सत्य का अनुसरण कैसे करें (4) भाग चार
उदाहरण 7 : मसालेदार भोजन खाना पसंद करना
कुछ लोग ऐसी जगह पैदा हुए, जहाँ मिर्च खाना आम बात है; शायद जलवायु के कारण या इसलिए कि उनके परिवार को मिर्च खाने की आदत है और उन्हें मिर्च खाना पसंद है, वे उसे रोज खाते हैं और उनके दैनिक आहार में अक्सर मसालेदार स्वाद की प्रधानता रहती है। यह स्पष्ट रूप से एक जन्मजात स्थिति है। यह कौन-सी जन्मजात स्थिति है? (जीवनशैली से जुड़ी आदत।) उनकी जीवनशैली से जुड़ी आदत यह है कि वे अपने दैनिक आहार में मसालेदार स्वादों के बिना नहीं रह सकते; जो कुछ भी वे खाते हैं, उसमें मसालेदार स्वाद होना ही चाहिए। यह पसंद कहाँ तक जाती है? यहाँ तक कि वे मीठे खाद्य पदार्थों में भी मसाला मिलाते हैं, मसालेदार स्वाद वाले हैमबर्गर और पिज्जा खाते हैं और चाय-कॉफी तक में मिर्च डालते हैं—यह है उनके मसालेदार भोजन के सेवन की सीमा। यह एक जीवनशैली से जुड़ी आदत है। क्या इसमें कुछ सही या गलत है? (नहीं।) मसालेदार भोजन की पसंद व्यक्ति के जीवन-परिवेश और जीवनशैली से जुड़ी आदतों के कारण होती है; इसमें कुछ सही या गलत नहीं है। कुछ लोग अत्यधिक मात्रा में मसालेदार भोजन करते हैं; अगर मसालेदार भोजन न हो तो वे नहीं खाएँगे। चाहे तुम इसे स्वीकार कर पाओ या नहीं, वे मसालेदार भोजन खाने पर ही जोर देते हैं और कोई इसे बदल नहीं सकता। संक्षेप में, मिर्च खाने का शौक एक जीवनशैली से जुड़ी आदत है, इसमें कोई समस्या नहीं है और इसमें सत्य शामिल नहीं है। कुछ लोग कहते हैं, “जीवनशैली से जुड़ी यह आदत बहुत चरम पर है; क्या इसे नकारात्मक चीज माना जाना चाहिए? क्या इसकी आलोचना या विनियमन किया जाना चाहिए? क्या हमें कुछ स्वास्थ्य-ज्ञान को बढ़ावा देना चाहिए और यह विचार फैलाना चाहिए कि खाने और जीवनशैली से जुड़ी आदतों के सिद्धांतों में स्वास्थ्य को प्राथमिकता देनी चाहिए?” क्या तुम निश्चित हो सकते हो कि मिर्च और मसालेदार भोजन खाना अस्वास्थ्यकर है? वे कई सालों से, कई पीढ़ियों से इस तरह से खा रहे हैं और काफी स्वस्थ हैं। विशेष रूप से, कुछ स्थानों पर लोग मिर्च इस हद तक खाते हैं कि दूसरों के लिए इसे स्वीकारना मुश्किल है। जब लोग देखते हैं कि उनका भोजन कितना मसालेदार है तो वे असहज महसूस करते हैं, फिर भी ये व्यक्ति मजबूत, स्वस्थ और काफी हृष्ट-पुष्ट होते हैं, जिनमें शारीरिक कार्य करने का दम और सहनशक्ति होती है। यह साबित करता है कि मिर्च खाने से कोई नुकसान नहीं होता और स्वास्थ्य पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता; और ऐसा लगता है कि उनका मसालेदार आहार स्वास्थ्य-सिद्धांतों के अनुरूप भी है। मिर्च खाने की पसंद जीवनशैली से जुड़ी एक जन्मजात आदत है। चाहे दूसरे इसे पसंद करें या न करें, अगर व्यक्ति इसका आनंद लेता है और यह दूसरों के जीवन या आहार को प्रभावित नहीं करती, तो इसे बनाए रखा जा सकता है। इसमें कुछ भी सही या गलत नहीं है; यह कोई बड़ा मुद्दा नहीं है और परमेश्वर का घर इसके बारे में कोई निर्णय नहीं देता। कुछ लोग कहते हैं, “मिर्च खाना पेट के लिए बुरा है।” अगर तुम्हें चिंता है कि यह तुम्हारे पेट के लिए बुरा है तो तुम बस इसे न खाने का विकल्प चुन सकते हो। अगर दूसरे लोग लंबे समय से मसालेदार खाना खा रहे हैं और उनका पेट खराब होता है तो वे इसे खुद ही महसूस कर लेंगे और अपना चुनाव कर लेंगे। इसलिए हर किसी का अपना स्वाद होता है—उसे मीठा स्वाद पसंद है या खट्टा, कड़वा या मसालेदार स्वाद, यह एक व्यक्तिगत मामला है। चाहे तुम जैसे भी खाओ या जितना भी खाओ, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, तुम्हें दोषी महसूस करने की जरूरत नहीं है। जब तक परिस्थितियाँ और परिवेश खाने दें, तब तक तुम तमाम चिंताएँ एक तरफ रखकर बिना किसी संकोच के खा सकते हो। जहाँ तक मेरा संबंध है, इस बारे में कोई नुस्खा नहीं है। अगर किसी को इस बारे में कुछ कहना हो तो तुम जवाब दे सकते हो, “यह मेरी स्वतंत्रता है, यह मेरा अधिकार है और तुम्हें इसमें दखल देने की जरूरत नहीं है। यहाँ तक कि अगर मैं सिर्फ मिर्च का ही भोजन खाऊँ तो भी इससे तुम्हारा कोई लेना-देना नहीं है। इससे मेरा पेट खराब होता है या नहीं, यह मेरी जिम्मेदारी है, तुम्हारी नहीं।” क्या इस तरह बोलना ठीक है? (हाँ।) यह तुम्हारा अपना मामला है; इससे दूसरों का कोई लेना-देना नहीं है और इससे मेरा भी कोई लेना-देना नहीं है। