सत्य का अनुसरण कैसे करें (4) भाग दो

उदाहरण 3 : अल्पभाषी दिखना

कुछ लोग स्वाभाविक रूप से बातूनी नहीं होते; छोटी उम्र से ही वे ज्यादा बोलना पसंद नहीं करते। दूसरों के साथ मिलते-जुलते समय वे सरल, कम समृद्ध भाषा में बात करते हैं और जब उनके साथ कई चीजें होती हैं तो उनके पास ज्यादा विचार नहीं होते, न ही उनके पास उन्हें व्यक्त करने के लिए ज्यादा शब्द होते हैं। अगर वे खुद को व्यक्त करते भी हैं तो यह बहुत सरल होता है। यह किस तरह की समस्या है? (यह उनके व्यक्तित्व से जुड़ी समस्या है।) यह उनके व्यक्तित्व की समस्या है, जो उनकी जन्मजात स्थितियों का हिस्सा है। उनका व्यक्तित्व प्राकृतिक रूप से अल्पभाषी होता है। वे सरल भाषा का इस्तेमाल करते हैं, उनके विचार बहुत जटिल नहीं होते और दूसरों के साथ मिलते-जुलते समय वे बोलने के प्रति अनिच्छुक होते हैं। जब सभाओं के दौरान सत्य पर संगति की जाती है तो वे सिर्फ दूसरों को बोलते हुए सुनते हैं और अगर वे दूसरों के बोलने के बाद एक सरल प्रतिक्रिया दे पाएँ तो यही काफी अच्छा है। अगर तुम उनसे पूछो, “इस बारे में तुम्हारी क्या समझ है?” तो वे कहेंगे, “मेरी समझ तुम्हारी समझ जैसी ही है।” अगर तुम उनसे विशिष्ट होने के लिए कहो तो वे बोलेंगे, “मैं भी तुम्हारी तरह ही सोचता हूँ,” और फिर उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं होता। यही उनका व्यक्तित्व होता है; अगर तुम उनसे और ज्यादा बोलने के लिए कहो तो उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं होता। यह उनकी जन्मजात स्थितियों का हिस्सा है। एक और तरह के व्यक्ति होते हैं, जिनके बारे में हालाँकि ऐसा प्रतीत होता है कि उनके पास कहने के लिए बहुत कुछ नहीं है और अक्सर वे बाहर से अल्पभाषी रहते हैं, फिर भी निजी तौर पर वे गपशप के बारे में पूछना पसंद करते हैं और इस तरह की चीजें कहते हैं : “फलाँ-फलाँ भाई या बहन कौन-से पास्टोरल क्षेत्र से है? मैंने सुना है कि वह आठ वर्षों से परमेश्वर में विश्वास कर रहा है—क्या वह कभी अगुआ रहा है? उसकी उम्र कितनी है? क्या यह सच है कि उसका तलाक हो गया है और उसका एक बच्चा है?” यह किस तरह की अभिव्यक्ति है? ऊपर से वे ज्यादा बात नहीं करते और सार्वजनिक स्थलों पर बोलना पसंद नहीं करते। उनकी भाषा बहुत समृद्ध नहीं होती और दूसरों के साथ सामान्य रूप से संवाद करने के लिए उनके पास शब्दों की कमी रहती है। लेकिन अन्य मामलों में उनके पास कहने के लिए बहुत कुछ होता है और वे हमेशा दूसरों के बारे में पूछताछ करना पसंद करते हैं और इस तरह की चीजें कहते हैं : “क्या उस व्यक्ति ने दोहरी पलकों की सर्जरी करवाई है? उसकी त्वचा बहुत गोरी है—क्या वह अक्सर ब्यूटी सैलून जाती है?” या “मैं देखता हूँ कि फलाँ व्यक्ति हमेशा लेटेस्ट कंप्यूटर इस्तेमाल करता है और उसके तमाम कपड़े नामी ब्रांड्स के और काफी महँगे होते हैं। क्या उसका परिवार संपन्न है? उसका परिवार किस तरह का व्यवसाय करता है? क्या उसके पिता एक अधिकारी हैं?” इन अभिव्यक्तियों में क्या समस्याएँ शामिल हैं? (इनमें उनकी मानवता से संबंधित समस्याएँ शामिल हैं।) गपशप के बारे में पूछना पसंद करना, तुच्छ व्यक्तिगत मामलों के बारे में जानकारी एकत्र करना और अन्य लोगों के मामलों के बारे में बातचीत करने का आनंद लेना—ये व्यक्ति की मानवता से संबंधित अभिव्यक्तियाँ हैं। क्या ये अभिव्यक्तियाँ अच्छी हैं? (नहीं।) ये किस तरह से अच्छी नहीं हैं? इनमें मानवता की कौन-सी समस्याएँ हैं? इन्होंने किसी को नुकसान नहीं पहुँचाया या सताया नहीं, न ही इन्होंने दूसरों के हितों को ठेस पहुँचाई, फिर इन अभिव्यक्तियों को बुरा क्यों माना जाता है? (वे हमेशा दूसरों के मामलों के बारे में जानना चाहते