें विवेक और जमीर नहीं होता; वह हमेशा दूसरों से ऊपर रहना चाहता है।) हमेशा दूसरों से ऊपर रहने की चाहत रखना अंशतः भ्रष्ट स्वभाव के कारण होता है। दूसरे अर्थ में, मानवता के परिप्रेक्ष्य से, क्या यह कुछ हद तक बेशर्मी नहीं है? (हाँ, है।) परमेश्वर का घर समाज नहीं है। क्या परमेश्वर का घर अगुआओं का चुनाव करते समय शैक्षणिक योग्यताओं की तुलना करता है? (नहीं।) परमेश्वर का घर अगुआओं का चुनाव किस आधार पर करता है? यह सत्य सिद्धांतों पर आधारित होता है, है न? (हाँ।) परमेश्वर के घर में अगुआओं का चुनाव सत्य सिद्धांतों पर आधारित होता है, न कि इस बात पर कि किसके पास उच्च शैक्षिक योग्यताएँ हैं। क्या वे अगुआओं के चुनाव के सिद्धांत जानते हैं? वे जानते हैं, लेकिन वे इन सिद्धांतों को सिर्फ नौकरशाही बयान और सिद्धांत मानते हैं और नहीं जानते कि उनका दैनिक जीवन में कैसे अभ्यास किया जाए या उन्हें कैसे लागू किया जाए। वे लगातार यह विचार फैलाते हैं कि सिर्फ उच्च शैक्षिक योग्यता वाले लोगों में ही अच्छी काबिलियत होती है, वे ही सत्य समझ सकते हैं और दूसरों की अगुआई कर सकते हैं। चूँकि उनके पास उच्च शैक्षिक योग्यता, कुछ ज्ञान और सामाजिक रुतबा होता है, इसलिए वे यह सोचते हुए कि परमेश्वर का घर समाज की तरह ही काम करता है, अपने ज्ञान और उच्च शैक्षिक योग्यता का उपयोग परमेश्वर के घर में अंतिम निर्णय लेने के लिए पूँजी के रूप में करते हैं। वे परमेश्वर के घर में अगुआओं को चुनने के सिद्धांतों को लोगों को देखने और चीजों से निपटने के अपने तरीकों और सामाजिक हैसियत और रुतबे को लेकर अपने तरीकों, परिप्रेक्ष्यों और दृष्टिकोणों से बदलना चाहते हैं। क्या यह विवेक की कमी नहीं है? (हाँ, है।) विवेक की कमी का वर्णन करने का दूसरा तरीका क्या है? (बेशर्म होना।) सीधे शब्दों में कहें तो यह बेशर्मी है; इसे कहने का दूसरा तरीका यह है कि ऐसे व्यक्ति में बहुत कम तार्किकता होती है। देखो, हालाँकि उन्होंने तथाकथित उच्च शिक्षा प्राप्त की होती है और कई किताबें पढ़ी होती हैं, लेकिन उनमें से किसी भी किताब या किसी भी अध्यापक या शिक्षक ने उन्हें कभी नहीं सिखाया कि विवेक प्राप्त करने के लिए कैसे कार्य करना है। किताबों से बहुत-सी चीजें सीखने के बाद उन्हें लगता है कि उन्होंने पूँजी प्राप्त कर ली है और वे साधारण लोगों से श्रेष्ठ हैं। हालाँकि उनकी खूबी कोई नकारात्मक चीज नहीं है और वह एक जन्मजात स्थिति है, लेकिन यह खूबी आसानी से एक निश्चित परिणाम की ओर ले जा सकती है—यह उन्हें अहंकारी और दंभी बना देती है, उनका विवेक खो जाता है और वे ढिठाई से निर्लज्ज और बेशर्म बन जाते हैं। कई किताबें पढ़ने और बहुत सारा ज्ञान प्राप्त करने के बावजूद वे “शर्म” शब्द का अर्थ नहीं समझते। इसलिए कुछ शैक्षिक योग्यताएँ प्राप्त करने के बाद वे इसे हर जगह दिखावा करने के लिए पूँजी के रूप में इस्तेमाल करते हैं और इसका उपयोग परमेश्वर के घर में रुतबा प्राप्त करने और निर्णायक बात कहने के लिए करना चाहते हैं। वे सोचते हैं, “मेरे पास उच्च शैक्षिक योग्यताएँ हैं और मैं चीजें जल्दी सीख लेता हूँ, जिसका अर्थ है कि मुझमें अच्छी काबिलियत है। इतना ही नहीं, मैं बहुत ज्ञानी हूँ, मैंने बहुत दुनिया देखी है और मेरी बुद्धि तेज है, इसलिए मैं दूसरों की अगुआई करने के योग्य हूँ।” निहितार्थ यह होता है कि उनका ज्ञान और खूबी ही सत्य हैं। ये सब विवेक की कमी की अभिव्यक्तियाँ हैं। क्या ऐसे व्यक्ति में, जिसमें विवेक की कमी हो, ईमानदारी होती है? क्या उसमें गरिमा होती है? (नहीं।) ईमानदारी और गरिमा का अभाव—यह अच्छी मानवता की अभिव्यक्ति है या घृणित, नीच मानवता की? (यह घृणित मानवता की अभिव्यक्ति है।) ऐसे लोगों में अच्छी मानवता नहीं होती। वे अपनी शैक्षिक योग्यताओं, सामाजिक रुतबे, व्यक्तिगत मूल्य और हैसियत को सबसे ज्यादा सँजोते हैं। इन्हें अपनी पूँजी मानकर वे बहुत ही अहंकारी और दंभी हो जाते हैं और अपनी चलाना चाहते हैं। यह घृणित मानवता की अभिव्यक्ति है। इस मुद्दे में दो पहलू शामिल हैं : एक उनकी मानवता से संबंधित है और दूसरा उनके भ्रष्ट स्वभाव से। मुद्दों पर उनका परिप्रेक्ष्य और मुद्दे सँभालने में उनका रवैया और दृष्टिकोण उनकी मानवता से संबंधित होते हैं। ऐसी मानवता उन्हें विशिष्ट क्रियाकलाप, अभिव्यक्तियाँ और प्रकाशन विकसित करने की ओर ले जाती है, जो एक भ्रष्ट स्वभाव की अभिव्यक्तियाँ हैं।

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