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? क्योंकि इस मामले में सत्य शामिल नहीं है, इसमें भ्रष्ट स्वभाव शामिल नहीं है और यह उन समस्याओं में से एक नहीं है जिन्हें परमेश्वर लोगों को बचाने में हल करना चाहता है। इसलिए जब जीवनशैली से जुड़ी आदतों की समस्याओं की बात आती है तो हम उन्हें नजरंदाज कर सकते हैं। यह कोई सकारात्मक चीज नहीं है, लेकिन यह कोई नकारात्मक चीज भी नहीं है—यह बस कुछ लोगों की पसंद है।
मेजबानी करने वाले कुछ लोग मिर्च खाना पसंद करते हैं और दिन में तीनों बार मसालेदार भोजन करना चाहते हैं। इसलिए जब वे खाना पकाते हैं तो हर बार के भोजन के लिए मसालेदार व्यंजन बनाते हैं। कुछ लोगों को, जिन्होंने कभी मिर्च नहीं खाई होती, इसे झेलना मुश्किल लगता है और वे सुझाव देते हैं कि मसालेदार व्यंजनों के बजाय बिना मसाले के व्यंजन बनाए जाएँ। लेकिन खाना पकाने वाला व्यक्ति इसे स्वीकारने के लिए तैयार नहीं होता और कहता है, “ऐसा नहीं चलेगा। मुझे मसालेदार खाना खाने की आदत है; अगर मैं इसे मसालेदार नहीं बनाऊँगा, तो मुझे इसमें स्वाद नहीं आएगा। तुम्हें मसालेदार खाना खाने का अभ्यास करना चाहिए; कुछ समय तक इसे खाने के बाद तुम्हें इसकी आदत हो जाएगी और तुम मसालेदार खाने से नहीं डरोगे।” यहाँ समस्या क्या है? (उनकी मानवता के साथ समस्या है।) उनकी मानवता में कैसी समस्या है? (वे दूसरों पर चीजें थोपते हैं।) दूसरों पर चीजें थोपना अच्छा नहीं है। क्या यह दूसरों को वह करने के लिए मजबूर करना नहीं है, जो वे नहीं करना चाहते? ऐसे लोग यह मानते हुए अपने हर काम में खुद को केंद्र में रखने की कोशिश करते हैं कि उन्हें जो पसंद है वही सबसे अच्छा है और दूसरों को उसे स्वीकार करना ही चाहिए। अगर उन्हें कुछ पसंद होता है तो वे दूसरों को भी उसे पसंद करने के लिए बाध्य करने की कोशिश करते हैं; हर किसी को चाहिए कि उन्हें संतुष्ट करे। क्या यह स्वार्थी और नीच नहीं है? वे न सिर्फ दूसरों पर चीजें थोपते हैं, बल्कि इसमें थोड़ी दुर्भावना भी होती है। क्या ऐसे व्यक्ति की मानवता अच्छी होती है? (नहीं।) खराब मानवता वाले लोग दूसरों को लाभ नहीं पहुँचा सकते; वे सिर्फ चोट पहुँचा सकते हैं और गंभीर मामलों में वे नुकसान भी पहुँचा सकते हैं। ऐसे लोग बहुत स्वार्थी और नीच होते हैं और वे हद से ज्यादा अशिष्ट भी होते हैं। अगर व्यक्ति में विवेक हो तो वह कह सकता है, “मुझे मसालेदार खाना पसंद है, लेकिन कुछ लोगों को नहीं है। इसलिए खाना बनाते समय मैं सिर्फ अपने बारे में नहीं सोच सकता। मुझे मसालेदार और बिना मसाले वाले, दोनों तरह के व्यंजन बनाने चाहिए, ताकि मैं और बाकी सभी लोग संतुष्ट हों। अपना कर्तव्य निभाते समय मैं जिस सिद्धांत का पालन करता हूँ, वह है हर किसी को संतुष्ट करना, यह सुनिश्चित करना कि हर कोई अच्छी तरह खाए, और सिर्फ खुद पर ध्यान केंद्रित न करना। मुझे यह कर्तव्य सिद्धांतों के अनुसार अच्छी तरह से निभाना चाहिए।” ऐसे व्यक्ति के बारे में तुम क्या सोचते हो? (उसकी मानवता अपेक्षाकृत अच्छी है।) वह किस तरह से अच्छी है? (वह दूसरों का ध्यान रखना और उनकी देखभाल करना जानता है। ऐसा नहीं है कि वह सिर्फ खुद को संतुष्ट करता है।) वह तुलनात्मक रूप से दयालु है, है न? अच्छी मानवता में दयालुता—दूसरों के प्रति विचारशील होना और उनकी देखभाल करना—शामिल है। क्या इसमें व्यक्ति की मानवता शामिल है? (हाँ।) व्यक्ति की उम्र, लिंग या मिजाज कैसा भी हो, अगर उसमें अच्छी मानवता है तो उसके आस-पास के लोग और उससे मिलने-जुलने वाले लोग लाभान्वित होंगे। ज्यादा विशेष रूप से, कुछ लोगों को उससे समर्थन और मदद मिलेगी, जबकि अन्य लोग उसके द्वारा दैनिक जीवन में देखभाल पाएँगे। यह अच्छी मानवता की एक अभिव्यक्ति है।