हैं, लगातार दूसरों की पीठ पीछे उनके कामों में ताक-झाँक करते रहते हैं। उनकी मानवता के विवेक में समस्या होती है।) यह उनकी मानवता के विवेक से संबंधित है। अगर वे स्पष्ट रूप से और सीधे पूछें, उदाहरण के लिए, “भाई फलाँ-फलाँ, तुम्हारी उम्र कितनी है?” तो क्या यह मानवता की सामान्य अभिव्यक्ति होगी? (हाँ।) क्या इस तरह से पूछना खुला और ईमानदारी से भरा नहीं है? क्या यह उचित नहीं है? (हाँ, है।) तो कुछ लोग संबंधित लोगों से सीधे सवाल क्यों नहीं पूछते या सीधे कुछ क्यों नहीं कहते? वे दूसरों की पीठ पीछे संदिग्ध चालें क्यों चलते हैं? अगर किसी विषय पर व्यक्तिगत रूप से पूछा जा सकता है या चर्चा की जा सकती है तो उसे खुले तौर पर सामने लाया जाना चाहिए। दूसरों की पीठ पीछे रहस्य क्यों फुसफुसाए जाएँ? क्या इसमें आचरण करने और चीजों से निपटने का एक निश्चित रवैया और तरीका शामिल नहीं है? क्या यह रवैया और तरीका अच्छा है? (नहीं।) इस रवैये और तरीके को अच्छा क्यों नहीं माना जाता? क्या ये लोग जो गुप्त रूप से चीजों के बारे में पूछताछ करना पसंद करते हैं, दूसरों की निजता की खोजबीन करने और लोगों की पीठ पीछे उनकी पड़ताल करने में आनंद लेते हैं? (हाँ।) वे लोगों की पीठ पीछे उनकी पड़ताल करना पसंद क्यों करते हैं? अगर उनके पास सवाल हैं तो वे सीधे क्यों नहीं पूछते? क्या आमने-सामने पूछने में कोई कठिनाई है? उन्हें लगता है कि सीधे पूछना आसान या संभव नहीं है, इसलिए वे दूसरों की पीठ पीछे पूछताछ करते हैं। क्या उनके इस तरह से व्यवहार करने का यही कारण नहीं है? (हाँ।) असल में कुछ चीजें सीधे पूछी जा सकती हैं, जैसे किसी व्यक्ति से ऐसे सवाल पूछना : “तुम कितने सालों से परमेश्वर में विश्वास कर रहे हो? क्या तुमने कॉलेज में पढ़ाई की है? तुम्हारी शिक्षा का स्तर क्या है? तुम्हारी उम्र क्या है?” ये तमाम सवाल आमने-सामने पूछे जा सकते हैं। अगर कुछ लोग तुम्हें बताने के लिए तैयार न हों तो मत पूछो और उनकी पीठ पीछे पूछताछ मत करो। अगर तुम्हें लगता है कि वे तुम्हारे साथ कुछ चीजें साझा करने के लिए तैयार होंगे या अगर तुम दोनों एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते हो और वे तुम पर इतना भरोसा करते हैं कि तुमसे बात कर सकते हैं तो तुम लोग उनसे सीधे पूछ सकते हो। उनकी पीठ पीछे पूछताछ करने के लिए इधर-उधर भटकने पर जोर क्यों दिया जाए? क्या यह वाकई जरूरी है? क्या यह काफी नीचतापूर्ण नहीं लगता? ये लोग सीधे पूछने की हिम्मत इसलिए नहीं करते, क्योंकि वे डरते हैं कि सामने वाला उन्हें नहीं बताएगा। लेकिन वे इन चीजों के बारे में दृढ़तापूर्वक जानना और पता लगाना चाहते हैं। अगर उन्हें पता नहीं लगता तो वे बेचैन महसूस करेंगे, लेकिन जब उन्हें जानकारी मिल जाती है तो वे अंदर से सहज महसूस करते हैं, मानो उन्हें कोई अनमोल खजाना मिल गया हो। वे किस तरह के लोग हैं? दूसरों के निजी मामलों या व्यक्तिगत जानकारी के बारे में पूछताछ करने और उसे समझने में आनंद लेना—ऐसे लोग गपशप करने और दूसरों की आलोचना करने में प्रवृत्त होते हैं, है न? (हाँ।) अगर तुम्हें लगता है कि दूसरा व्यक्ति तुम्हारे सवालों का जवाब देने के लिए तैयार होगा तो तुम उससे सीधे पूछ सकते हो और इन चीजों के बारे में पता लगा सकते हो। अगर दूसरे व्यक्ति को लगता है कि तुम्हारे कुछ सवाल अतिरेकी हैं और तुम्हारे पूछने की सीमा से परे हैं और वे तुम्हें जवाब देने से इनकार करते हैं तो कोई बात नहीं। अगर वे तुम्हें जवाब नहीं देना चाहते या नहीं चाहते कि तुम कुछ चीजें जानो तो उनकी पीठ पीछे भी पूछताछ मत करो। अगर तुम किसी अन्य व्यक्ति की जानकारी या उसके निजी मामले जानने पर जोर देते हो तो एक ओर वह तुम्हें संदेह की दृष्टि से देखना शुरू कर देगा : “तुम ये चीजें क्यों जानना चाहते हो? तुम मेरी पीठ पीछे मेरे बारे में जानने की कोशिश क्यों कर रहे हो? क्या तुम मुझे नियंत्रित करना, सताना या मेरे साथ विश्वासघात करना चाहते हो?” यह एक पहलू है। दूसरी ओर तुम्हें दूसरों के बारे में जानने की जरूरत क्या है? उनके बारे में जानने का तुम्हें क्या अधिकार है? क्या तुम हर किसी के बारे में जानकारी इकट्ठी करना चाहते हो? तुम्हें हर चीज के बारे में जानना है—क्या तुम जानकारी इकट्ठी करने में विशेषज्ञ हो? क्या यह तुम्हारा काम है? परमेश्वर के घर ने किसी को ऐसा काम नहीं सौंपा है। अगर तुम लगातार दूसरों के निजी मामलों के बारे में पूछताछ करने की कोशिश करते हो, उन चीजों के बारे में पूछताछ करते हो जिन्हें वे नहीं चाहते कि तुम जानो, तो इससे वे तुम्हें बहुत चिढ़ पैदा करने वाला पाते हैं। जिस किसी को दूसरे लोग चिढ़ पैदा करने वाला पाते हैं, उसकी मानवता कैसी होती है? कम से कम यह व्यक्ति बेशर्म होता है। गैर-विश्वासी ऐसे व्यक्ति को क्या कहते हैं? ढीठ बदमाश। उनकी मानवता नीच होती है, उनमें गरिमा नहीं होती और वे अनुचित आचरण करते हुए हर चीज के बारे में पूछताछ करना चाहते हैं। क्या वे ऐसे ही नहीं होते? (हाँ।) ऐसे व्यक्ति की मानवता अच्छी होती है या बुरी? (उसकी मानवता बुरी होती है।) उनकी मानवता, कम से कम, अच्छी नहीं होती। यह अच्छी मानवता न होने की श्रेणी के अंतर्गत एक अभिव्यक्ति है—अनुचित तरीके से व्यवहार करना और हमेशा संदिग्ध चालें चलना। ऊपर से वे तुम्हारे प्रति विनम्र, सम्मानप्रद और शालीन लगते हैं, अपने आचरण में शिष्ट और उचित प्रतीत होते हैं। लेकिन तुम्हारी पीठ पीछे वे संदिग्ध चालें चलते हैं, तुम्हारी उम्र, पारिवारिक पृष्ठभूमि और तुम्हारे अन्य पहलुओं के बारे में खुलकर चर्चा करने या तुमसे सीधे पूछने के बजाय पूछताछ करते हैं। दूसरों के साथ मिलते-जुलते समय या बातचीत करते समय वे स्पष्टवादी या सीधे नहीं होते; इसके बजाय वे हमेशा लोगों की पीठ पीछे संदिग्ध चालें चलते हैं, ऐसी चीजें करते हैं जो उजाले में आने लायक नहीं हैं। वे लगातार दूसरों के निजी मामलों पर और इस बात पर विचार करते रहते हैं कि वे क्या सोच रहे हैं, वे हमेशा ऐसे मामलों में तल्लीन रहते हैं। ऐसे लोगों की मानवता अच्छी नहीं होती और किसी भी समूह में ऐसे लोग सभी के द्वारा नापसंद किए जाते हैं। ऐसा नहीं है कि लोग नहीं चाहते कि तुम निजी चीजें जानो या वे तुमसे कुछ छिपा रहे होते हैं; बात यह है कि तुम्हारी मानवता और आचरण करने और चीजों से निपटने का तुम्हारा तरीका दूसरों को तुम्हें नापसंद करने के लिए बाध्य करता है। लोगों के तुम्हें नापसंद करने का कारण यह है कि आचरण करने और चीजों से निपटने का तुम्हारा तरीका कुछ हद तक घटिया होता है; तुम जो तरकीबें इस्तेमाल करते हो वे उचित और पारदर्शी होने के बजाय निम्न और घटिया होती हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ लोगों को दूसरों के साथ आमने-सामने बातचीत करने में कोई समस्या नहीं होती, लेकिन उनकी पीठ पीछे वे हमेशा लुक छिपकर काम करते हैं। जब दूसरे लोग चले जाते हैं तो वे जल्दी से उनके कंप्यूटर खोलकर यह देखते हैं कि वे किससे बात कर रहे थे, उन्होंने किस बारे में बात की, उन्होंने अपनी डायरी में क्या लिखा है और उनके पास कौन-सी अंतर्दृष्टियाँ हैं। कभी-कभी जब किसी व्यक्ति के कंप्यूटर में पासवर्ड लगा होता है तो वे यह कहकर उसे फुसलाने की कोशिश करते हैं, “क्या तुमने अपना कंप्यूटर पासवर्ड बदल लिया है? मैंने अभी-अभी अपना पासवर्ड बदलकर 1234567 किया है, शायद तुम्हें भी अपना पासवर्ड बदल लेना चाहिए।” ऐसा कहने का क्या उद्देश्य है? “मैं तुम्हें अपना पासवर्ड बता रहा हूँ—तुम्हें