ऐसे लोग भी हैं जिन्हें मसालेदार खाना इतना पसंद है कि जब वे अपना कर्त्तव्य निभाने बाहर जाते हैं तो वे खाने के समय मसालेदार व्यंजन परोसने वाली जगहें तलाशते हैं। अगर उन्हें एक बार का खाना बिना मसाले वाला खाना पड़े, तो वे अंदर से असहज महसूस करते हैं : “यहाँ मसालेदार भोजन न खा पाने से अपना कर्तव्य निभाना सच में अरुचिकर लगता है। मैं घर जाना चाहता हूँ, जहाँ मैं हर बार मसालेदार भोजन का आनंद ले सकूँ—उसी से मुझे संतोष मिलेगा! मिर्च के बिना किसी चीज में स्वाद नहीं आता; यहाँ तक कि दम देकर पकाया गया सुअर का गोश्त भी अपना स्वाद खो देता है। मुझे क्या करना चाहिए?” तो वे ऐसी जगहें तलाशते रहते हैं, जहाँ वे मिर्च खा सकें। बाद में उन्हें एक ऐसा रेस्तरां मिल जाता है जो मसालेदार भोजन में महारत रखता है, लेकिन वहाँ गाड़ी चलाकर जाने में एक घंटे से ज्यादा समय लगता है। वे कहते हैं, “चाहे वह कितनी भी दूर हो, मुझे जाना ही है! अगर मैंने आज कुछ मसालेदार नहीं खाया तो मैं अपना कर्तव्य नहीं निभाऊँगा। अगर मुझे मेरा मसालेदार भोजन न मिला तो मैं सहज महसूस नहीं करूँगा और दिन नहीं बिता पाऊँगा!” कोई उनसे कहता है, “अभी बाहर का माहौल खतरनाक है और यह इलाका काफी अराजक है! चलो वहाँ खाने नहीं जाते।” लेकिन वे नहीं सुनते और कहते हैं, “डरने की क्या बात है? खाना मायने रखता है! क्या तुम भी अक्सर बाहर नहीं जाते? डरो मत, कुछ नहीं होगा—परमेश्वर हमारी रक्षा करेगा!” खाना खाकर वे प्रसन्न हो जाते हैं। जब तक उन्हें मिर्च और वह स्वादिष्ट भोजन खाने को मिलता रहे जिसके लिए वे लालायित रहते हैं तब तक उन्हें सब ठीक लगता है और वे इतने खुश होते हैं कि नींद में भी मुस्कुराना बंद नहीं कर पाते। यह किस तरह की मानवता है? (एक स्वार्थी और नीच मानवता।) स्वार्थी और नीच होने के अलावा इसकी एक विशेषता और है : जब वे कुछ करना चाहते हैं तो वस्तुनिष्ठ परिवेश या स्थितियों पर विचार नहीं करते। अगर वे अपनी इच्छाएँ और प्राथमिकताएँ पूरी कर पाते हैं तो बस यही मायने रखता है। वे जो चीज खाना चाहते हैं, उसके एक निवाले के लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार रहते हैं—भले ही इसके लिए उन्हें एड़ी-चोटी का जोर क्यों न लगाना पड़े, वे अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए कुछ भी करेंगे। क्या यह सिर्फ स्वार्थी और नीच होना है? क्या यह मनमौजीपन भी नहीं है? (हाँ, है।) यह चरम मनमौजीपन है! जो कोई भी उनके साथ होता है, उसे उनके मनमौजीपन की कीमत चुकानी पड़ती है और उसके कारण शिकायतें झेलनी पड़ती हैं। वे जो कहते और करना चाहते हैं, वही होता है। आज उनका मूड खराब है, इसलिए वे खाना नहीं चाहते। जब उनसे पूछा जाता है कि वे क्यों नहीं खा रहे तो वे कहते हैं, “मैं आज क्रोधित हूँ, मेरा मूड खराब है, इसलिए मेरा खाने का मन नहीं है।” बाद में शाम को जब आराम करने का समय होता है तो वे यह कहते हुए सोने भी नहीं जाते कि उन्हें नींद नहीं आ रही और वे अपनी भावनाएँ व्यक्त करने के लिए गाना चाहते हैं। कोई उन्हें यह कहते हुए मनाने की कोशिश करता है, “अगर तुम गाओगे तो दूसरों की नींद खराब होगी।” वे जवाब देते हैं, “अभी मेरा मूड खराब है। मैं गाना चाहता हूँ। तुम लोग सो पाते हो या नहीं, यह मेरी चिंता का विषय नहीं है। मेरा मूड खराब है, फिर भी कोई मुझे सांत्वना नहीं दे रहा या मेरी परवाह नहीं कर रहा—तुम सभी लोग बहुत स्वार्थी हो!” क्या यह मनमौजी होना नहीं है? वे बेहद मनमौजी होते हैं; वे सही तरह से पेश नहीं आते और जो चाहे करते हैं। जब वे खुश होते हैं तो दूसरों की कोई भी बात उन्हें परेशान नहीं करती और वे यह तक कहते हैं, “मैं एक उदार व्यक्ति हूँ। मुझे छोटी-छोटी बातों पर उलझना पसंद नहीं है।” लेकिन जब वे खुश नहीं होते तो सभी को सँभलकर बोलना पड़ता है, कोशिश करनी पड़ती है कि वे नाराज न हों, क्योंकि ऐसा न करने से बड़ी परेशानी हो सकती है। वे झल्ला सकते हैं, चीजें तोड़ सकते हैं, यहाँ तक कि खाने से मना भी कर सकते हैं। ज्यादा गंभीर मामलों में वे यह कहते हुए अपना कर्तव्य छोड़ना, काम बंद करना और घर जाना चाह सकते हैं, “तुम लोगों में से कोई भी मेरे साथ अच्छी तरह पेश नहीं आता; तुम सब मुझे धौंस देते हो। दुनिया में कोई अच्छा व्यक्ति नहीं है!” क्या यह मनमौजीपन नहीं है? (हाँ, है।) क्या