भी अपना पासवर्ड मुझे बताना चाहिए, ताकि मुझे तुम्हारा कंप्यूटर जाँचने का मौका मिल सके।” यहाँ तक कि कुछ लोग दूसरों के बैग और सामान की तलाशी लेने का दुस्साहस भी करते हैं, जब वे आसपास नहीं होते। उदाहरण के लिए, अगर वे किसी को नए हेडफोन पहने हुए देखते हैं और जानना चाहते हैं कि उसकी ध्वनि की गुणवत्ता कैसी है, तो वे उस व्यक्ति के आसपास न होने पर वे हेडफोन लेकर सुनने का दुस्साहस कर सकते हैं। अगर तुम खुले तौर पर उस व्यक्ति के हेडफोन उधार माँगते हो और वह सहमत हो जाता है तो तुम उसे साधिकार जाँच सकते हो। अगर वह सहमत न हो तो तुम्हें उसे नहीं जाँचना चाहिए। क्या यह इसे सँभालने का उचित तरीका नहीं है? चाहे दूसरे लोग सहमत हों या नहीं, तुम्हें चीजें खुलकर उनके सामने सँभालनी चाहिए, उनकी पीठ पीछे नहीं। इस तरह का व्यक्ति यह कर ही नहीं सकता—वह हमेशा संदिग्ध चालें ही चलता है। किस हद तक? जैसे ही तुम वहाँ से जाते हो, वह तुरंत तुम्हारी चीजें खँगालता है, आध्यात्मिक भक्ति नोट्स में तुमने जो लिखा होता है उसे देखता है और इस डर से कि कहीं कुछ छूट न जाए, जल्दी से उसे कॉपी कर लेता है। ऊपर से वह सत्य के लिए लालायित दिखता है, लेकिन पर्दे के पीछे उसकी हरकतें घटिया होती हैं। जब वह तुम्हें नया कंप्यूटर खरीदते देखता है तो उसे जलन होती है। बाहरी तौर पर वह कहता है कि नया कंप्यूटर बढ़िया और तेज है, लेकिन अंदरूनी तौर पर वह सोचता है, “तेज? काश यह किसी दिन खराब हो जाए!” एक दिन तुम जिक्र करते हो कि नया कंप्यूटर ठीक से काम नहीं कर रहा और धीमा है, और वे चोरी-छिपे प्रफुल्लित महसूस करते हैं : “तुम्हें नया कंप्यूटर इस्तेमाल करने की सही सजा मिली है! मैंने अभी तक इसका इस्तेमाल नहीं किया है, इसलिए बेहतर है कि तुम भी इसका इस्तेमाल न कर पाओ!” उनका दिमाग नीच, घटिया विचारों से भरा रहता है जो उजाले में आने लायक नहीं हैं। कुछ लोग देखते हैं कि किसी व्यक्ति के पास अच्छा दिखने वाला कपड़ा है और वे भी उसे पहनकर देखना चाहते हैं। लेकिन सीधे पूछने के बजाय उन्हें बस उस व्यक्ति के आसपास न होने के अवसर का इंतजार करना होता है ताकि वे उसे चोरी-छिपे पहन सकें। वे खुद को आईने में देखते हैं, सोचते हैं कि वे बहुत अच्छे लग रहे हैं, लेकिन जैसे ही वे उस व्यक्ति के लौटने की पदचाप सुनते हैं, वैसे ही वे जल्दी से उसे उतार देते हैं और वापस उसकी जगह पर रख देते हैं। हालाँकि शायद ऐसे व्यक्ति की संदिग्ध चालबाजियों और चीजें सँभालने के उसके तरीकों में भ्रष्ट स्वभाव शामिल न हो या वे भ्रष्ट स्वभाव जितने गंभीर न हों, लेकिन आचरण करने और चीजों से निपटने के प्रति उसका रवैया और लोगों के साथ उसका व्यवहार काफी अरुचिकर और घृणास्पद होता है और यह किसी न किसी स्तर पर दूसरों के सामान्य जीवन को प्रभावित करता है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि ऐसे व्यक्ति की मानवता के साथ गंभीर समस्याएँ होती हैं। कितनी गंभीर? वह आचरण करने में अनुचित होता है, पर्दे के पीछे कई संदिग्ध चालें चलता है और समस्याओं से निपटने का उसका तरीका घटिया और गंदा होता है। वह हमेशा छिपा रहता है; वह कभी खुलेआम कुछ नहीं करता और हमेशा लोगों की पीठ पीछे काम करता है। जब दूसरे लोग आसपास नहीं होते, ध्यान नहीं दे रहे होते या जब कोई देख या पकड़ नहीं सकता कि वह क्या कर रहा है, तब वह गुप्त रूप से काम करता है। ऐसे व्यक्ति की मानवता अच्छी नहीं होती। वह हमेशा अँधेरे कोनों में रहता है, अँधेरे के वातावरण में लिपटा रहता है, प्रकाश या अन्य लोगों का सामना करने में असमर्थ होता है। उसकी मानवता नीच और घटिया होती है। क्या उसकी नीच मानवता की ये अभिव्यक्तियाँ स्वतः प्रवृत्त होती हैं? (नहीं।) वह दूसरों के सामने