मनमौजीपन व्यक्ति की मानवता के भीतर एक समस्या है? (हाँ।) वे बेहद मनमौजी होते हैं—सभी को उन पर ध्यान देना पड़ता है, और अगर चीजें उनके हिसाब से नहीं होतीं तो वे तुरंत शत्रु हो जाते हैं और उनका विस्फोटक गुस्सा भड़क उठता है। कोई उनका विरोध नहीं कर सकता और सभी को उन्हें मनाना पड़ता है। भले ही वे अब युवा न रहे हों, लेकिन उनकी मानवता एक बच्चे की तरह अपरिपक्व बनी रहती है। चाहे वे कहीं भी अपना कर्तव्य निभाएँ, वे कभी सार्वजनिक नियमों का पालन नहीं करते। जब वे खुश होते हैं और बात करना चाहते हैं तो सभी को सुनना पड़ता है और अगर कोई नहीं सुनता तो वे उस व्यक्ति के खिलाफ़ द्वेष पाल लेते हैं। जब तुम उनसे बात करते हो तो तुम्हें मुस्कुराना पड़ता है; अगर तुम कोई हाव-भाव नहीं दिखाते और सुनने के लिए तैयार नहीं दिखते तो वे गुस्सा हो जाते हैं और अपना आपा खो देते हैं। कलीसिया में वे जो चाहें जब चाहें करते हैं, बिना इस बात की परवाह किए कि इससे दूसरों की सामान्य जीवन-चर्या पर क्या असर पड़ेगा। अगर वे सहज महसूस करते हैं और अच्छे मूड में होते हैं तो उनके लिए यही सब मायने रखता है, और दूसरों को कोई आपत्ति नहीं उठाने दी जाती। अगर कोई घृणा या नाखुशी दिखाने के लिए आपत्ति उठाता है तो इससे वे भड़क उठते हैं और इसे छोड़ते नहीं। ऐसे कुछ लोग अपरिपक्व मानवता वाले युवा होते हैं, लेकिन अन्य लोग चालीस, पचास, यहाँ तक कि सत्तर या अस्सी वर्ष की आयु के होते हैं और बुढ़ापे में भी उनमें ऐसी ही मानवता होती है, वे विशेष रूप से मनमौजी होते हैं। चाहे परिवेश या स्थितियाँ इसकी अनुमति दें या नहीं, वे जो चाहें करते हैं। उदाहरण के लिए, वे ऐसी जगह पहुँचते हैं जहाँ नहाने की स्थितियाँ नहीं होतीं, लेकिन वे नहाने पर जोर देते हैं और कहते हैं, “घर पर मैं रोज नहाता हूँ; मैं बिना नहाए नहीं रह सकता।” लेकिन इस जगह उचित स्थितियाँ नहीं होतीं; हफ्ते में एक बार नहाना भी मुश्किल होता है। तो तुम क्या करोगे? सामान्य मानवता वाला व्यक्ति जानता है कि इस स्थिति से कैसे पेश आना है और इसे कैसे सँभालना है। अगर मौसम नम और घुटन भरा है तो पानी का एक बर्तन लेकर रात में बस शरीर पोंछकर सो जाना ही काफी है—यह एक ऐसी कठिनाई है जिसे सहा जा सकता है। इस पर काबू पाना असंभव नहीं है। लेकिन ऐसा व्यक्ति इसे नहीं सँभाल पाता; अगर वह नहाता नहीं तो वह सो नहीं पाता, खा नहीं पाता, यहाँ तक कि उसे लगता है कि वह जीवित नहीं रह पाएगा, मानो वह बहुत बड़ा अपमान सह रहा हो। कितना मनमौजी है वह? वह इतना मनमौजी है कि अपना कर्तव्य सामान्य रूप से नहीं निभा पाता, दूसरों के साथ सामान्य रूप से बातचीत नहीं कर पाता या मिलजुलकर नहीं रह पाता, यहाँ तक कि एक सामान्य व्यक्ति की तरह जी भी नहीं पाता। दूसरों को ऐसे व्यक्ति ऐसे लगते हैं जैसे उनमें कोई मनोविकार हो। अगर उनका किसी के साथ अच्छा रिश्ता होता है तो वे हमेशा साथ रहते हैं, मानो वे दो जिस्म एक जान हों। लेकिन अगर उनका किसी के साथ बुरा रिश्ता होता है या अगर किसी ने कभी उन्हें नाराज किया होता है तो वे उस व्यक्ति से बात किए बिना अपना पूरा जीवन बिता सकते हैं। जब वे उसे देखते हैं तो वे अपनी आँखें फेर लेते हैं और उनका चेहरा तुरंत काला पड़ जाता है मानो वे किसी दुश्मन का सामना कर रहे हों—ठेठ अतिवादी। क्या ऐसे व्यक्ति की मानवता सामान्य होती है? (नहीं।) ऐसे व्यक्ति अत्यधिक मनमौजी होते हैं और उनकी मानवता सामान्य नहीं होती। “सामान्य नहीं होने” का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि उनमें सामान्य मानवता नहीं होती। क्या ऐसे लोग दूसरों के साथ सामान्य मेलजोल और सहयोग कर सकते हैं? क्या वे लोगों के बीच सामान्य रूप से जी सकते हैं? क्या वे अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभा सकते हैं? (नहीं।) अगर वे अपना लक्ष्य प्राप्त करना चाहते हैं—चाहे वह भोजन करना हो, अच्छे व्यवहार का आनंद लेना हो या कुछ ऐसा करना हो जो वे करना चाहते हों—तो वह पूरा होना चाहिए। अगर नहीं तो ऐसा लगता है मानो आसमान गिर रहा हो, मानो उनकी दुनिया खत्म होने वाली हो। वे बेचैन हो जाते हैं और बड़बड़ाना शुरू कर देते