काम करने में शर्मिंदगी महसूस करता है; वह उन्हें उनकी पीठ पीछे करना पसंद करता है और दूसरों की पीठ पीछे काम करते समय वह किसी तरह का संयम नहीं दिखाता। क्या इसका उसके व्यक्तित्व से कोई लेना-देना है? (नहीं।) अगर तुम कहते हो कि ये संदिग्ध चालें या जो वह अपनी मानवता में प्रकट करता और जीता है वह भ्रष्ट स्वभाव के एक निश्चित पहलू से संबंधित होता है, तो यह सटीक नहीं होगा। लेकिन उसकी संदिग्ध चालें निरंतर चलती रहती हैं। ऊपरी तौर पर ऐसा लगता है कि उसने कोई बड़ी गलती नहीं की है और जब कलीसिया उसे कोई कर्तव्य सौंपती है तो ज्यादातर समय वह अपना दिल लगाकर काम करता है और आज्ञाकारी रहता है; बाहर से देखने में वह काफी उचित भी लगता है। लेकिन पर्दे के पीछे एक अलग ही कहानी रहती है—चूहे की तरह, जैसे ही कोई नहीं देख रहा होता, वह संदिग्ध चालें चलना शुरू कर देता है और चीजों को अंजाम देने लगता है। क्या ये लोग चूहों जैसे नहीं होते? इसके बारे में सोचो—अगर उनकी मानवता ऐसी है और दूसरों से मिलने-जुलने और चीजों से निपटने का उनका तरीका ऐसा है, अगर उनकी मानवता का नैतिक चरित्र ऐसा है और उनका मानवता सार ऐसा है, तो वे परमेश्वर और सत्य के साथ कैसे पेश आते हैं? क्या वे परमेश्वर और सत्य के साथ वैसे ही पेश आते हैं जैसे वे लोगों के साथ पेश आते हैं? (हाँ।) वे पर्दे के पीछे संदिग्ध चालें भी चलते हैं, है न? वे अगुआओं और कार्यकर्ताओं की निगरानी से बचने की हर संभव कोशिश करते हैं, उनके सामने एक तरह से पेश आते हैं और उनकी पीठ पीछे दूसरी तरह से। वे परमेश्वर की जाँच-पड़ताल नहीं स्वीकारते, न ही वे अपने दिल की गहराइयों में सत्य स्वीकारते हैं। चाहे परमेश्वर के वचन कुछ भी कहें, वे उनके साथ अपने ही तरीके से पेश आते हैं, कुछ संदिग्ध चालें चलते हैं और दिखावे के लिए कुछ चीजें करते हैं, ताकि बाहरी तौर पर कोई उनकी किसी समस्या या गलत कृत्यों को न देख सके। बाहरी तौर पर वे कुछ भी गलत करते प्रतीत नहीं होते और सत्य का अभ्यास करते दिखते हैं, लेकिन पर्दे के पीछे वे पहले ही अपनी संदिग्ध चालें चल चुके होते हैं और गलत काम पहले ही गुप्त रूप से बिना किसी को पता चले किए जा चुके होते हैं। वे परमेश्वर की जाँच-पड़ताल पर विश्वास नहीं करते या उसे स्वीकार नहीं करते और इसलिए वे सत्य नहीं स्वीकारते। इसमें क्या शामिल है? इसमें भ्रष्ट स्वभाव शामिल हैं। जब वे परमेश्वर, सत्य और अपने कर्तव्य के साथ ऐसी मानवता से और दूसरों के साथ बातचीत करने और चीजों से निपटने के इस तरीके से पेश आते हैं तो अपनी मानवता की जो विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ वे प्रकट करते हैं, उनमें भ्रष्ट स्वभाव शामिल होते हैं। इन भ्रष्ट स्वभावों में क्या शामिल होता है? कम से कम, उनमें धोखेबाज़ी शामिल होती है। अगर उनके क्रियाकलाप और ज्यादा गुप्त और धोखे से भरे हुए होते हैं तो इसमें क्या शामिल होता है? (यह दुष्टता की ओर बढ़ जाता है।) इसमें उनके भ्रष्ट स्वभावों के भीतर की धोखेबाज़ी और दुष्टता शामिल होती है। इसके अलावा, अपने दिलों की गहराई में वे हमेशा सत्य और परमेश्वर की जाँच-पड़ताल के बारे में संदेह रखते हैं। यह उनमें गहराई से समाया होता है। वे सोचते हैं, “कोई नहीं जानता कि मैं पर्दे के पीछे क्या करता हूँ। मैंने परमेश्वर को कहीं नहीं देखा है, इसलिए निश्चित रूप से परमेश्वर भी नहीं जानता—सिर्फ मैं जानता हूँ।” क्या इसमें भी भ्रष्ट स्वभाव शामिल नहीं है? भ्रष्ट स्वभावों के किस पहलू से इसका संबंध है? (क्या यह हठधर्मिता है?) उनके भीतर हठधर्मी स्वभाव अवश्य होता है। तो क्या इन विचारों का सार सत्य से विमुखता है? (हाँ।) सत्य के प्रति उनका रवैया प्रतिरोध और विरोध का होता है। हठधर्मी होने के अलावा वे सत्य से विशेष रूप से विमुख होते हैं, जो इसे एक गंभीर मुद्दा बनाता है। जब इसमें भ्रष्ट स्वभाव शामिल हो जाता है तो यह सिर्फ खराब मानवता से ज्यादा गंभीर हो जाता है। इसमें परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह, परमेश्वर का विरोध और सत्य के विरुद्ध जाने का सार शामिल होता है। इसमें परमेश्वर और सत्य के प्रति व्यक्ति का रवैया शामिल होता है। जब इसमें भ्रष्ट स्वभाव शामिल हो जाता है तो इसमें सत्य सिद्धांत शामिल होते हैं और सत्य से भ्रष्ट स्वभाव हल करने की जरूरत होती है।

उदाहरण 4 : बाहरी दिखावे की परवाह करना

कुछ लोग स्वाभाविक रूप से लंबे होते हैं और उनका शरीर सुघड़ होता है, इतना ही नहीं, उनके सुडौल, साफ-सुथरे, परिष्कृत नैन-नक्श होते हैं जो दूसरों को दिलकश लगते हैं। वे जो पहनते हैं, लोग उसकी यह कहते हुए प्रशंसा करते हैं, “वे वाकई किसी पत्रिका के चलते-फिरते विज्ञापन जैसे हैं—कितने सुंदर, कितने खूबसूरत, कितने शानदार!” यह उनकी जन्मजात स्थितियों के अंतर्गत आता है या उनकी मानवता या उनके भ्रष्ट स्वभावों के अंतर्गत? (यह उनका प्राकृतिक रूप होता है।) वे अच्छे चेहरे-मोहरे के साथ पैदा हुए थे। चूँकि वे प्राकृतिक रूप से आकर्षक होते हैं और उनका शरीर अच्छा होता है, इसलिए छोटी उम्र से ही उनके बड़े-बुजुर्ग उनकी प्रशंसा करते रहे, उनके सहपाठी उनसे ईर्ष्या करते रहे और उनके माता-पिता उन पर विशेष रूप से प्यार लुटाते रहे। हर रोज उनके माता-पिता उन्हें सजाकर रखते और उनके तीन या पाँच साल के होने से पहले एक दिन उन्हें छोटी लड़की के कपड़े पहनाए जाते और अगले दिन छोटे लड़के के। संक्षेप में, उनसे एक प्यारे-से छोटे-से खिलौने की तरह दुलार किया जाता था। जैसे-जैसे वे बड़े होते हैं, उन्हें अच्छा दिखने का विशेष शौक हो जाता है। आधुनिक, विशेषाधिकार प्राप्त जीवन-परिवेश में पले-बढ़े वे सजने-धजने की आदत पाल लेते हैं। विशेष रूप से विविध तरह के फैशन के बारे में अंतर्दृष्टि हासिल करने के बाद वे रंगों, पोशाकों और शैलियों का मिलान करने का आनंद लेना शुरू कर देते हैं; वे विशेष रूप से रुचिकर ढंग से कपड़े पहनते हैं, एक परिष्कृत चाल-ढाल दिखाते हैं। यहाँ तक कि एक साधारण टी-शर्ट और जींस भी उन पर अलग दिखते हैं और सामंजस्यपूर्ण रंगों के जूतों के साथ इनका मेल बिठाने पर उनकी शैली और भी प्रभावशाली हो जाती है—वे एकदम शानदार और अविश्वसनीय रूप से सुंदर होते हैं। उन्हें देखना आँखों के लिए एक सुखद अनुभव होता है। जब भी वे सार्वजनिक स्थानों या सड़कों पर दिखाई देते हैं तो वे निश्चित रूप से बहुत लोगों का ध्यान आकर्षित करते हैं। चूँकि वे अच्छे रूप-रंग के साथ पैदा हुए थे और उनमें यह जन्मजात स्थिति है और वे अच्छे कपड़े पहनना जानते हैं, चाहे जैसे भी कपड़े पहनें, एक विशेष रूप से परिष्कृत चाल-ढाल दिखाते हैं, इसलिए समान और विपरीत दोनों लिंगों के व्यक्ति उनके साथ बातचीत करने और जुड़ने का विशेष रूप से आनंद लेते हैं। लोग उनके साथ बैठकर बातचीत और गपशप करने और उनके साथ निकटता से मिलने-जुलने के लिए उत्सुक रहते हैं ताकि उनकी सुंदरता उन्हें आनंदित कर सके। क्या यह उनकी गलती है? (नहीं।) उनकी अनुकूल जन्मजात स्थिति के कारण लोग हमेशा उनके साथ हो सकने वाली किन्हीं समस्याओं, खामियों या दोषों के प्रति सहनशील रहते हैं। इस तरह, वे जहाँ भी जाते हैं वहाँ उनका विशेष रूप से स्वागत किया जाता है और वे लोकप्रिय होते हैं। यहाँ तक कि अगर वे कुछ अप्रिय कहें तो भी दूसरों को इसे सुनने में आनंद आता है। जब उनका गुस्सा भड़कता है या वे कोई रवैया अपनाते हैं तो लोग बुरा नहीं मानते या नाराज नहीं होते—वे उसे उनके द्वारा दिया गया इनाम तक समझते हैं। जैसे-जैसे