हैं, दूसरों के बारे में शिकायत करते हैं, परिवेश के बारे में शिकायत करते हैं, यहाँ तक कि यह कहते हुए परमेश्वर के बारे में भी शिकायत करते हैं, “परमेश्वर ने मेरे लिए कैसे परिवेश का इंतजाम किया है जिससे मुझे इतना कष्ट हो रहा है? दूसरों को ऐसे परिवेश का सामना क्यों नहीं करना पड़ा और इस तरह से कष्ट क्यों नहीं सहना पड़ा? मैं ही क्यों कष्ट सह रहा हूँ? परमेश्वर पक्षपाती है!” देखो, उनका राक्षसी स्वभाव उभर आया है, है न? क्या ऐसी मानवता मानक स्तर की है? (नहीं।) ऐसे लोगों से निपटा जाना चाहिए। ऐसे व्यक्ति से कैसे निपटा जाना चाहिए? (उसे एक साधारण कलीसिया में भेज दो।) अगर वह उस बिंदु तक पहुँच जाता है जहाँ वह अब अपना कर्तव्य नहीं निभा सकता, अपना कर्तव्य निभाते समय विघ्न-बाधाएँ ही पैदा करता है, जिससे उसे देखने वाला हर व्यक्ति घृणा और नाराजगी ही महसूस करता है और दूसरे लोग उसके साथ मिलजुलकर नहीं रह पाते तो उसे तुरंत चलता कर देना चाहिए—ऐसा व्यक्ति कुत्ते के बदबूदार मल जैसा होता है। मनमौजीपन में स्वार्थी, नीच और साथ ही अतार्किक रूप से असभ्य होना शामिल है। कभी-कभी इसमें अत्यधिक मतलबी, कठोर, यहाँ तक कि क्रूर और दुर्भावनापूर्ण होना भी शामिल होता है। जब ऐसा व्यक्ति कुछ समय के लिए अपना कर्तव्य निभाता है तो सभी को बहुत नुकसान होता है और जो भी उसे देखता है, भयभीत हो जाता है। अगर तुम उससे बचने की कोशिश करते हो और उसे उकसाते नहीं, तो भी उसके पास कहने के लिए कुछ होगा : “तुम किससे छिप रहे हो, चोर से? मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है जो तुम मुझसे बच रहे हो?” लेकिन अगर तुम उसके पास जाते हो और कुछ कहने की कोशिश करते हो, तो भी वह तुमसे सामान्य बातचीत नहीं करेगा। उसमें सामान्य मानवता नहीं होती और जो लोग उसके साथ बातचीत करते हैं, वे न सिर्फ मौखिक नुकसान झेलते हैं, बल्कि अपनी ईमानदारी का नुकसान, भावनात्मक नुकसान, यहाँ तक कि कुछ शारीरिक नुकसान भी झेलते हैं। ऐसे लोग वास्तव में घृणित होते हैं! क्या उन्हें बुरी मानवता वाले लोगों के रूप में वर्गीकृत करना उचित होगा? (हाँ।) ऐसे व्यक्ति में बुरी मानवता होती है और वह मनमौजी होता है। मनमौजी व्यक्ति न सिर्फ दूसरों का उन्नयन करने में विफल रहता है, बल्कि उन्हें नाराजगी और घृणा भी महसूस कराता है और वह किसी के साथ मिलजुलकर नहीं रह पाता। मुझे बताओ, क्या मनमौजी व्यक्ति सत्य स्वीकार सकता है? (नहीं।) तो उसके अंदर किस तरह का स्वभाव होता है? (हठधर्मिता का।) उसकी हठधर्मिता जाहिर है, लेकिन कुछ और भी है—वह क्या है? (सत्य से विमुख होना।) सही कहा। हठधर्मी होने और सत्य से विमुख होने के भ्रष्ट स्वभाव होना—ये मनमौजी लोगों की दो विशेषताएँ हैं। ऐसा व्यक्ति न सिर्फ मनमौजी होता है, बल्कि स्वार्थी और अतार्किक रूप से अशिष्ट भी होता है। उसकी अतार्किक रूप से अशिष्टता में दूसरों को अनुचित और मनमाने ढंग से परेशान करने का तत्त्व शामिल होता है। जब तुम उससे मेलजोल करते हो तो दयालुता से बात करना काम नहीं आता—उसे लगता है कि तुम्हारे गुप्त इरादे हैं। अगर तुम सख्ती से बात करते हो तो उसे लगता है कि तुम उसे कमजोर समझकर दबा रहे हो, लेकिन जब उसकी उच्छृंखलता से दूसरों को नुकसान पहुँचता है तो वह फिर भी कहेगा, “मेरा इरादा तुम्हें ठेस पहुँचाने का नहीं था। अगर तुम्हें ठेस लगी हो तो मैं माफी माँगता हूँ।” हालाँकि ये शब्द अच्छे लगते हैं लेकिन जब वह व्यक्ति जिसे ठेस पहुँची है, उसे माफ नहीं करता, यहाँ तक कि उसकी आलोचना भी करता है तो उच्छृंखल व्यक्ति क्रोधित हो जाता है और कहता है, “तुम बस इसे छोड़ नहीं सकते—क्या तुम मेरी माफी का फायदा नहीं उठा रहे? क्या तुम्हें लगता है कि मेरे माफी माँग लेने के कारण मुझे आसानी से धौंस दी जा सकती है? और अब तुम मेरी कमियाँ बता रहे हो! क्या मुझमें कमियाँ हैं? क्या तुम उन्हें बताने के काबिल हो?” क्या यह सत्य को स्वीकार न करने का मामला नहीं है? (हाँ, है।) इसमें उसका भ्रष्ट स्वभाव शामिल है। उसकी मानवता के ये लक्षण स्वाभाविक रूप से भ्रष्ट स्वभावों के कुछ लक्षणों में भी अभिव्यक्त होते हैं—वे जुड़े हुए हैं। ऐसे लोगों के भ्रष्ट स्वभावों की विशेषताओं में हठधर्मिता, सत्य से विमुखता और थोड़ी-बहुत क्रूरता शामिल है। ये पहलू उनके भ्रष्ट स्वभावों के लक्षण हैं।
उदाहरण 8 : मानवीय सहज-प्रवृत्तियाँ
जन्मजात स्थितियों में एक और पहलू शामिल है, जो मानवीय सहजवृत्ति है। उदाहरण के लिए, कुछ लोग परमेश्वर में विश्वास करने के बाद सीसीपी सरकार द्वारा परमेश्वर के चुने हुए लोगों का उन्मत्त दमन, उनकी गिरफ्तारियाँ और उनके साथ क्रूर व्यवहार देखकर भयभीत, उद्वेलित, हो जाते हैं, कातर बन जाते हैं और डर जाते हैं। कभी-कभी उनके पैरों में भी जान नहीं रहती और वे लगातार शौचालय जाना चाहते हैं। यह किस चीज की अभिव्यक्ति है? (सहजवृत्ति की।) यह एक सहजवृत्तिजन्य प्रतिक्रिया है। सामान्य मानवता के भीतर, जब कुछ भयावह घटनाओं, लोगों के जीवन से जुड़ी स्थितियों या उन्हें ख़तरे में डाल सकने वाले मामलों की बात आती है तो चाहे वह जानकारी सुनने पर हो या वास्तविकता से सामना होने पर, उनमें कुछ सहजवृत्तिजन्य प्रतिक्रियाएँ होंगी, वे कातर और डरे हुए महसूस करेंगे। साथ ही, उनके शरीर प्राकृतिक रूप से कुछ सामान्य प्रतिक्रियाएँ प्रदर्शित करेंगे, जैसे कि घबराहट, मांसपेशियों में ऐंठन, अस्थायी बहरापन या अंधापन, साथ ही शुष्क मुँह, कमजोर पैर, अत्यधिक पसीना आना, मूत्राशय या आँतों पर नियंत्रण खोना। क्या ये प्रतिक्रियाएँ होने की संभावना है? (हाँ।) ये प्रतिक्रियाएँ चाहे तंत्रिका-तंत्र द्वारा नियंत्रित हों या किसी अन्य कारण से उत्पन्न हों, हर हालत में बाहरी कारक द्वारा देह में उत्पन्न प्रतिक्रियाएँ हैं और इन प्रतिक्रियाओं को सामूहिक रूप से सहजवृत्ति कहा जाता है। शरीर की सहन करने की क्षमता की अपनी सीमाएँ होती हैं; जब वह व्यक्ति के साहस की सीमाएँ पार कर जाती है तो शरीर कुछ सहजवृत्तिजन्य प्रतिक्रियाएँ प्रदर्शित करेगा। इन प्रतिक्रियाओं को दूसरे लोग कमजोरी समझ सकते हैं या वे हास्यास्पद, दयनीय या सहानुभूति के योग्य लग सकती हैं, लेकिन ये अकाट्य रूप से व्यक्ति की जन्मजात सहजवृत्तियों की अभिव्यक्तियाँ हैं। ऐसे लोग भी हैं जो खतरे से सामना होने पर अपना सिर पकड़कर रोएँगे, आँसू बहाएँगे, यहाँ तक कि जोर से चिल्लाएँगे; दूसरे लोग छिपने के लिए किसी अँधेरे कोने में सिकुड़ सकते हैं—ऐसी सभी प्रतिक्रियाएँ सहजवृत्तिजन्य प्रतिक्रियाएँ हैं। ये सहजवृत्तिजन्य प्रतिक्रियाएँ, चाहे वह रोना हो, हँसना हो या इतना ज्यादा भयभीत हो जाना कि वे कुछ अपमानजनक कर दें—क्या इनमें कुछ सही या गलत है? (नहीं।) तो जो लोग सरकार द्वारा विश्वासियों को गिरफ्तार किए जाने के बारे में सुनकर डर जाते हैं, क्या हम उनके बारे में यह कह सकते हैं कि वे लोग कायर हैं और उनमें मानवता नहीं है? (नहीं।) क्या यह कथन, “ईश्वर में विश्वास करना आस्था के साथ आना चाहिए; व्यक्ति को डरना नहीं चाहिए!” सही है? (नहीं।) “यह कमजोरी है, कायरता और अक्षमता की अभिव्यक्ति है। यह परमेश्वर में विश्वास की कमी दर्शाती है और यह भी दर्शाती है कि वे परमेश्वर पर भरोसा करना नहीं जानते। ऐसा व्यक्ति विजेता नहीं है!” क्या हम यह कह सकते हैं? (नहीं।) क्यों नहीं? (यह सिर्फ एक शारीरिक प्रतिक्रिया है जो तब होती है जब कोई व्यक्ति बाहरी परिस्थितियों का सामना करता है।) यह एक सामान्य शारीरिक प्रतिक्रिया है, न कि भ्रष्ट स्वभाव से प्रेरित अभिव्यक्ति। इसका मतलब यह है कि जब लोगों में ऐसी परिस्थितियों में ये अभिव्यक्तियाँ और प्रकाशन होते हैं तो यह भ्रष्ट स्वभाव के प्रभाव के कारण नहीं होता, न ही ऐसा इसलिए होता है कि उनकी मानवता के भीतर कुछ विचार या दृष्टिकोण उनके ऊपर हावी हो रहे होते हैं। ये प्रतिक्रियाएँ कोई ऐसी चीज नहीं होतीं जिसकी तुम पहले से कल्पना कर लो; ऐसा नहीं है कि ऐसी परिस्थितियों से सामना होने पर तुम्हारे मन में अचानक अजीबोगरीब विचार आते हैं और फिर जब तुम इसके बारे में ज्यादा सोचते हो तो तुम घबरा जाते हो, तुम्हारा शरीर ऐंठने लगता है, यहाँ तक कि तुम अपने मूत्राशय या आँतों पर नियंत्रण खो देते हो। इन प्रतिक्रियाओं के पीछे यह कारण नहीं होता। बल्कि ऐसा इसलिए होता है कि इन घटनाओं या इस समाचार के बारे में सुनने के बाद