ये अनुभव इकट्ठे होते हैं, उनकी जन्मजात स्थिति उन्हें श्रेष्ठता का एहसास कराती है। वे सोचने लगते हैं, “सुंदर दिखना, एक परिष्कृत चाल-ढाल होना और अच्छे कपड़े पहनना मुझे जहाँ भी जाता हूँ लोकप्रिय बनाता है—यह शानदार है! यह समाज, यह मानवजाति वास्तव में इसे महत्व देती है। ऐसा लगता है कि मेरे माता-पिता ने मुझे जो यह जन्मजात स्थिति दी है, यह मेरी पूँजी है। नौकरी पाना आसान है और परीक्षा के दौरान अगर मैं किसी के पेपर से नकल करना चाहूँ तो मुझे बस उसे एक नजर देखने की जरूरत है और वह मुझे नक़ल करने देगा।” विपरीत लिंग के कई लोग उनका पीछा करते हैं और समान लिंग के लोगों में भी कई ऐसे होते हैं जो उनके साथ अच्छी तरह से पेश आते हैं और लगातार उनकी सुंदरता और अच्छे नैन-नक्श की प्रशंसा करते हैं। समय के साथ वे इस लाभ का ज्यादा से ज्यादा आनंद लेने लगते हैं। यह लाभ उन्हें कई सुविधाएँ, कई फायदे और बहुत सारे तरजीही व्यवहार दिलवाता है, जिससे वे कई चीजों का आनंद ले पाते हैं। इसलिए ऐसे माहौल में वे अपने लिए कुछ मानक विकसित कर लेते हैं। वे बिना मेकअप किए घर से बाहर नहीं निकलते और अगर उन्हें एक मुँहासा भी हो जाए तो वे उसे लोगों को दिखाने की हिम्मत नहीं करते। वे अपने खान-पान को लेकर सतर्क रहते हैं, मसालेदार भोजन और सोया सॉस से परहेज करते हैं और मन ही मन चिंतित होते हैं : “यह मुँहासा कब जाएगा? मैं इसे फोड़ नहीं सकता—मुझे डर है कि इससे निशान पड़ जाएगा। लेकिन अगर मैं इसे नहीं फोड़ता तो विपरीत लिंग के सदस्य जो कभी मेरी प्रशंसा करते थे, क्या इसे देखकर सोचेंगे नहीं कि मैं अब आकर्षक नहीं रहा, अब उनके सपनों का व्यक्ति नहीं रहा? क्या वे मेरे प्रति उदासीन होना शुरू कर देंगे? मुझे क्या करना चाहिए? मुझे लगता है कि मुझे बाहर जाने से पहले मुँहासा ठीक होने तक इंतजार करना होगा। मैं लोगों को मुझे इस हालत में देखने बिल्कुल नहीं दे सकता; इससे उनके दिमाग में मौजूद मेरी उत्तम छवि नष्ट हो जाएगी।” कुछ लोगों को अपने कपड़ों के रंग, फिटिंग और स्टाइल एकदम सही से मैच करने होते हैं। बाहर जाने से पहले उन्हें शीशे में खुद को हर कोण से देखना पड़ता है और कुछ तो यह सुनिश्चित करने के लिए सेल्फी भी लेते हैं कि वे धूप या कृत्रिम रोशनी में बिल्कुल सही दिखें, वे यह सुनिश्चित करते हैं कि उनकी त्वचा, रंग, हेयर-स्टाइल, कपड़े और चाल-ढाल जैसे पहलू आँखों को दिलकश लगें और दूसरों का अनुराग आकर्षित करें, उसके बाद ही वे बाहर जाने के लिए तैयार महसूस करते हैं। कर्तव्य शुरू करने के बाद भी वे यही जीवनशैली बनाए रखते हैं। अगर विशेष परिस्थितियों के कारण वे उस दिन नहाए न हों और विपरीत लिंग का कोई व्यक्ति उनके पास आता है तो वे तुरंत उससे दूर हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि अगर वे नहाए नहीं हैं तो वे देखे जाने लायक नहीं हैं। चूँकि अपने रूप और चाल-ढाल को लेकर उनकी बहुत-सी अपेक्षाएँ होती हैं, इसलिए इससे उनका दैनिक जीवन प्रभावित होता है। अगर वे किसी ऐसी जगह जाते हैं जहाँ वे नहा नहीं सकते तो वे बहुत परेशान और पीड़ित महसूस करते हैं और ठीक से खा या सो नहीं पाते। वे सोचते हैं, “अगर मैं नहा नहीं पाया तो क्या करूँगा? मैं तीन दिन से ज्यादा बिना नहाए कभी नहीं रहा हूँ। अगर मुझसे बदबू आने लगी तो क्या लोग मुझे नीची निगाह से देखेंगे? क्या मेरी छवि उत्तम नहीं रहेगी? क्या मैं अब दूसरों के सपनों का व्यक्ति नहीं रहूँगा? मुझे क्या करना चाहिए?” अगर वे खुद को ऐसी जगह पाते हैं, जहाँ रहने की स्थितियाँ खराब हों और भोजन पर्याप्त पौष्टिक या संतुलित न हो तो वे चिंता करने लगते हैं : “क्या इससे मेरी त्वचा प्रभावित होगी? क्या मेरी त्वचा रूखी या बूढ़ी हो जाएगी? क्या