बिना किसी सुचिंतित विचार के, बिना किसी मानसिक छनाई या प्रसंस्करण के तुम्हारा शरीर प्राकृतिक रूप से कुछ सहजवृत्तिजन्य शारीरिक प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करता है। तो ऐसी प्राकृतिक प्रतिक्रिया शरीर की सहजवृत्तियों द्वारा उत्पन्न होती है। इसमें कुछ सही या गलत नहीं होता, ताकत और कमजोरी के बीच का कोई अंतर नहीं होता और निश्चित रूप से सकारात्मक और नकारात्मक के बीच का कोई अंतर नहीं होता। कुछ लोग कहते हैं, “चाहे सरकार कैसे भी गिरफ्तारियाँ करे, मैं नहीं डरता!” मैं कहूँगा, तो यह तुम्हें मूर्ख बनाता है। जब बड़ा लाल अजगर तुम्हें प्रताड़ित करेगा, तब देखेंगे तुम डरते हो या नहीं—उस समय तुम्हारे लिए चीख रोकना असंभव होगा। जब दर्द अपने चरम पर पहुँचेगा तो क्या सोचोगे? “मैं मरना पसंद करूँगा। मरकर मैं आजाद हो जाऊँगा, फिर मुझे दर्द नहीं होगा।” ये सब शरीर की सहजवृत्तिजन्य प्रतिक्रियाएँ हैं और इनमें से कोई भी समस्या नहीं है। कुछ लोग कह सकते हैं, “मैं नहीं डरता; अगर कोई मुझे पीटेगा तो मैं जवाबी हमला करूँगा, और अगर मैं जीत न पाया तो बस भाग जाऊँगा।” लेकिन जब तुम भागोगे और कोई तुम पर बंदूक तान देगा तो तुम्हारे पैरों में जान नहीं रहेगी, तुम्हारा दिल कातर बन जाएगा और तुम नहीं चिल्लाओगे, “मैं नहीं डरता”। जब तुम्हारा जीवन दाँव पर लगा होगा तो तुम भी मरने से डरोगे—यह तुम्हारी सहजवृत्तिजन्य प्रतिक्रिया है। चूँकि ये सहजवृत्तिजन्य प्रतिक्रियाएँ हैं, इसलिए चाहे व्यक्ति में जो भी अभिव्यक्तियाँ हों या मानवीय कमजोरी के जो भी प्रकाशन हों, इसे गलत नहीं माना जाता, न ही यह शर्मनाक है और परमेश्वर इसकी निंदा नहीं करता। प्राकृतिक रूप से, तुम्हें इन प्रतिक्रियाओं को रोकने की कोशिश नहीं करनी चाहिए और देखने वालों को भी उनका मजाक नहीं उड़ाना चाहिए, क्योंकि सभी एक-जैसे हैं—हर कोई मांस और खून से बना है। मांस और खून की सहजवृत्तिजन्य प्रतिक्रियाएँ ऐसी ही होती हैं; तुम ऐसे हो, वे ऐसे हैं, हर व्यक्ति ऐसा है। यह ऐसा ही है जैसे भेड़िये से सामना होने पर व्यक्ति की पहली सहजवृत्तिजन्य प्रतिक्रिया क्या होती है? “भागो! जितना तेज भाग सको, भागो!” और भागते समय वे यह देखते हुए कि भेड़िया उन्हें पकड़ तो नहीं लेगा, चिंता करते हैं : “क्या होगा अगर उसने मुझे पकड़ लिया? क्या होगा अगर उसने मेरी गर्दन पर काट लिया—क्या मैं मर जाऊँगा? काश मेरे पास बंदूक या लोहे की छड़ होती।” वे इन चीजों के बारे में सिर्फ भागते समय सोचते हैं। लेकिन चाहे तुम इस बारे में जो भी सोचो, तुम्हारी पहली सहजवृत्तिजन्य प्रतिक्रिया निश्चित रूप से जल्दी से जल्दी उसके पीछा करने से बचना, जितना हो सके उतनी तेजी से और दूर भागना, पकड़े और खाए जाने से बचना होती है। ये सब सहजवृत्तिजन्य प्रतिक्रियाएँ हैं। तुम्हारी सहजवृत्तिजन्य प्रतिक्रिया क्या है? वह है खुद को बचाना, अपने जीवन की रक्षा करना और यह सुनिश्चित करना कि तुम्हारा जीवन खतरे में न पड़े। चाहे ये सहजवृत्तिजन्य प्रतिक्रियाएँ देखने वाले को कायरतापूर्ण, असहनीय या शर्मनाक लगें, ये वास्तव में शर्मनाक नहीं हैं, क्योंकि ये मांस और रक्त से बने लोगों की सामान्य अभिव्यक्तियाँ हैं; ये प्राकृतिक प्रकाशन हैं। एक सहजवृत्तिजन्य प्रतिक्रिया बस एक प्राकृतिक प्रकाशन है और उसमें कुछ भी शर्मनाक नहीं है। उदाहरण के लिए, जब तुम कोई चुटकुला सुनोगे तो हँसोगे। अगर तुम्हारे मुँह में भोजन या पानी हो तो भी तुम हँसोगे, क्योंकि यह एक सहजवृत्तिजन्य प्रतिक्रिया है। सहजवृत्तिजन्य प्रतिक्रिया ईश्वर प्रदत्त, जन्मजात कार्य होता है, जो प्राकृतिक रूप से तब घटित होगा जब परिस्थितियाँ सही होंगी। इसलिए जब सहजवृत्तिजन्य प्रतिक्रियाओं की बात आती है तो वे प्राकृतिक प्रकाशन होती हैं। वे मानवता की कमजोरी या दोष के प्रकाशन हो सकते हैं या वे तुम्हारी देह की प्राकृतिक अभिव्यक्ति के प्रकाशन हो सकते हैं। जो भी हो, चूँकि यह एक सहजवृत्तिजन्य प्रतिक्रिया है, इसलिए कुछ सही या गलत नहीं है। अगर तुम्हें शर्म आती है तो यह दर्शाता है कि तुममें अंतर्दृष्टि की कमी है और तुम्हारी मानवता काफी सतही है—तुम दूसरों पर अच्छा प्रभाव छोड़ना चाहते हो। अगर तुम अपनी सहजवृत्तिजन्य प्रतिक्रियाओं को रोकने की कोशिश करते हो तो यह साबित होता है कि तुम मूर्ख हो और तुम्हारे विवेक में समस्या है। विशेष खतरनाक परिवेशों और परिस्थितियों में, भले ही तुम इतने भयभीत हो कि तुम्हारी पतलून गीली हो जाए, तुम्हें इसे शर्मनाक नहीं समझना चाहिए। असल में, यह सामान्य मानवता की अभिव्यक्ति है। ऐसी परिस्थितियों में किसी में भी ये अभिव्यक्तियाँ हो सकती हैं—यहाँ तक कि प्रसिद्ध या महान लोग भी इसके अपवाद नहीं हैं। कड़ी परिस्थितियों में कोई अतिमानव नहीं होता—तुम सिर्फ एक साधारण व्यक्ति हो, कुछ खास नहीं, और तुम्हारे पास शेखी बघारने लायक कुछ नहीं है। यहाँ तक कि अगर तुम इतने डर जाते हो कि तुम्हारी पतलून गीली हो जाती है और दूसरों को इसका पता चल जाता है तो भी यह कोई शर्मनाक बात नहीं है, क्योंकि इस तरह लोग तुम्हारा आदर नहीं करेंगे या तुम्हारी पूजा नहीं करेंगे, और कम से कम, तुम सुरक्षित रहोगे। यह अब स्पष्ट हो जाना चाहिए, है ना? सहजवृत्तिजन्य मानवीय प्रतिक्रियाएँ बहुत सामान्य और स्वाभाविक हैं। उदाहरण के लिए, जब तुम्हारे बाल गंदे होते हैं और तुम्हारी खोपड़ी में खुजली होती है तो तुम सहजवृत्तिजन्य रूप से उसे खुजलाते हो। भले ही बाद में तुम्हारे नाखून गंदगी से भर जाएँ और लोग तुम्हें अशोभनीय या अस्वास्थ्यकर समझें, तुम क्या कर सकते हो? जब तुम्हारे बाल गंदे होंगे तो उनमें गंदगी होगी, क्योंकि तुम मांस और रक्त हो, धूल से बने हो और तुम्हें यह तथ्य स्वीकारना चाहिए। यह स्थिति बस तुम्हें यह बता रही है कि तुम्हारे बाल गंदे हैं और उन्हें धोने की जरूरत है। जब तुम्हारी खोपड़ी में खुजली होती है तो खुजलाना एक सहजवृत्तिजन्य प्रतिक्रिया है। सहजवृत्तिजन्य प्रतिक्रिया एक प्राकृतिक, सामान्य प्रतिक्रिया है, जो ईश्वर द्वारा बनाई गई जन्मजात स्थितियों और तंत्रिका-तंत्र के तहत एक सामान्य अभिव्यक्ति है। भले ही कभी-कभी ये अभिव्यक्तियाँ तुम्हें शर्मिंदा, अशोभनीय या अप्रतिष्ठित महसूस करा सकती हैं, फिर भी तुम्हें उन्हें बदलने या रोकने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। एक बात तो यह है कि ऐसा करने से तुम्हें मानवीय प्रवृत्तियों के साथ सही तरीके से पेश आने में मदद मिलती है; दूसरी बात यह है कि यह तुम्हारे आचरण के लिए भी उन्नयनकारी और लाभकारी है। एक बार जब तुम इस पहलू के बारे में एक निश्चित समझ और जागरूकता हासिल कर लेते हो तो दूसरों के साथ बातचीत और व्यवहार करते समय अगर मानवीय दैहिक सहजवृत्ति के कुछ पहलू प्राकृतिक रूप से अभिव्यक्त और प्रकट होते हैं तो तुम्हें उन्हें जानबूझकर छिपाने की जरूरत नहीं होगी। और अगर कभी-कभी कोई शर्मनाक स्थिति वास्तव में उत्पन्न हो ही जाती है तो उसे समझाने या छिपाने या दिखावा करने की कोई जरूरत नहीं होगी, क्योंकि यह सामान्य मानवता का प्रकाशन है और यह एक सहज मानवीय प्रतिक्रिया भी है—यह सब उन सीमाओं के भीतर है जिसे एक सामान्य व्यक्ति स्वीकार सकता है। उदाहरण के लिए, जब लोग फलियाँ खाते हैं तो उनके शरीर में प्राकृतिक रूप से कुछ गैस बनती है और सहजवृत्तिजन्य रूप से वे डकार लेंगे या गैस निकालेंगे। यह एक बहुत ही प्राकृतिक बात है। युवा स्त्री-पुरुष अक्सर महसूस करते हैं कि ऐसी अभिव्यक्तियाँ शर्मनाक हैं, लेकिन असल में इसमें कुछ भी शर्मनाक नहीं है। यह शरीर की एक सामान्य सहजवृत्तिजन्य प्रतिक्रिया है और इसका आचरण या क्रियाकलाप करने के सिद्धांतों से कोई लेना-देना नहीं है। हालाँकि कुछ लोग शायद इसे न समझ सकें या वे इससे असंतुष्ट हो सकते हैं, लेकिन यह निश्चित रूप से व्यक्ति के स्व-आचरण के लिए कोई सीमा न होने, खराब परवरिश होने, अनियंत्रित, उच्छृंखल, स्वार्थी होने या खराब या बुरी मानवता होने के स्तर तक नहीं पहुँचता—इसे इस हद तक बढ़ाने की कोई जरूरत नहीं है। यह मुद्दा स्व-आचरण से जुड़ा नहीं है और निश्चित रूप से इसका भ्रष्ट स्वभाव से कोई लेना-देना नहीं है। मामले को बढ़ा-चढ़ाकर कहने की कोई जरूरत नहीं है। इन चीजों के साथ सही तरीके से पेश आना चाहिए।
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?