मेरी त्वचा पर झुर्रियाँ पड़ जाएँगी? मैं इस जगह पर नहीं रह सकता—मुझे यहाँ से चले जाना चाहिए!” उनकी जन्मजात स्थिति से उत्पन्न श्रेष्ठता का भाव उनके जीवन को विशेष रूप से जटिल बना देता है, जिससे वे विशेष रूप से थकाऊ और संयमित तरीके से जीने लगते हैं। वे अपने प्रति दूसरों की राय के बारे में बेहद चिंतित रहते हैं, खासकर इस बारे में कि दूसरे उनके पहनावे, चाल-ढाल और हाव-भाव का कैसे आकलन करते हैं, इस बारे में बहुत चिंतित रहते हैं कि दूसरे उन्हें कैसे देखते हैं—इतना कि यह किस हद तक पहुँच जाता है? इस हद तक कि यह उनके सामान्य जीवन, कार्य और कर्तव्य निर्वहन को प्रभावित करता है। उनके रूप-रंग से उत्पन्न श्रेष्ठता की भावना ने उन्हें बहुत सतही बना दिया होता है, अपने नैन-नक्श को लेकर और इस बात को लेकर वे बहुत चिंतित रहते हैं कि दूसरे उन्हें कैसे देखते हैं। यह किस तरह की समस्या है? क्या ये तमाम अभिव्यक्तियाँ दैनिक जीवन में मुद्दे सँभालने के लिए एक सही रवैया है? (नहीं।) क्या ये विकृत विचार हैं जो उन्होंने अपने दैनिक जीवन के दौरान विकसित कर लिए होते हैं? (हाँ।) तो ये अभिव्यक्तियाँ किससे संबंधित हैं? (ये उनकी मानवता से संबंधित हैं।) यह उनकी मानवता के किस पहलू से संबंधित है? वे जिस तरह से आचरण करते हैं, उसमें क्या समस्या है? क्या यह सतहीपन है? (हाँ।) सतहीपन उनकी मानवता के भीतर एक समस्या होती है। और क्या? मिथ्या गौरव, इस बात की चिंता कि दूसरे उन्हें कैसे देखते हैं, दूसरों की नजर में सर्वोत्तम व्यक्ति बनने की इच्छा और एक विशेष नजाकत, और कठिनाई सहन करने में असमर्थता। इसके अलावा स्वार्थ भी होता है। अपनी छवि बनाए रखने के लिए वे सभी से अपनी सेवा-टहल करवाते हैं, जबकि वे थोड़ी-सी भी कठिनाई सहने से इनकार कर देते हैं। उनके प्राकृतिक रूप-रंग से उत्पन्न श्रेष्ठता का भाव उनमें यह चाहत जगाता है कि हर कोई उनके इर्द-गिर्द घूमे। उनके दैनिक जीवन में उनके ध्यान का केंद्र और जो लक्ष्य वे प्राप्त करना चाहते हैं वह है अपना बाहरी रूप-रंग बनाए रखना। उदाहरण के लिए, एक अवसर पर फोटो खींचते समय किसी व्यक्ति को पता चलता है कि जब वे मुस्कुराते हैं तो उनके दाँतों में सलाद के पत्ते का एक टुकड़ा फँसा दिखता है। उस क्षण से वे पत्तेदार सब्जियाँ खाना बंद कर देते हैं। यहाँ तक कि अगर यही एकमात्र विकल्प उपलब्ध हो और उनके पास इन्हें खाने के सिवा कोई विकल्प न हो तो भी वे खाने के तुरंत बाद कुल्ला कर लेते हैं और बाहर जाकर दूसरों से मिलने की हिम्मत करने से पहले शीशे में देखकर पूरी तरह से यह जाँच लेते हैं कि उनके दाँतों में कुछ फँसा हुआ तो नहीं है। क्या यह उनकी मानवता के भीतर कोई समस्या है? (हाँ।) दैनिक जीवन में ये सामान्य समस्याएँ मानवता के दायरे में आती हैं और भ्रष्ट स्वभाव के स्तर तक नहीं बढ़ी होतीं। जिन समस्याओं से वे निपटते हैं, वे सभी सिर्फ मानव-जीवन के पहलुओं से संबंधित होती हैं—अपने शारीरिक रूप-रंग और आंतरिक अपेक्षाओं पर ध्यान केंद्रित करके वे अपनी सुंदरता और अपने प्रति दूसरों का उच्चस्तरीय ध्यान बनाए रखने की कोशिश करते हैं। वे जो कुछ भी करते हैं—चाहे वह खाना हो, कपड़े पहनना हो या कठिनाई सहना और कीमत चुकाना हो—इन मुद्दों को सँभालने में उनके दृष्टिकोण और उनका रवैया पूरी तरह उनकी बाहरी छवि बनाए रखने की ओर उन्मुख होते हैं ताकि वे हमेशा आँखों को भाते रहें और यह सुनिश्चित हो कि दूसरों पर उनकी अच्छी छाप पड़े और वे उच्चस्तरीय ध्यान आकर्षित करें। क्या इसमें उनकी मानवता शामिल है? (हाँ।) इन तमाम अभिव्यक्तियों में उनकी मानवता शामिल होती है—ये दिखाती हैं कि उनकी मानवता अत्यधिक सतही है।

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